बुधवार, 28 अक्टूबर 2026

सपनों के पहाड़ और सियासत के दावों की अधूरी उम्मीदें

25 साल में भाजपा और कांग्रेस का हिसाब, विकास की रफ्तार और वादों की कसौटी कभी भाजपा तो कभी कांग्रेस के हाथ में सत्ता, फिर भी पहाड़ के मूल सवाल बरकरार 2027 के चुनाव से पहले दलों के सामने अपने कामकाज का हिसाब देने की चुनौती देहरादून। उत्तराखंड नौ नवंबर 2000 को अलग राज्य बना तो उम्मीद थी कि पहाड़ की भौगोलिक परिस्थितियों, सामाजिक जरूरतों और स्थानीय आकांक्षाओं के अनुरूप विकास का नया माडल तैयार होगा। रोजगार के लिए पलायन रुकेगा, गांवों तक बुनियादी सुविधाएं पहुंचेंगी, गैरसैंण को उसकी राजनीतिक पहचान मिलेगी और प्राकृतिक संसाधनों से संपन्न प्रदेश के लोगों की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी। लेकिन राज्य गठन के 26वें वर्ष में प्रवेश के साथ सवाल यह है कि भाजपा और कांग्रेस की सरकारों ने इन उम्मीदों को कितना पूरा किया? दोनों दलों को सत्ता में रहने के अवसर मिले, दोनों ने विकास के दावे किए, लेकिन पहाड़ की समस्याएं आज भी प्रदेश की राजनीति के केंद्र में हैं। उत्तराखंड के गठन को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच श्रेय लेने की राजनीति लंबे समय से जारी है। भाजपा पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के कार्यकाल में राज्य गठन को अपनी बड़ी उपलब्धि बताती है। वहीं, कांग्रेस राज्य आंदोलन में अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं की भूमिका तथा राज्य गठन से पहले और बाद में किए गए प्रयासों को सामने रखती है। हालांकि, उत्तराखंड का निर्माण किसी एक दल की राजनीतिक उपलब्धि भर नहीं था। इसके पीछे दशकों का संघर्ष, उत्तराखंड क्रांति दल की भूमिका, आंदोलनकारी संगठनों का योगदान और हजारों लोगों का त्याग था। राज्य गठन के राजनीतिक श्रेय से आगे बढ़कर असली सवाल यह है कि सत्ता में आने के बाद दोनों राष्ट्रीय दलों ने आंदोलन की मूल आकांक्षाओं को कितना महत्व दिया। राज्य गठन के बाद वर्ष 2002 में हुए पहले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 36 सीटें जीतकर सरकार बनाई। नारायण दत्त तिवारी के नेतृत्व वाली सरकार ने औद्योगिक विकास को गति देने और प्रदेश में निवेश आकर्षित करने पर जोर दिया। हरिद्वार, देहरादून और ऊधमसिंह नगर के औद्योगिक क्षेत्रों में निवेश की संभावनाओं को विस्तार मिला। औद्योगिक गतिविधियों ने रोजगार और आर्थिक विकास के नए अवसर पैदा किए। तिवारी सरकार का कार्यकाल इसलिए भी उल्लेखनीय रहा कि वह प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री थे, जिन्होंने अपना पांच वर्षीय कार्यकाल पूरा किया। लेकिन औद्योगिक विकास की चमक पहाड़ के दूरस्थ गांवों तक समान रूप से नहीं पहुंच सकी। मैदानी क्षेत्रों में उद्योगों के विस्तार के मुकाबले पर्वतीय जिलों में रोजगार के पर्याप्त अवसर पैदा करना चुनौती बना रहा। यही असंतुलन आगे चलकर पलायन और क्षेत्रीय विकास की बहस का प्रमुख मुद्दा बना। कांग्रेस को यह जवाब देना होगा कि उसके शासनकाल में शुरू हुई विकास की प्रक्रिया को पहाड़ी अर्थव्यवस्था, कृषि, बागवानी और स्थानीय रोजगार से जोड़ने के लिए पर्याप्त प्रयास क्यों नहीं हो सके। वर्ष 2012 में कांग्रेस फिर सत्ता में लौटी। विजय बहुगुणा के बाद हरीश रावत ने मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी संभाली। इस दौरान राजनीतिक अस्थिरता, वर्ष 2013 की केदारनाथ आपदा के बाद पुनर्निर्माण और वर्ष 2016 के राजनीतिक संकट ने सरकार को लगातार चुनौती दी। आपदा प्रभावित क्षेत्रों का पुनर्वास और चारधाम यात्रा व्यवस्था का पुनर्गठन महत्वपूर्ण विषय रहे। मगर सरकार की उपलब्धियों के साथ नेतृत्व संबंधी विवाद और राजनीतिक अस्थिरता भी कांग्रेस की छवि पर असर डालते रहे। भाजपा ने वर्ष 2007 में सरकार बनाई। बीसी खंडूड़ी और रमेश पोखरियाल निशंक के नेतृत्व में सड़क, आधारभूत ढांचे और प्रशासनिक सुधारों को लेकर कई घोषणाएं हुईं। हालांकि, मुख्यमंत्री बदलने की राजनीति ने सरकार की स्थिरता पर सवाल खड़े किए। वर्ष 2012 के चुनाव में भाजपा सत्ता से बाहर हो गई। वर्ष 2017 में भाजपा ने 70 सदस्यीय विधानसभा में 57 सीटें जीतकर ऐतिहासिक बहुमत हासिल किया। इसके बाद त्रिवेंद्र सिंह रावत, तीरथ सिंह रावत और पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में सरकार चली। वर्ष 2022 में भाजपा ने 47 सीटें जीतकर लगातार दूसरी बार सरकार बनाने का इतिहास रचा। इस दौरान सड़क और राजमार्ग परियोजनाओं, चारधाम यात्रा से जुड़े बुनियादी ढांचे, पर्यटन, धार्मिक स्थलों के विकास और निवेश आकर्षित करने पर विशेष जोर दिया गया। धामी सरकार ने समान नागरिक संहिता लागू करने, भर्ती परीक्षाओं में नकल के विरुद्ध सख्त कानून बनाने और महिलाओं के लिए सरकारी नौकरियों में क्षैतिज आरक्षण जैसे कदमों को अपनी प्रमुख उपलब्धियों में शामिल किया है। सरकार का दावा है कि इन फैसलों से सुशासन, सामाजिक सुरक्षा और रोजगार व्यवस्था को मजबूती मिली है। लेकिन भाजपा के सामने भी कई सवाल हैं। बड़े बुनियादी ढांचा प्रकल्पों और पर्यटन विस्तार के बीच पर्वतीय गांवों में स्थायी रोजगार, स्वास्थ्य सुविधाओं, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और पलायन की समस्या का समाधान कितना हुआ? भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं को लेकर युवाओं में पैदा हुए असंतोष ने सरकार की परीक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े किए। इसके अलावा भू-कानून, जमीन की खरीद, पर्यावरणीय संतुलन और आपदा प्रबंधन जैसे मुद्दे भी सरकार से ठोस जवाब मांगते हैं। भाजपा और कांग्रेस के शासनकाल की तुलना करते समय यह भी देखना होगा कि राज्य की अर्थव्यवस्था में विस्तार हुआ है और बुनियादी सुविधाओं का दायरा बढ़ा है, लेकिन विकास का लाभ सभी क्षेत्रों और वर्गों तक समान रूप से पहुंचाना अब भी चुनौती है। उद्योग, पर्यटन और निर्माण गतिविधियों से आर्थिक अवसर बढ़े हैं, मगर पर्वतीय क्षेत्रों में रोजगार का स्थायी आधार तैयार करना अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ पाया। शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में संस्थानों की मौजूदगी के साथ उनकी गुणवत्ता, विशेषज्ञों की उपलब्धता और दूरस्थ गांवों तक पहुंच का सवाल भी बना हुआ है। पलायन केवल आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि प्रदेश की सामाजिक और सांस्कृतिक संरचना से जुड़ा प्रश्न है। गांवों से युवाओं का बाहर जाना खेती, स्थानीय बाजारों, पारंपरिक ज्ञान और सामुदायिक जीवन को प्रभावित करता है। दोनों दलों ने पलायन रोकने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की घोषणाएं की हैं, लेकिन जनता के सामने कसौटी घोषणाएं नहीं, परिणाम हैं। उत्तराखंड की राजनीति का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि भाजपा और कांग्रेस सत्ता के लिए बारी-बारी से जनादेश हासिल करती रही हैं, लेकिन राज्य आंदोलन के कई मूल सवाल आज भी पूरी तरह हल नहीं हुए हैं। भाजपा के पास लगातार दो विधानसभा चुनाव जीतने और बड़े नीतिगत फैसलों का दावा है, तो कांग्रेस के पास अपने शासनकाल के औद्योगिक विस्तार और कल्याणकारी प्रयासों का पक्ष रखने का अवसर है। लेकिन किसी भी दल को केवल अपने दावों के आधार पर सफलता का प्रमाणपत्र नहीं मिल सकता।

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