रविवार, 13 सितंबर 2026
udaydinmaan: सत्ता से सवाल पर ‘बुलडोजर’
udaydinmaan: सत्ता से सवाल पर ‘बुलडोजर’: यूपी में सत्ता से सवाल की कीमत नौकरी, धमकी और खौफ योगी सरकार पर पत्रकार की आवाज दबाने के आरोप डबल इंजन सरकार में सवाल पूछना इतना बड़ा अपराध स...
2027 का ‘सियासी ट्रेलर’ जारी
विस चुनाव करीब आते ही केंद्रीय एजेंसियां एक्टिव
कांग्रेस ने घेरा, भाजपा बोली-जांच से क्यों भाग रहे
एजेंसियों पर चुनावी पिच तैयार का लगाया आरोप
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई ने सियासी तापमान बढ़ा दिया है। कांग्रेस ने कार्रवाई के समय और उसके राजनीतिक प्रभाव को सीधे 2027 के विधानसभा चुनाव से जोड़ते हुए इसे राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिश करार दिया है। पार्टी का आरोप है कि चुनाव नजदीक आते ही केंद्रीय एजेंसियों की सक्रियता बढ़ना महज संयोग नहीं है। वहीं भाजपा का कहना है कि भ्रष्टाचार और अनियमितताओं की जांच को चुनाव से जोड़ना कांग्रेस की पुरानी रणनीति है और यदि किसी मामले में जांच एजेंसी कार्रवाई कर रही है तो उसे राजनीतिक रंग देने के बजाय तथ्यों का सामना करना चाहिए।
ईडी की कार्रवाई के बाद प्रदेश कांग्रेस ने भाजपा पर निशाना साधते हुए सवाल उठाया कि आखिर चुनावी वर्ष की ओर बढ़ते उत्तराखंड में केंद्रीय जांच एजेंसियों की गतिविधियां अचानक क्यों तेज हो रही हैं। कांग्रेस का तर्क है कि राजनीतिक विरोधियों और उनसे जुड़े लोगों पर कार्रवाई के जरिए माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है। पार्टी नेताओं का कहना है कि 2027 के चुनाव को देखते हुए भाजपा विपक्ष पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की रणनीति अपना रही है।
कांग्रेस के इस हमले ने कार्रवाई को महज जांच एजेंसी की कार्रवाई न रहने देकर इसे सीधे राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है। पार्टी नेताओं का कहना है कि यदि किसी मामले में भ्रष्टाचार या वित्तीय अनियमितता के ठोस प्रमाण हैं तो जांच और कार्रवाई कानून के अनुसार होनी चाहिए, लेकिन जांच एजेंसियों की कार्रवाई का इस्तेमाल राजनीतिक नैरेटिव बनाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। कांग्रेस के आरोपों पर भाजपा का पलटवार भी उतना ही तीखा है। भाजपा का कहना है कि ईडी कोई राजनीतिक संगठन नहीं बल्कि कानून के तहत काम करने वाली जांच एजेंसी है। किसी मामले में जांच आगे बढ़ती है तो उसका आधार दस्तावेज और साक्ष्य होते हैं, चुनावी कैलेंडर नहीं।
भाजपा नेताओं के मुताबिक कांग्रेस जब सत्ता में थी, तब भी जांच एजेंसियों की कार्रवाई होती रही है। अब विपक्ष में रहते हुए हर कार्रवाई को चुनाव से जोड़ना कांग्रेस की राजनीतिक मजबूरी बन गई है। भाजपा का सवाल है कि यदि संबंधित व्यक्ति या मामले में कोई गड़बड़ी नहीं है तो जांच से डरने की जरूरत क्या है?
दरअसल, उत्तराखंड में 2027 का विधानसभा चुनाव अब राजनीतिक दलों के लिए दूर की मंजिल नहीं रह गया है। भाजपा जहां लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी का लक्ष्य लेकर संगठन को चुनावी मोड में ला चुकी है, वहीं कांग्रेस सत्ता में वापसी के लिए सरकार के खिलाफ मुद्दे तलाश रही है। ऐसे में ईडी की किसी भी कार्रवाई का राजनीतिक असर होना स्वाभाविक है। कांग्रेस इस कार्रवाई को केंद्रीय एजेंसियों के कथित राजनीतिक इस्तेमाल के बड़े नैरेटिव से जोड़ रही है। पार्टी के लिए यह मुद्दा इसलिए भी अहम है क्योंकि वह पहले से ही बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं, कानून-व्यवस्था, महंगाई और अन्य जनमुद्दों को लेकर भाजपा सरकार को घेरने की तैयारी में है।
भाजपा दूसरी ओर कांग्रेस के इस नैरेटिव को जांच से बचने की कोशिश के रूप में पेश कर सकती है। यानी ईडी की कार्रवाई के साथ ही दोनों दलों के बीच जांच बनाम राजनीतिक प्रतिशोध की बहस तेज होने के आसार हैं। ईडी की कार्रवाई के बाद असली सवाल यही है कि इसका असर 2027 के चुनावी विमर्श पर कितना पड़ेगा। यदि जांच में गंभीर वित्तीय अनियमितताओं के तथ्य सामने आते हैं तो भाजपा इसे भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई के रूप में पेश करेगी। इसके उलट यदि कांग्रेस इसे राजनीतिक प्रतिशोध साबित करने में सफल रहती है तो वह इसे विपक्ष को दबाने और चुनावी लाभ लेने की रणनीति के तौर पर जनता के सामने रखेगी। इसलिए फिलहाल लड़ाई केवल जांच की नहीं है। लड़ाई उस नैरेटिव की है जिसे दोनों प्रमुख दल 2027 के चुनाव तक जनता के बीच स्थापित करना चाहते हैं।
ईडी की कार्रवाई ने कांग्रेस को भाजपा पर हमला करने का नया मुद्दा दिया है, जबकि भाजपा के पास कांग्रेस से यह सवाल पूछने का अवसर है कि यदि जांच निष्पक्ष है तो उसे चुनाव से जोड़ने की जरूरत क्यों पड़ रही है? आने वाले दिनों में जांच की दिशा और सामने आने वाले तथ्य ही तय करेंगे कि यह मामला केवल एक कानूनी कार्रवाई बनकर रह जाता है या 2027 के चुनाव का बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनता है।
भ्रष्टाचार पर ‘मौन’ और कार्रवाई पर ‘शोर’
भाजपा का पलटवार, जांच एजेंसियों पर सवाल उठाना फितरत
2027 के चुनाव का नाम लेकर न छिपाएं अपनी नाकामियां
हर ऐक्शन को पालिटिकल रंग देना कांग्रेस पार्टी की मजबूरी
देहरादून। प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई को लेकर कांग्रेस के सवालों पर भाजपा ने पलटवार करते हुए तीखा हमला बोला है। भाजपा ने आरोप लगाया कि कांग्रेस लंबे समय से भ्रष्टाचार के मामलों पर आंखें बंद किए रही और अब जब केंद्रीय जांच एजेंसी ने कार्रवाई शुरू की है तो उसे राजनीतिक प्रतिशोध बताकर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। भाजपा का कहना है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ जांच कार्रवाई पर सवाल उठाने के बजाय कांग्रेस को जांच का सामना करना चाहिए और यदि आरोप निराधार हैं तो उन्हें तथ्यों के साथ खारिज करना चाहिए। भाजपा नेताओं ने कहा कि जांच एजेंसियां किसी राजनीतिक दल के निर्देश पर नहीं, बल्कि उपलब्ध साक्ष्यों और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर कार्रवाई करती हैं। ऐसे में हर कार्रवाई को आगामी विधानसभा चुनाव से जोड़ना कांग्रेस की राजनीतिक रणनीति हो सकती है, लेकिन इससे जांच की वैधता पर सवाल खड़ा नहीं होता।
भाजपा ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि जब भ्रष्टाचार के आरोप सामने आते हैं तो कांग्रेस राजनीतिक संरक्षण और बयानबाजी का सहारा लेती है, लेकिन जांच आगे बढ़ते ही उसे लोकतंत्र पर हमला बताने लगती है। भाजपा का सवाल है कि क्या किसी जांच एजेंसी की कार्रवाई इसलिए रोक दी जानी चाहिए क्योंकि चुनाव नजदीक हैं? भाजपा का कहना है कि 2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए कांग्रेस हर उस कार्रवाई को राजनीतिक रंग देने की कोशिश कर रही है, जिससे उसके नेताओं या करीबियों पर सवाल खड़े हो सकते हैं। पार्टी के अनुसार कांग्रेस के पास सरकार को घेरने के लिए जनमुद्दों का अभाव है, इसलिए वह जांच एजेंसियों की कार्रवाई को ही राजनीतिक मुद्दा बनाने में जुटी है।
भाजपा नेताओं ने कहा कि यदि ईडी की कार्रवाई कानून के तहत हो रही है तो कांग्रेस को जांच पूरी होने का इंतजार करना चाहिए। जांच को प्रभावित करने या कार्रवाई पर राजनीतिक दबाव बनाने के बजाय कांग्रेस को तथ्यों के आधार पर अपना पक्ष रखना चाहिए। भाजपा ने कांग्रेस के रवैये को लेकर कहा कि यह दोहरा मापदंड है। आरोप लगने पर कांग्रेस सफाई देती है, लेकिन जांच एजेंसी कार्रवाई करती है तो पूरा विपक्ष एजेंसी की निष्पक्षता पर सवाल उठाने लगता है। भाजपा का आरोप है कि कांग्रेस की राजनीति का यही विरोधाभास अब जनता के सामने उजागर हो रहा है।
पार्टी ने कहा कि भ्रष्टाचार किसी दल का राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि जनता के धन और व्यवस्था से जुड़ा सवाल है। इसलिए जांच जहां भी होनी चाहिए, वहां होनी चाहिए और दोषी पाए जाने पर कार्रवाई भी होनी चाहिए। ईडी कार्रवाई को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच बढ़ती बयानबाजी ने 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले एक नया राजनीतिक मोर्चा खोल दिया है। कांग्रेस जहां इसे केंद्रीय एजेंसियों के कथित दुरुपयोग से जोड़ रही है, वहीं भाजपा इसे भ्रष्टाचार के खिलाफ कानून सम्मत कार्रवाई बता रही है।
अब राजनीतिक लड़ाई इस बात पर भी केंद्रित होगी कि जनता के बीच कौन-सा नैरेटिव ज्यादा प्रभावी होता हैकृकि कांग्रेस का एजेंसियों का दुरुपयोग या भाजपा का भ्रष्टाचार पर कार्रवाई से डर क्यों? ईडी की जांच से जुड़े तथ्य और आगे होने वाली कानूनी कार्रवाई इस राजनीतिक बहस की दिशा तय करेगी। फिलहाल भाजपा ने कांग्रेस के सामने सीधा सवाल खड़ा कर दिया हैकृकि अगर भ्रष्टाचार नहीं हुआ तो जांच से आपत्ति क्यों, और अगर जांच गलत है तो तथ्य सामने रखने के बजाय चुनाव का हवाला क्यों?
सत्ता से सवाल पर ‘बुलडोजर’
यूपी में सत्ता से सवाल की कीमत नौकरी, धमकी और खौफ
योगी सरकार पर पत्रकार की आवाज दबाने के आरोप
डबल इंजन सरकार में सवाल पूछना इतना बड़ा अपराध
सत्ता से सवाल पूछना गुनाह है तो प्रेस कान्फ्रेंस किसलिए
देहरादून/लखनऊ। लोकतंत्र में प्रेस कान्फ्रेंस का मतलब सवाल-जवाब होता है। लेकिन उत्तर प्रदेश में महिला पत्रकार दिव्या श्रीवास्तव से जुड़े घटनाक्रम ने इस बुनियादी लोकतांत्रिक परंपरा पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से एक तीखा सवाल पूछने के बाद पत्रकार के सामने नौकरी जाने, पूछताछ और धमकी जैसी परिस्थितियां खड़ी होने के आरोप सामने आए हैं। विपक्ष ने इसे सीधे तौर पर पत्रकारिता की आवाज दबाने और सत्ता के असहज सवालों से बचने की कोशिश करार दिया है। मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि सवाल किसी राजनीतिक मंच पर नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री की प्रेस वार्ता में पूछा गया था। यानी जहां पत्रकारों से सवाल पूछने और सरकार से जवाब मांगने की अपेक्षा होती है, वहीं सवाल पूछने वाली पत्रकार को ही कथित दबाव का सामना करना पड़ा।
लोकतंत्र में पत्रकार का काम सत्ता के सामने खड़े होकर सवाल पूछना है। सवाल तीखा हो सकता है, असहज कर सकता है और सरकार को कठघरे में खड़ा कर सकता है। लेकिन सवाल का जवाब तथ्यों से दिया जाना चाहिए। दिव्या श्रीवास्तव प्रकरण में विपक्ष का आरोप है कि सवाल पूछने के बाद पत्रकार पर दबाव बनाया गया। नौकरी जाने और धमकी जैसे आरोपों ने पूरे मामले को महज एक पत्रकार की व्यक्तिगत परेशानी से निकालकर मीडिया की स्वतंत्रता बनाम सत्ता के दबाव की बहस के केंद्र में ला दिया है। सबसे बड़ा सवाल यही हैकृकि अगर पत्रकार सत्ता से सवाल नहीं पूछेगा तो फिर जनता की ओर से सवाल कौन पूछेगा?
इस घटनाक्रम पर समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने भी सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि यदि पत्रकारों को सवाल पूछने का अधिकार नहीं है तो प्रेस कान्फ्रेंस को प्रेस एकालाप कहा जाना चाहिए। यह टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि विवाद की जड़ ही सवाल पूछने के अधिकार से जुड़ी है। सरकार की प्रेस वार्ता में पत्रकार मौजूद होते हैं ताकि सरकार की नीतियों, फैसलों और दावों पर सवाल कर सकें। यदि केवल अनुकूल सवाल ही स्वीकार्य हों तो फिर प्रेस वार्ता और सरकारी प्रचार कार्यक्रम के बीच अंतर ही क्या रह जाता है?
भाजपा सरकारें सुशासन, कानून-व्यवस्था और मजबूत प्रशासन को अपनी पहचान बताती रही हैं। ऐसे में पत्रकार पर दबाव के आरोप सरकार के सामने असहज सवाल खड़े करते हैं। क्या मजबूत सरकार की ताकत सवालों का सामना करने में है या सवाल पूछने वाले को चुप कराने में? यदि पत्रकार ने गलत तथ्य रखे, तो सरकार उसका खंडन कर सकती थी। यदि सवाल भ्रामक था, तो तथ्य सामने रखे जा सकते थे। यदि कोई पत्रकारिता संबंधी गलती हुई थी, तो संस्थागत स्तर पर उसका समाधान हो सकता था। लेकिन यदि सवाल के बाद पत्रकार को नौकरी गंवानी पड़ी और उसके सामने सरकारी तंत्र से पूछताछ अथवा धमकी का माहौल बना, जैसा विपक्ष आरोप लगा रहा है, तो यह केवल एक पत्रकार का मामला नहीं रह जाता।
विवाद में कथित तौर पर बुलडोजर के खौफ का भी उल्लेख किया जा रहा है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में बुलडोजर सरकार की कार्रवाई और सख्ती का प्रतीक बन चुका है। ऐसे में यदि किसी पत्रकार को ही बुलडोजर की धमकी महसूस होने का दावा किया जाता है तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए बेहद गंभीर आरोप है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और पूरे घटनाक्रम पर संबंधित पक्षों का स्पष्ट पक्ष सामने आना जरूरी है। लेकिन सवाल फिर वही हैकृक्या पत्रकार को सत्ता से सवाल पूछने के बाद अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित होना चाहिए?
देशभर में पिछले कुछ वर्षों से मीडिया की स्वतंत्रता, पत्रकारों पर राजनीतिक दबाव और सत्ता के साथ मीडिया के रिश्तों को लेकर बहस चलती रही है। उत्तर प्रदेश का यह प्रकरण उसी बहस को फिर सामने ले आया है। सत्ता के लिए पत्रकारिता तब तक सुविधाजनक हो सकती है, जब तक वह उपलब्धियों की खबर लिखती रहे। असली लोकतांत्रिक परीक्षा तब होती है जब पत्रकार सरकार के दावों के सामने असुविधाजनक सवाल रखता है। सरकार की आलोचना सरकार विरोध नहीं होती और सवाल पूछना अपराध नहीं। लोकतंत्र में सत्ता बदलती रहती है, लेकिन सवाल पूछने का अधिकार स्थायी रहना चाहिए।
इस पूरे विवाद का सबसे चिंताजनक पहलू यही है कि यदि किसी पत्रकार को सवाल पूछने के बाद कथित दबाव का सामना करना पड़ता है तो इसका संदेश केवल मीडिया तक सीमित नहीं रहता। न्यूजरूम में बैठा दूसरा पत्रकार भी सोच सकता हैकृक्या यह सवाल पूछना सुरक्षित है? और जब पत्रकार सवाल पूछने से पहले अपने रोजगार, सुरक्षा या भविष्य के बारे में सोचने लगे, तब लोकतंत्र का चौथा स्तंभ बाहर से खड़ा दिखाई दे सकता है, लेकिन भीतर से कमजोर होने लगता है। इसलिए सरकार को आगे आकर पूरे घटनाक्रम पर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। पत्रकार पर लगाए गए आरोप हों तो सामने रखे जाएं। नौकरी जाने का कारण सार्वजनिक किया जाए। यदि किसी सरकारी तंत्र ने पत्रकार से पूछताछ या दबाव बनाया तो उसका आधार बताया जाए और यदि धमकी के आरोप गलत हैं तो सरकार उन्हें स्पष्ट रूप से खारिज करे। क्योंकि लोकतंत्र में सरकार की सबसे बड़ी ताकत यह नहीं कि उसके पास सत्ता है। उसकी सबसे बड़ी ताकत यह है कि वह सवालों का सामना करने का साहस रखती है।
सवाल पूछने वाले पत्रकार को जवाब मिलेगा या कार्रवाई? लोकतंत्र में प्रेस कान्फ्रेंस होगी या प्रेस एकालाप? सत्ता आईने से संवाद करेगी या आईना तोड़ने का आरोप झेलेगी? यही सवाल अब उत्तर प्रदेश की सियासत और मीडिया की स्वतंत्रता के सामने खड़ा है।
शनिवार, 12 सितंबर 2026
udaydinmaan: 2016 के ‘जख्म’ का 2027 में ‘हिसाब’
udaydinmaan: 2016 के ‘जख्म’ का 2027 में ‘हिसाब’: ईडी की कार्रवाई के बाद हरीश रावत ने कांग्रेस के पदों से इस्तीफे की पेशकश की 2016 की भर्ती परीक्षा की जांच ने फिर खोला कांग्रेस सरकार के दौर ...
2016 के ‘जख्म’ का 2027 में ‘हिसाब’
ईडी की कार्रवाई के बाद हरीश रावत ने कांग्रेस के पदों से इस्तीफे की पेशकश की
2016 की भर्ती परीक्षा की जांच ने फिर खोला कांग्रेस सरकार के दौर का नया अध्याय
2027 चुनाव से पहले कांग्रेस के सबसे बड़े चेहरे के कदम ने बढ़ाई पार्टी की मुश्किलें
पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कार्रवाई को राजनीतिक नैरेटिव गढ़ने की कोशिश बताया
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में शनिवार सुबह उस वक्त बड़ा सियासी भूचाल आ गया, जब पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरीश रावत ने पार्टी में अपने सभी पदों से इस्तीफे की पेशकश कर दी। पूर्व मुख्यमंत्री के इस फैसले को उनके पूर्व ओएसडी और वर्तमान निजी सहायक चंदन सिंह जीना के ठिकानों पर प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई के बाद उठाया गया कदम माना जा रहा है। हालांकि रावत ने कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता छोड़ने की बात नहीं कही है।
ईडी ने 2016 की ग्राम पंचायत विकास अधिकारी परीक्षा में कथित अनियमितताओं से जुड़े धनशोधन मामले में देहरादून में कई ठिकानों पर कार्रवाई की। एजेंसी के मुताबिक चंदन सिंह जीना के परिसर से 32 लाख रुपये नकद और 12 महंगी घड़ियां बरामद की गईं। जीना रावत के मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान ओएसडी रह चुके हैं और वर्तमान में उनके निजी सहायक के रूप में कार्यरत बताए गए हैं। हरीश रावत का इस्तीफा ऐसे समय आया है, जब उत्तराखंड कांग्रेस 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा को चुनौती देने की तैयारी में जुटी है। ऐसे में रावत का पद छोड़ना केवल व्यक्तिगत नैतिकता का सवाल नहीं, बल्कि कांग्रेस की चुनावी रणनीति के लिए भी बड़ा राजनीतिक संदेश है।
रावत लंबे समय से उत्तराखंड कांग्रेस के सबसे प्रभावशाली और अनुभवी चेहरों में रहे हैं। पार्टी की चुनावी राजनीति में उनका प्रभाव, पहाड़ और मैदान के बीच राजनीतिक संतुलन साधने की उनकी क्षमता और कार्यकर्ताओं के बीच उनकी पकड़ कांग्रेस की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। कांग्रेस की उत्तराखंड प्रदेश चुनाव समिति में भी रावत का नाम शामिल रहा है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या रावत का पदों से हटना कांग्रेस के लिए नैतिक दबाव कम करेगा या चुनावी मैदान में उसके सामने नया संकट खड़ा करेगा?
रावत ने अपने सहयोगी पर लगे आरोपों को लेकर अविश्वास जताया है। उनका कहना है कि वह आरोपों पर विश्वास नहीं करते, लेकिन यदि जांच में उनकी ओर से कोई गलती साबित होती है तो उसके लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। उन्होंने मौजूदा घटनाक्रम को उनके और उनके सहयोगियों के खिलाफ राजनीतिक नैरेटिव तैयार करने की कोशिश के रूप में भी देखा है। यही वह बिंदु है जहां रावत का इस्तीफा महज संगठनात्मक निर्णय न रहकर राजनीतिक संदेश बन जाता है। एक तरफ वह अपने सहयोगी के बचाव में खड़े दिखाई दे रहे हैं, दूसरी तरफ पद छोड़कर जांच से अपने राजनीतिक कद को अलग रखने की कोशिश कर रहे हैं।
2027 का चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आएगा, 2016 की कांग्रेस सरकार का कार्यकाल भाजपा के निशाने पर रहना तय माना जा रहा है। भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं का मुद्दा पहले ही उत्तराखंड की राजनीति में युवाओं के बीच संवेदनशील विषय बन चुका है। ऐसे में ईडी की कार्रवाई और उसके बाद रावत का इस्तीफा भाजपा को कांग्रेस पर हमला करने के लिए नया राजनीतिक हथियार दे सकता है। भाजपा इसे कांग्रेस शासनकाल की व्यवस्था पर सवाल के रूप में पेश कर सकती है, जबकि कांग्रेस के सामने चुनौती होगी कि वह जांच को राजनीतिक प्रतिशोध के आरोपों से जोड़ते हुए अपनी राजनीतिक जमीन बचाए।
सबसे बड़ा सवाल अब कांग्रेस के भीतर उठेगा। पार्टी पहले ही 2027 के लिए सरकार के खिलाफ बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं, कानून-व्यवस्था, एसआईआर और जनसरोकार के मुद्दे उठाने की तैयारी में है। ऐसे समय में उसके सबसे वरिष्ठ नेताओं में से एक का नाम एक जांच के राजनीतिक प्रभाव में आना पार्टी की धार को कमजोर कर सकता है। दूसरा सवाल नेतृत्व को लेकर है। क्या कांग्रेस हरीश रावत के प्रभाव से बाहर निकलकर नई पीढ़ी के नेतृत्व को आगे करेगी या रावत अब भी पार्टी की चुनावी रणनीति के केंद्र में बने रहेंगे?
रावत का यह कदम उत्तराखंड कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति के लिए भी महत्वपूर्ण है। पिछले कई वर्षों से कांग्रेस की राजनीति में रावत का प्रभाव और पार्टी के दूसरे धड़ों के साथ उनका समीकरण चर्चा में रहा है। अब जब विधानसभा चुनाव सिर पर हैं, उनका पद छोड़ना पार्टी के भीतर नेतृत्व, उम्मीदवार चयन और चुनावी रणनीति को प्रभावित कर सकता है। हालांकि इसे कांग्रेस छोड़ने के संकेत के रूप में देखना अभी जल्दबाजी होगी। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक रावत ने पार्टी के पदों से इस्तीफे की पेशकश की है, कांग्रेस की सदस्यता से नहीं। लेकिन राजनीतिक रूप से संदेश साफ हैकृ2016 की परछाइयां एक बार फिर 2027 के चुनावी मैदान तक पहुंच गई हैं। ईडी की कार्रवाई ने पुराने भर्ती प्रकरण को फिर राजनीतिक विमर्श के केंद्र में ला दिया है और रावत के इस्तीफे ने इसे और बड़ा बना दिया है।
अब जांच एजेंसियां अपना काम करेंगी, लेकिन उत्तराखंड की राजनीति में असली लड़ाई उस नैरेटिव की होगी जिसमें एक तरफ कांग्रेस इसे राजनीतिक प्रतिशोध बताएगी और दूसरी तरफ भाजपा इसे भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई के रूप में पेश करेगी। 2027 की जंग से पहले रावत का पद छोड़ना कांग्रेस के लिए सिर्फ एक इस्तीफा नहीं, बल्कि अपने सबसे अनुभवी चेहरे के राजनीतिक कवच पर आया बड़ा दबाव है।
रावत के सियासी ‘कुनबे’ पर ईडी की चोट
यूकेएसएसएससी केस ने फिर खोला 2016 का पन्ना,हरीश रावत के दौर की फाइल फिर खुली
पूर्व ओएसडी के ठिकाने पर छापे में 32 लाख नकद, सोना और लग्जरी घड़ियों की बरामदगी का दावा
भर्ती परीक्षा की कथित अनियमितताओं से जुड़े मामले ने 2027 से पहले बढ़ाई कांग्रेस की मुश्किलें
रावत बोले-आरोपों पर विश्वास नहीं, गलती साबित हुई तो जिम्मेदारी मेरी भी
भाजपा के हाथ लगा कांग्रेस के पुराने शासनकाल पर वार का नया हथियार
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में हरीश रावत के दौर की फाइल एक बार फिर खुल गई है। 2016 की ग्राम विकास अधिकारी परीक्षा में कथित अनियमितताओं से जुड़े मामले में प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई ने पूर्व मुख्यमंत्री के राजनीतिक कुनबे को सीधे कठघरे में ला खड़ा किया है। रावत के पूर्व ओएसडी और निजी सहायक रहे चंदन सिंह जीना के ठिकाने पर ईडी की छापेमारी में 32 लाख रुपये नकद, सोना और महंगी घड़ियां समेत अन्य कीमती सामान मिलने की रिपोर्ट सामने आई है। सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल यह नहीं है कि ईडी की कार्रवाई में क्या मिला। असली सवाल यह है कि जिस दौर की भर्ती प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं, उस दौर में सत्ता के सबसे नजदीकी लोगों की भूमिका आखिर कितनी दूर तक जाती है?
रावत ने आरोपों को खारिज करते हुए अपने सहयोगी का बचाव किया है। उनका कहना है कि उन्हें जीना के खिलाफ लगाए गए आरोपों पर विश्वास नहीं है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा है कि यदि उनकी ओर से कोई गलती साबित होती है तो उन्हें उसकी जिम्मेदारी लेनी चाहिए। हरीश रावत उत्तराखंड कांग्रेस के सबसे बड़े और अनुभवी चेहरों में हैं। इसलिए उनके पूर्व ओएसडी से जुड़ी ईडी कार्रवाई का राजनीतिक असर महज किसी सहयोगी की जांच तक सीमित नहीं रहेगा। 2016 की परीक्षा, तत्कालीन कांग्रेस सरकार और रावत के सत्ता काल का संदर्भ एक साथ सामने आने से भाजपा को कांग्रेस के पुराने शासन पर सीधा हमला करने का अवसर मिल गया है।
2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी के बीच यह घटनाक्रम कांग्रेस के लिए असहज करने वाला है। जिस पार्टी को भर्ती घोटालों और युवाओं के मुद्दे पर भाजपा को घेरना था, उसी के सबसे वरिष्ठ नेता से जुड़े राजनीतिक घेरे में अब जांच एजेंसी की कार्रवाई चर्चा का विषय बन गई है। ईडी की कार्रवाई में कथित रूप से नकदी, सोना और महंगी घड़ियां मिलने की खबर ने मामले को और राजनीतिक रंग दे दिया है। रिपोर्टों में 32 लाख रुपये नकद और करीब 200 ग्राम सोने की बरामदगी का भी उल्लेख है।
हालांकि इन संपत्तियों का स्रोत क्या है और इनका यूकेएसएसएससी प्रकरण से कोई प्रत्यक्ष संबंध है या नहीं, यह जांच का विषय है। बरामदगी को दोष सिद्धि मानना जल्दबाजी होगी, लेकिन इतनी बड़ी कार्रवाई ने राजनीतिक सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं और यही सवाल रावत के सामने सबसे कठिन चुनौती बनकर खड़ा हैकृकि क्या उनके बेहद करीबी रहे व्यक्ति की भूमिका सिर्फ संयोग है या जांच किसी बड़े नेटवर्क तक पहुंचेगी?
घटनाक्रम के बीच रावत द्वारा कांग्रेस के पदों से इस्तीफे की पेशकश ने मामले को और राजनीतिक वजन दे दिया। रिपोर्टों के मुताबिक उन्होंने कांग्रेस के दो संगठनात्मक पदों से इस्तीफा दिया है। यानी एक तरफ रावत अपने सहयोगी पर लगे आरोपों पर विश्वास नहीं करने की बात कह रहे हैं, दूसरी तरफ राजनीतिक जिम्मेदारी से पीछे हटने का संदेश भी दे रहे हैं। यहीं से कांग्रेस के भीतर भी सवाल उठना स्वाभाविक हैकृअगर आरोप बेबुनियाद हैं तो इस्तीफे की जरूरत क्यों पड़ी और अगर राजनीतिक जिम्मेदारी स्वीकार की जा रही है तो जांच के निष्कर्ष का इंतजार क्यों नहीं?
उत्तराखंड की राजनीति में भर्ती घोटाले सबसे संवेदनशील मुद्दों में रहे हैं। युवाओं के बीच सरकारी नौकरियों की परीक्षा में पारदर्शिता बड़ा राजनीतिक प्रश्न है। ऐसे में 2016 की परीक्षा से जुड़ी ईडी कार्रवाई को भाजपा निश्चित रूप से चुनावी मुद्दा बनाएगी। भाजपा का हमला सीधा होगाकृकि जिस कांग्रेस शासनकाल में परीक्षा हुई, उसी दौर के मुख्यमंत्री के करीबी पर अब जांच एजेंसी की कार्रवाई क्यों हो रही है? कांग्रेस के पास इसका राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर जवाब देना होगा।
इस पूरे प्रकरण को केवल हरीश रावत बनाम भाजपा की लड़ाई बना देना भी जांच के मूल सवाल को छोटा कर देगा। असली सवाल यह है कि सरकारी भर्ती व्यवस्था में कथित गड़बड़ियों का नेटवर्क कितना गहरा था और उसमें किस-किस स्तर के लोगों की भूमिका थी। यदि जांच में रावत या उनके किसी सहयोगी की कोई भूमिका सामने आती है तो कानून को अपना काम करना चाहिए। यदि आरोप राजनीतिक या तथ्यहीन साबित होते हैं तो जांच के बाद स्थिति भी साफ होनी चाहिए। लेकिन फिलहाल इतना जरूर है कि 2016 का वह अध्याय, जिसे उत्तराखंड की राजनीति पीछे छोड़ देना चाहती थी, 2027 के चुनाव से ठीक पहले फिर सामने खड़ा है और इस बार सवाल केवल भर्ती परीक्षा का नहीं है।
सवाल यह है कि सत्ता के गलियारों में किसकी पहुंच कितनी थी, किसने उस पहुंच का इस्तेमाल किया और उस दौर की राजनीतिक जवाबदेही आखिर तय होगी या फिर फाइलों के साथ सवाल भी दफन हो जाएंगे? रावत के सामने अब राजनीतिक चुनौती दोहरी हैकृकि सहयोगी का बचाव भी करना है और उस दौर की सत्ता पर उठ रहे सवालों का जवाब भी देना है।
उत्तराखंड की सियासत के गढ़ में एनएसयूआई ने गाड़ा झंडा
छात्र राजनीति के मैदान से 2027 की सियासी पिच तैयार करने में जुटी कांग्रेस
बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं, छात्र हितों के मुद्दों को हथियार बनाएगी एनएसयूआई
भाजपा के मजबूत राजनीतिक आधार में युवा वोट बैंक को चुनौती देने की तैयारी
देहरादून। उत्तराखंड की सियासत में जहां 2027 के विधानसभा चुनाव की बिसात बिछनी शुरू हो चुकी है, वहीं कांग्रेस ने सत्ता की लड़ाई से पहले छात्र राजनीति के मैदान में अपनी जमीन मजबूत करने की कवायद तेज कर दी है। कांग्रेस की छात्र इकाई एनएसयूआई ने प्रदेश के छात्र राजनीति के गढ़ों में संगठनात्मक सक्रियता बढ़ाते हुए युवाओं के बीच अपनी पैठ बनाने का दावा किया है। संगठन का लक्ष्य केवल छात्रसंघ चुनाव तक सीमित नहीं, बल्कि आने वाले विधानसभा चुनाव के लिए युवा नेतृत्व की नई फौज तैयार करना भी माना जा रहा है।
उत्तराखंड की राजनीति में छात्र राजनीति की भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण रही है। विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों से निकले छात्र नेता आगे चलकर मुख्यधारा की राजनीति में पहुंचे हैं। यही वजह है कि एनएसयूआई की सक्रियता को कांग्रेस के लिए महज संगठनात्मक गतिविधि नहीं, बल्कि भविष्य की सियासी निवेश रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। एनएसयूआई का फोकस छात्रसंघ चुनावों में प्रभाव बढ़ाने के साथ युवाओं के उन मुद्दों को राजनीतिक आवाज देने पर है, जो प्रदेश की राजनीति में लगातार बड़ा सवाल बन रहे हैं। सरकारी भर्तियों में पारदर्शिता, बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता, शिक्षा की गुणवत्ता और युवाओं के पलायन जैसे मुद्दे कांग्रेस की छात्र इकाई के एजेंडे में प्रमुखता से रखे जा रहे हैं।
कांग्रेस के लिए यह रणनीति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उत्तराखंड में युवा मतदाता चुनावी परिणामों को प्रभावित करने वाली बड़ी ताकत है। जिस संगठन की छात्र परिसरों में पकड़ मजबूत होगी, उसके पास भविष्य की राजनीति के लिए कार्यकर्ताओं और नेताओं का मजबूत आधार तैयार करने का अवसर भी होगा। उत्तराखंड में लंबे समय से भाजपा का संगठनात्मक नेटवर्क मजबूत माना जाता है। ऐसे में एनएसयूआई की सक्रियता का एक बड़ा राजनीतिक अर्थ यह भी है कि कांग्रेस भाजपा के मजबूत माने जाने वाले सामाजिक और युवा आधार में सेंध लगाने की कोशिश कर रही है।
कांग्रेस के सामने चुनौती केवल भाजपा को चुनाव में हराने की नहीं है। उसे बूथ स्तर तक मजबूत संगठन खड़ा करना है और इसके लिए छात्र राजनीति से निकलने वाले कार्यकर्ता महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। यही कारण है कि एनएसयूआई की गतिविधियों को कांग्रेस के 2027 मिशन की शुरुआती प्रयोगशाला के रूप में भी देखा जा सकता है। उत्तराखंड में सरकारी नौकरी युवाओं की राजनीति का सबसे संवेदनशील मुद्दा है। भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं और पेपर लीक के मामलों ने युवाओं में व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े किए हैं। एनएसयूआई इसी असंतोष को राजनीतिक मुद्दे में बदलने की तैयारी में है। संगठन यदि छात्र परिसरों से निकलकर भर्ती परीक्षाओं और रोजगार के सवाल को व्यापक युवा आंदोलन का रूप देने में सफल होता है तो इसका असर सीधे 2027 की राजनीति पर पड़ सकता है। कांग्रेस के लिए यह भाजपा सरकार को घेरने का मौका भी है और अपने संगठन को पुनर्जीवित करने का माध्यम भी।
एनएसयूआई की सबसे बड़ी राजनीतिक उपयोगिता कांग्रेस के लिए यह हो सकती है कि इससे पार्टी को नई पीढ़ी का नेतृत्व मिल सके। उत्तराखंड कांग्रेस में लंबे समय से पुराने और स्थापित चेहरों का प्रभाव रहा है। ऐसे में छात्र राजनीति से आने वाले नए नेताओं को आगे बढ़ाना पार्टी के लिए संगठनात्मक बदलाव का रास्ता खोल सकता है। लेकिन इसके लिए एनएसयूआई को केवल चुनावी पोस्टर और नारों से आगे बढ़ना होगा। परिसरों में छात्र समस्याओं पर लगातार संघर्ष, संवाद और संगठनात्मक उपस्थिति ही उसे स्थायी राजनीतिक ताकत दे सकती है।
एनएसयूआई ने अगर छात्र राजनीति के मैदान में अपना झंडा गाड़ा है तो अब असली परीक्षा उसे टिकाए रखने की है। छात्रसंघ चुनाव में जीत हासिल करना एक उपलब्धि हो सकती है, लेकिन उसे विधानसभा चुनाव तक राजनीतिक ऊर्जा में बदलना अलग चुनौती है। 2027 की सियासत में बेरोजगारी, भर्ती, पलायन, शिक्षा और युवाओं की भागीदारी जैसे मुद्दे निर्णायक हो सकते हैं। ऐसे में एनएसयूआई कांग्रेस के लिए युवा असंतोष को राजनीतिक संगठन में बदलने का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम बन सकती है। उत्तराखंड की राजनीति में सत्ता का रास्ता भले ही विधानसभा से होकर गुजरता हो, लेकिन उस रास्ते की पहली राजनीतिक सीढ़ी विश्वविद्यालय और महाविद्यालयों के परिसर भी बन सकते हैं और कांग्रेस ने शायद इसी सियासी गणित को पढ़ते हुए छात्र राजनीति के मैदान में अपना झंडा पहले ही गाड़ने की तैयारी शुरू कर दी है।
कांग्रेस को लगा ‘सियासी’ नेत्र रोग
विकास दिखता तो दुष्प्रचार की जरूरत नहीं पड़ती
भाजपा का पलटवार-जमीन पर चहुंमुखी विकास
कांग्रेस को उपलब्धियां नजर नहीं आ रहीं आजकल
सुविधाएं पहुंचाने को बताया सरकार का मूल मंत्र
देहरादून। कांग्रेस के लगातार सरकार पर हमलावर होने के बीच भाजपा ने पलटवार करते हुए विपक्ष पर तीखा हमला बोला है। भाजपा का कहना है कि कांग्रेस को अब राजनीतिक नेत्र रोग हो गया है। यही वजह है कि उसे जमीन पर दिखाई दे रहा चहुंमुखी विकास नजर नहीं आ रहा। भाजपा के अनुसार प्रदेश में सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, कनेक्टिविटी, रोजगार, महिला सशक्तीकरण, पर्यटन और आधारभूत ढांचे से जुड़े क्षेत्रों में लगातार काम हो रहा है, लेकिन कांग्रेस इन उपलब्धियों को देखने के बजाय राजनीतिक चश्मे से केवल कमियां तलाशने में जुटी है।
भाजपा का कहना है कि विपक्ष का काम सवाल उठाना है, लेकिन सवाल और दुष्प्रचार में अंतर होता है। कांग्रेस यदि सरकार के कामकाज पर तथ्य आधारित सवाल उठाती है तो सरकार उसका जवाब देने के लिए तैयार है, लेकिन हर विकास कार्य को नकारना और हर उपलब्धि में राजनीति तलाशना जनता को गुमराह करने की कोशिश है। भाजपा का दावा है कि वह कांग्रेस की इस रणनीति का जवाब आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि अपनी विकास की लकीर को और लंबा करके देगी।
भाजपा ने अपने राजनीतिक नैरेटिव के केंद्र में समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को रखा है। पार्टी का कहना है कि विकास का वास्तविक पैमाना केवल बड़े प्रोजेक्ट और चमकती सड़कें नहीं हैं, बल्कि यह देखना भी जरूरी है कि सरकारी योजनाओं का लाभ उस व्यक्ति तक पहुंच रहा है या नहीं, जिसके पास संसाधन सबसे कम हैं। भाजपा के अनुसार गरीब, किसान, महिला, युवा, बुजुर्ग और दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों तक सुविधाओं और योजनाओं की पहुंच बढ़ाने पर सरकार का जोर है। पार्टी इसे महज चुनावी घोषणा नहीं बल्कि शासन की कार्यशैली का हिस्सा बता रही है।
भाजपा का सीधा आरोप है कि कांग्रेस विकास के सवाल को राजनीतिक संघर्ष में बदलने की कोशिश कर रही है। पार्टी का कहना है कि विपक्ष को प्रदेश में हो रहे काम दिखाई देने चाहिए, लेकिन कांग्रेस का पूरा फोकस सरकार की आलोचना पर है। भाजपा नेताओं का तर्क है कि यदि विपक्ष सरकार की किसी योजना में कमी बताता है तो उस पर चर्चा हो सकती है, लेकिन हर काम को नकार देना प्रदेश की जनता के साथ भी अन्याय है। पार्टी का कहना है कि जनता अब दावों से अधिक काम को देख रही है और आने वाले समय में वही राजनीतिक फैसला करेगी।
हालांकि कांग्रेस सरकार के इन दावों को स्वीकार करने के बजाय बेरोजगारी, महंगाई, पलायन, भर्ती परीक्षाओं, कानून-व्यवस्था, मूल निवास और भू-कानून जैसे मुद्दों पर सरकार को लगातार घेर रही है। विपक्ष का तर्क है कि केवल योजनाओं की घोषणा और बड़े विकास प्रोजेक्टों से जनता की समस्याएं खत्म नहीं होतीं। ऐसे में भाजपा का चहुंमुखी विकास वाला दावा कांग्रेस के लिए राजनीतिक चुनौती है तो कांग्रेस के लगातार सवाल भाजपा के लिए जवाबदेही की कसौटी।
यही वजह है कि उत्तराखंड की सियासत अब एक दिलचस्प मुकाम पर पहुंचती दिखाई दे रही है। एक तरफ भाजपा विकास कार्यों को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि बताकर जनता के बीच जाने की तैयारी कर रही है, वहीं कांग्रेस सरकार के दावों की जमीन पर पड़ताल करने और कमियां गिनाने की रणनीति पर आगे बढ़ रही है। भाजपा का संकेत साफ है कि वह कांग्रेस के हर आरोप का जवाब देने में अपनी राजनीतिक ऊर्जा खर्च करने के बजाय विकास को अपना मुख्य चुनावी हथियार बनाना चाहती है। पार्टी का मानना है कि चुनावी राजनीति में सबसे प्रभावी जवाब वही है, जिसे जनता अपनी आंखों से देख सके और अपने जीवन में महसूस कर सके।
इसी सोच के तहत भाजपा कांग्रेस के आरोपों को दुष्प्रचार बताते हुए अपनी उपलब्धियों को गांव, गरीब और अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने पर जोर दे रही है। पार्टी का दावा है कि उसकी राजनीति का लक्ष्य विपक्ष की लकीर छोटी करना नहीं, बल्कि अपनी लकीर इतनी बड़ी करना है कि विरोधियों के आरोप उसके सामने बौने साबित हों। सियासी संदेश साफ है- कांग्रेस जहां सरकार के काम पर सवालों की रोशनी डाल रही है, वहीं भाजपा जनता के बीच विकास के कामों की तस्वीर लेकर जाने की तैयारी में है। अब असली परीक्षा इस बात की होगी कि 2027 की चुनावी चौखट पर जनता को किसकी तस्वीर ज्यादा साफ दिखाई देती है कि विपक्ष के सवालों की या सत्ता के विकास दावों की।
शुक्रवार, 11 सितंबर 2026
udaydinmaan: ‘जेन-जी’ की ताकत से बदल दी ‘सियासत’
udaydinmaan: ‘जेन-जी’ की ताकत से बदल दी ‘सियासत’: अब देशभर में नेता युवाओं की चौखट पर दे रहे हैं दस्तक नेपाल से उठी आवाज ने दुनिया के नेताओं को दिया नया संदेश सत्ता की राजनीति में सोशल मीडिय...
‘जेन-जी’ की ताकत से बदल दी ‘सियासत’
अब देशभर में नेता युवाओं की चौखट पर दे रहे हैं दस्तक
नेपाल से उठी आवाज ने दुनिया के नेताओं को दिया नया संदेश
सत्ता की राजनीति में सोशल मीडिया पीढ़ी की बढ़ती दखल
देहरादून। जिस जेन-जी को कुछ साल पहले तक राजनीति से दूर, मोबाइल और सोशल मीडिया में उलझी पीढ़ी माना जाता था, आज वही पीढ़ी सत्ता के गलियारों में सबसे बड़ा सवाल बनकर खड़ी है। नेपाल में युवाओं के आक्रोश और राजनीतिक व्यवस्था के खिलाफ उठी आवाज ने जिस तरह सत्ता को चुनौती दी, उसने सिर्फ पड़ोसी देशों की राजनीति को नहीं झकझोरा, बल्कि दुनिया के राजनीतिक दलों को भी अपने भविष्य की रणनीति पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है। संदेश साफ हैकृअब नेता सिर्फ मंच से युवाओं को संबोधित करके काम नहीं चला सकते, उन्हें जेन-जी की चौखट तक जाना होगा।
नेपाल का घटनाक्रम इस बदलाव का सबसे ताजा उदाहरण है। भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, राजनीतिक अस्थिरता और जवाबदेही जैसे मुद्दों पर युवाओं की नाराजगी ने पारंपरिक राजनीतिक समीकरणों को चुनौती दी। सोशल मीडिया के जरिए तेजी से संगठित होने वाली इस पीढ़ी ने दिखा दिया कि चुनावी राजनीति में संख्या महत्वपूर्ण है, लेकिन डिजिटल दौर में असंतोष की गति और उसकी पहुंच उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकती है। जेन-जी को लंबे समय तक राजनीतिक दलों के लिए भविष्य का वोट बैंक माना जाता रहा। लेकिन नेपाल सहित विभिन्न देशों के घटनाक्रम ने इस धारणा को बदल दिया है। यह पीढ़ी अब सिर्फ वोट देने वाली नहीं, बल्कि राजनीतिक मुद्दे तय करने, सरकार से सवाल पूछने और नेताओं की सार्वजनिक छवि बनाने-बिगाड़ने वाली ताकत बनती जा रही है।
यही कारण है कि राजनीतिक दलों की भाषा भी बदल रही है। नेताओं के भाषणों में रोजगार, डिजिटल स्वतंत्रता, शिक्षा, पारदर्शिता, भ्रष्टाचार और अवसर जैसे मुद्दों की जगह बढ़ रही है। राजनीतिक अभियान भी अब केवल रैलियों और पोस्टरों तक सीमित नहीं हैं। इंस्टाग्राम, यूट्यूब, फेसबुक, एक्स और अन्य डिजिटल मंच राजनीतिक संवाद के नए अखाड़े बन चुके हैं। जेन-जी की राजनीति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह सिर्फ घोषणाओं से संतुष्ट नहीं होती। वह सवाल पूछती हैकृकब? कैसे? किसके लिए? और जवाबदेही किसकी?
युवा पीढ़ी पारंपरिक राजनीतिक भाषणों और जुमलों की बजाय सीधे परिणाम देखना चाहती है। यही वजह है कि सत्ता में बैठे नेताओं के लिए अब सोशल मीडिया सिर्फ प्रचार का माध्यम नहीं रह गया है। वहां हर निर्णय की तत्काल प्रतिक्रिया होती है और राजनीतिक संदेश कुछ ही घंटों में व्यापक जनमत का रूप ले सकता है। इस बदलाव ने नेताओं के सामने नई मजबूरी पैदा की है। उन्हें अब जेन-जी को सिर्फ चुनाव के समय याद करने के बजाय लगातार उसके साथ संवाद करना पड़ रहा है।
नेपाल में जेन-जी की राजनीतिक सक्रियता ने दक्षिण एशिया में एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा किया हैकृकि क्या आने वाले चुनावों में युवा असंतोष पारंपरिक दलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनने जा रहा है? भारत समेत कई देशों में राजनीतिक दल पहले ही युवा मतदाताओं को साधने के लिए डिजिटल अभियान, युवा संवाद और सोशल मीडिया केंद्रित राजनीति को प्राथमिकता दे रहे हैं। लेकिन नेपाल के घटनाक्रम ने इस रणनीति को और गंभीर बना दिया है। अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि नेता युवाओं तक कैसे पहुंचेंगे। असली सवाल यह है कि क्या राजनीतिक दल जेन-जी के सवालों का जवाब देने के लिए अपने पुराने राजनीतिक तौर-तरीके बदलने को तैयार हैं?
इस पीढ़ी की अपेक्षा केवल रोजगार या विकास योजनाओं तक सीमित नहीं है। वह निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी, पारदर्शिता, संस्थाओं की जवाबदेही और भ्रष्टाचार पर कठोर कार्रवाई चाहती है। वह यह भी चाहती है कि राजनीति में उसकी आवाज केवल चुनावी आंकड़ों के रूप में नहीं, बल्कि नीति निर्माण में दिखाई दे। यही वह बिंदु है जहां पारंपरिक राजनीति और जेन-जी के बीच सबसे बड़ा टकराव दिखाई देता है। राजनीतिक दल जहां संगठन, नेतृत्व और सत्ता के पुराने ढांचे के जरिए राजनीति को देखते हैं, वहीं जेन-जी अधिक विकेंद्रित, त्वरित और सवाल पूछने वाली राजनीति की तरफ बढ़ रही है।
नेपाल की घटनाओं ने भारत के राजनीतिक दलों को भी एक संकेत दिया है। उत्तराखंड जैसे राज्यों में जहां बड़ी संख्या में युवा रोजगार, पलायन, शिक्षा, भर्ती परीक्षाओं और स्थानीय अवसरों को लेकर सवाल उठाते हैं, वहां जेन-जी की भूमिका आने वाले चुनावों में महत्वपूर्ण हो सकती है। 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी कर रहे दलों के लिए भी यह महज सोशल मीडिया अभियान का विषय नहीं है। युवा मतदाता क्या सोच रहा है, वह किस मुद्दे पर नाराज है और वह राजनीतिक दलों से क्या अपेक्षा करता हैकृयह चुनावी रणनीति का केंद्रीय सवाल बन सकता है। अब नेताओं की चौखट पर जेन-जी को बुलाने का दौर खत्म होता दिख रहा है। जेन-जी की चौखट पर नेताओं के पहुंचने का दौर शुरू हो चुका है।
इतिहास बनाम अस्मिता की जंग
नितिन नवीन के हमले के बाद कांग्रेस का पलटवार
विधानसभा चुनाव से पहले बढ़ गया राजनीतिक पारा
भाजपा अध्यक्ष ने कांग्रेस के इतिहास पर उठाए सवाल
कांग्रेस पार्टी ने भाजपा से घटना पर सीधा जवाब मांगा
देहरादून। हल्द्वानी के रामलीला मैदान में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की सभा के बाद हुए कथित शुद्धिकरण को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच शुरू हुआ विवाद अब सीधे राजनीतिक टकराव में बदल गया है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने हल्द्वानी पहुंचकर कांग्रेस पर दलितों के अपमान का आरोप लगाया और कहा कि जिस कांग्रेस का इतिहास दलितों के अपमान का रहा हो, वह सम्मान की बात नहीं कर सकती।
नितिन नवीन के इस हमले पर कांग्रेस ने पलटवार करते हुए सवाल खड़ा किया है कि मुद्दा कांग्रेस के इतिहास का है या हल्द्वानी में खरगे की सभा के बाद हुए शुद्धिकरण का? कांग्रेस का कहना है कि भाजपा को इतिहास के पन्ने पलटने के बजाय पहले यह स्पष्ट करना चाहिए कि सार्वजनिक मंच का शुद्धिकरण किस मानसिकता और संदेश के साथ किया गया।
विवाद अब केवल एक कार्यक्रम के बाद किए गए धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं रह गया है। कांग्रेस इसे दलित अस्मिता और संवैधानिक समानता से जोड़ रही है, जबकि भाजपा कांग्रेस पर इस प्रकरण को राजनीतिक रंग देने और धार्मिक भावनाओं से जुड़े मुद्दे पर राजनीति करने का आरोप लगा रही है। इससे आगामी विधानसभा चुनाव से पहले दोनों दलों के बीच वैचारिक टकराव और तेज हो गया है। नितिन नवीन ने प्रदेश कार्यसमिति की बैठक के दौरान कांग्रेस पर हमला बोलते हुए शुद्धिकरण विवाद को कांग्रेस के दलित विरोधी इतिहास से जोड़ने की कोशिश की। भाजपा का तर्क है कि कांग्रेस इस मुद्दे को राजनीतिक हथियार बनाकर समाज को बांटने का प्रयास कर रही है। लेकिन कांग्रेस ने भाजपा के इस तर्क को मुद्दे से भटकाने की कोशिश करार दिया है। पार्टी का कहना है कि अगर घटना गलत नहीं थी तो जांच और जवाबदेही से भाजपा को परेशानी क्यों हो रही है?
कांग्रेस का हमला सीधा हैकृखरगे के मंच पर शुद्धिकरण क्यों हुआ? इसके पीछे कौन था? इसका संदेश क्या था? कांग्रेस पहले ही इस घटना को सामाजिक भेदभाव और दलित सम्मान से जोड़कर विरोध दर्ज करा चुकी है। पार्टी ने देहरादून में प्रदर्शन किया और मामले में कार्रवाई की मांग की। मामले में पुलिस ने प्राथमिकी भी दर्ज की है और जांच आगे बढ़ रही है। रिपोर्टों के अनुसार प्राथमिकी में भारतीय न्याय संहिता की धाराओं के साथ अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण कानून की धारा भी लगाई गई है।
यही इस पूरे विवाद का सबसे संवेदनशील पक्ष है। धार्मिक आस्था का सम्मान लोकतंत्र की बुनियादी भावना है, लेकिन आस्था के नाम पर किसी व्यक्ति या समुदाय की सामाजिक प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाने का आरोप लगे तो सवाल संवैधानिक समानता तक पहुंचता है। उत्तराखंड हाई कोर्ट ने फिलहाल पुलिस को मामले की जांच करने देने का रास्ता अपनाया है और राज्य सरकार की ओर से महत्वपूर्ण इलेक्ट्रानिक साक्ष्य सुरक्षित रखने का आश्वासन दर्ज किया गया है। इसलिए राजनीतिक बयानबाजी के बीच असली कसौटी अब जांच होगी। कौन सही है, कौन गलतकृइसका फैसला नारों और मंचों से नहीं, तथ्यों और कानून के आधार पर होना चाहिए।
2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के बीच हल्द्वानी का यह विवाद भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बन चुका है। भाजपा इसे कांग्रेस की कथित तुष्टीकरण और विभाजनकारी राजनीति के खिलाफ मुद्दा बना रही है, जबकि कांग्रेस इसे भाजपा की कथित जातिवादी और सामाजिक विभाजन की राजनीति के उदाहरण के रूप में पेश कर रही है। यानी रामलीला मैदान अब सिर्फ एक मैदान नहीं रहाकृवह भाजपा और कांग्रेस के बीच वैचारिक और चुनावी संघर्ष का नया अखाड़ा बन गया है। सवाल अब यह नहीं कि कौन किस पर कितना बड़ा आरोप लगाता है। सवाल यह है कि राजनीति आस्था की रक्षा के नाम पर आगे बढ़ेगी या संविधान की समानता को केंद्र में रखकर? हल्द्वानी का जवाब आने वाले चुनावी विमर्श की दिशा तय कर सकता है।
‘पालिटिकल लैब’ में बिछाई हैट्रिक के लिए ‘बिसात’
संगठन से सामाजिक समीकरण तक साधने की कोशिश की
कमजोर सीटों, युवा और बूथ प्रबंधन पर भाजपा की है नजर
कार्यसमिति के बहाने कुमाऊं में भाजपा ने खोला चुनावी मोर्चा
राष्ट्रीय अध्यक्ष का संदेशकृसंगठन की ताकत ही जीत की गारंटी
देहरादून। उत्तराखंड में 2027 की चुनावी पटकथा लिखे जाने से पहले भाजपा ने कुमाऊं को अपनी राजनीतिक प्रयोगशाला बना दिया है। राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन का हल्द्वानी दौरा इसी रणनीति का संकेत है। प्रदेश कार्यसमिति की बैठक के मंच से संगठन को चुनावी मोड में लाने के साथ ही भाजपा ने कांग्रेस पर वैचारिक और राजनीतिक हमला भी तेज कर दिया। संदेश एकदम स्पष्ट हैकृभाजपा चुनाव का इंतजार करने के बजाय मैदान पहले ही अपने कब्जे में लेने की तैयारी कर रही है।
हल्द्वानी में नितिन नवीन की सक्रियता को केवल संगठनात्मक कार्यक्रम मानना राजनीतिक तौर पर अधूरा आकलन होगा। कुमाऊं में भाजपा के सामने सत्ता की हैट्रिक का लक्ष्य है तो कांग्रेस सत्ता विरोधी माहौल को चुनावी पूंजी बनाने की कोशिश में है। ऐसे में राष्ट्रीय नेतृत्व का सीधे मैदान में उतरना बताता है कि भाजपा हर सीट, हर बूथ और हर सामाजिक समीकरण की नए सिरे से पड़ताल कर रही है।
भाजपा के लिए कुमाऊं का महत्व सीटों के आंकड़े से कहीं बड़ा है। यह क्षेत्र कांग्रेस की परंपरागत राजनीतिक जमीन भी रहा है और कई विधानसभा क्षेत्रों में स्थानीय समीकरण चुनाव का रुख बदलते रहे हैं। यही कारण है कि भाजपा अब संगठन की पकड़ को मजबूत करने के साथ-साथ उन सीटों पर भी फोकस बढ़ा रही है जहां मुकाबला आसान नहीं माना जाता। नितिन नवीन की मौजूदगी में संगठन को जो संदेश गया, उसका सार यही है कि अब टिकट केवल दावेदारी से नहीं, जमीन पर ताकत से तय होगा।
स्थानीय स्तर पर सक्रियता, बूथ की स्थिति, जनता के बीच स्वीकार्यता और संगठन के साथ तालमेलकृइन सभी कसौटियों पर नेताओं की राजनीतिक उपयोगिता परखी जाएगी। यह संदेश मौजूदा विधायकों के लिए भी है और टिकट की कतार में खड़े नए चेहरों के लिए भी। भाजपा की चुनावी रणनीति का एक महत्वपूर्ण पहलू टिकट वितरण है। पार्टी पहले ही संगठनात्मक ढांचे को बूथ स्तर तक मजबूत करने और कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने पर जोर दे रही है। नितिन नवीन के दौरे ने इस रणनीति को और राजनीतिक वजन दिया है।
इसका सीधा अर्थ है कि 2027 में टिकट की दौड़ में केवल बड़े नाम पर्याप्त नहीं होंगे। पार्टी यह देखेगी कि कौन नेता अपने क्षेत्र में संगठन को कितना मजबूत कर सकता है और चुनावी मुकाबले में कितनी प्रभावी लड़ाई दे सकता है। यही समीकरण कई पुराने चेहरों के लिए चुनौती बन सकता है। हल्द्वानी में भाजपा अध्यक्ष का कांग्रेस पर हमला भी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा। खासकर रामलीला मैदान के कथित शुद्धिकरण विवाद के बीच दलित सम्मान और कांग्रेस के इतिहास को लेकर नितिन नवीन के बयान ने राजनीतिक तापमान और बढ़ा दिया। भाजपा ने जहां कांग्रेस को उसके राजनीतिक इतिहास के आईने में खड़ा करने की कोशिश की, वहीं कांग्रेस इस प्रकरण को सामाजिक सम्मान और संवैधानिक मूल्यों से जोड़कर भाजपा पर पलटवार कर रही है। यानी हल्द्वानी का मैदान अब सिर्फ एक विवाद का केंद्र नहीं, बल्कि 2027 की राजनीतिक कथा गढ़ने का अखाड़ा बनता जा रहा है।
भाजपा की अगली चुनौती युवा मतदाता है। रोजगार, भर्ती परीक्षाएं, पलायन, शिक्षा और स्थानीय अवसरों से जुड़े सवाल उत्तराखंड की राजनीति में लगातार प्रभावी रहे हैं। नितिन नवीन के दौरे में युवा संवाद को महत्व दिया जाना बताता है कि पार्टी इस वर्ग को केवल चुनावी आंकड़े के तौर पर नहीं देख रही, बल्कि उसके असंतोष और अपेक्षाओं को समझने की कोशिश कर रही है। जिस युवा के हाथ में मोबाइल है, वही चुनावी नैरेटिव बदलने की क्षमता भी रखता है। भाजपा जानती है कि बूथ की मशीनरी और डिजिटल नैरेटिवकृदोनों को साथ साधे बिना अगला चुनाव आसान नहीं होगा।
कुमाऊं में पूर्व सैनिक परिवारों का प्रभाव भी चुनावी समीकरणों में महत्वपूर्ण है। ऐसे में पूर्व सैनिकों के साथ संवाद और संगठनात्मक सक्रियता को भी भाजपा की व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। एक तरफ सरकार की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने की तैयारी है, दूसरी तरफ संगठन को बूथ स्तर पर सक्रिय किया जा रहा है। यही वह माडल है, जिसके सहारे भाजपा सत्ता विरोधी संभावित लहर को संगठन की ताकत से काटना चाहती है। कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं कि भाजपा मैदान में है। चुनौती यह है कि भाजपा कितनी जल्दी मैदान में उतर गई है।
कांग्रेस अभी जहां मुद्दों और सरकार विरोधी माहौल को मजबूत करने की कोशिश कर रही है, वहीं भाजपा संगठनात्मक मशीनरी को चुनावी अभियान में बदलने में जुटी है। राष्ट्रीय नेतृत्व की लगातार सक्रियता भी इसी ओर संकेत कर रही है। कांग्रेस यदि भाजपा के खिलाफ केवल सरकार की नाकामियों का आरोप लगाकर चुनाव लड़ने की रणनीति बनाती है तो उसे भाजपा की जमीनी तैयारी का जवाब देने के लिए अपना संगठन भी उसी स्तर पर सक्रिय करना होगा।
नितिन नवीन का हल्द्वानी दौरा भाजपा की चुनावी तैयारी का सिर्फ एक पड़ाव नहीं, बल्कि कुमाऊं में 2027 की बिसात बिछाने का संकेत है। अब भाजपा की नजर सिर्फ सत्ता बचाने पर नहीं, उन सीटों पर भी है जहां कांग्रेस उसे चुनौती देने की तैयारी कर रही है। असली मुकाबला अब नारों का नहींकृबूथ, भरोसे और सामाजिक समीकरणों का होगा। कुमाऊं ने करवट ली तो उत्तराखंड का चुनावी गणित भी बदल सकता है।
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मसूरी रोपवे के लिए गढ़वाल सभा को 972 वर्गमीटर भूमि लीज पर देने की मंजूरी
देहरादून। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की अध्यक्षता में शुक्रवार को हुई मंत्रिमंडल की बैठक संपन्न हो गई है। बैठक में कुल 10 महत्वपूर्ण प्रस्तावों पर मुहर लगी है। विधानसभा चुनाव से पहले उत्तराखंड सरकार ने स्वास्थ्य, खेल, न्याय, शिक्षा, पर्यटन और प्रशासनिक सुधार से जुड़े कई महत्वपूर्ण फैसलों पर मुहर लगाई है। शुक्रवार को हुई मंत्रिमंडल की बैठक में राजकीय मेडिकल कालेजों में एमबीबीएस इंटर्न का मासिक स्टाइपेंड 17 हजार से बढ़ाकर न्यूनतम 25 हजार रुपये करने का निर्णय लिया गया। वहीं खेल नीति के तहत अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतने वाले खिलाड़ियों को आउट ऑफ टर्न नियुक्ति देने के लिए विभिन्न विभागों में कुल 243 पदों पर नियुक्ति का रास्ता साफ कर दिया गया है। माध्यमिक शिक्षा विभाग में सहायक अध्यापक व्यायाम के 33 पदों को समर्पित करते हुए लेवल-6 में अपर सहायक अध्यापक व्यायाम के 33 नए पद सृजित करने को भी कैबिनेट ने मंजूरी दी है। इन पदों का उपयोग खेल प्रतिभाओं को आउट ऑफ टर्न सेवायोजन देने के लिए किया जाएगा।
कैबिनेट के निर्णयों की जानकारी देते हुए सूचना महानिदेशक बंशीधर तिवाड़ी ने बताया कि कैबिनेट ने न्यायिक क्षेत्र में भी बड़ा निर्णय लिया है। उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालय नैनीताल और प्रदेश के अधीनस्थ न्यायालयों में आबद्ध सरकारी अधिवक्ताओं को दिए जाने वाले शुल्क की दरों के पुनर्निर्धारण को मंजूरी दी गई है। मुख्य सचिव की अध्यक्षता में गठित सात सदस्यीय समीक्षा समिति के निर्णय के आधार पर अधिवक्ताओं की फीस बढ़ाने का प्रस्ताव स्वीकृत किया गया। उन्होंने बताया कि प्रदेश के पांच राजकीय मेडिकल कालेजों श्रीनगर, हल्द्वानी, देहरादून, हरिद्वार और अल्मोड़ा में एमबीबीएस तथा पीजी पाठ्यक्रम संचालित हो रहे हैं। इन मेडिकल कालेजों में वर्तमान में एमबीबीएस इंटर्न को 17 हजार रुपये प्रतिमाह स्टाइपेंड दिया जा रहा था। कैबिनेट ने इसे बढ़ाकर न्यूनतम 25 हजार रुपये प्रतिमाह करने की मंजूरी दी है। सरकार का तर्क है कि प्रदेश के दुर्गम और दूरस्थ क्षेत्रों तक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच मजबूत करने के लिए चिकित्सा शिक्षा और चिकित्सकीय मानव संसाधन को प्रोत्साहित करना जरूरी है। स्टाइपेंड बढ़ाने का फैसला इंटर्न डाक्टरों के लिए सीधे आर्थिक राहत के साथ मेडिकल शिक्षा क्षेत्र में सरकार की मानव संसाधन नीति के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
इसके साथ ही खेल नीति-2021 के तहत अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय खेलों में पदक विजेता खिलाड़ियों को प्रदेश में राजपत्रित और अराजपत्रित पदों पर आउट ऑफ टर्न सेवायोजन देने का प्रावधान है। कैबिनेट ने खेल विभाग, युवा कल्याण, गृह, परिवहन, शिक्षा और वन विभाग के अंतर्गत कुल 243 पदों पर नियुक्ति प्रदान किए जाने को मंजूरी दी है। यह निर्णय प्रदेश के उन खिलाड़ियों के लिए महत्वपूर्ण है, जो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतकर राज्य का नाम रोशन करते हैं और सरकारी सेवाओं में अवसर की उम्मीद रखते हैं। सरकार ने खेल प्रतिभाओं को रोजगार से जोड़ने के लिए खेल नीति में किए गए प्रावधान को लागू करने की दिशा में कदम बढ़ाया है।
इसके साथ ही खिलाड़ियों को आउट आफ टर्न नियुक्ति देने के लिए माध्यमिक शिक्षा विभाग में भी पदों का पुनर्गठन किया गया है। सहायक अध्यापक व्यायाम के लेवल-7 के कुल 1898 सृजित पदों में से 33 पद समर्पित करते हुए लेवल-6 में अपर सहायक अध्यापक व्यायाम के 33 पद सृजित किए जाएंगे। कैबिनेट के इस निर्णय से खेल प्रतिभाओं को सरकारी सेवा में समायोजित करने के लिए शिक्षा विभाग में नए अवसर उपलब्ध होंगे।
वहीं उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालय नैनीताल और प्रदेश के अधीनस्थ न्यायालयों में सरकार की ओर से पैरवी करने वाले अधिवक्ताओं की फीस की दरों के पुनर्निर्धारण को भी कैबिनेट ने हरी झंडी दे दी है। मुख्य सचिव की अध्यक्षता में गठित सात सदस्यीय समीक्षा समिति ने शुल्क की दरों की समीक्षा की थी। समिति की बैठक में लिए गए निर्णय के आधार पर फीस बढ़ाने के प्रस्ताव को कैबिनेट ने मंजूरी दी। इससे लंबे समय से शुल्क पुनरीक्षण की प्रतीक्षा कर रहे शासकीय अधिवक्ताओं को राहत मिलने की उम्मीद है।
व्यवसाय और नियामकीय प्रक्रियाओं को सरल बनाने की दिशा में भी कैबिनेट ने कदम बढ़ाया है। विधिक माप विज्ञान अधिनियम-2009 के तहत उत्तराखंड विधिक माप विज्ञान नियमावली-2012 में संशोधन करते हुए उत्तराखंड विधिक माप विज्ञान नियमावली-2026 के प्रख्यापन को मंजूरी दी गई। केंद्र सरकार के ईज आफ डूइंग बिजनेस, अनुपालन में कमी और विश्वास आधारित नियामकीय व्यवस्था के तहत चल रहे सुधार कार्यक्रमों के अनुरूप यह संशोधन किया गया है। इसका उद्देश्य बाट-माप से संबंधित लाइसेंसिंग प्रक्रिया को सरल बनाना है। देहरादून के पुरुकुल गांव से मसूरी लाइब्रेरी चौक तक प्रस्तावित रोपवे परियोजना को लेकर भी कैबिनेट ने महत्वपूर्ण फैसला किया है। रोपवे परियोजना के अपर टर्मिनल प्वाइंट और पार्किंग निर्माण के लिए पर्यटन विभाग को प्राप्त भूमि पर पूर्व में गढ़वाल सभा मसूरी को लीज पर दी गई भूमि के बराबर 972 वर्गमीटर भूमि लीज पर देने की अनुमति दी गई है। यह 972 वर्गमीटर भूमि मसूरी में गढ़वाल मंडल विकास निगम की पार्किंग के लिए क्रय की गई भूमि में से दी जाएगी। निर्णय को रोपवे परियोजना से जुड़े भूमि प्रबंधन और स्थानीय संस्थाओं के साथ समन्वय की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
कर्मचारी राज्य बीमा निगम के हरिद्वार स्थित चिकित्सालय के समीप चिन्हित 15 एकड़ भूमि को ईएसआई के निर्माण के लिए आवंटित करने का निर्णय भी कैबिनेट ने लिया है। इससे ईएसआई से जुड़े स्वास्थ्य ढांचे के विस्तार का रास्ता खुलेगा। कारागार प्रशासन एवं सुधार सेवा विभाग के ढांचे में भी बदलाव को मंजूरी मिली है। सुधारात्मक विंग के लिए अपर महानिरीक्षक कारागार का एक नवसृजित पद संवर्गीय ढांचे में शामिल किया जाएगा। इसके लिए उत्तराखंड कारागार प्रशासन एवं सुधार सेवा विभाग समूह क एवं ख सेवा नियमावली-2026 में संशोधन को कैबिनेट ने मंजूरी दी है। सरकार के अनुसार इससे विभागीय ढांचे को मजबूत करने के साथ सुधारात्मक कार्यों को अधिक प्रभावी बनाने में मदद मिलेगी।
उत्तराखंड विद्युत नियामक आयोग की वर्ष 2024-25 की वार्षिक रिपोर्ट को आगामी विधानसभा सत्र में सदन के पटल पर रखे जाने के प्रस्ताव को भी कैबिनेट ने स्वीकृति दी है। यह निर्णय विद्युत अधिनियम-2003 की धारा 105 के प्रावधानों के तहत लिया गया है। इसी तरह आयोग के वर्ष 2024-25 के वार्षिक लेखा विवरण को भी आगामी विधानसभा सत्र में विधानसभा के पटल पर रखने को मंजूरी दी गई है। इससे आयोग के कामकाज और वित्तीय विवरण को विधायिका के समक्ष प्रस्तुत करने की प्रक्रिया पूरी होगी।
बाक्स
कैबिनेट के प्रमुख फैसले
25 हजार रुपये एमबीबीएस इंटर्न का न्यूनतम मासिक स्टाइपेंड
243 पदकृ विभिन्न विभागों में पदक विजेता खिलाड़ियों के लिए आउट आफ टर्न नियुक्ति
33 पदकृ अपर सहायक अध्यापक व्यायाम के नए पद
972 वर्गमीटरकृ गढ़वाल सभा मसूरी के लिए लीज पर दी जाने वाली भूमि
15 एकड़कृ हरिद्वार में ईएसआई निर्माण के लिए भूमि आवंटन
1 पदकृ सुधारात्मक विंग में अपर महानिरीक्षक कारागार का नवसृजित पद
गुरुवार, 10 सितंबर 2026
udaydinmaan: दूनघाटी में पीजी का ‘काला’ कारोबार
udaydinmaan: दूनघाटी में पीजी का ‘काला’ कारोबार: बिना लाइसेंस वमानकों की अनदेखी के आरोपों ने खड़े किए हैं सवाल छात्र-छात्राओं से मोटी रकम वसूलने वाले संचालकों पर निगरानी कितनी पुलिस की चेकिं...
दूनघाटी में पीजी का ‘काला’ कारोबार
बिना लाइसेंस वमानकों की अनदेखी के आरोपों ने खड़े किए हैं सवाल
छात्र-छात्राओं से मोटी रकम वसूलने वाले संचालकों पर निगरानी कितनी
पुलिस की चेकिंग में सत्यापन और सीसीटीवी, पीजी नेटवर्क की चुनौती
सवाल यह कि राजधानी में कितने पीजी वास्तव में मानकों पर खरे उतरते
देहरादून। राजधानी देहरादून में पढ़ाई और रोजगार के लिए आने वाले युवाओं के लिए पीजी आवास बड़ी जरूरत बन चुके हैं, लेकिन इसी जरूरत ने एक बड़े कारोबार का रूप ले लिया है। शहर के कई इलाकों में मकानों और व्यावसायिक भवनों को पीजी में तब्दील कर दिया गया है। सवाल अब सिर्फ किराये और सुविधाओं का नहीं, बल्कि इन पीजी की वैधता, अग्निसुरक्षा, भवन क्षमता, पुलिस सत्यापन और संचालकों की जवाबदेही का है। पीजी कारोबार में बड़ी रकम घूम रही है, लेकिन इसके समानांतर यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या हर संचालक जरूरी अनुमति और सुरक्षा मानकों का पालन कर रहा है? हालिया रिपोर्टों में देहरादून के कई पीजी में अग्निसुरक्षा से जुड़े नियमों की अनदेखी की शिकायतें सामने आई हैं। इनमें पर्याप्त निकासी व्यवस्था, अग्निशमन उपकरण और अन्य सुरक्षा उपायों को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
राजधानी के शिक्षण संस्थानों और रोजगार केंद्रों के आसपास पीजी की मांग लगातार बनी हुई है। इसका सीधा फायदा संचालकों को मिलता है। एक ही भवन में कई कमरों को किराये पर देकर संचालक नियमित आय अर्जित करते हैं। लेकिन जिस भवन में दर्जनों युवक-युवतियां रह रहे हों, वहां फायर सेफ्टी, विद्युत सुरक्षा, आपातकालीन निकास, भवन की क्षमता और पुलिस सत्यापन जैसे मानक महज कागजी औपचारिकता नहीं हो सकते। सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस पीजी में एक साथ बड़ी संख्या में लोग रह रहे हैं, उसकी सुरक्षा जांच आखिरी बार कब हुई?
पीजी में सुरक्षा की अनदेखी का खतरा केवल चोरी या अपराध तक सीमित नहीं है। आग, गैस रिसाव, शार्ट सर्किट अथवा भवन संबंधी दुर्घटना की स्थिति में भीड़भाड़ वाले भवन गंभीर खतरा बन सकते हैं। हाल ही में सेलाकुई के एक निजी छात्रावास में आग की घटना के बाद अग्निशमन विभाग की जांच में अनिवार्य अग्निशमन अनापत्ति प्रमाणपत्र नहीं होने तथा स्मोक डिटेक्टर और स्प्रिंकलर जैसी व्यवस्थाओं के अभाव की बात सामने आई थी। यह घटना राजधानी और आसपास के क्षेत्रों में संचालित छात्रावासों तथा पीजी की सुरक्षा व्यवस्था की व्यापक जांच की जरूरत को सामने लाती है।
सरकार और प्रशासन का रुख यह रहा है कि नियमों का उल्लंघन करने वाले आवासीय और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों पर कार्रवाई की जाएगी। देहरादून पुलिस ने अगस्त में प्रेमनगर क्षेत्र के पीजी और हास्टलों में चेकिंग अभियान चलाया। संचालकों को रहने वालों का शत-प्रतिशत पुलिस सत्यापन कराने और सीसीटीवी लगाने के निर्देश दिए गए। बाहरी लोगों के प्रवेश तथा अन्य गतिविधियों पर भी निगरानी बढ़ाने को कहा गया। प्रशासन इससे पहले दूसरे तरह के आवासीय व्यवसायों में भी कार्रवाई कर चुका है। मई 2026 में मानकों के विपरीत संचालित 96 होमस्टे के पंजीकरण निरस्त किए गए थे। निरीक्षण में कई जगह अग्निशमन उपकरणों की कमी जैसी खामियां भी मिली थीं। यानी सरकार का संदेश साफ हैकृमानकों से खिलवाड़ स्वीकार नहीं होगा।
सवाल यह है कि यदि होमस्टे के मामले में निरीक्षण और पंजीकरण निरस्तीकरण की कार्रवाई हो सकती है तो राजधानी के पीजी नेटवर्क की भी संयुक्त सुरक्षा जांच क्यों न हो? प्रशासन को यह स्पष्ट करना होगा कि देहरादून में कितने पीजी संचालित हैं, इनमें से कितने पंजीकृत हैं, कितनों के पास जरूरी अग्निसुरक्षा स्वीकृति है और कितने भवन अपनी स्वीकृत क्षमता के अनुरूप छात्रों को आवास दे रहे हैं। सिर्फ पुलिस सत्यापन और सीसीटीवी से पूरी समस्या का समाधान नहीं होगा। भवन सुरक्षा, अग्निसुरक्षा, स्वच्छता, विद्युत व्यवस्था, आपातकालीन निकास और किरायेदारों के रिकार्डकृसभी की एक साथ जांच जरूरी है।
राजधानी में पीजी अब महज मकान किराये पर देने का मामला नहीं रह गया है। यह हजारों विद्यार्थियों और कामकाजी युवाओं की सुरक्षा से जुड़ा विषय है। इसलिए प्रशासन को पीजी संचालकों की सूची सार्वजनिक करने, नियमित निरीक्षण कराने और मानकों का उल्लंघन मिलने पर नोटिस से लेकर सीलिंग तक की कार्रवाई का स्पष्ट तंत्र बनाना चाहिए। क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं कि पीजी से कितना पैसा कमाया जा रहा है। असली सवाल यह है कि उस पैसे के बदले वहां रहने वालों को कितनी सुरक्षा दी जा रही है। सरकार के सामने चुनौती यही हैकृराजधानी में पीजी कारोबार चले, लेकिन नियमों की कीमत पर नहीं।
बता दें कि उत्तराखंड हाईकोर्ट ने जुलाई 2026 में देहरादून से जुड़े एक मामले में अग्निसुरक्षा कमियों के बावजूद फायर एनओसी जारी करने संबंधी जिलाधिकारी के आदेश को निरस्त किया था, जिससे अग्निसुरक्षा प्रमाणन में नियमों के पालन की गंभीरता सामने आती है।
भाजपा ने ‘महामंथन’ में परखी मिशन-2027 की ‘बिसात’
कोर कमेटी में संगठन से लेकर चुनावी रणनीति तक मंथन, सियासी जमीन मजबूत करने पर जोर
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की मौजूदगी में प्रदेश नेतृत्व ने खंगाली चुनावी तैयारी
बूथ से लेकर विधानसभा स्तर तक संगठन की सक्रियता पर नजर, भाजपा का शक्ति प्रदर्शन भी अहम
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव-2027 की उलटी गिनती के बीच हल्द्वानी भाजपा के महामंथन का केंद्र बन गया है। प्रदेश कार्यसमिति की बैठक के बाद पार्टी की प्रदेश कोर कमेटी में संगठन की ताकत, चुनावी तैयारियों और आगामी राजनीतिक कार्यक्रमों को लेकर मंथन ने साफ संकेत दिया है कि भाजपा अब चुनावी मोड में तेजी से आगे बढ़ रही है। राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की मौजूदगी ने बैठक की अहमियत और बढ़ा दी है। प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और संगठन के वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी में हुई बैठकों में पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती सरकार के कामकाज को चुनावी मुद्दे में बदलना और संगठन की जमीन को बूथ तक मजबूत रखना है। प्रदेश कार्यसमिति में मुख्यमंत्री, प्रदेश पदाधिकारी, जिलाध्यक्ष और विभिन्न मोर्चों-प्रकोष्ठों के पदाधिकारी शामिल हुए।
हल्द्वानी को बैठक के लिए चुनना अपने आप में राजनीतिक संदेश माना जा रहा है। कुमाऊं की राजनीति में भाजपा की पकड़ मजबूत रही है, लेकिन कांग्रेस लगातार क्षेत्रीय मुद्दों को लेकर सरकार को घेरने की कोशिश कर रही है। ऐसे में भाजपा नेतृत्व का हल्द्वानी में बैठकर चुनावी तैयारियों की समीक्षा करना संगठन के लिए महत्वपूर्ण है। पार्टी पहले ही सभी 70 विधानसभा क्षेत्रों में कोर कमेटियों के गठन और स्थानीय मुद्दों, बूथ प्रबंधन तथा सरकार की योजनाओं को जनता तक पहुंचाने की रणनीति पर काम शुरू कर चुकी है। यानी अब चुनाव की तैयारी केवल प्रदेश मुख्यालय तक सीमित नहीं रहने वाली। हर विधानसभा, हर मंडल और हर बूथ को चुनावी रणनीति का हिस्सा बनाने की कवायद तेज होगी।
हल्द्वानी में यह बैठक ऐसे समय हुई है जब रामलीला मैदान के शुद्धिकरण को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच राजनीतिक टकराव तेज है। कांग्रेस इस मुद्दे को लेकर भाजपा पर विभाजनकारी राजनीति का आरोप लगा रही है, जबकि भाजपा की ओर से कांग्रेस पर राजनीतिक और धार्मिक भावनाओं को मुद्दा बनाने के आरोप लगाए जा रहे हैं। ऐसे माहौल में राष्ट्रीय अध्यक्ष का हल्द्वानी पहुंचना केवल संगठनात्मक कार्यक्रम नहीं माना जा रहा। भाजपा के लिए यह कुमाऊं की राजनीतिक जमीन पर अपने कार्यकर्ताओं को स्पष्ट दिशा देने का अवसर भी है। दूसरी तरफ कांग्रेस के लिए चुनौती यह है कि वह इस विवाद को व्यापक जनमुद्दे में बदल पाती है या नहीं।
भाजपा के सामने 2027 में सबसे बड़ा सवाल सत्ता विरोधी माहौल को रोकने का होगा। सरकार विकास, रोजगार, निवेश, चारधाम, बुनियादी ढांचे और जनकल्याणकारी योजनाओं को अपनी उपलब्धियों के रूप में सामने रखेगी। विपक्ष बेरोजगारी, पलायन, महंगाई, कानून-व्यवस्था और स्थानीय मुद्दों को लेकर सरकार को घेरने की तैयारी में है। इसलिए कोर कमेटी की बैठक में केवल संगठन की समीक्षा पर्याप्त नहीं होगी। सरकार की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने और विपक्ष के आरोपों का राजनीतिक जवाब देने की रणनीति भी चुनावी सफलता का आधार बनेगी।
भाजपा की चुनावी रणनीति में बूथ प्रबंधन हमेशा से अहम रहा है। इस बार भी पार्टी का जोर बूथ स्तर तक संगठन को सक्रिय करने पर है। विधानसभा क्षेत्रवार कोर कमेटियों का गठन इसी रणनीति का हिस्सा है। अब सवाल यह है कि सरकार की योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक कितना पहुंचा और संगठन उस लाभार्थी तक कितनी प्रभावी ढंग से पहुंच पाता है। भाजपा के लिए 2027 का चुनाव केवल चेहरों का चुनाव नहीं होगा। यह संगठन बनाम संगठन, बूथ बनाम बूथ और नैरेटिव बनाम नैरेटिव की लड़ाई भी होगी। 10 सितंबर को नितिन नवीन की मौजूदगी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के अवसर पर प्रस्तावित सेवा संकल्प अभियान को लेकर भी बैठक होनी है। इसके बाद हल्द्वानी में पूर्व सैनिक सम्मेलन और रुद्रपुर में पंजाबी गौरव सम्मेलन का कार्यक्रम है। इससे भाजपा की रणनीति का एक और पहलू सामने आता हैकृकि संगठनात्मक गतिविधियों को सामाजिक संपर्क अभियानों से जोड़ना। यानी पार्टी चुनाव की औपचारिक घोषणा से पहले ही अपने संपर्क अभियान को व्यापक सामाजिक आधार देने की कोशिश में है।
हल्द्वानी की बैठक ने भाजपा के मिशन-2027 का संकेत जरूर दिया है, लेकिन असली परीक्षा बैठकों के बाद शुरू होगी। बैठक में रणनीति बन सकती है, लक्ष्य तय हो सकते हैं और संगठन को दिशा दी जा सकती है, लेकिन चुनाव जनता के बीच लड़ा जाएगा। भाजपा के सामने अब सवाल सिर्फ सत्ता बचाने का नहीं, बल्कि लगातार तीसरी जीत के लिए जनता के मन में अपने पक्ष का भरोसा कायम रखने का है। हल्द्वानी की बैठक से निकला संदेश साफ हैकृकि भाजपा चुनाव की तैयारी को अब अभियान में बदलने की ओर बढ़ रही है।
मिशन-2027 के लिए भाजपा का ‘हैट्रिक प्लान’
हैट्रिक के लिए भाजपा का प्लान तैयार, नितिन नवीन ने दिखाया जीत का रास्ता
जिताऊ चेहरों पर दांव और सामाजिक समीकरण साधने की बन गई है रणनीति
पूर्व सैनिकों और सिख समाज सम्मेलन के जरिए अब संपर्क बढ़ाने की कवायद
देहरादून। उत्तराखंड में लगातार तीसरी बार सरकार बनाने के लक्ष्य के साथ भाजपा ने विधानसभा चुनाव-2027 की तैयारियों को निर्णायक मोड़ पर पहुंचा दिया है। हल्द्वानी में प्रदेश पदाधिकारी एवं विस्तारित कार्यसमिति की बैठक में राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने संगठन को चुनावी मोड में पूरी ताकत के साथ उतरने का संदेश दिया। पार्टी ने सिर्फ सत्ता बरकरार रखने के बजाय हैट्रिक के साथ दो-तिहाई बहुमत की दिशा में बढ़ने का लक्ष्य रखा है।
नितिन नवीन का उत्तराखंड दौरा ऐसे समय हुआ है जब प्रदेश में चुनावी गतिविधियां तेज हो रही हैं। पार्टी नेतृत्व संगठन और सरकार दोनों के कामकाज की समीक्षा कर रहा है। भाजपा के लिए यह कवायद इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 2027 में उसे सत्ता विरोधी रुझानों, बेरोजगारी, पलायन और स्थानीय मुद्दों पर विपक्ष के हमलों का सामना करना होगा। भाजपा के नए चुनावी रोडमैप में संगठन को नीचे तक सक्रिय करने पर विशेष जोर है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार नवीन ने मंडल के बजाय शक्ति केंद्र आधारित रणनीति के साथ चुनावी तैयारी का आह्वान किया। इसका मतलब साफ हैकृभाजपा चुनाव के अंतिम चरण का इंतजार करने के बजाय अभी से मतदाता संपर्क, संगठन विस्तार और बूथ प्रबंधन को मजबूत करना चाहती है। पार्टी के लिए असली चुनौती यही होगी कि प्रदेश नेतृत्व का संदेश प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र और प्रत्येक बूथ तक कितनी मजबूती से पहुंचता है।
भाजपा ने टिकट वितरण को लेकर भी संकेत स्पष्ट किए हैं। प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट के अनुसार पार्टी सर्वे के आधार पर जिताऊ चेहरों को प्राथमिकता देने की दिशा में आगे बढ़ रही है। पार्टी की ओर से कराए गए एक सर्वे में भाजपा को 55 सीटों पर बढ़त का दावा भी सामने आया है, हालांकि यह पार्टी का आंतरिक आकलन है, स्वतंत्र चुनाव परिणाम नहीं। यानी टिकट में सिफारिश से ज्यादा चुनाव जीतने की क्षमता को तरजीह देने का संदेश दिया जा रहा है।
भाजपा का चुनावी प्लान केवल संगठन तक सीमित नहीं है। नितिन नवीन के दौरे में पूर्व सैनिकों और सिख समाज से जुड़े कार्यक्रम भी रखे गए हैं। पूर्व सैनिक सम्मेलन में हजारों लोगों के शामिल होने की तैयारी की गई थी। यह संकेत है कि पार्टी अलग-अलग सामाजिक समूहों तक पहुंच बढ़ाकर अपने समर्थन आधार को चुनाव से पहले और व्यापक करना चाहती है। संगठन मजबूत होने के बावजूद चुनाव जीतने के लिए सरकार के कामकाज को जनता के बीच प्रभावी ढंग से पहुंचाना भाजपा के लिए बड़ी चुनौती है। सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, निवेश, चारधाम, महिला कल्याण और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों पर सरकार अपनी उपलब्धियां गिनाएगी।
वहीं कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दल इन्हीं क्षेत्रों में सरकार की कमियां गिनाकर सत्ता विरोधी माहौल बनाने की कोशिश करेंगे। यानी भाजपा की रणनीति का अगला चरण उपलब्धि बनाम आरोप की राजनीतिक लड़ाई होगा। हल्द्वानी में भाजपा का महामंथन ऐसे समय हुआ जब रामलीला मैदान के कथित शुद्धिकरण को लेकर भाजपा और कांग्रेस आमने-सामने हैं। मामला अब राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर जांच और कानूनी प्रक्रिया तक पहुंच चुका है। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने हाल में मामले में हस्तक्षेप से इनकार करते हुए पुलिस को जांच जारी रखने दिया। ऐसे में भाजपा के सामने चुनौती है कि वह चुनावी विमर्श को केवल विवादों तक सीमित न रहने दे और सरकार के कामकाज तथा संगठन की तैयारियों को केंद्र में रखे।
भाजपा के हैट्रिक प्लान ने विपक्ष के सामने भी चुनौती बढ़ा दी है। कांग्रेस जहां सरकार के खिलाफ मुद्दों को धार देने में जुटी है, वहीं भाजपा चुनाव से काफी पहले संगठनात्मक तैयारी में बढ़त बनाने की कोशिश कर रही है। 2027 में मुकाबला केवल नारों का नहीं होगा, जिस दल का संगठन बूथ तक मजबूत होगा और जो मतदाता के रोजमर्रा के सवालों का विश्वसनीय जवाब दे पाएगा, उसके लिए बढ़त बनाना आसान होगा।
हल्द्वानी में भाजपा ने लक्ष्य बड़ा रखा हैकृहैट्रिक और दो-तिहाई बहुमत। संगठन के पास चुनावी मशीनरी का अनुभव भी है और सत्ता की ताकत भी। लेकिन चुनावी गणित सिर्फ संगठन से नहीं बनता। महंगाई, रोजगार, पलायन, भू-कानून, मूल निवास, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मुद्दे मतदाता के मन में क्या असर डालते हैं, यही भाजपा की रणनीति की असली परीक्षा होगी। नितिन नवीन ने पार्टी को जीत का लक्ष्य जरूर दे दिया है, लेकिन हैट्रिक का फैसला आखिरकार बूथ की मशीनरी नहीं, मतदाता की उंगली करेगी।
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भाजपा के हैट्रिक प्लान के सूत्र
शक्ति केंद्र आधारित संगठन
जिताऊ उम्मीदवारों पर जोर
सरकार की उपलब्धियों को चुनावी मुद्दा बनाना
पूर्व सैनिकों और सामाजिक समूहों से संपर्क
हैट्रिक के साथ दो-तिहाई बहुमत का लक्ष्य
2027 से पहले धार्मिक मुद्दों पर ‘महाभारत’
दुष्यंत गौतम के बयान को लेकर कांग्रेस ने भाजपा को सीधे निशाने पर लिया
सनातन और धार्मिक आस्था के सवाल पर दलों में तेज हुआ आरोप-प्रत्यारोप
हल्द्वानी शुद्धिकरण विवाद के बाद टीका प्रकरण ने बढ़ाया सियासी तापमान
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा और कांग्रेस के बीच सियासी तलवारें एक बार फिर खिंच गई हैं। हल्द्वानी के शुद्धिकरण विवाद के बाद अब दुष्यंत गौतम के टीका प्रकरण ने दोनों प्रमुख दलों को सीधे आमने-सामने ला खड़ा किया है। कांग्रेस ने भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव दुष्यंत गौतम की टिप्पणी को सनातन और धार्मिक आस्था का अपमान करार देते हुए भाजपा पर हमला बोला है। जवाब में भाजपा कांग्रेस की राजनीति और उसकी मंशा पर सवाल खड़े कर रही है। यानी विवाद अब सिर्फ एक नेता के बयान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि भाजपा बनाम कांग्रेस की वैचारिक और राजनीतिक लड़ाई का नया मोर्चा बन गया है।
कांग्रेस का आरोप है कि भाजपा धार्मिक प्रतीकों और सनातन की आस्था को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल कर रही है। पार्टी ने गौतम के बयान को इसी राजनीतिक सोच का उदाहरण बताते हुए भाजपा से जवाब मांगा है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि सनातन करोड़ों लोगों की आस्था है और किसी राजनीतिक दल को इसे अपने राजनीतिक एजेंडे के लिए इस्तेमाल करने का अधिकार नहीं है। भाजपा के लिए कांग्रेस का यह हमला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पार्टी 2027 के चुनाव में सनातन, सांस्कृतिक विरासत और धार्मिक आस्था को अपने व्यापक राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाने की तैयारी में है। ऐसे में गौतम का बयान विपक्ष को भाजपा पर हमला करने का नया अवसर दे रहा है।
रामलीला मैदान के कथित शुद्धिकरण को लेकर भाजपा और कांग्रेस पहले ही आमने-सामने हैं। कांग्रेस जहां इसे सामाजिक और धार्मिक अपमान से जोड़ रही है, वहीं भाजपा इसे धार्मिक भावनाओं से जुड़ा विषय बता रही है। अब टीका विवाद ने दोनों दलों को फिर उसी बहस के बीच ला खड़ा किया है। कांग्रेस को भाजपा पर हमला करने का मुद्दा मिला है तो भाजपा के सामने अपने राजनीतिक नैरेटिव को बचाने की चुनौती है। इस पूरे घटनाक्रम को 2027 की चुनावी राजनीति से अलग करके देखना मुश्किल है। भाजपा संगठन को बूथ स्तर तक सक्रिय करने और सरकार की उपलब्धियों के साथ चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी कर रही है। कांग्रेस सत्ता विरोधी मुद्दों को धार देने में जुटी है। ऐसे में धार्मिक विवाद दोनों दलों के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
कांग्रेस इन्हें ध्रुवीकरण और विभाजन की राजनीति के उदाहरण के रूप में पेश करेगी, जबकि भाजपा इन्हें सनातन और सांस्कृतिक अस्मिता के सम्मान के सवाल से जोड़कर जवाब देने की कोशिश करेगी। यही इस विवाद का सबसे बड़ा राजनीतिक प्रश्न है। यदि भाजपा इसे धार्मिक आस्था का प्रश्न मानती है तो कांग्रेस इसे राजनीतिक इस्तेमाल का मामला बता रही है। इस तरह बहस अब इस बात पर नहीं रह गई कि टीका विवाद में किसने क्या कहा, बल्कि सवाल यह बन गया है कि क्या उत्तराखंड की 2027 की चुनावी लड़ाई विकास और जनसरोकारों से आगे बढ़कर आस्था और पहचान की राजनीति के इर्द-गिर्द सिमटने जा रही है?
कांग्रेस के लिए यह विवाद भाजपा को घेरने का मौका है। पार्टी बेरोजगारी, पलायन, महंगाई, भू-कानून, मूल निवास और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों के साथ धार्मिक विवादों को भी अपने चुनावी अभियान में जोड़ना चाहती है। भाजपा के लिए चुनौती दूसरी है। उसे एक तरफ कांग्रेस के हमले का जवाब देना है और दूसरी तरफ यह संदेश भी बनाए रखना है कि सरकार का चुनावी एजेंडा विकास और सुशासन पर केंद्रित है। यानी टीका विवाद में असली लड़ाई बयान की नहीं, राजनीतिक नैरेटिव की है।
हल्द्वानी के शुद्धिकरण विवाद और अब टीका विवाद ने संकेत दे दिया है कि उत्तराखंड में चुनावी तापमान बढ़ने लगा है। आने वाले महीनों में ऐसे मुद्दों पर भाजपा और कांग्रेस के बीच टकराव और तेज होने की संभावना है। जनता के सामने अब दोनों दलों की परीक्षा होगी कि वह धार्मिक और राजनीतिक विवादों के बीच रोजगार, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई और पहाड़ के विकास जैसे सवालों को कितना महत्व देते हैं। क्योंकि 2027 का चुनाव भाजपा और कांग्रेस के बीच सिर्फ सत्ता की लड़ाई नहीं होगाकृयह इस बात की भी लड़ाई होगा कि उत्तराखंड की राजनीति का एजेंडा कौन तय करेगा।
बुधवार, 9 सितंबर 2026
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