बुधवार, 28 अक्टूबर 2026
यूकेडी: संघर्ष, पहचान और वजूद की तलाश
उत्तराखंड की अलग पहचान की लड़ाई को घर-घर पहुंचाया
खुद राजनीतिक जमीन तलाशने को मजबूर है प्रदेश में यूकेडी
2027 के चुनाव में अस्तित्व बचाने, विरासत लौटाने की चुनौती
देहरादून। उत्तराखंड क्रांति दल की कहानी उत्तराखंड राज्य आंदोलन के संघर्ष, क्षेत्रीय अस्मिता की राजनीति, सत्ता की संभावनाओं और राजनीतिक विफलताओं की कहानी है। जिस दल ने अलग पहाड़ी राज्य की मांग को आंदोलन से जनभावना बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, वह राज्य बनने के बाद उसी जनभावना को स्थायी राजनीतिक ताकत में नहीं बदल पाया। कभी उत्तराखंड की राजनीति में क्षेत्रीय विकल्प बनने की क्षमता रखने वाला यूकेडी आज भाजपा और कांग्रेस के बीच सिमटी सत्ता की राजनीति में अपनी जगह तलाश रहा है। अब 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के बीच सवाल यही है कि क्या यूकेडी अपनी खोई जमीन वापस हासिल कर पाएगा या राज्य आंदोलन की विरासत केवल उसकी राजनीतिक पहचान बनकर रह जाएगी?
25 जुलाई 1979 को स्थापित यूकेडी ने अलग उत्तराखंड राज्य की मांग को संगठित राजनीतिक आवाज देने में अहम भूमिका निभाई। पर्वतीय क्षेत्रों की भौगोलिक परिस्थितियों, रोजगार, पलायन, संसाधनों पर स्थानीय अधिकार और लखनऊ में बैठे सत्ता प्रतिष्ठान की कथित उपेक्षा जैसे सवाल दल की राजनीति के केंद्र में रहे। डा. देवीदत्त पंत, काशी सिंह ऐरी और अन्य आंदोलनकारी नेताओं की अगुआई में दल ने पहाड़ की समस्याओं को अलग राज्य की मांग से जोड़ा। बाद के वर्षों में इंद्रमणि बडोनी और दिवाकर भट्ट जैसे नेताओं ने भी आंदोलन को व्यापक जनाधार देने में भूमिका निभाई।
1990 के दशक में अलग राज्य की मांग ने व्यापक जनांदोलन का रूप लिया। वर्ष 1994 के आंदोलन, पुलिस कार्रवाई और रामपुर तिराहा कांड ने उत्तराखंड की राजनीति को निर्णायक मोड़ दिया। इस संघर्ष में यूकेडी की भूमिका महत्वपूर्ण रही, लेकिन आंदोलन केवल किसी एक दल का नहीं था। विभिन्न सामाजिक संगठनों, छात्र-युवा समूहों, महिला संगठनों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं की भागीदारी ने इसे व्यापक जनआंदोलन बनाया। अंततः नौ नवंबर 2000 को उत्तराखंड अलग राज्य बना। मगर जिस राज्य की स्थापना के लिए संघर्ष किया गया, उसके गठन के बाद क्षेत्रीय राजनीति को मजबूत करने का अवसर यूकेडी के हाथ से निकलने लगा।
अलग राज्य बनने के बाद यूकेडी के सामने सबसे बड़ी चुनौती आंदोलनकारी संगठन से प्रभावशाली राजनीतिक दल बनने की थी। जनता को उम्मीद थी कि पहाड़ की समस्याओं, स्थानीय रोजगार, पलायन, गैरसैंण में राजधानी और संसाधनों पर स्थानीय अधिकार जैसे मुद्दों को लेकर खड़ा हुआ दल राज्य की नीतियों को दिशा देगा। लेकिन भाजपा और कांग्रेस की मजबूत चुनावी मशीनरी के सामने यूकेडी अपना स्वतंत्र जनाधार कायम नहीं रख पाया।
वर्ष 2002 के विधानसभा चुनाव में यूकेडी को चार सीटें मिलीं। 2007 में दल के दो विधायक चुने गए और भाजपा को सरकार बनाने के लिए समर्थन दिया। वर्ष 2012 में भी यूकेडी के विधायकों के समर्थन ने सरकार गठन के समीकरणों में भूमिका निभाई। लेकिन सत्ता के समीकरणों में भागीदारी क्षेत्रीय दल को मजबूत जनाधार में बदलने के लिए पर्याप्त साबित नहीं हुई। यहीं यूकेडी की राजनीति का विरोधाभास सामने आया। जिस दल की पहचान सत्ता प्रतिष्ठान से संघर्ष करने वाले संगठन की थी, वह धीरे-धीरे सरकार बनाने और बचाने के गणित में उलझता दिखाई दिया। सत्ता में हिस्सेदारी के बावजूद वह अपनी मूल मांगों को निर्णायक राजनीतिक एजेंडा नहीं बना पाया। नतीजा यह रहा कि राज्य आंदोलन की विरासत तो उसके पास रही, लेकिन उस विरासत का चुनावी लाभ दूसरी पार्टियां उठाती रहीं।
यूकेडी की कमजोरी का एक बड़ा कारण आंतरिक मतभेद और गुटबाजी भी रही। नेतृत्व को लेकर विवाद, अलग-अलग राजनीतिक रास्ते अपनाने और संगठन में टूट ने दल की विश्वसनीयता को प्रभावित किया। राज्य की राजनीति में क्षेत्रीय विकल्प बनने के लिए जिस एकजुट नेतृत्व, मजबूत संगठन और स्पष्ट राजनीतिक दिशा की जरूरत थी, यूकेडी वहां बार-बार पिछड़ता रहा। राजनीतिक विश्लेषणों में भी गुटबाजी और भाजपा-कांग्रेस के साथ बदलते समीकरणों को दल के पतन के प्रमुख कारणों में गिना गया है। इसके साथ ही भाजपा और कांग्रेस ने राज्य आंदोलन से जुड़े मुद्दों को अपने राजनीतिक विमर्श में जगह दी। गैरसैंण, पलायन, स्थानीय रोजगार और पर्वतीय विकास जैसे सवालों पर दोनों राष्ट्रीय दलों ने अपने-अपने तरीके से राजनीतिक दावे किए। इससे यूकेडी के लिए अपनी विशिष्ट पहचान को चुनावी समर्थन में बदलना और कठिन होता गया।
2027 का विधानसभा चुनाव यूकेडी के लिए सामान्य चुनाव से कहीं अधिक महत्वपूर्ण होगा। राज्य गठन के बाद एक चौथाई सदी से ज्यादा समय गुजर चुका है। नई पीढ़ी के मतदाताओं के लिए राज्य आंदोलन इतिहास का हिस्सा है, जबकि उनकी प्राथमिकताएं रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, पलायन, स्थानीय अर्थव्यवस्था और बेहतर बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी हैं। यूकेडी को यह साबित करना होगा कि उसकी क्षेत्रीय राजनीति केवल अतीत के संघर्ष की याद नहीं, बल्कि वर्तमान समस्याओं का व्यावहारिक समाधान भी दे सकती है। दल के सामने तीन बड़ी चुनौतियां हैं। पहली, संगठन को गांवों और नगरों तक सक्रिय करना। दूसरी, युवा मतदाताओं के बीच विश्वसनीय राजनीतिक विकल्प के रूप में अपनी पहचान बनाना। तीसरी, भाजपा और कांग्रेस से अलग स्पष्ट आर्थिक, सामाजिक और विकास संबंधी एजेंडा पेश करना। केवल क्षेत्रीय अस्मिता का नारा पर्याप्त नहीं होगा। उसे रोजगार, पलायन रोकने, कृषि-बागवानी, पर्यटन, शिक्षा, स्वास्थ्य और स्थानीय संसाधनों पर अधिकार के सवालों पर ठोस कार्यक्रम देना होगा।
गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने का सवाल भी यूकेडी की राजनीतिक पहचान से जुड़ा है। लेकिन इस मुद्दे को केवल प्रतीकात्मक बहस तक सीमित रखने के बजाय पर्वतीय क्षेत्रों में प्रशासनिक पहुंच, रोजगार और विकास के विकेंद्रीकरण से जोड़ना होगा। पहाड़ के गांव खाली हो रहे हों, युवा रोजगार के लिए बाहर जाने को मजबूर हों और स्वास्थ्य-शिक्षा की सुविधाओं के लिए लोगों को लंबी दूरी तय करनी पड़े, तो क्षेत्रीय दल की प्रासंगिकता उसके समाधान से ही तय होगी। यूकेडी के सामने सबसे बड़ा राजनीतिक प्रश्न यही है कि जिस राज्य की मांग को उसने दशकों तक उठाया, उसी राज्य में वह मजबूत चुनावी शक्ति क्यों नहीं बन पाया। इसका उत्तर केवल भाजपा-कांग्रेस के प्रभाव में तलाशना पर्याप्त नहीं होगा। संगठनात्मक कमजोरी, नेतृत्व के मतभेद, बदलते राजनीतिक समीकरण और आंदोलन के बाद स्पष्ट वैकल्पिक शासन माडल पेश करने में असफलता का भी ईमानदार मूल्यांकन करना होगा।
उत्तराखंड की राजनीति में क्षेत्रीय मुद्दे आज भी प्रासंगिक हैं। पलायन, स्थानीय रोजगार, जमीन और संसाधनों पर अधिकार तथा पर्वतीय क्षेत्रों में विकास का असंतुलन ऐसे सवाल हैं जिनका समाधान अब भी जनता की प्रमुख अपेक्षाओं में शामिल है। इसलिए यूकेडी के लिए संभावनाएं पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं। लेकिन संभावनाओं को राजनीतिक ताकत में बदलने के लिए अतीत की उपलब्धियों का स्मरण करने से आगे बढ़ना होगा। राज्य आंदोलन ने यूकेडी को ऐतिहासिक पहचान दी, लेकिन उस पहचान को जनादेश में बदलना अब भी उसकी सबसे बड़ी परीक्षा है। 2027 में दल के सामने केवल सीटें जीतने का लक्ष्य नहीं, बल्कि यह साबित करने की चुनौती भी होगी कि उत्तराखंड की क्षेत्रीय राजनीति के लिए उसके पास आज भी एक विश्वसनीय और प्रासंगिक विकल्प मौजूद है। वरना जिस आंदोलन की आवाज कभी पहाड़ की राजनीतिक चेतना का प्रतीक थी, वही आवाज चुनावी राजनीति में और कमजोर पड़ सकती है।
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