शनिवार, 3 अक्टूबर 2026

udaydinmaan: असली ‘सिस्टम’ के फर्जी ‘कागज’

udaydinmaan: असली ‘सिस्टम’ के फर्जी ‘कागज’: नौकरी से मेडिकल दाखिले तक सवालों में है सत्यापन व्यवस्था उत्तराखंड में शिक्षक भर्ती से एमबीबीएस तक दस्तावेजों का खेल 19 एमबीबीएस सीटें रद्दक...

असली ‘सिस्टम’ के फर्जी ‘कागज’

नौकरी से मेडिकल दाखिले तक सवालों में है सत्यापन व्यवस्था उत्तराखंड में शिक्षक भर्ती से एमबीबीएस तक दस्तावेजों का खेल 19 एमबीबीएस सीटें रद्दकृ, सवाल सिर्फ फर्जीवाड़ा करने वालों पर देहरादून। उत्तराखंड में फर्जी दस्तावेजों का मामला अब किसी एक भर्ती, किसी एक विभाग या किसी एक प्रमाणपत्र तक सीमित नहीं रह गया है। शिक्षक भर्ती से लेकर मेडिकल प्रवेश तक सामने आए मामलों ने सरकारी दस्तावेज सत्यापन व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे पहले शिक्षा विभाग का आंकड़ा देखिए। वर्ष 2024 में नियुक्त किए गए 2316 बेसिक शिक्षकों के दस्तावेजों की जांच के आदेश इसलिए हुए क्योंकि बड़ी संख्या में प्रमाणपत्रों को लेकर सवाल उठे थे। इनमें स्थायी निवास प्रमाणपत्र से जुड़ी गड़बड़ियों के मामले भी सामने आए। यानी सवाल किसी एक संदिग्ध प्रमाणपत्र का नहीं था। सवाल यह था कि नियुक्ति प्रक्रिया पूरी होने और अभ्यर्थियों के शिक्षक बन जाने के बाद दस्तावेजों की व्यापक जांच की जरूरत क्यों पड़ी?इसके बाद मामला और आगे बढ़ा। उत्तर प्रदेश से डीएलएड कर उत्तराखंड में प्राथमिक शिक्षक बने 152 शिक्षकों के प्रमाणपत्रों की जांच शुरू हुई। यह शिक्षक 11 जिलों से जुड़े बताए गए। यहां सबसे बड़ा सवाल हैकृयदि दस्तावेजों में पात्रता से जुड़ी शर्तें पूरी नहीं हो रही थीं तो नियुक्ति से पहले उनका सत्यापन किस स्तर पर हुआ? फर्जी दस्तावेजों की सबसे चौंकाने वाली तस्वीर नीट-यूजी काउंसलिंग में सामने आई। सितंबर के आखिर तक उत्तराखंड में फर्जी प्रमाणपत्रों के आधार पर 19 एमबीबीएस सीटें रद्द की जा चुकी थीं। अलग-अलग मामलों में एससी, ओबीसी और स्वतंत्रता सेनानी आश्रित श्रेणी से जुड़े प्रमाणपत्रों पर सवाल उठे। यह मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि यहां फर्जी दस्तावेज का असर सीधे मेडिकल सीटों के आवंटन पर पड़ा, जिस सीट पर किसी पात्र अभ्यर्थी का अधिकार हो सकता था, वहां दस्तावेजों की सत्यता पर सवाल खड़ा हुआ। जांच में तो एक ऐसा मामला भी सामने आया, जिसमें एक ही पीपीओ नंबर का इस्तेमाल चार अभ्यर्थियों के लिए किए जाने की बात सामने आई। अब सवाल सिर्फ यह नहीं कि प्रमाणपत्र किसने बनाया। सवाल यह भी है कि एक ही रिकार्ड चार अलग-अलग दावेदारों के दस्तावेजों में कैसे पहुंच गया? मामला यहीं नहीं रुका। दो अक्टूबर को सामने आई रिपोर्ट में एक ही प्रमाणपत्र संख्या के दो अलग-अलग नामों से जुड़े होने का मामला सामने आया। यानी डिजिटल रिकार्ड, प्रमाणपत्र संख्या और विभागीय सत्यापन की पूरी व्यवस्था के सामने एक बुनियादी सवाल खड़ा हो गयाकृक्या अलग-अलग विभागों के पास मौजूद रिकार्ड आपस में वास्तविक समय में जुड़े हुए हैं? उत्तराखंड सरकार की अपनी आनलाइन व्यवस्था में प्रमाणपत्र सत्यापन की सुविधा उपलब्ध है। चिकित्सा शिक्षा विभाग के नियम भी स्पष्ट करते हैं कि गलत सूचना या दस्तावेज सामने आने पर प्रवेश निरस्त किया जा सकता है और कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। इसके बावजूद यदि किसी अभ्यर्थी का फर्जी या संदिग्ध प्रमाणपत्र दाखिले अथवा नियुक्ति के स्तर तक पहुंच जाता है तो समस्या केवल अभ्यर्थी की नहीं रह जाती। यह सत्यापन तंत्र की कार्यप्रणाली का प्रश्न बन जाती है। मेडिकल प्रवेश फर्जीवाड़े की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि स्वतंत्रता सेनानी आश्रित प्रमाणपत्र प्रकरण की जांच के लिए एसआईटी गठित करनी पड़ी। जांच आगे बढ़ी तो राजस्व विभाग के लेखपालों की भूमिका को लेकर भी सवाल सामने आए और पुराने मामलों की शिकायतें भी जांच के दायरे में आने लगीं। इसका अर्थ यह नहीं कि प्रत्येक अधिकारी या कर्मचारी इस मामले में दोषी है। लेकिन यह जरूर पूछना होगा कि प्रमाणपत्र जारी करने, सत्यापित करने और उसके आधार पर लाभ देने की पूरी श्रृंखला में जिम्मेदारी किसकी है? आंकड़े अपने आप में यह साबित नहीं करते कि उत्तराखंड देश में फर्जी दस्तावेजों के मामलों में नंबर एक है। ऐसा दावा करने के लिए सभी राज्यों के समान आधार पर राष्ट्रीय आंकड़े जरूरी हैं। लेकिन यह आंकड़े एक बात जरूर साबित करते हैंकृराज्य में दस्तावेज सत्यापन की व्यवस्था पर गंभीर और सार्वजनिक जवाबदेही का सवाल खड़ा हो चुका है। अब सरकार से पांच सीधे सवाल है। नियुक्ति और दाखिले से पहले दस्तावेजों का पूर्ण डिजिटल सत्यापन क्यों नहीं? जिन प्रमाणपत्रों पर बाद में सवाल उठे, वह पहले चरण में सत्यापन से कैसे निकल गए? फर्जी प्रमाणपत्र जारी करने वाले स्रोत तक पहुंचने की कार्रवाई कितनी दूर पहुंची? जिन मामलों में लाभ मिल चुका था, वहां सरकारी तंत्र की जवाबदेही किस स्तर पर तय हुई? क्या सरकार सभी भर्ती और प्रवेश प्रक्रियाओं में प्रमाणपत्रों का एकीकृत डिजिटल सत्यापन लागू करेगी? सबसे बड़ा सवाल यही हैकृफर्जी कागज बनाने वाला पकड़ा जाएगा, लेकिन वह कागज सरकारी व्यवस्था के भीतर पहुंचा कैसे? यही वह सवाल है जिसका जवाब केवल गिरफ्तारी, मुकदमे या सीट रद्द करने से नहीं मिलेगा। जवाब तब मिलेगा जब सरकार बताएगी कि फर्जी दस्तावेज की पहली एंट्री रोकने के लिए व्यवस्था में क्या बदला गया। क्योंकि अगर हर बार फर्जी दस्तावेज पकड़े जाने के बाद जांच शुरू होगी, तो व्यवस्था फर्जीवाड़ा रोक नहीं रही होगीकृसिर्फ उसका पता लगा रही होगी।

भाजपा: बूथ से सत्ता की हैट्रिक तक

नए चुनावी प्रभारी-सह प्रभारियों ने संभाली कमान, संगठन की ताकत पर है भरोसा बूथ मजबूत करने से लेकर सरकार का रिपोर्ट कार्ड जनता तक पहुंचाने की रणनीति भाजपा का घोषित फोकस मेरा बूथ, सबसे मजबूत और बूथ जीता, चुनाव जीता के सूत्र पर देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 का काउंटडाउन शुरू हो चुका है। भाजपा ने चुनावी तैयारी को अब बैठकों और बयानों से आगे ले जाकर संगठन के सबसे निचले स्तर यानी बूथ तक केंद्रित करना शुरू कर दिया है। दो अक्टूबर को प्रदेश भाजपा मुख्यालय में हुई सांगठनिक बैठक ने पार्टी की चुनावी दिशा काफी हद तक साफ कर दी। नए प्रदेश प्रभारी राम माधव, सह प्रभारी बांसुरी स्वराज और अरविंद मेनन की मौजूदगी में प्रदेश पदाधिकारियों, जिलाध्यक्षों और मंत्रियों के साथ संगठन की स्थिति और चुनावी तैयारियों पर मंथन हुआ। भाजपा का घोषित फोकस मेरा बूथ, सबसे मजबूत और बूथ जीता, चुनाव जीता के सूत्र पर है। पार्टी महामंत्री संगठन फणींद्रनाथ शर्मा ने बूथों को चुनावी रणनीति का केंद्र बनाने पर जोर दिया। प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने भी सरकार और संगठन के काम को बूथ स्तर तक पहुंचाने तथा जनता के बीच पार्टी की मौजूदगी बढ़ाने की बात कही। बैठक में भाजपा के चुनावी लक्ष्य को भी आक्रामक तरीके से सामने रखा गया। राम माधव ने कार्यकर्ताओं से सामान्य बहुमत तक सीमित रहने के बजाय 60 से अधिक सीटों के लक्ष्य के साथ काम करने को कहा। उत्तराखंड विधानसभा में कुल 70 सीटें हैं। यह लक्ष्य अपने आप में भाजपा की चुनावी महत्वाकांक्षा को दर्शाता है। पार्टी लगातार तीसरी बार सरकार बनाने की तैयारी कर रही है और संगठन को यह संदेश दिया जा रहा है कि चुनाव को सामान्य चुनाव की तरह नहीं, बल्कि नए सिरे से लड़ी जाने वाली लड़ाई के रूप में लिया जाए। भाजपा की रणनीति का दूसरा बड़ा हिस्सा सरकार के कामकाज को जनता तक ले जाना है। पार्टी नेतृत्व विधायकों और कार्यकर्ताओं से अपने-अपने क्षेत्रों में सक्रिय रहने तथा सरकार की उपलब्धियों के साथ स्थानीय समस्याओं पर भी जनता से संवाद करने को कह चुका है। अगस्त में हुई तैयारियों में रोजगार, विकास, पलायन और स्थानीय सुविधाओं जैसे मुद्दों पर संवाद बढ़ाने पर जोर दिया गया था। अब चुनौती यह है कि सरकारी योजनाओं का प्रचार केवल पार्टी कार्यकर्ताओं की बैठकों तक सीमित न रहे, बल्कि मतदाताओं तक पहुंचे। इसके लिए भाजपा ने बूथ, शक्ति केंद्र और घर-घर संपर्क की रणनीति पर जोर दिया है। अगस्त-सितंबर के संगठनात्मक कैलेंडर में बूथ सशक्तीकरण और हर घर तक संपर्क को प्रमुखता दी गई थी। राम माधव, बांसुरी स्वराज और अरविंद मेनन की नई टीम की तैनाती को भी 2027 की तैयारी के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। तीनों नेताओं के पहले संगठनात्मक प्रवास में जिलों, विधानसभा क्षेत्रों और बूथ स्तर तक संगठन की वास्तविक स्थिति समझने पर जोर रहा। सवाल यह है कि प्रदेश संगठन की रिपोर्ट और जमीन पर कार्यकर्ताओं की स्थिति में कितना अंतर है। यही वजह है कि आने वाले महीनों में भाजपा के लिए केवल बड़े कार्यक्रम महत्वपूर्ण नहीं होंगे। बूथ समितियों की सक्रियता, स्थानीय कार्यकर्ताओं की नाराजगी, विधायकों की क्षेत्रीय पकड़, जनता की शिकायतें और संगठन के भीतर समन्वय जैसे मुद्दे भी चुनावी तैयारी की कसौटी बनेंगे। भाजपा की नई चुनावी रणनीति में युवा मतदाताओं पर विशेष ध्यान दिखाई दे रहा है। बांसुरी स्वराज ने संगठनात्मक बैठक में जेन-जी और युवाओं से जुड़ी चुनौतियों का उल्लेख करते हुए पार्टी कार्यक्रमों को युवाओं की भाषा और शैली के अनुरूप बनाने की जरूरत बताई। यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि 2027 का चुनाव ऐसे समय में होगा जब रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाएं, शिक्षा, पलायन और युवाओं के अवसर जैसे मुद्दे राजनीतिक विमर्श में प्रमुख रहेंगे। भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती अब यही है कि संगठन की चुनावी मशीनरी को जमीन की वास्तविक परिस्थितियों से जोड़ा जाए। पार्टी के पास सरकार, संगठन और बूथ नेटवर्क का मजबूत ढांचा है, लेकिन चुनाव में अंतिम कसौटी मतदाताओं के बीच प्रदर्शन और स्वीकार्यता होती है। इसलिए 2027 की तैयारी में भाजपा का असली मंथन केवल यह नहीं है कि कितनी बैठकें होंगी और कितने कार्यक्रम चलेंगे। असली सवाल यह है कि 70 विधानसभा क्षेत्रों में संगठन जनता के बीच क्या संदेश लेकर जाएगा और स्थानीय स्तर पर उठ रहे सवालों का जवाब कैसे देगा। फिलहाल भाजपा ने अपनी दिशा स्पष्ट कर दी हैकृबूथ मजबूत करो, कार्यकर्ता सक्रिय करो, सरकार का रिपोर्ट कार्ड जनता तक ले जाओ और चुनाव को बड़े लक्ष्य के साथ लड़ो। अब आने वाले महीनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि कागज पर तैयार यह चुनावी रणनीति जमीन पर कितनी प्रभावी ढंग से उतरती है।

भाजपा का लक्ष्य, कांग्रेस की चुनौती और अन्य दलों का गणित

70 सीटों वाले उत्तराखंड में अब मुकाबला महज सरकार बनाने के बहुमत का नहीं रहा भाजपा ने 60 प्लस का लक्ष्य रखा, कांग्रेस भी अधिकतम सीटों की लड़ाई की तैयारी में क्षेत्रीय और अन्य दल वोटों के बिखराव से बदल सकते हैं कई सीटों के समीकरण देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 का चुनावी गणित अब एब्सोल्यूट मेजोरिटी यानी सरकार बनाने के लिए जरूरी 36 सीटों से आगे निकल चुका है। भाजपा ने सार्वजनिक रूप से 60 से अधिक सीटों का लक्ष्य रखा है। भाजपा की बैठक में भाजपा के प्रदेश प्रभारी राम माधव ने कार्यकर्ताओं से साधारण बहुमत के बजाय पार्टी की हाईएस्ट मेजोरिटी 60 प्लस के लक्ष्य के साथ काम करने को कहा। यही वह बिंदु है जहां 2027 का चुनाव केवल सत्ता और विपक्ष के बीच मुकाबला नहीं रह जाता। 70 सदस्यीय विधानसभा में 60 का आंकड़ा हासिल करना मतलब विपक्ष के लिए बेहद सीमित राजनीतिक स्पेस छोड़ना। लिहाजा भाजपा के इस लक्ष्य का राजनीतिक जवाब कांग्रेस की रणनीति में भी दिखाई दे रहा हैकृपार्टी केवल सत्ता परिवर्तन के लिए नहीं, बल्कि अधिकतम सीटों पर मजबूत दावेदारी बनाने की तैयारी कर रही है। कांग्रेस ने टिकट चयन में जीतने की क्षमता को प्राथमिकता देने की रणनीति सार्वजनिक की है। भाजपा के लिए 2027 इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वह लगातार तीसरी बार सरकार बनाने की कोशिश में है। पार्टी ने संगठन को बूथ स्तर तक सक्रिय करने, सरकार के कामकाज का रिपोर्ट कार्ड जनता तक ले जाने और चुनावी तैयारी को राजनीतिक लामबंदी में बदलने पर जोर दिया है। 60 पार का लक्ष्य केवल संख्या नहीं है। यह संगठन के भीतर कार्यकर्ताओं को एक बड़ा चुनावी लक्ष्य देने की रणनीति भी है। भाजपा का संदेश साफ है कि मुकाबला कुछ सीटों पर बढ़त लेने का नहीं, बल्कि प्रदेश के लगभग हर हिस्से में व्यापक जीत की कोशिश का है। लेकिन यही लक्ष्य भाजपा के सामने चुनौती भी खड़ी करता है। 60 सीटें जीतने के लिए 70 में से केवल 10 सीटें विपक्ष के लिए बचती हैं। इसका अर्थ है कि भाजपा को पहाड़, मैदान, कुमाऊं और गढ़वालकृहर क्षेत्र में बहुत व्यापक जीत दर्ज करनी होगी। कांग्रेस के लिए तस्वीर दूसरी है। विधानसभा में उसके पास वर्तमान में 20 सीटें हैं, जबकि भाजपा के पास 47 सीटें हैं। पार्टी की रणनीति में वरिष्ठ नेताओं को चुनावी जिम्मेदारियां देने के साथ-साथ संभावित उम्मीदवारों की जीतने की क्षमता को महत्व देने की बात सामने आई है। इसका संकेत है कि कांग्रेस इस बार टिकट वितरण को केवल वरिष्ठता या पारंपरिक दावेदारी के आधार पर नहीं छोड़ना चाहती। कांग्रेस के सामने गणित कठिन है, लेकिन राजनीति केवल संख्या से नहीं चलती। 2022 में भी कई सीटों पर मुकाबले करीबी रहे थे। उपलब्ध चुनावी विश्लेषण के अनुसार 23 सीटों पर जीत का अंतर पांच हजार मतों से कम था। यही करीबी सीटें 2027 में दोनों प्रमुख दलों की रणनीति का केंद्र बन सकती हैं। यहीं से उत्तराखंड के छोटे दलों और क्षेत्रीय राजनीतिक ताकतों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। उत्तराखंड क्रांति दल समेत अन्य दल यदि अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों में प्रभावी उम्मीदवार उतारते हैं तो उनका वास्तविक प्रभाव सीट जीतने से ज्यादा वोटों के बंटवारे में दिखाई दे सकता है। किसी सीट पर भाजपा और कांग्रेस के बीच अंतर कुछ हजार मतों का हो और तीसरे उम्मीदवार को उससे अधिक मत मिल जाएं, तो पूरा चुनावी गणित बदल सकता है। इसलिए बड़े दलों के लिए छोटे दलों की चुनौती को केवल सीटों की संख्या से मापना पर्याप्त नहीं होगा। 2027 में दलबदल भी इसी गणित का हिस्सा है। अगस्त 2026 की एक राजनीतिक रिपोर्ट में करीब 20 सीटों के समीकरणों पर दलबदल के असर का उल्लेख किया गया था। हालांकि किसी नेता के पार्टी बदलने से पूरा वोट बैंक स्थानांतरित हो जाए, इसकी कोई गारंटी नहीं है। भाजपा के सामने अब चुनौती अपने 60 पार के लक्ष्य को सीट-दर-सीट वास्तविक चुनावी गणित में बदलने की है। कांग्रेस के सामने चुनौती भाजपा के इस लक्ष्य को रोकते हुए अपने सीट आधार को तेजी से बढ़ाने की है। वहीं छोटे दलों के सामने अपना राजनीतिक आधार बढ़ाने का अवसर है। इस पूरी तस्वीर में सबसे महत्वपूर्ण विधानसभा क्षेत्र वह होंगे जहां पिछली बार मुकाबला करीबी रहा था। वहां कुछ हजार मतों का उतार-चढ़ाव भी बड़े दलों की सीट संख्या को प्रभावित कर सकता है। इसलिए 2027 की लड़ाई में बड़ा लक्ष्य और स्थानीय चुनावी गणित, दोनों साथ-साथ चलेंगे। भाजपा ने 60 पार का लक्ष्य सामने रख दिया है। कांग्रेस के लिए चुनौती अब केवल भाजपा को सत्ता से हटाने की नहीं, बल्कि अधिकतम सीटें अपने खाते में लाने की है और छोटे दलों के लिए यही मौका है कि वह उन सीटों पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराएं जहां मुख्य मुकाबला करीबी हो सकता है। उत्तराखंड की 70 सीटों का चुनाव इसलिए 36 के बहुमत की लड़ाई भर नहीं रह गया है। अब असली राजनीतिक सवाल यह है कि कौन-सा दल अपने लक्ष्य के कितने करीब पहुंचता है और तीसरे राजनीतिक स्पेस में खड़े दल कितनी सीटों के गणित को प्रभावित करते हैं। यही 2027 के चुनाव का सबसे दिलचस्प अंकगणित बनने जा रहा है।

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2026

udaydinmaan: 32 वर्षों बाद भी जीवंत है ‘अन्याय का दर्द’

udaydinmaan: 32 वर्षों बाद भी जीवंत है ‘अन्याय का दर्द’: रामपुर तिराहा कांड की 32वीं बरसी स्मृति, संघर्ष और न्याय की अधूरी आस,उत्तराखंड आंदोलन का वह काला दिन तीन दशक बीतने के बाद भी यह घटना उत्तरा...

जनता के ‘आशीर्वाद’ की तलाश में भाजपा

भाजपा ने बनाई बूथ से घर तक पहुंचने की रणनीति संगठन को चुनावी मोड में लाने की कवायद तेज की संगठनात्मक कार्यक्रमों में इसका खाका किया तैयार देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर भाजपा ने संगठन को चुनावी मोड में लाने की कवायद तेज कर दी है। पार्टी की रणनीति अब केवल सरकार की उपलब्धियां गिनाने तक सीमित नहीं दिख रही, बल्कि बूथ स्तर पर संगठन की सक्रियता, कमजोर सीटों पर पकड़ मजबूत करने और अलग-अलग सामाजिक समूहों के बीच संवाद बढ़ाने पर जोर है। हाल के संगठनात्मक कार्यक्रमों में इसका खाका सामने आया है। भाजपा के सामने 2027 में लगातार तीसरी बार सरकार बनाने का लक्ष्य है। इसके लिए पार्टी ने जमीनी संगठन को अपनी रणनीति का मुख्य आधार बनाया है। अगस्त-सितंबर के लिए जारी कार्यक्रमों में बूथ सशक्तीकरण, शक्ति केंद्रों की बैठकें, मतदाता संपर्क और वरिष्ठ कार्यकर्ताओं से संवाद को प्राथमिकता दी गई। पार्टी की कोशिश हर बूथ और हर घर तक संगठन की पहुंच बढ़ाने की है। भाजपा की रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा पिछली विधानसभा में हारी 23 सीटें हैं। इन क्षेत्रों में वरिष्ठ नेताओं और संगठन के पदाधिकारियों के प्रवास, रात्रि विश्राम, बूथ संवाद तथा स्थानीय स्तर पर प्रभावशाली लोगों से संपर्क जैसे कार्यक्रम किए गए। पार्टी इन सीटों पर पिछली हार के कारणों को समझने और संगठनात्मक कमियों को दूर करने की कोशिश कर रही है। वहीं जीती हुई सीटों को सुरक्षित रखना भी रणनीति का अहम हिस्सा है। पार्टी ने मौजूदा विधायकों को अपने क्षेत्रों में सक्रिय रहने, सरकार के काम जनता तक पहुंचाने और स्थानीय समस्याओं के समाधान पर जोर देने का संदेश दिया है। प्रत्याशी चयन में क्षेत्रीय सक्रियता, संगठन के फीडबैक और सर्वे को आधार बनाए जाने की बात भी सामने आई है। 2027 की चुनावी रणनीति में युवा मतदाताओं को भी विशेष महत्व दिया जा रहा है। राष्ट्रीय नेतृत्व की बैठकों में पहली बार मतदान करने वाले और 18 से 29 वर्ष के युवाओं तक पहुंच बढ़ाने, महाविद्यालय संपर्क, डिजिटल संवाद और युवा कार्यक्रमों पर चर्चा हुई है। इसके साथ ही भाजपा ने ओबीसी समाज के बीच संपर्क अभियान को भी गति दी है। घर-घर प्रवास, समाजवार संवाद और विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधियों से संपर्क के कार्यक्रम इसके हिस्से हैं। भाजपा ने प्रदेश कार्यसमिति के स्तर पर विकास, सुशासन, सामाजिक समरसता, जनकल्याण और उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान को अपने संभावित चुनावी एजेंडे के प्रमुख बिंदुओं के रूप में रखा है। पार्टी सरकार की योजनाओं और उपलब्धियों को भी चुनावी संवाद का आधार बनाने की तैयारी में है। इस पूरी कवायद का राजनीतिक संदेश साफ हैकृ2027 का चुनाव भाजपा केवल चुनावी मौसम में शुरू होने वाला अभियान नहीं बनाना चाहती। संगठन की गतिविधियों को पहले से ही चुनावी तैयारी में बदलकर पार्टी मतदाताओं तक लगातार पहुंच बनाए रखने की कोशिश कर रही है। अब असली परीक्षा इस रणनीति के जमीन पर असर की होगी। संगठन बूथ तक कितना सक्रिय होता है, विधायक स्थानीय असंतोष को कितना दूर कर पाते हैं और सरकार की उपलब्धियों के साथ जनता की मौजूदा अपेक्षाओं का संवाद कितना प्रभावी बनता है।कृइन सवालों पर भाजपा की 2027 की चुनावी तैयारी की दिशा काफी हद तक निर्भर करेगी।

32 वर्षों बाद भी जीवंत है ‘अन्याय का दर्द’

रामपुर तिराहा कांड की 32वीं बरसी स्मृति, संघर्ष और न्याय की अधूरी आस,उत्तराखंड आंदोलन का वह काला दिन तीन दशक बीतने के बाद भी यह घटना उत्तराखंड की सामूहिक स्मृति में जीवंत आंदोलनकारियों को रोकने के दौरान हिंसा ने पूरे आंदोलन को झकझोरा था देहरादून। उत्तराखंड राज्य आंदोलन के सबसे पीड़ादायक अध्याय रामपुर तिराहा कांड को 32 वर्ष पूरे हो चुके हैं। तीन दशक से अधिक समय बीतने के बाद भी यह घटना उत्तराखंड की सामूहिक स्मृति में उतनी ही जीवंत है। आंदोलनकारियों पर हुई कार्रवाई, महिलाओं के साथ कथित दुर्व्यवहार और गोलीकांड ने जिस पीड़ा को जन्म दिया, वह आज भी राज्य की राजनीति और सामाजिक चेतना का हिस्सा है। 32 वर्ष बाद न्याय की दिशा में हुई प्रगति को उम्मीद की शुरुआत माना जा रहा है, लेकिन इसे मंजिल मान लेना अभी जल्दबाजी होगी। रामपुर तिराहा केवल एक स्थान का नाम नहीं है। यह उस दौर की याद है जब अलग उत्तराखंड राज्य की मांग को लेकर पहाड़ों से हजारों लोग दिल्ली की ओर कूच कर रहे थे। दो अक्टूबर 1994 की रात मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहा पर आंदोलनकारियों को रोकने के दौरान हुई हिंसा ने पूरे आंदोलन को झकझोर दिया। इस घटना के बाद उत्तराखंड आंदोलन ने एक निर्णायक मोड़ लिया और राज्य गठन की मांग और अधिक मुखर हुई। उत्तराखंड का गठन वर्ष 2000 में हो गया, लेकिन रामपुर तिराहा से जुड़े मामलों में न्याय की प्रक्रिया लंबी खिंचती रही। यही वजह है कि हर वर्ष दो अक्टूबर के आसपास शहीदों को याद करते हुए एक सवाल फिर सामने आता हैकृक्या जिन लोगों ने राज्य के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगाया, उन्हें पूरा न्याय मिला? समय बीतने के साथ इस घटना के प्रत्यक्षदर्शियों और आंदोलनकारियों की संख्या कम हो रही है। नई पीढ़ी के सामने चुनौती है कि वह इस इतिहास को केवल एक सरकारी कार्यक्रम या श्रद्धांजलि दिवस तक सीमित न होने दे। रामपुर तिराहा की स्मृति को राजनीतिक भाषणों से आगे ले जाकर न्याय, जवाबदेही और इतिहास की सच्चाई से जोड़ना होगा। रामपुर तिराहा के संदर्भ में न्याय का अर्थ केवल दोषियों को सजा दिलाना नहीं है। न्याय का व्यापक अर्थ यह भी है कि उस रात क्या हुआ, किन परिस्थितियों में हुआ, किसकी क्या भूमिका थी और पीड़ितों को अब तक क्या मिलाकृइन सवालों का तथ्यात्मक और निष्पक्ष जवाब समाज के सामने आए। न्यायिक प्रक्रिया अपनी गति से चलती है, लेकिन लोकतांत्रिक समाज में संस्थागत जवाबदेही का प्रश्न उससे भी बड़ा है। किसी भी आंदोलन में शामिल नागरिकों के अधिकारों की रक्षा राज्य की जिम्मेदारी होती है। यदि कहीं इन अधिकारों का उल्लंघन हुआ है तो उसकी जवाबदेही तय होना लोकतंत्र की मजबूती का संकेत है। उत्तराखंड आंदोलन के शहीदों को श्रद्धांजलि देने का सबसे सार्थक तरीका केवल पुष्पांजलि नहीं हो सकता। असली श्रद्धांजलि तब होगी जब राज्य उस आंदोलन की मूल भावना को समझेकृपारदर्शी शासन, जवाबदेही, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, गांवों की मजबूती और पहाड़ के लोगों के सम्मान की भावना। राज्य आंदोलन की एक बड़ी चिंता यह थी कि पहाड़ के लोगों की आवाज सत्ता के केंद्र तक पहुंचे। तीन दशक बाद भी पलायन, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और गांवों के भविष्य से जुड़े सवाल मौजूद हैं। इसलिए रामपुर तिराहा की स्मृति आज के उत्तराखंड से भी सवाल करती है कि जिस राज्य के लिए बलिदान दिया गया, वह राज्य अपने मूल सवालों का कितना समाधान कर पाया। 32 वर्ष बाद न्याय की प्रक्रिया में आगे बढ़ना निश्चित रूप से उम्मीद पैदा करता है। लेकिन न्याय की शुरुआत को अंतिम पड़ाव मान लेना उस संघर्ष की भावना के साथ न्याय नहीं होगा। अभी पीड़ित परिवारों की पीड़ा, लंबित कानूनी प्रक्रियाएं और इतिहास की पूरी सच्चाई समाज के सामने लाने का दायित्व बाकी है। रामपुर तिराहा को केवल कैलेंडर की एक तारीख न बनाया जाए। यह उत्तराखंड के लोकतांत्रिक इतिहास का वह अध्याय है जो हर पीढ़ी को यह याद दिलाता रहेगा कि अधिकारों की लड़ाई में नागरिकों की आवाज का सम्मान कितना जरूरी है। 32 वर्ष बाद न्याय की उम्मीद जगी है। अब जरूरत इस बात की है कि यह उम्मीद परिणाम तक पहुंचे। क्योंकि रामपुर तिराहा के शहीदों के प्रति हमारा कर्तव्य केवल उन्हें याद करना नहीं, बल्कि उनके संघर्ष से निकले सवालों का जवाब तलाशना भी है।

विपक्ष के सवालों पर भाजपा का पलटवार

भाजपा का तंज हताशा में चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठा रहा विपक्ष मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण पर आमने-सामने भाजपा-कांग्रेस भाजपा ने की त्रुटिहीन सूची के लिए प्रक्रिया में सहयोग की अपील एसआईआर पर भाजपा ने विपक्ष के आंदोलन को बताया हताशा देहरादून। उत्तराखंड में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर सियासत लगातार तेज होती जा रही है। विपक्षी दल जहां एसआईआर की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए इसे रोकने की मांग कर रहे हैं, वहीं भाजपा ने इस विरोध को राजनीतिक मुद्दा बनाकर चुनावी माहौल गरमाने की कोशिश करार दिया है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष एवं राज्यसभा सांसद महेंद्र भट्ट ने कहा है कि संवैधानिक प्रक्रिया के जरिए जनता का विश्वास हासिल करने में असफल लोग अब हताशा में चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे हैं। भाजपा का तर्क है कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण निर्वाचन प्रक्रिया का हिस्सा है और इसका उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक त्रुटिहीन बनाना है। पार्टी ने कांग्रेस से प्रक्रिया का विरोध करने के बजाय आपत्तियों के निस्तारण में सहयोग करने की अपील भी की है। अगस्त में भट्ट ने कहा था कि राजनीतिक दलों और नागरिकों को मतदाता सूची को दुरुस्त करने की प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। एसआईआर को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच टकराव ऐसे समय बढ़ रहा है, जब उत्तराखंड में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियां तेज हो रही हैं। भाजपा ने कांग्रेस पर आरोप लगाया है कि वह एसआईआर को आगामी चुनाव में अपनी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बना रही है और चुनावी हार की आशंका के बीच नए मुद्दे तलाश रही है। कांग्रेस की ओर से इसके विपरीत एसआईआर और निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। यानी मतदाता सूची का तकनीकी पुनरीक्षण अब सीधे राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया है। भाजपा इसे चुनावी व्यवस्था को अधिक व्यवस्थित करने वाली संवैधानिक प्रक्रिया के रूप में पेश कर रही है, जबकि विपक्ष पारदर्शिता और मतदाताओं के अधिकारों से जुड़े सवाल उठा रहा है। एसआईआर को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर भी विवाद चल रहा है। निर्वाचन आयोग ने 23 सितंबर को कहा था कि एसआईआर से संबंधित निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए हैं। दूसरी ओर, विपक्षी दल आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते रहे हैं और प्रक्रिया में पारदर्शिता की मांग कर रहे हैं। भाजपा ने आयोग के फैसलों का बचाव करते हुए विपक्ष पर संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता को प्रभावित करने का आरोप लगाया है। इस बीच भाजपा के कुछ सहयोगी दलों ने भी एसआईआर को लेकर निर्वाचन आयोग से अधिक स्पष्टता और पारदर्शिता की मांग की है, जिससे यह मुद्दा केवल भाजपा बनाम विपक्ष की बहस तक सीमित नहीं रह गया है। उत्तराखंड में अब एसआईआर को लेकर दो समानांतर राजनीतिक नैरेटिव दिखाई दे रहे हैं। भाजपा इसे मतदाता सूची की शुद्धता और संवैधानिक प्रक्रिया से जोड़ रही है, जबकि विपक्ष इसे मतदाता अधिकारों और चुनावी पारदर्शिता के सवाल से जोड़ रहा है। दोनों पक्षों के बीच बढ़ता टकराव आने वाले महीनों में चुनावी विमर्श का हिस्सा बन सकता है। 2027 के चुनाव से पहले एसआईआर पर छिड़ी यह बहस इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मतदाता सूची सीधे चुनाव की बुनियाद से जुड़ी है। ऐसे में राजनीतिक आरोपों से आगे बढ़कर यह सुनिश्चित करना अहम होगा कि पात्र मतदाताओं के नाम सुरक्षित रहें, आपत्तियों का नियमानुसार निस्तारण हो और पूरी प्रक्रिया के बारे में मतदाताओं को स्पष्ट जानकारी मिले। फिलहाल भाजपा ने विपक्ष के आंदोलन को संवैधानिक प्रक्रिया से जनता का विश्वास जीतने में असफल लोगों की हताशा बताया है, जबकि विपक्ष एसआईआर की प्रक्रिया पर अपने सवालों के साथ आंदोलन जारी रखने की तैयारी में है। इस तरह उत्तराखंड की चुनावी राजनीति में एसआईआर अब महज मतदाता सूची के पुनरीक्षण का प्रशासनिक विषय नहीं, बल्कि 2027 से पहले भाजपा और विपक्ष के बीच एक प्रमुख राजनीतिक मुद्दा बनता जा रहा है।

कांग्रेस का लोकतंत्र बचाओ सप्ताह

जिला स्तर पर निकलेगा वोट बचाओ-देश बचाओ मार्च मतदान के अधिकार से जुड़े सवाल अब जनता के बीच कांग्रेस ने आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों से जोड़ा देहरादून। उत्तराखंड में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर अपना आंदोलन तेज करने की तैयारी कर ली है। पार्टी ने जिला स्तर पर लोकतंत्र बचाओ सप्ताह आयोजित करने और इसके तहत वोट बचाओ-देश बचाओ मार्च निकालने का निर्णय लिया है। कांग्रेस का कहना है कि मतदाता सूची और मतदान के अधिकार से जुड़े सवालों को जनता के बीच ले जाना जरूरी है। कांग्रेस के इस अभियान को आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों से जोड़कर भी देखा जा रहा है। पार्टी संगठन को जिला और ब्लाक स्तर तक सक्रिय करने के साथ एसआईआर के मुद्दे पर कार्यकर्ताओं और आम मतदाताओं के बीच संवाद बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रही है। पार्टी का फोकस अब इस मुद्दे को केवल नेताओं की बयानबाजी तक सीमित रखने के बजाय सड़क और जनसंपर्क अभियान तक ले जाने पर है। कांग्रेस लंबे समय से एसआईआर की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाती रही है। पार्टी नेताओं का तर्क है कि मतदाता सूची में किसी भी तरह की गड़बड़ी या पात्र मतदाताओं के नाम हटने की आशंका लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए गंभीर विषय है। इसी मुद्दे को लेकर कांग्रेस कार्यकर्ता जिला मुख्यालयों पर मार्च निकालेंगे और जनता के बीच अपनी बात रखेंगे। वहीं भाजपा एसआईआर को निर्वाचन प्रक्रिया का हिस्सा बताते हुए कांग्रेस के विरोध को राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश के रूप में देख रही है। भाजपा का कहना है कि मतदाता सूची को दुरुस्त करने की संवैधानिक प्रक्रिया का विरोध करने के बजाय राजनीतिक दलों को इसमें सहयोग करना चाहिए। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव में अभी समय है, लेकिन दोनों प्रमुख दलों ने संगठनात्मक स्तर पर तैयारियां तेज कर दी हैं। भाजपा बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करने और सरकार की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने पर जोर दे रही है। कांग्रेस इसके समानांतर सरकार के खिलाफ जनमुद्दों को लेकर आंदोलन की रणनीति आगे बढ़ा रही है। ऐसे में वोट बचाओ-देश बचाओ मार्च कांग्रेस के लिए केवल एक विरोध कार्यक्रम नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं को चुनावी अभियान के लिए सक्रिय करने का माध्यम भी बन सकता है। जिला स्तर पर होने वाले कार्यक्रमों के जरिए पार्टी स्थानीय मुद्दों को एसआईआर के सवाल के साथ जोड़कर जनता तक पहुंचाने की कोशिश करेगी। कांग्रेस की रणनीति में मतदाता अधिकार को केंद्रीय मुद्दा बनाने की कोशिश दिखाई दे रही है। पार्टी नेताओं का कहना है कि लोकतंत्र में मतदाता सबसे महत्वपूर्ण है और उसके मताधिकार की सुरक्षा सुनिश्चित होना जरूरी है। कांग्रेस इसी संदेश के साथ अपने अभियान को आगे बढ़ाने की तैयारी कर रही है। हालांकि, इस मुद्दे पर कांग्रेस को जनता के बीच यह भी स्पष्ट करना होगा कि एसआईआर में उसकी आपत्तियां क्या हैं और उनके समाधान के लिए वह क्या ठोस विकल्प चाहती है। दूसरी ओर भाजपा संवैधानिक प्रक्रिया और निर्वाचन आयोग की भूमिका को आधार बनाकर कांग्रेस के आरोपों का जवाब दे रही है। इस तरह 2027 के चुनाव से पहले उत्तराखंड में मतदाता सूची का मुद्दा अब राजनीतिक संघर्ष का नया मैदान बनता दिख रहा है। कांग्रेस सड़क पर उतरकर वोट बचाओ-देश बचाओ का संदेश देगी, जबकि भाजपा एसआईआर का बचाव करते हुए विपक्ष के अभियान पर सवाल उठा रही है। आने वाले दिनों में यह टकराव जिला मुख्यालयों से लेकर गांव और बूथ स्तर तक पहुंचने की संभावना है।

गुरुवार, 1 अक्टूबर 2026

udaydinmaan: गालीबाज मासूम को फिर ‘मंच’

udaydinmaan: गालीबाज मासूम को फिर ‘मंच’: डीएवी कालेज प्रकरण में एफआईआर के बाद भी यूपीएल फाइनल में प्रस्तुति का फैसला सवालों में उत्तराखंड की सांस्कृतिक प्राथमिकता,स्थानीय कलाकारों क...

गालीबाज मासूम को फिर ‘मंच’

डीएवी कालेज प्रकरण में एफआईआर के बाद भी यूपीएल फाइनल में प्रस्तुति का फैसला सवालों में उत्तराखंड की सांस्कृतिक प्राथमिकता,स्थानीय कलाकारों को प्राथमिकता देने की मांग देहरादून। देवभूमि उत्तराखंड में मंच की मर्यादा और स्थानीय कलाकारों के सम्मान को लेकर एक बार फिर बहस छिड़ गई है। अप्रैल में देहरादून के डीएवी पीजी कॉलेज में मंच से कथित अभद्र भाषा के इस्तेमाल को लेकर विवादों में आए हरियाणवी गायक मासूम शर्मा को अब उत्तराखंड प्रीमियर लीग के ग्रैंड फिनाले में दोबारा प्रस्तुति के लिए आमंत्रित किए जाने पर सवाल उठ रहे हैं। रायपुर स्थित राजीव गांधी अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम में होने वाले समापन समारोह में मासूम शर्मा की प्रस्तुति प्रस्तावित है। मामले की संवेदनशीलता इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि डीएवी पीजी कालेज के अप्रैल के कार्यक्रम में कथित आपत्तिजनक भाषा के मामले में डालनवाला कोतवाली में उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज हुई थी। पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज कर जांच शुरू की थी और गायक को बयान दर्ज कराने के लिए नोटिस भी जारी किया था। बाद में शर्मा ने अपने व्यवहार के लिए सार्वजनिक रूप से खेद जताया था। अब सवाल यह है कि जब उसी प्रकरण की गूंज अभी पूरी तरह थमी भी नहीं थी, तो प्रदेश के इतने बड़े सार्वजनिक आयोजन के लिए उन्हीं कलाकार का चयन कैसे हुआ? कांग्रेस समेत विभिन्न संगठनों ने आयोजन समिति और सरकार से इस चयन की प्रक्रिया तथा पूर्व विवाद की समीक्षा को लेकर सवाल किए हैं। कांग्रेस के प्रदेश उपाध्यक्ष लालचंद शर्मा ने भी पूछा कि विवाद के बावजूद यूपीएल फाइनल में उन्हें मंच देने का निर्णय क्यों लिया गया और क्या कलाकारों के चयन को लेकर कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश हैं। विवाद का दूसरा पहलू उत्तराखंड के स्थानीय कलाकारों से जुड़ा है। गढ़वाल, कुमाऊं और जौनसार की समृद्ध लोकसंगीत परंपरा के साथ प्रदेश में नई पीढ़ी के अनेक गायक, वादक और संगीत समूह लगातार काम कर रहे हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि प्रदेश के बड़े सार्वजनिक मंचों पर स्थानीय प्रतिभाओं को प्राथमिकता कितनी मिल रही है। मूल निवास और भू-कानून संघर्ष समिति ने भी यही मुद्दा उठाते हुए कहा कि उसका विरोध किसी बाहरी कलाकार से नहीं, बल्कि मंच पर अश्लीलता, गाली-गलौज और आपत्तिजनक भाषा से है। समिति ने सीएयू के साथ बातचीत में भविष्य के आयोजनों में उत्तराखंड के स्थानीय कलाकारों को प्राथमिकता देने की शर्त रखी। कार्यक्रम को लेकर विरोध के बीच क्रिकेट एसोसिएशन आफ उत्तराखंड की ओर से बताया गया कि कलाकार को कार्यक्रम का आधा भुगतान पहले ही किया जा चुका है, इसलिए इस समय कार्यक्रम रद्द करना संभव नहीं है। बातचीत के बाद यह सहमति बनी कि मासूम शर्मा मंच से उत्तराखंड की जनता से सार्वजनिक रूप से माफी मांगेंगे और भविष्य में आपत्तिजनक भाषा अथवा फूहड़ प्रस्तुति नहीं करने की बात स्पष्ट करेंगे। उत्तराखंड क्रांति दल ने हालांकि कार्यक्रम रद्द कर स्थानीय कलाकारों को अवसर देने की मांग की है। दल ने कार्यक्रम रद्द नहीं होने की स्थिति में स्टेडियम के बाहर विरोध की चेतावनी भी दी है। पुलिस ने भी कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था की बात कही है। पूरे विवाद का सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या उत्तराखंड के बड़े मंचों पर कलाकारों के चयन का कोई सांस्कृतिक और सामाजिक मानदंड होना चाहिए? कलाकार किसी भी प्रदेश का हो सकता है और देशभर के कलाकारों का उत्तराखंड में स्वागत भी होना चाहिए, लेकिन स्थानीय प्रतिभाओं को लगातार हाशिये पर रखकर बाहरी कलाकारों को प्राथमिकता देने की शिकायत लंबे समय से सामने आती रही है। देवभूमि की पहचान केवल पर्यटन और क्रिकेट तक सीमित नहीं है। यहां की पहचान उसकी लोकभाषाओं, लोकधुनों, परंपराओं और उन कलाकारों से भी बनती है, जिन्होंने सीमित संसाधनों के बावजूद पहाड़ की संस्कृति को देश-दुनिया तक पहुंचाया है। इसलिए सवाल मासूम शर्मा के कार्यक्रम से आगे बढ़कर उत्तराखंड की सांस्कृतिक नीति और आयोजकों की प्राथमिकताओं का भी है। बड़े मंचों पर बाहर से आने वाले कलाकारों का स्वागत हो, लेकिन क्या उसी मंच पर पहाड़ की अपनी आवाज को भी उतनी ही जगह मिलेगीकृयह सवाल अब उत्तराखंड के कलाकारों और सांस्कृतिक जगत के बीच चर्चा का विषय बन गया है।

संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल,भाजपा-कांग्रेस आमने-सामने

भाजपा बोलीकृनकारात्मक नैरेटिव से कांग्रेस की हताशा उजागर लोकतांत्रिक संस्थाओं पर भरोसा मजबूत करने की आज जरूरत कांग्रेस के आरोपों को बताया है राजनीतिक रणनीति का हिस्सा देहरादून। उत्तराखंड में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले संवैधानिक संस्थाओं को लेकर सियासी घमासान तेज होता दिखाई दे रहा है। भाजपा ने कांग्रेस पर संवैधानिक संस्थाओं के प्रति अविश्वास का माहौल बनाने और नकारात्मक नैरेटिव को आगे बढ़ाने का आरोप लगाया है। पार्टी का कहना है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर लगातार सवाल खड़े करना राजनीतिक असहमति से आगे की बात है और इससे जनता के बीच भ्रम की स्थिति पैदा होती है। भाजपा नेताओं का तर्क है कि कांग्रेस को चुनावी मुद्दों पर जनता के बीच जाना चाहिए, लेकिन इसके बजाय वह चुनाव आयोग और अन्य संवैधानिक संस्थाओं को लेकर सवाल खड़े कर रही है। पार्टी के मुताबिक, संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने का अधिकार सभी राजनीतिक दलों को है, लेकिन आरोपों के साथ ठोस तथ्य और प्रमाण भी सामने रखे जाने चाहिए। भाजपा का यह हमला ऐसे समय में आया है, जब मतदाता सूची, विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर और चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर कांग्रेस लगातार सवाल उठा रही है। कांग्रेस इन मुद्दों को चुनावी पारदर्शिता और मताधिकार से जोड़ रही है, जबकि भाजपा कांग्रेस के आरोपों को राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बता रही है। भाजपा का कहना है कि चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं की भूमिका चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता सुनिश्चित करने की है। ऐसे में बिना ठोस आधार के लगातार अविश्वास का वातावरण बनाने से लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति जनता के भरोसे पर असर पड़ सकता है। पार्टी ने कांग्रेस से आरोपों के बजाय तथ्य सामने रखने को कहा है। हालांकि, कांग्रेस का पक्ष इससे अलग है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि चुनाव प्रक्रिया, मतदाता सूची और निर्वाचन व्यवस्था से जुड़े सवाल उठाना लोकतंत्र में विपक्ष की जिम्मेदारी है। पार्टी का तर्क है कि यदि किसी प्रक्रिया में उसे कोई आपत्ति दिखाई देती है तो उसे सार्वजनिक करना संवैधानिक अधिकार है। कांग्रेस इसे संस्थाओं के खिलाफ अभियान नहीं, बल्कि चुनावी पारदर्शिता से जुड़ा सवाल बताती रही है। यही विरोधाभास अब उत्तराखंड की राजनीति में बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है। भाजपा इसे कांग्रेस की हताशा और नकारात्मक राजनीति के रूप में पेश कर रही है, जबकि कांग्रेस इसे लोकतांत्रिक निगरानी और चुनावी पारदर्शिता का प्रश्न बता रही है। विधानसभा चुनाव की तैयारियां तेज होने के साथ आने वाले दिनों में यह टकराव और बढ़ सकता है। खासतौर पर मतदाता सूची और एसआईआर जैसे मुद्दे यदि चुनावी बहस के केंद्र में आते हैं तो दोनों दलों के बीच राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और तेज होने की संभावना है। ऐसे में असली कसौटी यही होगी कि आरोपों और राजनीतिक दावों के बीच तथ्य कितने स्पष्ट रूप से जनता के सामने रखे जाते हैं।

युवाओं में राष्ट्रवादी विचारों की मजबूती का संकेत

भाजपा ने युवाओं के रुझान को बताया बदलती राजनीतिक सोच का संकेत प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर विपक्ष के सामने बढ़ी चुनौती इसे चुनावी समर्थन का सीधा संकेत मानना राजनीतिक दलों के लिए जल्दबाजी देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में युवाओं की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है। इसी बीच युवाओं के बीच राष्ट्र, राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय मुद्दों से जुड़े विचारों की स्वीकार्यता को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। भाजपा इसे युवाओं में राष्ट्रवादी विचारों की मजबूती का संकेत मान रही है और इसे आगामी विधानसभा चुनाव के लिहाज से महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश के रूप में देख रही है। भाजपा नेताओं का कहना है कि आज का युवा केवल स्थानीय मुद्दों तक सीमित नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, देश की वैश्विक भूमिका, सेना, सीमांत क्षेत्रों और राष्ट्र निर्माण जैसे विषयों पर भी अपनी राय रखता है। पार्टी के मुताबिक युवाओं में इन विषयों को लेकर बढ़ती रुचि उसके लिए सकारात्मक संकेत है। उत्तराखंड के संदर्भ में यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि राज्य की बड़ी आबादी का सामाजिक और आर्थिक संबंध सेना तथा पूर्व सैनिक परिवारों से जुड़ा रहा है। सीमांत जिलों की भौगोलिक परिस्थितियां और सैन्य परंपरा भी राष्ट्र और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों को यहां विशेष महत्व देती हैं। भाजपा इसी सामाजिक पृष्ठभूमि को अपनी राजनीतिक संवाद रणनीति से जोड़ रही है। हालांकि, युवाओं की राजनीतिक प्राथमिकताएं केवल राष्ट्रवाद तक सीमित नहीं हैं। रोजगार, भर्ती परीक्षाओं में पारदर्शिता, शिक्षा, पलायन, कौशल विकास और स्थानीय स्तर पर अवसर जैसे मुद्दे भी उत्तराखंड के युवा मतदाताओं के लिए महत्वपूर्ण हैं। इसलिए युवाओं के बीच राष्ट्रवादी विचारों की मौजूदगी को चुनावी समर्थन का सीधा संकेत मानना राजनीतिक दलों के लिए जल्दबाजी होगी। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल युवाओं के सवालों को रोजगार और आर्थिक अवसरों से जोड़कर सरकार को घेरते रहे हैं। उनका जोर इस बात पर है कि राष्ट्र निर्माण की चर्चा के साथ युवाओं को रोजगार, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और बेहतर भविष्य के अवसर भी चाहिए। ऐसे में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले युवाओं के बीच राजनीतिक विमर्श का स्वरूप महत्वपूर्ण होगा। राष्ट्रवाद बनाम रोजगार जैसी सरल राजनीतिक तस्वीर से आगे युवाओं के सामने कई मुद्दे एक साथ मौजूद हैं। भाजपा राष्ट्रवादी विमर्श को मजबूत करने की कोशिश करेगी, जबकि विपक्ष रोजगार, शिक्षा और सरकार के प्रदर्शन से जुड़े सवालों को प्रमुखता देने की रणनीति अपना सकता है। उत्तराखंड में युवा मतदाता किस मुद्दे को कितना महत्व देता है, इसका आकलन केवल राजनीतिक दलों के दावों से नहीं, बल्कि चुनावी आंकड़ों और जमीनी रुझानों से ही संभव होगा। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि युवाओं को लेकर राजनीतिक दलों की रणनीति तेज हो गई है और राष्ट्रवाद भी इस राजनीतिक संवाद का एक प्रमुख हिस्सा बनता जा रहा है।

फिर नीट-यूजी पर सियासी घमासान

विधायक विनोद चमोली ने यशपाल आर्य के आरोपों पर किया पलटवार भाजपा विधायक बोलेकृव्यवस्था पर सवाल उठाने से पहले तथ्य सामने रखें बोले-प्रदेश सरकार ने शिकायत मिलते ही जांच का दायरा भी बढ़ा दिया देहरादून। उत्तराखंड में नीट-यूजी काउंसलिंग के दौरान प्रमाणपत्रों की सत्यता को लेकर सामने आए मामलों ने अब राजनीतिक रंग ले लिया है। नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य के आरोपों पर भाजपा प्रदेश प्रवक्ता एवं वरिष्ठ विधायक विनोद चमोली ने पलटवार करते हुए कांग्रेस पर मुद्दे को राजनीतिक रूप देने का आरोप लगाया। दरअसल, नीट-यूजी 2026 की राज्य काउंसलिंग में फर्जी अथवा संदिग्ध प्रमाणपत्रों के आधार पर मेडिकल सीट हासिल करने के मामले सामने आने के बाद जांच और कार्रवाई का सिलसिला जारी है। हाल में 12 और अभ्यर्थियों के प्रमाणपत्र फर्जी पाए जाने पर उनके सीट आवंटन निरस्त किए गए। विश्वविद्यालय ने स्पष्ट किया है कि सत्यापन प्रक्रिया आगे भी जारी रहेगी। इसी मुद्दे को लेकर कांग्रेस ने सरकार की कार्यप्रणाली और प्रवेश प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य के आरोपों के जवाब में चमोली ने कहा कि यदि किसी स्तर पर गड़बड़ी सामने आती है तो उसकी जांच और कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन पूरी व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करने से पहले तथ्यों को सामने रखना जरूरी है। भाजपा का तर्क है कि सरकार ने शिकायतों को नजरअंदाज नहीं किया, बल्कि मामले सामने आते ही जांच के निर्देश दिए और प्रमाणपत्रों के सत्यापन का दायरा बढ़ाया। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी सभी आरक्षित श्रेणियों से जुड़े प्रमाणपत्रों की जांच के निर्देश दिए थे। शुरुआती जांच में प्रमाणपत्र निरस्त करने के साथ प्रवेश भी रद्द किए गए हैं। चमोली के पलटवार का राजनीतिक संदेश साफ हैकृकि भाजपा इस पूरे प्रकरण को व्यवस्था में सामने आई गड़बड़ी की जांच और दोषियों पर कार्रवाई के रूप में पेश कर रही है, जबकि कांग्रेस इसे सरकार की जवाबदेही से जोड़कर सवाल उठा रही है। मामले ने इसलिए भी गंभीरता बढ़ा दी है क्योंकि सवाल सिर्फ कुछ अभ्यर्थियों के प्रमाणपत्रों तक सीमित नहीं है। जांच अब इस बात तक पहुंच रही है कि प्रमाणपत्र जारी करने से लेकर काउंसलिंग में उनके सत्यापन तक कहीं प्रक्रियागत चूक हुई या नहीं। पिछले वर्षों के दाखिलों के रिकॉर्ड की जांच की संभावना भी सामने आई है। ऐसे में नीट-यूजी विवाद अब केवल शिक्षा और चिकित्सा प्रवेश का मुद्दा नहीं रह गया है। विधानसभा चुनाव से पहले यह सरकार की पारदर्शिता बनाम विपक्ष की जवाबदेही की राजनीति का नया अखाड़ा बनता दिखाई दे रहा है। आने वाले दिनों में कांग्रेस जहां सरकार से पूरी प्रक्रिया की जवाबदेही मांग सकती है, वहीं भाजपा कार्रवाई को अपनी सरकार की सख्ती के प्रमाण के तौर पर सामने रख सकती है। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि फर्जी प्रमाणपत्रों का इस्तेमाल आखिर किस स्तर पर संभव हुआ और पूरी प्रक्रिया में जिम्मेदारी किसकी तय होती है। राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से आगे अब निगाह जांच के निष्कर्ष और कार्रवाई पर रहेगी।

उत्तराखंड में ‘जेन-जी’ मांग रहा है जवाब

रोजगार से लेकर भर्ती और पलायन तक मुद्दों पर मुखर 2027 से पहले राजनीतिक दलों के लिए बढ़ गई चुनौती हाल के युवा संवाद कार्यक्रमों में यही तस्वीर सामने आई देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में जेन-जी अब केवल सोशल मीडिया पर सक्रिय पीढ़ी नहीं, बल्कि चुनावी विमर्श को प्रभावित करने वाला महत्वपूर्ण युवा वर्ग बनती दिख रही है। 2027 विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक दलों ने युवाओं के बीच अपनी पहुंच बढ़ानी शुरू कर दी है। लेकिन जेन-जी का मूड केवल राजनीतिक नारों या नेताओं की अपील तक सीमित दिखाई नहीं देता। रोजगार, पारदर्शी भर्ती, शिक्षा, पलायन, उद्यमिता और डिजिटल अवसर जैसे सवाल उसके राजनीतिक संवाद के केंद्र में हैं। हाल के युवा संवाद कार्यक्रमों में भी यही तस्वीर सामने आई है। मेरे सपनों का उत्तराखंड अभियान के तहत बड़ी संख्या में विद्यार्थियों ने रोजगार, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य, खेती और पर्यटन से जुड़े सुझाव दिए। मुख्यमंत्री के साथ हुए संवाद में भी युवाओं ने राज्य के भविष्य को लेकर अपनी प्राथमिकताएं सामने रखीं। जेन-जी के सामने राजनीतिक दलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि यह पीढ़ी केवल भाषण सुनकर संतुष्ट होने वाली नहीं दिखती। वह सवाल पूछती है कि रोजगार कहां है, भर्ती प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है, पढ़ाई के बाद अवसर कहां मिलेंगे और पहाड़ में रहने वाले युवाओं के लिए भविष्य की क्या गारंटी है। देशव्यापी युवा सर्वेक्षणों में भी रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य को युवाओं की प्रमुख राजनीतिक प्राथमिकताओं में बताया गया है। इससे उत्तराखंड में भी युवा राजनीति को केवल भावनात्मक मुद्दों तक सीमित रखने के बजाय रोजमर्रा के अवसरों और भविष्य से जोड़ने की जरूरत सामने आती है। 2026 की प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार उत्तराखंड में करीब 17 लाख युवा मतदाता हैं और 20 से 29 वर्ष आयु वर्ग की हिस्सेदारी भी महत्वपूर्ण है। यही कारण है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों युवा मतदाताओं तक पहुंच बनाने की रणनीति पर जोर दे रहे हैं। भाजपा की ओर से युवाओं से संवाद और युवा विद्यार्थी मंथन जैसे कार्यक्रम किए गए हैं। मुख्यमंत्री ने तीन लाख से अधिक छात्रों से संवाद का कार्यक्रम भी शुरू किया था। वहीं विपक्ष भी युवाओं के बीच रोजगार, भर्ती और शिक्षा जैसे सवालों को प्रमुखता दे रहा है। उत्तराखंड के संदर्भ में युवा सवाल और भी गहरे हैं। पहाड़ से पलायन रोकना है तो रोजगार कहां पैदा होगा? उच्च शिक्षा के बाद युवा राज्य में क्यों रुकेगा? प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवाओं को पारदर्शी व्यवस्था कैसे मिलेगी? स्थानीय संसाधनों से उद्यमिता के अवसर कैसे बनेंगे? यही वह सवाल हैं जिनका जवाब चुनावी घोषणा-पत्रों से आगे जमीन पर चाहिए। 2027 की राजनीति में जेन-जी किस दल के साथ जाएगी, इसका निष्कर्ष अभी निकालना जल्दबाजी होगी। लेकिन इतना जरूर स्पष्ट है कि उत्तराखंड का युवा अब केवल किसके साथ का सवाल नहीं पूछ रहाकृवह क्यों और क्या मिलेगा का जवाब भी मांग रहा है। यही बदलाव आने वाले विधानसभा चुनाव की राजनीतिक बहस की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण हो सकता है।

बुधवार, 30 सितंबर 2026

udaydinmaan: उत्तराखंड में 826 स्कूलों पर ताले

udaydinmaan: उत्तराखंड में 826 स्कूलों पर ताले: 2655 विद्यालय है मात्र एक शिक्षक के भरोसे खाली गांवों से सिकुड़ रहा शिक्षा का आधार माध्यमिक स्तर पर 4745 प्रवक्ता पद खाली 3937 पदों की पदोन्न...

उत्तराखंड में 826 स्कूलों पर ताले

2655 विद्यालय है मात्र एक शिक्षक के भरोसे खाली गांवों से सिकुड़ रहा शिक्षा का आधार माध्यमिक स्तर पर 4745 प्रवक्ता पद खाली 3937 पदों की पदोन्नति न्यायिक अड़चन में देहरादून। उत्तराखंड को बने 25 वर्ष पूरे होने के बाद विकास की उपलब्धियों के बीच सरकारी शिक्षा व्यवस्था की तस्वीर कई गंभीर सवाल खड़े कर रही है। एक तरफ पहाड़ के गांवों से लगातार घटती छात्र संख्या के कारण सरकारी प्राथमिक विद्यालयों के अस्तित्व पर संकट खड़ा हो गया है, तो दूसरी तरफ जिन विद्यालयों में बच्चे पढ़ रहे हैं, वहां पर्याप्त शिक्षक उपलब्ध नहीं हैं। पिछले पांच वर्षों में शून्य छात्र नामांकन के कारण 826 सरकारी प्राथमिक विद्यालय बंद अथवा दूसरे विद्यालयों में विलय किए जा चुके हैं। वहीं नवीनतम यूडीआईएसई 2025-26 के अनुसार राज्य में 2,655 विद्यालय ऐसे हैं, जहां केवल एक शिक्षक तैनात है। माध्यमिक शिक्षा का संकट इससे अलग और अधिक गंभीर है। राज्य में 4,745 प्रवक्ता पद रिक्त हैं। इनमें से 808 पदों पर सीधी भर्ती की प्रक्रिया चल रही थी, जबकि 3,937 पद पदोन्नति के माध्यम से भरे जाने हैं और न्यायिक रोक के कारण यह प्रक्रिया प्रभावित है। इसका असर विषयवार पढ़ाई से लेकर विद्यालयों के प्रशासन तक दिखाई दे रहा है। सरकार की ओर से विधानसभा में रखे गए आंकड़े बताते हैं कि विद्यालय बंद होने की समस्या मुख्य रूप से पर्वतीय क्षेत्रों में केंद्रित है। पांच वर्षों में सबसे अधिक 262 प्राथमिक विद्यालय टिहरी गढ़वाल में बंद हुए। इसके बाद पौड़ी गढ़वाल में 120, पिथौरागढ़ में 104 और अल्मोड़ा में 83 विद्यालय बंद हुए। नैनीताल में 49, चमोली में 43, देहरादून में 38, चंपावत में 34, बागेश्वर में 30, उत्तरकाशी में 25, ऊधमसिंह नगर में 21, रुद्रप्रयाग में 15 और हरिद्वार में दो विद्यालय बंद हुए। इन आंकड़ों का सबसे बड़ा संदेश यह है कि सरकारी स्कूलों के बंद होने की कहानी केवल शिक्षा विभाग की प्रशासनिक कवायद नहीं है। इसके पीछे पहाड़ के गांवों में बदलती जनसंख्या का संकट भी जुड़ा हुआ है। जिस गांव में बच्चों की संख्या लगातार घटती जाती है, वहां विद्यालय चलाना विभाग के लिए कठिन होता जाता है। लेकिन दूसरी तरफ विद्यालय का बंद होना उस गांव के सामाजिक जीवन को और कमजोर कर सकता है। यानी सवाल केवल यह नहीं है कि विद्यालय में बच्चे कितने हैं। सवाल यह भी है कि बच्चे गांव में क्यों नहीं हैं और गांव में बच्चों को रोकने के लिए शिक्षा व्यवस्था कितनी सक्षम है। जिलेवार आंकड़ों में पर्वतीय और मैदानी उत्तराखंड के बीच का अंतर भी साफ दिखाई देता है। टिहरी में 262 विद्यालय बंद हुए, जबकि हरिद्वार में केवल दो। पौड़ी, पिथौरागढ़ और अल्मोड़ा जैसे पर्वतीय जिलों में भी बंद विद्यालयों की संख्या काफी अधिक रही। यह अंतर उत्तराखंड के उस पुराने सवाल को सामने लाता है, जिस पर राज्य बनने के बाद से लगातार चर्चा होती रही हैकृक्या पहाड़ में शिक्षा की व्यवस्था केवल विद्यालय खोलकर मजबूत की जा सकती है, या इसके लिए गांवों में आबादी और रोजगार का टिकना भी जरूरी है? यदि गांवों से परिवार बाहर जा रहे हैं, खेती और स्थानीय रोजगार के अवसर घट रहे हैं और नई पीढ़ी शिक्षा व रोजगार के लिए मैदानी क्षेत्रों की ओर जा रही है, तो विद्यालयों में नामांकन स्वाभाविक रूप से प्रभावित होगा। लेकिन विद्यालय बंद होने के बाद बचे हुए परिवारों के बच्चों को दूर स्थित विद्यालय तक पहुंचाने की समस्या भी बढ़ती है। उत्तराखंड की सरकारी शिक्षा व्यवस्था की दूसरी बड़ी चुनौती शिक्षक उपलब्धता है। नवीनतम यूडीआईएसई 2025-26 में राज्य के 2,655 एकल-शिक्षक विद्यालय दर्ज हैं। संसद में प्रस्तुत केंद्र सरकार के आंकड़ों में भी उत्तराखंड के लिए यही संख्या दर्ज है। इससे पहले राज्य में 2,959 एकल-शिक्षक विद्यालय होने की रिपोर्ट सामने आई थी। इस आंकड़े को लेकर नीति आयोग की रिपोर्ट के संदर्भ में भी चिंता जताई गई। बाद के यूडीआईएसई आंकड़े में संख्या 2,655 दर्ज है। इसलिए अलग-अलग रिपोर्टों में संख्या का अंतर रिपोर्टिंग वर्ष और आंकड़ों के स्रोत के कारण हो सकता है। एकल-शिक्षक विद्यालय की वास्तविक चुनौती पहाड़ी क्षेत्रों में और अधिक जटिल हो जाती है। प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक को एक साथ अलग-अलग कक्षाओं के बच्चों को संभालना पड़ता है। पढ़ाई के अलावा प्रशासनिक कार्य, अभिलेख, विभागीय सूचनाएं और अन्य जिम्मेदारियां भी उसी शिक्षक के हिस्से में आती हैं। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि एक शिक्षक से एक साथ शिक्षण, मूल्यांकन, प्रशासन और विद्यालय प्रबंधन की सभी जिम्मेदारियां निभाने की अपेक्षा किस हद तक व्यावहारिक है। प्राथमिक विद्यालयों में जहां छात्र संख्या और एकल शिक्षक बड़ी समस्या है, वहीं माध्यमिक शिक्षा में शिक्षक पदों की रिक्तियां चिंता बढ़ा रही हैं। राज्य में 4,745 प्रवक्ता पद खाली बताए गए हैं। सरकार के अनुसार 808 पदों पर सीधी भर्ती की प्रक्रिया चल रही थी, लेकिन 3,937 पद पदोन्नति से भरे जाने की प्रक्रिया न्यायिक रोक के कारण प्रभावित हुई। इसका सीधा असर उन विद्यालयों पर पड़ता है जहां किसी विषय का स्थायी शिक्षक उपलब्ध नहीं है। विज्ञान, गणित, भाषा और अन्य विषयों में शिक्षक की कमी का प्रभाव विद्यार्थियों की नियमित पढ़ाई और परीक्षा की तैयारी पर पड़ सकता है। यहां शिक्षा व्यवस्था का एक विरोधाभास भी सामने आता हैकृएक ओर कई विद्यालयों में विद्यार्थियों की संख्या इतनी कम है कि विद्यालय बंद करने की नौबत आ रही है, दूसरी ओर मौजूद विद्यालयों में हजारों शिक्षक पद खाली हैं। शिक्षा व्यवस्था में केवल शिक्षकों की कमी ही नहीं है। विद्यालयों के प्रशासनिक नेतृत्व का संकट भी सामने है। सल्ट विधानसभा क्षेत्र में 59 माध्यमिक विद्यालयों में से 37 में स्थायी प्रधानाचार्य नहीं हैं। इन विद्यालयों में कार्यवाहक व्यवस्था के सहारे काम चलाया जा रहा है। प्रधानाचार्य किसी विद्यालय में केवल प्रशासनिक पद नहीं होता। विद्यालय की शैक्षणिक योजना, शिक्षकों के बीच समन्वय, अनुशासन, अभिभावकों से संवाद और विभागीय कार्यों में प्रधानाचार्य की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। लंबे समय तक स्थायी प्रधानाचार्य नहीं होने से विद्यालय संचालन पर इसका असर पड़ना स्वाभाविक है। शिक्षक और छात्र संकट के साथ सरकारी विद्यालयों की आधारभूत सुविधाएं भी चिंता का विषय बनी हुई हैं। उपलब्ध विभागीय आंकड़ों के अनुसार 2,210 सरकारी विद्यालयों की इमारतों की स्थिति खराब बताई गई है। 2024-25 के आंकड़ों पर आधारित रिपोर्ट में पौड़ी गढ़वाल में ऐसे विद्यालयों की संख्या 330 बताई गई थी। उसी रिपोर्ट में 361 विद्यालयों में छात्राओं के लिए शौचालय और 130 विद्यालयों में पेयजल सुविधा नहीं होने की जानकारी दी गई थी। जर्जर विद्यालय भवनों का संकट नया नहीं है। शिक्षा विभाग ने पहले भी वर्षाकाल में ऐसे भवनों में कक्षाएं संचालित नहीं करने के निर्देश दिए हैं। 2023 की विभागीय रिपोर्ट के आधार पर प्रदेश में 2,785 सरकारी स्कूल भवनों को जर्जर बताया गया था, जिससे यह भी स्पष्ट होता है कि अलग-अलग वर्षों और मानकों के कारण जर्जर भवनों के आंकड़ों में अंतर मिलता है। विद्यालय में शिक्षक और भवन होने के बाद भी यदि बिजली, पानी, शौचालय और अन्य बुनियादी सुविधाएं पर्याप्त नहीं हैं तो शिक्षा की गुणवत्ता का सवाल बना रहता है। पुराने सरकारी आंकड़ों में उत्तराखंड के बड़ी संख्या में विद्यालयों में बिजली, पुस्तकालय, खेल मैदान, शौचालय और पेयजल जैसी सुविधाओं की कमी दर्ज की गई थी। समय के साथ कई सुविधाओं में सुधार हुआ है, इसलिए पुराने आंकड़ों को वर्तमान स्थिति का सीधा प्रतिनिधि मानना उचित नहीं होगा। फिर भी पर्वतीय क्षेत्रों में भौगोलिक कठिनाइयां, मौसम, सड़क संपर्क और निर्माण की लागत जैसी समस्याएं शिक्षा के बुनियादी ढांचे को लगातार चुनौती देती हैं। उत्तराखंड के सरकारी विद्यालयों की मौजूदा तस्वीर को केवल शिक्षा विभाग की विफलता या उपलब्धि के रूप में देखना अधूरा होगा। इसके पीछे पलायन, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, रोजगार, स्वास्थ्य सेवाएं, सड़क संपर्क और गांवों की जनसांख्यिकी भी जुड़ी है। यदि किसी गांव में परिवार ही नहीं बचेंगे तो विद्यालय में विद्यार्थी कहां से आएंगे? और यदि विद्यालय बंद कर दिए जाएंगे तो गांव में बचे परिवार अपने बच्चों को लेकर वहां कितने समय तक टिके रहेंगे? यही वह बिंदु है जहां शिक्षा और पलायन का रिश्ता एक-दूसरे को प्रभावित करता दिखाई देता है। राज्य सरकार शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए कई पहल कर रही है। मार्च 2026 में शिक्षा मंत्री धन सिंह रावत ने सरकार की ओर से विद्यालयी शिक्षा में आधारभूत ढांचे, आधुनिक संसाधनों, नई शिक्षण पद्धतियों और शिक्षक कौशल पर जोर दिए जाने की बात कही थी। समग्र शिक्षा उत्तराखंड के स्तर पर भी शिक्षक प्रशिक्षण और विद्यालय सुधार से जुड़ी गतिविधियां जारी हैं। 2026 में 50 सरकारी विद्यालयों में आधुनिक शिक्षण माडल लागू करने की पहल भी सामने आई है। सरकार शिक्षा में फिनलैंड जैसी आधुनिक शिक्षण पद्धतियों से सीख लेने की दिशा में भी विचार कर रही है। लेकिन फिनलैंड की किसी पद्धति को अपनाने से पहले उत्तराखंड की अपनी भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियों को ध्यान में रखना जरूरी होगा। फिनलैंड की शिक्षा व्यवस्था में उच्च प्रशिक्षित शिक्षकों, शैक्षणिक स्वायत्तता, सीखने में समान अवसर और विद्यार्थियों की जरूरत के अनुसार सहायता पर जोर दिया जाता है। उत्तराखंड की शिक्षा व्यवस्था के सामने अब केवल यह चुनौती नहीं है कि कितने विद्यालय बनाए जाएं। चुनौती यह भी है कि कितने विद्यालय बचाए जाएं, कितने बच्चों को गांव में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले और कितने परिवारों को गांव छोड़ने से रोका जा सके। 826 विद्यालयों का बंद होना महज 826 भवनों का खाली होना नहीं है। प्रत्येक विद्यालय किसी गांव के सामाजिक और सामुदायिक जीवन का केंद्र भी रहा है। विद्यालय बंद होने का अर्थ कई जगहों पर बच्चों को दूसरे गांव तक भेजना, अभिभावकों के लिए अतिरिक्त जिम्मेदारी और गांव के सार्वजनिक जीवन में एक और कमी होना है। दूसरी ओर हजारों विद्यालयों का एक शिक्षक के भरोसे चलना बताता है कि जहां विद्यार्थी मौजूद हैं, वहां पर्याप्त मानवीय संसाधन उपलब्ध कराने की चुनौती अभी समाप्त नहीं हुई है। माध्यमिक स्तर पर 4,745 प्रवक्ता पदों की रिक्ति और 3,937 पदोन्नतियों का न्यायिक अड़चन में फंसना इस संकट को और बड़ा करता है। उत्तराखंड की शिक्षा व्यवस्था का सबसे बड़ा सवाल अब यह है कि सरकार बंद हो चुके विद्यालयों की संख्या गिनने से आगे बढ़कर उन कारणों को कैसे संबोधित करेगी, जिनकी वजह से विद्यालय खाली हुए और जो विद्यालय चल रहे हैं, वहां बच्चों को पर्याप्त शिक्षक, सुरक्षित भवन और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा कब तक मिलेगी। क्योंकि पहाड़ में स्कूल का बचना केवल शिक्षा विभाग की उपलब्धि नहीं होगाकृयह उस गांव में जीवन के बचे रहने का भी संकेत होगा।

छात्रसंघ नतीजों से भाजपा उत्साहित

भाजपा का दावा-एबीवीपी की 85 प्रतिशत जीत को सरकार के प्रति युवाओं के भरोसे से जोड़ा 2027 से पहले सियासी संदेश पढ़ने में जुटी भाजपा,डीएवी की जीत ने बढ़ाया उत्साह छात्रसंघ चुनावों के जरिए महाविद्यालय परिसरों में सक्रिय कार्यकर्ताओं का दिखा नेटवर्क देहरादून। उत्तराखंड के महाविद्यालयों में हुए छात्रसंघ चुनाव के नतीजों ने प्रदेश की राजनीति में भी हलचल बढ़ा दी है। राज्य के सबसे बड़े महाविद्यालय डीएवी पीजी कॉलेज समेत कई संस्थानों में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के प्रदर्शन से भाजपा उत्साहित है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने एबीवीपी की जीत पर बधाई देते हुए दावा किया कि प्रदेश में करीब 85 प्रतिशत छात्रसंघ सीटों पर मिली जीत इस बात का संकेत है कि युवाओं ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में लिए जा रहे निर्णयों पर भरोसा जताया है। प्रदेश के सबसे बड़े डीएवी पीजी कालेज में अध्यक्ष पद पर एबीवीपी के नवदीप राणा ने जीत दर्ज की। यह लगातार दूसरी बार है जब एबीवीपी ने डीएवी में अध्यक्ष पद अपने नाम किया है। देहरादून के एमकेपी और एसजीआरआर समेत कई महाविद्यालयों में भी एबीवीपी का प्रदर्शन मजबूत रहा। हालांकि कई स्थानों पर निर्दलीय और एनएसयूआई प्रत्याशियों ने भी जीत दर्ज की, जिससे पूरे छात्रसंघ चुनाव को केवल एकतरफा परिणाम के रूप में देखना उचित नहीं होगा। भाजपा ने इन परिणामों को आगामी विधानसभा चुनाव से पहले युवाओं के बीच अपने राजनीतिक प्रभाव के संकेत के रूप में प्रस्तुत किया है। महेंद्र भट्ट ने कहा कि एबीवीपी की जीत युवा वर्ग के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, विकास और सरकार की युवा-केंद्रित नीतियों के प्रति समर्थन को दर्शाती है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष का तर्क है कि छात्रसंघ चुनावों में एबीवीपी के पक्ष में आया परिणाम केवल छात्र राजनीति तक सीमित नहीं है। पार्टी इसे धामी सरकार की नीतियों से जोड़ रही है। भट्ट ने कहा कि युवाओं ने रोजगार, पारदर्शी व्यवस्था और युवा कल्याण से जुड़े सरकार के प्रयासों पर अपनी स्वीकृति की मुहर लगाई है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी विजयी एबीवीपी प्रत्याशियों को बधाई देते हुए परिणामों को युवाओं की राष्ट्रवादी विचारधारा और छात्रहित से जोड़कर देखा। उन्होंने कहा कि युवाओं ने अपने मत के जरिए विपक्ष की कथित नकारात्मक राजनीति को जवाब दिया है। यह मुख्यमंत्री और भाजपा की ओर से किया गया राजनीतिक आकलन है। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव अगले वर्ष होने हैं। ऐसे में छात्रसंघ चुनावों के परिणामों को राजनीतिक दल अपने-अपने तरीके से पढ़ रहे हैं। भाजपा के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि छात्र राजनीति में मजबूत संगठनात्मक नेटवर्क रखने वाली एबीवीपी ने कई महाविद्यालयों में अपना प्रभाव बनाए रखा। भाजपा की रणनीति में युवा मतदाताओं की भूमिका महत्वपूर्ण है। छात्रसंघ चुनावों के जरिए महाविद्यालय परिसरों में सक्रिय कार्यकर्ताओं का नेटवर्क भी सामने आता है। विधानसभा चुनाव के दौरान यही नेटवर्क बूथ और स्थानीय स्तर की राजनीतिक गतिविधियों में भूमिका निभा सकता है। हालांकि छात्रसंघ चुनाव के परिणामों को सीधे विधानसभा चुनाव के मतदाताओं की पसंद का प्रतिनिधि मानना उचित नहीं होगा। इन चुनावों में एनएसयूआई ने कुछ स्थानों पर बेहतर प्रदर्शन किया है। रुड़की के केएलडीएवी कॉलेज में एनएसयूआई ने छह में से चार पद जीते, जबकि मोरी में उसके सभी प्रत्याशियों ने जीत दर्ज की। नैनीताल के डीएसबी परिसर में अध्यक्ष पद पर निर्दलीय प्रत्याशी विजयी रहे। यानी छात्र राजनीति में मुकाबला पूरी तरह एबीवीपी तक सीमित नहीं रहा। कांग्रेस ने डीएवी चुनाव को लेकर प्रशासन और पुलिस की भूमिका पर सवाल भी उठाए और कथित अनियमितताओं की जांच की मांग की है। इन आरोपों पर प्रशासन और पुलिस का पक्ष अलग से सामने आना बाकी है। छात्रसंघ चुनावों के नतीजे ऐसे समय आए हैं जब राजनीतिक दल 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुटे हैं। भाजपा इन परिणामों के जरिए यह राजनीतिक संदेश देने की कोशिश कर रही है कि युवाओं के बीच सरकार की स्वीकार्यता बनी हुई है। दूसरी ओर कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इन परिणामों को छात्र राजनीति तक सीमित रखते हुए सरकार की नीतियों पर अपने सवालों को आगे बढ़ा सकते हैं। यही कारण है कि छात्रसंघ चुनाव अब महज परिसर की राजनीति नहीं रह गए हैं। इनके परिणामों ने विधानसभा चुनाव से पहले युवाओं के मुद्दों, रोजगार, शिक्षा और राजनीतिक भागीदारी को फिर बहस के केंद्र में ला दिया है। एबीवीपी की जीत को भाजपा धामी सरकार के प्रति युवा समर्थन के संकेत के तौर पर पेश कर रही है, जबकि चुनावों में एनएसयूआई और निर्दलीय प्रत्याशियों की सफलताएं यह बताती हैं कि छात्र राजनीति का पूरा परिदृश्य बहुआयामी है। अब असली राजनीतिक परीक्षा यह होगी कि छात्र परिसरों में दिखा यह रुझान अगले वर्ष विधानसभा चुनाव के दौरान किस रूप में दिखाई देता है।

एसआईआर पर भाजपा और कांग्रेस में जंग

एसआईआर पर घिरी कांग्रेस को भाजपा ने 60 साल का आईना दिखाया महेंद्र बोलेकृहार दिखी तो चुनाव व्यवस्था को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश भाजपा ने सीधे कांग्रेस के छह दशक के शासनकाल को निशाने पर लिया देहरादून। उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले चुनाव आयोग और विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच सियासी जंग और तेज हो गई है। कांग्रेस की ओर से एसआईआर और निर्वाचन प्रक्रिया पर लगातार सवाल उठाए जाने के बाद भाजपा ने अब सीधे कांग्रेस के छह दशक के शासनकाल को निशाने पर ले लिया है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष एवं राज्यसभा सांसद महेंद्र भट्ट ने कांग्रेस पर पलटवार करते हुए कहा कि आज जो पार्टी चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठा रही है, उसे पहले अपने शासनकाल के दौरान चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति और व्यवस्था का इतिहास देखना चाहिए। भट्ट ने तीखा हमला बोलते हुए कहा कि असली चुनावी मैच फिक्सिंग वह थी, जब जानबूझकर चुनाव आयुक्त के चयन की कोई नीति नहीं बनाई गई। जब सरकारें अपने यस-मैन को महत्वपूर्ण पदों पर बैठाती रहीं और आयुक्तों को बाद में मंत्री बनाया गया तथा चुनाव लड़ाया गया। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष ने आरोप लगाया कि कांग्रेस और विपक्ष को यह अहसास हो चुका है कि वह सामान्य राजनीतिक मुकाबले में जीत हासिल नहीं कर सकते, इसलिए अब पूरी चुनावी व्यवस्था पर ही संदेह खड़ा करने की रणनीति अपनाई जा रही है। हालांकि यह भाजपा का राजनीतिक आरोप है, कांग्रेस की ओर से इस पर अलग पक्ष रखा जा सकता है। भाजपा के हमले का सबसे तीखा हिस्सा कांग्रेस की चुनावी रणनीति को लेकर है। भट्ट का कहना है कि एसआईआर को लेकर जिस तरह विपक्ष सवाल उठा रहा है, उससे लगता है कि चुनाव परिणाम आने से पहले ही हार का कारण तलाशने की कोशिश शुरू हो गई है। भाजपा का तर्क है कि यदि मतदाता सूची में किसी पात्र नागरिक का नाम छूटता है या कोई वास्तविक त्रुटि सामने आती है तो राजनीतिक दलों को प्रमाण के साथ निर्वाचन आयोग के समक्ष आपत्ति दर्ज करानी चाहिए। लेकिन पूरी प्रक्रिया को ही संदिग्ध बताने से मतदाताओं के बीच चुनावी संस्थाओं के प्रति अविश्वास पैदा हो सकता है। कांग्रेस और विपक्ष की ओर से चुनाव प्रक्रिया पर उठाए जा रहे सवालों को भाजपा ने अब राजनीतिक हथियार बना लिया है। भट्ट ने कांग्रेस के आरोपों को उसी की भाषा में जवाब देते हुए मैच फिक्सिंग का पलटवार किया है। उनका निशाना केवल एसआईआर नहीं, बल्कि कांग्रेस के शासनकाल में चुनाव आयोग की नियुक्ति व्यवस्था भी है। भाजपा का कहना है कि कांग्रेस को वर्तमान व्यवस्था पर सवाल उठाने से पहले यह बताना चाहिए कि उसके शासनकाल में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति कितनी पारदर्शी थी। वर्तमान में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए 2023 के कानून में चयन समिति का प्रावधान है। राष्ट्रपति नियुक्ति करते हैं और निर्धारित चयन प्रक्रिया में प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता शामिल होते हैं। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की तैयारियां तेज होने के साथ ही चुनाव आयोग, मतदाता सूची और एसआईआर राजनीतिक विमर्श के बड़े मुद्दे बनते जा रहे हैं। कांग्रेस जहां चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता और मतदाता अधिकारों को लेकर सवाल उठा रही है, वहीं भाजपा इसे विपक्ष की राजनीतिक रणनीति बता रही है। भाजपा के लिए यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वह कांग्रेस के आरोपों का जवाब देने के साथ-साथ अपने पक्ष में एक बड़ा नैरेटिव खड़ा करना चाहती हैकृकि चुनाव आयोग पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक संस्थाओं पर अविश्वास पैदा करने की कोशिश है। दूसरी तरफ कांग्रेस के सामने चुनौती यह है कि एसआईआर को लेकर लगाए जा रहे आरोपों को केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित न रखकर ठोस आंकड़ों और प्रमाणों के साथ सामने रखे। भाजपा का कहना है कि लोकतंत्र में चुनावी जीत-हार का फैसला जनता करती है। इसलिए राजनीतिक दलों को चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर व्यापक संदेह पैदा करने के बजाय जनता के बीच अपने मुद्दों के साथ जाना चाहिए। यही वजह है कि महेंद्र भट्ट का ताजा बयान उत्तराखंड की चुनावी राजनीति में केवल कांग्रेस पर हमला नहीं, बल्कि 2027 के चुनाव से पहले चुनावी नैरेटिव पर पकड़ बनाने की कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है। भाजपा कांग्रेस को उसके छह दशक के शासन की याद दिलाकर पूछ रही है कि चुनाव आयोग पर सवाल उठाने से पहले अपने अतीत का हिसाब कौन देगा? वहीं कांग्रेस एसआईआर और चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाकर जवाबदेही मांग रही है। अब यह टकराव जितना बढ़ेगा, उतना ही चुनावी मैदान में मुद्दा किसे वोट से आगे बढ़कर किस चुनावी व्यवस्था पर भरोसा तक पहुंचता जाएगा।

परंपरा पर मंत्री की टिप्पणी से विवाद

शंख पर विवादित बयान पर संत समाज ने मंत्री पर दाग दिए सवाल जिस शंखनाद से होते हैं मंगल कार्य, भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी है परंपरा उसी पर टिप्पणी से उठे सवालकृदेवभूमि में आस्था के प्रतीकों का सम्मान कहां देहरादून। देवभूमि उत्तराखंड में अब शंख को लेकर दिया गया एक बयान सियासी बहस से आगे बढ़कर धार्मिक और आध्यात्मिक चर्चा का विषय बन गया है। पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज की शंख को लेकर की गई कथित विवादित टिप्पणी पर आध्यात्मिक संतों ने सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। सवाल सीधा हैकृकि जिस शंखनाद के साथ सनातन परंपरा में पूजा, आरती और मंगल कार्यों का श्रीगणेश होता है, उसी शंख को लेकर ऐसी टिप्पणी क्यों? भारतीय धार्मिक परंपरा में शंख का स्थान सदियों से विशेष रहा है। मंदिरों में आरती के समय शंखनाद, धार्मिक अनुष्ठानों की शुरुआत और शुभ अवसरों पर शंख बजाने की परंपरा आज भी कायम है। धार्मिक आख्यानों में भगवान श्रीकृष्ण के शंख का उल्लेख मिलता है। ऐसे में संत समाज का कहना है कि शंख महज एक वस्तु नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ा प्रतीक है। मंत्री के बयान को लेकर संत समाज के बीच यह सवाल उठ रहा है कि क्या सार्वजनिक जीवन में बैठे लोगों को धार्मिक परंपराओं के प्रतीकों पर टिप्पणी करने से पहले उनके महत्व की जानकारी नहीं होनी चाहिए? संतों का कहना है कि विचारों की स्वतंत्रता अपनी जगह है, लेकिन आस्था से जुड़े विषयों पर सार्वजनिक बयान देते समय शब्दों की मर्यादा और संदर्भ दोनों महत्वपूर्ण हैं। खासकर तब, जब बात उत्तराखंड जैसे प्रदेश की हो, जिसकी पहचान ही देवभूमि और आध्यात्मिक परंपराओं से जुड़ी है। उत्तराखंड की धार्मिक पहचान चारधाम से लेकर मंदिरों, मठों और संत परंपरा तक फैली हुई है। ऐसे प्रदेश में धार्मिक प्रतीकों को लेकर होने वाली टिप्पणी का असर केवल राजनीतिक गलियारों तक सीमित नहीं रहता। यही वजह है कि अब सवाल उठ रहा हैकृकि क्या पर्यटन और विकास की बात करते-करते प्रदेश की उस आध्यात्मिक विरासत को नजरअंदाज किया जा सकता है, जिसके कारण उत्तराखंड की अलग पहचान बनी है? संत समाज की आपत्ति का केंद्र यही है कि शंख को लेकर दिए गए बयान को केवल राजनीतिक बयानबाजी मानकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। उनके मुताबिक धार्मिक प्रतीकों के प्रति सम्मान और संवेदनशीलता सार्वजनिक जीवन की जिम्मेदारी का हिस्सा है। अब निगाहें मंत्री सतपाल महाराज की ओर हैं। क्या वह अपने बयान का संदर्भ स्पष्ट करेंगे? क्या वे बताएंगे कि उनकी टिप्पणी का वास्तविक आशय क्या था? और क्या संत समाज द्वारा उठाए जा रहे सवालों पर कोई स्पष्टीकरण सामने आएगा? शंखनाद सनातन परंपरा में शुभता का प्रतीक हैकृलेकिन इस बार शंख की आवाज से ज्यादा तेज वे सवाल सुनाई दे रहे हैं, जिनका जवाब संत समाज मंत्री से मांग रहा है।