मंगलवार, 1 सितंबर 2026
पवित्र मैदान पर ‘गंदी सियासत’
रामलीला मैदान विवाद में बीजेपी ने बदला पैंतरा, कांग्रेस को घेरा
खड़गे विवाद पर बीजेपी की दो टूककृपरंपरा से खिलवाड़ मंजूर नहीं
रामलीला मैदान का धार्मिक महत्व जानते हुए भी हो रही है सियासत
भाजपा का सवालकृधार्मिक आस्था के स्थल को राजनीतिक अखाड़ा
देहरादून। हल्द्वानी का रामलीला मैदान इन दिनों राजनीतिक विवाद का केंद्र बना हुआ है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के कार्यक्रम के बाद कथित शुद्धिकरण को लेकर कांग्रेस जहां भाजपा और हिंदू संगठनों पर हमलावर है, वहीं भाजपा ने अब इस विवाद को एक अलग कोण से उठाना शुरू कर दिया है। भाजपा का कहना है कि जिस रामलीला मैदान का स्थानीय धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में महत्व रहा है, वहां हुई घटना को केवल जातिगत चश्मे से देखना उत्तराखंड की सनातन परंपरा और स्थानीय आस्था के साथ अन्याय है।
भाजपा का तर्क है कि विवाद में शामिल प्रत्येक पक्ष की भूमिका और उसके बयान की जांच होनी चाहिए, लेकिन राजनीतिक लाभ के लिए पूरे घटनाक्रम को दलित बनाम सवर्ण या दलित बनाम सनातन की बहस में बदलना समाज को बांटने की कोशिश है। हल्द्वानी का रामलीला मैदान लंबे समय से धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक आयोजनों का प्रमुख स्थल रहा है। रामलीला जैसे धार्मिक आयोजनों के कारण इस मैदान की पहचान स्थानीय जनजीवन में केवल एक सार्वजनिक मैदान के रूप में नहीं, बल्कि धार्मिक-सांस्कृतिक परंपरा से जुड़े स्थान के तौर पर भी बनी है। यही वजह है कि भाजपा इस पहलू को राजनीतिक बहस के केंद्र में ला रही है।
भाजपा नेताओं का सवाल है कि यदि किसी धार्मिक-सांस्कृतिक स्थल पर कोई विवाद पैदा होता है तो उसकी संवेदनशीलता को समझना जरूरी है। उसे तत्काल जातीय संघर्ष की भाषा में बदल देना क्या उचित है? भाजपा का आरोप है कि कांग्रेस इस विवाद को 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले अपने राजनीतिक नैरेटिव को मजबूत करने के लिए इस्तेमाल कर रही है।
पार्टी नेताओं के अनुसार कांग्रेस के पास भाजपा को घेरने के लिए सामाजिक न्याय और दलित सम्मान का मुद्दा है, लेकिन इस बहस में सनातन परंपराओं और स्थानीय धार्मिक भावनाओं की अनदेखी नहीं की जा सकती। भाजपा का कहना है कि दलित सम्मान और सनातन सम्मान को एक-दूसरे के विरोध में खड़ा करना ही असली राजनीतिक साजिश है। पार्टी के मुताबिक उत्तराखंड की सामाजिक संरचना को इस तरह की विभाजनकारी राजनीति से बचाना सभी राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी है।
कांग्रेस लगातार सवाल उठा रही है कि खड़गे के कार्यक्रम के बाद कथित शुद्धिकरण क्यों किया गया और इसमें शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हुई। भाजपा इस सवाल पर सीधे बचाव करने के बजाय अब बहस का फोकस बदलने की कोशिश कर रही है। उसका कहना है कि किसी भी घटना पर कानून अपना काम करे, लेकिन धार्मिक स्थल और धार्मिक परंपराओं को लेकर संवेदनशीलता भी जरूरी है। यहीं से भाजपा का राजनीतिक पलटवार शुरू होता है। भाजपा नेताओं का सवाल है कि क्या किसी धार्मिक परंपरा को लेकर उठे विवाद को सीधे जातिवाद का नाम देकर खत्म कर देना उचित होगा?
कांग्रेस के लिए भाजपा का यह नैरेटिव चुनौतीपूर्ण है। कांग्रेस इस पूरे प्रकरण को दलित सम्मान और सामाजिक बराबरी का सवाल बनाना चाहती है। भाजपा इसे सनातन परंपरा, धार्मिक आस्था और सामाजिक सद्भाव से जोड़ रही है। इस तरह दोनों दल एक ही घटना से दो बिल्कुल अलग राजनीतिक संदेश निकाल रहे हैं। कांग्रेस का संदेशकृसामाजिक बराबरी से समझौता नहीं। भाजपा का संदेशकृधार्मिक आस्था को राजनीतिक हथियार मत बनाइए। यानी विवाद अब केवल हल्द्वानी तक सीमित नहीं रह गया है। यह उत्तराखंड में उस बड़े राजनीतिक संघर्ष का हिस्सा बन रहा है जिसमें सामाजिक न्याय बनाम सांस्कृतिक अस्मिता के अलग-अलग नैरेटिव सामने आ रहे हैं।
भाजपा कांग्रेस से यह भी पूछ रही है कि क्या हर राजनीतिक विवाद में जाति को केंद्र में रखना जरूरी है? पार्टी का कहना है कि उत्तराखंड का समाज लंबे समय से विभिन्न जातियों, समुदायों और परंपराओं के सह-अस्तित्व का उदाहरण रहा है। ऐसे में राजनीतिक दलों को ऐसे मुद्दों पर और अधिक जिम्मेदारी दिखानी चाहिए। हालांकि कांग्रेस का तर्क है कि कथित शुद्धिकरण जैसी घटना को सामान्य धार्मिक परंपरा बताकर टाला नहीं जा सकता। उसका कहना है कि सामाजिक बराबरी और सम्मान के सवाल को दबाया नहीं जा सकता। यही टकराव अब पूरे विवाद को और तीखा बना रहा है।
उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की राजनीतिक तैयारियां तेज होने के साथ इस विवाद का चुनावी महत्व भी बढ़ गया है। भाजपा जहां अपने हिंदुत्व और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नैरेटिव को मजबूती देने की कोशिश करेगी, वहीं कांग्रेस सामाजिक न्याय, संविधान और बराबरी को अपने अभियान का प्रमुख आधार बना सकती है। हल्द्वानी का रामलीला मैदान इसलिए अब केवल विवाद का स्थल नहीं, बल्कि दो राजनीतिक विचारधाराओं की टकराहट का प्रतीक बनता जा रहा है।
भाजपा का सवाल है कि सनातन परंपरा और दलित सम्मान को आमने-सामने खड़ा करके आखिर किसका राजनीतिक फायदा होगा? कांग्रेस का सवाल है कि धार्मिक आस्था के नाम पर सामाजिक भेदभाव को कैसे स्वीकार किया जा सकता है? यही दो सवाल आने वाले दिनों में उत्तराखंड की सियासत का तापमान तय करेंगे। रामलीला मैदान की धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान अपनी जगह है और सामाजिक समानता का संवैधानिक सिद्धांत अपनी जगह। राजनीतिक दलों के सामने चुनौती यही है कि आस्था और अधिकार की इस बहस को समाज को बांटने का हथियार बनने से कैसे रोका जाए।
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