सोमवार, 13 जुलाई 2026
‘सिस्टम’ भू-माफिया के आगे ‘बेबस’
उमेदपुर की सरकारी जमीन पर भू-माफियाओं का कब्जा
हाईकोर्ट सख्त, डीएम और डीएफओ को व्यक्तिगत तलब
अतिक्रमण के आरोपों पर हाईकोर्ट ने मांगा संयुक्त शपथ पत्र
प्रशासन और वन विभाग की कार्यशैली पर उठे गंभीर सवाल
देहरादून जिले की विकासनगर तहसील के ग्राम सभा उमेदपुर में सरकारी भूमि पर कथित कब्जे का मामला अब न्यायपालिका की निगरानी में पहुंच गया है। इस प्रकरण में दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए उत्तराखंड हाईकोर्ट ने मामले को गंभीर मानते हुए जिला मजिस्ट्रेट देहरादून और प्रभागीय वनाधिकारी को व्यक्तिगत रूप से संयुक्त शपथ पत्र दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि दोनों अधिकारी यह बताएंगे कि सरकारी भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराने के लिए अब तक क्या-क्या कार्रवाई की गई है। हाईकोर्ट की इस सख्ती के बाद प्रशासनिक और वन विभाग में हलचल तेज हो गई है। मामला केवल अवैध कब्जे का नहीं, बल्कि सरकारी भूमि की सुरक्षा, विभागीय लापरवाही और भू-माफियाओं के कथित गठजोड़ का भी माना जा रहा है।
यह मामला तब चर्चा में आया जब तीर्थनगरी )षिकेश के समाजसेवी एवं वरिष्ठ आरटीआई कार्यकर्ता प्रभु दयाल शर्मा ने सरकारी भूमि पर कथित कब्जे और प्रशासनिक निष्क्रियता के खिलाफ हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की। याचिका के अनुसार ग्राम सभा उमेदपुर में एक निजी भूमि खरीदने के बाद उस तक पहुंचने के लिए सरकारी भूमि का कथित रूप से उपयोग किया गया। आरोप है कि आसपास के कुछ लोगों की मिलीभगत से राजस्व एवं वन विभाग के अधीन आने वाली भूमि को समतल कर रास्ते के रूप में इस्तेमाल किया गया और बाद में उस पर कब्जा कर लिया गया।
मामले की शिकायत मिलने पर तत्कालीन जिला प्रशासन ने जांच कराई थी। जांच में जिन खसरा नंबरों की भूमि का उल्लेख किया गया, वे राजस्व अभिलेखों में जंगल-झाड़ी श्रेणी की भूमि पाई गई, जिसका प्रबंधन वन विभाग के अधीन बताया गया। जांच रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया कि जिस स्थान पर वर्षों से मौसमी नाला मौजूद था, उसे पिछले कुछ वर्षों में मलबा डालकर समतल कर दिया गया। इसके बाद उस भूमि पर अतिक्रमण होने की पुष्टि हुई। तहसील प्रशासन ने अपनी रिपोर्ट में वन विभाग को भूमि की सुरक्षा सुनिश्चित करने, बाड़बंदी कराने और अतिक्रमण हटाने की सिफारिश भी की थी।
मामले में वन संरक्षक स्तर से भी प्रभागीय वनाधिकारी को कार्रवाई के निर्देश भेजे गए थे, लेकिन आरोप है कि जमीन पर कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई। यही पहलू हाईकोर्ट की सुनवाई के दौरान भी महत्वपूर्ण बना। याचिकाकर्ता का कहना है कि विभागीय निष्क्रियता के कारण सरकारी भूमि पर कब्जा कर उसे करोड़ों रुपये के मूल्य की संपत्ति में बदल दिया गया।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से प्रस्तुत अभिलेखों में यह स्वीकार किया गया कि राजस्व अधिकारियों के निरीक्षण में अतिक्रमण से जुड़े तथ्य सामने आए थे। हालांकि, उपजिलाधिकारी की रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि मौके पर कोई अवैध निर्माण अथवा व्यावसायिक गतिविधि नहीं है। इसके बावजूद अतिक्रमण करने वालों के विरु( कार्रवाई की सिफारिश की गई। इसी विरोधाभास पर अदालत ने गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि प्रथम दृदृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि संबंधित विभाग प्रभावी कार्रवाई करने के बजाय हाथ पर हाथ धरे बैठा रहा।
हाईकोर्ट की सख्ती ने अब इस पूरे प्रकरण को केवल भूमि विवाद नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही और सरकारी संपत्ति की सुरक्षा से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले के रूप में खड़ा कर दिया है। आने वाले दिनों में डीएम और डीएफओ के संयुक्त शपथ पत्र तथा अदालत में प्रस्तुत कार्रवाई रिपोर्ट पर इस पूरे मामले की दिशा काफी हद तक निर्भर करेगी।
डीएम और डीएफओ से मांगा जवाब
हाईकोर्ट ने जिला मजिस्ट्रेट और प्रभागीय वनाधिकारी को निर्देश दिया है कि वह संयुक्त शपथ पत्र दाखिल कर यह स्पष्ट करेंकृकि सरकारी भूमि की वर्तमान स्थिति क्या है। अतिक्रमण हटाने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए। जिम्मेदार व्यक्तियों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई। भविष्य में सरकारी भूमि की सुरक्षा के लिए क्या व्यवस्था की जा रही है। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि मामले की व्यक्तिगत स्तर पर निगरानी जिला प्रशासन करेगा।
अब प्रशासन पर बढ़ी जिम्मेदारी
हाईकोर्ट के आदेश के बाद जिला प्रशासन ने मामले की दोबारा समीक्षा शुरू कर दी है। प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार सभी संबंधित अभिलेखों और विभागीय कार्रवाई का परीक्षण किया जा रहा है। यदि जांच में किसी स्तर पर लापरवाही या नियमों का उल्लंघन सामने आता है तो संबंधित व्यक्तियों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी। उमेदपुर का मामला केवल एक गांव की सरकारी जमीन तक सीमित नहीं है। यह सवाल भी खड़ा करता है कि यदि जांच रिपोर्टों में अतिक्रमण की पुष्टि हो चुकी थी, संबंधित विभागों को कार्रवाई के लिए पत्र भी भेजे जा चुके थे, तो फिर समय रहते सरकारी भूमि को अतिक्रमण से मुक्त क्यों नहीं कराया गया?
उत्तराखंड भाजपा का चुनावी ‘ब्लूप्रिंट’
2027 की जंग में हर कार्यकर्ता रहेगा वार रूम का हिस्सा
हर बूथ पर राजनीतिक मनोविज्ञान जीतने की है पूरी तैयारी
सत्ता विरोधी माहौल की आशंका को साधने की है कवायद
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में चुनावी बिगुल भले अभी औपचारिक रूप से नहीं बजा हो, लेकिन भाजपा ने अपनी सबसे बड़ी ताकतकृसंगठनकृको चुनावी मोड में डाल दिया है। पार्टी के भीतर से निकल रहे संकेत बताते हैं कि 2027 का विधानसभा चुनाव केवल सरकार के विकास कार्यों के भरोसे नहीं, बल्कि बूथ-दर-बूथ चलने वाली संगठनात्मक रणनीति के दम पर लड़ने की तैयारी है। भाजपा नेतृत्व का संदेश साफ हैकृसरकार चुनाव नहीं जिताती, संगठन जिताता है। यही कारण है कि प्रदेश से लेकर बूथ तक जिम्मेदारियों का नया खाका तैयार किया जा रहा है। संगठन को केवल कार्यक्रम कराने वाली इकाई नहीं, बल्कि चुनावी रणनीति के संचालन केंद्र के रूप में देखा जा रहा है।
भाजपा अच्छी तरह जानती है कि लगातार दो कार्यकाल के बाद एंटी-इनकंबेंसी का जोखिम किसी भी सरकार के सामने स्वाभाविक रूप से खड़ा होता है। महंगाई, बेरोजगारी, पलायन, स्थानीय विकास, भू-कानून और क्षेत्रीय अपेक्षाएं जैसे मुद्दे विपक्ष के लिए राजनीतिक अवसर बन सकते हैं। इसी पृष्ठभूमि में पार्टी अब विकास योजनाओं के प्रचार से आगे बढ़कर जनता से सीधा संवाद, कार्यकर्ताओं की सक्रियता और स्थानीय स्तर पर फीडबैक तंत्र को मजबूत करने पर जोर दे रही है। इस बार भाजपा की रणनीति का केंद्र मंचों की बड़ी रैलियां नहीं, बल्कि बूथ स्तर पर लगातार संपर्क अभियान बताया जा रहा है। हर बूथ पर मतदाता सूची का सूक्ष्म विश्लेषण, नए मतदाताओं तक पहुंच, सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों से संवाद, सोशल मीडिया के स्थानीय नेटवर्क और पन्ना प्रमुखों की सक्रियताकृयह सभी चुनावी मशीनरी के अहम हिस्से होंगे।
सूत्र बताते हैं कि उत्तराखंड जैसे राज्य में कई सीटों पर जीत-हार का अंतर बहुत कम रहता है। ऐसे में बूथ प्रबंधन निर्णायक भूमिका निभा सकता है। भाजपा नेतृत्व के सामने एक बड़ी चुनौती संगठन के भीतर समन्वय बनाए रखना भी है। चुनाव नजदीक आते ही टिकट की दावेदारी, स्थानीय गुटबाजी और कार्यकर्ताओं की अपेक्षाएं बढ़ना स्वाभाविक है। सूत्रों के अनुसार संगठनात्मक बैठकों में इस बात पर भी जोर दिया जा रहा है कि संभावित असंतोष को चुनाव से पहले ही चिन्हित किया जाए। जिला और मंडल स्तर से लगातार फीडबैक लेने, निष्क्रिय इकाइयों को सक्रिय करने और स्थानीय नेतृत्व के बीच संवाद बढ़ाने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। भाजपा सरकार विकास परियोजनाओं, सड़क, स्वास्थ्य, पर्यटन, निवेश और धार्मिक पर्यटन जैसे मुद्दों को अपनी उपलब्धि के रूप में सामने रखना चाहती है। लेकिन संगठन को यह जिम्मेदारी भी दी जा रही है कि वह यह समझे कि जनता इन कार्यों को किस नजर से देख रही है। यानी केवल उपलब्धियां गिनाना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि यह भी जरूरी होगा कि उनका असर मतदाता तक विश्वसनीय ढंग से पहुंचे।
भाजपा का आकलन है कि कांग्रेस रोजगार, महंगाई, पलायन, स्थानीय पहचान और क्षेत्रीय असंतोष जैसे मुद्दों को आक्रामक ढंग से उठाने का प्रयास करेगी। इसलिए संगठन को विपक्ष के आरोपों का तथ्यात्मक जवाब देने और स्थानीय स्तर पर राजनीतिक संवाद बनाए रखने की जिम्मेदारी भी सौंपी जा रही है। चुनावी रणनीति में पहली बार मतदान करने वाले युवाओं, महिला मतदाताओं और सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों तक लक्षित पहुंच बनाने की तैयारी दिखाई दे रही है। डिजिटल माध्यमों, सोशल मीडिया और स्थानीय संपर्क अभियानों को इसके लिए प्रमुख साधन माना जा रहा है।
संगठन को मिला यह रोडमैप जितना मजबूत कागज पर दिखता है, उसकी वास्तविक परीक्षा टिकट वितरण और चुनावी मैदान में होगी। यदि टिकट चयन के दौरान असंतोष बढ़ता है या स्थानीय समीकरण बिगड़ते हैं, तो मजबूत संगठन भी दबाव में आ सकता है। वहीं यदि पार्टी समय रहते इन चुनौतियों का समाधान कर लेती है, तो यही संगठन उसकी सबसे बड़ी चुनावी पूंजी साबित हो सकता है। उत्तराखंड की राजनीति में 2027 का चुनाव केवल भाजपा बनाम कांग्रेस की लड़ाई नहीं होगा। यह सरकार के प्रदर्शन बनाम संगठन की ताकत, स्थानीय मुद्दों बनाम राष्ट्रीय नेतृत्व और जनता की अपेक्षाओं बनाम चुनावी प्रबंधन की भी परीक्षा होगी। भाजपा ने अपने संगठन को चुनावी कमान सौंपकर यह संकेत दे दिया है कि वह हर बूथ को रणभूमि और हर कार्यकर्ता को चुनावी यो(ा मानकर आगे बढ़ना चाहती है। अब देखना यह होगा कि यह रणनीति मतदान केंद्रों तक कितनी प्रभावी साबित होती है।
चुनावी फतह के लिए ‘माइक्रो-मैनेजमेंट’
उत्तराखंड में भाजपा का पन्ना प्रमुख और बूथ समितियों पर बढ़ा भरोसा
चुनावी मुकाबलों को जीतने के लिए भाजपा ने तैयार किया नया फार्मूला
जीत का अंतर पाटने के लिए जमीनी नेटवर्क मजबूती में जुटी भाजपा
देहरादून। उत्तराखंड की चुनावी राजनीति का इतिहास बताता है कि अनेक विधानसभा सीटों पर जीत-हार का अंतर कुछ सौ से लेकर कुछ हजार वोटों के भीतर रहा है। ऐसे में प्रत्येक बूथ का प्रदर्शन निर्णायक बन जाता है। भाजपा का मानना है कि यदि प्रत्येक बूथ पर संगठन सक्रिय रहेगा, मतदाताओं से नियमित संवाद होगा और मतदान प्रतिशत बढ़ाया जा सकेगा तो चुनावी परिणामों पर सकारात्मक असर पड़ सकता है। इसी सोच के तहत बूथ समितियों की सक्रियता, पन्ना प्रमुखों की भूमिका और स्थानीय कार्यकर्ताओं के नेटवर्क को मजबूत करने की कवायद तेज हुई है।
इस बार भाजपा की रणनीति का एक अहम हिस्सा मतदाता सूची का सूक्ष्म परीक्षण भी है। पार्टी कार्यकर्ताओं को निर्देश दिए जा रहे हैं कि वह अपने-अपने क्षेत्रों की मतदाता सूची का अध्ययन करें और यह सुनिश्चित करें कि पात्र मतदाताओं के नाम सूची में दर्ज हों तथा किसी प्रकार की त्रुटि होने पर समय रहते संबंधित निर्वाचन प्रक्रिया के माध्यम से उसका समाधान कराया जाए। सटीक मतदाता सूची चुनावी प्रबंधन का महत्वपूर्ण आधार होती है। नए मतदाताओं तक पहुंच, स्थानांतरण के कारण हुए बदलाव और स्थानीय स्तर पर मतदाता जागरूकता अभियान भी इसी रणनीति का हिस्सा माने जा रहे हैं।
भाजपा संगठन उन परिवारों तक भी पहुंच बढ़ाने की योजना पर काम कर रहा है, जिन्हें विभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ मिला है। इसके साथ ही पहली बार मतदान करने वाले युवाओं पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। युवाओं से संवाद, डिजिटल माध्यमों का उपयोग, कालेज स्तर पर संपर्क और सोशल मीडिया के जरिए पार्टी की पहुंच बढ़ाने की रणनीति पर भी जोर है। पार्टी का आकलन है कि पहली बार मतदान करने वाले मतदाता कई सीटों पर निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। भाजपा की कोशिश है कि सरकार की योजनाओं और संगठन की गतिविधियों के बीच बेहतर तालमेल दिखाई दे। विकास कार्यों, आधारभूत संरचना, पर्यटन, सड़क, स्वास्थ्य, महिला सशक्तीकरण और सामाजिक कल्याण योजनाओं की जानकारी घर-घर तक पहुंचाने में संगठन की भूमिका बढ़ाई जा रही है।
राजनीतिकदृदृष्टि से इसका उद्देश्य केवल उपलब्धियां गिनाना नहीं, बल्कि मतदाताओं के साथ नियमित संवाद बनाए रखना भी है। पार्टी के लिए केवल प्रचार पर्याप्त नहीं माना जा रहा। संगठन स्थानीय स्तर पर जनता की अपेक्षाओं, कार्यकर्ताओं की सक्रियता और क्षेत्रीय मुद्दों का फीडबैक भी जुटा रहा है। इसका उद्देश्य यह समझना है कि किन क्षेत्रों में संगठन को और मजबूत करने की जरूरत है तथा किन मुद्दों पर जनता अधिक संवेदनशील है। यह फीडबैक भविष्य की चुनावी रणनीति और संगठनात्मक निर्णयों में उपयोगी माना जा रहा है।
हालांकि भाजपा की चुनावी तैयारी व्यवस्थित दिखाई देती है, लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं हैं। लगातार दो कार्यकाल के बाद सत्ता विरोधी माहौल की संभावनाएं, स्थानीय मुद्दे, टिकट की दावेदारी, क्षेत्रीय असंतोष और विपक्ष के राजनीतिक अभियान चुनावी मुकाबले को कठिन बना सकते हैं। राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि मजबूत संगठन चुनावी बढ़त दिला सकता है, लेकिन अंततः मतदाताओं का निर्णय स्थानीय परिस्थितियों, उम्मीदवारों की स्वीकार्यता और चुनाव के समय के मुद्दों पर भी निर्भर करेगा। जहां भाजपा बूथ और संगठन को मजबूत करने में जुटी है, वहीं विपक्ष भी महंगाई, बेरोजगारी, पलायन, भू-कानून, शिक्षा, स्वास्थ्य और स्थानीय विकास जैसे मुद्दों पर जनता के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। ऐसे में आगामी महीनों में राजनीतिक गतिविधियां और तेज होने की संभावना है।
आने वाले महीनों में मतदाता सूची के पुनरीक्षण, संगठनात्मक बैठकों, प्रशिक्षण कार्यक्रमों और जनसंपर्क अभियानों की गति बढ़ने के संकेत हैं। राजनीतिक रूप से यह स्पष्ट है कि भाजपा ने 2027 के चुनाव को केवल अंतिम समय का अभियान न मानकर लंबी तैयारी का चुनाव माना है। उत्तराखंड भाजपा का बूथ से लेकर वोटर लिस्ट तक का फोकस यह दर्शाता है कि पार्टी चुनावी प्रबंधन को सूक्ष्म स्तर पर मजबूत करना चाहती है। संगठन की सक्रियता, मतदाताओं तक निरंतर पहुंच और स्थानीय स्तर पर संवाद की यह रणनीति चुनावी मुकाबले में उसे बढ़त दिलाने का प्रयास है। हालांकि इसकी वास्तविक सफलता का आकलन चुनावी मैदान में ही होगा, जहां संगठन, सरकार का प्रदर्शन, उम्मीदवारों की स्वीकार्यता और जनता की प्राथमिकताएं मिलकर अंतिम परिणाम तय करेंगी।
फास्ट फूड के ‘चलन’ में ‘कल्यौ’ की महक गुम
पहाड़ की रसोई से दूर हुआ पारंपरिक व पौष्टिक सुबह का भोजन
आधुनिकता की भेंट चढ़ता सेहत और आत्मीयता का प्रतीक कल्यौ
पहाड़ की आत्मीयता, श्रम व लोक संस्कृति की पहचान थी कल्यौ
देहरादून। आधुनिक जीवनशैली और फास्ट फूड की संस्कृति ने पहाड़ के खान-पान को तेजी से बदल दिया है। ब्रेड, बिस्कुट, नूडल्स और पैकेटबंद खाद्य पदार्थों ने गांवों की रसोई में भी जगह बना ली है। लेकिन एक समय ऐसा था जब पहाड़ के गांवों में दिन की शुरुआत कल्यौ से होती थी। यह केवल सुबह का भोजन नहीं, बल्कि पहाड़ के श्रम, स्वास्थ्य, आत्मीयता और सामुदायिक जीवन का प्रतीक था। गढ़वाल और कुमाऊँ के अनेक क्षेत्रों में सुबह खेत, जंगल या पशुओं के काम पर निकलने से पहले जो भोजन किया जाता था, उसे स्थानीय बोली में कल्यौ भी कहा जाता था। यह भोजन साधारण अवश्य था, लेकिन पौष्टिक, स्थानीय और मौसम के अनुरूप होता था।
पहाड़ की महिलाओं का दिन भोर से पहले शुरू हो जाता था। चूल्हे में लकड़ियां सुलगती थीं, तांबे की केतली में पानी गर्म होता था और सिलबट्टे पर नमक, हरी मिर्च तथा भांग या तिल की चटनी पीसी जाती थी। कल्यौ में अक्सर मंडुवे या गेहूं की रोटी, झंगोरे का दलिया, मक्के की रोटी, पिछली रात की बची रोटी को घी या छाछ के साथ, मौसमी साग, आलू का ठेचुवा, भांग की चटनी, गुड़, घर का मक्खन या छाछ परोसी जाती थी। कई इलाकों में मौसम और उपलब्धता के अनुसार गहत, भट्ट या कुल्थ की दाल भी शामिल होती थी।
पहाड़ का जीवन कठिन था। कई किलोमीटर पैदल चलना, खेतों में काम करना, घास और लकड़ी लाना तथा पशुपालनकृइन सबके लिए भरपूर ऊर्जा चाहिए होती थी। कल्यौ इसी आवश्यकता को ध्यान में रखकर तैयार होता था। इसमें स्थानीय अनाज, मोटे अनाज, दालें और प्राकृतिक खाद्य पदार्थ शामिल होते थे, जो लंबे समय तक ऊर्जा देते थे। आज जिस मोटे अनाज को स्वास्थ्यवर्धक मानकर दुनिया अपनाने की बात कर रही है, वह पहाड़ के कल्यौ का सदियों से हिस्सा रहा है। यदि सुबह कोई रिश्तेदार, पड़ोसी या राहगीर घर आ जाता, तो उसे बिना कल्यौ कराए जाने देना अशुभ और असभ्य माना जाता था। यह परंपरा बताती है कि पहाड़ में भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि रिश्तों को जोड़ने का माध्यम भी था।
सड़क, बाज़ार और बदलती दिनचर्या के साथ कल्यौ की परंपरा धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगी। नौकरी, स्कूल, शहरों की ओर पलायन और पैकेटबंद खाद्य पदार्थों की बढ़ती उपलब्धता ने स्थानीय सुबह के भोजन की जगह ले ली। आज गांवों में भी कई घरों में सुबह की शुरुआत चाय और बिस्कुट से होती है। नई पीढ़ी के अनेक बच्चों को यह भी पता नहीं कि कल्यौ केवल नाश्ता नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक परंपरा थी। पोषण विशेषज्ञ मोटे अनाज, स्थानीय दालों और पारंपरिक भोजन को स्वास्थ्य के लिए लाभकारी मानते हैं। ऐसे में कल्यौ जैसी परंपरा केवल सांस्कृतिक धरोहर नहीं, बल्कि स्वस्थ जीवनशैली का भी उदाहरण बन सकती है।
आज के समय में यदि होमस्टे, ग्रामीण पर्यटन और स्थानीय भोजन को बढ़ावा देने की योजनाओं में कल्यौ को शामिल किया जाए, तो पर्यटकों को उत्तराखंड की असली स्वाद-परंपरा से परिचित कराया जा सकता है। इससे स्थानीय किसानों, महिला स्वयं सहायता समूहों और पारंपरिक खाद्य संस्कृति को भी नया संबल मिल सकता है। कल्यौ हमें सिखाता है कि भोजन का अर्थ केवल विविध व्यंजन नहीं, बल्कि स्थानीय संसाधनों का सम्मान, श्रम का महत्व और परिवार का साथ भी है। मिट्टी के चूल्हे की आंच, ताजी रोटी की खुशबू, सिलबट्टे की चटनी और पूरे परिवार का एक साथ बैठकर भोजन करनाकृयही पहाड़ की उस जीवनशैली की पहचान थी, जिसमें सादगी ही सबसे बड़ा वैभव थी।
पहाड़ का कल्यौ पेट ही नहीं भरता था, वह दिन भर के श्रम का संबल और रिश्तों की गर्माहट भी साथ लेकर चलता था। आज जब दुनिया लोकल फूड और सुपरफूड की ओर लौट रही है, तब उत्तराखंड का कल्यौ हमें याद दिलाता है कि हमारी अपनी परंपराओं में ही स्वास्थ्य, संस्कृति और आत्मनिर्भरता का गहरा ज्ञान छिपा है। जरूरत केवल उसे पहचानने और अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की है।
भाजपा-कांग्रेस के बीच ‘स्पेस’ की तलाश
उत्तराखंड क्रांति दल और आप की साख दांव पर, क्या बदलेगा चुनावी समीकरण?
यूकेडी और आप बदल पाएंगे 2027 का चुनावी गणित, नई राजनीति की तलाश में आप
भाजपा-कांग्रेस की सीधी लड़ाई के बीच क्षेत्रीय दलों के सामने अस्तित्व बचाने की चुनौतीर्
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में पिछले दो दशकों से सत्ता का केंद्र भाजपाऔर कांग्रेस के बीच ही घूमता रहा है। लेकिन हर चुनाव से पहले एक सवाल जरूर उठता है, क्या इस बार कोई तीसरी ताकत उभरेगी? 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले भी यह सवाल राजनीतिक गलियारों में गूंज रहा है। नजरें उत्तराखंड क्रांति दल और आम आदमी पार्टी पर टिकी हैं, लेकिन दोनों दलों के सामने अवसर जितना बड़ा है, चुनौती उससे कहीं अधिक कठिन दिखाई दे रही है।
उत्तराखंड राज्य आंदोलन की अग्रिम पंक्ति में रहने वाला उत्तराखंड क्रांति दल कभी पहाड़ की राजनीतिक आवाज माना जाता था। अलग राज्य की मांग को जनांदोलन बनाने में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। लेकिन राज्य बनने के बाद पार्टी धीरे-धीरे अपने जनाधार को संभाल नहीं सकी। बार-बार के नेतृत्व विवाद, संगठनात्मक बिखराव, चुनावी गठबंधनों की अस्थिरता और प्रमुख नेताओं के अन्य दलों में जाने से यूकेडी का प्रभाव लगातार सिमटता गया। आज स्थिति यह है कि राज्य आंदोलन की विरासत होने के बावजूद पार्टी विधानसभा में प्रभावी उपस्थिति दर्ज नहीं करा पा रही है। फिर भी यूकेडी के समर्थकों का मानना है कि भू-कानून, मूल निवास, जल-जंगल-जमीन, पलायन और पहाड़ की अस्मिता जैसे मुद्दों पर उसकी वैचारिक पहचान अब भी अलग है। चुनौती यह है कि क्या वह इन मुद्दों को फिर जनआंदोलन में बदल पाएगी।
दिल्ली और पंजाब की सफलता के बाद आम आदमी पार्टी ने उत्तराखंड में भी मजबूत विकल्प बनने की कोशिश की थी। शिक्षा, स्वास्थ्य, भ्रष्टाचार और मुफ्त सेवाओं के वादों के साथ पार्टी ने चुनावी मैदान में उतरकर काफी चर्चा बटोरी। लेकिन चुनावी परिणामों ने स्पष्ट कर दिया कि केवल प्रचार से संगठन नहीं बनता। बूथ स्तर की कमजोरी, स्थानीय नेतृत्व की सीमित पहुंच और चुनाव के बाद संगठनात्मक सुस्ती ने पार्टी की रफ्तार धीमी कर दी। अब 2027 से पहले पार्टी फिर संगठन खड़ा करने की कोशिश कर रही है। हालांकि सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या आप उत्तराखंड की स्थानीय राजनीतिक संवेदनाओं के अनुरूप अपनी रणनीति तैयार कर पाएगी, या फिर राष्ट्रीय माडल पर ही निर्भर रहेगी?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तराखंड में तीसरे दल के लिए राजनीतिक स्थान पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। बेरोजगारी, पलायन, भू-कानून, स्थानीय रोजगार, पर्वतीय विकास और क्षेत्रीय अस्मिता जैसे मुद्दे अब भी ऐसे हैं, जिन पर कोई वैकल्पिक राजनीतिक ताकत प्रभावी अभियान चला सकती है। लेकिन इसके लिए केवल मुद्दे उठाना पर्याप्त नहीं होगा। मजबूत संगठन, विश्वसनीय नेतृत्व, बूथ स्तर की सक्रियता और लगातार जनसंपर्क जरूरी होगा। समय-समय पर यह चर्चा भी होती रही है कि भाजपा और कांग्रेस के मुकाबले क्षेत्रीय और छोटे दलों के बीच किसी प्रकार का चुनावी तालमेल बन सकता है। हालांकि अभी तक यूकेडी और आप की ओर से ऐसा कोई औपचारिक संकेत सामने नहीं आया है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि किसी भी संभावित सहयोग का आधार केवल सीटों का बंटवारा नहीं, बल्कि साझा राजनीतिक एजेंडा होना चाहिए। अन्यथा ऐसा गठजोड़ टिकाऊ नहीं माना जाएगा।
यूकेडी और आप दोनों की निगाह युवा मतदाताओं पर है। रोजगार, पारदर्शिता, शिक्षा, उद्यमिता और स्थानीय अवसर जैसे मुद्दे युवाओं को प्रभावित कर सकते हैं। लेकिन युवा मतदाता केवल नारों से प्रभावित नहीं होता वह संगठन की विश्वसनीयता और नेतृत्व की क्षमता भी देखता है। 2027 का चुनाव यूकेडी और आप दोनों के लिए केवल सीटें जीतने का सवाल नहीं होगा, बल्कि राजनीतिक प्रासंगिकता बनाए रखने की परीक्षा भी होगा।
उत्तराखंड की राजनीति में तीसरे विकल्प की चर्चा हर चुनाव से पहले होती है, लेकिन चुनाव परिणाम अक्सर भाजपा और कांग्रेस के इर्द-गिर्द ही सिमट जाते हैं। यूकेडी के पास आंदोलन की विरासत है, जबकि आप के पास वैकल्पिक राजनीति का दावा। दोनों के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या वह विरासत और वादों को वोट में बदल पाएंगे? 2027 की चुनावी बिसात पर भाजपा और कांग्रेस मुख्य खिलाड़ी बने हुए हैं। लेकिन यदि यूकेडी स्थानीय अस्मिता के मुद्दों को फिर जनआंदोलन का रूप दे सके और आप जमीनी संगठन खड़ा कर सके, तो कुछ सीटों पर मुकाबला त्रिकोणीय हो सकता है। फिलहाल, दोनों दलों को सबसे पहले यह साबित करना होगा कि वह केवल चुनावी उपस्थिति नहीं, बल्कि वास्तविक राजनीतिक विकल्प भी हैं।
‘चुनावी दहलीज’ पर फिर खुली ‘पुरानी फाइल’
चारधाम की व्यवस्था, मंदिर प्रबंधन और आस्था की राजनीति के बीच फिर हलचल
उत्तराखंड में सत्ता और भाजपा संगठन रख रहे हैं पूरे प्रकरण पर अपनी पैनी नजर
विवादों के बीच देवस्थानम बोर्ड की सुगबुगाहट, अंदरखाने रणनीतियों में जुटे दल
देहरादून। उत्तराखंड की सत्ता के गलियारों में इन दिनों एक पुराना नाम फिर फुसफुसाहटों में सुनाई देने लगा हैकृदेवस्थानम बोर्ड। आधिकारिक तौर पर यह अध्याय वर्षों पहले बंद हो चुका है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि चारधाम यात्रा, मंदिर प्रबंधन और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा कोई भी बड़ा विवाद सामने आते ही यह मुद्दा फिर बहस के केंद्र में आ जाता है। राजनीतिक सूत्रों का कहना है कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा और विपक्ष, दोनों इस विषय की संवेदनशीलता को अच्छी तरह समझते हैं। यही वजह है कि सार्वजनिक बयान बेहद सावधानी से दिए जा रहे हैं, जबकि अंदरखाने चारधाम से जुड़े हर घटनाक्रम पर लगातार नजर रखी जा रही है।
हाल के वर्षों में चारधाम यात्रा के दौरान भीड़ प्रबंधन, यात्रा व्यवस्थाओं, मंदिर प्रशासन, चढ़ावे की पारदर्शिता और विभिन्न प्रशासनिक निर्णयों को लेकर समय-समय पर सवाल उठे हैं। इन घटनाओं के साथ राजनीतिक चर्चाओं में देवस्थानम बोर्ड का संदर्भ भी फिर उभरने लगता है। सत्ता पक्ष यह संदेश देना चाहता है कि वह धार्मिक परंपराओं का सम्मान करते हुए व्यवस्थाओं को बेहतर बनाने के पक्ष में है। दूसरी ओर विपक्ष यह तर्क देता है कि मंदिरों के प्रशासन और निर्णयों में अधिक पारदर्शिता तथा जवाबदेही आवश्यक है। दोनों पक्षों के बीच यही राजनीतिक खींचतान इस पुराने मुद्दे को बार-बार चर्चा में ले आती है।
भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि चारधाम यात्रा की व्यवस्थाओं को आधुनिक बनाया जाए, लेकिन ऐसा कोई संदेश न जाए जिससे पारंपरिक अधिकारों या धार्मिक भावनाओं पर हस्तक्षेप का आरोप लगे। यही कारण है कि सरकार अब मंदिर प्रबंधन से जुड़े हर बड़े निर्णय को राजनीतिक और सामाजिक दोनों दृष्टियों से तौलकर आगे बढ़ाना चाहती है। पार्टी नेतृत्व यह भी समझता है कि देवभूमि उत्तराखंड में धार्मिक विषय केवल प्रशासनिक मुद्दा नहीं, बल्कि जनभावनाओं से गहराई से जुड़ा प्रश्न है।
विपक्ष भी चारधाम से जुड़े किसी भी विवाद को केवल प्रशासनिक चूक तक सीमित नहीं रखना चाहता। उसका प्रयास रहेगा कि यदि व्यवस्थाओं, पारदर्शिता या जवाबदेही पर सवाल उठते हैं, तो उन्हें व्यापक राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाया जाए। हालांकि अब तक किसी प्रमुख दल ने देवस्थानम बोर्ड जैसी व्यवस्था को पुनर्जीवित करने की औपचारिक वकालत नहीं की है, लेकिन इस विषय का प्रतीकात्मक महत्व आज भी बरकरार है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव से पहले सबसे बड़ी चिंता किसी नई नीति से अधिक विश्वास की है। चारधाम से जुड़े समुदाय, हक-हकूकधारी, स्थानीय हितधारक, श्र(ालु और सरकारकृइन सभी के बीच भरोसा बनाए रखना किसी भी सरकार के लिए महत्वपूर्ण होगा। यदि यात्रा प्रबंधन से जुड़े विवाद बढ़ते हैं, तो विपक्ष इसे सरकार की कार्यशैली से जोड़ने की कोशिश करेगा। वहीं यदि व्यवस्थाएं सुचारु रहती हैं, तो सत्ता पक्ष इसे अपनी प्रशासनिक क्षमता के प्रमाण के रूप में पेश करेगा।
2027 का चुनाव विकास, रोजगार और स्थानीय मुद्दों के साथ-साथ आस्था से जुड़े प्रश्नों को भी छू सकता है। देवस्थानम बोर्ड का नाम भले किसी आधिकारिक एजेंडे में न हो, लेकिन यह मुद्दा उत्तराखंड की राजनीति में एक प्रतीक बन चुका हैकृऐसा प्रतीक, जो मंदिर प्रबंधन, धार्मिक परंपरा और सरकारी भूमिका के बीच संतुलन पर होने वाली हर बहस में फिर सामने आ जाता है। राजनीति में कुछ फाइलें बंद नहीं होतीं, केवल अलमारी बदलती है। देवस्थानम बोर्ड भी शायद ऐसी ही फाइल है। वह आज कानून की किताब में नहीं, लेकिन राजनीतिक स्मृति में मौजूद है। इसलिए चारधाम से जुड़ा हर बड़ा घटनाक्रम उस पुराने अध्याय की याद ताजा कर देता है।
अब सवाल यह नहीं कि देवस्थानम बोर्ड वापस आएगा या नहीं, बल्कि यह है कि क्या चारधाम से जुड़े हर नए विवाद में उसका नाम फिर राजनीतिक बहस का हिस्सा बनता रहेगा? उत्तराखंड की चुनावी राजनीति में इसका जवाब आने वाले महीनों की परिस्थितियां तय करेंगी।
सत्ता की ‘हैट्रिक’ रोकने को कांग्रेस तैयार
2027 की जंग के लिए अभी से मैदान में उतरी कांग्रेस
परिवर्तन यात्राओं से लेकर हाईकमान की सक्रियता तक
सत्ता वापसी का खाका तैयार करने में जुटी कांग्रेस पार्टी
देहरादून। वर्ष 2017 और 2022 के विधानसभा चुनाव में लगातार हार का सामना करने के बाद अब उत्तराखंड कांग्रेस ने 2027 के चुनाव को करो या मरो की लड़ाई मान लिया है। करीब एक दशक से सत्ता से बाहर कांग्रेस इस बार कोई राजनीतिक जोखिम लेने के मूड में नहीं दिख रही। यही वजह है कि चुनाव में अभी लंबा समय बाकी होने के बावजूद पार्टी ने संगठन को सक्रिय करने, कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा भरने और जनता के बीच अपनी मौजूदगी मजबूत करने की कवायद तेज कर दी है।
प्रदेश कांग्रेस की रणनीति साफ हैकृचुनाव की घोषणा का इंतजार नहीं, बल्कि अभी से चुनावी माहौल तैयार करना। इसी रणनीति के तहत जिलों में परिवर्तन यात्राएं निकाली जा रही हैं। इन यात्राओं का उद्देश्य केवल सरकार की नीतियों का विरोध करना नहीं, बल्कि बूथ स्तर तक निष्क्रिय संगठन को सक्रिय करना, स्थानीय मुद्दों को पहचानना और कार्यकर्ताओं को चुनावी मोड में लाना भी है। उत्तराखंड कांग्रेस के लिए राहत की बात यह है कि इस बार पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व भी राज्य को लेकर पहले की तुलना में अधिक सक्रिय दिखाई दे रहा है। राष्ट्रीय स्तर के नेताओं के उत्तराखंड दौरे शुरू हो चुके हैं और प्रदेश नेतृत्व के साथ लगातार रणनीतिक बैठकों का सिलसिला चल रहा है।
सूत्रों के अनुसार पार्टी का शीर्ष नेतृत्व केवल सभाएं करने तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि संगठन की वास्तविक स्थिति, जिला इकाइयों की सक्रियता और संभावित चुनावी समीकरणों का भी आकलन कर रहा है। संदेश स्पष्ट है कि 2027 का चुनाव केवल प्रदेश नेतृत्व के भरोसे नहीं छोड़ा जाएगा। कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती भाजपा नहीं, बल्कि अपना संगठन है। कई जिलों में गुटबाजी, निष्क्रिय संगठन और बूथ स्तर पर कमजोर ढांचा लंबे समय से पार्टी की कमजोरी रहे हैं।
इसी कारण प्रदेश मुख्यालय में लगातार समीक्षा बैठकों का दौर चल रहा है। जिला और ब्लाक स्तर के पदाधिकारियों से रिपोर्ट ली जा रही है, संगठनात्मक कार्यक्रमों की निगरानी की जा रही है और बूथ स्तर तक नई टीम तैयार करने पर जोर दिया जा रहा है। पार्टी नेतृत्व यह मानता है कि यदि संगठन मजबूत नहीं हुआ, तो केवल बड़े नेताओं की रैलियां चुनावी जीत में नहीं बदल पाएंगी। कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा को राजनीतिक पर्यवेक्षक दो नजरियों से देख रहे हैं। पहला, यह सरकार के खिलाफ माहौल बनाने का प्रयास है। दूसरा, यह पार्टी के लिए एक संगठनात्मक अभ्यास भी है, जिसके जरिए यह परखा जा रहा है कि किस जिले में कार्यकर्ता कितने सक्रिय हैं और किन क्षेत्रों में अतिरिक्त मेहनत की जरूरत है। इन यात्राओं के दौरान महंगाई, बेरोजगारी, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सुरक्षा, किसानों की समस्याएं और स्थानीय मुद्दे प्रमुखता से उठाए जा रहे हैं।
कांग्रेस की राह आसान नहीं है। भाजपा पहले से ही बूथ प्रबंधन, मतदाता सूची, लाभार्थी संपर्क और संगठनात्मक विस्तार पर काम कर रही है। ऐसे में कांग्रेस को केवल सरकार की आलोचना से आगे बढ़कर मतदाताओं के सामने एक विश्वसनीय विकल्प भी प्रस्तुत करना होगा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस यदि सत्ता विरोधी भावना को राजनीतिक समर्थन में बदलना चाहती है, तो उसे मजबूत संगठन, स्पष्ट नेतृत्व और एक ठोस चुनावी एजेंडा साथ लेकर चलना होगा।
प्रदेश कांग्रेस में यह सवाल भी महत्वपूर्ण रहेगा कि चुनाव के समय पार्टी का चेहरा कौन होगा। फिलहाल पार्टी सामूहिक नेतृत्व की बात कर रही है, लेकिन चुनाव नजदीक आने के साथ नेतृत्व का प्रश्न और प्रमुख हो सकता है। पार्टी की कोशिश है कि यह बहस संगठन को कमजोर करने के बजाय चुनावी तैयारी के बाद के चरण में ही सामने आए। राजनीतिक दृष्टि से 2027 का विधानसभा चुनाव उत्तराखंड कांग्रेस के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। लगातार तीसरी हार पार्टी के मनोबल और संगठन दोनों पर गहरा असर डाल सकती है, जबकि जीत या मजबूत प्रदर्शन उसे राज्य की राजनीति में नई ऊर्जा दे सकता है। इसीलिए पार्टी अभी से गांव-गांव पहुंचने, कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने और जनता के बीच अपनी राजनीतिक उपस्थिति मजबूत करने में जुटी है।
उत्तराखंड की राजनीति में भाजपा चुनावी मशीनरी को मजबूत करने में जुटी है, जबकि कांग्रेस अपने बिखरे संगठन को फिर से खड़ा करने की कोशिश कर रही है। आने वाले महीनों में असली मुकाबला केवल सरकार बनाम विपक्ष का नहीं होगा, बल्कि बूथ बनाम बूथ, संगठन बनाम संगठन और जनसंपर्क बनाम जनसंपर्क का भी होगा। कांग्रेस ने 2027 की लड़ाई का शंखनाद समय से पहले कर दिया है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या परिवर्तन यात्राओं से निकली राजनीतिक ऊर्जा मतदान केंद्रों तक पहुंच पाएगी या फिर यह तैयारी भी पिछले चुनावों की तरह संगठनात्मक कमजोरियों के बोझ तले दब जाएगी। इसका जवाब आने वाले महीनों में पार्टी की एकजुटता, जमीनी सक्रियता और जनता के बीच उसकी स्वीकार्यता तय करेगी।
शनिवार, 11 जुलाई 2026
सत्ता की ‘राह’ पर कांग्रेस का नया ‘ब्लूप्रिंट’
आलोचना को छोड़ आंदोलन की राह पर कांग्रेस
केसी वेणुगोपाल ने फूंका सक्रियता का बिगुल
संगठन से सड़क तक लड़ाई तेज करने की तैयारी
राज्यों में जवाबदेही और मुद्दों की राजनीति पर जोर
देहरादून। आगामी विधानसभा चुनावों और अगले आम चुनाव को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस ने सत्ता में वापसी के लिए अपनी राजनीतिक रणनीति को नए सिरे से धार देना शुरू कर दिया है। पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव केसी वेणुगोपाल ने पत्रकारों से बातचीत के दौरान स्पष्ट संकेत दिए कि कांग्रेस अब केवल सरकार की आलोचना तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि संगठन, जनसंपर्क और जनआंदोलनों के जरिए मैदान में उतरकर राजनीतिक बढ़त हासिल करने का प्रयास करेगी। वेणुगोपाल के बयान को कांग्रेस के नए एक्शन प्लान का सार्वजनिक संकेत माना जा रहा है। पार्टी का संदेश साफ है कि चुनावी जीत केवल नारों से नहीं, बल्कि बूथ स्तर तक मजबूत संगठन, कार्यकर्ताओं की सक्रियता और जनता के मुद्दों पर लगातार संघर्ष से ही संभव होगी।
सूत्रों के अनुसार कांग्रेस अब वन साइज फिट्स आल की रणनीति छोड़कर राज्यों की राजनीतिक परिस्थितियों के अनुरूप अभियान चलाएगी। जहां स्थानीय मुद्दे प्रभावी हैं, वहां क्षेत्रीय नेतृत्व को आगे रखा जाएगा, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की समस्याएं और संविधान की रक्षा जैसे विषयों को प्रमुखता दी जाएगी। वेणुगोपाल ने संगठनात्मक मजबूती को सबसे बड़ी प्राथमिकता बताते हुए संकेत दिया कि निष्क्रिय इकाइयों की समीक्षा होगी और सक्रिय कार्यकर्ताओं को अधिक जिम्मेदारी दी जाएगी। पार्टी नेतृत्व चाहता है कि जिला और ब्लाक स्तर तक संगठन चुनावी मोड में दिखाई दे।
कांग्रेस नेतृत्व ने कार्यकर्ताओं को भी साफ संदेश दिया है कि चुनावी वर्ष में केवल पद धारण करना पर्याप्त नहीं होगा, जो नेता और पदाधिकारी जनता के बीच सक्रिय रहेंगे, वही संगठन में आगे बढ़ेंगे। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह संदेश पार्टी के भीतर अनुशासन और जवाबदेही बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। कांग्रेस मानती है कि भाजपा की सबसे बड़ी ताकत उसका जमीनी संगठन है। ऐसे में पार्टी अब उसी मोर्चे पर मुकाबले की तैयारी कर रही है। बूथ प्रबंधन, सोशल मीडिया नेटवर्क, जनसंपर्क अभियान और स्थानीय आंदोलनों को एक साथ जोड़कर चुनावी रणनीति तैयार की जा रही है। वेणुगोपाल ने यह भी संकेत दिया कि विपक्षी दलों के साथ राजनीतिक समन्वय और साझा मुद्दों पर सहयोग की संभावनाओं को भी पूरी तरह नकारा नहीं गया है। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि कांग्रेस अपनी संगठनात्मक ताकत बढ़ाने पर सबसे अधिक ध्यान दे रही है।
कांग्रेस नेतृत्व की चिंता केवल चुनाव लड़ने की नहीं, बल्कि चुनाव जीतने की है। इसी कारण अब पार्टी की बैठकों में भाषणों से अधिक संगठनात्मक समीक्षा, बूथ रिपोर्ट, सदस्यता अभियान और जनसंपर्क कार्यक्रमों पर जोर दिया जा रहा है। पार्टी का प्रयास है कि जनता के बीच यह संदेश जाए कि कांग्रेस विपक्ष की भूमिका निभाने के बजाय सत्ता का मजबूत विकल्प बनने की तैयारी में है। आगामी विधानसभा चुनाव वाले राज्यों में कांग्रेस ने विशेष रणनीति बनाने की प्रक्रिया तेज कर दी है। स्थानीय नेतृत्व को जनता के बीच अधिक सक्रिय रहने, सरकार को मुद्दों पर घेरने और संगठनात्मक समन्वय मजबूत करने के निर्देश दिए जा रहे हैं। उत्तराखंड जैसे राज्यों में भी पार्टी सत्ता विरोधी माहौल को अपने पक्ष में बदलने की कोशिश में जुटी है।
धामी के ‘हैट्रिक’ के दावे के सामने कांग्रेस ‘ढर्रा’
उत्तराखंड कांग्रेस के सामने संगठन से लेकर नेतृत्व तक की अग्निपरीक्षा
नेताओं की ऊर्जा आपसी कलह में नहीं, जनता के बीच दिखनी चाहिए
अब संगठन में सक्रियता और जवाबदेही से ही तय होगा नेताओं का कद
जमीनी पकड़ और बूथ पर परिणाम देने वालों को ही मिल सकती है तवज्जो
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति इस समय दिलचस्प मोड़ पर खड़ी है। एक ओर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में भाजपा लगातार तीसरी बार सरकार बनाने का दावा कर रही है, वहीं कांग्रेस सत्ता में वापसी के लिए संगठन को फिर से खड़ा करने की चुनौती से जूझ रही है। दिल्ली से मिले संदेश ने प्रदेश कांग्रेस के नेताओं के सामने स्पष्ट कर दिया है कि अब बयानबाजी नहीं, बल्कि बूथ स्तर पर परिणाम देने होंगे। कांग्रेस महासचिव वेणुगोपाल ने संगठन की सक्रियता और जवाबदेही पर जिस तरह जोर दिया, उसका सीधा असर उत्तराखंड कांग्रेस पर पड़ना तय माना जा रहा है। प्रदेश में लंबे समय से नेतृत्व, गुटीय समीकरण और टिकट की संभावनाओं को लेकर चर्चाएं चलती रही हैं। अब केंद्रीय नेतृत्व चाहता है कि नेताओं की ऊर्जा आंतरिक खींचतान में नहीं, बल्कि जनता के बीच दिखाई दे।
प्रदेश कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह अलग-अलग शक्ति केंद्रों को एक मंच पर लाकर चुनावी अभियान को गति दे। यदि गुटीय राजनीति जारी रही तो भाजपा को इसका सीधा लाभ मिल सकता है। इसके मुकाबले कांग्रेस महंगाई, बेरोजगारी, पलायन, भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा और स्थानीय युवाओं के रोजगार जैसे मुद्दों को लेकर सरकार को घेर रही है। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि केवल मुद्दे उठाना पर्याप्त नहीं होगा। इन मुद्दों को गांव-गांव और बूथ-बूथ तक पहुंचाने वाला मजबूत संगठन भी चाहिए।
उत्तराखंड की राजनीति का इतिहास बताता है कि यहां सरकारों के खिलाफ असंतोष समय-समय पर उभरता रहा है। लेकिन हर बार विपक्ष उसे चुनावी लाभ में बदल पाए, ऐसा नहीं हुआ। कांग्रेस के सामने यही सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल है। यदि पार्टी स्थानीय मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाती है, संगठन को सक्रिय करती है और टिकट वितरण में समय रहते स्पष्टता लाती है, तो मुकाबला रोचक हो सकता है। लेकिन यदि अंदरूनी खींचतान हावी रही तो सत्ता विरोधी भावना भी बिखर सकती है। वेणुगोपाल के संकेतों का एक असर टिकट वितरण पर भी पड़ सकता है। माना जा रहा है कि केंद्रीय नेतृत्व केवल वरिष्ठता के आधार पर नहीं, बल्कि जमीनी सक्रियता, जनस्वीकार्यता और संगठनात्मक प्रदर्शन को भी महत्व देगा। इससे कई दावेदारों के लिए चुनौती बढ़ सकती है।
2027 के चुनाव में पहली बार मतदान करने वाले युवाओं की बड़ी संख्या और महिला मतदाताओं की बढ़ती भागीदारी चुनावी समीकरण बदल सकती है। कांग्रेस यदि इन दोनों वर्गों के लिए स्पष्ट एजेंडा और विश्वसनीय नेतृत्व प्रस्तुत करती है तो उसे राजनीतिक बढ़त मिल सकती है। दूसरी ओर भाजपा भी अपने संगठन और सरकारी योजनाओं के दम पर इन्हीं वर्गों को साधने में जुटी हुई है। वेणुगोपाल का ष्एक्शन प्लानष् उत्तराखंड कांग्रेस के लिए एक राजनीतिक संदेश से अधिक एक संगठनात्मक चेतावनी भी है। अब यह देखना होगा कि प्रदेश नेतृत्व इसे कितनी गंभीरता से लागू करता है। आने वाले महीनों में कांग्रेस की सक्रियता, जनआंदोलन, सदस्यता अभियान और बूथ प्रबंधन ही तय करेंगे कि पार्टी 2027 में सत्ता की मजबूत दावेदार बनती है या फिर विपक्ष की भूमिका तक सीमित रह जाती है।
उत्तराखंड में 2027 की लड़ाई केवल भाजपा बनाम कांग्रेस नहीं होगी, बल्कि संगठन बनाम असंतोष की भी होगी। भाजपा अपनी संगठित चुनावी मशीनरी और सरकार के कामकाज के आधार पर मैदान में उतरेगी, जबकि कांग्रेस को सत्ता विरोधी माहौल को जनसमर्थन में बदलने के लिए जमीन पर असाधारण मेहनत करनी होगी।
खो गई सिलबट्टे की ‘खर्र-खर्र’ और रसोई की ‘रौनक’
आधुनिक गैजेट्स ने बदल दी है पहाड़ के रसोई की अनोखी रंगत
मिक्सर व ग्राइंडर के शोर में कहीं खो गई सिलबट्टे की खर्र-खर्र
आज भी अधूरी है सिलबट्टे वाले नमक-चटनी की सोंधी खुशबू
पहाड़ के गांवों की रसोई में यह केवल पत्थर नहीं एक संस्कृति
देहरादून। एक समय था जब पहाड़ के किसी भी गांव में सुबह की शुरुआत केवल पक्षियों की चहचहाहट से नहीं होती थी, बल्कि रसोई से आती सिलबट्टे पर मसाले पीसने की खर्र-खर्र की आवाज से होती थी। वह आवाज़ किसी मशीन की नहीं, बल्कि एक घर के जीवंत होने की पहचान होती थी। सिलबट्टा केवल दो पत्थरों का मेल नहीं था। वह पहाड़ की गृहस्थी का सबसे भरोसेमंद साथी था। उस पर पीसी गई हरी मिर्च, भांग की चटनी, भुना नमक, जाखिया, तिल, धनिया और लहसुन का स्वाद आज भी किसी आधुनिक मिक्सर की तेज धार नहीं दे पाती। आज रसोई में मिक्सर है, ग्राइंडर है, फूड प्रोसेसर है, लेकिन सिलबट्टे पर पीसे मसालों की आत्मा कहीं पीछे छूट गई है।
पहाड़ की माताएं घंटों सिलबट्टे पर मसाले पीसती थीं। उनके हाथों की लय ऐसी होती थी कि मसाले केवल पिसते नहीं थे, उनमें अपनापन भी घुल जाता था। जब भांग की चटनी सिल पर तैयार होती थी, उसकी खुशबू पूरे आंगन में फैल जाती थी। बच्चे रोटी लेकर पहले ही बैठ जाते थे। कहा जाता है कि सिलबट्टे पर पीसने से मसालों का तेल और प्राकृतिक सुगंध बनी रहती है। शायद यही कारण है कि पुराने लोग आज भी कहते हैंकृमिक्सर मसाला पीसता है, सिलबट्टा स्वाद बनाता है। आज गांवों में भी कई सिलबट्टे धूल खा रहे हैं। कुछ घरों में तुलसी के चौरे के पास पड़े हैं, तो कहीं गोठ के किनारे। नई पीढ़ी के लिए वह बस एक भारी पत्थर है, लेकिन बुजुर्गों की आंखों में उसे देखकर बीते समय की पूरी कहानी उतर आती है। उस पत्थर पर वर्षों तक परिवार की रोटी का स्वाद तैयार हुआ। त्योहारों की चटनियां बनीं। मेहमानों के स्वागत की तैयारी हुई। बच्चों के लिए पहली बार दलिया पीसा गया। कितनी पीढ़ियों की स्मृतियां उसकी सतह पर आज भी जैसे अंकित हैं।
सिलबट्टा उस दौर की पहचान भी है जब पहाड़ आत्मनिर्भर था। मसाले बाजार से तैयार नहीं आते थे। खेत में उगते थे घर में सुखाए जाते थे और सिलबट्टे पर पीसे जाते थे। हर चटनी का स्वाद अलग होता था क्योंकि उसमें घर की मिट्टी, पानी और हाथों का स्पर्श शामिल होता था। यह केवल रसोई का औजार नहीं था, बल्कि पहाड़ की महिलाओं के श्रम, धैर्य और आत्मसम्मान का जीवंत प्रतीक था।
बदलती जीवनशैली ने सिलबट्टे को लगभग रसोई से बाहर कर दिया है। शहरों में तो यह सजावट की वस्तु बन चुका है और गांवों में भी इसका उपयोग तेजी से घट रहा है। सवाल यह है कि क्या आने वाली पीढ़ी केवल किताबों में पढ़ेगी कि कभी मसाले पत्थर पर भी पीसे जाते थे? क्या वह कभी समझ पाएंगे कि भांग की चटनी का असली स्वाद मशीन से नहीं, मां के हाथों और सिलबट्टे की धीमी रगड़ से पैदा होता था?
पहाड़ की संस्कृति केवल मंदिरों, मेलों और लोकगीतों में नहीं बसती। वह रसोई में रखे उन साधारण दिखने वाले उपकरणों में भी जीवित है, जिन्होंने पीढ़ियों का जीवन संवारा। सिलबट्टा उनमें सबसे महत्वपूर्ण है। यदि हम अपनी पारंपरिक रसोई, स्थानीय भोजन और लोक संस्कृति को बचाना चाहते हैं, तो सिलबट्टे जैसी विरासत को भी सम्मान देना होगा। क्योंकि जिस दिन पहाड़ के घरों से सिलबट्टे की आखिरी खनक खत्म हो जाएगी, उस दिन केवल एक पत्थर नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक स्मृति का एक अनमोल अध्याय भी हमेशा के लिए मौन हो जाएगा।
‘आस्था-विकास’ की पिच पर ‘जवाबदेही’ की गुगली
कांग्रेस के लिए सवालों का मंच, भाजपा के लिए आस्था का केंद्र
उत्तराखंड में चुनावी शंखनाद से पहले मंदिरों पर हुई सियासत तेज
यक्ष प्रश्न: आस्था और आरोपों के बीच आमजन किसके साथ
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में एक बार फिर मंदिर केवल पूजा-अर्चना का विषय नहीं, बल्कि चुनावी विमर्श का केंद्र बनते दिखाई दे रहे हैं। चारधाम, प्राचीन मंदिरों के प्रबंधन, धार्मिक परंपराओं और मंदिर परिसरों से जुड़े विवादों ने सियासी बहस को नई धार दे दी है। विधानसभा चुनाव 2027 से पहले भाजपा और कांग्रेस दोनों ने इस मुद्दे पर अपनी-अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश तेज कर दी है। भाजपा का राजनीतिक संदेश स्पष्ट हैकृमंदिर केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था और सांस्कृतिक पहचान के प्रतीक हैं। पार्टी अपने शासनकाल में चारधाम परियोजना, तीर्थ अवसंरचना, श्र(ालु सुविधाओं और धार्मिक पर्यटन को उपलब्धियों के रूप में प्रस्तुत कर रही है। भाजपा का दावा है कि उसकी राजनीति विकास और आस्था को साथ लेकर चलने की है। दूसरी ओर कांग्रेस सरकार से मंदिरों के प्रबंधन, पारदर्शिता, वित्तीय जवाबदेही और स्थानीय हितों से जुड़े सवाल पूछ रही है। पार्टी का कहना है कि धार्मिक संस्थानों से जुड़े मामलों में जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित होना चाहिए। कांग्रेस यह भी आरोप लगाती रही है कि सरकार धार्मिक मुद्दों का राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश करती है, जबकि भाजपा इन आरोपों को सिरे से खारिज करती है।
उत्तराखंड जैसे धार्मिक महत्व वाले राज्य में मंदिरों का मुद्दा केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक आयाम भी रखता है। चारधाम यात्रा से हजारों परिवारों की आजीविका जुड़ी है। मंदिरों से जुड़ी व्यवस्थाएं, यात्रियों की सुविधाएं, स्थानीय व्यापार और पारदर्शी प्रशासनकृये सभी चुनावी चर्चा का हिस्सा बनते जा रहे हैं। भाजपा इस बहस को आस्था और सांस्कृतिक विरासत के नजरिए से प्रस्तुत करती है, जबकि कांग्रेस प्रबंधन, पारदर्शिता और जवाबदेही पर अधिक जोर देती है। यही वैचारिक अंतर राजनीतिक टकराव का मुख्य आधार बन गया है। भाजपा लगातार यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि उसने धार्मिक स्थलों के विकास को प्राथमिकता दी है और यह उसकी वैचारिक प्रतिब(ता का हिस्सा है। वहीं कांग्रेस यह दिखाना चाहती है कि मंदिरों की गरिमा केवल निर्माण कार्यों से नहीं, बल्कि ईमानदार और पारदर्शी व्यवस्था से भी जुड़ी होती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले महीनों में मंदिरों से जुड़े हर मुद्दे पर दोनों दलों के बीच बयानबाजी और तेज होगी। यह बहस केवल धार्मिक नहीं रहेगी, बल्कि सुशासन, प्रशासनिक जवाबदेही और राजनीतिक विश्वसनीयता तक पहुंचेगी। देवभूमि उत्तराखंड में मंदिर केवल श्र(ा के केंद्र नहीं, बल्कि सामाजिक जीवन और स्थानीय अर्थव्यवस्था का भी आधार हैं। इसलिए मंदिरों पर होने वाली राजनीतिक बहस का असर चुनावी माहौल पर भी पड़ सकता है। लेकिन अंततः मतदाता यह भी देखेगा कि किस दल ने आस्था का सम्मान करने के साथ-साथ व्यवस्थाओं को बेहतर बनाने के लिए ठोस काम किया।
2027 की ओर बढ़ती उत्तराखंड की राजनीति में मंदिर फिर एक बड़े चुनावी मुद्दे के रूप में उभर रहे हैं। भाजपा उन्हें अपनी वैचारिक पहचान और आस्था से जोड़कर प्रस्तुत कर रही है, जबकि कांग्रेस प्रबंधन और जवाबदेही के सवाल उठा रही है। अब असली फैसला जनता के हाथ में होगा। मतदाता यह तय करेगा कि चुनावी बहस में किसका पक्ष अधिक विश्वसनीय हैकृआस्था के साथ विकास का दावा, या आस्था के साथ जवाबदेही की मांग। देवभूमि की राजनीति में यह टकराव आने वाले दिनों में और अधिक तीखा होने के संकेत दे रहा है।
कांग्रेस के ‘दौरों’ पर भाजपा की ‘घेराबंदी’
उत्तराखंड में अब हर दौरा बनेगा राजनीतिक रणक्षेत्र
कांग्रेस के उत्तराखंड दौरों पर भाजपा का पलटवार तेज
बड़े नेताओं की आवाजाही पर सत्ता पक्ष कर रहा हमला
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की आहट तेज होते ही राजनीतिक तापमान भी चढ़ने लगा है। कांग्रेस के राष्ट्रीय नेताओं के लगातार उत्तराखंड दौरे अब भाजपा के निशाने पर हैं। मुख्यमंत्री, मंत्रियों और भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने कांग्रेस के अभियान को लेकर आक्रामक रुख अपनाते हुए सवालों की बौछार शुरू कर दी है। भाजपा नेताओं का कहना है कि कांग्रेस के शीर्ष नेता उत्तराखंड में राजनीतिक जमीन तलाशने के लिए लगातार दौरे कर रहे हैं, लेकिन पार्टी पहले अपने भीतर के मतभेद और नेतृत्व के सवालों का समाधान करे। सत्ता पक्ष का दावा है कि राज्य की जनता केवल भाषण सुनने नहीं, बल्कि काम का हिसाब देखने के मूड में है।
भाजपा नेताओं का कहना है कि चुनावी मौसम नजदीक आते ही कांग्रेस को उत्तराखंड की याद आना राजनीतिक अवसरवाद को दर्शाता है। उनका तर्क है कि राज्य के विकास, निवेश, सड़क, पर्यटन और बुनियादी ढांचे के मुद्दों पर कांग्रेस के पास कोई ठोस वैकल्पिक रोडमैप नहीं है। भाजपा के कई नेताओं ने यह भी कहा कि राष्ट्रीय नेताओं की रैलियां भी तभी प्रभावी होती हैं, जब प्रदेश संगठन मजबूत हो। उनके अनुसार, कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती भाजपा नहीं, बल्कि उसकी अपनी अंदरूनी खींचतान है। राज्य सरकार के मंत्रियों ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि केवल बड़े नेताओं की सभाओं से चुनाव नहीं जीते जाते। जनता यह देखती है कि किस दल के पास स्पष्ट नेतृत्व, नीति और विकास की दृष्टि है।
भाजपा का दावा है कि केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं ने गांवों से लेकर शहरों तक विकास की नई तस्वीर बनाई है। ऐसे में कांग्रेस के आरोपों और दौरों से जनता प्रभावित होने वाली नहीं है। भाजपा नेताओं का मानना है कि कांग्रेस उत्तराखंड में सत्ता विरोधी माहौल बनाने की कोशिश कर रही है, लेकिन उसे यह भी बताना होगा कि यदि उसे मौका मिला तो वह राज्य के लिए क्या अलग करेगी। सत्ता पक्ष लगातार यह सवाल उठा रहा है कि कांग्रेस केवल सरकार की आलोचना कर रही है या उसके पास कोई स्पष्ट विकास एजेंडा भी है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले महीनों में कांग्रेस के हर बड़े नेता का उत्तराखंड दौरा भाजपा के जवाबी अभियान का केंद्र बनेगा। एक ओर कांग्रेस जनता के मुद्दोंकृमहंगाई, बेरोजगारी, पलायन और स्थानीय समस्याओंकृको लेकर सरकार को घेरने का प्रयास करेगी, तो दूसरी ओर भाजपा विकास कार्यों, संगठनात्मक मजबूती और नेतृत्व के सवाल पर कांग्रेस को लगातार कठघरे में खड़ा करेगी। उत्तराखंड की राजनीति अब स्पष्ट रूप से चुनावी मोड में प्रवेश कर चुकी है। कांग्रेस अपने राष्ट्रीय नेतृत्व के सहारे कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा भरने की कोशिश कर रही है, जबकि भाजपा इस अभियान को बाहरी राजनीतिक प्रदर्शन बताते हुए जनता के बीच अपनी सरकार के कामकाज को मुख्य मुद्दा बनाने में जुटी है।
उत्तराखंड कांग्रेस के ‘सारथी’ बैकफुट पर
2027 की लड़ाई में सबसे बड़ा सवाल बन रही है गैरहाजिरी
उत्तराखंड में कांग्रेस के राष्ट्रीय नेताओं की सक्रियता बढ़ी
पूर्व सीएम हरदा की सीमित मौजूदगी पर हो गई चर्चा तेज
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियां तेज हो चुकी हैं। कांग्रेस के राष्ट्रीय नेता लगातार राज्य का दौरा कर रहे हैं, संगठन को सक्रिय करने की कवायद चल रही है और सत्ता परिवर्तन का दावा भी किया जा रहा है। लेकिन इन सबके बीच एक सवाल राजनीतिक गलियारों में लगातार तैर रहा हैकृकांग्रेस के सबसे अनुभवी चेहरों में गिने जाने वाले पूर्व मुख्यमंत्री हरदा यानी हरीश रावत अपेक्षाकृत कम सक्रिय क्यों दिखाई दे रहे हैं? उत्तराखंड कांग्रेस की राजनीति में हरीश रावत लंबे समय तक सबसे प्रभावशाली जननेता रहे हैं। चुनावी रणनीति से लेकर कार्यकर्ताओं को ऊर्जा देने तक उनकी भूमिका अहम मानी जाती रही है। ऐसे में चुनावी माहौल के बीच उनकी सीमित सार्वजनिक सक्रियता को लेकर तरह-तरह की राजनीतिक चर्चाएं शुरू हो गई हैं।
कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व ने उत्तराखंड में अपनी सक्रियता बढ़ा दी है। बड़े नेताओं के दौरे, संगठनात्मक बैठकों और चुनावी तैयारियों का सिलसिला जारी है। इसके बावजूद कार्यकर्ताओं का एक वर्ग मानता है कि यदि हरीश रावत भी पहले की तरह लगातार जनसभाओं, पदयात्राओं और संगठनात्मक अभियानों में सक्रिय दिखाई दें, तो पार्टी के कार्यकर्ताओं का मनोबल और मजबूत हो सकता है। हालांकि कांग्रेस के भीतर यह भी राय है कि पार्टी अब सामूहिक नेतृत्व के माडल पर आगे बढ़ रही है और चुनाव किसी एक चेहरे के बजाय पूरी टीम के दम पर लड़ना चाहती है।
हरीश रावत की सीमित सक्रियता को भाजपा भी राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश कर रही है। भाजपा के नेता आरोप लगा रहे हैं कि कांग्रेस अपने सबसे बड़े जनाधार वाले नेता की भूमिका को लेकर स्पष्ट नहीं है। सत्ता पक्ष इसे कांग्रेस के अंदर नेतृत्व को लेकर असमंजस का संकेत बताता है। वहीं कांग्रेस का कहना है कि पार्टी में सभी वरिष्ठ नेताओं की भूमिका तय है और चुनावी समय आने पर हर नेता अपनी जिम्मेदारी निभाएगा।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि समय के साथ हरीश रावत की भूमिका में बदलाव आया है। पहले वह आंदोलन, जनसंपर्क और चुनावी अभियान का सबसे प्रमुख चेहरा होते थे, जबकि अब संगठन में नई पीढ़ी के नेताओं को भी आगे बढ़ाने की कोशिश दिखाई दे रही है। इसके बावजूद यह भी सच है कि उत्तराखंड के ग्रामीण क्षेत्रों, विशेषकर कुमाऊं और गढ़वाल के अनेक इलाकों में आज भी हरीश रावत की व्यक्तिगत पहचान और जनसंपर्क क्षमता को कांग्रेस की बड़ी राजनीतिक पूंजी माना जाता है।
कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती भाजपा की मजबूत संगठनात्मक मशीनरी का मुकाबला करना है। ऐसे में अनुभवी नेतृत्व और नए चेहरों के बीच संतुलन बनाना पार्टी के लिए महत्वपूर्ण होगा। यदि हरीश रावत चुनावी अभियान में अधिक सक्रिय भूमिका निभाते हैं, तो इसका असर कार्यकर्ताओं के उत्साह और चुनावी संदेश दोनों पर पड़ सकता है। दूसरी ओर यदि पार्टी पूरी तरह नए नेतृत्व और सामूहिक रणनीति पर भरोसा करती है, तो उसे यह भी सुनिश्चित करना होगा कि वरिष्ठ नेताओं का अनुभव और जनाधार चुनावी अभियान से अलग-थलग न पड़ जाए।
उत्तराखंड की राजनीति में एक कहावत अक्सर सुनाई देती हैकृकांग्रेस का चुनाव और हरदा की चर्चा, दोनों अलग नहीं हो सकते। यही कारण है कि जैसे-जैसे 2027 का चुनाव करीब आएगा, हरीश रावत की भूमिका, उनकी सक्रियता और चुनावी रणनीति में उनकी भागीदारी पर राजनीतिक चर्चाएं और तेज होना लगभग तय है। फिलहाल तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं है, लेकिन इतना निश्चित है कि कांग्रेस यदि सत्ता में वापसी का सपना देख रही है, तो उसे अपने अनुभवी नेतृत्व, संगठनात्मक मजबूती और नई राजनीतिक रणनीतिकृतीनों के बीच संतुलन बनाना होगा। उत्तराखंड की चुनावी बिसात पर यह संतुलन ही जीत और हार के बीच का सबसे महत्वपूर्ण अंतर साबित हो सकता है।
शुक्रवार, 10 जुलाई 2026
कांग्रेस में अनुशासन की चुनावी ‘सर्जरी’
कांग्रेस में 2027 विस चुनाव से पहले संगठन पर कसा केंद्रीय नेतृत्व ने शिकंजा
गुटबाजी, टिकट की दौड़ और नेतृत्व के समीकरणों पर है पैनी नजर
राष्ट्रीय नेतृत्व के सामने सबसे बड़ी चुनौतीकृगुटबाजी पर लगाम और चुनाव की तैयारी
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में जब भी कांग्रेस के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल का दौरा तय होता है, तो यह महज एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं होता। यह संकेत होता है कि दिल्ली अब उत्तराखंड की राजनीति को केवल देख नहीं रही, बल्कि उसे अपनी रणनीति के अनुसार आकार देना चाहती है। 2027 का विधानसभा चुनाव अभी दूर है, लेकिन कांग्रेस के भीतर चुनाव शुरू हो चुका है। यह चुनाव भाजपा के खिलाफ कम और कांग्रेस के भीतर नेतृत्व, संगठन, टिकट और राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई ज्यादा दिखाई दे रहा है। यही कारण है कि वेणुगोपाल का दौरा कई नेताओं के लिए अवसर भी है और परीक्षा भी।
उत्तराखंड कांग्रेस वर्षों से एक ही बीमारी से जूझ रही हैकृचुनाव आते ही कार्यकर्ताओं से ज्यादा दावेदार सक्रिय हो जाते हैं। बूथ कमजोर रहता है और नेताओं के खेमे मजबूत हो जाते हैं। परिणाम यह होता है कि जनता के बीच लड़ाई लड़ने से पहले पार्टी अपने भीतर ही उलझ जाती है। ऐसे में वेणुगोपाल का दौरा इस बात का संकेत माना जा रहा है कि दिल्ली अब यह जोखिम दोहराना नहीं चाहती। राष्ट्रीय नेतृत्व जानता है कि यदि संगठन बिखरा रहा, तो सत्ता विरोधी माहौल भी कांग्रेस के लिए पर्याप्त नहीं होगा। भाजपा की सबसे बड़ी ताकत उसका बूथ नेटवर्क और चुनावी मशीनरी है। कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती उसका संगठनात्मक ढांचा है। भाजपा चुनाव से महीनों पहले बूथ पर पहुंच जाती है, जबकि कांग्रेस अक्सर टिकट घोषित होने के बाद पूरी ताकत से मैदान में उतरती है।
यदि कांग्रेस को 2027 में मुकाबला करना है, तो उसे भाषणों से ज्यादा संगठन पर निवेश करना होगा। यही कारण है कि वेणुगोपाल की प्राथमिकता संगठनात्मक अनुशासन और कार्यकर्ता-आधारित राजनीति मानी जा रही है। कांग्रेस में विधानसभा चुनाव से पहले टिकट की दावेदारी हमेशा संगठन पर भारी पड़ती रही है। कई सीटों पर एक ही टिकट के लिए अनेक दावेदार सक्रिय रहते हैं। यदि समय रहते इस प्रतिस्पर्धा का प्रबंधन नहीं हुआ, तो असंतोष चुनावी नुकसान में बदल सकता है। संभव है कि राष्ट्रीय नेतृत्व इस बार प्रदर्शन, जनाधार और संगठनात्मक सक्रियता को अधिक महत्व देने की कोशिश करे। हालांकि अंतिम फैसला भविष्य में ही होगा, लेकिन संगठन को अनुशासित रखने का संदेश अभी से दिया जा सकता है।
कांग्रेस के सामने केवल सरकार की आलोचना करना पर्याप्त नहीं होगा। मतदाता अब यह भी जानना चाहता है कि विकल्प क्या है। बेरोजगारी, पलायन, स्वास्थ्य, शिक्षा, भू-कानून, मूल निवास और पहाड़ी अर्थव्यवस्था जैसे मुद्दों पर ठोस और विश्वसनीय रोडमैप के बिना केवल सत्ता विरोधी राजनीति सीमित असर छोड़ सकती है। यदि वेणुगोपाल के दौरे के बाद कांग्रेस इन मुद्दों पर एक स्पष्ट और संगठित अभियान खड़ा करती है, तो चुनावी मुकाबला अधिक प्रतिस्पर्धी हो सकता है। उत्तराखंड कांग्रेस में यह धारणा लंबे समय से रही है कि बड़े संगठनात्मक फैसलों पर दिल्ली की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। इसलिए वेणुगोपाल का दौरा स्वाभाविक रूप से राजनीतिक संदेश लेकर आता है। कार्यकर्ताओं की नजर इस बात पर रहेगी कि संगठनात्मक दिशा, अभियान और समन्वय को लेकर क्या संकेत दिए जाते हैं।
वेणुगोपाल का उत्तराखंड दौरा केवल कैलेंडर का एक कार्यक्रम नहीं है। यह कांग्रेस के लिए एक परीक्षा हैकृक्या वह गुटों की राजनीति से ऊपर उठकर संगठन को प्राथमिकता दे पाएगी? यदि जवाब हाँ है, तो 2027 का चुनाव अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है। यदि जवाब नहीं है, तो सत्ता विरोधी माहौल भी कांग्रेस के लिए पर्याप्त नहीं होगा।
पहाड़ की ‘पीड़ा’ चुनावी ‘हथियार’
यूकेडी के उभार की आहट से बदले चुनावी समीकरण
भाजपा और कांग्रेस के बीच तीसरे विकल्प की तलाश
पहाड़ के मुद्दों पर फिर मुखर हुई उत्तराखंड क्रांति दल
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति लंबे समय से भाजपा और कांग्रेस के इर्द-गिर्द घूमती रही है, लेकिन विधानसभा चुनाव 2027 से पहले राजनीतिक गलियारों में एक नई चर्चा जोर पकड़ रही हैकृक्या राज्य में एक बार फिर क्षेत्रीय राजनीति लौट रही है? उत्तराखंड राज्य आंदोलन की विरासत अपने नाम से जोड़ने वाला उत्तराखंड क्रांति दल लगातार जनसंपर्क अभियान, पहाड़ के मूल मुद्दों और स्थानीय अस्मिता को केंद्र में रखकर खुद को फिर से स्थापित करने की कोशिश में जुटा है। हालांकि अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि राज्य में यूकेडी के पक्ष में व्यापक चुनावी लहर बन चुकी है, लेकिन कई राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यदि पार्टी अपने संगठन को मजबूत करने और जनता के बीच निरंतर सक्रिय रहने में सफल रहती है, तो वह कई सीटों पर मुकाबले को त्रिकोणीय बना सकती है।
यूकेडी अपने पुराने राजनीतिक एजेंडेकृस्थायी राजधानी, सशक्त भू-कानून, मूल निवास, पलायन, बेरोजगारी, जल-जंगल-जमीन और पर्वतीय विकासकृको फिर से मजबूती से उठा रही है। पार्टी का तर्क है कि राज्य बनने के ढाई दशक बाद भी जिन मुद्दों के लिए उत्तराखंड आंदोलन हुआ था, वे आज भी अधूरे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में खाली होते गांव, सीमांत क्षेत्रों से पलायन, कृषि संकट, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी जैसे मुद्दों को लेकर यूकेडी भाजपा और कांग्रेस दोनों पर निशाना साध रही है। पार्टी का कहना है कि राष्ट्रीय दल चुनाव के समय पहाड़ की बात करते हैं, लेकिन सत्ता में आने के बाद प्राथमिकताएं बदल जाती हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सत्ता विरोधी माहौल बनने की स्थिति में सबसे अधिक फायदा अक्सर तीसरे विकल्प को मिलता है। यदि भाजपा और कांग्रेस दोनों के टिकट वितरण से असंतोष बढ़ता है, तो यूकेडी ऐसे नेताओं और कार्यकर्ताओं को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर सकती है। विशेषकर पर्वतीय सीटों पर स्थानीय चेहरों और क्षेत्रीय मुद्दों की पकड़ रखने वाले प्रत्याशी चुनावी मुकाबले को दिलचस्प बना सकते हैं। यदि यूकेडी सीमित सीटों पर भी प्रभावी प्रदर्शन करती है, तो कई निर्वाचन क्षेत्रों में जीत-हार का अंतर प्रभावित हो सकता है।
पार्टी युवाओं, बेरोजगारों और उत्तराखंड आंदोलन से जुड़े परिवारों तक पहुंच बनाने का प्रयास कर रही है। सोशल मीडिया के माध्यम से भी यूकेडी अपनी उपस्थिति बढ़ा रही है। पार्टी का संदेश है कि उत्तराखंड की समस्याओं का समाधान स्थानीय सोच और स्थानीय नेतृत्व से ही संभव है। हालांकि राजनीतिक विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि केवल भावनात्मक मुद्दे चुनाव जिताने के लिए पर्याप्त नहीं होंगे। संगठन, संसाधन, मजबूत उम्मीदवार और बूथ स्तर की तैयारी किसी भी क्षेत्रीय दल के लिए सबसे बड़ी चुनौती बने हुए हैं।
भले ही यूकेडी पूरे राज्य में सत्ता की मुख्य दावेदार न दिखाई दे, लेकिन कई सीटों पर उसका प्रभाव निर्णायक हो सकता है। यदि पार्टी 5 से 10 प्रतिशत तक वोट भी अपने पक्ष में खींचने में सफल रहती है, तो भाजपा और कांग्रेस दोनों के पारंपरिक गणित पर असर पड़ सकता है। राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि यदि चुनाव परिणाम त्रिशंकु स्थिति की ओर बढ़ते हैं, तो क्षेत्रीय दलों की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है।
उत्तराखंड की जनता ने राज्य आंदोलन के समय क्षेत्रीय नेतृत्व पर भरोसा जताया था, लेकिन बाद के वर्षों में यूकेडी संगठनात्मक कमजोरी, नेतृत्व संकट और आंतरिक मतभेदों के कारण अपना जनाधार खोती चली गई। अब पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल जनता का विश्वास जीतना नहीं, बल्कि यह साबित करना भी है कि वह आंदोलन की विरासत से आगे बढ़कर आज के उत्तराखंड के लिए एक व्यवहारिक राजनीतिक विकल्प बन सकती है। 2027 का चुनाव केवल भाजपा और कांग्रेस के बीच सत्ता का संघर्ष नहीं होगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि क्या उत्तराखंड की राजनीति में क्षेत्रीय दलों के लिए फिर से जगह बन रही है या नहीं। आने वाले महीनों में यूकेडी की संगठनात्मक सक्रियता, जनसंपर्क अभियान और स्थानीय मुद्दों पर उसकी पकड़ ही तय करेगी कि मौजूदा चर्चा चुनावी परिणामों में बदलती है या नहीं।
रोटना है ‘खुशी’ बांटने की पहाड़ी ‘परंपरा’
पहाड़ की रसोई का अनोखा भूला-बिसरा स्वाद
रोटना आज भी रिश्तों में घोलता रहता है मिठास
न घी से टपकती मिठाई और न बाजार की चमक
हर पर्व और शुभ अवसर की पहली पसंद रोटना
देहरादून। आधुनिक जीवनशैली और बाजार की चकाचौंध में उत्तराखंड के पारंपरिक व्यंजन धीरे-धीरे लोगों की थाली से गायब होते जा रहे हैं। इन्हीं में एक है रोटनाकृपहाड़ की रसोई में बनने वाला ऐसा पारंपरिक पकवान, जिसकी मिठास केवल स्वाद में नहीं, बल्कि संस्कृति, अपनत्व और लोकजीवन में भी घुली हुई है। एक समय था जब गांव में किसी के घर शुभ कार्य होता, नई फसल कटती, पूजा-अर्चना होती या मेहमान आते, तो रसोई में सबसे पहले रोटना बनाया जाता था। यह केवल भोजन नहीं, बल्कि खुशी बांटने की परंपरा थी।
रोटना गेहूं के आटे से बनाया जाने वाला पारंपरिक मीठा व्यंजन है। इसमें गुड़ या शक्कर, देसी घी और स्थानीय स्वाद के अनुसार सौंफ, इलायची या अन्य घरेलू सामग्री मिलाई जाती है। इसे मोटे आकार में तवे या धीमी आंच पर पकाया जाता है, जिससे इसकी सुगंध पूरे घर में फैल जाती है। पहाड़ की महिलाएं बताती हैं कि रोटना केवल पेट भरने के लिए नहीं, बल्कि परिवार के साथ बैठकर खाने और बांटने की संस्कृति का हिस्सा था। पहाड़ के गांवों में रोटना जन्मोत्सव, नामकरण, विवाह, इगास, हरेला और अन्य शुभ अवसरों पर बनाया जाता रहा है। खेतों में मेहनत के बाद गर्म रोटना और ताजा घी का स्वाद आज भी बुजुर्गों की यादों में बसा हुआ है। पहले जब बाजार से मिठाइयां आसानी से उपलब्ध नहीं थीं, तब रोटना ही मेहमाननवाजी का सबसे सम्मानजनक व्यंजन माना जाता था।
आज गांवों से पलायन, संयुक्त परिवारों का टूटना और फास्ट फूड संस्कृति के बढ़ते प्रभाव ने रोटना जैसे पारंपरिक व्यंजनों को पीछे धकेल दिया है। नई पीढ़ी के कई युवाओं ने इसका नाम तो सुना है, लेकिन स्वाद कभी चखा ही नहीं। बुजुर्गों का कहना है कि पहले बच्चों को रोटना बनाना भी सिखाया जाता था, लेकिन अब यह कला धीरे-धीरे घरों से गायब होती जा रही है। यदि रोटना पारंपरिक तरीके से स्थानीय अनाज, गुड़ और सीमित घी के साथ बनाया जाए, तो यह पैकेज्ड मिठाइयों की तुलना में अधिक पौष्टिक विकल्प हो सकता है। स्थानीय अनाज और गुड़ ऊर्जा के साथ पारंपरिक स्वाद भी देते हैं।
पहाड़ में ग्रामीण पर्यटन और होमस्टे संस्कृति तेजी से विकसित हो रही है। ऐसे में रोटना जैसे पारंपरिक व्यंजन पर्यटकों को स्थानीय संस्कृति से जोड़ने का माध्यम बन सकते हैं, जिस तरह अन्य राज्यों ने अपने पारंपरिक खाद्य पदार्थों को पर्यटन की पहचान बनाया है, उसी तरह रोटना भी उत्तराखंड की पाक विरासत का महत्वपूर्ण प्रतीक बन सकता है। पहाड़ की पहचान केवल हिमालय, मंदिरों और प्राकृतिक सौंदर्य से नहीं बनती, उसकी असली पहचान गांवों की रसोई में बसती है। रोटना उसी विरासत का स्वाद है, जिसे हमने आधुनिकता की दौड़ में पीछे छोड़ दिया। यदि हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को केवल मोबाइल और माल की संस्कृति देंगे, तो वे शायद यह कभी नहीं जान पाएंगे कि पहाड़ की असली मिठास किसी महंगी मिठाई में नहीं, बल्कि मां के हाथों से बने एक साधारण रोटना में बसती थी।
पहाड़ की सांस्कृतिक विरासत को बचाना है तो केवल लोकगीत और लोकनृत्य ही नहीं, रसोई की इस अमूल्य परंपरा को भी अगली पीढ़ी तक पहुंचाना होगा। क्योंकि स्वाद भी इतिहास होता है, और रोटना उस इतिहास का मीठा अध्याय है।
‘2037 तक पुष्कर सिंह धामी’
वायरल वीडियो से गरमाई उत्तराखंड की सियासत
सोशल मीडिया के एक दावे ने छेड़ दी है नई बहस
भाजपा ने 2027 से आगे का भी खींच दिया खाका
राजनीतिक खाका या यह केवल डिजिटल नैरेटिव
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में इन दिनों एक वायरल वीडियो ने नई बहस छेड़ दी है। सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म पर प्रसारित हो रहे एक वीडियो में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के वर्ष 2037 तक मुख्यमंत्री बने रहने का दावा किया जा रहा है। इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन वीडियो ने राजनीतिक गलियारों से लेकर सोशल मीडिया तक चर्चाओं का बाजार गर्म कर दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि उत्तराखंड में अभी 2027 का विधानसभा चुनाव भी नहीं हुआ है, लेकिन सोशल मीडिया पर 2037 की सत्ता का दावा यह संकेत देता है कि चुनावी राजनीति अब केवल जनसभाओं में नहीं, बल्कि डिजिटल नैरेटिव के जरिए भी लड़ी जा रही है।
राजनीति में आत्मविश्वास किसी भी दल की ताकत माना जाता है, लेकिन जब भविष्य के चुनावी नतीजों को पहले से तय मानने जैसा संदेश सामने आने लगे, तो विपक्ष इसे लोकतांत्रिक विनम्रता के बजाय राजनीतिक अतिआत्मविश्वास के रूप में पेश करने की कोशिश करता है। उत्तराखंड का राजनीतिक इतिहास बताता है कि राज्य की जनता ने कई बार सत्ता परिवर्तन का फैसला किया है। ऐसे में 2037 तक सत्ता में बने रहने जैसे दावों पर स्वाभाविक रूप से राजनीतिक बहस तेज होना तय है। विपक्षी दलों के लिए ऐसा वायरल वीडियो सरकार पर निशाना साधने का अवसर बन सकता है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल यह सवाल उठा सकते हैं कि क्या सरकार जनता की मौजूदा समस्याओंकृबेरोजगारी, पलायन, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और स्थानीय मुद्दोंकृसे ज्यादा राजनीतिक संदेश गढ़ने में व्यस्त है।
उत्तराखंड में चुनावी राजनीति अब सोशल मीडिया के दौर में प्रवेश कर चुकी है। छोटे वीडियो, वायरल क्लिप और आकर्षक राजनीतिक संदेश कुछ ही घंटों में लाखों लोगों तक पहुंच रहे हैं। ऐसे में किसी भी वायरल सामग्री का प्रभाव उसके तथ्यात्मक होने से पहले ही राजनीतिक चर्चा को प्रभावित कर सकता है। यही वजह है कि राजनीतिक दलों के लिए डिजिटल संचार जितना अवसर है, उतनी ही चुनौती भी। वायरल सामग्री पर जनता की प्रतिक्रिया और तथ्यात्मक स्थितिकृदोनों पर नजर रखना आवश्यक है।
राजनीति में जनता अंतिम निर्णायक होती है, सोशल मीडिया नहीं। मुख्यमंत्री कौन बनेगा और कितने समय तक रहेगा, इसका फैसला न किसी वायरल वीडियो से होता है और न किसी राजनीतिक नारे से। यह निर्णय चुनाव में मतदाता अपने वोट से करता है। फिर भी यह वायरल वीडियो एक संकेत अवश्य देता है कि उत्तराखंड की राजनीति में 2027 का चुनावी नैरेटिव अब धीरे-धीरे आकार लेने लगा है। आने वाले समय में भाजपा अपनी उपलब्धियों के आधार पर जनादेश मांगेगी, जबकि विपक्ष सरकार के प्रदर्शन को मुद्दा बनाएगा। ऐसे में डिजिटल दावे, राजनीतिक प्रतीक और चुनावी संदेश आने वाले महीनों में और अधिक तीखे होने की संभावना है।
कांग्रेस की ‘वीआईपी परेड’ या संगठन बचाने की कवायद
भाजपा का कांग्रेस पर तंजकृजहां संगठन कमजोर, वहां बढ़ते हैं वीआईपी दौरे
दिल्ली के नेताओं की आवाजाही विकास के लिए नहीं, गुटबाजी संभालने के लिए
कांग्रेस नेताओं ने दिया भाजपा को जवाबकृयह चुनावी तैयारी है, गुटबाजी नहीं
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के साथ राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं। कांग्रेस के राष्ट्रीय नेताओं के लगातार प्रस्तावित दौरों को लेकर भारतीय जनता पार्टी ने तीखा हमला बोला है। भाजपा का आरोप है कि कांग्रेस में इन दिनों चल रही वीआईपी परेड का मकसद जनता के मुद्दों पर संघर्ष नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर बढ़ती गुटबाजी और नेतृत्व विवाद को संभालना है। भाजपा नेताओं का कहना है कि कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व को उत्तराखंड की जनता की समस्याओं से अधिक अपने संगठन की अंदरूनी चुनौतियों की चिंता है। उनके अनुसार, प्रदेश में राष्ट्रीय नेताओं की लगातार मौजूदगी इस बात का संकेत है कि पार्टी अभी भी संगठनात्मक असंतोष और आपसी खींचतान से पूरी तरह उबर नहीं पाई है।
भाजपा का दावा है कि जिस दल का संगठन मजबूत होता है, उसे बार-बार दिल्ली से नेताओं को भेजकर कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने की आवश्यकता नहीं पड़ती। पार्टी का कहना है कि कांग्रेस अभी चुनाव लड़ने से पहले अपने ही नेताओं को एक मंच पर लाने की चुनौती से जूझ रही है। भाजपा यह भी आरोप लगा रही है कि कांग्रेस के भीतर टिकट की संभावित दावेदारी, क्षेत्रीय गुटों की सक्रियता और नेतृत्व को लेकर अलग-अलग खेमों की खींचतान को शांत करने के लिए केंद्रीय नेताओं के दौरे बढ़ाए जा रहे हैं।
दूसरी ओर कांग्रेस इन आरोपों को राजनीतिक प्रचार करार दे रही है। पार्टी का कहना है कि राष्ट्रीय नेताओं के दौरे संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने, कार्यकर्ताओं से संवाद बढ़ाने और विधानसभा चुनाव की तैयारी का हिस्सा हैं। कांग्रेस का दावा है कि भाजपा संगठनात्मक बैठकों को भी गुटबाजी का रंग देकर राजनीतिक लाभ लेना चाहती है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि लोकतांत्रिक दलों में समीक्षा बैठकें, रणनीति निर्माण और कार्यकर्ताओं के साथ संवाद सामान्य प्रक्रिया है और इसे आंतरिक संकट बताना भाजपा की राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी वर्ष नजदीक आते ही लगभग सभी बड़े दल अपने संगठन को सक्रिय करने के लिए वरिष्ठ नेताओं के दौरे बढ़ाते हैं। हालांकि, यदि किसी दल में पहले से मतभेदों की चर्चा हो, तो ऐसे दौरों को राजनीतिक चश्मे से भी देखा जाता है। उत्तराखंड में कांग्रेस के सामने एक ओर भाजपा की मजबूत चुनावी मशीनरी है, तो दूसरी ओर उसे अपने संगठन को बूथ स्तर तक सक्रिय और एकजुट बनाए रखने की चुनौती भी है। भाजपा इसी पहलू को मुद्दा बनाकर कांग्रेस पर निशाना साध रही है। स्पष्ट है कि उत्तराखंड की राजनीति अब चुनावी मोड में प्रवेश कर चुकी है। भाजपा विकास, संगठन और सरकार के कामकाज को अपनी ताकत बताने में जुटी है, जबकि कांग्रेस सत्ता विरोधी मुद्दों को धार देने के साथ संगठन को मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
कांग्रेस के राष्ट्रीय नेताओं के दौरे आने वाले दिनों में और बढ़ सकते हैं। इसके साथ ही भाजपा भी इन्हें राजनीतिक हथियार बनाकर यह संदेश देने की कोशिश करेगी कि कांग्रेस पहले अपने घर को संभाले, फिर सरकार पर सवाल उठाए। फिलहाल उत्तराखंड की राजनीति में मुद्दों के साथ-साथ नैरेटिव की लड़ाई भी तेज हो चुकी हैकृएक पक्ष इसे संगठन की मजबूती बता रहा है, तो दूसरा इसे गुटबाजी की मरम्मत। अंतिम फैसला, हमेशा की तरह, जनता करेगी।
धामी माडल पर दांव: चेहरा नहीं भविष्य बदलेंगे
भाजपा ने बदला उत्तराखंड की राजनीति का नैरेटिव
सबसे लंबे कार्यकाल को बना रही चुनावी हथियार
मुख्य विपक्ष से सवालकृचेहरा कौन और एजेंडा क्या
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में एक समय मुख्यमंत्री बदलना उतना ही सामान्य माना जाता था, जितना मानसून का मौसम बदलना। सत्ता बदलने से पहले मुख्यमंत्री बदल जाते थे और सरकारें अपने ही फैसलों से अस्थिर नजर आती थीं। लेकिन अब भाजपा उसी उत्तराखंड में एक नया राजनीतिक आख्यान गढ़ रही हैकृस्थिर नेतृत्व, मजबूत सरकार और लगातार फैसले। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का लगातार लंबा कार्यकाल अब केवल प्रशासनिक उपलब्धि नहीं, बल्कि भाजपा का सबसे बड़ा चुनावी ब्रांड बनने की ओर बढ़ रहा है। पार्टी यह संदेश देने में जुटी है कि जिस राज्य को कभी राजनीतिक अस्थिरता की पहचान से देखा जाता था, वही आज स्थिर नेतृत्व का उदाहरण पेश कर रहा है।
भाजपा ने धामी पर लगातार भरोसा जताकर यह संकेत दिया है कि उत्तराखंड में नेतृत्व परिवर्तन की पुरानी राजनीति को पीछे छोड़ दिया गया है। अब पार्टी का पूरा चुनावी अभियान एक स्थिर चेहरे और निरंतर नेतृत्व के इर्द-गिर्द बुना जा सकता है। राजनीतिक गलियारों में इसे भाजपा की सोची-समझी रणनीति माना जा रहा है। संदेश सीधा हैकृजब कप्तान तय है, तो टीम भी उसी के नेतृत्व में मैदान में उतरेगी। भाजपा जहां धामी के नेतृत्व को उपलब्धि बताकर जनता के बीच जा रही है, वहीं कांग्रेस अब भी संगठन, नेतृत्व और चुनावी रणनीति को धार देने में जुटी दिखाई देती है। भाजपा इसी बिंदु को राजनीतिक हथियार बनाकर यह सवाल उछाल सकती है कि जब हमारा चेहरा तय है, तो आपका कौन? यही वह राजनीतिक बढ़त है, जिसे भाजपा 2027 तक बनाए रखना चाहेगी।
भाजपा का दावा है कि निवेश, सड़क, कनेक्टिविटी, धार्मिक पर्यटन, समान नागरिक संहिता और प्रशासनिक फैसलों ने उत्तराखंड को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाई है। विपक्ष इन दावों पर सवाल उठाते हुए बेरोजगारी, पलायन, महंगाई, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मुद्दों को सामने रखता रहा है। यानी चुनावी मुकाबला अब केवल विकास के दावों का नहीं, बल्कि किसका नैरेटिव जनता स्वीकार करती हैकृइसका होगा। उत्तराखंड की राजनीति में अब एक नया समीकरण बनता दिख रहा है। भाजपा चुनाव को स्थिर नेतृत्व बनाम अस्थिर विकल्प के रूप में पेश करने की कोशिश कर सकती है, जबकि कांग्रेस इसे लंबा कार्यकाल बनाम जनता के मुद्दे की बहस में बदलना चाहेगी।
उत्तराखंड की राजनीति में कभी मुख्यमंत्री बदलना सबसे बड़ी खबर होती थी। आज भाजपा उसी इतिहास को पलटकर यह बताना चाहती है कि अब चेहरा नहीं बदलेगा। लेकिन लोकतंत्र में केवल लंबा कार्यकाल ही उपलब्धि का प्रमाण नहीं होता। असली परीक्षा यह है कि क्या उस लंबे कार्यकाल में जनता की उम्मीदें भी उतनी ही तेजी से पूरी हुईं। भाजपा धामी के लंबे नेतृत्व को अपना सबसे बड़ा चुनावी पोस्टर बनाएगी। विपक्ष इसे जनता के अधूरे सवालों से चुनौती देगा। 2027 का चुनाव इस बात का फैसला करेगा कि मतदाता स्थिरता पर मुहर लगाते हैं या जवाबदेही को तरजीह देते हैं।
गुरुवार, 9 जुलाई 2026
पहाड़ की अनमोल धरोहर है ‘अरसा’
पहाड़ के हर मांगलिक कार्य का पहला गवाह है अरसा
अरसे में पहाड़ की मिठास में घुली सदियों की संस्कृति
पहाड़ में इसके बिना अधूरे माने जाते हे सभी शुभ कार्य
आधुनिक दौर में अपनी पहचान बचाए है पारंपरिक अरसा
देहरादून। पहाड़ की संस्कृति केवल मंदिरों, बुग्यालों, लोकगीतों और हिमालय की चोटियों में ही नहीं बसती, बल्कि उसकी रसोई में भी सांस लेती है। यहां के पारंपरिक व्यंजन केवल भूख मिटाने का माध्यम नहीं, बल्कि इतिहास, आस्था, रिश्तों और लोकजीवन की जीवित धरोहर हैं। इन्हीं धरोहरों में एक नाम हैकृअरसा। पहाड़ में जब किसी घर में बेटी का विवाह तय होता था, जब किसी नवजात का नामकरण होता, जब देवी-देवताओं का जागर लगता, जब हरेला, इगास, घृत संक्रांति या किसी शुभ पर्व का आगमन होता, तब रसोई में सबसे पहले जिस व्यंजन की तैयारी शुरू होती थी, वह अरसा ही होता था। उसकी खुशबू पूरे गांव को यह संदेश दे देती थी कि इस घर में कोई मंगल अवसर आया है।
आज बाजार में सैकड़ों तरह की मिठाइयां उपलब्ध हैं, लेकिन पहाड़ के बुजुर्ग आज भी कहते हैंकृष्मिठाई बहुत हैं पर अरसे जैसा अपनापन किसी में नहीं। इतिहासकारों का मानना है कि हिमालयी क्षेत्रों में चावल और गुड़ से बने पकवानों की परंपरा बहुत पुरानी रही है। उत्तराखण्ड में कृकृषि आधारित समाज के विकास के साथ धान की खेती बढ़ी और गुड़ का उपयोग भी ग्रामीण जीवन का हिस्सा बना। इन्हीं दो सरल सामग्रियों से तैयार हुआ अरसा धीरे-धीरे धार्मिक अनुष्ठानों और सामाजिक परंपराओं का अभिन्न अंग बन गया। गढ़वाल और कुमाऊँ दोनों क्षेत्रों में इसकी विधि लगभग समान है, हालांकि स्वाद और आकार में स्थानीय विविधताएं मिलती हैं। कहीं इसे थोड़ा मोटा बनाया जाता है, तो कहीं पतला और कुरकुरा। लेकिन हर जगह इसका उद्देश्य एक ही रहाकृशुभ अवसर की मिठास साझा करना।
पौड़ी और टिहरी के कुछ गांवों में एक लोककथा प्रचलित है। कहा जाता है कि एक समय गांव में भीषण अकाल पड़ा। खेतों में केवल थोड़ा-सा धान बचा और घरों में थोड़ा गुड़। गांव की सबसे बुजुर्ग महिला ने दोनों को मिलाकर एक नया पकवान बनाया और उसे सबसे पहले ग्राम देवता को अर्पित किया। मान्यता है कि उसके बाद गांव में अच्छी वर्षा हुई और भरपूर फसल आई। तभी से हर शुभ अवसर पर अरसा बनाकर पहले ईष्टदेव को चढ़ाने की परंपरा शुरू हुई। यह कथा ऐतिहासिक प्रमाण नहीं, बल्कि लोकविश्वास का हिस्सा है। लेकिन यह इस बात को अवश्य दर्शाती है कि अरसा केवल भोजन नहीं, बल्कि आस्था और सामुदायिक जीवन से गहराई से जुड़ा हुआ है।
पहाड़ के पुराने विवाहों में अरसे का विशेष महत्व होता था। बेटी की विदाई के समय जो पारंपरिक पकवान ससुराल भेजे जाते थे, उनमें अरसा सबसे प्रमुख होता। इसे केवल मिठाई नहीं, बल्कि शुभकामना और समृ(ि का प्रतीक माना जाता था। कई गांवों में आज भी यह परंपरा जीवित है कि विवाह के निमंत्रण के साथ या विवाह के बाद रिश्तेदारों को अरसा और अन्य पारंपरिक पकवान भेंट किए जाते हैं। यह केवल स्वाद नहीं, बल्कि रिश्तों की मिठास बांटने का माध्यम है। उत्तराखण्ड के कई लोकगीतों और मांगल गीतों में पारंपरिक पकवानों का उल्लेख मिलता है। गांवों की महिलाएं जब सामूहिक रूप से अरसा बनाती थीं तो लोकधुनों के बीच पूरा माहौल उत्सव में बदल जाता था। अरसे की तैयारी सामूहिक श्रम, आपसी सहयोग और सामाजिक एकता का प्रतीक हुआ करती थी।
आज मशीनों और तैयार मिठाइयों के दौर में वह सामूहिकता कम होती जा रही है, लेकिन बुजुर्गों की स्मृतियों में वह दौर आज भी जीवित है। पहाड़ के ग्रामीण समाज में अरसे को लेकर कई कहावतें प्रचलित रही हैं, जैसेकृअरसा बिना ब्या, जैसे दीप बिना दिया। अर्थात जिस प्रकार दीपक बिना ज्योति के अधूरा है, उसी प्रकार विवाह बिना अरसे के अधूरा माना जाता था। एक और कहावत कही जाती हैकृअरसे की मिठास रिश्तों में बसती है। यह केवल व्यंजन की नहीं, बल्कि पारिवारिक प्रेम और आत्मीयता की भी पहचान है। इन कहावतों का सार यही है कि अरसा सामाजिक जीवन में केवल भोजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक प्रतीक रहा है।
अरसा बनाना केवल नुस्खा नहीं, बल्कि अनुभव का काम है। चावल कितनी देर भिगोना है, कितना सुखाना है, गुड़ की चाशनी किस तापमान तक पकानी है और मिश्रण को कितनी देर विश्राम देना हैकृइन सभी बातों का संतुलन ही अरसे का असली स्वाद तय करता है। पहले गांवों में यह कला मां से बेटी और दादी से पोती तक पहुंचती थी। लिखित नुस्खों की नहीं, बल्कि अनुभव की परंपरा थी। यही कारण है कि हर गांव के अरसे का स्वाद थोड़ा अलग होता था।
आधुनिक पोषण विज्ञान भी मानता है कि यदि अरसा शु( देसी गुड़, स्थानीय चावल और घी से बनाया जाए तो यह कई कृकृत्रिम मिठाइयों की तुलना में बेहतर विकल्प हो सकता है। गुड़ में आयरन, कैल्शियम और अन्य खनिज तत्व होते हैं, जबकि चावल ऊर्जा का प्रमुख स्रोत है। पहाड़ के कठिन जीवन में यह मिठाई केवल स्वाद के लिए नहीं, बल्कि श्रम करने वालों को ऊर्जा देने के लिए भी उपयोगी मानी जाती थी।
आज उत्तराखण्ड के गांव तेजी से खाली हो रहे हैं। पलायन के कारण कई घरों की रसोई वर्षों से बंद हैं। संयुक्त परिवार टूट रहे हैं। बाजार की पैक्ड मिठाइयों ने घर में बनने वाले पारंपरिक व्यंजनों की जगह लेनी शुरू कर दी है। नई पीढ़ी अरसे का स्वाद तो जानती है, लेकिन उसे बनाने की विधि बहुत कम लोगों को आती है। यदि यही स्थिति रही तो आने वाले वर्षों में यह परंपरा केवल पुस्तकों और संग्रहालयों तक सीमित होकर रह सकती है। उत्तराखण्ड में महिला स्वयं सहायता समूह, ग्रामीण उद्यमी और स्थानीय स्टार्टअप यदि अरसे को आधुनिक पैकेजिंग, स्वच्छ उत्पादन और ई-कॉमर्स से जोड़ें तो यह बड़ा आर्थिक अवसर बन सकता है। आज लोग पारंपरिक, प्राकृतिक और स्थानीय उत्पादों की ओर लौट रहे हैं। ऐसे समय में अरसा केवल सांस्कृतिक धरोहर नहीं, बल्कि हिमालयी ब्रांड के रूप में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी जगह बना सकता है।
अरसा केवल चावल, गुड़ और घी का मेल नहीं है। यह पहाड़ की मिट्टी की खुशबू, मां के हाथों का स्नेह, दादी की सीख, गांव की चौपाल, मांगल गीतों की गूंज और पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक स्मृतियों का स्वाद है। जब भी उत्तराखण्ड की किसी रसोई में अरसा तला जाता है, तब केवल एक मिठाई नहीं बनतीकृवहां इतिहास, परंपरा, आत्मीयता और अपनी जड़ों से जुड़े रहने का संकल्प भी फिर से जीवित हो उठता है। यही कारण है कि अरसा आज भी केवल एक व्यंजन नहीं, बल्कि देवभूमि की सांस्कृतिक मिठास का सबसे सजीव प्रतीक है।
सदस्यता लें
संदेश (Atom)