मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026
चिट्ठी, यात्रा और बवाल
कांग्रेस के भीतर टकराव, प्रभारी कुमारी सैलजा की आपत्ति के बावजूद रावत आगे बढ़े
चुनावी तैयारी के बीच संगठन और व्यक्तिगत राजनीतिक अभियान के बीच खिंची लकीर
उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की आहट के साथ कांग्रेस की अंदरूनी सियासत हुई तेज
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की आहट के साथ कांग्रेस की अंदरूनी सियासत एक बार फिर सार्वजनिक बहस के केंद्र में आ गई है। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा को लेकर पार्टी की प्रदेश प्रभारी कुमारी सैलजा की चिट्ठी और उसके बाद भी यात्रा जारी रहने से संगठन के भीतर मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं। एक अक्टूबर को सैलजा ने रावत को पत्र लिखकर यात्रा आगे न बढ़ाने का आग्रह किया था। उनका कहना था कि यात्रा को लेकर न तो प्रभारी के स्तर पर और न ही प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष से चर्चा की गई।
मामला यहीं नहीं रुका। कांग्रेस नेतृत्व की आपत्ति के बावजूद रावत ने अपनी यात्रा जारी रखी। पांच अक्टूबर को जसपुर से हल्द्वानी की ओर यात्रा बढ़ी और रामनगर में समर्थकों ने उनका जोरदार स्वागत किया। छह अक्टूबर को रामनगर में स्वागत के दौरान जेसीबी से पुष्पवर्षा किए जाने की खबर ने इस राजनीतिक घटनाक्रम को और चर्चा में ला दिया।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे अहम पहलू यह है कि विवाद केवल एक यात्रा को लेकर नहीं है। इसके केंद्र में कांग्रेस में चुनावी अभियान का संचालन, संगठन की भूमिका और वरिष्ठ नेताओं की राजनीतिक सक्रियता का सवाल भी दिखाई दे रहा है। कांग्रेस नेतृत्व ने स्पष्ट किया है कि चुनावी दौर में पार्टी के कार्यक्रम संगठन के स्तर पर तय हों और व्यक्तिगत अभियानों से अलग सामूहिक गतिविधियों पर जोर दिया जाए। संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल की ओर से भी व्यक्तिगत अभियानों के बजाय पार्टी संगठन के तय कार्यक्रमों के अनुरूप गतिविधियां चलाने का संदेश दिया गया है।
रावत की ओर से यात्रा को जनसंवाद और जनता के प्रति आभार से जोड़ा जा रहा है। दूसरी ओर, पार्टी नेतृत्व की आपत्ति का आधार संगठनात्मक समन्वय बताया गया है। यही अंतर अब राजनीतिक विवाद का रूप ले चुका है। एक पक्ष इसे जनता के बीच जाने की राजनीतिक कवायद मान रहा है तो दूसरा इसे संगठन की अनुमति और सामूहिक रणनीति के दायरे में देखने पर जोर दे रहा है। उत्तराखंड कांग्रेस के लिए इस घटनाक्रम का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि विधानसभा चुनाव में अब ज्यादा समय नहीं है। ऐसे समय में पार्टी के भीतर होने वाली हर राजनीतिक गतिविधि का संदेश कार्यकर्ताओं और जनता तक जाता है। एक तरफ कांग्रेस भाजपा के खिलाफ सरकार, रोजगार, महंगाई, विकास और अन्य मुद्दों को लेकर अपना अभियान तेज करना चाहती है, वहीं दूसरी ओर वरिष्ठ नेताओं के अलग-अलग कार्यक्रम संगठनात्मक एकजुटता के सवाल खड़े कर रहे हैं।
कांग्रेस के सामने चुनौती यह है कि वह वरिष्ठ नेताओं की व्यक्तिगत राजनीतिक सक्रियता और पार्टी की सामूहिक चुनावी रणनीति के बीच संतुलन कैसे बनाती है। रावत लंबे समय से उत्तराखंड की राजनीति का प्रमुख चेहरा रहे हैं। ऐसे में उनकी राजनीतिक सक्रियता का असर केवल उनके व्यक्तिगत कार्यक्रम तक सीमित नहीं रहता। उनके कार्यक्रमों में कांग्रेस कार्यकर्ताओं और समर्थकों की भागीदारी स्वाभाविक रूप से संगठन के भीतर संदेश पैदा करती है। दूसरी तरफ प्रदेश प्रभारी का तर्क भी स्पष्ट है कि चुनावी वर्ष में समानांतर कार्यक्रम पार्टी की सामूहिक रणनीति को प्रभावित कर सकते हैं। कांग्रेस नेतृत्व ने इसी कारण व्यक्तिगत अभियानों के बजाय सामूहिक कार्यक्रमों पर जोर दिया है।
विवाद बढ़ने के बाद रावत को कांग्रेस नेतृत्व ने दिल्ली बुलाया है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार पार्टी नेतृत्व उनसे इस पूरे घटनाक्रम पर बातचीत करेगा और उनका पक्ष सुनने के बाद आगे का निर्णय लिया जाएगा। सात या आठ अक्टूबर को बातचीत की संभावना बताई गई है। इससे साफ है कि उत्तराखंड की यह चिट्ठी अब देहरादून तक सीमित नहीं रही। मामला दिल्ली तक पहुंच चुका है। कांग्रेस हाईकमान के सामने चुनौती केवल एक यात्रा को लेकर निर्णय लेने की नहीं, बल्कि उत्तराखंड में चुनाव से पहले संगठनात्मक समन्वय बनाए रखने की भी है।
कांग्रेस के भीतर चल रहा यह विवाद भाजपा के लिए भी राजनीतिक मुद्दा बन सकता है। चुनावी राजनीति में विपक्ष के संगठनात्मक मतभेद सत्ता पक्ष के लिए हमले का आधार बनते हैं। कांग्रेस जितना अपने भीतर के विवाद को सार्वजनिक रूप से संभालने में व्यस्त होगी, उतना ही भाजपा उसके नेतृत्व और एकजुटता पर सवाल उठा सकती है। हालांकि कांग्रेस के सामने इसका दूसरा पहलू भी है। यदि पार्टी इस विवाद को संवाद के जरिए सुलझा लेती है और वरिष्ठ नेताओं को एक साझा चुनावी मंच पर ले आती है, तो मौजूदा टकराव को संगठनात्मक समन्वय में बदला जा सकता है। फिलहाल मामला खुला है और अगले कुछ दिनों में होने वाली बैठकों तथा नेतृत्व के फैसले पर निगाह रहेगी।
दरअसल, उत्तराखंड कांग्रेस में इस समय चिट्ठी केवल एक पत्र नहीं है, यात्रा केवल एक कार्यक्रम नहीं है और बवाल केवल नेताओं की नाराजगी तक सीमित नहीं है। इसके पीछे चुनाव से पहले संगठन की कमान, राजनीतिक भूमिका और अभियान की दिशा को लेकर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। अब देखना यह है कि कांग्रेस इस विवाद को सार्वजनिक टकराव बनने से रोकती है या यह चिट्ठी आने वाले चुनावी अभियान की पटकथा का एक बड़ा अध्याय बन जाती है।
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