मंगलवार, 1 सितंबर 2026

एफआईआर बन गई नया ‘रणक्षेत्र’

भाजपा बोलीकृसियासत के लिए समाज को मत बांटो, कानून से ऊपर कौन राहुल की एफआईआर पर कांग्रेस के हंगामे को बताया राजनीतिक नौटंकी देहरादून। हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के कार्यक्रम के बाद सामने आए कथित शुद्धिकरण विवाद ने उत्तराखंड की सियासत को सड़क से लेकर राजधानी तक गर्म कर दिया है। कांग्रेस ने जहां इसे सामाजिक अपमान, दलित सम्मान और संविधान की लड़ाई का नाम देकर भाजपा को घेरना शुरू किया है, वहीं भाजपा ने पलटवार करते हुए कांग्रेस के इस अभियान को राजनीतिक मुद्दे को जातीय रंग देने की कोशिश करार दिया है। भाजपा का हमला सीधा हैकृकांग्रेस के पास जनता के बीच जाने के लिए मुद्दे नहीं बचे तो अब विवादों को चुनावी हथियार बनाया जा रहा है। भाजपा नेताओं का कहना है कि उत्तराखंड की शांत सामाजिक व्यवस्था को राजनीतिक फायदे के लिए जाति के चश्मे से देखना प्रदेश के हित में नहीं है। पार्टी ने कांग्रेस से सवाल किया है कि क्या हर राजनीतिक विवाद को जातिगत संघर्ष में बदल देना ही उसकी राजनीति का नया एजेंडा है? कांग्रेस जिस घटना को दलित सम्मान से जोड़कर राष्ट्रीय मुद्दा बनाने में जुटी है, भाजपा ने उसी नैरेटिव को पलटने की कोशिश शुरू कर दी है। भाजपा का कहना है कि किसी व्यक्ति या संगठन की ओर से कानून का उल्लंघन हुआ है तो जांच होनी चाहिए और दोष सिद्ध होने पर कार्रवाई भी। लेकिन इसके नाम पर पूरे राजनीतिक दल या समाज को कटघरे में खड़ा करना स्वीकार नहीं किया जा सकता। पार्टी का तर्क है कि कानून अपना रास्ता तय करेगा, राजनीतिक मंच अदालत नहीं बन सकता। यही वह लाइन है जिसके जरिए भाजपा कांग्रेस के आंदोलन की धार कुंद करने की कोशिश कर रही है। राहुल गांधी के खिलाफ दर्ज एफआईआर ने विवाद को और बड़ा राजनीतिक आयाम दे दिया है। कांग्रेस इसे बदले की राजनीति बता रही है और कार्रवाई की मांग कर रही है। भाजपा का जवाब है कि लोकतंत्र में राजनीतिक कद कितना भी बड़ा क्यों न हो, कानून सबके लिए समान होना चाहिए। भाजपा के लिए यह मुद्दा इसलिए भी अहम है क्योंकि कांग्रेस राहुल गांधी की एफआईआर को लेकर देशभर में आंदोलन की तैयारी कर रही है। ऐसे में भाजपा इस लड़ाई को कानून बनाम राजनीतिक दबाव के फ्रेम में रखने की कोशिश कर रही है। भाजपा का संदेश हैकृएफआईआर को लेकर सड़क पर दबाव बनाने से कानून की प्रक्रिया नहीं बदलेगी। भाजपा ने कांग्रेस के आंदोलन के पीछे राजनीतिक मंशा भी तलाशनी शुरू कर दी है। पार्टी नेताओं का आरोप है कि कांग्रेस सामाजिक न्याय के नाम पर वोट बैंक की राजनीति करना चाहती है। भाजपा का कहना है कि कांग्रेस को यदि वास्तव में सामाजिक सद्भाव की चिंता है तो उसे ऐसे मुद्दों को हवा देने के बजाय प्रदेश में भाईचारे की राजनीति करनी चाहिए। भाजपा के हमले का सार यही हैकृसम्मान के सवाल पर राजनीति नहीं, कानून के आधार पर फैसला होना चाहिए। इस विवाद का सबसे बड़ा राजनीतिक संदर्भ 2027 का विधानसभा चुनाव है। उत्तराखंड में चुनावी तैयारी शुरू होते ही भाजपा और कांग्रेस दोनों अपने-अपने सामाजिक और राजनीतिक नैरेटिव मजबूत करने में जुटे हैं। कांग्रेस के लिए यह विवाद भाजपा को सामाजिक न्याय के मोर्चे पर घेरने का अवसर है। भाजपा के लिए चुनौती है कि कांग्रेस इसे दलित बनाम भाजपा के सवाल में तब्दील न कर पाए। इसीलिए भाजपा अब रक्षात्मक होने के बजाय आक्रामक हो गई है। पार्टी कांग्रेस से पूछ रही है कि अगर हर विवाद को जाति से जोड़कर आंदोलन किया जाएगा तो क्या इससे समाज में दूरी नहीं बढ़ेगी? भाजपा की कोशिश इस पूरे विवाद को विकास बनाम विवाद की बहस में बदलने की है। पार्टी का कहना है कि जनता रोजगार, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, पलायन और पर्यटन जैसे मुद्दों पर जवाब चाहती है, जबकि कांग्रेस राजनीतिक विवादों को हवा देकर चुनावी जमीन तैयार कर रही है। यानी भाजपा का निशाना केवल कांग्रेस नहीं, बल्कि उसका चुनावी नैरेटिव है। कांग्रेस जहां पूछ रही है कि कथित शुद्धिकरण करने वालों पर कार्रवाई कब होगी, वहीं भाजपा पलटकर पूछ रही है कि क्या राहुल गांधी कानून से ऊपर हैं? यही सवाल अब आने वाले दिनों में राजनीतिक बहस का केंद्र बन सकता है। फिलहाल दोनों दल पीछे हटने के मूड में नहीं हैं। कांग्रेस सड़क पर उतरने की तैयारी में है तो भाजपा भी जवाबी राजनीतिक अभियान की जमीन तैयार कर रही है। एक घटना ने कई सवाल खड़े कर दिए हैंकृसामाजिक सम्मान का, राजनीतिक मर्यादा का, कानून का और सबसे बढ़कर 2027 के चुनावी नैरेटिव का। हल्द्वानी का विवाद अब केवल शुद्धिकरण तक सीमित नहीं है। कांग्रेस इसे भाजपा की वैचारिक राजनीति का प्रतीक बता रही है, जबकि भाजपा इसे कांग्रेस की विवाद पैदा करो और राजनीतिक लाभ लो रणनीति के रूप में पेश कर रही है। उत्तराखंड की सियासत में अब असली मुकाबला सिर्फ बयानबाजी का नहीं, बल्कि इस बात का है कि जनता किस नैरेटिव को स्वीकार करती है। एक तरफ कांग्रेस का सवालकृखड़गे के कथित अपमान पर कार्रवाई कब? दूसरी तरफ भाजपा का पलटवारकृराजनीति के लिए समाज को कब तक बांटोगे? और इसी सवाल-जवाब के बीच 2027 का चुनावी रण धीरे-धीरे आकार लेता दिख रहा है।

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