रविवार, 23 अगस्त 2026

udaydinmaan: महंगाई का ‘मिठास’ पर डाका

udaydinmaan: महंगाई का ‘मिठास’ पर डाका: चीनी के दामों ने बिगाड़ा रसोई का बजट, विपक्ष हमलावर कांग्रेस समेत विपक्षी दलों ने बढ़ती कीमतों पर जताया आक्रोश विपक्ष ने रसोई के बजट पर असर को...

राहुल गांधी का ‘स्त्री स्वाभिमान’ दांव

पुणे में छात्राओं के बीच राहुल गांधी का बयान मनुस्मृति की व्याख्या को लेकर सियासी बहस अधिकार और पहचान को लेकर सियासत तेज देहरादून। हजारों छात्राओं के बीच कांग्रेस नेता राहुल गांधी का एक बयान अब राजनीतिक बहस का नया केंद्र बन गया है। पुणे में आयोजित छात्रों की गूंज कार्यक्रम में राहुल गांधी ने महिलाओं की स्वतंत्र पहचान, उनके अधिकार और अपने भविष्य के फैसले खुद लेने की क्षमता पर जोर देते हुए कहा कि महिलाएं किसी की नहीं, सिर्फ अपनी हैं। बयान सामने आने के बाद महिला अधिकार, सामाजिक परंपराओं और मनुस्मृति की व्याख्या को लेकर सियासी बहस तेज हो गई है। राहुल गांधी ने छात्राओं के बीच अपने संबोधन में महिलाओं की स्वतंत्रता को केवल सामाजिक अधिकार का विषय नहीं, बल्कि उनकी व्यक्तिगत पहचान और निर्णय लेने की आजादी से जोड़ने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि किसी भी महिला को उसकी पहचान किसी दूसरे व्यक्ति या रिश्ते के आधार पर नहीं दी जानी चाहिए। उसके सपने, उसकी महत्वाकांक्षा और उसके भविष्य का फैसला करने का अधिकार उसी के पास होना चाहिए। कार्यक्रम के दौरान राहुल गांधी ने मनुस्मृति में महिलाओं को लेकर की गई व्याख्याओं पर भी सवाल खड़े किए। उनका तर्क था कि समाज में महिलाओं की भूमिका और स्वतंत्रता को लेकर पुराने विचारों को आज के लोकतांत्रिक और संवैधानिक मूल्यों की कसौटी पर देखा जाना चाहिए। यही हिस्सा अब राजनीतिक बहस का कारण बन गया है। कांग्रेस इसे महिला सम्मान और समान अधिकार की आवाज के रूप में पेश कर रही है, जबकि भाजपा और उसके वैचारिक समर्थक राहुल गांधी के बयान को हिंदू परंपराओं और धार्मिक ग्रंथों पर राजनीतिक टिप्पणी के रूप में देख सकते हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी और तेज होने की संभावना है। राहुल गांधी का मंच और दर्शक वर्ग भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण था। हजारों छात्राओं के बीच महिलाओं की स्वतंत्रता और आत्मनिर्णय की बात करके उन्होंने सीधे युवा महिला मतदाताओं से संवाद स्थापित करने की कोशिश की। राहुल का संदेश साफ था कि महिलाओं को किसी रिश्ते की पहचान से आगे बढ़कर स्वतंत्र नागरिक के रूप में देखा जाना चाहिए। उनका जोर इस बात पर रहा कि महिला अपनी शिक्षा, करियर, जीवन और भविष्य को लेकर खुद निर्णय लेने में सक्षम हो। राहुल गांधी का यह बयान केवल सामाजिक विमर्श तक सीमित रहने वाला नहीं है। भारतीय राजनीति में महिला मतदाता पिछले कुछ चुनावों में निर्णायक भूमिका निभाती रही हैं। ऐसे में महिलाओं की स्वतंत्रता, सम्मान और अधिकार से जुड़े मुद्दे सीधे चुनावी राजनीति को प्रभावित करते हैं। कांग्रेस के लिए यह बयान युवाओं और महिलाओं के बीच अपने राजनीतिक संदेश को मजबूत करने का अवसर है। वहीं भाजपा के लिए चुनौती यह होगी कि वह इस मुद्दे पर राहुल गांधी के हमले का जवाब किस राजनीतिक और वैचारिक धरातल पर देती है। दरअसल, बहस केवल मनुस्मृति की व्याख्या तक सीमित नहीं है। असली सवाल यह है कि आधुनिक भारत में महिला की पहचान क्या होकृकिसी रिश्ते, परिवार और सामाजिक भूमिका से तय होने वाली पहचान या अपने फैसले खुद लेने वाली स्वतंत्र नागरिक की पहचान? राहुल गांधी के बयान के बाद सोशल मीडिया पर भी बहस तेज होने की संभावना है। समर्थक इसे महिला स्वतंत्रता और समानता का संदेश बता रहे हैं, जबकि विरोधी इसे धार्मिक-सामाजिक परंपराओं पर हमला करार दे सकते हैं। ऐसे में पुणे का यह बयान आने वाले दिनों में संसद से लेकर चुनावी मंचों तक सुनाई दे सकता है। राहुल गांधी ने छात्राओं के बीच जिस मुद्दे को उठाया है, वह अब केवल एक कार्यक्रम का बयान नहीं रह गया है। यह भारतीय राजनीति में महिला की स्वतंत्र पहचान, परंपरा बनाम आधुनिकता और संविधान बनाम सामाजिक रूढ़ियों की पुरानी बहस को एक बार फिर सामने लाने वाला मुद्दा बन गया है। आखिरकार सवाल यही है कि महिला को राजनीति कब तक किसी के वोट बैंक के रूप में देखेगी और कब उसे उसके अपने निर्णयों वाली नागरिक के रूप में स्वीकार करेगी? पुणे में राहुल गांधी का बयान इसी सवाल को राजनीतिक बहस के केंद्र में ले आया है।

महंगाई का ‘मिठास’ पर डाका

चीनी के दामों ने बिगाड़ा रसोई का बजट, विपक्ष हमलावर कांग्रेस समेत विपक्षी दलों ने बढ़ती कीमतों पर जताया आक्रोश विपक्ष ने रसोई के बजट पर असर को बनाया राजनीतिक हथियार देहरादून। रसोई के बजट पर बढ़ते दबाव ने उत्तराखंड की सियासत को भी गरमा दिया है। चीनी समेत रोजमर्रा की जरूरतों से जुड़ी कई वस्तुओं के दाम बढ़ने को लेकर कांग्रेस सहित विपक्षी दलों ने सरकार पर निशाना साधना शुरू कर दिया है। विपक्ष का आरोप है कि महंगाई लगातार आम परिवारों की जेब पर बोझ बढ़ा रही है, जबकि सरकार राहत देने के बजाय आंकड़ों और दावों के सहारे अपनी पीठ थपथपा रही है। चीनी जैसी रोजमर्रा की जरूरत की वस्तु के दाम बढ़ना भले ही देखने में छोटा मुद्दा लगे, लेकिन इसका सीधा असर घर के मासिक बजट पर पड़ता है। चाय से लेकर मिठाई और घरेलू खाद्य पदार्थों तक में चीनी का इस्तेमाल होता है। ऐसे में कीमतों में बढ़ोतरी का असर केवल बाजार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि परिवारों के खर्च का संतुलन भी बिगाड़ता है। कांग्रेस ने बढ़ती कीमतों को लेकर सरकार को घेरते हुए कहा कि आम आदमी पहले ही महंगाई, रोजगार और आय से जुड़े दबावों से जूझ रहा है। ऐसे में खाद्य और दैनिक उपयोग की वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी उसकी मुश्किलें और बढ़ा रही है। विपक्षी दलों का कहना है कि सरकार को केवल महंगाई दर के आंकड़े बताने के बजाय बाजार में आम उपभोक्ता की स्थिति देखनी चाहिए। उनका तर्क है कि कागज पर महंगाई नियंत्रित होने का दावा अपनी जगह है, लेकिन बाजार में परिवार का मासिक खर्च बढ़ रहा है तो इसका असर राजनीतिक रूप से भी दिखाई देगा। महंगाई भारतीय राजनीति में हमेशा से बड़ा चुनावी मुद्दा रही है। खासकर विधानसभा चुनावों के दौरान रसोई का बजट सीधे राजनीतिक बहस का हिस्सा बन जाता है। उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए विपक्ष को सरकार को घेरने के लिए यह मुद्दा उपयोगी हथियार मिल सकता है। महंगाई का सवाल केवल चीनी तक सीमित नहीं है। खाद्य तेल, दाल, सब्जियां, दूध और अन्य दैनिक जरूरतों की कीमतों में उतार-चढ़ाव आम उपभोक्ता की चिंता बढ़ाता है। विपक्ष इसी व्यापक तस्वीर को सामने रखकर सरकार की आर्थिक नीतियों पर सवाल उठा रहा है। सत्तारूढ़ भाजपा के सामने चुनौती यह है कि वह बढ़ती कीमतों को लेकर जनता की नाराजगी को किस तरह शांत करती है। सरकार के पास कीमतों को नियंत्रित करने के लिए उठाए गए कदमों और बाजार व्यवस्था से जुड़े अपने तर्क हो सकते हैं, लेकिन राजनीतिक चुनौती केवल आंकड़ों से हल नहीं होगी। क्योंकि चुनावी राजनीति में जनता यह नहीं देखती कि महंगाई का कारण वैश्विक बाजार है या घरेलू आपूर्ति व्यवस्था। वह सबसे पहले अपनी जेब देखती है। महीने के अंत में घर का बजट बिगड़ रहा है तो सरकार से सवाल होना स्वाभाविक है। हालांकि महंगाई के मुद्दे ने कांग्रेस समेत विपक्षी दलों को सरकार पर हमला करने का अवसर जरूर दिया है, लेकिन इसे चुनावी मुद्दे में बदलना विपक्ष के लिए भी चुनौतीपूर्ण होगा। केवल बढ़ी कीमतों की सूची गिनाने से जनता का भरोसा हासिल नहीं किया जा सकता। विपक्ष को यह भी बताना होगा कि सत्ता में आने पर वह महंगाई को नियंत्रित करने के लिए क्या ठोस कदम उठाएगा। उत्तराखंड की सियासत में अब महंगाई का सवाल धीरे-धीरे जमीन पकड़ सकता है। चीनी के बढ़ते दाम से शुरू हुई बहस यदि दाल, तेल, सब्जी, दूध और अन्य जरूरी वस्तुओं तक पहुंचती है तो यह सरकार के लिए असहज राजनीतिक मुद्दा बन सकता है।

चीनी की कीमतों पर एथेनाल का ‘तड़का’

उत्तराखंड में आमने-सामने आ गए कांग्रेस-भाजपा कांग्रेस ने एथेनाल नीति को बताया महंगाई की वजह भाजपा ने कांग्रेस के आरोपों को करार दिया प्रोपेगेंडा देहरादून। चीनी के बढ़ते दाम को लेकर उत्तराखंड की सियासत में एक बार फिर एथेनाल का मुद्दा गर्म हो गया है। कांग्रेस ने चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी को केंद्र की एथेनाल नीति से जोड़ते हुए सरकार पर निशाना साधा है। वहीं भाजपा ने कांग्रेस के आरोपों को खारिज करते हुए इसे राजनीतिक प्रोपेगेंडा करार दिया है। दोनों दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप ने चीनी की कीमतों के सवाल को सीधे केंद्र की कृषि और ऊर्जा नीति से जोड़ दिया है। कांग्रेस का तर्क है कि गन्ने से चीनी उत्पादन के बजाय एथेनॉल उत्पादन को बढ़ावा देने की नीति का असर चीनी की उपलब्धता और बाजार कीमतों पर पड़ सकता है। पार्टी का कहना है कि जब गन्ने और उसके उत्पादों का एक हिस्सा एथेनॉल के लिए इस्तेमाल होता है तो चीनी उत्पादन की मात्रा प्रभावित होने की आशंका रहती है। ऐसे में यदि बाजार में आपूर्ति का संतुलन बिगड़ता है तो कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। भाजपा ने कांग्रेस के इस तर्क को राजनीतिक रंग देने की कोशिश बताया है। पार्टी का कहना है कि चीनी की कीमतों में उतार-चढ़ाव को केवल एथेनाल नीति से जोड़ देना आर्थिक तथ्यों को नजरअंदाज करना है। भाजपा के अनुसार चीनी बाजार पर उत्पादन, मांग, स्टाक, निर्यात-आयात और वैश्विक बाजार समेत कई कारकों का प्रभाव पड़ता है। दरअसल एथेनाल नीति पिछले कुछ वर्षों से केंद्र की ऊर्जा रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। पेट्रोल में एथेनाल मिश्रण बढ़ाने की नीति का उद्देश्य आयातित पेट्रोलियम पर निर्भरता कम करना, किसानों को अतिरिक्त बाजार उपलब्ध कराना और कृषि उत्पादों से वैकल्पिक ईंधन तैयार करना है। यही नीति अब चीनी की कीमतों को लेकर राजनीतिक बहस के केंद्र में है। कांग्रेस इसे सरकार की प्राथमिकताओं से जोड़कर सवाल उठा रही है, जबकि भाजपा का कहना है कि एथेनॉल को चीनी की महंगाई का सीधा कारण बताना तथ्यात्मक रूप से अधूरा निष्कर्ष है। महंगाई का मुद्दा जनता से सीधे जुड़ा होने के कारण दोनों दल इसे अपने-अपने पक्ष में इस्तेमाल कर रहे हैं। कांग्रेस के लिए चीनी की बढ़ती कीमत सरकार की आर्थिक नीतियों पर हमला करने का अवसर है। वहीं भाजपा इसे विपक्ष की ओर से सरकार को बदनाम करने की कोशिश के तौर पर पेश कर रही है। राजनीतिक रूप से यह बहस इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि महंगाई का असर सीधे परिवारों के घरेलू बजट पर पड़ता है। चीनी भले ही रोजमर्रा की खरीदारी में बड़ी वस्तु न हो, लेकिन इसके दाम बढ़ने का असर चाय, मिठाई, बेकरी और अन्य खाद्य उत्पादों की कीमतों पर भी दिखाई दे सकता है। एथेनाल और चीनी की कीमतों के बीच संबंध को लेकर राजनीतिक दावों से अलग वास्तविक तस्वीर उत्पादन और बाजार की परिस्थितियों पर निर्भर करती है। गन्ने का कितना हिस्सा चीनी के लिए और कितना एथेनाल के लिए जाता है, चीनी का उत्पादन कितना हुआ, घरेलू मांग कितनी है और बाजार में उपलब्ध स्टाक कितना हैकृइन सभी पहलुओं को देखे बिना केवल एक कारण तय करना आसान नहीं है। यही वह जगह है जहां राजनीतिक बहस और आर्थिक विश्लेषण अलग-अलग रास्ते पकड़ लेते हैं। कांग्रेस इसे सरकार की नीति का परिणाम बता रही है, जबकि भाजपा इसे विपक्ष का प्रोपेगेंडा बता रही है। लेकिन आम उपभोक्ता के लिए बहस का केंद्र इससे कहीं सरल हैकृबाजार में चीनी कितने की मिल रही है और आगे इसकी कीमत कहां जाएगी? उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले महंगाई जैसे मुद्दे राजनीतिक दलों के लिए अहम होते जा रहे हैं। कांग्रेस यदि चीनी की कीमतों को एथेनाल नीति से जोड़कर व्यापक महंगाई के मुद्दे में बदलती है तो भाजपा को सरकार की नीतियों का बचाव करना होगा। वहीं भाजपा के लिए चुनौती केवल कांग्रेस के आरोपों को प्रोपेगेंडा बताने की नहीं, बल्कि उपभोक्ता को यह भरोसा दिलाने की भी होगी कि सरकार महंगाई पर नजर रख रही है। फिलहाल चीनी की मिठास पर सियासत कड़वी होती जा रही है। कांग्रेस के लिए एथेनाल सरकार की नीति पर सवाल उठाने का हथियार है तो भाजपा के लिए वही मुद्दा विपक्ष के प्रोपेगेंडा का उदाहरण। असली फैसला राजनीतिक मंचों पर नहीं, बाजार की कीमतों और उपभोक्ता की जेब करेगी।

मिशन 2027 के लिए बूथ पर ‘कमल’

बूथ सशक्तिकरण से भाजपा का चुनावी आगाज संगठन को जमीनी स्तर पर धार देने की तैयारी प्रदेश महामंत्री के नेतृत्व में गठित की गई टीम देहरादून। उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों को लेकर भाजपा ने अब अपनी रणनीति को पूरी तरह बूथ स्तर तक ले जाने की कवायद तेज कर दी है। संगठन को चुनावी मोड में लाते हुए पार्टी बूथ सशक्तिकरण अभियान के जरिये धरातल पर अपनी चुनावी रणनीति का आगाज करने जा रही है। इसके लिए प्रदेश महामंत्री के नेतृत्व में बूथ सशक्तिकरण अभियान की टीम का गठन किया गया है। भाजपा का फोकस अब केवल बड़े राजनीतिक कार्यक्रमों और नेताओं की सभाओं तक सीमित रहने के बजाय बूथ स्तर पर संगठन को मजबूत करने पर है। पार्टी की रणनीति है कि प्रत्येक बूथ पर कार्यकर्ताओं की सक्रियता बढ़ाई जाए, स्थानीय स्तर पर मतदाताओं से संपर्क मजबूत किया जाए और संगठन की योजनाओं एवं सरकार की उपलब्धियों को घर-घर तक पहुंचाया जाए। भाजपा की चुनावी राजनीति में बूथ प्रबंधन हमेशा से महत्वपूर्ण रहा है। आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए पार्टी एक बार फिर इसी माडल को मजबूत करने में जुटी है। बूथ सशक्तिकरण अभियान के तहत कमजोर बूथों की पहचान, कार्यकर्ताओं की सक्रियता, पन्ना स्तर तक संपर्क और स्थानीय मुद्दों की जानकारी जुटाने पर जोर दिए जाने की रणनीति है। पार्टी की कोशिश यह भी है कि बूथ स्तर पर संगठन केवल चुनाव के समय सक्रिय दिखाई न दे, बल्कि लगातार जनता के बीच मौजूद रहे। इसके लिए बूथ अध्यक्ष से लेकर पन्ना प्रमुख और अन्य जिम्मेदार कार्यकर्ताओं की भूमिका को अधिक प्रभावी बनाने की तैयारी की जा रही है। बूथ सशक्तिकरण अभियान को व्यवस्थित रूप से संचालित करने के लिए प्रदेश महामंत्री के नेतृत्व में टीम गठित की गई है। यह टीम संगठनात्मक जिलों और मंडलों के साथ समन्वय करते हुए बूथों की स्थिति का आकलन करेगी और आवश्यकतानुसार कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारियां सौंपेगी। भाजपा की रणनीति में यह अभियान इसलिए भी अहम है क्योंकि विधानसभा चुनाव में हर सीट का परिणाम बूथ स्तर के प्रदर्शन से तय होता है। पार्टी कमजोर बूथों को चिन्हित कर वहां संगठन की पकड़ मजबूत करने पर विशेष ध्यान दे सकती है। बूथ सशक्तिकरण अभियान को केवल संगठनात्मक कवायद न रखकर सरकार की योजनाओं और उपलब्धियों से भी जोड़ने की तैयारी है। भाजपा कार्यकर्ताओं के माध्यम से केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं की जानकारी आम लोगों तक पहुंचाने के साथ ही लाभार्थियों से संपर्क मजबूत करने की रणनीति पर काम करेगी। पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि सरकार की उपलब्धियों और संगठन के संदेश को स्थानीय स्तर के मुद्दों से कैसे जोड़ा जाए। उत्तराखंड में रोजगार, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, महंगाई और आपदा जैसे सवाल जनता के बीच महत्वपूर्ण हैं। बूथ स्तर का कार्यकर्ता इन मुद्दों पर जनता की प्रतिक्रिया संगठन तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभा सकता है। 2027 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की सीधी टक्कर कांग्रेस से मानी जा रही है। ऐसे में बूथ सशक्तिकरण अभियान को पार्टी की चुनावी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। भाजपा जहां अपने मजबूत संगठनात्मक ढांचे का लाभ उठाना चाहती है, वहीं कांग्रेस भी लगातार संगठन को सक्रिय करने और सरकार के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश कर रही है। भाजपा के लिए चुनौती सत्ता विरोधी रुझानों को रोकने के साथ-साथ युवा, महिला और पहली बार मतदान करने वाले मतदाताओं तक प्रभावी ढंग से पहुंच बनाने की भी है। बूथ स्तर का नेटवर्क इस काम में पार्टी के लिए सबसे उपयोगी माध्यम बन सकता है। भाजपा की ओर से बूथ सशक्तिकरण अभियान की टीम का गठन इस बात का संकेत है कि 2027 की चुनावी तैयारियां अब बैठकों और रणनीति दस्तावेजों से आगे बढ़कर जमीन पर उतरने लगी हैं। आने वाले महीनों में संगठनात्मक गतिविधियों, बूथ बैठकों और मतदाता संपर्क अभियानों में तेजी देखने को मिल सकती है। कुल मिलाकर भाजपा ने चुनावी रण में उतरने से पहले अपना सबसे मजबूत हथियार धारदार करने की तैयारी शुरू कर दी हैकृबूथ। अब देखना होगा कि बूथ सशक्तिकरण अभियान संगठन को कितनी मजबूती देता है और 2027 के चुनावी मुकाबले में भाजपा की जमीन कितनी पुख्ता कर पाता है।

एसआईआर पर ‘सियासी’ टकराव

बीएलओ और बीएलए-2 को धमकाने का आरोप चुनाव आयोग से मिला भाजपा का प्रतिनिधिमंडल प्रक्रिया बाधित करने वालों पर कार्रवाई की मांग देहरादून। उत्तराखंड में विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर सियासी टकराव लगातार तेज होता जा रहा है। भाजपा ने कांग्रेस पर एसआईआर प्रक्रिया को प्रभावित करने और बूथ स्तर पर काम कर रहे बीएलओ तथा पार्टी के बीएलए-2 को कथित रूप से धमकाने का आरोप लगाया है। भाजपा प्रतिनिधिमंडल ने चुनाव आयोग से मुलाकात कर मामले में हस्तक्षेप की मांग करते हुए एसआईआर की प्रक्रिया बाधित करने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग की। भाजपा का आरोप है कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया को लेकर कांग्रेस कार्यकर्ताओं की ओर से बूथ स्तर पर भ्रम और दबाव का माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है। पार्टी का कहना है कि निर्वाचन प्रक्रिया से जुड़े अधिकारियों और राजनीतिक दलों के अधिकृत प्रतिनिधियों को स्वतंत्र रूप से अपना काम करने दिया जाना चाहिए। भाजपा प्रतिनिधिमंडल ने चुनाव आयोग के समक्ष अपनी शिकायत रखते हुए कहा कि एसआईआरजैसी महत्वपूर्ण प्रक्रिया में किसी भी तरह का राजनीतिक हस्तक्षेप लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए उचित नहीं है। पार्टी ने आयोग से मांग की कि बीएलओ और बीएलए-2 के काम में बाधा डालने, उन्हें धमकाने अथवा दबाव बनाने की शिकायतों की निष्पक्ष जांच कराई जाए। भाजपा नेताओं का कहना है कि मतदाता सूची का शुद्ध और पारदर्शी होना चुनाव की विश्वसनीयता के लिए बेहद जरूरी है। यदि बूथ स्तर पर ही प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रयास होगा तो इसका असर पूरी चुनावी प्रक्रिया पर पड़ सकता है। दूसरी ओर कांग्रेस एसआईआर को लेकर पहले से ही निर्वाचन आयोग और भाजपा पर सवाल उठाती रही है। कांग्रेस का आरोप है कि पुनरीक्षण की प्रक्रिया में यदि वास्तविक मतदाताओं के नाम प्रभावित होते हैं तो इसका सीधा असर मताधिकार पर पड़ेगा। पार्टी ने बूथ स्तर पर निगरानी और अपने प्रतिनिधियों की सक्रिय भूमिका की बात कही है। यही वजह है कि एसआईआर अब महज प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रह गई है। मतदाता सूची को लेकर दोनों प्रमुख राजनीतिक दल आमने-सामने हैं और हर पक्ष दूसरे पर चुनावी लाभ के लिए प्रक्रिया को प्रभावित करने का आरोप लगा रहा है। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 में प्रस्तावित हैं। ऐसे में मतदाता सूची का पुनरीक्षण राजनीतिक दलों के लिए बेहद संवेदनशील मुद्दा बन गया है। चुनाव से पहले मतदाता सूची में नाम जुड़ने, हटने या संशोधन की प्रक्रिया पर राजनीतिक दलों की नजर स्वाभाविक रूप से बनी हुई है। भाजपा का कहना है कि एसआईआर का उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक शुद्ध और विश्वसनीय बनाना है। पार्टी ने आयोग से आग्रह किया कि प्रक्रिया में किसी भी तरह की बाधा को गंभीरता से लिया जाए और कानून के तहत कार्रवाई हो। वहीं कांग्रेस की ओर से लगातार यह सवाल उठाया जा रहा है कि कहीं पुनरीक्षण की प्रक्रिया के नाम पर वास्तविक मतदाताओं के नाम प्रभावित न हों। ऐसे में आने वाले दिनों में एसआईआर को लेकर दोनों दलों की सियासी बयानबाजी और तेज होने के आसार हैं। एसआईआर को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच बढ़ते आरोप-प्रत्यारोप ने निर्वाचन आयोग के सामने भी चुनौती बढ़ा दी है। आयोग के लिए सबसे महत्वपूर्ण यह होगा कि पूरी प्रक्रिया राजनीतिक विवाद से अलग, पारदर्शी और नियमों के मुताबिक पूरी हो। मतदाता सूची में एक भी वास्तविक मतदाता का नाम गलत तरीके से हटना गंभीर विषय है, वहीं अपात्र नामों की मौजूदगी भी चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर सकती है। इसलिए राजनीतिक आरोपों के बीच असली कसौटी प्रक्रिया की पारदर्शिता और शिकायतों के समयबद्ध निस्तारण की होगी। फिलहाल एसआईआर उत्तराखंड में चुनावी राजनीति का नया मोर्चा बन चुका है। भाजपा आयोग के दरवाजे पर पहुंचकर कांग्रेस पर प्रक्रिया बाधित करने का आरोप लगा रही है, जबकि कांग्रेस पहले से ही एसआईआर को लेकर सवाल उठा रही है। 2027 के चुनाव से पहले मतदाता सूची को लेकर छिड़ी यह सियासी जंग आने वाले दिनों में और धार पकड़ सकती है।

शनिवार, 22 अगस्त 2026

udaydinmaan: 60 में पेंशन और 61 में ‘अफसरशाही’

udaydinmaan: 60 में पेंशन और 61 में ‘अफसरशाही’: आमजन के लिए उम्र की सीमा, साहबों के लिए आजीवन कुर्सी कभी सलाहकार तो कभी विशेषज्ञ, पद बदलते हैं पर चेहरा वही पेंशन भी जेब में और भारी-भरकम सं...

60 में पेंशन और 61 में ‘अफसरशाही’

आमजन के लिए उम्र की सीमा, साहबों के लिए आजीवन कुर्सी कभी सलाहकार तो कभी विशेषज्ञ, पद बदलते हैं पर चेहरा वही पेंशन भी जेब में और भारी-भरकम संविदा का वेतन भी जारी अफसरों के लिए अनलिमिटेड एक्सटेंशन पर उठे गंभीर सवाल देहरादून। उत्तराखंड में सरकारी नौकरी की एक अजीब कहानी है। कर्मचारी की उम्र 60 साल होती है, फाइलों में सेवा समाप्त हो जाती है, पेंशन शुरू हो जाती है, लेकिन कुछ अफसरों की सरकारी पारी खत्म नहीं होती। कुर्सी बदल जाती है, पदनाम बदल जाता है, कभी सलाहकार तो कभी विशेषज्ञ, कभी आयोग तो कभी किसी समिति में नई भूमिका मिल जाती है। यानी सरकारी नौकरी का कैलेंडर आम आदमी के लिए चलता है, लेकिन कुछ खास अफसरों के लिए शायद अतिरिक्त पन्ने भी रखे गए हैं। सवाल यह नहीं है कि किसी सेवानिवृत्त अफसर की विशेषज्ञता का इस्तेमाल क्यों किया जाए। सवाल यह है कि किस आधार पर, कितने समय के लिए और किस पारदर्शी प्रक्रिया के तहत? उत्तराखंड में सेवानिवृत्त सरकारी सेवकों की जनहित और अपरिहार्यता की स्थिति में पुनर्नियुक्ति का प्रावधान है। शासन के एक आदेश में सलाहकार, परामर्शी, विशेष कार्याधिकारी और विशेषज्ञ समन्वयक जैसे पदों पर संविदा के आधार पर तैनाती की व्यवस्था का उल्लेख है। यहीं से असली सवाल पैदा होता है। अगर सरकार को किसी अफसर का अनुभव इतना जरूरी लगता है कि रिटायरमेंट के बाद भी उसे सरकारी काम सौंपना पड़े, तो फिर क्या राज्य में नई पीढ़ी के अधिकारियों और विशेषज्ञों की कमी है? और अगर कमी है तो उसे दूर करने की योजना क्या है? उत्तराखंड का युवा नौकरी के लिए परीक्षा देता है। हजारों युवा सालों तैयारी करते हैं। रिक्तियों का इंतजार करते हैं। भर्ती परीक्षाओं की तारीख देखते हैं। कभी परीक्षा टलती है, कभी परिणाम का इंतजार होता है। दूसरी तरफ सरकारी व्यवस्था में ऐसी तस्वीर दिखाई देती है जिसमें रिटायर होने के बाद भी अनुभवी अफसरों के लिए सरकारी दरवाजे बंद नहीं होते। यह विरोधाभास सवाल पूछता है। क्या सरकारी व्यवस्था अनुभव के नाम पर एक ही चेहरे को बार-बार मौका देती रहेगी? सरकार कह सकती है कि अनुभवी अफसरों की जरूरत है। बिल्कुल है। अनुभव किसी भी प्रशासन की पूंजी है। लेकिन अनुभव और स्थायी सरकारी पुनर्वास में अंतर है। किसी विशेष परियोजना के लिए विशेषज्ञ की जरूरत हो तो निश्चित अवधि की नियुक्ति समझ में आती है। लेकिन अगर रिटायरमेंट के बाद लगातार नई जिम्मेदारियां मिलती रहें तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या सरकारी व्यवस्था में पदों का एक अनौपचारिक पोस्ट-रिटायरमेंट क्लब तैयार हो रहा है? और यह सवाल सिर्फ एक सरकार का नहीं है। सत्ता बदलती है, चेहरे बदलते हैं, लेकिन यह व्यवस्था कई बार अपना रास्ता खोज लेती है। लोकतंत्र में कुर्सी किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं होती। सरकारी पद जनता के पैसे से चलते हैं। इसलिए जनता को यह जानने का अधिकार है कि रिटायरमेंट के बाद किसी अधिकारी की पुनर्नियुक्ति क्यों की गई, उसके लिए चयन की प्रक्रिया क्या रही, कितने उम्मीदवारों पर विचार हुआ और उसकी नियुक्ति की समयसीमा क्या है। वरना विशेषज्ञता शब्द धीरे-धीरे पहचान का दूसरा नाम बन सकता है। उत्तराखंड जैसे युवा राज्य में यह बहस और जरूरी है। यहां बेरोजगार युवाओं की सबसे बड़ी शिकायत सिर्फ नौकरी की कमी नहीं, बल्कि अवसरों की समानता को लेकर भी है। जब युवा देखता है कि एक ओर सरकारी पदों के लिए उम्र सीमा खत्म हो जाती है और दूसरी ओर कुछ रिटायर अफसरों के लिए सरकारी व्यवस्था में नई भूमिकाएं निकल आती हैं, तो उसके मन में सवाल पैदा होना स्वाभाविक है। सरकार को इस व्यवस्था के लिए एक साफ नीति बनानी चाहिए। रिटायरमेंट के बाद नियुक्ति अपवाद हो, परंपरा नहीं। हर पुनर्नियुक्ति के साथ कारण सार्वजनिक हो। पद की अवधि तय हो। काम का स्पष्ट दायरा हो। प्रदर्शन की समीक्षा हो। और जहां काम किसी नियमित सेवा अधिकारी या नए विशेषज्ञ से कराया जा सकता है, वहां सिर्फ पुराने प्रशासनिक संपर्कों के आधार पर नियुक्ति न हो। क्योंकि लोकतंत्र में अनुभव जरूरी है, लेकिन अवसरों का दरवाजा हमेशा एक ही पीढ़ी के लिए खुला रहना जरूरी नहीं है। उत्तराखंड को अब यह तय करना होगा कि सरकारी सेवा का मतलब 60 साल की उम्र में खत्म होने वाली नौकरी है या फिर कुछ लोगों के लिए सरकारी व्यवस्था में चलती रहने वाली दूसरी पारी? अगर दूसरी पारी जरूरी है तो उसके नियम सबके सामने होने चाहिए। वरना जनता यही पूछेगीकृकि सरकारी नौकरी से रिटायरमेंट हुआ है या सिर्फ पदनाम से?

बेटी का न्याय बनाम ‘सियासी जंग’

अंकिता भंडारी केस में आखिर कब तक चलेगी बयानबाजी सीबीआई जांच पर खिंची तलवारों के बीच सवाल दरकिनार अंकिता की आत्मा को न्याय चाहिए, राजनीति की रोटियां नहीं प्रकरण पर सियासत तेज,जांच अदालत में या बयानों के मंच पर देहरादून। अंकिता प्रकरण उत्तराखंड के लिए सिर्फ एक मुकदमा नहीं है। यह उस भरोसे का सवाल है, जो एक बेटी के परिवार से लेकर पूरे समाज तक फैला हुआ है। ऐसे मामले में सबसे जरूरी चीज हैकृन्याय। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि न्याय की इस लंबी यात्रा के बीच राजनीति लगातार अपना रास्ता खोज लेती है। कांग्रेस आरोप लगा रही है कि अंकिता प्रकरण में सीबीआई जांच को लेकर सरकार और जांच एजेंसी की भूमिका सवालों के घेरे में है। दूसरी ओर सत्ता पक्ष का कहना है कि कांग्रेस इस संवेदनशील मामले को राजनीतिक मुद्दा बनाने में जुटी है और केंद्रीय जांच ब्यूरो तथ्यों एवं साक्ष्यों के आधार पर नियमानुसार जांच कर रही है। यहीं से असली सवाल पैदा होता हैकृकि क्या किसी जांच की दिशा बयानबाजी से तय होगी या सबूतों से? किसी भी आपराधिक मामले में अदालत के सामने आरोप नहीं, साक्ष्य टिकते हैं। जांच एजेंसी का काम प्रेस कांफ्रेंस में फैसला सुनाना नहीं, बल्कि उपलब्ध तथ्यों, दस्तावेजों, बयानों और वैज्ञानिक साक्ष्यों की पड़ताल करना है। सीबीआई हो या कोई दूसरी जांच एजेंसी, उसकी जांच का अंतिम मूल्यांकन अदालत में होना है। लेकिन राजनीति को अदालत का इंतजार कम ही पसंद आता है। एक तरफ कांग्रेस सवाल पूछ रही है। दूसरी तरफ भाजपा उन सवालों को राजनीतिक साजिश बताकर खारिज कर रही है। टीवी स्क्रीन और सोशल मीडिया पर आरोप-प्रत्यारोप का शोर बढ़ता जा रहा है। मगर इस शोर में सबसे महत्वपूर्ण आवाज कहीं पीछे छूटने का खतरा हैकृअंकिता के परिवार की न्याय की आवाज। कांग्रेस यदि सीबीआई जांच पर सवाल उठाती है तो उसे सिर्फ राजनीतिक बयान देने के बजाय ठोस तथ्यों के साथ अपनी आपत्तियां सामने रखनी चाहिए। कौन-सा साक्ष्य नजरअंदाज हुआ? किस बिंदु पर जांच में कमी है? किस तथ्य की अनदेखी की गई? जनता को यह बताया जाना चाहिए। उधर सरकार और भाजपा के पास भी केवल यह कह देना पर्याप्त नहीं कि सीबीआई स्वतंत्र एजेंसी है। जनता का भरोसा सिर्फ इस वाक्य से नहीं बनता। जांच की प्रक्रिया में पारदर्शिता, अदालत में मजबूत पैरवी और पीड़ित परिवार को समय पर न्यायकृयही भरोसा पैदा करते हैं। क्योंकि जनता अब राजनीतिक दावों से आगे देखना चाहती है। अंकिता प्रकरण में वर्षों से न्याय की प्रतीक्षा कर रहे परिवार के लिए हर नया बयान शायद पुराने जख्म को फिर खोलता है। इसलिए राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि किसी बेटी की त्रासदी को चुनावी पोस्टर, प्रेस नोट और राजनीतिक भाषण का विषय बनाने से न्याय नहीं मिलता और यहां एक असुविधाजनक सवाल दोनों पक्षों से है। अगर जांच सही है तो अदालत में साक्ष्य बोलने दीजिए। अगर जांच में कमी है तो ठोस तथ्य सामने रखिए। सिर्फ राजनीति हो रही है कहकर हर सवाल को खारिज कर देना भी लोकतांत्रिक जवाब नहीं है। और हर जांच को साजिश बताकर संदेह पैदा करना भी न्याय प्रक्रिया को मजबूत नहीं करता। उत्तराखंड के लोगों ने इस प्रकरण में बहुत कुछ देखा हैकृआक्रोश, आंदोलन, राजनीतिक आरोप, वादे और फिर लंबी कानूनी प्रक्रिया। अब जनता को बहस नहीं, परिणाम चाहिए। राजनीति अपनी जगह है। जांच अपनी जगह। अदालत अपनी जगह। अंकिता के मामले में सबसे जरूरी यह है कि जांच निष्पक्ष हो, साक्ष्यों के आधार पर हो और अदालत के सामने पूरा सच पहुंचे। दोषी कौन है, इसका फैसला राजनीतिक दलों के मंच से नहीं, कानून और न्यायालय की प्रक्रिया से होना चाहिए। क्योंकि आखिर में सवाल यह नहीं रहेगा कि किस पार्टी ने कितनी प्रेस कांफ्रेंस कीं। सवाल यह रहेगा कि अंकिता को न्याय मिला या नहीं? और इस सवाल का जवाब किसी पार्टी के प्रवक्ता के पास नहीं, न्याय की प्रक्रिया के पास होना चाहिए।

वोटर लिस्ट पर ‘सियासी जंग’

ड्रामेबाजी और घुसपैठिए के बयानों में उलझा लोकतंत्र का असली सवाल मतदाता सूची के बहाने कांग्रेस की घेराबंदी और भाजपा का काउंटर अटैक अगर सूची में खोट नहीं तो इतने सवाल क्यों और खोट है तो सुधार कब होगा विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर कांग्रेस आक्रामक, भाजपा ने साधा निशाना देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में इन दिनों एक दिलचस्प तस्वीर दिखाई दे रही है। एक तरफ कांग्रेस विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर लगातार सवाल उठा रही है, दूसरी तरफ भाजपा कांग्रेस की इस मुहिम को ड्रामेबाजी बताकर उसके जमीनी संगठन पर सवाल खड़े कर रही है। भाजपा का तर्क है कि कांग्रेस जमीनी राजनीति में कमजोर हो चुकी है और अब मतदाता सूची के मुद्दे को राजनीतिक हथियार बनाने की कोशिश कर रही है। लेकिन लोकतंत्र में असली सवाल यह नहीं कि कौन किसे ड्रामेबाज कह रहा है। असली सवाल यह है कि मतदाता सूची में गड़बड़ी है तो उसे ठीक कौन करेगा और अगर गड़बड़ी नहीं है तो इतने सवाल क्यों उठ रहे हैं? भाजपा कह रही है कि उत्तराखंड की सरकार यहां की जनता चुनेगी, कोई घुसपैठिया नहीं। राजनीतिक संदेश साफ हैकृमतदाता सूची की शुचिता को राष्ट्रीय सुरक्षा और पहचान के सवाल से जोड़कर कांग्रेस पर दबाव बनाना। भाजपा के लिए यह मुद्दा चुनावी रणनीति का हिस्सा भी है और अपने समर्थक मतदाताओं को सक्रिय करने का माध्यम भी। कांग्रेस के सामने चुनौती दूसरी है। सिर्फ प्रेस कांफ्रेंस, बयान और आरोपों से चुनाव नहीं जीते जाते। चुनाव बूथ पर लड़ा जाता है। मतदाता से संपर्क, संगठन की सक्रियता, स्थानीय मुद्दों पर पकड़ और कार्यकर्ताओं की मौजूदगीकृयही जमीनी राजनीति की असली परीक्षा है। यदि कांग्रेस एसआईआर को लेकर गंभीर है तो उसे बूथ स्तर तक अपने प्रतिनिधि उतारने होंगे, प्रभावित मतदाताओं की सूची तैयार करनी होगी और तथ्य के साथ चुनाव आयोग के सामने आपत्तियां रखनी होंगी। वरना भाजपा का ड्रामेबाजी वाला आरोप कांग्रेस के खिलाफ राजनीतिक हथियार बन सकता है। लेकिन भाजपा को भी यह नहीं भूलना चाहिए कि मतदाता सूची कोई राजनीतिक प्रचार का दस्तावेज नहीं, लोकतंत्र की बुनियाद है। किसी वास्तविक भारतीय मतदाता का नाम केवल प्रक्रिया की गड़बड़ी के कारण छूटता है तो उसका नुकसान किसी पार्टी को नहीं, लोकतंत्र को होता है। इसलिए एसआईआर को लेकर उठ रहे हर गंभीर सवाल का जवाब तथ्यों से देना जरूरी है। घुसपैठिया नहीं, जनता चुनेगी सरकारकृयह राजनीतिक नारा सुनने में प्रभावी हो सकता है, लेकिन लोकतंत्र की असली ताकत मतदाता की पहचान से आगे उसकी स्वतंत्र पसंद में है। मतदाता कौन है, यह कानून और चुनावी प्रक्रिया तय करेगी और किसे वोट देना है, यह जनता तय करेगी और यहीं 2027 की लड़ाई दिलचस्प होती जा रही है। भाजपा अपने संगठन और बूथ नेटवर्क के भरोसे कांग्रेस पर बढ़त का दावा कर रही है। कांग्रेस सत्ता विरोधी माहौल, बेरोजगारी, भर्ती विवाद, महंगाई, पलायन और स्थानीय मुद्दों को हथियार बनाने की कोशिश में है। लेकिन इन मुद्दों को वोट में बदलने के लिए कांग्रेस को बयानबाजी से कहीं आगे जाना होगा। कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा खतरा भाजपा नहीं, उसकी अपनी जमीनी निष्क्रियता है। यदि पार्टी के नेता राजधानी में एसआईआर पर रोज बयान देते रहें और गांव-कस्बे के बूथ पर कार्यकर्ता दिखाई न दे, तो राजनीति प्रेस नोट में जरूर जिंदा रह सकती है, चुनाव में नहीं। दूसरी ओर भाजपा यदि संगठन की ताकत के भरोसे यह मान ले कि चुनाव पहले ही जीत लिया गया है तो वह भी गलती करेगी। उत्तराखंड का मतदाता कई बार सत्ता को चौंकाने की क्षमता रखता है। पहाड़ के गांव से लेकर मैदानी शहर तक मतदाता अपने मुद्दों पर फैसला करता है और चुनाव के दिन राजनीतिक समीकरणों की सारी गणित बदल सकता है। इसलिए एसआईआर का मुद्दा सिर्फ कांग्रेस बनाम भाजपा की लड़ाई नहीं होना चाहिए। यह सवाल होना चाहिए कि किसका नाम मतदाता सूची में है, किसका नाम नहीं है और क्यों नहीं है। चुनावी शोर में यह बुनियादी सवाल दबना नहीं चाहिए। क्योंकि सरकार न भाजपा का मीडिया मैनेजमेंट चुनेगा, न कांग्रेस की प्रेस कांफ्रेंस। सरकार वही चुनेगा जिसके सामने आखिर में मतदाता अपना वोट डालेगा और उस मतदाता को घुसपैठिया कहकर नहीं, उसके अधिकार और भरोसे के साथ देखना होगा। 2027 की असली लड़ाई अभी शुरू हुई है। एसआईआर उसका एक अध्याय है। फैसला पूरी किताब पर होगा।

शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

udaydinmaan: गुलदार और भालू के बाद ‘नई आफत’

udaydinmaan: गुलदार और भालू के बाद ‘नई आफत’: पहाड़ों में खूंखार आवारा कुत्तों का कहर, गांवों और रास्तों पर बना दहशत का माहौल चमोली के नारायणबगड़ में हिंसक कुत्तों के डर से 10 स्कूलों में ...

गुलदार और भालू के बाद ‘नई आफत’

पहाड़ों में खूंखार आवारा कुत्तों का कहर, गांवों और रास्तों पर बना दहशत का माहौल चमोली के नारायणबगड़ में हिंसक कुत्तों के डर से 10 स्कूलों में 4 दिन का अवकाश घोषित स्कूल बंद होने के चलते अब घर बैठे आनलाइन माध्यम से पढ़ाई करने को मजबूर छात्र मीलों पैदल सफर तय कर स्कूल जाने वाले नौनिहालों और अभिभावकों की उड़ी रातों की नींद देहरादून। पहाड़ में वन्यजीवों के बाद अब आवारा और हिंसक कुत्तों का आतंक भी लोगों के लिए चिंता का सबब बनता जा रहा है। चमोली जिले के नारायणबगड़ क्षेत्र में आवारा और हिंसक कुत्तों के बढ़ते आतंक को देखते हुए प्रशासन ने स्कूली बच्चों की सुरक्षा के मद्देनजर बड़ा फैसला लिया है। क्षेत्र के दस विद्यालयों में 20 अगस्त से 23 अगस्त तक छात्र-छात्राओं के लिए अवकाश घोषित कर दिया गया है। इस दौरान विद्यालयों में ऑनलाइन माध्यम से पढ़ाई जारी रखने के निर्देश दिए गए हैं। पहाड़ के दूरदराज इलाकों में बच्चों का स्कूल तक पहुंचना पहले ही किसी चुनौती से कम नहीं है। कई बच्चे पैदल रास्तों से होकर विद्यालय पहुंचते हैं। ऐसे में रास्तों में हिंसक कुत्तों के झुंड का खतरा बच्चों और अभिभावकों की चिंता बढ़ा रहा है। प्रशासन को बच्चों की सुरक्षा के लिए स्कूल बंद करने जैसा कदम उठाना पड़ा, यह स्थिति की गंभीरता को दर्शाता है। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में कभी बाघ और गुलदार की दस्तक, कभी भालू का आतंक और अब आवारा कुत्तों के झुंड ग्रामीण आबादी के सामने नई चुनौती बनते जा रहे हैं। सवाल यह है कि जिन पहाड़ी क्षेत्रों में बच्चों को रोजाना कई किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल पहुंचना पड़ता है, वहां उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी आखिर किसकी है? नारायणबगड़ क्षेत्र में आवारा और हिंसक कुत्तों के आतंक को लेकर जिलाधिकारी चमोली की ओर से दिए गए निर्देशों के बाद मुख्य शिक्षा अधिकारी कार्यालय ने विद्यालयों के लिए आदेश जारी किया। आदेश में संबंधित विकासखंड शिक्षा अधिकारी और उप शिक्षा अधिकारी को इसका अनुपालन सुनिश्चित कराने के निर्देश दिए गए हैं। इसके साथ ही अवकाश की अवधि में संबंधित विद्यालयों के शिक्षकों को आनलाइन माध्यम से शिक्षण कार्य संचालित करने को कहा गया है, ताकि बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह प्रभावित न हो।इस संबंध में मुख्य शिक्षा अधिकारी, चमोली की ओर से जारी आदेश में कहा गया है कि नारायणबगड़ क्षेत्र में आवारा और हिंसक कुत्तों के अत्यधिक आतंक को देखते हुए जिलाधिकारी चमोली के निर्देशों के अनुपालन में छात्र-छात्राओं की सुरक्षा के दृष्टिगत यह निर्णय लिया गया है। आदेश के मुताबिक नारायणबगड़ क्षेत्र के राजकीय इंटर कालेज नारायणबगड़, राजकीय बालिका इंटर कालेज नारायणबगड़, सरस्वती शिशु मंदिर नारायणबगड़, उत्तरांचल विद्या निकेतन नारायणबगड़, राजकीय प्राथमिक विद्यालय नारायणबगड़, श्री गुरु राम राय पब्लिक स्कूल पैंती, राजकीय प्राथमिक विद्यालय नलंगाव, राजकीय इंटर कालेज नलंगाव, माडर्न चिल्ड्रन एकेडमी नारायणबगड़ और उत्तराखंड विद्या निकेतन नारायणबगड़ में यह आदेश लागू रहेगा। बाक्स वन्यजीवों के बाद आवारा कुत्तों का संकट उत्तराखंड में मानव-वन्यजीव संघर्ष लंबे समय से गंभीर समस्या बना हुआ है। पहाड़ के गांवों में बाघ, गुलदार और भालू की आवाजाही से ग्रामीणों में भय बना रहता है। अब कई क्षेत्रों में आवारा और हिंसक कुत्तों के झुंड भी लोगों की सुरक्षा के लिए चुनौती बन रहे हैं। नारायणबगड़ का ताजा मामला इस बात का संकेत है कि पहाड़ी क्षेत्रों में मानव सुरक्षा का संकट केवल जंगल से आने वाले वन्यजीवों तक सीमित नहीं रह गया है। सड़कों, बाजारों और आबादी के आसपास घूमने वाले आवारा कुत्ते भी प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती बन चुके हैं। चार दिन के लिए स्कूल बंद करने का फैसला बच्चों की सुरक्षा के लिहाज से तत्काल राहत जरूर है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि 23 अगस्त के बाद क्या होगा? यदि कुत्तों के आतंक पर स्थायी नियंत्रण नहीं हुआ तो बच्चों की पढ़ाई, अभिभावकों की चिंता और ग्रामीणों की सुरक्षा का सवाल फिर सामने खड़ा होगा। अब निगाह प्रशासन की अगली कार्रवाई पर है कि वह केवल स्कूल बंद करने तक सीमित रहता है या आवारा और हिंसक कुत्तों की समस्या के स्थायी समाधान के लिए ठोस कदम भी उठाता है।

‘एक्स्ट्रा इनकम’ का लाइसेंस

उत्तराखंड में डाक्टरों को भी जल्द ही मिलेगा शाम का बाजार मजबूरी से निकलकर एक्स्ट्रा इनकम बनी देशभर में अधिकार डाक्टरों की निजी प्रैक्टिस की छूट से व्यवस्था पर उठेंगे सवाल देहरादून। सरकारी नौकरी में तनख्वाह मिलती है। तनख्वाह के बदले कर्मचारी से उम्मीद की जाती है कि वह अपने पद की जिम्मेदारी ईमानदारी से निभाएगा। लेकिन धीरे-धीरे इस व्यवस्था में एक नया शब्द घुस आया हैकृएक्स्ट्रा इनकम। पहले यह शब्द फुसफुसाकर बोला जाता था। अब लगता है कि इसे व्यवस्था ने बाकायदा स्वीकार करना शुरू कर दिया है। पुलिस में ऊपर की कमाई की कहानियां पुरानी हैं। सरकारी दफ्तरों में फाइल आगे बढ़ाने की अपनी फीस है। कहीं काम कराने की कीमत है, कहीं काम रोकने की कीमत। कहीं ठेका है तो कहीं कमीशन। कहीं परमिट है तो कहीं सिफारिश। जनता को धीरे-धीरे समझा दिया गया कि सरकारी नौकरी की असली कमाई वेतन पर्ची में नहीं, उसके बाहर है और अब बेचारे डाक्टर भी बच गए थे। सरकार ने कहाकृउन्हें भी शाम को मरीज देखने दीजिए। खबर सुनकर शायद कोई कहेगा कि इसमें बुराई क्या है? डाक्टर हैं, मेहनत करेंगे, अतिरिक्त कमाई करेंगे। लेकिन असली सवाल यहीं से शुरू होता है। अगर सरकारी अस्पताल की नौकरी के बाद उसी सरकारी अस्पताल में निजी प्रैक्टिस होगी, तो मरीज सरकारी रहेगा या निजी? डाक्टर सरकारी रहेगा या निजी? अस्पताल सरकारी रहेगा या कमाई का साझा मंच? उत्तराखंड में सरकारी चिकित्सकों को शाम के समय सरकारी अस्पतालों में सशर्त निजी प्रैक्टिस की अनुमति देने की तैयारी है। यानी अब व्यवस्था का मॉडल कुछ ऐसा दिखाई दे रहा हैकृदिन में सरकार की नौकरी, शाम को उसी व्यवस्था में निजी कमाई। इसे सुविधा कहिए, सुधार कहिए या डाक्टरों को रोकने की कोशिश। लेकिन जनता का सवाल इससे खत्म नहीं होता। क्योंकि सरकारी अस्पताल में आने वाला गरीब मरीज यह सोचकर आता है कि यहां उसे निजी अस्पताल की तुलना में राहत मिलेगी। वह डाक्टर की फीस और अस्पताल के खर्च से बचने की उम्मीद लेकर आता है। अगर उसी सरकारी परिसर में निजी प्रैक्टिस का रास्ता खुलता है तो सबसे पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि सरकारी सेवा और निजी सेवा के बीच दीवार कहां होगी? कहीं ऐसा तो नहीं कि सरकारी व्यवस्था धीरे-धीरे ऐसी दुकान बन जाए जिसमें काउंटर दो होंकृएक सरकार के नाम पर और दूसरा निजी कमाई के नाम पर? यह सवाल डाक्टरों के खिलाफ नहीं है। बिल्कुल नहीं। डाक्टर मेहनत करते हैं, कठिन परिस्थितियों में काम करते हैं, दूरदराज के इलाकों में सेवाएं देते हैं। स्वास्थ्य विभाग में डाक्टरों की कमी भी वास्तविक समस्या है और सरकारी आंकड़ों में मेडिकल आफिसर और विशेषज्ञों के पदों पर रिक्तियां दर्ज हैं। लेकिन सवाल व्यवस्था का है। अगर डाक्टरों को रोकने के लिए उन्हें अतिरिक्त कमाई का रास्ता देना जरूरी हो गया है, तो अगला सवाल यह होना चाहिए कि पुलिस को क्या दिया जाएगा? फिर पटवारी क्यों पीछे रहे? फिर तहसील का कर्मचारी क्यों पीछे रहे? फिर वह क्लर्क क्यों पीछे रहे जिसकी मेज पर आपकी फाइल पड़ी है? फिर हर सरकारी विभाग में एक बोर्ड क्यों न लगा दिया जाए।कृसरकारी सेवा समय-सुबह से शाम तक और एक्स्ट्रा इनकम का समय-शाम के बाद। व्यंग्य लग रहा है? लेकिन खतरा यहीं है। जब व्यवस्था किसी अनौपचारिक एक्स्ट्रा इनकम को रोकने में असफल होती है, तो उसके सामने दो रास्ते होते हैं। पहलाकृभ्रष्टाचार और अनौपचारिक कमाई पर कठोर कार्रवाई। दूसराकृउसे किसी न किसी रूप में वैध या स्वीकार्य बनाने का रास्ता। दूसरा रास्ता आसान है। जनता भी धीरे-धीरे अभ्यस्त हो जाती है। पहले लोग कहते थेकृबिना पैसे काम नहीं होता। फिर कहने लगेकृसाहब की भी मजबूरी है। अब कहीं ऐसा न हो कि अगली पीढ़ी पूछेकृकि सरकारी नौकरी में एक्स्ट्रा इनकम कितनी है?यही असली खतरा है। सरकार को डाक्टरों के लिए अतिरिक्त कमाई का रास्ता खोलना है तो नियम इतने साफ होने चाहिए कि सरकारी सेवा की कीमत पर निजी कमाई का खेल न हो। मरीज को पहले यह अधिकार होना चाहिए कि उसे सरकारी अस्पताल में सरकारी सेवा किस कीमत पर और किस व्यवस्था में मिलेगी। क्योंकि सरकारी अस्पताल गरीब की मजबूरी नहीं, उसका अधिकार है। सरकारी डाक्टर सिर्फ एक कर्मचारी नहीं होता। वह राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था का चेहरा होता है। जिस डाक्टर को जनता अपने टैक्स से वेतन देती है, उससे जनता को यह उम्मीद भी होती है कि उसका इलाज प्राथमिकता होगा, न कि उसकी जेब और यही सवाल पुलिस और दूसरे विभागों पर भी लागू होता है। सरकारी नौकरी अगर सेवा है तो सेवा की कीमत वेतन है। अगर वेतन कम है तो वेतन बढ़ाइए। काम का दबाव ज्यादा है तो व्यवस्था सुधारिए। डाक्टरों की कमी है तो भर्ती कीजिए। अस्पतालों में सुविधाएं नहीं हैं तो सुविधाएं बढ़ाइए। लेकिन हर समस्या का समाधान एक्स्ट्रा इनकम क्यों बनता जा रहा है? कहीं ऐसा तो नहीं कि सरकार व्यवस्था सुधारने के बजाय व्यवस्था की कमियों को कमाई का अवसर बनाकर छोड़ रही है? जनता को सरकारी अस्पताल में इलाज चाहिए, सरकारी दफ्तर में काम चाहिए, पुलिस से सुरक्षा चाहिए और विभागों से जवाबदेही। उसे यह नहीं चाहिए कि हर सेवा के साथ कोई एक्स्ट्रा जुड़ा हुआ हो। क्योंकि जिस दिन सरकारी सेवा और निजी कमाई के बीच की रेखा मिट गई, उस दिन सबसे बड़ा नुकसान गरीब का होगा। फिर सरकारी अस्पताल अस्पताल नहीं रहेगा, सरकारी दफ्तर दफ्तर नहीं रहेगा और सरकारी नौकरी नौकरी नहीं रहेगीकृसब कुछ एक बाजार में बदल जाएगा और बाजार में सबसे कमजोर हमेशा वही होता है जिसके पास पैसे कम होते हैं। इसलिए सवाल डाक्टरों को अतिरिक्त कमाई की अनुमति देने से ज्यादा बड़ा है। क्या सरकार सरकारी व्यवस्था को मजबूत कर रही है या धीरे-धीरे जनता को यह समझा रही है कि हर सरकारी सेवा के पीछे एक एक्स्ट्रा देना सामान्य बात है? क्योंकि ‘एक्स्ट्रा इनकम’ की यह छोटी-सी दरार कल पूरी व्यवस्था की दीवार में बड़ा छेद बन सकती है।

आजादी के ‘महामंत्र’ पर राजनीति

वंदे मातरम के गायन पर आमने-सामने भाजपा और कांग्रेस पूरे गायन पर उठे सवाल और सियासत का बन गया नया केंद्र भाजपा ने बनाया हथियार, कांग्रेस की मंशा पर उठाए सवाल देहरादून। जिस देश की आजादी की लड़ाई में वंदे मातरम सिर्फ एक गीत नहीं, बल्कि अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ प्रतिरोध की आवाज बन गया था, उसी देश में इसके गायन को लेकर राजनीतिक विवाद खड़ा होना निश्चित तौर पर गंभीर सवाल पैदा करता है। कांग्रेस की ओर से कार्यक्रमों में वंदे मातरम के पूरे गायन को लेकर उठे सवालों ने भाजपा को कांग्रेस पर हमला करने का मौका दे दिया है। भाजपा इसे राष्ट्रभावना से जोड़कर कांग्रेस के खिलाफ राजनीतिक हथियार बना रही है, जबकि कांग्रेस की ओर से इसे राजनीतिक मुद्दा बनाए जाने पर सवाल उठाए जा रहे हैं। आजादी के आंदोलन के दौर में वंदे मातरम ने लोगों के भीतर राष्ट्रीय चेतना जगाने का काम किया। स्वतंत्रता सेनानियों के नारों में यह गूंजता था और ब्रिटिश शासन के विरोध का प्रतीक बन चुका था। ऐसे में इस गीत को लेकर किसी भी तरह का विवाद भावनात्मक रूप से देश के बड़े वर्ग को प्रभावित करता है। भाजपा का आरोप है कि कांग्रेस का रवैया राष्ट्रवादी प्रतीकों को लेकर हमेशा से दोहरा रहा है। पार्टी नेताओं का कहना है कि जिस वंदे मातरम को स्वतंत्रता सेनानियों ने अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष में अपनी आवाज बनाया, उसके गायन से कांग्रेस का पीछे हटना दुर्भाग्यपूर्ण है। भाजपा इस मुद्दे को कांग्रेस की कथित तुष्टीकरण की राजनीति से जोड़कर भी देख रही है। हालांकि इस पूरे विवाद का दूसरा पहलू भी है। वंदे मातरम के इतिहास, इसके विभिन्न पदों और स्वतंत्रता आंदोलन में इसकी भूमिका को समझे बिना इसे सिर्फ राजनीतिक नारे में बदल देना भी उचित नहीं होगा। राष्ट्रगीत का सम्मान और उसके राजनीतिक इस्तेमाल के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है। असल सवाल यह है कि क्या देशभक्ति का प्रमाण अब इस बात से तय होगा कि कौन कितना जोर से वंदे मातरम गाता है? अगर कोई दल या नेता इसके गायन को लेकर सवाल उठाता है तो उससे सवाल जरूर होना चाहिए। लेकिन इसी के साथ यह भी पूछा जाना चाहिए कि आजादी के आंदोलन के प्रतीकों का इस्तेमाल सिर्फ चुनावी राजनीति के लिए क्यों किया जा रहा है? वंदे मातरम् की ताकत उसकी धुन में नहीं, उस इतिहास में है जिसमें यह करोड़ों भारतीयों की आवाज बना था। इसलिए इसे राजनीतिक अखाड़े में खींचने के बजाय उसके ऐतिहासिक महत्व और राष्ट्रीय भावना का सम्मान किया जाना चाहिए। कांग्रेस के लिए भी यह राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील मामला है। अगर उसके किसी कार्यक्रम में राष्ट्रगीत के गायन को लेकर असमंजस या अनिच्छा दिखाई देती है तो पार्टी को देश के सामने अपना पक्ष साफ करना चाहिए। उसे यह स्पष्ट करना होगा कि क्या वह वंदे मातरम के सम्मान और उसके गायन के खिलाफ है या केवल उसके राजनीतिक इस्तेमाल का विरोध कर रही है। क्योंकि जनता के लिए संदेश महत्वपूर्ण है। जिस गीत को स्वतंत्रता आंदोलन में देश की आजादी के लिए संघर्ष कर रहे लोगों ने अपनी आवाज बनाया, उसके प्रति किसी भी राजनीतिक दल की असंवेदनशीलता सवालों के घेरे में आएगी। लेकिन भाजपा को भी यह समझना होगा कि राष्ट्रभक्ति किसी एक राजनीतिक दल की निजी संपत्ति नहीं है। वंदे मातरम किसी पार्टी का गीत नहीं, देश के स्वतंत्रता संघर्ष की ऐतिहासिक विरासत है। इसलिए इसे लेकर राजनीति जितनी कम होगी, सम्मान उतना ही ज्यादा रहेगा। देश को आज भी वंदे मातरम की जरूरत हैकृलेकिन राजनीतिक हथियार के रूप में नहीं, उस साझा राष्ट्रीय चेतना के प्रतीक के रूप में जिसने कभी अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती देने का साहस दिया था।

लोकतंत्र की पहली शर्त पर ‘पालिटिकल वार’

उत्तराखंड में मतदाता सूची पर बढ़ी रार, मतदाता सूची की शुद्धि पर गरमाई राजनीति वास्तविक मतदाताओं के नाम कटने का खतरा, कांग्रेस ने सत्यापन की उठाई मांग सूची की सफाई पर विरोध क्यों, भाजपा बोली फर्जी नामों को हटाना बेहद जरूरी देहरादून। लोकतंत्र की सबसे पहली शर्त है कि मतदाता सूची साफ हो, सही हो और उसमें वही नाम हों जो वास्तव में मतदान के पात्र हैं। लेकिन उत्तराखंड में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर सियासत लगातार गरमाती जा रही है। कांग्रेस इस प्रक्रिया पर सवाल उठा रही है, जबकि भाजपा इसे मतदाता सूची को शुद्ध करने की जरूरी कवायद बता रही है। सवाल अब यह उठ रहा है कि अगर एसआईआर का मकसद मतदाता सूची को अधिक पारदर्शी और त्रुटिरहित बनाना है तो कांग्रेस को इससे परेशानी क्यों हो रही है? कांग्रेस का तर्क है कि पुनरीक्षण की प्रक्रिया में वास्तविक मतदाताओं के नाम कटने का खतरा है और किसी भी पात्र नागरिक को मतदान के अधिकार से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। पार्टी लगातार मांग कर रही है कि प्रक्रिया पारदर्शी हो और प्रत्येक नाम हटाने से पहले उचित सत्यापन किया जाए। लेकिन भाजपा कांग्रेस के इस विरोध को राजनीतिक चश्मे से देख रही है। भाजपा नेताओं का सवाल है कि अगर मतदाता सूची में फर्जी, डुप्लीकेट या अपात्र नाम हैं तो उन्हें हटाने का विरोध क्यों? लोकतंत्र में मतदाता सूची जितनी साफ होगी, चुनाव उतने ही निष्पक्ष होंगे। यहीं से एसआईआर सिर्फ प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रह जाता, बल्कि राजनीतिक बहस का मुद्दा बन जाता है। कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर वह चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता की बात करती है तो उसे मतदाता सूची के शुद्धिकरण का सिद्धांततः विरोध क्यों करना चाहिए? उसे यह स्पष्ट करना होगा कि वह एसआईआर के खिलाफ है या उस तरीके के खिलाफ जिसमें एसआईआर को लागू किया जा रहा है। दूसरी तरफ सरकार और निर्वाचन तंत्र की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। सिर्फ यह कह देना पर्याप्त नहीं कि सूची शुद्ध की जा रही है। यह भी सुनिश्चित करना होगा कि वास्तविक मतदाता का नाम गलती से न कटे। खासकर पहाड़ी और दूरदराज के इलाकों में जहां पलायन, अस्थायी निवास और दस्तावेजों से जुड़े सवाल पहले से जटिल हैं, वहां विशेष सावधानी की जरूरत है। मतदाता सूची की शुचिता लोकतंत्र की बुनियाद है। इसमें फर्जी नाम नहीं होने चाहिए, लेकिन किसी वास्तविक नागरिक का नाम भी सिर्फ तकनीकी गलती से नहीं हटना चाहिए। कांग्रेस को बताना होगा कि उसे शुद्ध मतदाता सूची से परेशानी है या प्रक्रिया से और सरकार को बताना होगा कि वह शुद्धिकरण के नाम पर किसी वास्तविक मतदाता के अधिकार की रक्षा कैसे करेगी। आखिर चुनाव सिर्फ जीतने-हारने का खेल नहीं है। मतदाता सूची में दर्ज हर नाम लोकतंत्र में एक नागरिक की आवाज है। इसलिए एसआईआर पर राजनीति हो सकती है, लेकिन मतदाता के अधिकार से खिलवाड़ नहीं। 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के बीच मतदाता सूची पर उठते सवालों को हल्के में लेना किसी भी दल के लिए राजनीतिक रूप से भारी पड़ सकता है। कांग्रेस हो या भाजपाकृदोनों को याद रखना होगा कि लोकतंत्र में सबसे बड़ा वोट बैंक कोई पार्टी नहीं, खुद मतदाता है।

चुनावी रण से पहले ‘मीडिया मैनेजमेंट’ एक्टिव

भाजपा फुल एक्टिव, कांग्रेस सुस्त, बाकी दलों की आवाज कहां मीडिया मैनेजमेंट के मोर्चे पर भाजपा सबसे आगे, कांग्रेस है पीछे चुनाव से पहले कांग्रेस के पास मौके, लेकिन प्रचार मशीनरी बंद भाजपा चला रही विज्ञप्ति-बाण, कांग्रेस का संचार तंत्र अभी सुस्त देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की औपचारिक घोषणा भले अभी बाकी हो, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी तैयारियों का रिहर्सल शुरू कर दिया है। कहीं बूथ मजबूत किए जा रहे हैं, कहीं संगठन की बैठकें हो रही हैं और कहीं टिकट के दावेदार शक्ति प्रदर्शन में जुटे हैं। लेकिन इस पूरी चुनावी तैयारी में एक ऐसा मोर्चा भी है, जहां भाजपा फिलहाल बाकी दलों से काफी आगे दिखाई दे रही हैकृमीडिया मैनेजमेंट। अखबारों के न्यूजरूम तक पहुंचने वाली प्रेस विज्ञप्तियों पर नजर डालें तो तस्वीर काफी दिलचस्प है। भाजपा की ओर से एक दिन में पांच से दस तक विज्ञप्तियां पहुंच रही हैं। बयान, कार्यक्रम, संगठनात्मक बैठकें, सरकार की उपलब्धियां, विपक्ष पर हमले और स्थानीय गतिविधियांकृहर मुद्दे को मीडिया तक पहुंचाने की कोशिश दिखाई दे रही है। इसके उलट कांग्रेस की तरफ से कई दिनों में महज एक-दो विज्ञप्तियां ही पहुंचती हैं। पार्टी के पास मुद्दे हैं, नेता हैं, बयान हैं और सरकार को घेरने के मौके भी हैं, लेकिन उन्हें लगातार और व्यवस्थित तरीके से मीडिया तक पहुंचाने की मशीनरी उतनी सक्रिय नजर नहीं आती। चुनाव में यह अंतर सिर्फ प्रेस विज्ञप्तियों का नहीं, राजनीतिक संचार की तैयारी का संकेत है। भाजपा ने लंबे समय से यह समझ लिया है कि चुनाव सिर्फ मैदान में नहीं लड़ा जाता। चुनाव की लड़ाई अखबारों, टीवी चैनलों, डिजिटल प्लेटफार्म और सोशल मीडिया पर भी लड़ी जाती है। इसलिए पार्टी के पास संगठन के साथ-साथ संदेश पहुंचाने का तंत्र भी लगातार सक्रिय रहता है। एक कार्यक्रम हुआ नहीं कि तस्वीरें तैयार। नेता ने बयान दिया नहीं कि प्रेस नोट तैयार। सरकार ने कोई उपलब्धि गिनाई नहीं कि उसका प्रचार शुरू। विपक्ष ने कोई आरोप लगाया नहीं कि उसका जवाब भी तैयार। यानी भाजपा का संदेश हैकृखबर खत्म होने से पहले हमारी प्रतिक्रिया खबर में होनी चाहिए। इसके सामने कांग्रेस का मीडिया तंत्र कई बार ऐसा दिखाई देता है जैसे पार्टी को खबर बनने के बाद खबर याद आती हो। कांग्रेस के पास बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं, कानून-व्यवस्था, महंगाई, पलायन, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मुद्दों की कमी नहीं है। सरकार को घेरने के लिए उसके पास सामग्री की पूरी फाइल है। लेकिन सवाल यह है कि उस फाइल को रोज जनता तक पहुंचाने वाला कौन है? राजनीति में मुद्दा होना पर्याप्त नहीं है। मुद्दे को जनता की भाषा में लगातार सामने रखना भी पड़ता है। कांग्रेस अगर सप्ताह में एक-दो बार प्रेस नोट जारी करके यह मान ले कि उसने विपक्ष की भूमिका निभा दी, तो भाजपा की लगातार चलने वाली मीडिया मशीनरी के सामने उसका संदेश स्वाभाविक रूप से कमजोर पड़ेगा और बाकी दल? उनकी स्थिति तो और भी कठिन है। उत्तराखंड क्रांति दल राज्य की अस्मिता, मूल निवास और क्षेत्रीय मुद्दों की राजनीति को फिर से धार देने की कोशिश कर रहा है। आम आदमी पार्टी सरकार और विपक्ष दोनों पर सवाल उठा सकती है। बसपा का अपना सामाजिक आधार है। वाम दलों के पास मुद्दों की कमी नहीं। छोटे क्षेत्रीय और नए राजनीतिक समूह भी चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे हैं। लेकिन मीडिया में मौजूदगी के मामले में इनमें से अधिकांश दल या तो कभी-कभार दिखाई देते हैं या चुनाव के करीब आते ही सक्रिय होने की उम्मीद में बैठे हैं। यहीं सबसे बड़ा खतरा है। क्योंकि मीडिया कोई चुनावी लाउडस्पीकर नहीं है, जिसे मतदान से दो महीने पहले आन कर दिया जाए। जनता को लगातार बताना पड़ता है कि पार्टी क्या सोचती है, क्या चाहती है और सत्ता में आने पर क्या करेगी। भाजपा इस मोर्चे पर फिलहाल बाकी दलों से आगे है। लेकिन कांग्रेस के लिए यह स्थिति चेतावनी भी है और अवसर भी। अगर कांग्रेस सचमुच 2027 को गंभीरता से ले रही है तो उसे सिर्फ बड़े नेताओं के दौरों और प्रेस कान्फ्रेंस तक सीमित रहने के बजाय डेली मीडिया नैरेटिव बनाना होगा। हर दिन का एक मुद्दा, सरकार पर एक सवाल, जनता की एक समस्या और उसका राजनीतिक समाधानकृयह लगातार जनता तक जाना चाहिए। क्योंकि चुनाव में जनता को वही दिखाई देता है जो लगातार दिखाई देता है। यहां एक और दिलचस्प सवाल हैकृक्या मीडिया मैनेजमेंट चुनाव जिताता है? सिर्फ मीडिया मैनेजमेंट से चुनाव नहीं जीता जा सकता। लेकिन खराब मीडिया मैनेजमेंट चुनावी संदेश को जरूर कमजोर कर सकता है। भाजपा अगर रोज दस बातें जनता तक पहुंचा रही है और कांग्रेस रोज एक बात भी मुश्किल से पहुंचा रही है तो जनता के सामने किसकी मौजूदगी ज्यादा होगी, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है और छोटे दलों के लिए तो चुनौती और बड़ी है। उनके पास संसाधन कम हो सकते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उनके पास खबरें नहीं हैं। आज डिजिटल मीडिया, सोशल मीडिया, स्थानीय पत्रकारों और क्षेत्रीय मुद्दों के माध्यम से कम खर्च में भी मजबूत राजनीतिक संवाद बनाया जा सकता है। लेकिन उसके लिए चाहिएकृनियमितता, रणनीति और राजनीतिक संदेश की स्पष्टता। उत्तराखंड की राजनीति में 2027 की जमीन तैयार हो रही है। भाजपा संगठन और मीडिया दोनों स्तर पर पहले से सक्रिय दिखाई दे रही है। कांग्रेस सरकार विरोधी माहौल को राजनीतिक विकल्प में बदलने की कोशिश कर रही है, लेकिन उसके संदेश की निरंतरता सवालों में है। यूकेडी और दूसरे छोटे दल जनता के मुद्दे उठा रहे हैं, मगर उनकी आवाज का विस्तार सीमित है। आखिर चुनाव सिर्फ यह नहीं है कि कौन जनता के बीच गया। यह भी है कि कौन जनता के दिमाग में लगातार मौजूद रहा और मीडिया की इस लड़ाई में अभी तस्वीर साफ है।कृभाजपा रोज दस्तक दे रही है, कांग्रेस कभी-कभार दरवाजा खटखटा रही है और बाकी दल शायद यह इंतजार कर रहे हैं कि चुनाव की तारीख घोषित हो और दरवाजा अपने आप खुल जाए। लेकिन राजनीति में दरवाजे अपने आप नहीं खुलते, उन्हें रोज खटखटाना पड़ता है।

गुरुवार, 20 अगस्त 2026

udaydinmaan: भाजपा का ‘आपरेशन 2027’ शुरू

udaydinmaan: भाजपा का ‘आपरेशन 2027’ शुरू: 19 जिलों में भाजपा की नई तैनाती, चुनावी बिसात पर संगठन प्रभारी-सह प्रभारियों की नियुक्ति महज संगठन विस्तार ही नहीं विस चुनाव से पहले बूथ तक ...

भाजपा का ‘आपरेशन 2027’ शुरू

19 जिलों में भाजपा की नई तैनाती, चुनावी बिसात पर संगठन प्रभारी-सह प्रभारियों की नियुक्ति महज संगठन विस्तार ही नहीं विस चुनाव से पहले बूथ तक पकड़ मजबूत करने की कवायद देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के बीच भाजपा ने संगठन को चुनावी मोड में डालना शुरू कर दिया है। पार्टी ने प्रदेश के 19 सांगठनिक जिलों के लिए प्रभारी और सह प्रभारी नियुक्त कर दिए हैं। पहली नजर में यह सामान्य संगठनात्मक फेरबदल दिखाई दे सकता है, लेकिन चुनावी राजनीति के लिहाज से देखें तो भाजपा का यह कदम काफी महत्वपूर्ण है। पार्टी ने जिलों में ऐसे समय पर जिम्मेदारियां तय की हैं, जब चुनावी मैदान तैयार हो रहा है और टिकट से लेकर बूथ प्रबंधन तक हर स्तर पर राजनीतिक समीकरण तेजी से आकार ले रहे हैं। भाजपा की राजनीति में संगठन केवल चुनाव के समय सक्रिय होने वाला ढांचा नहीं है। बूथ से लेकर प्रदेश स्तर तक लगातार सक्रिय रहने वाला कैडर उसका सबसे बड़ा राजनीतिक हथियार माना जाता है। यही वजह है कि 19 सांगठनिक जिलों में प्रभारी और सह प्रभारियों की नियुक्ति को 2027 की चुनावी रणनीति की शुरुआती बड़ी कवायद के तौर पर देखा जा रहा है। उत्तराखंड की 70 विधानसभा सीटों का चुनाव केवल बड़े राजनीतिक नारों से नहीं जीता जाता। यहां पहाड़ और मैदान की अलग-अलग राजनीतिक जरूरतें हैं। कुमाऊं और गढ़वाल के भीतर भी क्षेत्रवार मुद्दे और जातीय-सामाजिक समीकरण अलग हैं। ऐसे में प्रदेश मुख्यालय से चुनावी रणनीति बनाने के बजाय उसे जिले और मंडल स्तर तक पहुंचाना भाजपा की प्राथमिकता होगी। नए प्रभारी और सह प्रभारी इसी काम की कड़ी होंगे। उनकी जिम्मेदारी केवल बैठकों तक सीमित नहीं रहेगी। संगठन की वास्तविक स्थिति, बूथ कमेटियों की सक्रियता, स्थानीय नेताओं के बीच तालमेल, सरकार की योजनाओं का प्रचार और जनता के बीच पार्टी की पकड़ जैसे मुद्दों पर भी नजर रखनी होगी। यानी भाजपा चुनाव आने से पहले ही यह जान लेना चाहती है कि कौन सा बूथ मजबूत है, कहां संगठन कमजोर है और कहां पार्टी के भीतर ही असंतोष चुनावी नुकसान का कारण बन सकता है। भाजपा के लिए 2027 का चुनाव केवल संगठन की परीक्षा नहीं है। प्रदेश की सरकार के कामकाज का भी जनमत संग्रह होगा। धामी सरकार डबल इंजन सरकार के विकास मॉडल को चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश करेगी। लेकिन विपक्ष बेरोजगारी, पलायन, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, आपदा प्रबंधन और युवाओं से जुड़े सवालों को लेकर सरकार को घेरने की तैयारी में है। ऐसे में जिला प्रभारियों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। उन्हें केवल पार्टी का पक्ष जनता तक पहुंचाना नहीं होगा, बल्कि जनता के सवालों और नाराजगी की रिपोर्ट भी ऊपर तक पहुंचानी होगी। क्योंकि चुनावी राजनीति में सबसे खतरनाक स्थिति वह होती है जब पार्टी के पास कागजों में मजबूत संगठन हो, लेकिन जमीन पर मतदाता उससे दूरी बनाने लगे। 2027 के चुनाव से पहले भाजपा के सामने एक और बड़ी चुनौती टिकट की होगी। हर विधानसभा क्षेत्र में संभावित दावेदार सक्रिय हो चुके हैं। कई पुराने चेहरे टिकट की उम्मीद लगाए बैठे हैं, तो नए नेता भी संगठन में अपनी पकड़ मजबूत करने में जुटे हैं। जिला प्रभारी और सह प्रभारी ऐसे समय में पार्टी के भीतर शक्ति संतुलन बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। उन्हें यह भी देखना होगा कि टिकट की होड़ संगठनात्मक गुटबाजी में न बदल जाए। क्योंकि भाजपा के लिए सबसे बड़ा खतरा विपक्ष से पहले अपनों की नाराजगी हो सकती है। टिकट कटने के बाद बगावत, भीतरघात या निर्दलीय मैदान में उतरने की स्थिति पार्टी के चुनावी गणित को बिगाड़ सकती है। भाजपा की यह कवायद कांग्रेस के लिए भी राजनीतिक संदेश है। कांग्रेस अभी संगठन को मजबूत करने और चुनावी चेहरे को लेकर अपनी रणनीति स्पष्ट करने में जुटी है। ऐसे में भाजपा यदि डेढ़ साल पहले ही जिलेवार संगठन की जिम्मेदारी तय कर रही है तो इसका अर्थ साफ हैकृपार्टी चुनाव को अंतिम छह महीने की लड़ाई नहीं मान रही। भाजपा चाहती है कि चुनाव की घोषणा होने से पहले ही उसका संगठन मतदाता तक पहुंच चुका हो। सरकार की उपलब्धियां बूथ तक पहुंचें, लाभार्थियों से संपर्क हो, स्थानीय मुद्दों की पहचान हो और कमजोर सीटों पर पहले से काम शुरू किया जाए। हालांकि भाजपा की संगठनात्मक ताकत किसी से छिपी नहीं है, लेकिन चुनाव केवल संगठन के दम पर नहीं जीते जाते। अंततः मतदाता यह तय करता है कि सरकार ने उसके जीवन में कितना बदलाव किया। 19 जिलों में प्रभारी-सह प्रभारी नियुक्त करना भाजपा की तैयारी का संकेत जरूर है, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि 2027 का चुनाव पार्टी के लिए आसान होगा। पहाड़ की नाराजगी, युवाओं के रोजगार के सवाल, सरकारी नौकरियों की भर्ती, पलायन, महिलाओं की सुरक्षा और महंगाई जैसे मुद्दे चुनावी हवा का रुख बदल सकते हैं। इसलिए भाजपा के सामने चुनौती सिर्फ संगठन खड़ा करने की नहीं, बल्कि संगठन को जनता की नब्ज पढ़ने वाली मशीन बनाने की है। 2027 की चुनावी बिसात पर भाजपा ने पहली बड़ी चाल चल दी है। अब देखना यह होगा कि जिला प्रभारी और सह प्रभारी पार्टी के लिए सिर्फ बैठकें और रिपोर्ट तैयार करते हैं या वास्तव में जमीन पर संगठन की कमजोर नसों को पकड़ पाते हैं। क्योंकि चुनाव बूथ पर लड़ा जाएगा, लेकिन उसका फैसला जनता के मन में होगा।

एसआईआर की सुनवाई में कांग्रेस की ‘निगरानी’

कांग्रेस पार्टी की हर दावे-आपत्ति पर नजर रखने की है तैयारी मतदाता सूची को लेकर चुनावी साल में बढ़ेगी सियासी तपिश एसआईआर में आपत्तियों के दौरान मौजूद रहेंगे कांग्रेस प्रतिनिधि देहरादून। उत्तराखंड में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर सियासी हलचल अब और तेज होने के आसार हैं। कांग्रेस ने संकेत दिया है कि एसआईआर के तहत होने वाली सुनवाई के दौरान वह अपने प्रतिनिधियों को मौजूद रखेगी। पार्टी का तर्क है कि मतदाता सूची से जुड़े दावे और आपत्तियों की प्रक्रिया में पारदर्शिता बनी रहे और किसी भी पात्र मतदाता का नाम प्रभावित न हो। कांग्रेस का यह फैसला ऐसे समय आया है जब प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियां धीरे-धीरे रफ्तार पकड़ रही हैं। चुनावी राजनीति में मतदाता सूची महज प्रशासनिक दस्तावेज नहीं, बल्कि पूरी चुनावी प्रक्रिया की बुनियाद होती है। ऐसे में एसआईआर की हर गतिविधि अब राजनीतिक दलों की निगाह में रहने वाली है। कांग्रेस की रणनीति साफ दिखाई दे रही है। पार्टी सुनवाई के दौरान अपने प्रतिनिधियों के जरिए यह देखने की कोशिश करेगी कि दावे और आपत्तियों पर निर्धारित नियमों के अनुसार कार्रवाई हो रही है या नहीं। कांग्रेस को आशंका है कि प्रक्रिया के दौरान यदि किसी पात्र मतदाता का नाम सूची से हटता है या किसी आपत्ति का निस्तारण पारदर्शी तरीके से नहीं होता, तो उसका सीधा असर आने वाले विधानसभा चुनाव पर पड़ सकता है। यही कारण है कि पार्टी अब केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित रहने के बजाय प्रक्रिया के स्तर पर निगरानी बढ़ाने की तैयारी में है। उत्तराखंड में एसआईआर अब सिर्फ प्रशासनिक कवायद नहीं रह गया है। इसके साथ राजनीतिक दलों की चिंता भी जुड़ गई है। चुनाव से पहले मतदाता सूची में होने वाला कोई भी बदलाव सीधे चुनावी गणित को प्रभावित कर सकता है। कांग्रेस पहले भी एसआईआर की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाती रही है। पार्टी की कोशिश है कि सुनवाई के दौरान उसके प्रतिनिधि मौजूद रहें और जरूरत पड़ने पर आपत्ति या शिकायत को संबंधित स्तर तक पहुंचाया जा सके। भाजपा की ओर से इस पर क्या रुख अपनाया जाता है, यह भी महत्वपूर्ण होगा। यदि सत्तारूढ़ दल और विपक्ष एसआईआर को लेकर आमने-सामने आते हैं तो मतदाता सूची आने वाले महीनों में उत्तराखंड की राजनीति का बड़ा मुद्दा बन सकती है। कांग्रेस के लिए यह फैसला केवल प्रशासनिक निगरानी का विषय नहीं है। यह उसके संगठन की जमीनी क्षमता की भी परीक्षा है। प्रतिनिधि नियुक्त करना आसान है, लेकिन उन्हें हर स्तर पर सक्रिय रखना बड़ी चुनौती होगी। उन्हें मतदाता सूची समझनी होगी, दावे-आपत्तियों की प्रक्रिया की जानकारी रखनी होगी और स्थानीय स्तर पर मतदाताओं के साथ संपर्क बनाए रखना होगा। यानी एसआईआर कांग्रेस के लिए संगठन को बूथ तक सक्रिय करने का अवसर भी बन सकता है। भाजपा लंबे समय से अपने बूथ संगठन को अपनी सबसे बड़ी ताकत बताती रही है। ऐसे में कांग्रेस यदि एसआईआर की सुनवाई में अपने प्रतिनिधियों को सक्रिय करती है तो भाजपा को भी अपने संगठन की सक्रियता बनाए रखनी होगी। 2027 के चुनाव में मुकाबला केवल चुनावी सभाओं और नारों का नहीं होगा। मतदाता सूची से लेकर बूथ प्रबंधन तक हर स्तर पर राजनीतिक दलों की तैयारियां निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं। एसआईआर की प्रक्रिया के दौरान यदि बड़ी संख्या में नाम हटने, जोड़ने या दावों-आपत्तियों को लेकर विवाद सामने आते हैं तो मामला राजनीतिक रंग ले सकता है। कांग्रेस इसे चुनावी पारदर्शिता का सवाल बनाएगी, जबकि भाजपा संभवतः प्रक्रिया को नियमों के तहत होने वाली सामान्य चुनावी कवायद बताएगी। लेकिन असली सवाल यह होगा कि अंतिम मतदाता सूची कितनी विश्वसनीय और स्वीकार्य बनती है। 2027 की चुनावी जंग अभी दूर है, लेकिन मतदाता सूची पर निगरानी की लड़ाई शुरू हो चुकी है। कांग्रेस ने सुनवाई में प्रतिनिधि उतारने का फैसला लेकर साफ कर दिया है कि वह एसआईआर को केवल सरकारी प्रक्रिया मानकर चुप बैठने वाली नहीं है। अब देखना होगा कि यह निगरानी लोकतांत्रिक पारदर्शिता तक सीमित रहती है या आने वाले दिनों में उत्तराखंड की सियासत का नया चुनावी रणक्षेत्र बन जाती है।