शनिवार, 10 अक्टूबर 2026

चुनावी बिगुल से पहले भाजपा की बढ़ी ‘रफ्तार’

संगठन, सरकार और चुनावी रणनीति पर फोकस 60 पार के लक्ष्य के साथ तीसरी जीत की तैयारी देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की औपचारिक घोषणा से पहले ही भारतीय जनता पार्टी ने अपनी राजनीतिक गतिविधियां तेज कर दी हैं। संगठनात्मक बैठकों से लेकर सरकार के कामकाज के प्रचार और बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने तक, पार्टी का जोर चुनावी तैयारी को समय रहते धार देने पर है। वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव में लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटने की भाजपा की रणनीति अब राजनीतिक चर्चाओं के केंद्र में है। पार्टी नेतृत्व की ओर से 60 पार का लक्ष्य सामने रखे जाने के बीच संगठन और सरकार के सामने इस नारे को जमीनी समर्थन में बदलने की चुनौती भी है। भाजपा की रणनीति केवल चुनाव के नजदीक आने पर प्रचार अभियान शुरू करने तक सीमित नहीं दिखती। पार्टी संगठन को सक्रिय रखने, केंद्र और राज्य सरकार की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने, बूथ प्रबंधन मजबूत करने और स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ताओं के साथ संवाद बढ़ाने पर जोर दे रही है। पार्टी के लिए यह तैयारी इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि उत्तराखंड में सत्ता परिवर्तन की परंपरा को तोड़कर लगातार दो विधानसभा चुनाव जीतने के बाद अब तीसरी जीत का लक्ष्य उसके सामने है। भाजपा नेतृत्व की ओर से 2027 के चुनाव में 60 से अधिक सीटें जीतने का लक्ष्य रखा गया है। यह लक्ष्य पार्टी की चुनावी महत्वाकांक्षा को तो जाहिर करता है, लेकिन इसके साथ ही संगठन के सामने बड़ी जिम्मेदारी भी खड़ी करता है। 70 सदस्यीय विधानसभा में इतनी बड़ी संख्या में सीटें हासिल करने के लिए पार्टी को अपने मौजूदा जनाधार को बनाए रखने के साथ उन क्षेत्रों में भी समर्थन बढ़ाना होगा, जहां स्थानीय असंतोष, विकास संबंधी शिकायतें या राजनीतिक प्रतिस्पर्धा उसके लिए चुनौती बन सकती हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में भाजपा सरकार अपने कार्यकाल के फैसलों, विकास योजनाओं और केंद्र सरकार के सहयोग को चुनावी विमर्श का हिस्सा बनाने की तैयारी में है। वहीं प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट और संगठन के अन्य पदाधिकारियों की जिम्मेदारी कार्यकर्ताओं को सक्रिय रखने तथा पार्टी की रणनीति को बूथ स्तर तक पहुंचाने की है। चुनावी तैयारियों में भाजपा का परंपरागत संगठनात्मक ढांचा अहम भूमिका निभाने वाला है। शक्ति केंद्रों, बूथ समितियों और स्थानीय कार्यकर्ताओं के माध्यम से मतदाताओं तक पहुंच बनाने की कोशिश पार्टी की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। संगठन के स्तर पर बैठकों, जिम्मेदारियों के निर्धारण और सरकार के कार्यक्रमों को जनता के बीच ले जाने की गतिविधियों से पार्टी चुनावी माहौल तैयार करना चाहती है। भाजपा के लिए चुनौती यह भी है कि संगठन की सक्रियता केवल बैठकों और कार्यक्रमों तक सीमित न रहे। बेरोजगारी, भर्ती प्रक्रियाओं, पलायन, ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं और भ्रष्टाचार से जुड़ी शिकायतों जैसे मुद्दों पर जनता के सवालों का जवाब देना भी चुनावी तैयारी का हिस्सा होगा। इन विषयों पर विपक्ष लगातार सरकार को घेरता रहा है। दूसरी ओर कांग्रेस भाजपा की चुनावी तैयारियों के बीच अपने संगठन को एकजुट करने और सरकार के खिलाफ मुद्दों को धार देने की कोशिश में है। कांग्रेस के सामने नेतृत्व, आपसी समन्वय और प्रदेशव्यापी अभियान को प्रभावी बनाने की चुनौती है। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच आरोप-प्रत्यारोप भी राजनीतिक बहस का हिस्सा बने हुए हैं। भाजपा जहां एसआईआर को मतदाता सूची दुरुस्त करने की प्रक्रिया बता रही है, वहीं कांग्रेस ने नामों में कमी को लेकर सवाल उठाए हैं। इस मुद्दे पर चुनावी राजनीति के साथ-साथ निर्वाचन प्रक्रिया की पारदर्शिता और पात्र मतदाताओं के नाम सूची में बने रहने का सवाल भी महत्वपूर्ण है। चुनावी तैयारी के बीच भाजपा के लिए सरकार की उपलब्धियों को सामने रखना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी जनता की नाराजगी और स्थानीय समस्याओं को समझना भी है। पहाड़ी क्षेत्रों में सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार के सवाल लंबे समय से राजनीतिक विमर्श का हिस्सा रहे हैं। सरकारी स्कूलों में घटते छात्र नामांकन, युवाओं के रोजगार और पलायन जैसे विषयों पर सरकार के दावों तथा जमीनी अनुभवों के बीच अंतर को विपक्ष चुनावी मुद्दा बना सकता है। ऐसे में भाजपा की रणनीति की असली परीक्षा प्रचार की गति से आगे बढ़कर जनता के बीच उसके संदेश की स्वीकार्यता में होगी। पार्टी के सामने अपने कार्यकर्ताओं को सक्रिय रखने, स्थानीय असंतोष को संबोधित करने और सरकार के कामकाज का राजनीतिक लाभ लेने की चुनौती है। विधानसभा चुनाव की घोषणा से पहले राजनीतिक गतिविधियों में तेजी को भाजपा की समयपूर्व चुनावी तैयारी के रूप में देखा जा सकता है। पार्टी के लिए शुरुआती तैयारी का उद्देश्य संगठन को चुनावी मोड में रखना और विपक्ष से पहले अपना राजनीतिक एजेंडा स्थापित करना है। हालांकि, चुनावी लक्ष्य और वास्तविक जनसमर्थन के बीच की दूरी का आकलन जनता के मुद्दों, स्थानीय परिस्थितियों और चुनाव के दौरान बनने वाले राजनीतिक समीकरणों से ही होगा। उत्तराखंड की राजनीति में अब नजर इस बात पर रहेगी कि भाजपा अपनी संगठनात्मक सक्रियता को कितनी प्रभावी ढंग से जनसंपर्क में बदलती है और कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दल उसके मुकाबले किस तरह अपनी रणनीति तैयार करते हैं। चुनाव की औपचारिक घोषणा में अभी समय हो, लेकिन राजनीतिक दलों के बीच तैयारी और मुद्दों को लेकर प्रतिस्पर्धा का दौर शुरू हो चुका है।

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