मंगलवार, 23 जून 2026

नगरासू में लौटी शांति

दो दिन तक चले हाई वोल्टेज घटनाक्रम के बाद प्रशासन ने हालात सामान्य बताए निहंग श्र(ालुओं से वार्ता सफल रही, गुरुद्वारे में लंगर और अरदास फिर शुरू जिला प्रशासन ने कहा- कानून-व्यवस्था पूरी तरह नियंत्रण में, भ्रामक खबरों और अफवाहों पर ध्यान न दे जनता देहरादून। रुद्रप्रयाग के नगरासू गुरुद्वारा प्रकरण में तनाव के बाद सोमवार को स्थिति सामान्य होती दिखाई दी। जिला प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि नगरासू में कानून-व्यवस्था पूरी तरह नियंत्रण में है और चारधाम यात्रा पर किसी प्रकार का प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा है। प्रशासन ने लोगों से सोशल मीडिया पर प्रसारित अफवाहों से दूर रहने की अपील की है। नगरासू गुरुद्वारा उस समय सुर्खियों में आया जब चमोली के कर्णप्रयाग में हुई झड़प के बाद कुछ निहंग श्र(ालु अपनी मांगों को लेकर गुरुद्वारे में डटे रहे। प्रारंभिक खबरों में गुरुद्वारे के प्रबंधक को बंधक बनाए जाने और कब्जे जैसी बातें सामने आईं, लेकिन जिला प्रशासन ने इन दावों का खंडन करते हुए कहा कि किसी को बंधक नहीं बनाया गया था और पूरी स्थिति बातचीत के माध्यम से संभाली जा रही थी। रविवार देर रात तक जिला प्रशासन, पुलिस और वरिष्ठ अधिकारियों ने लगातार निहंगों से वार्ता की। प्रशासन के अनुसार बातचीत सकारात्मक रही और किसी प्रकार की बल प्रयोग की नौबत नहीं आई। सोमवार को गुरुद्वारे में सामान्य रूप से अरदास और लंगर सेवा भी संचालित होती रही, जिससे श्र(ालुओं और स्थानीय लोगों ने राहत की सांस ली। इस पूरे घटनाक्रम की जड़ चमोली जिले के कर्णप्रयाग में पार्किंग विवाद के बाद हुई हिंसक झड़प को माना जा रहा है। उस मामले में चार निहंग श्र(ालुओं की गिरफ्तारी के बाद विरोध का स्वर नगरासू तक पहुंच गया। पुलिस ने स्पष्ट किया है कि गिरफ्तारी कानून के अनुसार की गई है और मामले की जांच जारी है। प्रदेश सरकार ने भी पूरे मामले पर नजर बनाए रखी है। गृह विभाग ने अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि चारधाम यात्रा की सुरक्षा सर्वाेच्च प्राथमिकता रहे और किसी भी अफवाह को फैलने से रोका जाए। प्रशासन का कहना है कि यात्रा मार्ग पूरी तरह सुरक्षित है और श्र(ालु बिना किसी भय के अपनी यात्रा जारी रख सकते हैं। हालांकि राजनीतिक स्तर पर इस घटनाक्रम ने सरकार को विपक्ष के निशाने पर ला दिया है। विपक्ष का कहना है कि यदि प्रारंभिक स्तर पर संवाद स्थापित किया जाता तो मामला इतना नहीं बढ़ता। दूसरी ओर सरकार का दावा है कि संवेदनशील परिस्थिति को बिना किसी बड़े टकराव के नियंत्रित करना प्रशासन की बड़ी सफलता है। नगरासू प्रकरण ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि चारधाम और हेमकुंड साहिब यात्रा के दौरान सुरक्षा प्रबंधन, भीड़ नियंत्रण और विभिन्न राज्यों से आने वाले श्र(ालुओं के बीच बेहतर समन्वय कैसे सुनिश्चित किया जाए। धार्मिक यात्राओं के दौरान छोटी घटनाएं भी यदि समय पर नहीं संभाली जाएं तो वे बड़े विवाद का रूप ले सकती हैं। फिलहाल नगरासू में शांति लौट आई है, लेकिन प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती अब विश्वास बहाल करने की है। निष्पक्ष जांच, पारदर्शी कार्रवाई और अफवाहों पर प्रभावी नियंत्रण ही इस पूरे प्रकरण का स्थायी समाधान साबित हो सकता है। बाक्स अधिकारियों ने की शांति की अपील शैलेश बगोली गृह सचिव ने कहा कि यह मामला दो पक्षों के आपसी विवाद से जुड़ा है। इसे सांप्रदायिक रंग देकर माहौल खराब करने वालों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने आईजी गढ़वाल को निष्पक्ष जांच के निर्देश दिए गए हैं।विशाल मिश्रा जिलाधिकारी, रुद्रप्रयाग ने बताया कि गुरुद्वारे में अरदास और लंगर सेवाएं सामान्य रूप से जारी हैं। किसी प्रकार के स्थाई कब्जे या हिंसा की खबरें भ्रामक हैं। सोशल मीडिया की अफवाहों पर ध्यान न दें। राजीव स्वरूप आईजी, गढ़वाल रेंज ने कहा कि मामले की विस्तृत जांच की जा रही है। सोशल मीडिया पर अफवाह और भ्रामक पोस्ट फैलाने वालों को चिन्हित करने के लिए विशेष जांच के निर्देश दिए गए हैं। यह था पूरा घटनाक्रम बता दें कि घटनाक्रम की शुरुआत शनिवार 20 जून को हुई। चमोली जिले के कर्णप्रयाग बाजार में बीते 16 जून को वाहन खड़ा करने को लेकर कुछ सिख तीर्थयात्रियों निहंगों का स्थानीय लोगों से विवाद हो गया था, जिसमें तलवारबाजी में चार स्थानीय लोग घायल हुए थे। इस मामले में पुलिस ने पंजाब के मोहाली निवासी चार निहंगों को गिरफ्तार किया था। शनिवार को हेमकुंड साहिब यात्रा से लौट रहे सात से आठ निहंगों का एक अन्य दल नगरासू गुरुद्वारे पहुंचा। यहां लंगर और ठहरने के दौरान गुरुद्वारा प्रबंधन समिति और इन निहंगों के बीच बहस हो गई। इसके बाद, गिरफ्तार साथियों की तत्काल रिहाई की मांग को लेकर ये निहंग शस्त्रों तलवार, भाला और कृपाण के साथ गुरुद्वारे की तीसरी मंजिल पर चढ़ गए और मोर्चाबंदी कर दी। यह था आरोप नगरासू गुरुद्वारे के मुख्य ग्रंथी बाबा बेहंत सिंह ने आरोप लगाया कि शरण और भोजन दिए जाने के बावजूद उक्त दल ने सेवादारों के साथ अभद्रता की, सीसीटीवी कैमरे तोड़े और पुलिस व स्थानीय लोगों पर पथराव की कोशिश की। निहंगों ने गुरुद्वारे के सेवादार नवतेज सिंह समेत दो लोगों को अपने कब्जे में ले लिया था, जिनमें से एक को शनिवार रात और दूसरे को रविवार शाम छोड़ दिया गया। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए रुद्रप्रयाग के जिलाधिकारी विशाल मिश्रा और पुलिस अधीक्षक नीहारिका तोमर भारी पुलिस बल, एटीएस और आईटीबीपी के जवानों के साथ मौके पर डटे रहे। एसपी नीहारिका तोमर ने स्वयं लगभग एक घंटे तक फोन पर निहंगों से वार्ता कर उन्हें कानून हाथ में न लेने के लिए समझाया। चमोली के कर्णप्रयाग और गैरसैंण क्षेत्रों में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए 27 जून तक निषेधाज्ञा धारा 144/संशोधित नागरिक संहिता प्रावधान लागू कर दी गई है।

अल्मोड़ा से विरोध की ‘गूंज’

अल्मोड़ा में मुख्यमंत्री धामी को काले झंडे, गो बैक के नारों से गरमाई सूबे की सियासत युवा कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने मुख्यमंत्री के दौरे के दौरान किया विरोध प्रदर्शन, कई हिरासत में कांग्रेस ने इसे लोकतांत्रिक अधिकार बताया, भाजपा ने कहाकृविकास विरोधी राजनीति देहरादून। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के अल्मोड़ा दौरे के दौरान उस समय राजनीतिक माहौल गरमा गया, जब युवा कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने उन्हें काले झंडे दिखाते हुए गो बैक के नारे लगाए। मुख्यमंत्री के कार्यक्रम स्थल की ओर बढ़ रहे प्रदर्शनकारियों को पुलिस ने बैरिकेडिंग पर ही रोक दिया। इस दौरान पुलिस और कार्यकर्ताओं के बीच तीखी नोकझोंक हुई और कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेकर बाद में छोड़ दिया गया। मुख्यमंत्री धामी अल्मोड़ा में विभिन्न विकास योजनाओं के लोकार्पण और शिलान्यास के साथ-साथ जनसभा को संबोधित करने पहुंचे थे। कार्यक्रम के दौरान सुरक्षा व्यवस्था चाक-चौबंद रही, लेकिन युवा कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए बेरोजगारी, पेपर लीक, बढ़ती महंगाई और युवाओं से जुड़े मुद्दों को लेकर विरोध दर्ज कराया। युवा कांग्रेस नेताओं का कहना था कि प्रदेश का युवा रोजगार, पारदर्शी भर्ती और बेहतर शिक्षा व्यवस्था की मांग कर रहा है, लेकिन सरकार इन मुद्दों पर गंभीर नहीं दिख रही। प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि बार-बार भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं और युवाओं के भविष्य से जुड़े मामलों पर सरकार जवाबदेही से बच रही है। उनका कहना था कि मुख्यमंत्री के समक्ष लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने का प्रयास किया गया। दूसरी ओर भाजपा ने कांग्रेस के विरोध प्रदर्शन को राजनीतिक नौटंकी करार दिया। भाजपा नेताओं का कहना है कि मुख्यमंत्री धामी प्रदेश में रिकॉर्ड विकास कार्यों को गति दे रहे हैं और कांग्रेस जनता के बीच अपनी घटती राजनीतिक जमीन को बचाने के लिए केवल विरोध की राजनीति कर रही है। भाजपा का दावा है कि प्रदेश में निवेश, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और पर्यटन के क्षेत्र में लगातार काम हो रहा है, जिससे कांग्रेस असहज है। पुलिस प्रशासन ने पूरे घटनाक्रम के दौरान स्थिति को नियंत्रण में रखा। अधिकारियों के अनुसार प्रदर्शन की सूचना पहले से थी, इसलिए सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम किए गए थे। किसी भी अप्रिय स्थिति से बचने के लिए प्रदर्शनकारियों को कार्यक्रम स्थल से पहले ही रोक दिया गया। प्रशासन ने कहा कि कानून-व्यवस्था पूरी तरह सामान्य रही और मुख्यमंत्री के सभी निर्धारित कार्यक्रम शांतिपूर्वक संपन्न हुए। अल्मोड़ा की घटना ऐसे समय हुई है जब उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की तैयारियां धीरे-धीरे तेज होने लगी हैं। विपक्ष लगातार बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं, महंगाई और युवाओं के मुद्दों को लेकर सरकार को घेरने की कोशिश कर रहा है। वहीं भाजपा विकास कार्यों और मजबूत नेतृत्व को चुनावी मुद्दा बनाने में जुटी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव से पहले मुख्यमंत्री के हर दौरे पर विपक्ष इस तरह के प्रतीकात्मक विरोध के जरिए सरकार को घेरने का प्रयास करेगा। दूसरी ओर भाजपा ऐसे प्रदर्शनों को विकास विरोधी बताकर जनता के बीच अपना पक्ष मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही है। अल्मोड़ा के स्थानीय लोगों का कहना है कि लोकतंत्र में विरोध का अधिकार सभी को है, लेकिन विरोध शांतिपूर्ण होना चाहिए। आम लोगों की अपेक्षा है कि राजनीतिक दल आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर रोजगार, पलायन, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे जमीनी मुद्दों पर ठोस समाधान प्रस्तुत करें।

चुनावी बिसात के बीच नया ‘सियासी ट्रेंड’

बीजेपी नेताओं की घेराबंदी से गरमाई सियासत उत्तराखंड में विपक्ष ने बदली चुनाव की रणनीति चुनाव अभी दूर, लेकिन राजनीतिक टकराव तेज सीएम से लेकर प्रदेश अध्यक्ष व मंत्रियों का विरोध जनाक्रोश की अभिव्यक्ति या विपक्ष की है रणनीति देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 भले अभी कुछ समय दूर हों, लेकिन राजनीतिक दलों ने चुनावी बिसात बिछानी शुरू कर दी है। प्रदेश के राजनीतिक माहौल में पिछले कुछ सप्ताह के दौरान एक नया ट्रेंड तेजी से उभरकर सामने आया है। मुख्यमंत्री, मंत्रियों और भाजपा के वरिष्ठ नेताओं के सार्वजनिक कार्यक्रमों में विरोध, घेराव, काले झंडे और गो बैक के नारे अब लगातार देखने को मिल रहे हैं। अल्मोड़ा में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को युवा कांग्रेस द्वारा काले झंडे दिखाए जाने का मामला हो या अन्य जिलों में भाजपा नेताओं के कार्यक्रमों के दौरान विरोध प्रदर्शनकृइन घटनाओं ने यह संकेत दिया है कि विपक्ष अब केवल प्रेस बयान और धरना-प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहना चाहता। उसकी रणनीति सीधे उन मंचों तक पहुंचने की है, जहां सत्ता जनता के बीच मौजूद है। राजनीतिक गलियारों में अब यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या यह केवल अलग-अलग घटनाएं हैं या फिर इसके पीछे कोई संगठित चुनावी रणनीति काम कर रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस और उससे जुड़े संगठन अब भाजपा के प्रत्येक बड़े कार्यक्रम को राजनीतिक अवसर के रूप में देख रहे हैं। उद्देश्य केवल विरोध दर्ज कराना नहीं, बल्कि सरकार को लगातार रक्षात्मक स्थिति में रखना भी है। इस रणनीति के तहत मुख्यमंत्री, मंत्रियों और भाजपा के प्रदेश पदाधिकारियों के दौरों की पहले से जानकारी जुटाई जाती है। इसके बाद स्थानीय कार्यकर्ताओं को सक्रिय कर विरोध प्रदर्शन, काले झंडे, ज्ञापन और नारेबाजी के माध्यम से राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की जाती है। इन प्रदर्शनों के वीडियो और तस्वीरें कुछ ही मिनटों में सोशल मीडिया पर प्रसारित कर दी जाती हैं, जिससे राजनीतिक चर्चा का दायरा और बढ़ जाता है। विपक्ष बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं, महंगाई, पलायन, कानून-व्यवस्था, किसानों की समस्याओं और स्थानीय मुद्दों को प्रमुखता से उठा रहा है। इन मुद्दों को प्रत्येक विरोध प्रदर्शन का आधार बनाया जा रहा है ताकि यह संदेश दिया जा सके कि सरकार जनभावनाओं से दूर होती जा रही है। हालांकि राजनीतिक विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि विरोध के पीछे केवल मुद्दे ही नहीं, बल्कि चुनाव से पहले कार्यकर्ताओं को सक्रिय रखने और संगठन को ऊर्जा देने की रणनीति भी काम कर रही है। भाजपा इन विरोध प्रदर्शनों को विपक्ष की राजनीतिक हताशा करार दे रही है। पार्टी नेताओं का कहना है कि जब सरकार विकास कार्यों, निवेश, चारधाम यात्रा, समान नागरिक संहिता, नकल विरोधी कानून और भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई जैसे मुद्दों पर आगे बढ़ रही है, तब विपक्ष के पास केवल विरोध की राजनीति बची है। लेकिन राजनीतिक दृष्टि से देखें तो भाजपा के सामने भी चुनौती कम नहीं है। चुनावी वर्ष नजदीक आने के साथ हर सार्वजनिक कार्यक्रम में सुरक्षा, राजनीतिक संदेश और जनसंपर्ककृतीनों का संतुलन बनाए रखना आसान नहीं होगा। किसी भी छोटी घटना का राजनीतिक असर बड़ा हो सकता है। वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तराखंड में यह चुनावी संघर्ष का शुरुआती चरण है। विपक्ष सड़क पर संघर्ष का माहौल बनाकर सरकार के खिलाफ जनमत तैयार करना चाहता है, जबकि भाजपा विकास और स्थिर नेतृत्व के मुद्दे पर जनता के बीच जाने की तैयारी में है। यानी दोनों दलों ने अपनी-अपनी चुनावी रणनीति तय कर ली है। एक ओर सड़क पर संघर्ष का संदेश है, तो दूसरी ओर विकास और उपलब्धियों का दावा। लगातार बढ़ते विरोध प्रदर्शनों ने एक और सवाल खड़ा किया है कि क्या राजनीतिक विरोध लोकतांत्रिक मर्यादाओं के भीतर रह पाएगा? विशेषज्ञों का मानना है कि शांतिपूर्ण विरोध लोकतंत्र की ताकत है, लेकिन यदि विरोध टकराव या हिंसा में बदलता है तो इसका नुकसान राजनीतिक दलों से ज्यादा लोकतांत्रिक व्यवस्था को होगा। प्रशासन के सामने भी चुनौती है कि वह राजनीतिक विरोध और कानून-व्यवस्था के बीच संतुलन बनाए रखे। चुनावी माहौल में यह जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। भाजपा का कहना है कि लोकतंत्र में विरोध का स्वागत है, लेकिन अराजकता स्वीकार नहीं की जाएगी। पार्टी नेताओं का दावा है कि जनता विकास कार्यों और सरकार के प्रदर्शन के आधार पर निर्णय करेगी। सरकार का यह भी कहना है कि विपक्ष जनता के वास्तविक मुद्दों के बजाय राजनीतिक सुर्खियां बटोरने की कोशिश कर रहा है। कांग्रेस का कहना है कि सरकार जनता के सवालों से बच रही है। विपक्ष के अनुसार यदि युवाओं, कर्मचारियों, किसानों और आम लोगों की समस्याओं का समाधान समय पर किया जाता, तो सड़क पर उतरने की नौबत नहीं आती। कांग्रेस इसे लोकतांत्रिक अधिकार और जनभावनाओं की अभिव्यक्ति बता रही है। उत्तराखंड की राजनीति में अब चुनावी शतरंज की बिसात सज चुकी है। भाजपा अपनी उपलब्धियों के सहारे जनादेश दोहराने की तैयारी में है, जबकि विपक्ष जनाक्रोश को राजनीतिक पूंजी में बदलने की कोशिश कर रहा है। भाजपा नेताओं की लगातार घेराबंदी की घटनाएं इस बात का संकेत हैं कि आने वाले महीनों में प्रदेश की राजनीति और अधिक आक्रामक होगी। हालांकि यह निष्कर्ष निकालना अभी जल्दबाजी होगी कि ये सभी विरोध एक केंद्रीकृत रणनीति का हिस्सा हैं। लेकिन इतना स्पष्ट है कि विपक्ष सार्वजनिक कार्यक्रमों को सरकार पर राजनीतिक दबाव बनाने के मंच के रूप में अधिक सक्रियता से इस्तेमाल कर रहा है। विधानसभा चुनाव नजदीक आते-आते यह सियासी टकराव और तेज होने की पूरी संभावना है।

‘भडूडू’ था पहाड़ की रसोई का राजा

इसमें पकती थी दाल और बसती थी पहाड़ की संस्कृति कांसे का भडूडू केवल नहीं था दाल पकाने का एक बर्तन पारिवारिक संस्कृति और लोक विरासत का जीवंत प्रतीक गैस और प्रेशर कुकर के दौर में यह अनमोल धरोहर लुप्त देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ों की पहचान केवल हिमालय, देवस्थल, नदियां और जंगल ही नहीं हैं, बल्कि यहां की पारंपरिक रसोई भी उतनी ही समृ( रही है। पहाड़ की रसोई में इस्तेमाल होने वाले बर्तनों का अपना अलग महत्व था। सिलबट्टा, ओखली, गंज्याली, तकली और तांबे-पीतल के बर्तनों की तरह ही भडूडू भी हर घर की शान हुआ करता था। आज की पीढ़ी शायद इस नाम से परिचित भी न हो, लेकिन कुछ दशक पहले तक पहाड़ के लगभग हर घर में कांसे का बना भडूडू जरूर होता था। यह विशेष रूप से दाल पकाने के लिए इस्तेमाल किया जाता था। माना जाता था कि भडूडू में बनी गहत, भट्ट, मसूर, उड़द या राजमा की दाल का स्वाद किसी अन्य बर्तन में नहीं आ सकता। भडूडू केवल भोजन बनाने का साधन नहीं था, बल्कि वह पहाड़ की रसोई का ऐसा साथी था, जिसने पीढ़ियों तक हजारों परिवारों के भोजन को स्वाद और पौष्टिकता से भर दिया। भडूडू कांसे का मोटा और मजबूत बर्तन होता था। इसका निचला हिस्सा गोल और गहरा होता था, जिससे आग की गर्मी पूरे बर्तन में समान रूप से फैलती थी। ऊपर का मुंह अपेक्षाकृत छोटा होता था, जिससे भाप लंबे समय तक भीतर बनी रहती थी और दाल धीरे-धीरे गलती थी। लकड़ी के चूल्हे पर भडूडू को रखा जाता था। नीचे चीड़, बांज, बुरांश या अन्य सूखी लकड़ियां जलती रहती थीं और ऊपर दाल घंटों तक धीमी आंच पर पकती रहती थी। सुबह-सुबह महिलाएं गहत, भट्ट या मसूर की दाल को धोकर भडूडू में डालती थीं। उसमें पानी, हल्दी और थोड़ा नमक मिलाकर चूल्हे पर चढ़ा दिया जाता था। इसके बाद दाल को जल्दी पकाने की कोई जल्दबाजी नहीं होती थी। दाल धीरे-धीरे उबलती रहती थी। बीच-बीच में उसे लकड़ी के कलछुल से चलाया जाता था। जब दाल पूरी तरह गल जाती, तब उसमें जाखिया, जीरा, लहसुन, सूखी लाल मिर्च और देसी घी का तड़का लगाया जाता था। घर के बुजुर्ग कहते थे कि दाल जितनी धीरे पकेगी, स्वाद उतना ही गहरा होगा। पहाड़ के लोग मानते थे कि भडूडू में बनी दाल का स्वाद अलग ही होता था। इसके पीछे कांसे का बर्तन गर्मी को संतुलित रखता था। लकड़ी की धीमी आंच दाल को समान रूप से पकाती थी। दाल जल्दी नहीं गलती थी, बल्कि धीरे-धीरे अपना प्राकृतिक स्वाद छोड़ती थी। धुएं की हल्की खुशबू भोजन में अलग सुगंध भर देती थी। यही कारण था कि आज भी बुजुर्ग कहते हैं कि गैस और प्रेशर कुकर में बनी दाल पेट भर सकती है, लेकिन भडूडू वाली दाल मन भर देती थी। आयुर्वेद में कांसे के बर्तनों का विशेष महत्व बताया गया है। ग्रामीण समाज का मानना था कि कांसे के बर्तन में पका भोजन अधिक सुपाच्य होता है। पहाड़ के लोग इसे किसी वैज्ञानिक सि(ांत के रूप में नहीं, बल्कि अपने अनुभव के आधार पर मानते थे। गहत, भट्ट और उड़द जैसी पौष्टिक दालें जब भडूडू में पकती थीं तो वह लंबे समय तक गर्म भी रहती थीं और उनका स्वाद भी बना रहता था। पहाड़ के पुराने घरों में रसोई केवल खाना बनाने की जगह नहीं होती थी। जब भडूडू चूल्हे पर चढ़ा होता था, तब पूरा परिवार उसके आसपास बैठता था। बच्चे गृहकार्य करते थे। बुजुर्ग लोककथाएं सुनाते थे। महिलाएं ऊन कातती थीं। पुरुष खेत-खलिहान की बातें करते थे। यानी भडूडू के साथ केवल दाल नहीं पकती थी, बल्कि परिवार भी साथ बैठता था। पहाड़ में बेटी की विदाई के समय उसे तांबे और कांसे के बर्तनों के साथ भडूडू भी दिया जाता था। इसे गृहस्थी की शुरुआत का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता था। कई परिवार आज भी अपने पूर्वजों का भडूडू संभालकर रखते हैं। यह केवल बर्तन नहीं, बल्कि परिवार की विरासत माना जाता है। समय बदला, लकड़ी के चूल्हों की जगह गैस ने ले ली। प्रेशर कुकर ने घंटों पकने वाली दाल को कुछ मिनटों में तैयार कर दिया। स्टील और नॉन-स्टिक बर्तनों का चलन बढ़ गया। धीरे-धीरे भडूडू रसोई से गायब होने लगा। आज गांवों में भी बहुत कम घर ऐसे हैं, जहां नियमित रूप से भडूडू का इस्तेमाल होता हो। लोक संस्कृति के जानकार मानते हैं कि यदि पारंपरिक रसोई से जुड़े बर्तनों को नहीं बचाया गया, तो आने वाली पीढ़ियां केवल किताबों और तस्वीरों में ही इन्हें देख पाएंगी। ग्रामीण पर्यटन, होम-स्टे और पारंपरिक पहाड़ी भोजन के माध्यम से भडूडू को फिर से पहचान दिलाई जा सकती है। यदि पर्यटकों को भडूडू में बनी गहत या भट्ट की दाल परोसी जाए तो यह उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान को नई ऊंचाई दे सकता है। पहाड़ की संस्कृति केवल मंदिरों, मेलों और लोकगीतों में नहीं बसती, बल्कि उसकी रसोई में भी जीवित रहती है। भडूडू उसी संस्कृति का एक ऐसा अध्याय है, जो धीरे-धीरे बंद होता जा रहा है। यदि हम अपनी अगली पीढ़ी को पहाड़ की असली पहचान से जोड़ना चाहते हैं, तो हमें केवल व्यंजन ही नहीं, बल्कि उन्हें बनाने वाले पारंपरिक बर्तनों और उनसे जुड़ी जीवनशैली को भी सहेजना होगा। क्योंकि भडूडू में पकने वाली दाल केवल भोजन नहीं थी, वह पहाड़ की आत्मा का स्वाद थी।

रविवार, 21 जून 2026

भीमलः उत्तराखंड के पहाड़ों का ‘कल्पवृक्ष’

भीमल के पेड़ में दवा भी, सहारा भी और आजीविका भी पहाड़ की जीवनशैली का अभिन्न हिस्सा रहा भीमल का पेड़ औषधीय गुणों से लेकर मजबूत रेशे तक हर रूप में अनमोल देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ों में प्रकृति ने ऐसी अनेक धरोहरें दी हैं, जिन्होंने सदियों से ग्रामीण जीवन को आत्मनिर्भर बनाया। इन्हीं में से एक है भीमल का पेड़। पहाड़ के बुजुर्ग इसे केवल एक वृक्ष नहीं, बल्कि जीवन का साथी मानते हैं। इसकी छाल से निकलने वाला मजबूत रेशा हो, पत्तियों से मिलने वाला पौष्टिक चारा, लकड़ी का घरेलू उपयोग या फिर इसके औषधीय गुणकृभीमल का हर हिस्सा किसी न किसी रूप में मानव और पशुओं के लिए उपयोगी रहा है। एक समय था जब पहाड़ के लगभग हर गांव के आसपास भीमल के पेड़ सहज ही दिखाई देते थे। गांव की महिलाएं इसकी छाल से रेशा निकालकर मजबूत रस्सियां बनाती थीं। इन रस्सियों का उपयोग खेतों में, पशुपालन में, घास और लकड़ी बांधने, पुल बनाने और घरेलू कार्यों में वर्षों तक किया जाता था। आज भले ही नायलॉन और प्लास्टिक ने उनकी जगह ले ली हो, लेकिन भीमल की रस्सी की मजबूती और टिकाऊपन का मुकाबला आज भी मुश्किल माना जाता है। पहाड़ की अर्थव्यवस्था लंबे समय तक पशुपालन पर आधारित रही है। भीमल की मुलायम और पौष्टिक पत्तियां गाय, बैल, बकरी और भैंस के लिए उत्कृष्ट चारे के रूप में जानी जाती हैं। विशेषकर सर्दियों में, जब हरा चारा कम उपलब्ध होता है, तब भीमल की पत्तियां पशुओं के पोषण का बड़ा आधार बनती हैं। यही कारण है कि ग्रामीण परिवार आज भी अपने खेतों की मेड़ों और घरों के आसपास भीमल लगाना पसंद करते हैं। आयुर्वेद और लोक चिकित्सा में भीमल का विशेष महत्व है। ग्रामीण परंपराओं में इसकी छाल और पत्तियों का उपयोग घाव भरने, सूजन कम करने तथा त्वचा संबंधी समस्याओं में किया जाता रहा है। माना जाता है कि इसकी छाल में ऐसे प्राकृतिक तत्व पाए जाते हैं जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सहायक हो सकते हैं। हालांकि किसी भी औषधीय उपयोग से पहले विशेषज्ञ की सलाह आवश्यक मानी जाती है। भीमल केवल इंसान के लिए ही नहीं, बल्कि पर्यावरण के लिए भी वरदान है। इसकी जड़ें मिट्टी को मजबूती से पकड़कर रखती हैं, जिससे पहाड़ी ढलानों पर कटाव कम होता है। वर्षा के पानी को भूमि में समाहित करने में भी यह वृक्ष मददगार माना जाता है। यही कारण है कि जल संरक्षण और भूस्खलन रोकने के प्रयासों में भी भीमल जैसे स्थानीय वृक्षों को महत्वपूर्ण माना जाता है। पहले गांवों में महिलाएं भीमल के रेशे से रस्सी, डोरी, जाल और कई हस्तशिल्प उत्पाद तैयार करती थीं। इन उत्पादों की स्थानीय बाजारों में अच्छी मांग रहती थी। यदि आधुनिक डिजाइन और विपणन से जोड़ा जाए, तो भीमल आधारित हस्तशिल्प आज भी ग्रामीण महिलाओं के लिए स्वरोजगार का सशक्त माध्यम बन सकता है। बदलती जीवनशैली, पलायन और प्लास्टिक उत्पादों के बढ़ते उपयोग के कारण भीमल के पेड़ों की संख्या और उनसे जुड़े पारंपरिक ज्ञान में लगातार कमी आ रही है। नई पीढ़ी भीमल की उपयोगिता से धीरे-धीरे अनजान होती जा रही है। वन विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्थानीय प्रजातियों के संरक्षण पर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया, तो पहाड़ अपनी एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक और सांस्कृतिक धरोहर खो सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि भीमल के पौधों का बड़े पैमाने पर रोपण किया जाए और इसके रेशे व अन्य उत्पादों का वैज्ञानिक ढंग से मूल्य संवर्धन किया जाए, तो यह पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी नई मजबूती दे सकता है। जैविक और प्राकृतिक उत्पादों की बढ़ती मांग के दौर में भीमल से बने उत्पाद देश-विदेश के बाजारों में अपनी अलग पहचान बना सकते हैं। पहाड़ के बुजुर्ग कहते हैंकृजिस गांव में भीमल है, वहां पशुधन भी स्वस्थ रहता है और प्रकृति भी खुशहाल रहती है। आधुनिकता की दौड़ में यदि इस वृक्ष और इससे जुड़े पारंपरिक ज्ञान को सहेजा जाए, तो भीमल आने वाली पीढ़ियों के लिए केवल एक पेड़ नहीं, बल्कि उत्तराखंड की समृ( लोक संस्कृति, आत्मनिर्भरता और प्रकृति से जुड़ाव का जीवंत प्रतीक बना रहेगा।

धामी का ‘जीरो टालरेंस’ एक्शन या चुनावी साल का ‘मास्टरस्ट्रोक’

भूमि प्रकरण में धामी सरकार की कार्रवाई के बाद भ्रष्टाचार पर सियासत चुनावी साल में प्रशासनिक सख्ती बन गई राजनीतिक विमर्श का केंद्र धामी सरकार का अफसरशाही को कड़ा संदेश, विपक्ष उठा रहा सवाल देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 से पहले हरिद्वार नगर निगम के भूमि प्रकरण में धामी सरकार की सख्त कार्रवाई ने राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है। जांच में जिन अधिकारियों की भूमिका सामने आने के बाद सरकार ने कार्रवाई की, उसे मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की जीरो टालरेंस नीति का बड़ा उदाहरण बताया जा रहा है। वहीं विपक्ष इसे स्वागत योग्य कदम तो मान रहा है, लेकिन यह सवाल भी उठा रहा है कि क्या यह सख्ती हर मामले में समान रूप से लागू होगी या फिर चुनावी साल में सरकार अपनी छवि चमकाने की कोशिश कर रही है। यह प्रकरण अब केवल हरिद्वार नगर निगम तक सीमित नहीं रह गया है। यह पूरे प्रदेश की नौकरशाही, राजनीतिक व्यवस्था और चुनावी माहौल का बड़ा विषय बन गया है। सत्ता, विपक्ष और आम जनताकृतीनों की नजर इस बात पर है कि सरकार इस कार्रवाई को आखिर किस मुकाम तक ले जाती है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी लगातार सार्वजनिक मंचों से कहते रहे हैं कि उनकी सरकार भ्रष्टाचार के मामलों में किसी भी स्तर पर समझौता नहीं करेगी। सरकार का दावा है कि पिछले कुछ वर्षों में नकल माफिया के खिलाफ कठोर कानून, भर्ती घोटालों में कार्रवाई, अवैध कब्जों पर अभियान और अब हरिद्वार नगर निगम प्रकरण में त्वरित निर्णय इस बात के प्रमाण हैं कि शासन की प्राथमिकता पारदर्शिता और जवाबदेही है। सरकार के अनुसार यदि जांच में किसी अधिकारी की भूमिका सामने आती है तो उसके पद या प्रभाव की परवाह किए बिना कार्रवाई होगी। भाजपा का मानना है कि इससे जनता में यह भरोसा मजबूत होगा कि कानून सबके लिए समान है और प्रशासनिक तंत्र में जवाबदेही तय की जा रही है। भाजपा नेताओं का तर्क है कि पहले भ्रष्टाचार के मामलों में वर्षों तक फाइलें दबाकर रखी जाती थीं, जबकि वर्तमान सरकार ने कार्रवाई की गति तेज की है। पार्टी इसे निर्णायक नेतृत्व की पहचान के रूप में भी पेश कर रही है। कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और उत्तराखंड क्रांति दल इस कार्रवाई का खुलकर विरोध नहीं कर रहे, लेकिन सरकार की मंशा पर सवाल जरूर उठा रहे हैं। कांग्रेस का कहना है कि यदि सरकार वास्तव में जीरो टालरेंस की नीति पर चल रही है तो प्रदेश में सामने आए हर भ्रष्टाचार के मामले में समान स्तर की कार्रवाई होनी चाहिए। विपक्ष का आरोप है कि कई मामलों में कार्रवाई की गति धीमी रही, जबकि कुछ मामलों में तत्काल सख्ती दिखाई गई। आम आदमी पार्टी का कहना है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई का स्वागत है, लेकिन इसे केवल चुनावी संदेश तक सीमित नहीं रहना चाहिए। दोषियों को न्यायालय में सजा दिलाना ही वास्तविक सफलता होगी। यूकेडी का कहना है कि यदि सरकार ईमानदारी से पूरे प्रशासनिक ढांचे की जवाबदेही तय करती है तो जनता उसका समर्थन करेगी, लेकिन कार्रवाई केवल चुनिंदा मामलों तक सीमित रही तो जनता इसे राजनीतिक प्रबंधन के रूप में देखेगी। प्रशासनिक विशेषज्ञों का मानना है कि हरिद्वार नगर निगम प्रकरण ने पूरे सरकारी तंत्र को एक स्पष्ट संदेश दिया है कि अब फाइलों में लिए गए निर्णयों की जवाबदेही तय हो सकती है। लंबे समय से यह धारणा रही है कि कुछ अधिकारी नियमों की अलग-अलग व्याख्या कर विवादास्पद फैसले लेते हैं। इस कार्रवाई ने संकेत दिया है कि सरकारी पद अब केवल अधिकार नहीं बल्कि उत्तरदायित्व भी है। यदि आने वाले समय में अन्य विभागों में भी इसी तरह निष्पक्ष कार्रवाई होती है तो इससे प्रशासनिक अनुशासन मजबूत हो सकता है। जनता की राय इस मुद्दे पर दो हिस्सों में बंटी दिखाई देती है। एक वर्ग का मानना है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ जितनी भी सख्ती हो, उसका स्वागत किया जाना चाहिए। लोगों का कहना है कि यदि अधिकारी और कर्मचारी जवाबदेह होंगे तो सरकारी व्यवस्था में सुधार आएगा और जनता का विश्वास बढ़ेगा। दूसरा वर्ग यह मानता है कि केवल निलंबन या विभागीय कार्रवाई पर्याप्त नहीं है। यदि जांच समयब( पूरी नहीं हुई, दोषियों को कानूनी सजा नहीं मिली और सरकारी नुकसान की भरपाई नहीं हुई, तो ऐसी कार्रवाई का असर सीमित रह जाएगा। जनता अब परिणाम देखना चाहती है, केवल घोषणाएं नहीं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विधानसभा चुनाव 2027 में भ्रष्टाचार, सुशासन और प्रशासनिक जवाबदेही बड़े चुनावी मुद्दे बन सकते हैं। भाजपा इस कार्रवाई को अपनी ईमानदार और निर्णायक सरकार की पहचान के रूप में प्रचारित करेगी। दूसरी ओर विपक्ष यह साबित करने की कोशिश करेगा कि सरकार की सख्ती केवल चुनावी वर्ष तक सीमित है। युवा मतदाता, मध्यम वर्ग और सरकारी सेवाओं से जुड़े लोग इस मुद्दे को गंभीरता से देख रहे हैं। यही वर्ग चुनावी परिणामों को भी काफी हद तक प्रभावित करता है। हरिद्वार नगर निगम भूमि प्रकरण में धामी सरकार की कार्रवाई ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि भ्रष्टाचार के मुद्दे को सरकार अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक और प्रशासनिक ताकत के रूप में पेश करना चाहती है। लेकिन चुनावी राजनीति में केवल कार्रवाई की शुरुआत नहीं, उसका तार्किक और निष्पक्ष निष्कर्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है। यदि सरकार आने वाले समय में बिना किसी भेदभाव के सभी मामलों में समान कठोरता दिखाती है, तो जीरो टालरेंस की नीति एक मजबूत राजनीतिक पूंजी बन सकती है। लेकिन यदि कार्रवाई चुनिंदा मामलों तक सीमित रह गई, तो विपक्ष इसे चुनावी प्रबंधन करार देने में देर नहीं लगाएगा।

भाजपा के लिए ‘खतरे की घंटी’

गृह जनपद में ही भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट का विरोध सत्ता के प्रति बढ़ती नाराजगी को विपक्ष ने बनाया चुनावी मुद्दा भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के विरोध से बढ़ी धामी सरकार की चिंता देहरादून। विधानसभा चुनाव 2027 से पहले उत्तराखंड की राजनीति में ऐसे संकेत दिखाई देने लगे हैं, जो भाजपा के लिए चिंता का कारण बन सकते हैं। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट को उनके गृह जनपद चमोली के पोखरी क्षेत्र में विरोध का सामना करना पड़ा। कार्यक्रम के दौरान महेंद्र भट्ट मुर्दाबाद के नारे लगने की घटना ने सियासी गलियारों में नई चर्चा छेड़ दी है। विपक्ष इसे धामी सरकार के खिलाफ बढ़ते जनाक्रोश का संकेत बता रहा है, जबकि भाजपा इसे विपक्ष द्वारा प्रायोजित विरोध करार दे रही है। भाजपा ने 2022 के चुनाव में विकास, समान नागरिक संहिता, सख्त कानून व्यवस्था और भ्रष्टाचार पर कार्रवाई जैसे मुद्दों के सहारे दोबारा सत्ता हासिल की थी। लेकिन कार्यकाल के अंतिम चरण में रोजगार, महंगाई, पेपर लीक, पलायन, स्थानीय समस्याएं और विकास कार्यों की रफ्तार जैसे मुद्दे फिर से चर्चा में हैं। ऐसे माहौल में यदि पार्टी के शीर्ष प्रदेश नेतृत्व को अपने ही क्षेत्र में विरोध का सामना करना पड़े तो उसका राजनीतिक संदेश दूर तक जाता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सत्ता विरोधी लहर हमेशा बड़े आंदोलनों से नहीं, बल्कि छोटी-छोटी स्थानीय घटनाओं से आकार लेना शुरू करती है। जनता जब अपने प्रतिनिधियों के सामने खुलकर नाराजगी जताने लगे तो यह संकेत संगठन के लिए भी गंभीर माना जाता है। विपक्ष ने इस घटनाक्रम को हाथों-हाथ लिया है। कांग्रेस का कहना है कि यह विरोध प्रदेशभर में बढ़ रहे जन असंतोष की शुरुआत है। पार्टी का आरोप है कि सरकार ने युवाओं, किसानों, कर्मचारियों और आम जनता से जुड़े मुद्दों पर अपेक्षित संवेदनशीलता नहीं दिखाई। आम आदमी पार्टी और उत्तराखंड क्रांति दल भी इसे जनता के मोहभंग का संकेत बताते हुए सरकार पर लगातार हमलावर हैं। हालांकि भाजपा इस पूरे घटनाक्रम को स्थानीय मुद्दों से जुड़ी सामान्य लोकतांत्रिक प्रतिक्रिया बता रही है। पार्टी नेताओं का कहना है कि जनता की हर बात सुनी जाएगी और सरकार विकास कार्यों के आधार पर दोबारा जनता के बीच जाएगी। भाजपा संगठन भी बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं को सक्रिय कर फीडबैक लेने और असंतोष को दूर करने की रणनीति पर काम कर रहा है। चुनावी राजनीति में प्रतीकात्मक घटनाओं का महत्व कम नहीं होता। अपने ही गृह जनपद में प्रदेश अध्यक्ष का विरोध विपक्ष को यह कहने का अवसर देता है कि सरकार के खिलाफ असंतोष अब भाजपा के मजबूत माने जाने वाले क्षेत्रों तक पहुंचने लगा है। वहीं भाजपा के लिए यह संदेश है कि केवल सरकार की उपलब्धियां गिनाने से काम नहीं चलेगा, बल्कि जनता की नाराजगी को समय रहते दूर करना भी जरूरी होगा। उत्तराखंड की राजनीति में अभी चुनावी तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं है, लेकिन इतना तय है कि आने वाले महीनों में रोजगार, महंगाई, पेपर लीक, स्थानीय विकास और जनसरोकारों के मुद्दे चुनावी विमर्श के केंद्र में रहेंगे। यदि भाजपा समय रहते संगठन और सरकार के बीच बेहतर तालमेल बनाकर जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरने में सफल नहीं होती, तो विपक्ष इन मुद्दों को चुनावी हथियार बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा।

युवाओं का ‘गुस्सा’ बनाम सरकार की ‘साख’

बेरोजगारों के मुद्दे पर विपक्ष सरकार को घेरने की तैयारी में भाजपा के लिए चुनाव से पहले युवाओं के भरोसे की ‘जंग’ कांग्रेस ने खोला मोर्चा, आप और यूकेडी भी हुई आक्रामक देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 से पहले राज्य में एक बार फिर पेपर लीक और भर्ती परीक्षाओं का मुद्दा राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया है। कांग्रेस ने इसे सरकार की सबसे बड़ी प्रशासनिक विफलता बताते हुए प्रदेशभर में आंदोलन की रणनीति तैयार कर ली है। दूसरी ओर आम आदमी पार्टी और उत्तराखंड क्रांति दल भी बेरोजगार युवाओं के साथ खड़े होकर सरकार को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं। माना जा रहा है कि आगामी चुनाव में रोजगार और भर्ती परीक्षाओं की पारदर्शिता सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकती है। उत्तराखंड में पिछले कुछ वर्षों के दौरान विभिन्न भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक और अनियमितताओं के आरोपों ने लाखों युवाओं के भविष्य पर सवाल खड़े किए। स्नातक स्तरीय भर्ती परीक्षा, सचिवालय सुरक्षा, वन दरोगा सहित कई परीक्षाओं में अनियमितताओं के आरोपों ने प्रदेश की राजनीति को झकझोर दिया था। हजारों अभ्यर्थियों ने सड़कों पर उतरकर आंदोलन किया और सरकार को कई परीक्षाएं रद्द करनी पड़ीं। इसी मुद्दे को कांग्रेस अब चुनावी हथियार बना रही है। प्रदेश कांग्रेस का कहना है कि सरकार युवाओं को रोजगार देने में असफल रही और जो भर्तियां निकाली गईं, उनमें भी भ्रष्टाचार और पेपर लीक ने युवाओं का विश्वास तोड़ दिया। कांग्रेस प्रदेशभर में युवा न्याय अभियान चलाने की तैयारी कर रही है, जिसमें बेरोजगार युवाओं के साथ संवाद और जनसभाएं आयोजित की जाएंगी। आम आदमी पार्टी भी इस मुद्दे पर लगातार सरकार को घेर रही है। पार्टी का आरोप है कि भाजपा सरकार ने युवाओं को रोजगार के नाम पर केवल आश्वासन दिए। आप का कहना है कि यदि भर्ती प्रक्रिया पूरी तरह डिजिटल और जवाबदेह होती तो पेपर लीक जैसे मामले सामने नहीं आते। पार्टी युवाओं के बीच रोजगार गारंटी और पारदर्शी भर्ती व्यवस्था को प्रमुख चुनावी वादा बनाने की तैयारी में है। उत्तराखंड क्रांति दल ने भी इस मुद्दे को राज्य के युवाओं के सम्मान से जोड़ दिया है। यूकेडी का कहना है कि प्रदेश बनने का उद्देश्य स्थानीय युवाओं को रोजगार देना था, लेकिन आज वही युवा भर्ती घोटालों और बेरोजगारी से सबसे अधिक प्रभावित हैं। पार्टी इसे राज्य की अस्मिता और युवाओं के भविष्य का सवाल बताकर गांव-गांव तक ले जाने की रणनीति बना रही है। भाजपा सरकार का कहना है कि पेपर लीक मामलों में पहली बार सख्त कार्रवाई की गई। आरोपियों की गिरफ्तारी हुई, परीक्षाएं निरस्त की गईं और दोषियों के खिलाफ कठोर कानून लागू किया गया। सरकार यह भी दावा कर रही है कि नई भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता बढ़ाई गई है और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए तकनीकी निगरानी मजबूत की गई है। भाजपा चुनावी मंचों पर यह संदेश देने की तैयारी में है कि पिछली घटनाओं पर कार्रवाई करके सरकार ने युवाओं का भरोसा बहाल करने का प्रयास किया है। उत्तराखंड में लगभग 18 से 35 वर्ष आयु वर्ग के मतदाताओं की संख्या चुनावी समीकरणों में निर्णायक मानी जाती है। बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाएं और सरकारी नौकरियां हमेशा से इस वर्ग के प्रमुख मुद्दे रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि विपक्ष इस मुद्दे को लगातार जीवित रखता है तो यह चुनावी माहौल को प्रभावित कर सकता है। दिलचस्प बात यह है कि कांग्रेस, आप और यूकेडी तीनों अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं के बावजूद पेपर लीक और बेरोजगारी के मुद्दे पर लगभग एक ही सुर में सरकार को घेर रहे हैं। हालांकि तीनों दलों की चुनावी रणनीति अलग है, लेकिन लक्ष्य एक ही हैकृयुवा मतदाताओं का विश्वास जीतना।

शनिवार, 20 जून 2026

फिर ‘भाजपा’ या अब ‘कांग्रेस’

उत्तराखंड में ‘हैट्रिक’ पर भाजपा की नजर और वापसी के लिए बेताब दिख रही है प्रदेश में कांग्रेस भाजपा तीसरी बार सत्ता बचाने की चुनौती में, कांग्रेस सत्ता परिवर्तन की परंपरा लौटाने की कोशिश में संगठन, बूथ, बागी, बेरोजगारी, पलायन और स्थानीय मुद्दे तय करेंगे सूबे में अगली सरकार देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 भले ही अभी कुछ महीने दूर हों, लेकिन प्रदेश में चुनावी रण लगभग सज चुका है। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ने संगठनात्मक बैठकों, कार्यकर्ता सम्मेलनों, जनसंपर्क अभियानों और केंद्रीय नेताओं के लगातार दौरों के जरिए यह संकेत दे दिया है कि अब हर राजनीतिक कदम चुनावी चश्मे से देखा जाएगा। भाजपा लगातार तीसरी बार सरकार बनाने का इतिहास रचना चाहती है, जबकि कांग्रेस 2022 में टूटी सत्ता परिवर्तन की परंपरा को फिर से स्थापित करने की कोशिश में है। उत्तराखंड की राजनीति की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि राज्य गठन के बाद लंबे समय तक सत्ता भाजपा और कांग्रेस के बीच बदलती रही। वर्ष 2022 में पहली बार भाजपा ने लगातार दूसरी बार सरकार बनाकर इस परंपरा को तोड़ा। अब 2027 का चुनाव इस सवाल का जवाब देगा कि क्या यह बदलाव स्थायी है या मतदाता फिर सत्ता परिवर्तन की ओर लौटेंगे। भाजपा इस चुनाव में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में उतरने का स्पष्ट संकेत दे चुकी है। पार्टी का पूरा फोकस संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने, पिछले चुनाव में हारे बूथों की समीक्षा, लाभार्थी वर्ग को फिर से जोड़ने और केंद्र व राज्य सरकार की योजनाओं को चुनावी मुद्दा बनाने पर है। राष्ट्रीय नेतृत्व भी लगातार उत्तराखंड पर विशेष ध्यान दे रहा है। भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती एंटी-इनकंबेंसी को नियंत्रित करना है। लंबे समय तक सत्ता में रहने के कारण स्थानीय स्तर पर विधायकों के खिलाफ नाराजगी, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे चुनाव में असर डाल सकते हैं। दूसरी ओर कांग्रेस ने भी चुनावी तैयारियां तेज कर दी हैं। राहुल गांधी, प्रदेश प्रभारी और अन्य वरिष्ठ नेताओं के लगातार उत्तराखंड दौरे इसी रणनीति का हिस्सा माने जा रहे हैं। पार्टी संगठन को सक्रिय करने, पुराने नेताओं को साथ लाने, नए चेहरों को अवसर देने और युवाओं के बीच पहुंच बढ़ाने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस की रणनीति सरकार के खिलाफ बेरोजगारी, महंगाई, पेपर लीक, पलायन, स्वास्थ्य सेवाओं की कमी, पर्वतीय क्षेत्रों में खाली होते गांव और स्थानीय विकास के मुद्दों को चुनावी विमर्श का केंद्र बनाना है। राजनीतिक दल भले ही बड़े-बड़े दावे कर रहे हों, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और भी है। उत्तराखंड का मतदाता अब केवल बड़े नेताओं की रैलियों से प्रभावित नहीं होता। गांवों में सड़क, पेयजल, अस्पताल, स्कूल, मोबाइल नेटवर्क, वन्यजीवों का आतंक, खेती की बदहाली और युवाओं के रोजगार जैसे मुद्दे अधिक महत्वपूर्ण बनते जा रहे हैं। पहाड़ से लगातार पलायन आज भी सबसे बड़ा सामाजिक और राजनीतिक प्रश्न है। हजारों गांव आंशिक या पूरी तरह खाली हो चुके हैं। चुनाव के समय यह मुद्दा हर दल उठाता है, लेकिन समाधान अभी भी अधूरा माना जाता है। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 केवल भाजपा और कांग्रेस के बीच सत्ता की लड़ाई नहीं होगा, बल्कि यह चुनाव इस बात की भी परीक्षा होगा कि जनता विकास के दावों को प्राथमिकता देती है या स्थानीय असंतोष को। भाजपा के सामने उपलब्धियों को जनसमर्थन में बदलने की चुनौती है, जबकि कांग्रेस के सामने असंतोष को वोट में बदलने की। अंतिम फैसला हमेशा की तरह उत्तराखंड की जनता के हाथ में होगा, जो राज्य गठन के बाद कई बार यह साबित कर चुकी है कि वह किसी भी राजनीतिक दल को स्थायी जनादेश देने के बजाय उसके कामकाज का कठोर मूल्यांकन करती है। बाक्स बागी बन सकते हैं गेम चेंजर उत्तराखंड के लगभग हर चुनाव में टिकट वितरण के बाद बगावत देखने को मिलती रही है। भाजपा और कांग्रेस दोनों में ऐसे कई नेता हैं जो वर्षों से टिकट की प्रतीक्षा कर रहे हैं। यदि टिकट वितरण में असंतोष बढ़ता है तो निर्दलीय उम्मीदवार कई सीटों पर मुकाबला त्रिकोणीय बना सकते हैं। प्रदेश की राजनीति का इतिहास बताता है कि कई सीटों पर जीत-हार का अंतर हजार या उससे भी कम वोटों का रहा है। ऐसे में बागी उम्मीदवार चुनावी समीकरण बिगाड़ सकते हैं। अभी तक की सरकारें 2002-कांग्रेस सरकार 2007-भाजपा सरकार 2012-कांग्रेस सरकार 2017-भाजपा सरकार 2022-भाजपा सरकार

थम गए घराट के ‘पाट’ अब बची हैं सिर्फ ‘यादें’

घराट’ कृपानी की शक्ति से चलने वाली पारंपरिक आटा चक्की थी पहाड़ की विरासत --गधेरों के किनारे घराट कभी थे गांव की अर्थव्यवस्था, संस्कृति और सामाजिक जीवन का केंद्र --पलायन, आधुनिक चक्कियों और बदलती जीवनशैली ने धरोहर को इतिहास के पन्नों तक समेटा --कभी पहाड़ में गांवों के घराट के आसपास हर समय रहती थी लोगों की खूब चहल-पहल देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ों में बहती छोटी-छोटी नदियों और गधेरों के किनारे कभी एक ऐसी विरासत जीवंत हुआ करती थी, जिसकी घर्र-घर्र की आवाज पूरे गांव के जीवन की लय बन जाती थी। यह विरासत थी ‘घराट’ कृपानी की शक्ति से चलने वाली पारंपरिक आटा चक्की। आज भले ही घराटों के पाट थम चुके हों, लेकिन पहाड़ की स्मृतियों में उनकी आवाज आज भी उतनी ही जीवित है। एक समय था जब गांव का हर परिवार अपने खेतों में उगे गेहूं, मंडुवा, झंगोरा, मक्का और जौं की बोरियां पीठ पर लादकर कई किलोमीटर पैदल चलकर घराट तक पहुंचता था। वहां आटा पिसवाने की कोई जल्दबाजी नहीं होती थी। क्योंकि घराट केवल अनाज पीसने की जगह नहीं था, बल्कि वह गांव का सबसे बड़ा सामाजिक केंद्र था। घराट के आसपास हर समय लोगों की चहल-पहल रहती थी। कोई अपनी बारी का इंतजार करता, कोई खेती-किसानी की चर्चा करता, तो कोई दूर शहर या फौज में नौकरी कर रहे बेटे का हाल सुनाता। महिलाएं लोकगीत गातीं, बच्चे गधेरे के किनारे खेलते और बुजुर्ग पुराने किस्सों से नई पीढ़ी को गांव का इतिहास सुनाते। कई बार घराट ही वह जगह बन जाता, जहां रिश्ते तय होते, गांव की समस्याओं पर चर्चा होती और सामूहिक फैसले लिए जाते। आज की भाषा में कहें तो घराट गांव की चौपाल, पंचायत और संवाद केंद्रकृतीनों का संगम था। घराट पहाड़ के लोगों की प्रकृति के साथ तालमेल की अद्भुत मिसाल था। इसमें न बिजली की जरूरत पड़ती थी और न ही डीजल की। गधेरे का बहता पानी लकड़ी के पंखों को घुमाता और वही शक्ति पत्थर के भारी पाट को चलाती थी। धीरे-धीरे पिसा हुआ आटा स्वाद, पौष्टिकता और खुशबू में अलग पहचान रखता था। आज जब पूरी दुनिया पर्यावरण संरक्षण और हरित ऊर्जा की बात कर रही है, तब यह याद करना जरूरी है कि उत्तराखंड के गांव सदियों पहले ही जल ऊर्जा का ऐसा उपयोग कर रहे थे, जो पूरी तरह प्रकृति के अनुकूल था। रूद्रप्रयाग जिले के दानकोट निवासी देवी प्रसाद गौड बताते हैं कि घराट में पिसे मंडुवे की रोटी, झंगोरे का आटा या गेहूं का स्वाद कुछ अलग ही होता था। आटा गर्म नहीं होता था, इसलिए उसमें अनाज की प्राकृतिक खुशबू और पोषण बना रहता था। यही कारण था कि घराट का आटा केवल भोजन नहीं, बल्कि स्वास्थ्य का भी आधार माना जाता था। समय बदला, गांवों से पलायन बढ़ा और बिजली से चलने वाली चक्कियां गांव-गांव तक पहुंच गईं। इसके साथ ही घराटों की रौनक भी खत्म होने लगी। जिन रास्तों पर कभी अनाज की बोरियां लेकर लोग चलते थे, वहां अब झाड़ियां उग आई हैं। कई घराट ढह चुके हैं, कुछ मलबे में बदल गए हैं और कुछ केवल नाम भर रह गए हैं। पहाड़ के खाली होते गांवों के साथ घराट भी वीरान हो गए। पानी अब भी बहता है, लेकिन उसे घुमाने वाले पाट और वहां जुटने वाला समाज बिखर चुका है। इतिहासकार डा. भगवती प्रसाद पुरोहित मानते हैं कि घराट केवल तकनीकी संरचना नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान हैं। यह उस दौर की याद दिलाते हैं, जब गांव आत्मनिर्भर थे और स्थानीय संसाधनों के सहारे अपना जीवन चलाते थे। यदि इन घराटों का संरक्षण किया जाए, तो इन्हें ग्रामीण पर्यटन, पारंपरिक खाद्य उत्पादों और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ा जा सकता है। कई देशों में ऐसी पारंपरिक जलचक्कियां आज भी पर्यटन का बड़ा आकर्षण हैं। उत्तराखंड भी इस दिशा में पहल कर अपनी विरासत को नई पहचान दे सकता है। आज भी बरसात के दिनों में जब किसी पुराने घराट के पास से बहता पानी तेज होता है, तो लगता है मानो पत्थरों के बीच कहीं वह पुरानी घर्र-घर्र की आवाज अब भी छिपी हुई है। वह आवाज केवल चक्की के घूमने की नहीं थी, बल्कि आत्मनिर्भर पहाड़, सामूहिक जीवन, आपसी प्रेम और प्रकृति के साथ संतुलन की थी। आज जरूरत केवल घराटों को बचाने की नहीं, बल्कि उस संस्कृति को बचाने की है जिसने पहाड़ को सदियों तक जीवंत बनाए रखा। क्योंकि जब घराट बंद हुए, तब केवल चक्कियां नहीं रुकींकृपहाड़ की एक पूरी जीवनशैली धीरे-धीरे खामोश हो गई। हालांकि प्रदेश में आज कुछ संस्थाएं इस दिशा में काम कर रही है, लेकिन वह भी सिर्फ सरकार बजट की आस में इससे जुडे़ है। बजट खत्म तो उनकी जिम्मेदारी भी खत्म।

कांग्रेस के ‘कमांडर’ की चुनावी फौज ‘लापता’

विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा फुल एक्टिव और कांग्रेस अभी भी है अधूरी गोदियाल सक्रिय, लेकिन कुर्सियां खाली, कांग्रेस के लिए मिशन 2027 की चुनौती कांग्रेस पाटी में अकेले कमांडर के सिर चुनाव का भार अभी तक न टीम, न रणनीति देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 में भले अभी कुछ समय बाकी हो, लेकिन सियासत पूरी तरह चुनावी रंग में रंग चुकी है। भाजपा ने संगठन से लेकर सरकार तक पूरे चुनावी तंत्र को सक्रिय कर दिया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी लगातार जिलों का दौरा कर रहे हैं, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष से लेकर केंद्रीय नेता तक संगठन की नब्ज टटोल रहे हैं और बूथ स्तर तक चुनावी तैयारियों को अंतिम रूप दिया जा रहा है। दूसरी ओर प्रदेश की मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस की तस्वीर बिल्कुल उलट नजर आ रही है। पार्टी ने प्रदेश अध्यक्ष के रूप में गणेश गोदियाल को कमान तो सौंप दी, लेकिन चुनाव की दहलीज पर खड़ी कांग्रेस के पास अभी तक पूरी प्रदेश कार्यकारिणी ही नहीं है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद गणेश गोदियाल लगातार सक्रिय हैं। दिल्ली से लेकर देहरादून तक बैठकों का दौर जारी है। कार्यकर्ताओं से संवाद भी हो रहा है और सरकार पर हमले भी तेज हैं। लेकिन प्रदेश संगठन का ढांचा अभी भी अधूरा है। प्रदेश उपाध्यक्ष कौन होंगे, महामंत्री कौन होंगे, जिलों की जिम्मेदारी किसे मिलेगी, चुनावी अभियान कौन संभालेगा, मीडिया प्रबंधन कौन करेगा और बूथ स्तर पर संगठन को कौन सक्रिय करेगाकृइन सभी सवालों के जवाब अभी मिलने बाकी हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि चुनावी वर्ष में संगठन जितना जल्दी खड़ा होता है, उतना ही मजबूत संदेश कार्यकर्ताओं तक जाता है। कांग्रेस में फिलहाल यही संदेश सबसे कमजोर दिखाई दे रहा है। भाजपा ने 2027 के चुनाव को लेकर महीनों पहले तैयारी शुरू कर दी है। प्रत्येक जिले में संगठनात्मक बैठकें, शक्ति केंद्रों की समीक्षा, बूथ समितियों का गठन, पन्ना प्रमुखों की सक्रियता और लाभार्थी संपर्क अभियान लगातार चल रहे हैं। इसके विपरीत कांग्रेस के भीतर अभी भी संगठन विस्तार का इंतजार है। राजनीतिक गलियारों में चुटकी ली जा रही है कि भाजपा चुनाव लड़ रही है और कांग्रेस अभी टीम बना रही है। उत्तराखंड विधानसभा की 70 सीटों पर जीत के लिए केवल मुद्दे काफी नहीं होते। चुनाव जीतने के लिए बूथ एजेंट, सेक्टर प्रभारी, जिला प्रभारी, सोशल मीडिया टीम, मीडिया सेल, युवा और महिला संगठन, प्रशिक्षण टीम और संसाधनों का मजबूत नेटवर्क चाहिए। यही नेटवर्क चुनाव के दिन वोट को बूथ तक पहुंचाता है। कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि यदि प्रदेश संगठन का गठन जल्द नहीं हुआ तो चुनावी तैयारियों में देरी का सीधा असर जमीनी स्तर पर दिखाई दे सकता है। उत्तराखंड की राजनीति में संगठन हमेशा निर्णायक रहा है। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 47 सीटें’जीतकर लगातार दूसरी बार सरकार बनाई, जबकि कांग्रेस 19 सीटों पर सिमट गई। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा की संगठनात्मक मजबूती उसकी बड़ी ताकत रही, जबकि कांग्रेस कई स्थानों पर स्थानीय स्तर पर कमजोर दिखाई दी। अब यदि कांग्रेस सत्ता में वापसी का सपना देख रही है तो उसे केवल सरकार के खिलाफ माहौल बनाने से ज्यादा, अपने संगठन को धार देनी होगी। कांग्रेस लगातार बेरोजगारी, पेपर लीक, महंगाई, पलायन, स्वास्थ्य सेवाओं और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे उठा रही है। लेकिन राजनीति का पुराना नियम है कि मुद्दे टीवी स्टूडियो में नहीं, बूथ पर जीत दिलाते हैं। जब तक हर विधानसभा, हर ब्लाक और हर बूथ पर पार्टी का मजबूत ढांचा नहीं होगा, तब तक सरकार विरोधी मुद्दों का पूरा राजनीतिक लाभ मिलना आसान नहीं होगा। कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर प्रदेश कार्यकारिणी का ऐलान कब होगा? क्योंकि संगठन बनने के बाद ही चुनावी जिम्मेदारियां तय होंगी और टिकट के दावेदार भी अपनी रणनीति स्पष्ट कर पाएंगे। उत्तराखंड की राजनीति में इन दिनों एक तंज खूब सुनाई दे रहा है कि भाजपा के पास पूरी बारात तैयार है, कांग्रेस अभी घोड़ी सजाने में लगी है। इसके साथ ही प्रदेश अध्यक्ष मैदान में हैं, लेकिन चुनावी टीम की जर्सी अभी सिल रही है। 2027 का विधानसभा चुनाव केवल चेहरे का नहीं, बल्कि संगठन की ताकत का चुनाव होगा। भाजपा ने अपनी चुनावी मशीनरी को काफी हद तक सक्रिय कर दिया है, जबकि कांग्रेस की असली परीक्षा अभी अपने घर को व्यवस्थित करने की है।

राहुल की ‘जेन-जेड’ से दोस्ती

डिजिटल पीढ़ी, सीधे सवालों के साथ कांग्रेस नेता राहुल गाधी ने बना दी है नई युवा रणनीति रोजगार, पेपर लीक, शिक्षा व सोशल मीडिया के जरिए नई पीढ़ी तक पहुंचने की कोशिश में कांग्रेस भाजपा भी युवा मतदाताओं पर पकड़ मजबूत रखने में जुटी, पड़ोसी देशों के युवा आंदोलनों की चर्चा तेज देहरादून। देश की राजनीति में एक नया शब्द तेजी से चर्चा में है जेन-जेड। यह वह पीढ़ी है, जिसने सोशल मीडिया के दौर में आंखें खोलीं, इंटरनेट को किताबों से ज्यादा देखा, मोबाइल को हथियार बनाया और अपने सवालों के जवाब सीधे सत्ता से मांगने की आदत विकसित की। यही कारण है कि अब राजनीतिक दलों की नजर भी इसी पीढ़ी पर टिक गई है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने हाल के महीनों में अपने राजनीतिक अभियान का केंद्र इस नई पीढ़ी को बनाया है। छात्रों से लगातार संवाद, प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं, पेपर लीक, बेरोजगारी और शिक्षा व्यवस्था के सवालों को उठाकर कांग्रेस युवाओं के बीच अपनी नई राजनीतिक जमीन तैयार करने की कोशिश कर रही है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि राहुल गांधी अब केवल पारंपरिक कांग्रेस वोट बैंक पर निर्भर रहने के बजाय पहली बार मतदान करने वाले और 18 से 30 वर्ष के मतदाताओं को अपनी राजनीति का सबसे बड़ा आधार बनाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में शामिल है। चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार हर चुनाव में लाखों नए मतदाता जुड़ते हैं। इनमें अधिकांश जेन-जेड वर्ग के होते हैं। यह पीढ़ी जाति, धर्म और परंपरागत राजनीतिक नारों से आगे बढ़कर रोजगार, करियर, स्टार्टअप, शिक्षा, डिजिटल अवसर, पारदर्शिता और सरकारी जवाबदेही जैसे मुद्दों पर अधिक ध्यान देती है। यही वजह है कि आज लगभग हर राजनीतिक दल सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा सक्रिय दिखाई देता है। इंस्टाग्राम रील, यूट्यूब, एक्स, फेसबुक और पाडकास्ट अब राजनीतिक हथियार बन चुके हैं। राहुल गांधी ने पिछले कुछ समय में लगातार छात्रों और युवाओं के मुद्दों को उठाया है। उन्होंने पेपर लीक, प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता, बेरोजगारी और शिक्षा व्यवस्था को लेकर केंद्र सरकार पर लगातार सवाल खड़े किए हैं। उनकी सभाओं में अब युवाओं की भागीदारी पहले की तुलना में अधिक दिखाई दे रही है। कांग्रेस का पूरा डिजिटल अभियान भी युवाओं को ध्यान में रखकर तैयार किया जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राहुल गांधी यह संदेश देना चाहते हैं कि यदि युवाओं के भविष्य का सवाल है तो कांग्रेस उनकी आवाज बनेगी। यह कहना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा कि भाजपा में खलबली मच गई है। हालांकि इतना जरूर है कि भाजपा भी युवाओं को अपने साथ बनाए रखने के लिए लगातार सक्रिय है। भाजपा पिछले दस वर्षों में स्टार्टअप इंडिया, डिजिटल इंडिया, स्किल इंडिया, पीएम मुद्रा योजना, नई शिक्षा नीति, डिजिटल गवर्नेंस और विभिन्न युवा कार्यक्रमों के जरिए युवा वर्ग तक पहुंच बनाने का प्रयास करती रही है। इसके साथ ही भाजपा का सोशल मीडिया नेटवर्क देश का सबसे मजबूत राजनीतिक डिजिटल नेटवर्क माना जाता है। यही कारण है कि कांग्रेस और भाजपा दोनों अब युवाओं के बीच नैरेटिव की लड़ाई लड़ रहे हैं। हाल के वर्षों में दक्षिण एशिया के कई देशों में युवाओं ने बड़े जनआंदोलनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बांग्लादेश में सरकारी नौकरियों में आरक्षण नीति के खिलाफ छात्र आंदोलन ने व्यापक राजनीतिक संकट पैदा किया। वही श्रीलंका में आर्थिक संकट के दौरान हजारों युवाओं ने सड़कों पर उतरकर सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किए। इसके साथ ही नेपाल में भी समय-समय पर छात्र और युवा विभिन्न राजनीतिक आंदोलनों का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। इन घटनाओं के बाद भारत में भी राजनीतिक विश्लेषक यह चर्चा कर रहे हैं कि क्या युवाओं का असंतोष भविष्य में चुनावी राजनीति को प्रभावित कर सकता है। हालांकि यह भी उतना ही महत्वपूर्ण तथ्य है कि भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था, चुनावी प्रक्रिया, संघीय ढांचा और राजनीतिक परिस्थितियां इन देशों से काफी अलग हैं। इसलिए किसी एक देश की राजनीतिक घटनाओं को भारत पर सीधे लागू करना उचित नहीं माना जाता। बता दें कि आज का युवा अखबार पढ़ने से पहले मोबाइल खोलता है। राजनीतिक दल भी इसे अच्छी तरह समझ चुके हैं। यही कारण है कि अब चुनावी भाषणों से ज्यादा महत्व छोटे वीडियो, लाइव बातचीत, पाडकास्ट, डिजिटल कैंपेन और वायरल कंटेंट का हो गया है। राहुल गांधी भी अब पारंपरिक रैलियों के साथ डिजिटल संवाद पर विशेष जोर दे रहे हैं, जबकि भाजपा पहले से ही इस क्षेत्र में मजबूत मानी जाती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले विधानसभा चुनावों और 2029 के लोकसभा चुनाव में केवल जातीय समीकरण या पारंपरिक वोट बैंक ही निर्णायक नहीं होंगे। पहली बार वोट डालने वाले युवा, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्र, बेरोजगार डिग्रीधारी, स्टार्टअप से जुड़े युवा और डिजिटल दुनिया में सक्रिय मतदाता चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं। इसी कारण कांग्रेस रोजगार, शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था को मुख्य मुद्दा बना रही है, जबकि भाजपा विकास, बुनियादी ढांचे, डिजिटल परिवर्तन, कल्याणकारी योजनाओं और राष्ट्रीय नेतृत्व के मुद्दों पर अपना भरोसा कायम रखना चाहती है। राहुल गांधी का जेन-ज़ेड की ओर बढ़ता कदम इस बात का संकेत है कि कांग्रेस भविष्य की राजनीति को युवा आकांक्षाओं के इर्द-गिर्द खड़ा करना चाहती है। दूसरी ओर भाजपा भी अपने युवा समर्थन आधार को बनाए रखने और बढ़ाने के लिए समान रूप से सक्रिय है। आने वाले वर्षों में यह मुकाबला केवल दो दलों का नहीं, बल्कि युवा मतदाताओं के विश्वास, उम्मीदों और आकांक्षाओं को अपने पक्ष में करने की राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का होगा, जिस दल को नई पीढ़ी का अधिक भरोसा मिलेगा, वही भविष्य की भारतीय राजनीति की दिशा तय करने में मजबूत स्थिति में होगा।

गुरुवार, 18 जून 2026

70 सीटें, चार कोने और एक गद्दी

उत्तराखंड की सियासत में तीसरे-चौथे मोर्चे का खौफ, बदलेगी राष्ट्रीय दलों की रणनीति राष्ट्रीय दलों के वोट बैंक में सेंध लगाने को तैयार क्षेत्रीय और बाहरी सूरमा उत्तराखंड की 70 सीटों पर आप व यूकेडी की एंट्री से उड़े दिग्गजों के तोते देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की आहट अभी से सुनाई देने लगी है। अब तक मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधा माना जा रहा था, लेकिन आम आदमी पार्टी और उत्तराखंड क्रांति दल की सक्रियता ने चुनावी रण को त्रिकोणीय ही नहीं बल्कि कई सीटों पर चतुष्कोणीय बनाने के संकेत दे दिए हैं। आप ने प्रदेश की सभी 70 विधानसभा सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है, जबकि यूकेडी पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि वह उत्तराखंडियत, भू-कानून, मूल निवास और क्षेत्रीय अस्मिता के मुद्दों पर पूरे दमखम के साथ चुनाव मैदान में उतरेगी। भले ही आप और यूकेडी सरकार बनाने की स्थिति में न दिखें, लेकिन दोनों दल भाजपा और कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगाने की क्षमता रखते हैं। यही कारण है कि दोनों राष्ट्रीय दलों ने अपनी चुनावी रणनीति को नए सिरे से तैयार करना शुरू कर दिया है। भाजपा को चिंता इस बात की है कि शहरी क्षेत्रों में आम आदमी पार्टी बिजली, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य को मुद्दा बनाकर मध्यम वर्ग और युवाओं को आकर्षित करने की कोशिश करेगी। दूसरी ओर कांग्रेस को डर है कि सत्ता विरोधी मतों का बिखराव सीधे भाजपा को फायदा पहुंचा सकता है। यूकेडी की सक्रियता भी दोनों दलों के लिए चुनौती है। उत्तराखंड आंदोलन की विरासत रखने वाला यह दल पर्वतीय क्षेत्रों में भू-कानून, मूल निवास, पलायन और स्थानीय रोजगार जैसे भावनात्मक मुद्दों को फिर से चुनावी विमर्श के केंद्र में लाने की तैयारी में है। दिल्ली और पंजाब के बाद उत्तराखंड में संगठन को नए सिरे से खड़ा करने में जुटी आम आदमी पार्टी ने नई प्रदेश इकाई के गठन के साथ बड़ा संदेश दिया है कि वह केवल औपचारिक उपस्थिति नहीं बल्कि हर विधानसभा क्षेत्र में मजबूत लड़ाई लड़ेगी। पार्टी का दावा है कि वह शिक्षा, स्वास्थ्य, भ्रष्टाचार और रोजगार को चुनाव का मुख्य एजेंडा बनाएगी और सभी 70 सीटों पर उम्मीदवार उतारेगी। यूकेडी लंबे समय से कह रही है कि राष्ट्रीय दल उत्तराखंड के मूल मुद्दों को भूल चुके हैं। पार्टी का फोकस सशक्त भू-कानून, मूल निवास 1950 आधारित नीति की मांग, पलायन रोकने की ठोस योजना, पर्वतीय जिलों में रोजगार, राज्य आंदोलन की मूल भावना पर रहेगा। यदि यूकेडी कुछ क्षेत्रों में प्रभावी प्रदर्शन करती है तो वह कई सीटों पर भाजपा और कांग्रेस दोनों का गणित बिगाड़ सकती है। राजनीतिक जानकारों के अनुसार देहरादून, हरिद्वार, )षिकेश, रुड़की, काशीपुर, हल्द्वानी, रुद्रपुर और कोटद्वार जैसे शहरी क्षेत्रों में आप अपनी पकड़ मजबूत करने का प्रयास करेगी, जबकि यूकेडी का प्रभाव टिहरी, उत्तरकाशी, चमोली, रुद्रप्रयाग, पिथौरागढ़, बागेश्वर और अल्मोड़ा जैसे पर्वतीय क्षेत्रों में देखने को मिल सकता है। दोनों बड़े दल अब केवल एक-दूसरे पर हमला करने तक सीमित नहीं रह सकते। उन्हें छोटे दलों के प्रभाव को भी ध्यान में रखकर उम्मीदवार चयन, संगठन विस्तार और स्थानीय मुद्दों पर अधिक फोकस करना होगा। भाजपा बूथ स्तर पर संगठन मजबूत कर रही है, जबकि कांग्रेस भी जिलों और ब्लाकों में संगठनात्मक बैठकों के जरिए चुनावी तैयारी तेज कर चुकी है। उत्तराखंड की राजनीति में अब केवल भाजपा बनाम कांग्रेस का सीधा मुकाबला नहीं दिख रहा। आम आदमी पार्टी की 70 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा और यूकेडी की आक्रामक तैयारी ने चुनावी समीकरणों को नया मोड़ दे दिया है। सरकार कौन बनाएगा, इसका उत्तर अभी भविष्य के गर्भ में है, लेकिन इतना तय है कि तीसरे और चौथे मोर्चे की सक्रियता भाजपा और कांग्रेस दोनों की चुनावी रणनीति को प्रभावित करेगी। यदि आप और यूकेडी अपने-अपने क्षेत्रों में प्रभावी वोट हासिल करते हैं, तो 2027 का चुनाव उत्तराखंड के इतिहास के सबसे दिलचस्प और बहुकोणीय चुनावों में से एक साबित हो सकता है।

कांग्रेस नेताओं के ‘जमीनी टेस्ट’ की तैयारी

कांग्रेस की प्रदेश प्रभारी कुमारी सैलजा का कांग्रेस नेताओं को दिया अल्टीमेटम उत्तराखंड में सैलजा का साफ संदेशकृजो जनता के बीच पसीना बहाएगा, वही टिकट पाएगा उत्तराखंड कांग्रेस में परफार्मेंस रिपोर्ट कार्ड तय करेगा टिकट, सिटिंग विधायकों की भी बढ़ी धड़कनें कांग्रेस प्रदेश प्रभारी ने दिया जीत का मंत्र, संगठन में अनुशासन व जवाबदेही पर जोर देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियों में जुटी कांग्रेस ने अब संगठन को चुनावी मोड में लाना शुरू कर दिया है। प्रदेश प्रभारी कुमारी सैलजा के उत्तराखंड दौरे ने साफ संकेत दे दिया है कि इस बार पार्टी केवल दावेदारी के आधार पर टिकट नहीं बांटेगी, बल्कि जमीनी सक्रियता, संगठन के प्रति समर्पण और जनता के बीच लगातार काम करने वाले नेताओं को ही प्राथमिकता मिलेगी। प्रदेश प्रभारी ने प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय में जिला अध्यक्षों, महानगर अध्यक्षों, फ्रंटल संगठनों, प्रकोष्ठों और विधानसभा स्तर के पदाधिकारियों के साथ मैराथन बैठकें कीं। इस दौरान उन्होंने संगठन की मजबूती, बूथ प्रबंधन, कार्यकर्ताओं की सक्रियता और चुनावी रणनीति पर विस्तार से चर्चा की। बैठक का सबसे बड़ा संदेश यही रहा कि जो नेता आज से जनता के बीच दिखाई देगा, टिकट की दौड़ में वही आगे रहेगा। प्रदेश प्रभारी ने साफ शब्दों में कहा कि केवल दिल्ली या देहरादून में बैठकर टिकट की पैरवी करने से कुछ नहीं होगा। चुनाव लड़ने की इच्छा रखने वाले नेताओं को अभी से अपने विधानसभा क्षेत्रों में सक्रिय होना होगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि टिकट का आधार केवल वरिष्ठता नहीं बल्कि विजयी होने की क्षमता और जनता के बीच स्वीकार्यता होगी। प्रदेश प्रभारी ने संगठन की कमजोर कड़ियों पर भी खुलकर चर्चा की। उन्होंने कहा कि कांग्रेस को केवल सरकार की आलोचना करने वाली पार्टी नहीं बल्कि जनता के बीच संघर्ष करने वाले संगठन के रूप में पहचान बनानी होगी। बैठक के दौरान प्रदेश प्रभारी ने नेताओं को स्पष्ट संदेश दिया कि व्यक्तिगत मतभेद पार्टी के भीतर रह सकते हैं, लेकिन सार्वजनिक रूप से संगठन को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियां स्वीकार नहीं की जाएंगी। उन्होंने कहा कि कांग्रेस की सबसे बड़ी ताकत उसका कार्यकर्ता है और यदि सभी नेता एकजुट होकर काम करेंगे तो 2027 में सत्ता परिवर्तन संभव है। प्रदेश प्रभारी ने कार्यकर्ताओं से कहा कि वह केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित न रहें बल्कि जनता से जुड़े मुद्दों को गांव-गांव तक पहुंचाएं। प्रदेश प्रभारी ने स्पष्ट किया कि विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी का पूरा फोकस संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने पर रहेगा। प्रदेश प्रभारी का यह दौरा केवल संगठनात्मक बैठक भर नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे कांग्रेस के चुनावी अभियान की औपचारिक शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है। पार्टी नेतृत्व यह संदेश देना चाहता है कि 2027 का चुनाव केवल नेताओं के भरोसे नहीं बल्कि मजबूत संगठन और सक्रिय कार्यकर्ताओं के दम पर लड़ा जाएगा। भाजपा जहां सत्ता बचाने की रणनीति पर काम कर रही है, वहीं कांग्रेस अब संगठनात्मक अनुशासन, बूथ प्रबंधन और जमीनी सक्रियता के जरिए सत्ता में वापसी का रास्ता तलाश रही है। प्रदेश प्रभारी के दौरे से कांग्रेस ने दो स्पष्ट संदेश दिए हैंकृपहला, टिकट उसी को मिलेगा जो जनता के बीच रहेगा और जीतने की क्षमता साबित करेगा। दूसरा, संगठन सर्वाेपरि है और अनुशासन से कोई समझौता नहीं होगा। विधानसभा चुनाव 2027 से पहले कांग्रेस अब दावेदारों की भी परीक्षा ले रही है और संगठन की भी।

उत्तराखंड में ‘मार्च’ की जंग ‘नवंबर’ में

उत्तराखंड में प्री-मैच्योर इलेक्शन की सुगबुगाहट से राजनीतिक दलों की थमी सांसें सूबे में समय से पहले बजेगा चुनावी बिगुल,जनगणना, अर्द्धकुंभ और सियासी गणित ने बढ़ाई हलचल राजनीतिक दलों की गतिविधियां, संगठनात्मक बैठकों की बढ़ती रफ्तार ने इस संभावना को हवा दे दी देहरादून। समय से पहले विधानसभा चुनाव की चर्चा ने उत्तराखंड की राजनीति को गर्मा दिया है। भाजपा और कांग्रेस दोनों ने अपनी चुनावी तैयारियां तेज कर दी हैं। उत्तराखंड की राजनीति में इन दिनों एक ही सवाल सबसे ज्यादा चर्चा में हैकृक्या विधानसभा चुनाव तय समय से पहले हो सकते हैं? अभी विधानसभा का कार्यकाल मार्च 2027 तक है, लेकिन राजनीतिक दलों की गतिविधियां, संगठनात्मक बैठकों की बढ़ती रफ्तार और चुनावी तैयारियों ने इस संभावना को हवा दे दी है कि प्रदेश में नवंबर-दिसंबर 2026 में ही चुनाव कराए जा सकते हैं। हालांकि इस पर अभी कोई आधिकारिक फैसला नहीं हुआ है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि ऐसा होता है तो यह उत्तराखंड के चुनावी इतिहास की सबसे बड़ी रणनीतिक कवायद होगी। इसकी वजह केवल राजनीति नहीं, बल्कि प्रशासनिक मजबूरियां भी बताई जा रही हैं। केंद्र सरकार ने वर्ष 2027 में देशव्यापी जनगणना का कार्यक्रम तय किया है। दूसरी ओर उत्तराखंड सहित उत्तर प्रदेश, पंजाब और गोवा के विधानसभा चुनाव भी इसी अवधि में प्रस्तावित हैं। चुनाव और जनगणना दोनों में बड़ी संख्या में शिक्षक, प्रशासनिक अधिकारी तथा सरकारी कर्मचारी लगाए जाते हैं। यदि दोनों प्रक्रियाएं एक साथ होती हैं तो सरकारी मशीनरी पर भारी दबाव पड़ सकता है। इसी कारण समय से पहले चुनाव कराने की चर्चा राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में चल रही है। आंकड़ों बताते है कि पिछले दो चुनावों में भाजपा का वर्चस्व रहा है, जबकि कांग्रेस लगातार अपनी खोई जमीन वापस पाने की कोशिश कर रही है। भाजपा ने प्रदेश की सभी 70 विधानसभा सीटों पर संगठन को सक्रिय करना शुरू कर दिया है। बूथ समितियों की समीक्षा, शक्ति केंद्रों की बैठकों और वरिष्ठ नेताओं के लगातार दौरों ने संकेत दिए हैं कि पार्टी किसी भी स्थिति के लिए तैयार रहना चाहती है। हाल के दिनों में राष्ट्रीय नेतृत्व के उत्तराखंड दौरे, कार्यकर्ताओं के साथ बैठकों और बूथ स्तर तक संगठन मजबूत करने के निर्देशों ने चुनावी चर्चाओं को और तेज किया है। मुख्य विपक्ष कांग्रेस भी संगठन को धार देने में जुट गई है। प्रदेश प्रभारी के लगातार दौरे, जिलाध्यक्षों की बैठकों, फ्रंटल संगठनों की समीक्षा और कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने की रणनीति इस बात का संकेत है कि पार्टी भी संभावित समयपूर्व चुनाव की संभावना को नजरअंदाज नहीं कर रही। हरिद्वार में प्रस्तावित धार्मिक आयोजनों तथा प्रशासनिक व्यवस्थाओं को देखते हुए भी चुनावी कैलेंडर को लेकर चर्चाएं हो रही हैं। यदि चुनाव, धार्मिक आयोजन और जनगणना एक साथ आते हैं तो प्रशासनिक संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। यही वजह है कि समयपूर्व चुनाव की संभावना पर राजनीतिक बहस जारी है। यदि चुनाव समय से पहले होते हैं तो सभी दलों को उम्मीदवार चयन, टिकट वितरण, चुनावी घोषणापत्र और संसाधनों की तैयारी अपेक्षा से कई महीने पहले पूरी करनी होगी। छोटे दलों और निर्दलीय उम्मीदवारों के लिए यह और बड़ी चुनौती साबित हो सकती है। बता दें कि उत्तराखंड में लगभग 85 लाख मतदाता हैं। इनमें युवाओं और महिलाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। 2022 के विधानसभा चुनाव में मतदान प्रतिशत लगभग 65 प्रतिशत रहा था। इस बार युवाओं, पहली बार मतदान करने वाले मतदाताओं और महिलाओं की भूमिका निर्णायक मानी जा रही है।

घड़ी नहीं ‘गंज्याली’ की थाप से जागता था पहाड़

ओखली में गंज्याली की हर चोट नहीं कूटती थी केवल धान या मंडुवा पहाड़ की आत्मनिर्भरता, महिलाओं का श्रम व लोकगीतों की थी मिठास सदियों पुरानी पहाड़ की लोक संस्कृति की सुनाई देती थी वह धड़कन रील और रील्स की दुनिया में कहीं गुम हो गई बुजुर्गों की प्यारी विरासत देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ी गांवों की सुबह कभी अलार्म की आवाज से नहीं, बल्कि ओखली में पड़ती गंज्याली की लयब( थाप से होती थी। यह आवाज इतनी परिचित थी कि गांव के लोग बिना घड़ी देखे समझ जाते थे कि दिन निकलने वाला है। पहाड़ की रसोई में चूल्हे की पहली आंच जलने से पहले ओखली में गंज्याली चलती थी और पूरे आंगन में उसकी ठक-ठक...ठक-ठक की गूंज फैल जाती थी। यह केवल एक घरेलू काम नहीं, बल्कि पहाड़ की जीवनशैली का अभिन्न हिस्सा था। गंज्याली लकड़ी से बना एक मजबूत और भारी उपकरण है, जिसका उपयोग ओखली में धान, मंडुवा, झंगोरा, गेहूं, गहत और अन्य अनाज कूटने के लिए किया जाता था। पहाड़ के लगभग हर घर के आंगन में पत्थर या मजबूत लकड़ी की ओखली बनी होती थी और उसके साथ गंज्याली हमेशा खड़ी रहती थी। यह रसोई का उतना ही महत्वपूर्ण हिस्सा थी, जितना चूल्हा, सिलबट्टा या तांबे का भड्डू। पहाड़ में खेती आसान नहीं थी। सीढ़ीदार खेतों में महीनों की मेहनत के बाद जब धान या मंडुवा की फसल घर आती थी, तब उसका अंतिम रूप गंज्याली ही देती थी। धान को ओखली में डालकर गंज्याली से कूटा जाता, जिससे उसका छिलका अलग होता और शु( चावल तैयार होता। मंडुवा और झंगोरा भी इसी प्रक्रिया से साफ किए जाते थे। यह पूरी प्रक्रिया धैर्य, ताकत और अनुभव मांगती थी। गंज्याली का सबसे गहरा रिश्ता पहाड़ की महिलाओं से था। सुबह घर के काम शुरू होने से पहले वह ओखली के पास पहुंच जाती थीं। कई बार दो महिलाएं आमने-सामने खड़ी होकर बारी-बारी से गंज्याली चलाती थीं। दोनों की थाप में इतना तालमेल होता था कि एक पल की चूक भी नहीं होती। इस दौरान वह गढ़वाली और कुमाऊंनी लोकगीत गातीं, सुख-दुख साझा करतीं और गांव-समाज की बातें भी करतीं। इस तरह ओखली केवल अनाज कूटने की जगह नहीं, बल्कि सामाजिक संवाद का केंद्र भी बन जाती थी। बुजुर्ग बताते हैं कि गंज्याली से कूटा गया चावल मशीन से निकले चावल की तुलना में अधिक स्वादिष्ट होता था। उसमें अनाज का प्राकृतिक स्वाद और पौष्टिकता बनी रहती थी। यही कारण था कि पहाड़ के लोगों का भोजन सादा होने के बावजूद बेहद पौष्टिक माना जाता था। आज भी कई बुजुर्ग मानते हैं कि मशीनों ने सुविधा तो दी, लेकिन स्वाद और परंपरा दोनों कहीं पीछे छूट गए। पहाड़ में किसी घर की समृ(ि का अंदाजा उसके आंगन से लगाया जाता था, जिस घर में मजबूत ओखली और अच्छी गंज्याली होती, उसे आत्मनिर्भर परिवार माना जाता था। उस समय बाजार पर निर्भरता बहुत कम थी। घर का अनाज घर में ही तैयार होता था और परिवार अपनी जरूरतें स्वयं पूरी करता था। समय के साथ बिजली से चलने वाली राइस मिलें, आटा चक्कियां और आधुनिक मशीनें गांव-गांव तक पहुंच गईं। अब कुछ ही मिनटों में वही काम हो जाता है, जिसके लिए पहले घंटों मेहनत करनी पड़ती थी। सुविधा बढ़ी, लेकिन गंज्याली की आवाज गांवों से धीरे-धीरे गायब हो गई। आज अधिकांश घरों में ओखली और गंज्याली या तो किसी कोने में रखी हैं या फिर पूरी तरह खत्म हो चुकी हैं। लोक संस्कृति के जानकार मानते हैं कि गंज्याली केवल एक उपकरण नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर है। इसे लोक संग्रहालयों, विद्यालयों, सांस्कृतिक मेलों और ग्रामीण पर्यटन से जोड़कर नई पीढ़ी तक पहुंचाने की जरूरत है। यदि गांवों में पारंपरिक अनाजों और जैविक खेती को बढ़ावा मिलेगा, तो गंज्याली जैसी विरासत भी फिर से सम्मान पा सकती है। आज जब पहाड़ के गांवों से पलायन बढ़ रहा है और पारंपरिक जीवनशैली तेजी से बदल रही है, तब गंज्याली की खामोशी बहुत कुछ कहती है। कभी जिसकी थाप से सुबह जागती थी, आज वह किसी पुराने घर के आंगन में चुपचाप खड़ी है। ऐसा लगता है मानो वह आने वाली पीढ़ियों से पूछ रही होकृक्या मेरी ठक-ठक अब हमेशा के लिए थम जाएगी? गंज्याली की आवाज भले ही धीमी पड़ गई हो, लेकिन उसकी हर चोट में आज भी पहाड़ की मिट्टी की खुशबू, मेहनतकश हाथों का पसीना, लोकगीतों की मिठास और आत्मनिर्भर उत्तराखंड की पूरी कहानी जीवित है। यही गंज्याली की सबसे बड़ी पहचान है और यही उसकी सबसे अमूल्य विरासत।

बुधवार, 17 जून 2026

अतिथि देवो भवः की संस्कृति पर चोट

पर्यटकों और श्र(ालुओं की गुंडागर्दी से आहत हो गई है देवभूमि चारधाम यात्रा और पर्यटन सीजन में बढ़ रहे दुर्व्यवहार के मामले स्थानीय के साथ मारपीट, अभद्रता और दबंगई की घटनाएं बढ़ी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो बढ़ा रहे सभी की चिंता सरकार और प्रशासन पर समय रहते सख्ती नहीं करने के आरोप देहरादून। सदियों से अपनी सरलता, सहनशीलता और अतिथि देवो भवः की परंपरा के लिए पहचाने जाने वाले पहाड़ के लोग आज भीतर ही भीतर रो रहे हैं, जिन पहाड़ों ने देश-दुनिया से आने वाले पर्यटकों और श्र(ालुओं का खुले दिल से स्वागत किया, वहीं अब कई जगहों पर स्थानीय लोग खुद को असुरक्षित और अपमानित महसूस कर रहे हैं। चारधाम यात्रा और पर्यटन सीजन के दौरान लगातार सामने आ रही घटनाएं इस बात का संकेत हैं कि देवभूमि का धैर्य अब जवाब देने लगा है। उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में आए दिन ऐसे मामले सामने आ रहे हैं, जहां बाहरी राज्यों से आए कुछ पर्यटक और श्र(ालु स्थानीय लोगों के साथ अभद्र व्यवहार करते दिखाई दे रहे हैं। कहीं सड़क पर विवाद के दौरान मारपीट हो रही है तो कहीं होटल, ढाबों और टैक्सी चालकों के साथ बदसलूकी की घटनाएं सामने आ रही हैं। कई मामलों में महिलाओं और बुजुर्गों तक के साथ दुर्व्यवहार के आरोप लगे हैं। उत्तराखंड की संस्कृति हमेशा से मेहमानों के सम्मान की रही है। पहाड़ के लोग अपने सीमित संसाधनों के बावजूद यात्रियों की मदद के लिए आगे आते रहे हैं। आपदा हो या यात्रा का कठिन रास्ता, स्थानीय लोग हमेशा सहारा बनते रहे हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में पर्यटन के बढ़ते दबाव के साथ व्यवहार में भी बदलाव देखने को मिला है। स्थानीय लोगों का कहना है कि बड़ी संख्या में आने वाले कुछ पर्यटक पहाड़ को पर्यटन स्थल नहीं बल्कि मौज-मस्ती का मैदान समझने लगे हैं। शराब पीकर हुड़दंग, ट्रैफिक नियमों की अनदेखी, धार्मिक स्थलों की मर्यादा का उल्लंघन और स्थानीय लोगों के साथ अभद्रता जैसी घटनाएं आम होती जा रही हैं। चारधाम यात्रा को आस्था का सबसे बड़ा पर्व माना जाता है। हर साल लाखों श्र(ालु बाबा केदार, बदरीविशाल, हेमकुंड, गंगोत्री और यमुनोत्री के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। लेकिन हाल के वर्षों में यात्रा मार्गों पर कई बार श्र(ालुओं और स्थानीय लोगों के बीच विवाद की खबरें सामने आई हैं। स्थानीय व्यापारियों, टैक्सी चालकों और होटल संचालकों का कहना है कि कुछ लोग यात्रा पर श्र(ा से कम और दबंगई के प्रदर्शन के लिए अधिक आते दिखाई देते हैं। मामूली बातों पर गाली-गलौज और मारपीट तक की नौबत आ जाती है। पहले ऐसी घटनाएं स्थानीय स्तर तक सीमित रह जाती थीं, लेकिन अब मोबाइल कैमरों और सोशल मीडिया ने पूरी तस्वीर सामने ला दी है। आए दिन ऐसे वीडियो वायरल हो रहे हैं जिनमें पर्यटकों और स्थानीय लोगों के बीच झगड़े, सड़क पर हंगामा और कानून व्यवस्था की धज्जियां उड़ती दिखाई देती हैं। इन वीडियो के बाद प्रदेशभर में यह बहस तेज हो गई है कि आखिर देवभूमि की गरिमा को बचाने के लिए क्या किया जा रहा है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि सरकार पर्यटन और यात्रा के आंकड़ों को लेकर तो उत्साहित दिखाई देती है, लेकिन उससे जुड़ी चुनौतियों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा। पर्यटन बढ़ने के साथ कानून व्यवस्था, ट्रैफिक नियंत्रण और स्थानीय लोगों की सुरक्षा के लिए ठोस व्यवस्था की जरूरत है। कई सामाजिक संगठनों का कहना है कि यदि समय रहते सख्त नियम नहीं बनाए गए तो स्थानीय लोगों में असंतोष बढ़ सकता है। उनका मानना है कि उत्तराखंड केवल पर्यटन उद्योग नहीं बल्कि लाखों लोगों का घर भी है और उनकी गरिमा तथा सुरक्षा सर्वाेच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। पर्यटन उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। हजारों परिवारों की आजीविका पर्यटन और यात्रा सीजन पर निर्भर है। यही कारण है कि कई बार अपमान और दुर्व्यवहार झेलने के बावजूद स्थानीय लोग खुलकर विरोध नहीं कर पाते। उन्हें डर रहता है कि कहीं उनकी रोजी-रोटी प्रभावित न हो जाए। लेकिन अब हालात ऐसे बनते जा रहे हैं कि पहाड़ की खामोशी के पीछे गहरा आक्रोश दिखाई देने लगा है। विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तराखंड में पर्यटन और तीर्थाटन का स्वागत होना चाहिए, लेकिन इसके साथ अनुशासन और जवाबदेही भी जरूरी है। जो लोग देवभूमि में आते हैं, उन्हें यहां की संस्कृति, परंपराओं और स्थानीय समाज का सम्मान करना होगा। उत्तराखंड केवल पहाड़, नदियां और मंदिर नहीं है। यह उन लोगों की भूमि है जिन्होंने सदियों से इन पहाड़ों को जिंदा रखा है। यदि स्थानीय लोगों का सम्मान और सुरक्षा खतरे में पड़ती है तो इसका असर केवल समाज पर नहीं बल्कि पर्यटन और तीर्थाटन की पूरी व्यवस्था पर पड़ेगा। आज पहाड़ मानो सरकार, प्रशासन और समाज से एक ही सवाल पूछ रहा है।कृ

नीट की ‘दौड़’ में टूट रहे ‘सपने’

देहरादून में मेधावी छात्रा की आत्महत्या ने खड़े किए कई सवाल छात्रा ने सुसाइड नोट में नीट में अच्छी रैंक आने का किया जिक्र सफलता के बाद भी तनाव में जी रहे हजारों मेधावी छात्र-छात्राएं परीक्षाओं के दबाव और मानसिक स्वास्थ्य पर फिर छिड़ी बहस विशेषज्ञ बोले, रैंक व अंकों से ज्यादा जरूरी है मानसिक संतुलन देहरादून। डाक्टर बनने का सपना लेकर लाखों छात्र हर वर्ष राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा ‘नीट’ में बैठते हैं। इस परीक्षा को देश की सबसे कठिन और प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं में गिना जाता है। एक-एक अंक और एक-एक रैंक भविष्य का रास्ता तय करती है। लेकिन इस प्रतियोगिता की चमक के पीछे एक ऐसी दुनिया भी है जहां तनाव, चिंता, अवसाद और असुरक्षा का अंधेरा लगातार गहराता जा रहा है। देहरादून के पटेलनगर क्षेत्र में एक मेधावी छात्रा द्वारा आत्महत्या की घटना ने पूरे समाज को झकझोर दिया है। पुलिस को मिले सुसाइड नोट में छात्रा ने नीट में अच्छी रैंक प्राप्त होने का उल्लेख किया है। यह तथ्य अपने आप में कई गंभीर सवाल खड़े करता है। आमतौर पर माना जाता है कि अच्छी रैंक और सफलता मिलने के बाद छात्रों की परेशानियां समाप्त हो जाती हैं, लेकिन यह घटना बताती है कि वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल है। यह मामला केवल एक छात्रा की दुखद मौत का नहीं, बल्कि उस मानसिक दबाव का प्रतीक बन गया है, जिससे देशभर के लाखों छात्र गुजर रहे हैं। मेडिकल और इंजीनियरिंग जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता की होड़ ने बच्चों की जिंदगी को किताबों, टेस्ट सीरीज और रैंकिंग तक सीमित कर दिया है। बचपन और युवावस्था का बड़ा हिस्सा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में गुजर जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि कई बार छात्र परीक्षा पास करने के बाद भी मानसिक दबाव से मुक्त नहीं हो पाते। अच्छी रैंक आने के बावजूद पसंदीदा कालेज मिलने की चिंता, भविष्य को लेकर अनिश्चितता, परिवार और समाज की अपेक्षाएं तथा लगातार बेहतर प्रदर्शन करने का दबाव उन्हें भीतर ही भीतर परेशान करता रहता है। मनोवैज्ञानिक बताते हैं कि कई छात्र अपनी भावनाओं को परिवार और मित्रों के साथ साझा नहीं कर पाते। बाहर से वह सामान्य और सफल दिखाई देते हैं, लेकिन भीतर गहरी चिंता और अकेलेपन से जूझ रहे होते हैं। ऐसे मामलों में समय रहते संवाद और सहयोग नहीं मिलने पर स्थिति गंभीर हो सकती है। पिछले एक दशक में देशभर में कोचिंग संस्कृति तेजी से बढ़ी है। लाखों छात्र घर-परिवार से दूर रहकर वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। सुबह से रात तक पढ़ाई, टेस्ट, रैंकिंग और प्रतिस्पर्धा का माहौल मानसिक दबाव को बढ़ाता है। शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि छात्रों का मूल्यांकन केवल अंकों और रैंक के आधार पर किया जाना भी समस्या का बड़ा कारण है। जब सफलता को केवल एक परीक्षा से जोड़ दिया जाता है, तो छात्र असफलता या अनिश्चितता को स्वीकार नहीं कर पाते। समाज में डाक्टर और इंजीनियर बनने को आज भी प्रतिष्ठा से जोड़कर देखा जाता है। कई बार अभिभावक अनजाने में बच्चों पर अत्यधिक अपेक्षाओं का बोझ डाल देते हैं। बच्चे परिवार की उम्मीदों पर खरा उतरने के लिए अपनी भावनाओं को दबा लेते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अभिभावकों को बच्चों के अंकों और रैंक से अधिक उनकी मानसिक स्थिति पर ध्यान देना चाहिए। यदि बच्चा तनाव, चिंता या उदासी के संकेत दे रहा हो तो उसे गंभीरता से लेना आवश्यक है। देहरादून, हल्द्वानी और अन्य शहरों में बड़ी संख्या में छात्र प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं। शिक्षा के बढ़ते केंद्रों के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य की चुनौतियां भी सामने आ रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि स्कूलों, कालेजों और कोचिंग संस्थानों में नियमित काउंसलिंग व्यवस्था अनिवार्य की जानी चाहिए ताकि छात्र अपनी समस्याओं को खुलकर साझा कर सकें। पटेलनगर की यह घटना केवल एक परिवार का दर्द नहीं है। यह उस व्यवस्था पर भी सवाल है जिसमें बच्चों की सफलता को उनकी रैंक से मापा जाता है, लेकिन उनके मानसिक संघर्षों को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। यह समय शिक्षा व्यवस्था, अभिभावकों, शिक्षकों और समाज के लिए आत्ममंथन का है। यदि हम केवल परिणामों पर ध्यान देंगे और बच्चों की भावनाओं को नहीं समझेंगे, तो ऐसी दुखद घटनाएं चिंता का विषय बनी रहेंगी। आज जरूरत इस बात की है कि प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों को यह भरोसा दिया जाए कि उनकी पहचान केवल एक परीक्षा, एक रैंक या एक परिणाम से नहीं है। उनका जीवन, उनका आत्मविश्वास और उनका मानसिक स्वास्थ्य किसी भी परीक्षा से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।

सरकारी ‘नाकामी’ ने छीनी एक ‘उम्मीद’

नीट विवाद की भेंट चढ़ी देहरादून की एक होनहार जिंदगी नीट विवाद में घिरा सिस्टम, सवालों के घेरे में सरकार देहरादून की छात्रा की मौत ने खड़े किए कई सवाल सुसाइड नोट में अच्छी तैयारी और रैंक की उम्मीद सरकार की नाकामी और कीमत चुका रहे ‘बच्चे’ देहरादून। देहरादून में नीट की तैयारी कर रही छात्रा की मौत ने केंद्र सरकार और परीक्षा व्यवस्था को कठघरे में खड़ा कर दिया है। बताया जा रहा है कि छात्रा ने अपने सुसाइड नोट में लिखा था कि उसने नीट परीक्षा की अच्छी तैयारी की थी और उसे अच्छी रैंक आने की पूरी उम्मीद थी। लेकिन जिस परीक्षा व्यवस्था पर उसने भरोसा किया, वही व्यवस्था विवादों और अनिश्चितताओं में उलझ गई। यह घटना केवल एक छात्रा की मौत नहीं है, बल्कि उस सरकारी व्यवस्था पर सवाल है जो करोड़ों युवाओं के भविष्य की जिम्मेदारी संभालने का दावा करती है। जब छात्र सालों तक दिन-रात मेहनत करते हैं, परिवार अपनी जमा पूंजी बच्चों की पढ़ाई पर खर्च करता है और फिर परीक्षा की निष्पक्षता पर ही सवाल खड़े हो जाते हैं, तो सबसे बड़ा धोखा उन युवाओं के साथ होता है जिन्होंने ईमानदारी से मेहनत की होती है। देश में पिछले कुछ वर्षों में भर्ती परीक्षाओं से लेकर प्रवेश परीक्षाओं तक पेपर लीक की घटनाएं लगातार सामने आती रही हैं। हर बार सरकार जांच, कार्रवाई और सुधार के बड़े-बड़े दावे करती है, लेकिन जमीनी हकीकत नहीं बदलती। नीट जैसे देश के सबसे महत्वपूर्ण मेडिकल प्रवेश परीक्षा में भी विवाद सामने आना इस बात का प्रमाण है कि सरकार परीक्षा प्रणाली को सुरक्षित और विश्वसनीय बनाने में पूरी तरह सफल नहीं रही है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि परीक्षा प्रणाली में सेंध लगती है तो उसकी सजा छात्रों को क्यों भुगतनी पड़ती है? आखिर उन अधिकारियों और एजेंसियों की जवाबदेही कब तय होगी जिनकी जिम्मेदारी परीक्षा को निष्पक्ष तरीके से संपन्न कराना है? देहरादून की छात्रा के सुसाइड नोट की पंक्तियांकृमैंने अच्छी तैयारी की थी, मुझे अच्छी रैंक आने की उम्मीद थीकृसरकारी दावों की पोल खोलती नजर आती हैं। यह केवल एक छात्रा की पीड़ा नहीं, बल्कि लाखों युवाओं की आवाज है जो आज यह महसूस कर रहे हैं कि उनकी मेहनत व्यवस्था की खामियों के सामने बेबस है। सरकार लगातार युवाओं को देश का भविष्य बताती है, लेकिन जब वही युवा परीक्षा विवादों, बेरोजगारी और अनिश्चितता से जूझ रहे हों तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर युवाओं की चिंता प्राथमिकता में क्यों नहीं है? बता दें कि नीट देश की सबसे बड़ी प्रवेश परीक्षाओं में से एक है, जिसमें हर साल लाखों विद्यार्थी डाक्टर बनने का सपना लेकर शामिल होते हैं। वर्ष 2026 में भी 22 लाख से अधिक अभ्यर्थियों ने परीक्षा दी थी, लेकिन पेपर लीक के आरोपों के बाद परीक्षा रद्द कर दी गई और दोबारा परीक्षा कराने का फैसला लिया गया। इस निर्णय ने छात्रों को मानसिक रूप से झकझोर दिया। महीनों की मेहनत, आर्थिक खर्च और भावनात्मक दबाव के बाद छात्रों को फिर उसी प्रक्रिया से गुजरना पड़ रहा है। एक मेडिकल छात्र बनने का सपना केवल छात्र का नहीं होता, बल्कि पूरे परिवार की उम्मीदें उससे जुड़ी होती हैं। कई परिवार अपनी आर्थिक सीमाओं को पार कर बच्चों को कोचिंग और पढ़ाई के बेहतर अवसर उपलब्ध कराते हैं। ऐसे में जब परीक्षा की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं या परीक्षा रद्द होती है, तो सबसे बड़ा आघात उन छात्रों को पहुंचता है जिन्होंने ईमानदारी से तैयारी की होती है। देहरादून की छात्रा के सुसाइड नोट में लिखे शब्दकृमैंने अच्छी तैयारी की थी, मुझे अच्छी रैंक की उम्मीद थी आज पूरे देश के छात्रों की पीड़ा को सामने ला रहे हैं। यह सवाल उठ रहा है कि आखिर छात्रों की मेहनत का मूल्य कौन चुकाएगा? किसी भी लोकतंत्र में सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी नागरिकों का भरोसा बनाए रखना होती है। लेकिन जब करोड़ों छात्रों के भविष्य से जुड़ी परीक्षाओं पर बार-बार सवाल उठें, जब मेहनती छात्र निराशा में डूबने लगें और जब एक छात्रा अपने नोट में अपनी मेहनत और उम्मीदों का जिक्र करके दुनिया से विदा हो जाए, तब यह केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं रह जाती, बल्कि शासन और व्यवस्था की विफलता का प्रतीक बन जाती है। आज देश जानना चाहता है कि परीक्षा प्रणाली की खामियों की जिम्मेदारी कौन लेगा? कितने और युवाओं के सपने टूटेंगे? और आखिर कब सरकार ऐसी व्यवस्था दे पाएगी जिस पर छात्रों को पूरा भरोसा हो सके? बाक्स जवाबदेही पर उठ रहे सवाल सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि पेपर लीक हुआ तो जिम्मेदार कौन है? यदि परीक्षा की गोपनीयता नहीं बचाई जा सकती तो इसकी कीमत छात्रों को क्यों चुकानी पड़ रही है? अभिभावकों का कहना है कि हर बार जांच, कमेटी और कार्रवाई की बात होती है, लेकिन व्यवस्था में स्थायी सुधार दिखाई नहीं देता। पेपर लीक की घटनाएं अब अपवाद नहीं बल्कि एक गंभीर राष्ट्रीय समस्या बनती जा रही हैं। सरकार और एजेंसियों के सामने बड़ी चुनौती केंद्र सरकार और परीक्षा एजेंसियों ने परीक्षा प्रक्रिया को अधिक सुरक्षित बनाने तथा दोबारा परीक्षा के लिए अतिरिक्त इंतजाम करने की घोषणा की है। परीक्षा अवधि बढ़ाने, प्रश्न पुस्तिका में बदलाव और सुरक्षा उपायों को मजबूत करने जैसे कदम उठाए गए हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या इन उपायों से छात्रों का टूटा हुआ भरोसा वापस आ पाएगा?

गांवों से लेकर सोशल मीडिया तक ‘सियासी जंग’

चुनाव में अभी समय, लेकिन मैदान में उतर चुके हैं दोनों दलों के कार्यकर्ता भाजपा सरकार की उपलब्धियों के सहारे, कांग्रेस जनमुद्दों के सहारे बना रही रणनीति बेरोजगारी, पलायन, महंगाई और विकास के मुद्दों पर तेज होगी 2027 की जंग देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 में अभी डेढ़ वर्ष से अधिक का समय शेष है, लेकिन सियासी दलों ने चुनावी रण की तैयारियां अभी से शुरू कर दी हैं। सत्ता में बैठी भाजपा और विपक्षी कांग्रेस दोनों ही गांव की चौपालों, कस्बों की बैठकों, सोशल मीडिया अभियानों और संगठनात्मक गतिविधियों के जरिए अपनी-अपनी जमीन मजबूत करने में जुट गई हैं। प्रदेश की राजनीति में अब हर कार्यक्रम, हर दौरा और हर बयान को चुनावी नजरिए से देखा जाने लगा है। भाजपा जहां लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी का इतिहास रचने की तैयारी कर रही है, वहीं कांग्रेस दस साल के सत्ता वनवास को समाप्त करने के लिए पूरी ताकत झोंकने की रणनीति पर काम कर रही है। यही वजह है कि दोनों दलों के नेता गांव-गांव पहुंच रहे हैं और संगठन को बूथ स्तर तक सक्रिय करने में लगे हैं। सत्तारूढ़ भाजपा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में विकास कार्यों, निवेश, सड़क, रेल, हवाई कनेक्टिविटी, समान नागरिक संहिता और धार्मिक पर्यटन जैसे मुद्दों को जनता के बीच ले जाने की तैयारी में है। प्रदेश संगठन भी बूथ सशक्तिकरण अभियान पर जोर दे रहा है। पार्टी का लक्ष्य है कि प्रत्येक बूथ पर कार्यकर्ताओं का मजबूत नेटवर्क तैयार किया जाए। भाजपा नेताओं का मानना है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में मिली सफलता का लाभ 2027 में भी मिल सकता है, यदि संगठन को जमीनी स्तर पर और मजबूत किया जाए। इसी रणनीति के तहत केंद्रीय नेताओं, प्रदेश प्रभारी और संगठन के वरिष्ठ पदाधिकारियों के लगातार उत्तराखंड दौरे हो रहे हैं। जिलों और मंडलों में बैठकों का सिलसिला तेज हो गया है। पार्टी विशेष रूप से उन क्षेत्रों पर ध्यान दे रही है, जहां पिछले चुनावों में जीत का अंतर कम रहा था। दूसरी ओर कांग्रेस बेरोजगारी, महंगाई, पेपर लीक, पलायन, स्वास्थ्य सुविधाओं और स्थानीय युवाओं के रोजगार जैसे मुद्दों को लेकर भाजपा सरकार को घेरने की रणनीति पर काम कर रही है। कांग्रेस नेतृत्व का मानना है कि प्रदेश में एंटी-इंकम्बेंसी का लाभ उसे मिल सकता है। इसी कारण पार्टी नेताओं को जनता के बीच जाने और जनसंवाद बढ़ाने के निर्देश दिए जा रहे हैं। प्रदेश प्रभारी से लेकर प्रदेश अध्यक्ष तक लगातार जिलों का दौरा कर संगठन को सक्रिय करने में जुटे हैं। कांग्रेस की चुनौती केवल भाजपा से मुकाबला करना नहीं है, बल्कि अपने भीतर की गुटबाजी को नियंत्रित रखना भी है। पार्टी नेतृत्व जानता है कि यदि संगठन एकजुट रहा तो मुकाबला अधिक प्रभावी हो सकता है। उत्तराखंड के चुनावों में हमेशा गांव और ग्रामीण मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं। यही कारण है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों का फोकस गांवों की चौपालों पर है। नेता अब शहरों से निकलकर दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों की पगडंडियां नाप रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में बैठकों, जनसंपर्क अभियानों और स्थानीय मुद्दों को उठाने का सिलसिला तेज हो गया है। सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल और पलायन जैसे मुद्दे चुनावी बहस के केंद्र में दिखाई देने लगे हैं। विधानसभा चुनाव 2027 में सोशल मीडिया की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण रहने वाली है। भाजपा और कांग्रेस दोनों डिजिटल प्लेटफार्म पर अपनी मौजूदगी मजबूत करने में लगी हैं। व्हाट्सएप ग्रुप, फेसबुक पेज, यूट्यूब चैनल और इंस्टाग्राम के जरिए मतदाताओं तक पहुंचने की रणनीति बनाई जा रही है। राजनीतिक दल अब केवल रैलियों और सभाओं पर निर्भर नहीं रहना चाहते, बल्कि मोबाइल स्क्रीन तक अपनी पहुंच सुनिश्चित करना चाहते हैं। दोनों दलों के सामने एक बड़ी चुनौती अपने नाराज नेताओं और कार्यकर्ताओं को साथ रखने की भी है। भाजपा और कांग्रेस दोनों में ऐसे नेता हैं जो टिकट और संगठनात्मक जिम्मेदारियों को लेकर असंतुष्ट रहे हैं। चुनाव नजदीक आते ही डैमेज कंट्रोल की राजनीति भी तेज हो गई है। वरिष्ठ नेता लगातार संवाद स्थापित कर संगठन को एकजुट रखने की कोशिश कर रहे हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि 2027 का चुनाव विकास बनाम जनमुद्दों की लड़ाई के रूप में सामने आ सकता है। भाजपा जहां अपनी उपलब्धियों और केंद्र-राज्य सरकार की योजनाओं को मुद्दा बनाएगी, वहीं कांग्रेस जनता से जुड़े सवालों को लेकर चुनावी मैदान में उतरेगी। हालांकि चुनाव में अभी समय है, लेकिन उत्तराखंड की राजनीति में चुनावी बिगुल बज चुका है। गांव की चौपाल से लेकर सोशल मीडिया तक दोनों दलों ने अपनी-अपनी बिसात बिछानी शुरू कर दी है। आने वाले महीनों में राजनीतिक गतिविधियां और तेज होंगी और प्रदेश की जनता के बीच वादों, दावों और आरोप-प्रत्यारोपों का दौर भी बढ़ेगा।