सोमवार, 5 अक्टूबर 2026
भाजपा का ‘वार’ विपक्ष ‘लाचार’
भाजपा ने कसी कमर, 60 सीटों को फोकस में रखकर मैदान सजाने की कवायद
बाकी 10 सीटों पर कांग्रेस, निर्दलीय और छोटे दलों के बीच जमीन बचाने की जंग
2027 के लिए भाजपा का बड़ा दांव, कांग्रेस के सामने अस्तित्व बचाने की चुनौती
देहरादून। उत्तराखंड की सियासत में 2027 का चुनावी रण अभी दूर है, लेकिन भाजपा ने अपनी रणनीति का खाका खींचना शुरू कर दिया है। 70 विधानसभा सीटों वाली बिसात पर भाजपा की नजर 60 सीटों पर है। पार्टी ने इन सीटों को केंद्र में रखकर संगठन को सक्रिय करने, कमजोर कड़ियों को दुरुस्त करने और बूथ स्तर तक चुनावी तैयारी को धार देने की कवायद शुरू कर दी है। भाजपा के 60 पार लक्ष्य ने विपक्ष के सामने भी चुनौती खड़ी कर दी है। कांग्रेस के लिए मामला अब सिर्फ अपनी सीटें बढ़ाने का नहीं, बल्कि भाजपा को उसके घोषित लक्ष्य तक पहुंचने से रोकने की राजनीतिक लड़ाई का भी है। वहीं बची हुई सीटों पर निर्दलीय, क्षेत्रीय दल और छोटे राजनीतिक समूह अपने लिए जगह तलाशेंगे।
भाजपा की खासियत उसका संगठनात्मक ढांचा है और इस बार भी पार्टी चुनावी तैयारी को अंतिम दौर तक टालने के मूड में नहीं दिख रही। बूथ, शक्ति केंद्र और मंडल स्तर पर गतिविधियों को तेज करने के साथ उन सीटों पर विशेष फोकस किया जा रहा है जहां पार्टी को अतिरिक्त मेहनत की जरूरत महसूस होती है। 60 पार का लक्ष्य अपने आप में बड़ा राजनीतिक संदेश है। इसका अर्थ है कि भाजपा केवल अपनी मजबूत सीटों पर निर्भर रहने के बजाय प्रदेश के लगभग हर हिस्से में मुकाबला खड़ा करने की तैयारी में है। यानी भाजपा की लड़ाई सिर्फ सत्ता बचाने की नहीं, अपने चुनावी दायरे को अधिकतम करने की है।
भाजपा ने यदि 60 सीटों को लक्ष्य बनाया है तो कांग्रेस के सामने राजनीतिक चुनौती साफ है। उसे एक तरफ अपने मजबूत क्षेत्रों को बचाना होगा, दूसरी तरफ उन सीटों पर वापसी की कोशिश करनी होगी जहां पिछली बार पार्टी कमजोर रही। लेकिन कांग्रेस की राह में संगठनात्मक समन्वय और नेतृत्व के सवाल भी हैं। वरिष्ठ नेताओं की सक्रियता, उनके बीच तालमेल, टिकट की दावेदारी और स्थानीय गुटबाजी जैसे मुद्दे चुनावी रणनीति पर असर डाल सकते हैं। कांग्रेस के लिए सबसे अहम सवाल यह होगा कि क्या वह भाजपा के व्यापक संगठनात्मक अभियान के मुकाबले समय रहते अपना चुनावी नेटवर्क उसी स्तर तक सक्रिय कर पाती है।
भाजपा ने 60 सीटों को अपने फोकस में रखा है तो बाकी 10 सीटें राजनीतिक रूप से खास दिलचस्प हो सकती हैं। यहां कांग्रेस के साथ-साथ निर्दलीय और छोटे दलों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। उत्तराखंड में स्थानीय मुद्दों और उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़ कई बार दलगत समीकरणों को प्रभावित करती रही है। ऐसे में कुछ सीटों पर मुकाबला सीधे भाजपा बनाम कांग्रेस तक सीमित रहने के बजाय बहुकोणीय हो सकता है। छोटे दलों के सामने चुनौती यह है कि वह अपने मुद्दों को चुनावी विमर्श में कितना स्थान दिला पाते हैं। निर्दलीयों के लिए चुनौती अपनी व्यक्तिगत राजनीतिक जमीन को वोट में बदलने की होगी।
भाजपा के लिए 60 सीटों का लक्ष्य घोषित करना आसान है, लेकिन उसे जमीन पर साधना अलग चुनौती है। 70 में से 60 सीटों पर प्रभावी मुकाबले की तैयारी का मतलब है कि पार्टी को लगभग हर क्षेत्र में संगठन, उम्मीदवार और स्थानीय समीकरणों पर बारीकी से काम करना होगा, जहां पार्टी मजबूत है, वहां प्रदर्शन कायम रखना होगा। जहां कमजोर है, वहां सेंध लगाने की रणनीति बनानी होगी और जहां स्थानीय असंतोष या बहुकोणीय मुकाबला है, वहां टिकट चयन सबसे महत्वपूर्ण हथियार बन सकता है। यहीं से भाजपा की असली परीक्षा शुरू होगी।
जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आएंगे, 60 सीटों का फोकस टिकट के दावेदारों की संख्या भी बढ़ा सकता है। हर विधानसभा में पार्टी के भीतर कई संभावित चेहरे सक्रिय होंगे। ऐसे में संगठन के लिए सबसे बड़ी चुनौती केवल मजबूत उम्मीदवार तलाशना नहीं, बल्कि टिकट कटने या दावेदारी कमजोर पड़ने की स्थिति में संभावित असंतोष को संभालना भी होगी। कांग्रेस में भी यही स्थिति रहने वाली है। दोनों दलों में टिकट वितरण के दौरान स्थानीय समीकरण, गुटीय संतुलन और जीत की रणनीति के बीच तालमेल बैठाना अहम होगा।
भाजपा के 60 पार अभियान का जवाब केवल सरकार विरोधी मुद्दे गिनाने से नहीं दिया जा सकता। कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दलों को यह तय करना होगा कि वे किन सीटों पर अपना पूरा राजनीतिक जोर लगाएंगे और किन मुद्दों को लेकर जनता के बीच जाएंगे। रोजगार, पलायन, भू-कानून, महंगाई, स्थानीय विकास, पहाड़ और मैदान का संतुलन जैसे मुद्दे चुनावी बहस का हिस्सा बन सकते हैं। लेकिन इन मुद्दों को वोट में बदलने के लिए विपक्ष को संगठनात्मक तैयारी और स्थानीय नेतृत्व की जरूरत होगी। उत्तराखंड की 70 सीटों पर चुनावी युद्ध अभी औपचारिक रूप से शुरू नहीं हुआ है, लेकिन राजनीतिक सेनाएं अपनी-अपनी तैनाती शुरू कर चुकी हैं। भाजपा ने 60 सीटों का लक्ष्य सामने रखकर मैदान की घेराबंदी शुरू कर दी है। कांग्रेस के सामने इस घेराबंदी को तोड़ने की चुनौती है, जबकि छोटे दल और निर्दलीय अपने प्रभाव वाले इलाकों में राजनीतिक जगह बचाने की कोशिश करेंगे। आने वाले महीनों में उम्मीदवारों की सक्रियता, टिकट की दावेदारी, संगठनात्मक फेरबदल और स्थानीय समीकरण इस तस्वीर को और बदलेंगे।
70 सीटों का चुनाव है, लेकिन भाजपा ने फिलहाल अपनी नजर 60 पर गड़ा दी है। अब सवाल यह नहीं कि भाजपा कितनी सीटें जीतेगीकृवह भविष्यवाणी होगीकृसवाल यह है कि कांग्रेस और बाकी दल भाजपा की इस 60 सीटों वाली चुनावी घेराबंदी का जवाब किस रणनीति से देते हैं।
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