सोमवार, 5 अक्टूबर 2026
वोटर लिस्ट के ‘शुद्धीकरण’ पर सियासत
वार-पलटवार
वर्ग विशेष को निशाना बनाने के आरोपों को भाजपा ने किया खारिज, पर्वतीय क्षेत्रों के आंकड़े दे पेश की सफाई
सूची में नामों की कटौती पर कांग्रेस हमलावर, भाजपा ने बताया चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता
नाम घटने को लेकर दावों और प्रतिदावों से गरमाई उत्तराखंड राज्य में चुनावी राजनीति
देहरादून। उत्तराखंड में एसआईआर के बाद अंतिम मतदाता सूची जारी होने के साथ ही विधानसभा चुनाव से पहले सियासी घमासान तेज हो गया है। मतदाता सूची में बड़े बदलाव को लेकर कांग्रेस जहां चुनावी प्रक्रिया और नाम हटाए जाने पर सवाल उठा रही है, वहीं भाजपा ने कांग्रेस के आरोपों पर पलटवार करते हुए इसे मतदाता सूची के शुद्धीकरण की प्रक्रिया बताया है। दोनों दलों के बीच अब बहस इस बात पर केंद्रित हो गई है कि सूची से घटे नामों का वास्तविक स्वरूप क्या है और इसका राजनीतिक असर किस रूप में देखा जाए।
भाजपा ने कांग्रेस के उन आरोपों को खारिज किया है, जिनमें वर्ग विशेष के मतदाताओं के नाम निशाने पर होने की बात कही जा रही है। भाजपा का तर्क है कि यदि किसी खास वर्ग को निशाना बनाकर नाम हटाए गए होते तो नामों में कमी का भौगोलिक और सामाजिक पैटर्न अलग दिखाई देता। पार्टी नेताओं ने कहा है कि पर्वतीय क्षेत्रों में भी बड़ी संख्या में नाम घटे हैं, जबकि वहां उस वर्ग की आबादी अपेक्षाकृत कम है। भाजपा इसे कांग्रेस के आरोपों पर सवाल उठाने वाला तथ्य बता रही है।
दूसरी तरफ कांग्रेस का कहना है कि एसआईआर के बाद बड़ी संख्या में मतदाता सूची से बाहर हुए हैं और चुनाव आयोग को विधानसभा-वार पूरा विवरण सार्वजनिक करना चाहिए। कांग्रेस नेता सूर्यकांत धस्माना ने दावा किया है कि प्री-एसआईआर और एसआईआर के दौरान 13 लाख से अधिक नाम हटाए गए और इनके बारे में विस्तृत जानकारी सामने आनी चाहिए।
एसआईआर के बाद उत्तराखंड की अंतिम मतदाता सूची में 71,58,949 मतदाता दर्ज हैं। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार पिछली सूची की तुलना में मतदाताओं की संख्या में करीब आठ लाख से अधिक की कमी आई है। हालांकि, यह कमी अपने आप में यह साबित नहीं करती कि किसी खास राजनीतिक या सामाजिक वर्ग के मतदाताओं को जानबूझकर हटाया गया। चुनाव आयोग ने नामों की जांच, दावे-आपत्तियां और पात्र लोगों को दोबारा नाम जुड़वाने की प्रक्रिया का प्रावधान रखा है। आयोग ने अंतिम सूची के बाद भी ऐसे मतदाताओं की पहचान और पुनः पंजीकरण के लिए विशेष अभियान चलाने के निर्देश दिए हैं।
यही वह बिंदु है जहां राजनीतिक आरोप और प्रशासनिक प्रक्रिया अलग-अलग दिखाई देती हैं। कांग्रेस सूची में कमी को लेकर सवाल उठा रही है, जबकि भाजपा इसे मतदाता सूची को अद्यतन करने की प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत कर रही है। भाजपा ने कांग्रेस के वर्ग विशेष के वोट काटे जाने के आरोप पर पर्वतीय और मैदानी क्षेत्रों के आंकड़ों को राजनीतिक बहस का आधार बनाया है। एक रिपोर्ट के अनुसार एसआईआर के बाद मैदानी क्षेत्रों की 36 विधानसभा सीटों में पर्वतीय क्षेत्रों की तुलना में लगभग दोगुने मतदाता घटे हैं।
भाजपा इसी तथ्य को कांग्रेस के आरोपों के जवाब के रूप में इस्तेमाल कर रही है। पार्टी का तर्क है कि यदि किसी खास समुदाय को निशाना बनाकर नाम हटाए गए होते तो केवल भौगोलिक आधार पर ऐसी तस्वीर सामने नहीं आती। लेकिन यहां भी अंतिम निष्कर्ष निकालने से पहले विधानसभा-वार, बूथ-वार और कारण-वार आंकड़ों का विश्लेषण जरूरी है। केवल कुल संख्या के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि नाम किन कारणों से हटे। मृत, स्थायी रूप से स्थानांतरित, दोहराए गए या सत्यापन में संपर्क न हो पाने वाले मतदाताओं की अलग-अलग श्रेणियां हैं।
एसआईआर का विवाद ऐसे समय सामने आया है जब उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की तैयारियां तेज हो रही हैं। इसलिए मतदाता सूची में हुआ बदलाव स्वाभाविक रूप से राजनीतिक दलों के लिए महत्वपूर्ण हो गया है। भाजपा इसे साफ-सुथरी मतदाता सूची की दिशा में कदम बता रही है, जबकि कांग्रेस पारदर्शिता और नामों के विलोपन की प्रक्रिया पर सवाल उठा रही है।
भाजपा नेताओं का आरोप है कि कांग्रेस मतदाता सूची को लेकर भ्रम पैदा कर रही है और लोकतंत्र बचाने के नाम पर राजनीतिक मुद्दा खड़ा कर रही है। इसके जवाब में कांग्रेस का कहना है कि मतदाता सूची से पात्र लोगों का नाम छूटना लोकतांत्रिक अधिकार से जुड़ा गंभीर विषय है। इस टकराव में सबसे महत्वपूर्ण सवाल राजनीतिक बयान नहीं, आंकड़ों की पारदर्शिता है। यदि चुनाव आयोग विधानसभा-वार और कारण-वार विवरण सार्वजनिक करता है तो विवाद के कई सवालों का तथ्यात्मक जवाब मिल सकता है। इससे न केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप की गुंजाइश घटेगी, बल्कि पात्र मतदाताओं के नाम वापस जोड़ने की प्रक्रिया भी अधिक भरोसेमंद होगी।
उत्तराखंड की राजनीति में एसआईआर अब महज प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रह गई है। भाजपा इसे मतदाता सूची के शुद्धीकरण और कांग्रेस के आरोपों के जवाब के रूप में देख रही है, जबकि कांग्रेस इसे मताधिकार और चुनावी पारदर्शिता से जोड़ रही है। ऐसे में आने वाले दिनों में दोनों दलों की राजनीतिक रणनीति में मतदाता सूची महत्वपूर्ण मुद्दा बनी रह सकती है। लेकिन अंतिम तस्वीर राजनीतिक दावों से नहीं, बूथ स्तर के आंकड़ों और पात्र मतदाताओं के नामों की स्थिति से स्पष्ट होगी। 2027 के चुनाव से पहले उत्तराखंड में अब लड़ाई सिर्फ वोट की नहीं, वोटर लिस्ट के नैरेटिव की भी हैकृभाजपा इसे शुद्धीकरण बता रही है, कांग्रेस इसे सवालों के घेरे में रख रही है। फैसला आरोपों से नहीं, सार्वजनिक आंकड़ों से होगा।
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें