शनिवार, 10 अक्टूबर 2026
अंदरूनी ‘उलझनों’ में कांग्रेस
चुनाव की तैयारी के बीच नेतृत्व, यात्राओं और संगठनात्मक तालमेल पर सवाल
भाजपा को घेरने से पहले अपनों के बीच समन्वय की चुनौती
देहरादून। उत्तराखंड में वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियां तेज होने लगी हैं, लेकिन कांग्रेस के सामने सरकार को घेरने के साथ-साथ अपने भीतर के मतभेदों को संभालने की चुनौती भी खड़ी हो गई है। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा को लेकर पार्टी नेतृत्व की आपत्ति ने संगठन के भीतर समन्वय और नेतृत्व की भूमिका पर नई बहस छेड़ दी। चुनाव से कुछ महीने पहले सामने आया यह विवाद कांग्रेस की उस रणनीति के लिए अहम है, जिसके तहत पार्टी भाजपा के सामने एकजुट विकल्प पेश करना चाहती है।
हरीश रावत की यात्रा को लेकर प्रदेश प्रभारी कुमारी सैलजा ने सवाल उठाए थे। उनका तर्क था कि पार्टी के आधिकारिक कार्यक्रमों के बीच किसी अलग अभियान से संगठनात्मक तालमेल प्रभावित हो सकता है। यात्रा को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल से चर्चा किए बिना आगे बढ़ाने पर भी आपत्ति जताई गई। दूसरी ओर, हरीश रावत ने अपने कार्यक्रम को जनसंपर्क और शुभचिंतकों के प्रति आभार व्यक्त करने की पहल बताया। इस घटनाक्रम ने पार्टी के भीतर व्यक्तिगत राजनीतिक पहलों और सामूहिक संगठनात्मक अनुशासन के बीच तनाव को सार्वजनिक कर दिया। हरीश रावत की यात्रा का विवाद महज एक कार्यक्रम को लेकर असहमति तक सीमित नहीं रहा। इसके साथ यह सवाल भी जुड़ गया कि चुनाव से पहले पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की राजनीतिक गतिविधियों का संचालन किस तरह होगा और प्रदेश में अभियान की दिशा कौन तय करेगा।
यात्रा को लेकर हाईकमान की आपत्ति के बावजूद हरीश रावत ने जसपुर से हल्द्वानी तक अपना कार्यक्रम आगे बढ़ाया। इस दौरान पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और वरिष्ठ नेता प्रीतम सिंह की मौजूदगी ने घटनाक्रम को अतिरिक्त राजनीतिक महत्व दिया। वहीं, प्रदेश कांग्रेस के दूसरे प्रमुख नेताओं की अनुपस्थिति ने पार्टी के भीतर अलग-अलग राजनीतिक प्राथमिकताओं को लेकर चर्चा को हवा दी। हालांकि, केवल किसी कार्यक्रम में मौजूदगी या गैरमौजूदगी से नेताओं के बीच मतभेदों की पूरी तस्वीर तय नहीं की जा सकती। कांग्रेस नेतृत्व के सामने अब दोहरी जिम्मेदारी है। एक ओर वरिष्ठ नेताओं की राजनीतिक सक्रियता और उनके समर्थकों की भूमिका को साथ लेकर चलना है, तो दूसरी ओर यह सुनिश्चित करना है कि चुनावी अभियान किसी एक नेता की पहल के बजाय साझा रणनीति के तहत आगे बढ़े।
राष्ट्रीय नेतृत्व की ओर से संकेत दिया गया है कि उत्तराखंड में पार्टी के अभियान सामूहिक रूप से चलाए जाने चाहिए। इस संदेश के पीछे संगठनात्मक एकजुटता और चुनावी तैयारियों में तालमेल बनाए रखने की जरूरत दिखाई देती है। लेकिन सवाल यह है कि क्या निर्देश जारी करने भर से अलग-अलग नेताओं की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं, कार्यशैली और प्राथमिकताओं के बीच बेहतर समन्वय स्थापित हो पाएगा? भाजपा जहां संगठन और बूथ स्तर पर अपनी चुनावी तैयारियों को गति देने में जुटी है, वहीं कांग्रेस के लिए सरकार के खिलाफ मुद्दों को एक साझा अभियान में बदलना जरूरी है। बेरोजगारी, भर्ती प्रक्रियाओं, पलायन, ग्रामीण सुविधाओं और भ्रष्टाचार से जुड़े सवालों पर विपक्ष सरकार को घेरता रहा है। इन मुद्दों को प्रदेशव्यापी राजनीतिक अभियान का रूप देने के लिए नेताओं के बीच स्पष्ट जिम्मेदारी और तालमेल की जरूरत होगी।
कांग्रेस की चुनौती यह भी है कि सरकार के खिलाफ जन असंतोष को राजनीतिक समर्थन में बदलने के लिए उसे केवल आरोपों तक सीमित नहीं रहना होगा। जनता के सामने वैकल्पिक नीतियों, रोजगार और विकास को लेकर स्पष्ट दृष्टिकोण रखना भी जरूरी होगा। यदि पार्टी का सार्वजनिक विमर्श बार-बार आंतरिक विवादों की ओर लौटता है, तो उसके मुद्दों और संगठनात्मक संदेश को पर्याप्त जगह मिलना कठिन हो सकता है।
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें