रविवार, 18 अक्टूबर 2026

बीजेपी की ‘राह में कांटे’

विकास के दावों के बीच अंकिता कांड, पेपर लीक और बयानों के बवंडर में घिरी धामी सरकार अंकिता भंडारी प्रकरण से एसआईआर तक, पेपर लीक और रेखा आर्य विवाद ने बढ़ाई सरकार की चुनौती राज्यपाल नियुक्ति पर भी सियासी घमासान, एक के बाद एक विवाद बने गले की हड्डी देहरादून। उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव की उलटी गिनती के बीच भाजपा सरकार के सामने चुनौतियां कम होने के बजाय बढ़ती दिखाई दे रही हैं। एक तरफ मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सरकार विकास, जनकल्याण और चुनावी तैयारियों के दम पर सत्ता में वापसी की रणनीति बना रही है, तो दूसरी तरफ कई ऐसे विवाद हैं, जो सरकार की राजनीतिक मुश्किलें बढ़ा रहे हैं। अंकिता भंडारी हत्याकांड में कथित वीआईपी की भूमिका को लेकर फिर उठे सवाल, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण पर विवाद, भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ी और पेपर लीक के आरोप, कैबिनेट मंत्री रेखा आर्य से जुड़ा ताजा विवाद और दुष्यंत कुमार गौतम की राज्यपाल पद पर नियुक्ति को लेकर उठा बवाल भाजपा के लिए असहज स्थिति पैदा कर रहा है। इन प्रकरणों का असर केवल सरकार की छवि तक सीमित नहीं है। विपक्ष को सरकार की जवाबदेही पर सवाल उठाने, जनता के बीच मुद्दे ले जाने और चुनाव से पहले राजनीतिक माहौल बनाने का अवसर भी मिल रहा है। ऐसे में भाजपा के सामने चुनौती केवल विपक्ष के हमलों का जवाब देने की नहीं, बल्कि उन सवालों पर भरोसेमंद स्पष्टीकरण देने की भी है, जिन पर जनता जवाब चाहती है। अंकिता भंडारी हत्याकांड एक बार फिर उत्तराखंड की राजनीति के केंद्र में है। मामले में तीन दोषियों को अदालत से उम्रकैद की सजा मिलने के बावजूद कथित वीआईपी की भूमिका को लेकर उठते सवाल राजनीतिक विवाद का कारण बने हुए हैं। सीबीआई इस पहलू की जांच कर रही है। इसी बीच भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय महामंत्री दुष्यंत कुमार गौतम को सिक्किम का राज्यपाल नियुक्त किए जाने के बाद विवाद ने नया मोड़ ले लिया है। अंकिता के माता-पिता ने दिल्ली में प्रदर्शन कर न्याय की मांग उठाई, जबकि कांग्रेस ने नियुक्ति पर सवाल खड़े किए हैं। यहां भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि मामला केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रह गया है। अंकिता के परिवार की मांग और वीआईपी की कथित भूमिका से जुड़े सवालों ने संवेदनशील जनभावना को फिर सक्रिय कर दिया है। कांग्रेस इसे न्याय और जवाबदेही का प्रश्न बना रही है। वहीं, भाजपा नेताओं ने विपक्ष पर इस प्रकरण का राजनीतिक लाभ उठाने का आरोप लगाया है। ऐसे में सरकार के सामने जांच की निष्पक्षता और पारदर्शिता को लेकर जनता का विश्वास बनाए रखने की चुनौती है। विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर ने भी राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है। मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर नामों की कटौती और संशोधन को लेकर विपक्ष सवाल उठा रहा है। कांग्रेस की चिंता है कि कहीं पात्र मतदाता सूची से बाहर न रह जाएं। दूसरी ओर, निर्वाचन व्यवस्था में नामों की शुद्धता, मृत और स्थानांतरित मतदाताओं के नाम हटाने तथा दोहरी प्रविष्टियों को दुरुस्त करने की दलील दी जा रही है। उत्तराखंड में एसआईआर के बाद मतदाताओं की संख्या में आए बदलाव और विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों में संभावित चुनावी असर को लेकर बहस तेज है। कांग्रेस इसे मताधिकार और लोकतांत्रिक पारदर्शिता से जोड़ रही है, जबकि भाजपा के लिए यह स्पष्ट करना जरूरी है कि किसी पात्र मतदाता का नाम छूटने की स्थिति में उसे सुधारने के लिए क्या व्यवस्था है। चुनाव से पहले मतदाता सूची का सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसका सीधा संबंध मतदान के अधिकार और चुनावी भागीदारी से है। उत्तराखंड में भर्ती परीक्षाओं और पेपर लीक का मुद्दा भाजपा सरकार के लिए पहले से ही चुनौती रहा है। सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए परीक्षा में गड़बड़ी केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि वर्षों की मेहनत और भविष्य से जुड़ा सवाल है। जब भती प्रक्रिया की निष्पक्षता पर संदेह पैदा होता है, तो उसका असर सरकार की विश्वसनीयता पर भी पड़ता है। विपक्ष बेरोजगारी और भर्ती परीक्षाओं के मुद्दे पर सरकार को घेरता रहा है। भाजपा सरकार के सामने चुनौती यह है कि वह जांच, दोषियों के खिलाफ कार्रवाई और भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता के जरिए युवाओं का भरोसा बहाल करे। चुनावी वर्ष में यह मुद्दा इसलिए भी संवेदनशील है, क्योंकि युवाओं की नाराजगी राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित कर सकती है। कैबिनेट मंत्री रेखा आर्य और उनके पति गिरधारी लाल साहू के बीच विवाद ने भी सरकार की मुश्किलें बढ़ाई हैं। रेखा आर्य ने अपने पति के खिलाफ गंभीर आरोप लगाते हुए पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है। दूसरी ओर, उनके पति ने मंत्री पर कथित भ्रष्टाचार और करीब 210 करोड़ रुपये की अवैध संपत्ति अर्जित करने के आरोप लगाए हैं। मंत्री ने इन आरोपों को निराधार बताया है। पुलिस ने रेखा आर्य की शिकायत से जुड़े मामले की जांच के लिए विशेष जांच दल गठित किया है। इस विवाद का राजनीतिक पहलू यह है कि आरोप-प्रत्यारोप अब सार्वजनिक हो चुके हैं और विपक्ष ने सरकार से जवाब मांगा है। कांग्रेस कथित संपत्ति और अन्य आरोपों की निष्पक्ष जांच की मांग कर रही है। हालांकि, आरोपों को प्रमाणित तथ्य नहीं माना जा सकता और उनकी सच्चाई जांच के बाद ही स्पष्ट होगी। फिर भी चुनाव से पहले किसी मंत्री से जुड़ा ऐसा विवाद सरकार के लिए राजनीतिक असहजता पैदा करता है। भाजपा को अब यह सुनिश्चित करना होगा कि मामले की जांच निष्पक्ष हो और किसी भी पक्ष को राजनीतिक प्रभाव के कारण राहत या नुकसान न मिले। दुष्यंत कुमार गौतम की सिक्किम के राज्यपाल पद पर नियुक्ति ने अंकिता प्रकरण को फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है। कांग्रेस ने नियुक्ति पर सवाल उठाते हुए मांग की है कि कथित वीआईपी पहलू की जांच पूरी होने तक इस नियुक्ति पर पुनर्विचार किया जाए। पार्टी का तर्क है कि जांच के बीच इस तरह की नियुक्ति जनता के मन में सवाल पैदा कर सकती है। दूसरी ओर, गौतम से जुड़े आरोपों को लेकर अंतिम निष्कर्ष जांच और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही निकाला जा सकता है। इस पूरे घटनाक्रम ने भाजपा के सामने राजनीतिक और नैतिक जवाबदेही का सवाल खड़ा कर दिया है। विपक्ष के लिए यह मुद्दा सरकार को घेरने का अवसर है, जबकि भाजपा को आरोपों और सिद्ध तथ्यों के बीच अंतर स्पष्ट रखते हुए जांच की निष्पक्षता पर भरोसा कायम करना होगा। इन बड़े राजनीतिक विवादों के अलावा बेरोजगारी, पलायन, ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं की कमी, महंगाई, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता जैसे मुद्दे भी सरकार की परीक्षा ले रहे हैं। भाजपा विकास कार्यों और केंद्र तथा राज्य की योजनाओं को अपनी उपलब्धियों के रूप में पेश कर रही है। लेकिन चुनाव में केवल उपलब्धियों का प्रचार पर्याप्त नहीं होगा। जनता यह भी देखेगी कि उसके रोजमर्रा के सवालों का समाधान कितना हुआ है। उत्तराखंड जैसे राज्य में पहाड़ और मैदान की जरूरतें अलग-अलग हैं। दूरस्थ गांवों में स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा, सड़क और संचार सुविधाओं की स्थिति तथा स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर चुनावी बहस को प्रभावित कर सकते हैं। यदि इन मुद्दों पर जनता की अपेक्षाएं अधूरी रहती हैं, तो राजनीतिक विवादों का असर और बढ़ सकता है। भाजपा संगठन चुनावी तैयारियों में जुटा है और सरकार अपनी उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने की रणनीति बना रही है। लेकिन एक के बाद एक उठते विवादों के कारण राजनीतिक एजेंडे को केवल विकास तक सीमित रखना आसान नहीं होगा। विपक्ष इन सभी मुद्दों को जोड़कर सरकार की जवाबदेही पर सवाल उठा सकता है। भाजपा की चुनौती है कि वह हर प्रकरण पर तथ्यों के आधार पर जवाब दे और जनता के बीच भरोसा बनाए रखे। 2027 के चुनाव से पहले भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष के आरोपों का जवाब देना भर नहीं, बल्कि उन सवालों पर जनता को संतुष्ट करना है जो लगातार उठ रहे हैं। अंकिता भंडारी प्रकरण में न्याय और जांच की पारदर्शिता, एसआईआर में मतदाताओं के अधिकारों की सुरक्षा, भर्ती प्रक्रिया में निष्पक्षता और मंत्री से जुड़े आरोपों की जांचकृइन सभी पर सरकार का रुख उसकी राजनीतिक विश्वसनीयता की कसौटी बनेगा। फिलहाल इतना तय है कि चुनावी मुकाबला केवल नारों और उपलब्धियों के दावों तक सीमित नहीं रहने वाला। भाजपा को जहां अपनी उपलब्धियां गिनानी होंगी, वहीं विवादों पर भी स्पष्ट जवाब देना होगा। कांग्रेस के लिए इन मुद्दों को जनता के बीच ले जाना अवसर है, लेकिन उसे भी आरोपों को प्रमाणित तथ्यों और ठोस सवालों के साथ उठाना होगा। आखिरकार, चुनाव में निर्णायक सवाल यही होगा कि जनता सरकार के दावों, विपक्ष के आरोपों और अपने अनुभवों के आधार पर किस पर भरोसा करती है।

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