मंगलवार, 2 जून 2026

आस्था’ की पिच पर होगा ‘सियासी’ मैच

उत्तराखंड में विस चुनाव 2027 के संभावित मुद्दे -भाग-23 यूसीसी, डेमोग्राफी चेंज और सख्त भू-कानून के इर्द-गिर्द घूमेगी सूबे की सियासत ---चारधाम यात्रा, मंदिर कारिडोर और धार्मिक पर्यटन पर बढ़ेगी सियासी बहस ---हिंदुत्व बनाम स्थानीय मुद्दों के बीच चुनावी रणनीति तैयार करने में जुटे दल ---संत समाज, तीर्थ पुरोहित और धार्मिक संगठनों की भूमिका भी रहेगी अहम देहरादून। उत्तराखंड में वर्ष 2027 में होने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर राजनीतिक सरगर्मियां धीरे-धीरे तेज होने लगी हैं। राज्य की राजनीति में इस बार धर्म और आस्था का मुद्दा प्रमुख चुनावी एजेंडा बन सकता है। चारधाम यात्रा, मंदिरों के विकास, धार्मिक पर्यटन, सनातन संस्कृति और हिंदुत्व की राजनीति को लेकर भाजपा और विपक्ष अपनी-अपनी रणनीति तैयार करने में जुट गए हैं। प्रदेश में लंबे समय से धार्मिक आस्था राजनीति का अहम हिस्सा रही है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में केदारनाथ धाम पुनर्निर्माण, बद्रीनाथ मास्टर प्लान, मानसखंड और मंदिर कारिडोर जैसी परियोजनाओं ने इस मुद्दे को और अधिक प्रभावी बना दिया है। भाजपा इन विकास कार्यों को अपनी बड़ी उपलब्धि के रूप में जनता के सामने रखने की तैयारी कर रही है। वहीं कांग्रेस स्थानीय समस्याओं, पलायन, बेरोजगारी और महंगाई के मुद्दों को केंद्र में रखकर भाजपा को घेरने की रणनीति बना रही है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उत्तराखंड की धार्मिक पहचान और तीर्थाटन आधारित अर्थव्यवस्था को देखते हुए धर्म आधारित राजनीति का असर पहाड़ से लेकर मैदान तक दिखाई दे सकता है। खासकर गढ़वाल क्षेत्र में चारधाम यात्रा और मंदिर विकास कार्य चुनावी माहौल को प्रभावित कर सकते हैं। भाजपा जहां खुद को सनातन संस्कृति का संरक्षक बताने में जुटी है, वहीं विपक्ष यह सवाल उठा सकता है कि धार्मिक परियोजनाओं के बावजूद आम लोगों की आर्थिक स्थिति में कितना सुधार हुआ। संत समाज और धार्मिक संगठनों की भूमिका भी चुनाव में अहम मानी जा रही है। चारधाम यात्रा व्यवस्थाओं, तीर्थ पुरोहितों के अधिकार और मंदिर समितियों से जुड़े मुद्दों पर भी राजनीतिक दल अपनी सक्रियता बढ़ा रहे हैं। इसके अलावा समान नागरिक संहिता जैसे मुद्दों को भी भाजपा चुनावी विमर्श में शामिल कर सकती है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि उत्तराखंड में धार्मिक आस्था लोगों की भावनाओं से सीधे जुड़ी हुई है। ऐसे में चुनावी सभाओं से लेकर सोशल मीडिया अभियान तक धर्म आधारित संदेशों का प्रभाव बढ़ सकता है। हालांकि यह भी माना जा रहा है कि केवल धार्मिक मुद्दों के सहारे चुनाव जीतना आसान नहीं होगा, क्योंकि जनता रोजगार, सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मुद्दों पर भी जवाब चाहती है। बाक्स कांग्रेस की डायवर्जन पालिटिक्स मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के सामने धर्म की इस पिच पर सीधे उतरने का जोखिम है। इसलिए, कांग्रेस की रणनीति इस मुद्दे को सीधे खारिज करने के बजाय इसे डायवर्जन पालिटिक्स करार देने की है। विपक्ष अखबारों और सोशल मीडिया के जरिए अंकिता भंडारी मामले, केदारनाथ में सोने की चोरी के आरोप और भर्ती घोटालों को अभी से हवा दे रहा है ताकि चुनाव को वापस जनता के बुनियादी मुद्दों पर लाया जा सके। सत्तापक्ष चारधाम कारिडोर और केदारनाथ-बद्रीनाथ के पुनरुत्थान को अपनी धार्मिक प्रतिब(ता से जोड़ रहा है, वहीं स्थानीय युवाओं और क्षेत्रीय संगठनों का एक बड़ा वर्ग सोशल मीडिया पर अभियान चला रहा है कि अगर देवभूमि को बचाना है, तो हिमाचल की तर्ज पर सख्त भू-कानून लागू करो। विपक्ष इस जनभावना को भांप चुका है और वह धर्म के मुकाबले जमीन और हक-हकूक का कार्ड खेलने की फिराक में है।

पहाड़ का पारंपरिक ज़ायका है आलू की ‘थिचवाणी’

---पहाड़ की रसोई की शान इसके स्वाद में बसती है लोक संस्कृति की मिठास ---गढ़वाल और कुमाऊं दोनों मंडलों में बेहद लोकप्रिय पारंपरिक व्यंजन ---सादगी, स्वाद और पौष्टिकता का अनूठा संगम है आलु की थिचवाणी ---गांव की रसोई से अब शहरों और पर्यटन स्थलों तक बढ़ गई है इसकी पहचान देहरादून। उत्तराखंड की पारंपरिक खानपान संस्कृति अपने अनोखे स्वाद और सादगी के लिए देशभर में जानी जाती है। इन्हीं पारंपरिक व्यंजनों में एक खास नाम है आलू की थिचवाणी जो पहाड़ की रसोई की पहचान मानी जाती है। कम मसालों में बनने वाला यह व्यंजन आज भी गांवों में उतना ही लोकप्रिय है, जितना वर्षों पहले हुआ करता था। पहाड़ की जीवनशैली, मौसम और स्थानीय स्वाद का अद्भुत मेल थिचवाणी में देखने को मिलता है। गढ़वाल और कुमाऊं दोनों क्षेत्रों में बनने वाली थिचवाणी का स्वाद थोड़ा अलग हो सकता है, लेकिन इसकी आत्मा एक जैसी ही रहती है। उबले हुए आलुओं को हाथों से दबाकर या कूटकर तैयार किया जाता है, जिसके बाद उसमें टमाटर, हरी मिर्च, जाखिया, धनिया और पारंपरिक मसालों का तड़का लगाया जाता है। पहाड़ के लोग इसे मंडुवे की रोटी, गेहूं की रोटी या चावल के साथ बड़े चाव से खाते हैं। पहाड़ के बुजुर्ग बताते हैं कि पुराने समय में जब लोग खेतों और जंगलों में मेहनत करते थे, तब जल्दी बनने वाला पौष्टिक भोजन बेहद जरूरी होता था। ऐसे में थिचवाणी सबसे आसान और स्वादिष्ट विकल्प मानी जाती थी। कम संसाधनों में बनने वाला यह व्यंजन आज भी ग्रामीण जीवन की सादगी को जीवित रखे हुए है। पारंपरिक पहाड़ी भोजन स्वास्थ्य की दृदृष्टि से भी बेहद लाभकारी है। आलू की थिचवाणी में स्थानीय मसालों और कम तेल का प्रयोग इसे हल्का और पौष्टिक बनाता है। यही कारण है कि अब होटल और होमस्टे संचालक भी पर्यटकों को पारंपरिक उत्तराखंडी थाली में थिचवाणी परोसने लगे हैं। उत्तराखंड में तेजी से बदलती जीवनशैली के बीच पारंपरिक व्यंजनों को बचाए रखने की जरूरत महसूस की जा रही है। कई सामाजिक संगठन और महिला समूह स्थानीय खानपान को बढ़ावा देने के लिए अभियान चला रहे हैं। उनका मानना है कि पहाड़ के पारंपरिक व्यंजन केवल भोजन नहीं बल्कि यहां की संस्कृति, लोकजीवन और पहचान का हिस्सा हैं। आज आलू की थिचवाणी केवल एक व्यंजन नहीं, बल्कि पहाड़ की आत्मीयता और पारंपरिक जीवनशैली का प्रतीक बन चुकी है। गांव की मिट्टी से जुड़ा यह स्वाद लोगों को अपनी जड़ों की याद दिलाता है।

देवभूमि में राहुल की ‘एंट्री’ से कांग्रेस की मिलेगी ‘संजीवनी’

---कांग्रेस नेता राहुल गांधी संगठन में नई ऊर्जा भरने के लिए पहुंचेंगे उत्तराखंड ---बेरोजगारी, पलायन और महंगाई के मुद्दों पर भाजपा को घेरेंगे राहुल गांधी ---2027 विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में बढ़ने लगा है उत्साह ---कांग्रेस कार्यकर्ताओं में जोश भरने और चुनावी शंखनाद की तैयारी तेज देहरादून। उत्तराखंड में आगामी विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर राजनीतिक माहौल धीरे-धीरे गर्माने लगा है। ऐसे समय में कांग्रेस नेता राहुल गांध के प्रस्तावित उत्तराखंड दौरे को पार्टी के लिए नई संजीवनी के रूप में देखा जा रहा है। लंबे समय से संगठनात्मक चुनौतियों और चुनावी हार से जूझ रही कांग्रेस को राहुल गांधी के दौरे से कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा मिलने की उम्मीद है। प्रदेश कांग्रेस का मानना है कि राहुल गांधी का जनसंपर्क और आम जनता से सीधे संवाद करने का तरीका युवाओं, महिलाओं और बेरोजगार वर्ग को पार्टी के साथ जोड़ने में मदद करेगा। पार्टी नेताओं का कहना है कि राज्य में बेरोजगारी, पलायन, महंगाई, स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली और पहाड़ों में खाली होते गांव जैसे मुद्दों पर जनता के बीच असंतोष बढ़ रहा है, जिसे कांग्रेस राजनीतिक रूप से मजबूत मुद्दा बनाना चाहती है। कांग्रेस रणनीतिकारों के अनुसार राहुल गांधी अपने दौरे में विशेष रूप से युवा वर्ग और पहाड़ी क्षेत्रों के लोगों से संवाद कर सकते हैं। माना जा रहा है कि वह रोजगार, शिक्षा, महिला सुरक्षा और स्थानीय संसाधनों पर अधिकार जैसे विषयों को प्रमुखता से उठाएंगे। इससे कांग्रेस को भाजपा के मुकाबले वैकल्पिक राजनीतिक विकल्प के रूप में खुद को स्थापित करने का अवसर मिल सकता है। प्रदेश कांग्रेस संगठन भी राहुल गांधी के दौरे को लेकर सक्रिय हो गया है। जिला और ब्लाक स्तर पर बैठकों का दौर शुरू हो चुका है। पार्टी नेताओं का दावा है कि राहुल गांधी की सभाओं और रोड शो में बड़ी संख्या में लोग जुट सकते हैं, जिससे कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ेगा और संगठन को मजबूती मिलेगी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पिछले कुछ समय में राहुल गांधी ने देशभर में लगातार जनसरोकार के मुद्दों को उठाकर विपक्ष की राजनीति में नई सक्रियता दिखाई है। इसका असर उत्तराखंड में भी देखने को मिल सकता है। खासकर युवा मतदाताओं और सरकारी भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ी से नाराज वर्ग को कांग्रेस अपने पक्ष में करने की कोशिश करेगी। कांग्रेस यह भी मान रही है कि राहुल गांधी का दौरा केवल राजनीतिक कार्यक्रम नहीं बल्कि जनता से भावनात्मक जुड़ाव बनाने का माध्यम बनेगा। पहाड़ की समस्याओं को राष्ट्रीय मंच पर उठाने की रणनीति के तहत कांग्रेस इस दौरे को बड़े अभियान के रूप में पेश करने की तैयारी कर रही है। अब नजर इस बात पर रहेगी कि राहुल गांधी का उत्तराखंड दौरा कांग्रेस को कितनी राजनीतिक मजबूती देता है और क्या पार्टी इसे 2027 के चुनावी माहौल में वास्तविक जनसमर्थन में बदल पाती है। बाक्स भाजपा के लिए शुभ रहा है राहुल का दौराः भट्ट भाजपा ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी के उत्तराखंड दौरे पर तंज कसते हुए कहा कि कांग्रेस को उनके आने पर पुनर्विचार करना चाहिए, क्योंकि उनकी उपस्थिति हमेशा भाजपा के लिए ही लाभकारी साबित होती है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने कहा कि कांग्रेस पूरी तरह से सेना और सनातन विरोधी पार्टी है, जिसमें उनकी पार्टी के शीर्ष नेता राहुल गांधी का योगदान सबसे अधिक है। लिहाजा उनके आने से प्रदेश कांग्रेस के नेताओं को खुशफहमी हो सकती है, लेकिन प्रदेश की प्रबु( जनता को नही। क्योंकि राहुल और कांग्रेस पार्टी का सनातन एवं सेना विरोधी चाल, चरित्र और चेहरा सब देख चुके हैं। उत्तराखंड सैन्य बहुल प्रदेश है, जिसके युवाओं ने देश पर पीढ़ी दर पीढ़ी मर मिटना सीखा है वहां की देशभक्त जनता विपक्ष के ऐसे कायरों और मौकापरस्तों को कभी भी स्वीकार नहीं करने वाली है। उन्होंने तंज कसा कि कांग्रेस पार्टी के नेताओं को गलतफहमी हो सकती है कि राहुल के आने से राज्य में उनकी स्थिति में कोई सुधार आ सकता है, जबकि प्रदेश की जनता पूरी तरह स्पष्ट है कि सनातन और राष्ट्र विरोधी लोग उन्हे बर्दाश्त नहीं करेंगे। बाक्स जनता प्रदेश में चाहती है बदलाव: शैलजा राहुल गांधी के उत्तराखंड दौरे की तैयारी का जायजा लेने के लिए कांग्रेस की प्रदेश प्रभारी कुमारी शैलजा उत्तराखंड दौरे पर पहुंच गई है। कांग्रेस मुख्यालय में पार्टी पदाधिकारियों की बैठक में कहा कि नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का उत्तराखंड दौरा महत्वपूर्ण है और वह इस बात की ओर इशारा करता है कि वह उत्तराखंड की जनता के हर सुख दुःख में हमेशा साथ खड़े रहते हैं। कुमारी शैलजा ने कहा कि आज उत्तराखंड सरकार में आपसी तालमेल की बड़ी कमी है। भाजपा नेता विधायक और मंत्री अंतर कला में उलझे हुए हैं यह समय प्रदेश में बदलाव का है और जनता सरकार के कामकाज से खुश नहीं है। कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को इस अवसर का लाभ उठाना चाहिए और प्रदेश में बदलाव के लिए कमर कस लेनी चाहिए।

रविवार, 31 मई 2026

देवभूमि की रीढ़ हो रही है ‘खोखली’

उत्तराखंड में विस चुनाव 2027 के संभावित मुद्दे -भाग-22 उत्तराखंड में पलायन, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरणीय संकट बनेगा बड़ा मुद्दा ---पहचान की जंग, खंडहर मकान व थमते कदम ---डिग्रियों के बोझ तले दबा है पहाड़ का भविष्य ---बुनियादी सुविधाओं की खाई पाटना बड़ी चुनौती ---चुनावी शोर के बीच बड़ा यक्ष प्रश्न बनेगा पलायन देहरादून। उत्तराखंड में वर्ष 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव की राजनीतिक बिसात धीरे-धीरे सजने लगी है। भाजपा, कांग्रेस और क्षेत्रीय दल अपने-अपने स्तर पर संगठन मजबूत करने और चुनावी रणनीति बनाने में जुट गए हैं। लेकिन इस बार चुनावी चर्चा केवल सत्ता परिवर्तन या चेहरों तक सीमित नहीं रहने वाली। पहाड़ के गांवों में अब सबसे बड़ा सवाल पहाड़ का भविष्य बनता जा रहा है। यही कारण है कि आगामी चुनाव में पलायन, खाली होते गांव, युवाओं की बेरोजगारी, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की बदहाली, पर्यावरणीय संकट और स्थानीय पहचान जैसे मुद्दे राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आ सकते हैं। उत्तराखंड राज्य बनने के पीछे सबसे बड़ी भावना थी कि पहाड़ की समस्याओं का समाधान स्थानीय स्तर पर होगा। लेकिन राज्य गठन के 25 साल बाद भी हजारों गांव खाली हो चुके हैं। पहाड़ का युवा रोजगार के लिए देहरादून, दिल्ली, चंडीगढ़ और महानगरों की ओर पलायन कर रहा है। गांवों में बुजुर्ग और महिलाएं ही बची हैं। खेती लगातार घाटे का सौदा बनती जा रही है और पारंपरिक आजीविकाएं संकट में हैं। ऐसे में आमजन के बीच यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि आखिर पहाड़ का भविष्य क्या होगा? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2027 का चुनाव केवल विकास के दावों का नहीं, बल्कि पहाड़ बचाने की लड़ाई के रूप में भी देखा जा सकता है। भाजपा सरकार लगातार इंफ्रास्ट्रक्चर, सड़क, चारधाम परियोजना, निवेश और पर्यटन को अपनी उपलब्धि बता रही है। हाल ही में पेश बजट में भी ग्रामीण सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और कुंभ 2027 से जुड़ी परियोजनाओं पर विशेष जोर दिया गया है। हालांकि विपक्ष और सामाजिक संगठन यह सवाल उठा रहे हैं कि बड़े विकास मॉडल के बावजूद पहाड़ के मूल मुद्दे क्यों नहीं सुलझ पाए। पर्वतीय क्षेत्रों में अस्पतालों में डाक्टर नहीं हैं, कई स्कूल छात्र संख्या कम होने से बंद होने की कगार पर हैं और युवाओं को स्थायी रोजगार के अवसर नहीं मिल रहे। यही कारण है कि गांवों से लगातार पलायन जारी है। विशेषज्ञों का कहना है कि उत्तराखंड में अब मैदानी विकास बनाम पहाड़ी असंतोष की भावना भी उभर रही है। देहरादून, हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर में तेजी से शहरीकरण हो रहा है, जबकि दूरस्थ पहाड़ी जिलों में बुनियादी सुविधाओं की कमी अब भी बरकरार है। इससे क्षेत्रीय असंतुलन का मुद्दा भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होता जा रहा है। सोशल मीडिया और युवाओं के बीच क्षेत्रीय राजनीति की चर्चा भी बढ़ रही है। कई मंचों पर राष्ट्रीय दलों के प्रति नाराजगी और क्षेत्रीय विकल्प की मांग खुलकर दिखाई दे रही है। कुछ आनलाइन चर्चाओं में युवाओं ने उत्तराखंड क्रांति दल जैसे क्षेत्रीय दलों को मजबूत विकल्प बनाने की बात कही है, हालांकि संगठनात्मक कमजोरी और नेतृत्व संकट को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि यदि 2027 के चुनाव में कोई दल पहाड़ के भविष्य को लेकर ठोस रोडमैप प्रस्तुत करता हैकृजैसे स्थानीय रोजगार, पर्वतीय कृषि, ग्रामीण पर्यटन, शिक्षा-स्वास्थ्य सुधार और पर्यावरण संरक्षणकृतो वह जनता के बीच मजबूत पकड़ बना सकता है। खासतौर पर युवा मतदाता अब केवल घोषणाओं से आगे बढ़कर जवाबदेही मांग रहे हैं। जलवायु परिवर्तन और आपदाएं भी इस चुनाव में अहम भूमिका निभा सकती हैं। जोशीमठ भू-धंसाव, अतिवृष्टि, जंगलों में आग और बार-बार आने वाली प्राकृतिक आपदाओं ने पहाड़ में विकास माडल पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। लोगों के बीच यह चर्चा बढ़ रही है कि बिना पर्यावरणीय संतुलन के विकास का माडल पहाड़ के अस्तित्व के लिए खतरा बन सकता है। राजनीतिक तौर पर भाजपा अभी मजबूत संगठन और नेतृत्व के दम पर चुनावी तैयारी में आगे दिखाई दे रही है। पार्टी ने बूथ स्तर तक रणनीति तेज कर दी है। वहीं कांग्रेस जनता के असंतोष को मुद्दा बनाने की कोशिश में जुटी है। दूसरी ओर क्षेत्रीय दल पहाड़ बनाम दिल्ली माडल की भावना को हवा देने का प्रयास कर सकते हैं। स्पष्ट है कि 2027 का चुनाव केवल सत्ता की लड़ाई नहीं होगा, बल्कि यह तय करेगा कि उत्तराखंड का पहाड़ आने वाले वर्षों में किस दिशा में जाएगा। यदि गांव खाली होते रहे, युवा पलायन करते रहे और प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ता रहा, तो आने वाले समय में पहाड़ का भविष्य केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि अस्तित्व का सवाल बन सकता है।

‘होमस्टे’ से खंडहरों में लौटी ‘जिंदगी’

---पलायन के जख्मों पर मरहम लगा रही पहाड़ की विरासत ---सूबे पारंपरिक घर अब सैलानियों के संग रच रहे नई जिंदगी ---सैलानियों को भा रहा है पहाड़ की संस्कृति का यह अनूठा रंग देहरादून। पत्थरों की दीवारें, लकड़ी की नक्काशीदार चौखट, स्लेट की छत, आंगन में रखी पीतल की गागर, और चूल्हे से उठती लकड़ी की खुशबू। उत्तराखंड के पहाड़ों में कभी यह घर केवल मकान नहीं होते थे, बल्कि पीढ़ियों की यादों, संस्कारों और रिश्तों की जीवित पहचान होते थे। समय बदला, पलायन बढ़ा और धीरे-धीरे यह घर वीरान होने लगे। कई गांवों में ताले लटक गए, आंगनों में घास उग आई और कभी बच्चों की आवाजों से गूंजने वाले घर खामोश हो गए। लेकिन अब पहाड़ की इन्हीं खामोश दीवारों में फिर से जिंदगी लौटने लगी है। पुराने पारंपरिक घर अब होमस्टे बनकर नई पहचान हासिल कर रहे हैं। यह केवल पर्यटन का कारोबार नहीं, बल्कि पहाड़ की विरासत को बचाने की एक भावनात्मक कोशिश बनती जा रही है। गढ़वाल और कुमाऊं के कई गांवों में लोग अपने पुश्तैनी घरों को आधुनिक सुविधाओं के साथ सजा रहे हैं, लेकिन उनकी आत्मा को वैसा ही रहने दिया गया है। कहीं पुरानी लकड़ी की खिड़कियां आज भी जस की तस हैं, तो कहीं दादी के समय का चूल्हा आज भी पर्यटकों को पहाड़ की असली जिंदगी से रूबरू करा रहा है। पहाड़ छोड़कर शहरों में बस चुके कई युवा अब अपने गांव लौट रहे हैं। जिन घरों में कभी बुजुर्ग अकेले रह गए थे, वहां अब देश-विदेश से आने वाले पर्यटक पहाड़ी संस्कृति को महसूस करने पहुंच रहे हैं। सुबह तांबे के लोटे में पानी, खेतों की पगडंडियां, मंडुवे की रोटी, झंगोरे की खीर और लोकगीतों की मधुर आवाज अब होमस्टे का हिस्सा बन चुकी है। दरअसल, होमस्टे केवल कमाई का जरिया नहीं है। यह उस टूटते रिश्ते को जोड़ने का माध्यम भी बन रहा है, जो वर्षों से पहाड़ और उसके लोगों के बीच कमजोर पड़ता जा रहा था, जिन घरों को लोग खंडहर समझने लगे थे, वह आज गांव की पहचान बन रहे हैं। कई गांवों में महिलाएं इस बदलाव की सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरी हैं। वह पर्यटकों को स्थानीय भोजन परोस रही हैं, लोककथाएं सुना रही हैं और हस्तशिल्प से जुड़ी चीजें बेचकर आत्मनिर्भर बन रही हैं। इससे गांवों की अर्थव्यवस्था में भी नई जान आ रही है। हालांकि इस बदलाव के बीच एक चिंता भी है। कुछ जगहों पर आधुनिकता की दौड़ में पारंपरिक वास्तुकला और पहाड़ी संस्कृति को नुकसान पहुंचने लगा है। सीमेंट और चमक-दमक के बीच पुराने घरों की असली आत्मा खोने का डर भी लोगों को सताने लगा है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि होमस्टे माडल को स्थानीय संस्कृति और पर्यावरण के अनुरूप विकसित किया जाए, तभी यह पहाड़ की विरासत को सही मायनों में बचा पाएगा। पहाड़ के इन पुराने घरों में केवल पत्थर और लकड़ी नहीं बसती, बल्कि वहां पुरखों की यादें, त्योहारों की खुशबू, रिश्तों की गर्माहट और उस मिट्टी की आत्मा रहती है, जिसने पीढ़ियों को पाला है। शायद यही कारण है कि जब कोई पर्यटक इन घरों में ठहरता है, तो उसे होटल जैसा एहसास नहीं होता, बल्कि वह खुद को किसी अपने गांव का मेहमान महसूस करता है। आज जब पहाड़ लगातार पलायन और आधुनिकता की मार झेल रहा है, तब यह होमस्टे केवल पर्यटन केंद्र नहीं, बल्कि उम्मीद की नई रोशनी बनकर उभर रहे हैं। ऐसा लगता है मानो वर्षों से बंद पड़े पहाड़ी घर फिर से कह रहे हों...हम अभी जिंदा हैं और हमारी विरासत अभी बाकी है।

उत्तराखंड से गूंजेगा भगवा संदेश

उत्तराखंड में प्रचंड बहुमत के लिए भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष ने फूंका चुनावी बिगुल ---उत्तराखंड की माटी से हुंकार, देश और दुनिया तक भगवा संदेश पहुंचाने का किया आह्वान ---2027 की चुनावी बिसात फतह करने के लिए भाजपा कार्यकर्ता झोंके अपनी पूरी ताकत ---बोले-भाजपा सिर्फ सत्ता चलाने वाली नहीं, राष्ट्रहित की विचारधारा वाली सरकार देहरादून। उत्तराखंड के तीन दिवसीय दौरे पर पहुंचे भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने देवभूमि उत्तराखंड से पूरे देश और दुनिया तक भगवा संदेश पहुंचाने का आह्वान करते हुए आगामी विधानसभा चुनाव 2027 में पार्टी को प्रचंड बहुमत से जिताने की अपील की। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भाजपा की सरकार केवल सत्ता चलाने वाली सरकार नहीं है, बल्कि यह सांस्कृतिक राष्ट्रवादी विचारधारा को आगे बढ़ाने वाली सरकार है, जिसे मजबूत बनाए रखना राष्ट्रहित में आवश्यक है। राष्ट्रीय अध्यक्ष ने पार्टी कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों को संबोधित करते हुए कहा कि उत्तराखंड केवल एक राज्य नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, सनातन परंपरा और राष्ट्रवाद की चेतना का केंद्र है। उन्होंने कहा कि गंगा, हिमालय, चारधाम और )षि-मुनियों की तपोभूमि से निकला संदेश पूरे देश को दिशा देता है। ऐसे में भाजपा कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारी और अधिक बढ़ जाती है। उन्होंने कार्यकर्ताओं से बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करने का आह्वान करते हुए कहा कि 2027 का चुनाव केवल राजनीतिक मुकाबला नहीं, बल्कि विचारधारा की लड़ाई भी होगा। उन्होंने कहा कि भाजपा ने देश में सांस्कृतिक पुनर्जागरण का वातावरण तैयार किया है और उत्तराखंड इस अभियान का महत्वपूर्ण केंद्र बनकर उभरा है। अपने संबोधन में राष्ट्रीय अध्यक्ष ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व का उल्लेख करते हुए कहा कि पिछले वर्षों में देश ने वैश्विक स्तर पर नई पहचान बनाई है। उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार ने विकास और संस्कृति को साथ लेकर चलने का कार्य किया है। चाहे अयोध्या में राम मंदिर निर्माण हो, काशी का पुनर्विकास हो या केदारखंड और मानसखंड को जोड़ने की योजनाएंकृइन सभी ने भारत की सांस्कृतिक आत्मा को नई ऊर्जा दी है। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड में भाजपा सरकार ने सड़क, स्वास्थ्य, पर्यटन, रेल और हवाई कनेक्टिविटी के क्षेत्र में ऐतिहासिक कार्य किए हैं। चारधाम यात्रा को सुविधाजनक बनाने, सीमांत क्षेत्रों के विकास और पर्यटन को रोजगार से जोड़ने की दिशा में सरकार लगातार काम कर रही है। उन्होंने दावा किया कि डबल इंजन सरकार ने राज्य को विकास की नई गति दी है। हालांकि राष्ट्रीय अध्यक्ष का पूरा भाषण केवल विकास तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने बार-बार सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और सनातन मूल्यों का उल्लेख करते हुए कार्यकर्ताओं से कहा कि भाजपा का संघर्ष केवल चुनाव जीतने का नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने का अभियान है। उन्होंने कहा कि विपक्ष भाजपा की विचारधारा को समझ नहीं पा रहा, जबकि देश की जनता अब राष्ट्रहित और सांस्कृतिक अस्मिता के मुद्दों पर खुलकर भाजपा के साथ खड़ी है। उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं को संदेश देते हुए कहा कि आने वाला चुनाव संगठन की ताकत और जनता के विश्वास का चुनाव होगा। प्रत्येक कार्यकर्ता को घर-घर जाकर केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं को जनता तक पहुंचाना होगा। उन्होंने विशेष रूप से युवाओं और पहली बार मतदान करने वाले मतदाताओं को पार्टी से जोड़ने पर जोर दिया।

दूनघाटी में ‘हाईप्रोफाइल’ मंथन

उत्तराखंड में भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने बताया विधानसभा चुनाव के लिए ‘एक्शन प्लान’ ---सांसदों-विधायकों को विधानसभा स्तर पर मोर्चा संभालने के निर्देश ---वोट बैंक से आगे विचार परिवार के दायरे को बढ़ाने पर होगा फोकस ---विपक्षी खेमे की घेराबंदी के लिए भाजपा ने झोंकी सांगठनिक ताकत देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर भारतीय जनता पार्टी ने अब जमीनी स्तर पर संगठनात्मक तैयारी तेज कर दी है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने उत्तराखंड दौरे के दौरान सांसदों, विधायकों और संगठन पदाधिकारियों के साथ हुई महत्वपूर्ण बैठकों में स्पष्ट संकेत दे दिए हैं कि आगामी चुनाव केवल राजनीतिक अभियान नहीं, बल्कि पार्टी विचार परिवार के विस्तार का मिशन होगा। उन्होंने सभी जनप्रतिनिधियों को विधानसभा स्तर पर ठोस कार्ययोजना बनाकर सक्रिय भूमिका निभाने के निर्देश दिए हैं। सूत्रों के अनुसार राष्ट्रीय अध्यक्ष ने संगठन और सरकार के बीच बेहतर समन्वय पर विशेष जोर देते हुए कहा कि भाजपा की सबसे बड़ी ताकत उसका बूथ स्तर तक फैला संगठन और वैचारिक कार्यकर्ता हैं। ऐसे में हर विधायक, सांसद और पदाधिकारी को केवल चुनावी नेता नहीं, बल्कि संगठन विस्तारक की भूमिका में काम करना होगा। बैठक में विशेष रूप से उन विधानसभा सीटों पर गहन चर्चा की गई, जहां भाजपा पिछले विधानसभा और लोकसभा चुनावों में कमजोर रही या हार का सामना करना पड़ा। पार्टी नेतृत्व ने इन सीटों का अलग-अलग राजनीतिक और सामाजिक विश्लेषण तैयार करने के निर्देश दिए हैं। माना जा रहा है कि भाजपा अब हर सीट पर स्थानीय समीकरण, जातीय संतुलन, युवा मतदाता, महिला वोट बैंक और क्षेत्रीय मुद्दों को ध्यान में रखते हुए अलग रणनीति तैयार करेगी। राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कहा कि पार्टी को केवल जीतने वाली सीटों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए, बल्कि कमजोर क्षेत्रों में भी संगठन की जड़ें मजबूत करनी होंगी। उन्होंने कार्यकर्ताओं को हर बूथ, मजबूत बूथ के मंत्र के साथ गांव-गांव तक पहुंचने का आह्वान किया। बैठक में यह भी तय किया गया कि जिन सीटों पर भाजपा पिछली बार कमजोर रही, वहां लोकसभा और राज्यसभा सांसदों की विशेष जिम्मेदारी तय की जाएगी। सांसदों को इन क्षेत्रों में नियमित प्रवास, जनसंपर्क और संगठनात्मक बैठकों के माध्यम से पार्टी को मजबूत करने का दायित्व सौंपा जा रहा है। पार्टी नेतृत्व का मानना है कि सांसदों की सक्रिय मौजूदगी से कार्यकर्ताओं में ऊर्जा बढ़ेगी और जनता के बीच सरकार की योजनाओं का प्रभावी संदेश पहुंचेगा। सूत्र बताते हैं कि पार्टी अब प्रवास राजनीति को चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा बना रही है। इसके तहत सांसद और वरिष्ठ नेता लगातार गांवों, कस्बों और दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों में रात्रि प्रवास करेंगे। इससे स्थानीय मुद्दों की जानकारी लेने के साथ-साथ कार्यकर्ताओं के साथ सीधा संवाद भी स्थापित किया जाएगा। राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने स्पष्ट किया कि भाजपा केवल चुनावी गणित के आधार पर राजनीति नहीं करती, बल्कि वैचारिक आधार पर समाज को जोड़ने का कार्य करती है। उन्होंने कहा कि पार्टी का लक्ष्य केवल सीटें जीतना नहीं, बल्कि समाज के हर वर्ग तक राष्ट्रवादी और सांस्कृतिक विचारधारा को पहुंचाना है। बैठक में सोशल मीडिया और युवा मतदाताओं पर भी विशेष फोकस किया गया। पार्टी ने युवाओं के बीच डिजिटल माध्यमों से पहुंच बढ़ाने, पहली बार मतदान करने वाले मतदाताओं को जोड़ने और केंद्र व राज्य सरकार की योजनाओं को प्रभावी ढंग से प्रचारित करने की रणनीति पर चर्चा की।

आस्था’ पर जाम का ‘ब्रेक’

बदरीनाथ हाईवे पर जाम की वीडियो सोशल मीडिया पर हो रही है वायरल ---बदरीनाथ हाईवे पर जोशीमठ के पास घंटों रेंगते दिख रहे वीडिया में वाहन ---सरकार का दावा-कृरिकार्ड भीड़ के बाद भी व्यवस्था संभाल रहे अफसर ---जोशीमठ, पांडुकेश्वर और गोविंदघाट क्षेत्र में है यात्रियों का ज्यादा दबाव देहरादून। उत्तराखंड के जोशीमठ के पास बद्रीनाथ यात्रा मार्ग से आ रही तस्वीरें और वीडियो इस समय सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे हैं। इन वीडियो में वाहनों की कई किलोमीटर लंबी कतारें और घंटों से जाम में फंसे श्र(ालु नजर आ रहे हैं। चारधाम यात्रा में उमड़ रही रिकार्ड भीड़ अब बदरीनाथ यात्रा मार्ग पर भारी दबाव के रूप में दिखाई देने लगी है। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में साफ दिख रहा है कि जोशीमठ के पास राष्ट्रीय राजमार्ग पर विगत दिवस लंबा ट्रैफिक जाम लगने से हजारों श्र(ालु घंटों तक रास्ते में फंसे रहे। कई स्थानों पर वाहन रेंगते नजर आए, जबकि कुछ जगह यात्रियों को सड़क किनारे उतरकर इंतजार करना पड़ा। वायरल हो रहे एक वीडियो में बदरीनाथ हाईवे पर वाहनों की कई किलोमीटर लंबी कतारें दिखाई दे रही हैं। वीडियो में बताया जा रहा है कि जोशीमठ, पांडुकेश्वर और गोविंदघाट क्षेत्र में अत्यधिक दबाव के चलते बार-बार यातायात प्रभावित हो रहा है। पहाड़ी मार्ग संकरा होने और कई स्थानों पर सड़क निर्माण कार्य चलने से भी समस्या बढ़ रही है। उधर, राज्य सरकार ने कहा है कि इस बार चारधाम यात्रा में रिकार्ड संख्या में श्र(ालु पहुंच रहे हैं, जिसके कारण कुछ स्थानों पर दबाव बढ़ा है। सरकार के अनुसार ट्रैफिक व्यवस्था संभालने के लिए अतिरिक्त पुलिस बल और प्रशासनिक टीमें तैनात की गई हैं। अधिकारियों को लगातार मानिटरिंग के निर्देश दिए गए हैं। सरकार की ओर से श्र(ालुओं से अपील की गई है कि वह यात्रा पर निकलने से पहले मौसम और ट्रैफिक अपडेट जरूर देखें और प्रशासन द्वारा जारी दिशा-निर्देशों का पालन करें। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने यात्रा व्यवस्थाओं को लेकर सरकार पर निशाना साधा है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि सरकार चारधाम यात्रा को लेकर केवल प्रचार में व्यस्त रही, जबकि जमीन पर व्यवस्थाएं चरमराई हुई हैं। पार्टी ने आरोप लगाया कि यदि पहले से भीड़ का अनुमान था तो पार्किंग, ट्रैफिक नियंत्रण और वैकल्पिक व्यवस्थाओं को मजबूत क्यों नहीं किया गया। कांग्रेस ने यात्रियों की परेशानी को प्रशासनिक लापरवाही का परिणाम बताया। वही भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट का कहना है कि इस वर्ष चारधाम यात्रा में रिकार्ड संख्या में श्र(ालु पहुंच रहे हैं, जो बाबा बदरीविशाल के प्रति लोगों की गहरी आस्था को दर्शाता है। पार्टी नेताओं के अनुसार सरकार और प्रशासन लगातार स्थिति की मानिटरिंग कर रहे हैं। अतिरिक्त पुलिस बल और ट्रैफिक टीमें तैनात की गई हैं तथा यात्रियों की सुरक्षा सर्वाेच्च प्राथमिकता है। भाजपा का कहना है कि पहाड़ी क्षेत्रों में अत्यधिक भीड़ के दौरान कुछ समय के लिए दबाव बढ़ना स्वाभाविक है। बाक्स सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में लोग 5 से 8 घंटे तक एक ही जगह पर फंसे होने का दावा कर रहे हैं। कई वीडियो में लोग प्रशासन की व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए दिख रहे हैं कि क्षमता से अधिक वाहनों को आगे क्यों जाने दिया जा रहा है। बता दें कि जोशीमठ के पास आल वेदर रोड के निर्माण कार्य और पिछले दिनों हुए कुछ भूस्खलन के चलते भी सड़कें संकरी हुई हैं, जिससे श्बॉटलनेकश् जैसी स्थिति बन गई है। भाजपा का बयान भारतीय जनता पार्टी ने कहा कि

‘पहाड़ों में जीवंत होता है द्वापर युग’

देवभूमि में आस्था और इतिहास का साक्षात संगम है पांडव नृत्य, इस दौरान ---उत्तराखंड के गांवों में सदियों से जीवित है पांडव नृत्य की परंपरा ---लोक संस्कृति, आस्था और महाभारत कथाओं का अद्भुत संगम ---नई पीढ़ी तक लोक विरासत पहुंचाने की चुनौती बनी बड़ी चिंता देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ केवल प्राकृतिक सुंदरता और धार्मिक स्थलों के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी समृ( लोक संस्कृति और परंपराओं के लिए भी देशभर में अलग पहचान रखते हैं। इन्हीं लोक परंपराओं में एक महत्वपूर्ण और प्राचीन परंपरा है पांडव नृत्य। गढ़वाल के कई गांवों में आज भी यह लोकनृत्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि आस्था, इतिहास और लोकजीवन का जीवंत हिस्सा माना जाता है। पांडव नृत्य का संबंध महाभारत काल की कथाओं से माना जाता है। लोक मान्यता है कि पांडव अपने वनवास और अज्ञातवास के दौरान हिमालयी क्षेत्रों में भी पहुंचे थे। इसी विश्वास के चलते उत्तराखंड के गांवों में पांडवों को देवतुल्य सम्मान दिया जाता है और उनके जीवन प्रसंगों को लोकनृत्य एवं गीतों के माध्यम से मंचित किया जाता है। यह नृत्य मुख्य रूप से गढ़वाल क्षेत्र के रुद्रप्रयाग, चमोली जिलों के गांवों में अधिक प्रचलित है। सर्दियों के मौसम, धार्मिक आयोजनों और विशेष मेलों के दौरान गांवों में रातभर पांडव नृत्य आयोजित किया जाता है। ढोल, दमाऊं, रणसिंघा और थाली की पारंपरिक धुनों के बीच कलाकार महाभारत के विभिन्न प्रसंगों को अभिनय और नृत्य के जरिए जीवंत कर देते हैं। पांडव नृत्य की सबसे बड़ी विशेषता इसकी आध्यात्मिकता मानी जाती है। गांवों में इसे केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि देव अनुष्ठान के रूप में देखा जाता है। कई स्थानों पर कलाकारों में देव अवतरण की मान्यता भी जुड़ी होती है। स्थानीय लोग मानते हैं कि प्रस्तुति के दौरान पांडवों की आत्मिक शक्ति कलाकारों में प्रवेश करती है और पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठता है। इस लोकनृत्य में भीम, अर्जुन, द्रौपदी, श्रीकृष्ण और दुर्याेधन जैसे पात्रों की विशेष भूमिका होती है। कलाकार पारंपरिक वेशभूषा पहनकर घंटों तक नृत्य करते हैं। संवादों से अधिक यहां भाव-भंगिमा, लोकगीत और वाद्ययंत्रों की धुन कहानी को आगे बढ़ाती है। कई बार पूरा गांव रातभर जागकर इस आयोजन का हिस्सा बनता है। लोक संस्कृति के जानकारों का मानना है कि पांडव नृत्य केवल कला नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सामाजिक एकता और सामूहिक चेतना का प्रतीक है। गांवों में यह आयोजन लोगों को एक मंच पर जोड़ता है। बुजुर्गों से लेकर बच्चे तक इसमें भाग लेते हैं और इसी माध्यम से नई पीढ़ी अपनी लोक विरासत से जुड़ती है। हालांकि आधुनिकता और पलायन के दौर में यह परंपरा चुनौतियों का सामना भी कर रही है। गांव खाली हो रहे हैं और लोक कलाकारों की संख्या धीरे-धीरे कम होती जा रही है। युवा पीढ़ी का रुझान आधुनिक मनोरंजन की ओर बढ़ने से पारंपरिक लोक कलाओं पर संकट गहराने लगा है। कई सांस्कृतिक संगठनों और लोक कलाकारों का कहना है कि यदि समय रहते संरक्षण नहीं मिला तो आने वाले वर्षों में यह विरासत कमजोर पड़ सकती है। इसके बावजूद पहाड़ के कई गांव आज भी अपनी सांस्कृतिक जड़ों को बचाए हुए हैं। जब रात के सन्नाटे में ढोल-दमाऊं की थाप गूंजती है और पांडव नृत्य शुरू होता है, तब ऐसा लगता है मानो महाभारत का इतिहास फिर से जीवंत हो उठा हो। यही कारण है कि पांडव नृत्य केवल एक लोक परंपरा नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक आत्मा का अभिन्न हिस्सा माना जाता है।

शुक्रवार, 29 मई 2026

बीजेपी का ‘आल इज वेल’ गेम प्लान

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के दौरे से पहले भाजपा नेताओं की जुगलबंदी दिखी मुख्यमंत्री आवास से निकली तस्वीरों ने बदल गई है उत्तराखंड में सियासी हवा लंबे समय बाद त्रिवेंद्र रावत पहुंचे सीएम हाउस, अनिल बलूनी संग बनी रणनीति उत्तराखंड भाजपा ने विधानसभा चुनाव से पहले चली एकजुटता की बड़ी चाल देहरादून। सियासत में तस्वीरें सिर्फ यादों के लिए नहीं, बल्कि बड़े संदेशों के लिए खींची जाती हैं। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन के तीन दिवसीय उत्तराखंड प्रवास से ठीक पहले मुख्यमंत्री आवास से निकली तस्वीरों ने उत्तराखंड की राजनीति में एक नई इबारत लिख दी है। लंबे समय से सियासी गलियारों में चर्चा का विषय बनी दूरियों पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने एक डिनर डिप्लोमेसी के जरिए पूर्णविराम लगा दिया है। सूत्र बताते हैं कि सीएम आवास का माहौल सामान्य से अलग था। काफी लंबे अर्से बाद पूर्व सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत मुख्यमंत्री आवास पहुंचे जहां मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने खुद गर्मजोशी से उनकी अगवानी की। इसके साथ ही गढ़वाल सांसद अनिल बलूनी ने भी सीएम से वार्ता कर कई विषयों पर चर्चा की। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने परंपरा और शिष्टाचार का निर्वहन करते हुए पूर्व सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत का शाल ओढ़ाकर गर्मजोशी से स्वागत किया। मुख्यमंत्री ने उन्हें पौधा भी भेंट किया जो संगठन के भीतर नई ऊर्जा और विकास के अंकुर फूटने का प्रतीक माना जा रहा है। इस दौरान दोनों नेताओं के चेहरे की मुस्कान ने विपक्षी खेमे में चल रही अंदरूनी कलह की चर्चाओं पर विराम लगाने का काम किया है। डिनर के साथ ही मुख्यमंत्री आवास पर एक उच्च स्तरीय संगठनात्मक बैठक भी हुई। इस बैठक की अहमियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसमें मुख्यमंत्री और पूर्व मुख्यमंत्री के अलावा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट और प्रदेश संगठन महामंत्री अजेय कुमार भी मौजूद रहे। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि त्रिवेंद्र सिंह रावत का सीएम आवास पर इस तरह सक्रिय दिखना भाजपा की उस रणनीति का हिस्सा है, जिसमें वह अपने हर बड़े चेहरे को एक साथ मंच पर लाना चाहती है। जब पार्टी के दो दिग्गज और निर्णायक चेहरे वर्तमान और पूर्व सीएम एक साथ डिनर टेबल पर बैठकर राष्ट्रीय अध्यक्ष के दौरे की रणनीति तैयार कर रहे हों तो यह सीधे तौर पर कार्यकर्ताओं के लिए अनुशासन और एकजुटता की लक्ष्मण रेखा है। सूत्रों के अनुसार डिनर के साथ चली लंबी गुफ्तगू में राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन के आगामी तीन दिवसीय दौरे के एक-एक बिंदु पर बारीकी से चर्चा की गई। संगठन और सरकार के बीच बेहतर तालमेल कैसे रहे, इस पर वरिष्ठ नेताओं ने अपने अनुभव साझा किए। पूर्व सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत और धामी की साथ-साथ डिनर करती तस्वीर ने विपक्ष के उन दावों को हवा में उड़ा दिया है, जिनमें भाजपा के भीतर गुटबाजी की बात कही जा रही थी। आज से शुरू हो रहे राष्ट्रीय अध्यक्ष के प्रवास के दौरान होने वाली अहम बैठकों का एजेंडा भी इस डिनर टेबल पर फाइनल किया गया। इसके साथ ही गढ़वाल सांसद अनिल बलूनी ने कुछ दिन पूर्व भाजपा से नाराज चल रहे अरविंद पांडे के आवास पर जाकर उनसे मुलाकात की और उसके बाद देहरादून में सीएम धामी से मुलाकात कर कई विषयों पर चर्चा की। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि नितिन नबीन के दौरे से ठीक पहले भाजपा ने अपने अंतर्विरोधों पर मरहम लगा लिया है। त्रिवेंद्र सिंह रावत जैसे दिग्गज नेता का सीएम आवास पहुंचना और मुख्यमंत्री का उन्हें ससम्मान शाल ओढ़ाकर स्वागत करना यह दर्शाता है कि पार्टी के भीतर अब सब कुछ दुरुस्त है। नितिन नबीन के दौरे से पहले भाजपा ने अपने आंतरिक मोर्चों को पूरी तरह सुरक्षित कर लिया है। मुख्यमंत्री धामी की डिनर डिप्लोमेसी ने न केवल वरिष्ठों का सम्मान सुनिश्चित किया है, बल्कि संगठन के उन कील-कांटों को भी निकाल फेंका है जो भविष्य की राह में बाधा बन सकते थे। अब भाजपा पूरी ताकत और एकजुटता के साथ राष्ट्रीय अध्यक्ष का स्वागत करने और 2027 की बिसात बिछाने के लिए तैयार खड़ी है।

भाजपा बनाएगी ‘मिशन रिपीट’ का ब्लूप्रिंट

---धामी सरकार के कामकाज की होगी समीक्षा ---बूथ स्तर तक संगठन मजबूत करने पर फोकस ---कांग्रेस पर मनोवैज्ञानिक बढ़त बनाने की रणनीति ---पहाड़ के मुद्दों पर केंद्रीय नेतृत्व की रहेगी नजर ---सत्ता विरोधी माहौल को साधने की भी है तैयारी देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर भाजपा ने समय से पहले चुनावी मोर्चाबंदी शुरू कर दी है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन का उत्तराखंड दौरा इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। पार्टी इस दौरे के जरिए जहां संगठन को सक्रिय करने में जुटी है, वहीं सरकार और संगठन के बीच बेहतर तालमेल बैठाने की कवायद भी तेज हो गई है। भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष के दौरे को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व पर केंद्रीय नेतृत्व के भरोसे के रूप में भी देखा जा रहा है। भाजपा पहले ही संकेत दे चुकी है कि 2027 का चुनाव धामी के चेहरे पर ही लड़ा जाएगा। ऐसे में यह दौरा पार्टी के भीतर किसी भी संभावित असंतोष को शांत करने और कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा भरने की कोशिश माना जा रहा है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा इस बार केवल चुनावी घोषणाओं के भरोसे नहीं रहना चाहती, बल्कि बूथ स्तर तक मजबूत नेटवर्क तैयार करने में जुट गई है। पार्टी ग्रामीण क्षेत्रों, सीमांत इलाकों और शहरी सीटों पर अलग-अलग रणनीति तैयार कर रही है। संगठनात्मक बैठकों में कार्यकर्ताओं को अभी से चुनावी मोड में लाने पर जोर दिया जा रहा है। दूसरी ओर भाजपा की सक्रियता विपक्षी कांग्रेस के लिए भी चुनौती बनती दिख रही है। कांग्रेस जहां अभी संगठनात्मक मजबूती और नेतृत्व संतुलन की जद्दोजहद में उलझी है, वहीं भाजपा लगातार केंद्रीय नेतृत्व के जरिए कार्यकर्ताओं में संदेश देने की कोशिश कर रही है कि पार्टी पूरी तरह चुनावी तैयारी में उतर चुकी है। हालांकि भाजपा के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। बेरोजगारी, पलायन, भर्ती परीक्षाओं में धांधली, सड़क और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी जैसे मुद्दे लगातार सरकार को घेर रहे हैं। पहाड़ों में भू-कानून और मूल निवास जैसे मुद्दों पर भी जनता की नाराजगी खुलकर सामने आई है। ऐसे में राष्ट्रीय अध्यक्ष का यह दौरा केवल राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन नहीं, बल्कि जनता के मूड को समझने और चुनाव से पहले कमजोर कड़ियों को दुरुस्त करने का प्रयास भी माना जा रहा है। भाजपा अब उत्तराखंड में लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी का सपना देख रही है। इसी कारण पार्टी ने चुनावी तैयारियों को अभी से गति दे दी है। आने वाले महीनों में केंद्रीय नेताओं के और दौरों की संभावना भी जताई जा रही है। साफ है कि उत्तराखंड में 2027 का चुनावी रण धीरे-धीरे गर्माने लगा है।

टिहरी की नथ: पहाड़ की ‘ध्याण’ के श्रृंगार का ‘गौरव’

परंपरा, सौंदर्य और पहाड़ी संस्कृति की पहचान बनी सदियों पुरानी विरासत क्रासर ---सोने की कारीगरी में झलकती पहाड़ की समृ( संस्कृति ---समय बदला लेकिन नथ का सम्मान आज भी है कायम ---नई पीढ़ी फैशन के साथ अपनी परंपरा को भी दे रही जगह देहरादून। ‘तेरी टिहरी की नथुली सुआ, सैंण-सैंण मा लश्कारी...’ पहाड़ में जब-जब इस गढ़वाली गीत की धुन कानों में पड़ती है तो पहाड़ की ध्याण के चेहरे पर पहाड़ की शान टिहरी की नथ आखों के सामने इसका दृश्य दिखता है। उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र की संस्कृति जितनी समृ( और रंगीन है, उतनी ही खास उसकी पारंपरिक वेशभूषा और आभूषण भी हैं। इन्हीं में सबसे खास पहचान रखती है टिहरी की नथ जिसे गढ़वाल की शान कहा जाता है। पहाड़ की महिलाओं के सौंदर्य, सम्मान और पारंपरिक गौरव का प्रतीक मानी जाने वाली यह नथ आज भी अपनी अलग पहचान बनाए हुए है। गढ़वाली विवाह की कल्पना टिहरी की नथ के बिना अधूरी मानी जाती है। बड़े आकार की यह सोने की नथ केवल आभूषण नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक भी रही है। पुराने समय में परिवार की आर्थिक स्थिति और सामाजिक सम्मान का अंदाजा भी महिलाओं द्वारा पहनी जाने वाली नथ से लगाया जाता था। कहा जाता है कि टिहरी रियासत के दौर में इस नथ को विशेष पहचान मिली। राजघरानों और समृ( परिवारों की महिलाएं बड़े आकार की नथ पहनती थीं, जिसके बाद धीरे-धीरे यह परंपरा गांव-गांव तक पहुंच गई। समय के साथ टिहरी की नथ गढ़वाल की सांस्कृतिक पहचान बन गई। इस नथ की खासियत इसका बड़ा गोल आकार और उसमें जड़े जाने वाले मोती व लाल-हरे नग होते हैं। पारंपरिक रूप से इसे सोने से तैयार किया जाता है और कई बार इसका वजन भी काफी अधिक होता है। शादी के दौरान दुल्हन जब पारंपरिक गढ़वाली वेशभूषा के साथ टिहरी की नथ पहनती है तो उसका रूप अलग ही दिखाई देता है। गढ़वाल में नथ केवल श्रृंगार का हिस्सा नहीं, बल्कि भावनाओं और परंपराओं से भी जुड़ी हुई है। कई परिवारों में यह पीढ़ी दर पीढ़ी विरासत के रूप में सौंपी जाती है। दादी-नानी की नथ आज भी परिवारों में संभालकर रखी जाती है और विशेष अवसरों पर नई पीढ़ी उसे गर्व के साथ पहनती है। पहाड़ के लोकगीतों और लोकनृत्यों में भी टिहरी की नथ का जिक्र अक्सर सुनाई देता है। गढ़वाली गीतों में दुल्हन की सुंदरता और उसकी नथ की चमक को खास तौर पर दर्शाया जाता रहा है। समय के साथ फैशन और जीवनशैली में काफी बदलाव आया है, लेकिन टिहरी की नथ का आकर्षण आज भी कम नहीं हुआ। अब युवा पीढ़ी पारंपरिक डिजाइनों के साथ हल्के और आधुनिक स्टाइल की नथ भी पसंद कर रही है। कई फैशन डिजाइनर और ज्वेलरी कलाकार भी गढ़वाली नथ को नए अंदाज में पेश कर रहे हैं। सोशल मीडिया और उत्तराखंडी सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने भी इस पारंपरिक आभूषण को नई पहचान दी है। पहाड़ी विवाहों में अब भी दुल्हन की सबसे खास पहचान उसकी बड़ी और खूबसूरत नथ ही मानी जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तराखंड की पारंपरिक कला और आभूषणों को संरक्षित करना बेहद जरूरी है। टिहरी की नथ केवल एक गहना नहीं, बल्कि गढ़वाल की सांस्कृतिक आत्मा का हिस्सा है। बदलते दौर में नई पीढ़ी यदि अपनी इस विरासत को अपनाए रखेगी, तो पहाड़ की पहचान और भी मजबूत होगी। टिहरी की नथ आज भी यह एहसास कराती है कि आधुनिकता की दौड़ में भी पहाड़ अपनी परंपराओं और संस्कृति को गर्व के साथ जीवित रखे हुए है।

‘नैरेटिव’ नया और ‘डीएनए’ वही पुराना

गढ़वाल-कुमाऊं संतुलन, मैदानी बनाम पहाड़ी राजनीति और जातीय गणित तय करेंगे चुनावी दिशा क्रासर ---प्रदेश के गढ़वाल और कुमाऊं में बनेगी अलग-अलग चुनाव की रणनीति ---पहाड़ बनाम मैदान का मुद्दा फिर पकड़ सकता है जोर, रणनीति में जुटे दल ---पलायन, भू-कानून, मूल निवास व सीमांत जिलों में विकास पर होगा फोकस देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 में इस बार केवल विकास और बेरोजगारी ही नहीं, बल्कि क्षेत्रीय समीकरण भी सत्ता की दिशा तय करने में बड़ी भूमिका निभाने जा रहे हैं। राज्य गठन के बाद से ही उत्तराखंड की राजनीति गढ़वाल-कुमाऊं संतुलन, पहाड़ और मैदान के राजनीतिक प्रभाव और जातीय समीकरणों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। आगामी चुनाव में भी यही समीकरण राजनीतिक दलों की रणनीति का केंद्र बनने लगे हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दल अब क्षेत्रवार रणनीति तैयार करने में जुट गए हैं। गढ़वाल मंडल की सीटों पर जहां राष्ट्रवाद, सड़क और चारधाम परियोजनाओं को मुद्दा बनाया जा सकता है, वहीं कुमाऊं में बेरोजगारी, पलायन और स्थानीय पहचान के सवाल अधिक प्रभावी रहने की संभावना है। उत्तराखंड की राजनीति में लंबे समय से गढ़वाल और कुमाऊं का संतुलन बेहद अहम माना जाता रहा है। मुख्यमंत्री, प्रदेश अध्यक्ष और संगठन में प्रमुख पदों पर क्षेत्रीय संतुलन साधना हर दल की मजबूरी रही है। भाजपा हो या कांग्रेस दोनों दल जानते हैं कि किसी एक क्षेत्र की उपेक्षा राजनीतिक नुकसान का कारण बन सकती है। वर्तमान में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी कुमाऊं क्षेत्र से आते हैं और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष गढ़वाल से प्रतिनिधित्व करते हैं। वहीं कांग्रेस भी क्षेत्रीय असंतोष को भुनाने की कोशिश में जुटी हुई है। उत्तराखंड में हर चुनाव के दौरान पहाड़ और मैदान के बीच विकास असंतुलन का मुद्दा उठता रहा है। पहाड़ी जिलों में पलायन, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, बंद स्कूल और खराब सड़कें आज भी बड़ा मुद्दा हैं। दूसरी ओर देहरादून, हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर जैसे मैदानी जिलों में शहरीकरण, ट्रैफिक, कानून व्यवस्था और रोजगार प्रमुख चुनावी मुद्दे बनते जा रहे हैं। राजनीतिक दल अब इन दोनों क्षेत्रों के लिए अलग-अलग चुनावी नैरेटिव तैयार करने में जुटे हैं। पहाड़ में मूल निवास, भू-कानून और स्थानीय रोजगार जैसे मुद्दे हवा पकड़ सकते हैं, जबकि मैदान में विकास परियोजनाओं और निवेश को प्रमुखता दी जा सकती है। राज्य की राजनीति में ठाकुर, ब्राह्मण, दलित और ओबीसी वोट बैंक का प्रभाव भी लगातार बढ़ा है। भाजपा और कांग्रेस दोनों ही जातीय संतुलन साधने के लिए टिकट वितरण से लेकर संगठन विस्तार तक सावधानी बरत रहे हैं। हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर की सीटों पर मुस्लिम और प्रवासी वोटरों की भूमिका भी कई सीटों पर परिणाम प्रभावित कर सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस बार युवा मतदाता और पहली बार वोट डालने वाली पीढ़ी भी चुनावी समीकरण बदल सकती है। सोशल मीडिया और स्थानीय मुद्दों के प्रभाव से पारंपरिक वोट बैंक में भी बदलाव के संकेत दिखाई दे रहे हैं। चीन और नेपाल सीमा से लगे पिथौरागढ़, चमोली और उत्तरकाशी जैसे जिलों में राष्ट्रीय सुरक्षा, सड़क और संचार सुविधाएं प्रमुख मुद्दे बन सकते हैं। भाजपा यहां राष्ट्रवाद और सीमांत विकास को प्रमुख चुनावी एजेंडा बना सकती है। वहीं कांग्रेस स्थानीय समस्याओं और पलायन को लेकर सरकार को घेरने की तैयारी में है। हालांकि उत्तराखंड की राजनीति मुख्य रूप से भाजपा और कांग्रेस के इर्द-गिर्द घूमती रही है, लेकिन इस बार क्षेत्रीय संगठन और सामाजिक मंच भी चुनावी माहौल को प्रभावित कर सकते हैं। भू-कानून और मूल निवास की मांग को लेकर सक्रिय समूह पहाड़ में जनभावनाओं को दिशा देने की कोशिश कर रहे हैं। यदि यह मुद्दे चुनाव तक मजबूत बने रहते हैं तो मुख्य दलों की रणनीति भी प्रभावित हो सकती है। उत्तराखंड में 2027 का चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का नहीं, बल्कि क्षेत्रीय आकांक्षाओं और सामाजिक संतुलन की परीक्षा भी होगा। पहाड़ की नाराजगी, मैदान की अपेक्षाएं और गढ़वाल-कुमाऊं का समीकरण किस दल के पक्ष में जाएगा, यही आने वाले चुनाव की सबसे बड़ी कहानी बनने जा रही है।

काफिले की ‘रफ्तार’ पर सियासी ‘रार’

---जौलीग्रांट एयरपोर्ट से पार्टी मुख्यालय तक वाहनों की लंबी कतार से कई जगह जाम जैसे हालात ---विपक्ष ने पीएम मोदी की ऊर्जा बचत अपील का हवाला देकर भाजपा को घेरा ---भाजपा बोली कार्यकर्ताओं का उत्साह लोकतंत्र की ताकत, विपक्ष कर रहा अनावश्यक राजनीति ---सोशल मीडिया पर भी रोड शो और वाहनों के काफिले को लेकर छिड़ी बहस देहरादून। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के उत्तराखंड दौरे के दौरान जौलीग्रांट एयरपोर्ट से देहरादून स्थित पार्टी मुख्यालय तक निकले वाहनों के लंबे काफिले ने राजनीतिक बहस छेड़ दी है। एक ओर भाजपा इसे कार्यकर्ताओं के उत्साह और संगठन की ताकत बता रही है, वहीं विपक्ष ने इसे फिजूल शक्ति प्रदर्शन बताते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ऊर्जा बचत और पर्यावरण संरक्षण की अपील से जोड़कर सवाल उठाए हैं। राष्ट्रीय अध्यक्ष के स्वागत के लिए एयरपोर्ट से लेकर शहर तक बड़ी संख्या में भाजपा कार्यकर्ता वाहनों के साथ पहुंचे। कई किलोमीटर तक चले काफिले के कारण रास्ते में ट्रैफिक की रफ्तार धीमी पड़ गई। आम लोगों को जगह-जगह जाम और असुविधा का सामना करना पड़ा। दफ्तर जाने वाले लोग, स्कूली वाहन और रोजमर्रा के काम से निकलने वाले नागरिक लंबे समय तक यातायात में फंसे रहे। प्रदेश कांग्रेस नेताओं ने इस पूरे घटनाक्रम को भाजपा की दिखावटी राजनीति करार दिया। कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार ऊर्जा बचत, ईंधन बचाने और कार्बन उत्सर्जन कम करने की अपील करते हैं, लेकिन उनकी ही पार्टी के नेता सैकड़ों गाड़ियों के काफिले निकालकर विपरीत संदेश दे रहे हैं। कांग्रेस नेताओं ने कहा कि जिस राज्य में आम आदमी महंगे पेट्रोल-डीजल से परेशान है, वहां राजनीतिक रोड शो के नाम पर ईंधन की बर्बादी जनता को खटक रही है। विपक्ष ने यह भी आरोप लगाया कि सत्ता का प्रभाव दिखाने के लिए आम जनता की सुविधा को नजरअंदाज किया गया। भाजपा नेताओं ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताया है। पार्टी पदाधिकारियों का कहना है कि राष्ट्रीय अध्यक्ष का उत्तराखंड आगमन कार्यकर्ताओं के लिए उत्साह का विषय था और बड़ी संख्या में लोगों का स्वागत के लिए पहुंचना स्वाभाविक है। भाजपा नेताओं का कहना है कि लोकतंत्र में राजनीतिक दलों के कार्यक्रम और स्वागत यात्राएं नई बात नहीं हैं। पार्टी ने यह भी कहा कि यातायात व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रशासन ने आवश्यक इंतजाम किए थे और विपक्ष केवल राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश कर रहा है। काफिले को लेकर आम नागरिकों में भी मिली-जुली प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। कुछ लोगों ने इसे बड़े नेताओं के स्वागत की परंपरा बताया, जबकि कई लोगों ने सोशल मीडिया पर ट्रैफिक अव्यवस्था और ईंधन की बर्बादी को लेकर नाराजगी जाहिर की। देहरादून निवासी एक व्यापारी ने कहा कि अगर ऊर्जा बचाने और प्रदूषण कम करने की बात होती है तो नेताओं को भी उदाहरण पेश करना चाहिए। वहीं एक भाजपा समर्थक ने कहा कि राष्ट्रीय अध्यक्ष का स्वागत करना कार्यकर्ताओं का उत्साह है, इसे गलत तरीके से नहीं देखना चाहिए। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि विधानसभा चुनाव 2027 से पहले ऐसे आयोजन शक्ति प्रदर्शन का माध्यम बनेंगे। भाजपा जहां बड़े जनसमर्थन को अपनी ताकत के रूप में पेश करेगी, वहीं विपक्ष इन्हें जनता की समस्याओं और वीआईपी संस्कृति से जोड़कर घेरने की कोशिश करेगा। फिलहाल देहरादून का यह रोड शो केवल राजनीतिक कार्यक्रम नहीं रहा, बल्कि इसने ऊर्जा बचत बनाम राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन की बहस को भी तेज कर दिया है।

‘डबल इंजन’ बनाम ‘पहाड़ का दर्द’

2027 के विधानसभा चुनाव में विकास माडल पर आमने-सामने हो सकते है सत्ता और विपक्ष क्रासर ---भाजपा विकास कार्यों को बनाएगी चुनावी हथियार, विपक्ष उठाएगा जमीनी सवाल ---सड़क, पर्यटन और निवेश के दावों के बीच पलायन-बेरोजगारी पर घिरेगी सरकार ---पहाड़ के गांव, रोजगार और स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर जनता के बीच बढ़ेगी बहस देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, वैसे-वैसे राज्य की राजनीति में विकास माडल सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकता है। भाजपा जहां मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में अपने डबल इंजन विकास माडल को जनता के सामने रखेगी, वहीं कांग्रेस और क्षेत्रीय दल इसी माडल की जमीनी हकीकत पर सवाल खड़े करने की तैयारी में हैं। उत्तराखंड राज्य बनने के 27 साल बाद भी पहाड़ पलायन, बेरोजगारी, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी समस्याओं से जूझ रहा है। ऐसे में आगामी चुनाव में जनता यह सवाल पूछ सकती है कि आखिर उत्तराखंड का वास्तविक विकास माडल क्या है और उसका लाभ आम लोगों तक कितना पहुंचा? भाजपा सरकार मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में सड़कों, एक्सप्रेस-वे, आल वेदर रोड, रेल परियोजनाओं, पर्यटन कारिडोर, धार्मिक पुनर्निर्माण और निवेश सम्मेलनों को अपने विकास मॉडल की पहचान के रूप में पेश कर रही है। हाल ही में पेश किए गए 1.11 लाख करोड़ रुपये के बजट में भी सरकार ने इंफ्रास्ट्रक्चर, युवा, महिला और ग्रामीण विकास पर फोकस दिखाया है। भाजपा का दावा है कि डबल इंजन सरकार के कारण उत्तराखंड में सड़क, स्वास्थ्य, पर्यटन और निवेश के क्षेत्र में अभूतपूर्व काम हुए हैं। केदारनाथ पुनर्निर्माण, चारधाम यात्रा प्रबंधन, होम-स्टे नीति, नए मेडिकल कालेज और सीमांत क्षेत्रों में सड़क नेटवर्क को पार्टी अपनी उपलब्धियों के रूप में गिना रही है। पार्टी संगठन पहले ही मिशन-2027 के लिए सक्रिय दिखाई दे रहा है और मुख्यमंत्री धामी को चुनाव का चेहरा बनाए जाने के संकेत भी साफ दिख रहे हैं। हालांकि विपक्ष इसी विकास माडल पर सबसे ज्यादा हमला बोलने की तैयारी में है। कांग्रेस का आरोप है कि सरकार का विकास केवल कागजों और विज्ञापनों तक सीमित है। पहाड़ों से लगातार पलायन, गांवों में खाली घर, अस्पतालों में डाक्टरों की कमी, सरकारी स्कूलों की बदहाली और युवाओं में बढ़ती बेरोजगारी विपक्ष के प्रमुख मुद्दे बन सकते हैं। कांग्रेस यह भी सवाल उठा रही है कि यदि विकास हुआ है तो पहाड़ों के दूरस्थ गांव आज भी सड़क, इंटरनेट और स्वास्थ्य सेवाओं से क्यों जूझ रहे हैं? राज्य में बढ़ती आपदाएं, जंगल की आग, पेयजल संकट और अनियोजित शहरीकरण को भी विपक्ष विकास माडल की विफलता के तौर पर पेश करने की रणनीति बना रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2027 का चुनाव विकास के दावे बनाम विकास की हकीकत पर केंद्रित हो सकता है। भाजपा जहां बड़े प्रोजेक्ट, धार्मिक पर्यटन और निवेश को अपनी ताकत बताएगी, वहीं विपक्ष गांव, किसान, रोजगार और पलायन जैसे स्थानीय मुद्दों को जनता के बीच ले जाएगा। क्षेत्रीय दल भी इस बहस को पहाड़ बनाम मैदान के नजरिये से देखने की कोशिश कर रहे हैं। सोशल मीडिया और युवाओं के बीच यह चर्चा तेजी से बढ़ रही है कि राज्य का विकास माडल स्थानीय संसाधनों, रोजगार और पहाड़ी अस्मिता को कितना मजबूत कर पाया है। विशेषज्ञों का कहना है कि उत्तराखंड में अब केवल सड़क और भवन निर्माण को विकास नहीं माना जाएगा। जनता रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, पलायन रोकने और गांवों को जीवित रखने वाले माडल की तलाश में है। ऐसे में 2027 का चुनाव इस बात का फैसला भी करेगा कि उत्तराखंड भविष्य में धार्मिक पर्यटन आधारित विकास माडल पर आगे बढ़ेगा या स्थानीय जरूरतों और पहाड़ी अर्थव्यवस्था पर आधारित नए माडल की मांग तेज होगी।

बुधवार, 27 मई 2026

उत्तराखंडियत’ से बढ़ी राष्ट्रीय दलों की ‘बेचौनी’

उत्तराखंड में विस चुनाव 2027 के संभावित मुद्दे -भाग-19 इस बार फिर से क्षेत्रीय अस्मिता को नए सिरे से राजनीतिक ताकत बनाएगी प्रदेश की जनता ---दिल्ली बनाम देहरादून की राजनीति में फंसा पहाड़ ---भू-कानून, मूल निवास और पलायन पर होगा वार ---राष्ट्रीय दलों को चुनौती देने को क्षेत्रीय चेहरे तैयार देहरादून। देवभूमि उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 जैसे-जैसे करीब आ रहे हैं, वैसे-वैसे राजनीतिक बहस का केंद्र बदलता दिख रहा है। इस बार मुकाबला सिर्फ भाजपा और कांग्रेस के बीच सत्ता परिवर्तन का नहीं रहेगा, बल्कि उत्तराखंडियत बनाम राष्ट्रीय राजनीति की विचारधारा का भी बनता जा रहा है। राज्य आंदोलन की भावनाओं, पहाड़ी पहचान, मूल निवास, भू-कानून, पलायन और स्थानीय संसाधनों पर अधिकार जैसे मुद्दे अब फिर राजनीतिक मंचों पर लौटने लगे हैं। उत्तराखंड बनने के पीछे सबसे बड़ी भावना थी अलग पहाड़ी पहचान और स्थानीय विकास। लेकिन राज्य गठन के 25 साल बाद भी पहाड़ों में खाली होते गांव, बेरोजगारी, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं का संकट लोगों के मन में सवाल खड़े कर रहा है। ऐसे में क्षेत्रीय अस्मिता का मुद्दा फिर से मजबूत होता दिख रहा है। भाजपा 2027 में भी राष्ट्रीय नेतृत्व,हिंदुत्व,राष्ट्रवाद और डबल इंजन सरकार के विकास मॉडल पर चुनाव लड़ने की तैयारी में है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में पार्टी संगठन अभी से चुनावी तैयारी में जुट गया है। प्रत्याशियों के चयन से लेकर बूथ स्तर तक रणनीति बनाई जा रही है। भाजपा का फोकस चारधाम परियोजना, सड़क, रेल और निवेश जैसे बड़े विकास कार्यों को चुनावी नैरेटिव बनाने पर रहेगा। पार्टी राष्ट्रीय नेतृत्व के चेहरे और केंद्र की योजनाओं के सहारे चुनावी बढ़त बनाए रखना चाहती है। राज्य आंदोलन से निकला उत्तराखंड क्रांति दल भी 2027 में सभी 70 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहा है। पार्टी एक बार फिर मूल मुद्दों भू-कानून, स्थायी निवास, जल-जंगल-जमीन और पहाड़ी पहचान को केंद्र में ला रही है। हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भावनात्मक मुद्दों के बावजूद क्षेत्रीय दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती मजबूत संगठन और भरोसेमंद नेतृत्व की है। सोशल मीडिया और युवाओं में समर्थन दिखने के बावजूद जमीनी नेटवर्क अभी कमजोर माना जा रहा है। अंकिता भंडारी हत्याकांड, भर्ती घोटाले, पलायन और बेरोजगारी जैसे मुद्दों ने युवाओं के भीतर व्यवस्था के प्रति नाराजगी पैदा की है। पहाड़ के गांवों में यह भावना भी बढ़ रही है कि राष्ट्रीय दल चुनाव के समय तो पहाड़ की बात करते हैं, लेकिन बाद में प्राथमिकता मैदानी राजनीति को मिलती है।यही कारण है कि हमारा उत्तराखंड कैसा हो? का सवाल अब राजनीतिक बहस का हिस्सा बन रहा है। सोशल मीडिया पर भी मूल निवास,सख्त भू-कानून और पहाड़ी अधिकार जैसे मुद्दे तेजी से ट्रेंड कर रहे हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि 2027 का चुनाव सिर्फ सत्ता परिवर्तन का नहीं होगा, बल्कि यह तय करेगा कि उत्तराखंड की राजनीति राष्ट्रीय मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमेगी या फिर राज्य अपनी क्षेत्रीय अस्मिता को नए सिरे से राजनीतिक ताकत बनाएगा। यदि क्षेत्रीय भावनाएं मजबूत हुईं तो राष्ट्रीय दलों को भी स्थानीय मुद्दों पर ज्यादा स्पष्ट रुख अपनाना पड़ सकता है। वहीं अगर राष्ट्रवाद और विकास का नैरेटिव हावी रहा तो भाजपा को लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटने का फायदा मिल सकता है।

वादों की ‘डिलीवरी’ पर जनता का ‘पहरा’

उत्तराखंड में विस चुनाव 2027 के संभावित मुद्दे -भाग-16 2027 में सड़क, पुल और अस्पतालों पर घिरेगी सियासत, इंफ्रास्ट्रक्चर बनेगा सबसे बड़ा मुद्दा ---पहाड़ में सड़क, अस्पताल और विकास की सुस्त रफ्तार से बढ़ी बेचौनी ---सत्ता पक्ष के लिए साख तो विपक्ष के लिए घेराबंदी का बन सकता है हथियार ---आगामी चुनाव इंफ्रास्ट्रक्चर के मुद्दे पर आमने-सामने होंगे राजनीतिक दल देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, वैसे-वैसे यह साफ होता जा रहा है कि इस बार चुनावी रण में सबसे बड़ा मुद्दा इंफ्रास्ट्रक्चर यानी बुनियादी ढांचे का रहने वाला है। सड़क, पुल, अस्पताल, पेयजल, शहरी ट्रैफिक और ग्रामीण कनेक्टिविटी को लेकर जनता के भीतर बढ़ती बेचौनी अब राजनीतिक सवाल में बदलती दिख रही है। राज्य बनने के इतने साल बाद भी पहाड़ के कई गांव आज सड़क, स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं से जूझ रहे हैं। सरकारें विकास के बड़े-बड़े दावे करती रही हैं, लेकिन चुनावी मौसम आते ही जनता अब घोषणाओं से ज्यादा जमीन पर दिखने वाले काम का हिसाब मांगने लगी है। देहरादून, हल्द्वानी, ऋषिकेश और हरिद्वार जैसे शहरों में ट्रैफिक जाम अब रोजमर्रा की समस्या बन चुका है। राजधानी में प्रस्तावित रिस्पना-बिंदाल एलिवेटेड कारिडोर को सरकार अपनी बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश कर रही है, वहीं विपक्ष इसे पर्यावरण और विस्थापन का मुद्दा बना रहा है। हालिया बजट में इस परियोजना समेत कई सड़क और शहरी विकास योजनाओं पर बड़ा फोकस दिखाई दिया। दूसरी तरफ पहाड़ के दूरस्थ इलाकों में तस्वीर बिल्कुल अलग है। बारिश के दौरान टूटती सड़कें, भूस्खलन से कटते गांव और महीनों तक बाधित रहने वाली आवाजाही लोगों के भीतर गुस्सा पैदा कर रही है। चारधाम यात्रा मार्गों पर करोड़ों रुपये खर्च हुए, लेकिन गांवों की संपर्क सड़कें अब भी बदहाल हैं। यही विरोधाभास चुनावी भाषणों का बड़ा हिस्सा बनने वाला है। स्वास्थ्य इंफ्रास्ट्रक्चर भी इस बार बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकता है। पहाड़ में डाक्टरों की कमी, रेफर सिस्टम और बंद पड़े अस्पतालों को लेकर लोगों में नाराजगी है। हालांकि सरकार मेडिकल कालेज, जिला अस्पताल और स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार को अपनी उपलब्धि बता रही है। विशेषज्ञ मानते हैं कि उत्तराखंड में इंफ्रास्ट्रक्चर केवल विकास का नहीं, बल्कि पलायन और अस्तित्व का सवाल भी बन चुका है। गांवों में सड़क, अस्पताल और रोजगार न होने से लगातार लोग शहरों की ओर जा रहे हैं। ऐसे में विपक्ष खाली होते गांव और कागजी विकास को बड़ा मुद्दा बना सकता है। राजनीतिक दलों ने भी इसकी आहट समझनी शुरू कर दी है। भाजपा जहां डबल इंजन विकास और बड़े बजट का हवाला दे रही है, वहीं कांग्रेस सरकार से सवाल पूछ रही है कि आखिर करोड़ों के बजट के बावजूद आम आदमी की जिंदगी में कितना बदलाव आया।

‘देवी’ की सुरक्षा पर दल ‘मौन’

उत्तराखंड में विस चुनाव 2027 के संभावित मुद्दे -भाग-17 अंकिता भंडारी केस से लेकर 33 प्रतिशत आरक्षण तक बनेगा चुनावी मुद्दा ---महिलाओं के लिए सुरक्षा और सम्मान बड़ा सवाल ---नारी शक्ति को साधने में जुट गए हैं राजनीतिक दल ---साइबर अपराध व छेड़छाड़ के मामलों पर बढ़ी चिंता ---महिला भागीदारी और सुरक्षा बड़ा राजनीतिक फैक्टर देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की राजनीतिक बिसात धीरे-धीरे सजने लगी है। राज्य में नारी शक्ति को लेकर राजनीतिक दलों की सक्रियता भी बढ़ रही है। भाजपा और कांग्रेस दोनों महिला वोट बैंक को साधने की तैयारी में जुट गई हैं। हाल की रिपोर्टों में यह सामने आया है कि 2027 चुनाव में महिला भागीदारी और सुरक्षा बड़ा राजनीतिक फैक्टर बन सकता है। पहाड़ों की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बीच राज्य आंदोलन से लेकर अर्थव्यवस्था को संभालने तक में महिलाओं की भूमिका अग्रणी रही है। हाल ही में उत्तराखंड विधानसभा के विशेष सत्र में नारी शक्ति वंदन अधिनियम और 33 प्रतिशत महिला आरक्षण को लेकर हुई तीखी बहस ने यह साफ कर दिया है कि इस बार कोई भी दल आधी आबादी को हल्के में लेने का जोखिम नहीं उठा सकता। महिला सुरक्षा का सवाल सिर्फ अपराध तक सीमित नहीं है। पहाड़ की महिलाओं के सामने आज भी सुनसान सड़कें, कमजोर परिवहन व्यवस्था, रात में पुलिस गश्त की कमी और साइबर ठगी जैसी नई चुनौतियां मौजूद हैं। पर्वतीय जिलों में कई गांव ऐसे हैं जहां शाम ढलते ही महिलाओं की आवाजाही लगभग बंद हो जाती है। कालेज जाने वाली छात्राओं और नौकरीपेशा महिलाओं के बीच भी सुरक्षा को लेकर चिंता लगातार बढ़ रही है। उत्तराखंड पुलिस के आंकड़ों और विभिन्न रिपोर्टों में यह संकेत मिला है कि राज्य में अपहरण और अन्य अपराधों में बढ़ोतरी दर्ज हुई है, जबकि कुछ गंभीर अपराधों में कमी भी बताई गई है। लेकिन विपक्ष का आरोप है कि अपराध कम नहीं हुए, बल्कि कई मामलों में शिकायतें दर्ज ही नहीं हो पातीं। राजनीतिक दल भी अब महिला सुरक्षा को लेकर अपने-अपने एजेंडे तैयार कर रहे हैं। भाजपा महिला हेल्पलाइन, महिला डेस्क और सुरक्षा अभियानों को अपनी उपलब्धि बताने में जुटी है, जबकि कांग्रेस महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी और सुरक्षा कानूनों के बेहतर क्रियान्वयन को बड़ा मुद्दा बना रही है। विपक्षी दल विशेषकर कांग्रेस कानून-व्यवस्था और महिला सुरक्षा के मोर्चे पर सरकार को लगातार घेर रहे हैं। अंकिता भंडारी हत्याकांड की गूंज आज भी उत्तराखंड के पहाड़ों और मैदानों में शांत नहीं हुई है। विपक्ष का आरोप है कि राज्य में महिलाओं के खिलाफ अपराधों के ग्राफ में बढ़ोतरी हुई है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि सरकार केवल नारी वंदन जैसे नारों के पीछे अपनी कमियों को छिपा रही है। विपक्ष का सीधे तौर पर सवाल है कि पर्यटन और होमस्टे नीति के तहत दूरदराज के क्षेत्रों में काम करने वाली बेटियों की सुरक्षा के लिए धरातल पर क्या ठोस कदम उठाए गए हैं? दूसरी ओर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और सत्तारूढ़ भाजपा इस मुद्दे पर रक्षात्मक होने के बजाय आक्रामक रुख अपनाए हुए हैं। सरकार का दावा है कि उन्होंने महिला सुरक्षा और सशक्तिकरण के लिए ऐतिहासिक कदम उठाए हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि उत्तराखंड में महिला मतदाता अब केवल भावनात्मक नारों से प्रभावित नहीं होगी। रोजगार, सुरक्षा, शिक्षा और सम्मान जैसे मुद्दों पर ठोस जवाब मांगने वाली महिला वोटर 2027 में चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकती है। खासकर पहाड़ की महिलाएं, जो जल, जंगल और जमीन से लेकर परिवार की पूरी जिम्मेदारी उठाती हैं, अब राजनीतिक भागीदारी और सुरक्षित माहौल दोनों चाहती हैं। सोशल मीडिया के दौर में महिला सुरक्षा का मुद्दा और संवेदनशील हो गया है। साइबर स्टाकिंग, फर्जी प्रोफाइल और आनलाइन ब्लैकमेलिंग जैसे मामलों ने युवतियों और छात्राओं की चिंता बढ़ाई है। जैसे-जैसे 2027 का चुनावी दंगल करीब आएगा, अंकिता भंडारी मामले का राजनीतिक असर, महिला आरक्षण बिल को लागू करने की समयसीमा और स्थानीय स्तर पर सुरक्षा के इंतजाम ही यह तय करेंगे कि देवभूमि की मातृशक्ति किस दल के सिर पर जीत का सेहरा बांधती है। फिलहाल, महिला सुरक्षा का यह मुद्दा केवल एक सामाजिक चिंता नहीं, बल्कि सत्ता की चाबी का मुख्य केंद्र बन चुका है।

पहाड़ की ‘खामोशी’ में सुलग रहा ‘असंतोष’

उत्तराखंड में विस चुनाव 2027 के संभावित मुद्दे -भाग-18 उत्तराखंड में बढ़ता असंतोष, 2027 में बदल सकता है सियासत का चेहरा ---रोजगार की आस में भटकता पहाड़ का युवा, खाली होता पहाड़ ---महंगाई की मार और बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं पर फूटेगा गुस्सा ---उत्तराखंड में पहाड़ से मैदान तक सुलग रहे हैं बुनियादी सवाल देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 भले अभी दूर हो, लेकिन प्रदेश की राजनीति में चुनावी पारा धीरे-धीरे बढ़ने लगा है। इस बार चुनावी मैदान में सबसे बड़ा मुद्दा आमजन का बढ़ता असंतोष बन सकता है। पहाड़ से लेकर मैदान तक जनता के बीच बेरोजगारी, पलायन, महंगाई, स्वास्थ्य सुविधाओं की बदहाली और विकास के असमान वितरण को लेकर नाराजगी खुलकर सामने आने लगी है। राज्य गठन के 25 वर्ष बाद भी पहाड़ के हजारों गांव आज बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। गांवों से लगातार हो रहा पलायन उत्तराखंड की सबसे बड़ी विडंबना बन चुका है, जिन खेतों में कभी फसलें लहलहाती थीं, वहां अब झाड़ियां उग रही हैं। स्कूलों में बच्चों की संख्या घट रही है और कई गांवों में ताले लगे मकान राज्य की हकीकत बयां कर रहे हैं। युवाओं के भीतर सबसे ज्यादा गुस्सा रोजगार और भर्ती प्रक्रियाओं को लेकर दिखाई दे रहा है। पिछले वर्षों में सामने आए भर्ती घोटालों ने सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं में यह भावना गहराती जा रही है कि मेहनत से ज्यादा सिस्टम की पहुंच मायने रखती है। यही कारण है कि सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक युवाओं का असंतोष लगातार दिखाई दे रहा है। महंगाई भी आम आदमी की कमर तोड़ रही है। रसोई गैस, बिजली, पेट्रोल और रोजमर्रा की जरूरतों की बढ़ती कीमतों ने मध्यमवर्ग और गरीब परिवारों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। दूसरी ओर स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति पहाड़ में आज भी चिंता का विषय बनी हुई है। कई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र डाक्टरों और संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं। गंभीर मरीजों को आज भी इलाज के लिए देहरादून, हल्द्वानी या बड़े शहरों का रुख करना पड़ता है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस बार जनता केवल घोषणाओं और नारों से प्रभावित नहीं होगी। लोग जमीन पर बदलाव देखना चाहते हैं। सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे मुद्दे चुनावी विमर्श के केंद्र में रहेंगे। विपक्ष भी सरकार को इन्हीं मुद्दों पर घेरने की तैयारी में जुटा है। हालांकि सत्ताधारी दल विकास कार्यों, सड़क परियोजनाओं, चारधाम यात्रा, पर्यटन और निवेश को अपनी उपलब्धि के रूप में जनता के सामने रख रहा है। लेकिन गांवों और कस्बों में बढ़ती नाराजगी यह संकेत दे रही है कि जनता अब विकास के दावों और जमीनी हकीकत के बीच तुलना करने लगी है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल का दावा है कि जनता इस बार भाजपा की नीतियों से पूरी तरह ऊब चुकी है और विकल्प की तलाश में है। वहीं, भाजपा संगठन इस बात से बेफिक्र है और उसका मानना है कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में किए गए कड़े फैसले और बुनियादी ढांचे का विकास उन्हें सत्ता विरोधी लहर से बचा ले जाएंगे। जनता में एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है जिसका मानना है कि सूबे में नौकरशाही आम लोगों और जनप्रतिनिधियों पर हावी है। छोटे-छोटे कामों के लिए जनता को दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते हैं। भ्रष्टाचार का मुद्दा भले ही सतह पर न दिखे, लेकिन प्रशासनिक सुस्ती से लोग खफा हैं। 2027 का चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन की लड़ाई नहीं होगा, बल्कि यह उस आम आदमी की उम्मीदों और नाराजगी का चुनाव भी बन सकता है जो वर्षों से बेहतर उत्तराखंड का सपना देख रहा है। अगर जनता का यह असंतोष आने वाले समय में और गहराया, तो यह चुनावी नतीजों की दिशा बदलने की ताकत भी रखेगा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2027 का चुनाव केवल चेहरों या दावों पर नहीं, बल्कि सीधे तौर पर जन-सरोकारों और बुनियादी मुद्दों पर लड़ा जाएगा। बाक्स प्रदेश के युवाओं में है निराशा उत्तराखंड के पहाड़ों से सेना में जाने की एक समृ( परंपरा रही है। केंद्र सरकार की अग्निवीर योजना को लेकर यहां के युवाओं में जो असमंजस और गुस्सा था, वह अब भी पूरी तरह शांत नहीं हुआ है। इसके अलावा राज्य सेवा परीक्षाओं में पेपर लीक के पुराने जख्म और स्थायी नौकरियों की कमी ने पढ़े-लिखे युवाओं को निराश किया है। मैदान से लेकर पहाड़ तक रोजगार आज भी सबसे बड़ा सुलगता हुआ मुद्दा है। आमजन के पहचान की लड़ाई पिछले कुछ समय से उत्तराखंड में सख्त भू-कानून और मूल निवास की मांग को लेकर जनता सड़कों पर उतरी है। पहाड़ों में बाहरी लोगों द्वारा धड़ाधड़ जमीनें खरीदने और स्थानीय लोगों के अधिकारों के सीमित होने की आशंका ने एक बड़ा जन-आंदोलन खड़ा किया है। जनता में यह धारणा बलवती हो रही है कि सरकारें उनकी जल, जंगल और जमीन की रक्षा करने में ढुलमुल रवैया अपना रही हैं।

‘धधक’ रहे जंगल, घुट रही हैं ‘सांसें’

गढ़वाल और कुमाऊं के कई क्षेत्रों के जंगलों में लगी भीषण आग पहाड़ की जलधाराओं,वन्यजीवों और पर्यावरण पर मंडराया संकट जंगलों में आग से मानव-वन्यजीव संघर्ष का खतरा और बढ़ने की संभावना देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ इन दिनों एक भयानक त्रासदी से गुजर रहे हैं। कुमाऊं से लेकर गढ़वाल तक पहाड़ियों की ढलानें हरी-भरी वनस्पतियों के बजाय दावानल की नारंगी लपटों से धधक रही हैं। रात के अंधेरे में दूर से देखने पर ऐसा लगता है मानो पूरे पहाड़ ने आग की चादर ओढ़ ली हो। दिन के समय आसमान में सूरज की रोशनी धुंध और काले धुएं के पीछे छिप गई है। यह आग सिर्फ पेड़ों को राख नहीं कर रही, बल्कि उत्तराखंड की पारिस्थितिकी, वन्यजीवों और इंसानी जिंदगियों को भी अपनी चपेट में ले रही है। यह मौसम पहाड़ में कई दुर्लभ पक्षियों और वन्यजीवों के प्रजनन का होता है। काफल, बुरांश और बांज के जंगलों में लगी इस आग ने काफल-पाको जैसे अनगिनत पक्षियों के घोंसले और उनके अंडों को जलाकर खाक कर दिया है। आग से बचने के लिए काकड़, गुलदार और जंगली सूअर आबादी वाले क्षेत्रों की तरफ भाग रहे हैं, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष का खतरा और बढ़ गया है। उत्तराखंड के जंगलों में गर्मियां आते ही आग जैसे नियति बन गई है। सूखी चीड़ की पत्तियां छोटी सी चिंगारी को भी भयावह आग में बदल देती हैं। कई बार यह आग गांवों तक पहुंच जाती है। लोगों के पशुओं के लिए चारा, जंगलों की जड़ी-बूटियां और पेयजल स्रोत तक इसकी चपेट में आ जाते हैं। पहाड़ के लोग कहते हैं कि जंगल जलते हैं तो केवल पेड़ नहीं मरते, गांव की जिंदगी भी धीरे-धीरे खत्म होने लगती है। सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि जंगलों की आग अब मौसम और पर्यावरण को भी बदल रही है, जिन पहाड़ियों पर कभी ठंडी हवाएं बहती थीं, वहां अब धुएं की गंध महसूस होती है। छोटी-छोटी गाड़-गदेरे और प्राकृतिक जलस्रोत सूखने लगे हैं।