सोमवार, 3 अगस्त 2026

udaydinmaan: कुदरत को ‘माल’ समझने वालों आंखें खोलो

udaydinmaan: कुदरत को ‘माल’ समझने वालों आंखें खोलो: दुनिया को बचाने का रास्ता गुजरता है हिमालय की देव संस्कृति से होकर गढ़वाल, कुमाऊँ और हिमाचल की देव संस्कृति है सदियों से यहां की आस्था हजार...

udaydinmaan: कैमरे चालू, ट्रक मुस्तैद और तमाशा

udaydinmaan: कैमरे चालू, ट्रक मुस्तैद और तमाशा: अतिक्रमण हटाओ अभियान सहूलियत या सिर्फ कैमरों वाला छलावा अवैध कब्जे से ज्यादा प्रशासनिक नूराकुश्ती से लाचार हुआ देहरादून जब तक अफसर मेहरबान र...

udaydinmaan: कागजों में ‘सेवक’ और मंचों पर ‘महाराज’

udaydinmaan: कागजों में ‘सेवक’ और मंचों पर ‘महाराज’: स्वागत भाषणों में समय स्वाहा, पहाड़ के दर्द सुनने की नेताओं को फुर्सत ही नहीं सुर्खियों की राजनीति छोड़िए, मेघालय माडल अपनाकर नीयत साफ कीजिए स...

कागजों में ‘सेवक’ और मंचों पर ‘महाराज’

स्वागत भाषणों में समय स्वाहा, पहाड़ के दर्द सुनने की नेताओं को फुर्सत ही नहीं सुर्खियों की राजनीति छोड़िए, मेघालय माडल अपनाकर नीयत साफ कीजिए सरकार उत्तराखंड में नेताओं के स्वागत में फिजूलखर्च, समस्याओं पर आज भी पसरा है सन्नाटा माला नहीं, जनता का होगासम्मान, मेघालय सरकार का फैसला बन गया है मिसाल देहरादून। पहले एक खबर बनी। फिर एक आदेश आया और अब उस आदेश ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया हैकृक्या लोकतंत्र में जनता सबसे ऊपर है या फिर मंच पर बैठे वीआईपी? मेघालय सरकार ने वीआईपी संस्कृति पर ऐसा फैसला लिया है, जिसकी चर्चा पूरे देश में हो रही है। अब वहां किसी भी सरकारी कार्यक्रम में मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री, मंत्री, विधायक या अन्य जनप्रतिनिधियों का औपचारिक अभिनंदन, शॉल ओढ़ाने, माला पहनाने और स्मृति चिन्ह देने जैसी परंपरा नहीं होगी। इसके बजाय कार्यक्रमों में आम नागरिकोंकृकिसान, शिक्षक, महिला समूह, युवा, सामाजिक कार्यकर्ता या किसी स्थानीय उपलब्धि हासिल करने वाले व्यक्तिकृको सम्मानित किया जाएगा और उन्हें अपनी बात रखने का अवसर मिलेगा। मेघालय सरकार का तर्क साफ है कि सरकारी कार्यक्रम जनता के टैक्स के पैसे से होते हैं। इसलिए उनका केंद्र भी जनता ही होनी चाहिए, न कि मंच पर बैठे नेता। सरकारी आयोजन विकास कार्यों की समीक्षा, योजनाओं की जानकारी और लोगों की समस्याओं के समाधान के लिए होने चाहिए, न कि नेताओं के स्वागत-सत्कार के लिए। यह फैसला केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि सरकारी संस्कृति बदलने की कोशिश माना जा रहा है। अब प्रश्न उठता है कि क्या उत्तराखंड भी ले सकता है ऐसा फैसला? देवभूमि उत्तराखंड में शायद ही कोई सरकारी कार्यक्रम ऐसा होता हो, जहां मंच पर नेताओं के स्वागत में फूल-मालाओं की कतार न लगी हो। कई बार कार्यक्रम का बड़ा हिस्सा स्वागत भाषण, शाल ओढ़ाने और स्मृति चिन्ह देने में ही निकल जाता है। जनता घंटों इंतजार करती रहती है कि आखिर उनकी समस्या पर कब बात होगी। अगर मेघालय की तरह उत्तराखंड में भी ऐसा आदेश लागू हो जाए तो तस्वीर काफी बदल सकती है। क्या बदल सकता है? सरकारी कार्यक्रमों में समय की बचत होगी, मंच पर नेताओं के बजाय जनता की उपलब्धियों को सम्मान मिलेगा और गांव की महिला, सैनिक परिवार, किसान, शिक्षक और युवा मंच के केंद्र में होंगे। अधिकारियों का फोकस स्वागत व्यवस्था से हटकर योजनाओं के क्रियान्वयन पर होगा। जनता और सरकार के बीच संवाद बढ़ेगा। उत्तराखंड के सरकारी कार्यक्रमों में अक्सर देखने को मिलता हैकृकि मंच पर लंबी कुर्सियों की कतार,स्वागत के लिए कई-कई संस्थाओं की लाइन,दर्जनों मालाएं और शाल,नेताओं के लंबे भाषण और अंत में जनता के सवाल पूछने का समय ही खत्म। कई बार तो किसी योजना के शुभारंभ से ज्यादा चर्चा स्वागत समारोह की होती है। ऐसे में मेघालय का माडल उत्तराखंड के लिए भी एक नई सोच पेश करता है। सरकारी कार्यक्रमों का खर्च जनता के टैक्स से चलता है। यदि उसी पैसे से नेताओं का स्वागत, स्मृति चिन्ह, फूल-मालाएं और औपचारिक आयोजन किए जाएं, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह खर्च वास्तव में आवश्यक है? अगर यही राशि किसी विद्यालय, अस्पताल, पुस्तकालय, आंगनबाड़ी, महिला समूह या छात्रवृत्ति पर खर्च हो, तो उसका सीधा लाभ समाज को मिलेगा। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 करीब हैं। ऐसे समय में यदि राज्य सरकार भी मेघालय जैसी पहल करती है, तो यह केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं बल्कि एक बड़ा राजनीतिक संदेश होगा कि सरकार वास्तव में वीआईपी संस्कृति खत्म करना चाहती है। यह कदम विपक्ष और सत्ताकृदोनों के लिए एक परीक्षा भी होगा। क्योंकि मंच पर सम्मान पाने की परंपरा किसी एक दल तक सीमित नहीं रही है। उत्तराखंड के लोग वर्षों से पलायन, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और पेयजल जैसे मुद्दों पर जवाब चाहते हैं। ऐसे में यदि सरकारी कार्यक्रमों का केंद्र जनता बन जाए, तो लोकतंत्र की भावना और मजबूत होगी। आखिर लोकतंत्र में सबसे बड़ा वीआईपी कौन होना चाहिएकृमंत्री या मतदाता? मेघालय सरकार का फैसला केवल माला हटाने का आदेश नहीं है, बल्कि शासन की प्राथमिकताओं को बदलने का प्रयास है। यदि उत्तराखंड भी इस माडल को अपनाता है, तो सरकारी कार्यक्रमों की संस्कृति में बड़ा बदलाव आ सकता है। नेताओं के स्वागत की जगह यदि किसी सीमांत गांव की महिला, किसी सरकारी स्कूल के मेधावी छात्र, किसी सैनिक की शहादत देने वाले परिवार, किसी नवाचारी किसान या आपदा में उत्कृष्ट कार्य करने वाले स्वयंसेवक का सम्मान हो, तो लोकतंत्र की असली तस्वीर सामने आएगी। सवाल अब यही हैकृक्या उत्तराखंड भी वीआईपी संस्कृति से आगे बढ़कर जनता ही सबसे बड़ा सम्मान का संदेश देने का साहस दिखाएगा, या फिर सरकारी मंचों पर फूल-मालाओं और औपचारिक अभिनंदन की परंपरा पहले की तरह जारी रहेगी?

कैमरे चालू, ट्रक मुस्तैद और तमाशा

अतिक्रमण हटाओ अभियान सहूलियत या सिर्फ कैमरों वाला छलावा अवैध कब्जे से ज्यादा प्रशासनिक नूराकुश्ती से लाचार हुआ देहरादून जब तक अफसर मेहरबान रहेंगे, तब तक कैसे खाली होंगे फुटपाथ राजधानी दून में फुटपाथ पर कब्जे की वापसी हर बार होती है तेज से देहरादून। देहरादून में फिर अतिक्रमण हटाओ अभियान चल रहा है। फुटपाथ खाली कराए जा रहे हैं। दुकानों के बाहर रखा सामान ट्रकों में भरा जा रहा है। नगर निगम के अधिकारी कैमरों के सामने खड़े होकर बता रहे हैं कि शहर को अतिक्रमण मुक्त बनाया जा रहा है। कुछ दिन तक सड़कें चौड़ी दिखाई देंगी। लोग कहेंगे, वाह, अब ट्रैफिक सुधर जाएगा। लेकिन जरा ठहरिए...एक महीना बाद उसी सड़क से गुजरिए। वही फुटपाथ फिर सामान से भर जाएंगे। वही ठेले, वही बोर्ड, वही टीन शेड, वही पार्किंग और वही कब्जा। फिर अगले साल यही अभियान चलेगा। फिर वही तस्वीरें, वही प्रेस विज्ञप्ति और वही दावाकृअतिक्रमण हटा दिया गया। सवाल यह नहीं है कि अतिक्रमण हटाया गया या नहीं। सवाल यह है कि अतिक्रमण हटता क्यों नहीं, सिर्फ हटाया क्यों जाता है? यानी बीमारी का इलाज नहीं, केवल बुखार नापने की रस्म निभाई जा रही है। अब प्रश्न उठता है कि क्या फुटपाथ पर बैठा छोटा दुकानदार?क्या फल बेचने वाला गरीब? क्या ठेले वाला? या फिर वह पूरा तंत्र जो सालों तक अवैध कब्जे को बढ़ने देता है और फिर अचानक बुलडोजर लेकर पहुंच जाता है? अगर किसी दुकान ने दो-दो, तीन-तीन फुट तक सरकारी जमीन घेर ली, तो यह एक दिन में नहीं हुआ होगा। यह महीनों और वर्षों में हुआ होगा। तब नगर निगम कहां था? तब नोटिस क्यों नहीं दिए गए?तब कार्रवाई क्यों नहीं हुई?और अगर कार्रवाई हुई थी तो फिर कब्जा दोबारा कैसे हो गया? यानी शहर में अतिक्रमण से बड़ा सवाल प्रशासनिक अतिक्रमण का है। जहां जिम्मेदारी पर लापरवाही ने कब्जा कर लिया है। अब देहरादून में अतिक्रमण हटाओ अभियान भी एक सरकारी मौसम बन चुका है।जैसे बरसात आती है। जैसे सर्दियां आती हैं। वैसे ही बुलडोजर भी आता है। मीडिया कवरेज होती है। कुछ तस्वीरें वायरल होती हैं। कुछ अधिकारी सम्मानित हो जाते हैं। फिर सब कुछ सामान्य हो जाता है। अगर अभियान के बाद दोबारा कब्जा हो जाता है, तो इसका मतलब साफ है कि कार्रवाई अधूरी थी। यही सबसे बड़ा सवाल है। जब फुटपाथ पर ठेला लगता है, तो बुलडोजर तुरंत पहुंच जाता है। लेकिन जब किसी बड़े होटल का पार्किंग क्षेत्र सड़क तक फैल जाता है...जब किसी बड़े शोरूम की सीढ़ियां सरकारी जमीन पर बन जाती हैं..जब किसी प्रभावशाली व्यक्ति की बाउंड्री वाल आगे बढ़ जाती है...तब कार्रवाई की गति धीमी क्यों पड़ जाती है? कानून की आंख पर पट्टी इसलिए बांधी गई थी कि वह सबको बराबर देखे। लेकिन कई बार लगता है कि उस पट्टी के नीचे से पहचान भी झांक रही है। यह यक्ष प्रश्न है कि फुटपाथ दुकानों के विस्तार के लिए नहीं बने।फुटपाथ पैदल चलने वालों के लिए बने हैं।लेकिन देहरादून में कई जगह पैदल चलना ही सबसे मुश्किल काम है।क्योंकि फुटपाथ पर दुकान है। ठेला है। बाइक खड़ी है। कार पार्क है और जहां कुछ नहीं है, वहां निर्माण सामग्री रखी है। यानी पैदल चलने वाला नागरिक सड़क पर उतरता है। फिर सड़क पर ट्रैफिक बढ़ता है। फिर दुर्घटना होती है। फिर प्रशासन ट्रैफिक प्लान बनाता है। लेकिन फुटपाथ वापस पैदल यात्रियों को नहीं मिलते। कोई भी अवैध निर्माण बिना किसी की नजर के वर्षों तक खड़ा नहीं रह सकता। हर नया शेड...हर नया बोर्ड...हर नई दीवार...किसी न किसी की आंखों के सामने बनी होगी। अगर अधिकारी नहीं देख पाए, तो यह अक्षमता है। अगर देखकर भी नहीं बोले, तो यह सवाल जवाबदेही का है और अगर सब जानते थे, फिर भी चुप रहे, तो यह केवल अतिक्रमण नहीं, व्यवस्था की साझेदारी है। बुलडोजर समाधान नहीं है। समाधान हैकृ दोबारा कब्जा करने वालों पर भारी आर्थिक दंड, संबंधित क्षेत्र के जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय हो, हर अतिक्रमण क्षेत्र की डिजिटल मैपिंग हो, साप्ताहिक निरीक्षण अनिवार्य हो, प्रभावशाली और सामान्य नागरिक के लिए समान कानून लागू हो, रेहड़ी-फड़ी वालों के लिए नियोजित वेंडिंग ज़ोन विकसित किए जाएं, ताकि रोजगार भी बचे और सड़कें भी। जब तक कब्जा करने वाले से ज्यादा डर कार्रवाई करने वाले को रहेगा, तब तक अतिक्रमण लौटता रहेगा। बता दें कि देहरादून केवल राजधानी नहीं है, यह उत्तराखंड का चेहरा है। लेकिन शहर की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यहां अतिक्रमण हटाने का अभियान, अतिक्रमण रोकने की नीति से ज्यादा मजबूत दिखाई देता है। बुलडोजर की आवाज कुछ घंटों तक सुनाई देती है। लेकिन उसके बाद फिर धीरे-धीरे दुकानें बाहर आने लगती हैं। सामान फुटपाथ पर सजने लगता है। लोहे के स्टैंड वापस आ जाते हैं। तिरपाल फिर तन जाती है और शहर समझ जाता है कि अभियान खत्म हो गया है। शायद देहरादून को बुलडोजर से ज्यादा ईमानदार निगरानी की जरूरत है। क्योंकि सवाल अतिक्रमण का नहीं है। सवाल उस व्यवस्था का है जो हर साल वही गलती दोहराती है और फिर उसी गलती पर कार्रवाई करके अपनी पीठ थपथपाती है और तब लगता है कि देहरादून में सड़कों पर सबसे स्थायी चीज अतिक्रमण नहीं, बल्कि अस्थायी कार्रवाई है। यही इस शहर की सबसे बड़ी विडंबना है।

यूकेडी का 70 सीटों पर दांव

भाजपा और कांग्रेस के सियासी गणित में पड़ सकती है नई दरार यूकेडी की घोषणा से विस चुनाव में त्रिकोणीय मुकाबले के संकेत पहाड़ की राजनीति में फिर उठी क्षेत्रीय अस्मिता की दमदार आवाज देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति लंबे समय से भाजपा और कांग्रेस के इर्द-गिर्द घूमती रही है। लेकिन अब उत्तराखंड क्रांति दल ने आगामी विधानसभा चुनाव में सभी 70 सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान कर सियासी समीकरणों को नई दिशा देने की कोशिश की है। यह घोषणा ऐसे समय आई है जब भाजपा सत्ता बचाने और कांग्रेस सत्ता में वापसी की रणनीति बनाने में जुटी है। ऐसे में यूकेडी का मैदान में पूरी ताकत के साथ उतरना दोनों राष्ट्रीय दलों के लिए नई चुनौती बन सकता है। हालांकि सवाल यह भी है कि क्या यूकेडी सिर्फ चुनावी उपस्थिति दर्ज कराएगी या वास्तव में भाजपा और कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध लगाकर मुकाबले को त्रिकोणीय बना देगी? उत्तराखंड राज्य आंदोलन की अगुआ रही यूकेडी वर्षों से अपने खोए जनाधार को वापस पाने की कोशिश कर रही है। अलग राज्य बनने के बाद जिस दल ने राज्य निर्माण का सपना दिखाया, वही धीरे-धीरे राजनीतिक हाशिये पर पहुंच गया। अब पार्टी एक बार फिर मूल निवास, भू-कानून, रोजगार, पलायन, जल-जंगल-जमीन और पहाड़ की पहचान जैसे मुद्दों को लेकर जनता के बीच जाने की तैयारी कर रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यूकेडी इन मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाने में सफल रहती है, तो वह उन मतदाताओं को आकर्षित कर सकती है जो भाजपा और कांग्रेस दोनों से निराश हैं। उत्तराखंड में कई विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां जीत-हार का अंतर दो से पांच हजार वोटों के भीतर रहा है। यदि यूकेडी इन सीटों पर कुछ हजार वोट भी हासिल कर लेती है, तो कई सीटों का परिणाम बदल सकता है। विशेषकर पर्वतीय जिलोंकृपौड़ी, टिहरी, चमोली, उत्तरकाशी, पिथौरागढ़, बागेश्वर, अल्मोड़ा और रुद्रप्रयागकृमें क्षेत्रीय मुद्दों का असर अधिक माना जाता है। यहां यूकेडी की सक्रियता भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए परेशानी का कारण बन सकती है। भाजपा फिलहाल सरकार में है और स्वाभाविक रूप से सत्ता विरोधी माहौल का सामना भी कर रही है। यदि यूकेडी भू-कानून, मूल निवास, स्थानीय युवाओं को रोजगार, पलायन और पहाड़ की उपेक्षा जैसे मुद्दों पर जनसमर्थन जुटाती है, तो उसका असर भाजपा के पारंपरिक वोट बैंक पर भी पड़ सकता है। हालांकि भाजपा संगठनात्मक रूप से मजबूत है और उसके पास बूथ स्तर तक मजबूत नेटवर्क है, लेकिन छोटे अंतर वाली सीटों पर यूकेडी का प्रभाव निर्णायक हो सकता है। कांग्रेस सत्ता विरोधी लहर का लाभ उठाने की उम्मीद कर रही है। लेकिन यदि भाजपा विरोधी वोट यूकेडी की ओर खिसकते हैं, तो कांग्रेस की संभावित बढ़त कमजोर पड़ सकती है। कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वह मतदाताओं को यह भरोसा दिलाए कि भाजपा को हराने की वास्तविक लड़ाई उसी के हाथ में है। यदि विपक्षी वोट बंटे, तो इसका सीधा फायदा भाजपा को मिल सकता है। उत्तराखंड के शुरुआती चुनावों में यूकेडी का प्रभाव साफ दिखाई देता था। कई बार उसने सत्ता गठन के समीकरणों को प्रभावित किया। बाद के वर्षों में संगठन कमजोर हुआ, नेतृत्व बिखरा और जनाधार सिमटता गया। अब यदि पार्टी सभी 70 सीटों पर मजबूत उम्मीदवार उतारने, संगठन खड़ा करने और प्रभावी चुनाव अभियान चलाने में सफल होती है, तो वह भले सत्ता तक न पहुंचे, लेकिन कई सीटों पर किंगमेकर की भूमिका निभा सकती है। घोषणा करना और उसे जमीन पर उतारना, दोनों अलग बातें हैं। यूकेडी के सामने कई बड़ी चुनौतियां हैंकृकि हर सीट पर मजबूत उम्मीदवार खोजना, चुनावी संसाधनों का प्रबंधन, बूथ स्तर तक संगठन खड़ा करना, युवा मतदाताओं के बीच प्रभाव बनाना, गुटबाजी से बचना और क्षेत्रीय मुद्दों को चुनावी एजेंडा बनाना। यदि पार्टी इन चुनौतियों से पार नहीं पाती, तो 70 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा केवल प्रतीकात्मक बनकर रह सकती है। उत्तराखंड की राजनीति अब केवल भाजपा बनाम कांग्रेस तक सीमित नहीं दिखाई दे रही। यूकेडी के इस फैसले ने चुनावी बहस में तीसरे विकल्प की संभावना को फिर जीवित कर दिया है। यदि क्षेत्रीय अस्मिता, भू-कानून और स्थानीय अधिकारों का मुद्दा चुनाव के केंद्र में आता है, तो यूकेडी राजनीतिक चर्चा का बड़ा केंद्र बन सकती है। वहीं यदि चुनाव राष्ट्रीय नेतृत्व, संगठन और संसाधनों के दम पर लड़ा गया, तो भाजपा और कांग्रेस की सीधी टक्कर ही प्रमुख रहेगी। यूकेडी का 70 सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान केवल एक चुनावी घोषणा नहीं, बल्कि यह संदेश भी है कि उत्तराखंड की राजनीति में क्षेत्रीय दल अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं। अब नजर इस बात पर होगी कि क्या यूकेडी अपनी इस घोषणा को मजबूत संगठन, प्रभावी उम्मीदवारों और जनसमर्थन में बदल पाती है या फिर यह भी चुनावी मौसम की एक और राजनीतिक घोषणा बनकर रह जाएगी। 2027 के विधानसभा चुनाव की तस्वीर अभी पूरी तरह साफ नहीं है, लेकिन इतना तय है कि यूकेडी की इस घोषणा ने राजनीतिक दलों की रणनीति बदलने पर मजबूर कर दिया है। भाजपा को अपने वोट बैंक की रक्षा करनी होगी, कांग्रेस को विपक्षी मतों के बिखराव से बचना होगा और यूकेडी को यह साबित करना होगा कि वह केवल अतीत की विरासत नहीं, बल्कि उत्तराखंड की राजनीति का भविष्य भी बन सकती है। यदि ऐसा हुआ, तो इस बार चुनावी मुकाबला सिर्फ सत्ता परिवर्तन का नहीं, बल्कि राज्य की क्षेत्रीय राजनीति के पुनर्जागरण का भी हो सकता है।

कुदरत को ‘माल’ समझने वालों आंखें खोलो

दुनिया को बचाने का रास्ता गुजरता है हिमालय की देव संस्कृति से होकर गढ़वाल, कुमाऊँ और हिमाचल की देव संस्कृति है सदियों से यहां की आस्था हजारों वर्षों से यहां पर्यावरण संरक्षण व सामाजिक संतुलन का जीवंत दर्शन देहरादून। हिमालय केवल बर्फ से ढकी पर्वत श्रृंखलाओं का नाम नहीं है। यह उन सभ्यताओं का घर है, जिन्होंने प्रकृति को संसाधन नहीं, बल्कि देवत्व का स्वरूप माना। गढ़वाल, कुमाऊँ और हिमाचल के पर्वतीय समाज की पहचान केवल उनकी लोकभाषाओं, लोकगीतों और रीति-रिवाजों से नहीं होती, बल्कि उस देव संस्कृति से होती है, जिसने हजारों वर्षों से मनुष्य और प्रकृति के बीच संतुलन बनाए रखने का संदेश दिया है। आज जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, ग्लेशियरों के पिघलने, जल संकट और जैव विविधता के क्षरण जैसी चुनौतियों से जूझ रही है, तब हिमालयी समाज की यह परंपरा आधुनिक पर्यावरणीय सोच के लिए भी महत्वपूर्ण संदर्भ बनकर उभरती है। यहां जंगल केवल लकड़ी का स्रोत नहीं, नदी केवल पानी का साधन नहीं और पर्वत केवल खनिज संपदा का भंडार नहीं माने गए। इन्हें जीवनदाता और पूजनीय माना गया। गढ़वाल, कुमाऊँ और हिमाचल के अधिकांश गांवों में आज भी ग्राम देवता या स्थानीय देवी-देवताओं की परंपरा जीवित है। प्रत्येक क्षेत्र की अपनी अलग देव परंपरा, अपने मेले, अपने अनुष्ठान और अपने लोकाचार हैं। इन देवस्थलों के आसपास के जंगलों, जलस्रोतों और चरागाहों को लंबे समय तक सामुदायिक संरक्षण मिलता रहा। अनेक स्थानों पर इन क्षेत्रों से पेड़ काटना, जलस्रोतों को प्रदूषित करना या वन्यजीवों को नुकसान पहुंचाना धार्मिक और सामाजिक दोनों दृष्टियों से अनुचित माना जाता था। इस प्रकार आस्था ने संरक्षण की ऐसी व्यवस्था विकसित की, जिसे आज की भाषा में ष्सामुदायिक पर्यावरण प्रबंधनष् कहा जा सकता है। हिमालयी देव संस्कृति की जड़ें स्थानीय लोकविश्वासों और व्यापक सनातन परंपरा, दोनों से जुड़ी दिखाई देती हैं। पर्वतों को शिव का निवास, नदियों को मातृस्वरूप, वृक्षों को जीवनदायी और धरती को माता मानने की परंपरा ने प्रकृति के प्रति सम्मान की भावना को मजबूत किया। हिमालयी क्षेत्रों में होने वाले अनेक धार्मिक अनुष्ठानों में जल, अग्नि, वायु, पृथ्वी और आकाशकृइन पंचमहाभूतों का विशेष महत्व है। यह दृष्टिकोण केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं, बल्कि दैनिक जीवन, कृषि, पशुपालन और सामुदायिक व्यवहार में भी दिखाई देता है। स्थानीय देव परंपराएं केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं रहीं। उन्होंने गांवों के सामाजिक जीवन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कई क्षेत्रों में विवादों के समाधान, सामुदायिक निर्णय, मेलों के आयोजन, जलस्रोतों की देखरेख और प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग से जुड़े नियमों में देवस्थानों और स्थानीय परंपराओं का प्रभाव देखा जाता रहा है। इससे सामाजिक अनुशासन और सामुदायिक जिम्मेदारी की भावना मजबूत होती थी। गढ़वाल, कुमाऊँ और हिमाचल के लोकपर्व केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के अवसर भी हैं। हरेला, फूलदेई, इगास,घी संक्रांति, बग्वाल, नंदा देवी महोत्सव, जागर जैसी परंपराएं ऋतुओं, खेती, जंगलों, जल और सामुदायिक जीवन से गहराई से जुड़ी हैं। इन पर्वों के माध्यम से नई पीढ़ी तक यह संदेश पहुंचता है कि प्रकृति का सम्मान केवल पूजा से नहीं, बल्कि उसके संरक्षण से भी होता है। तेजी से बढ़ते शहरीकरण, सड़क निर्माण, अनियोजित पर्यटन, जलवायु परिवर्तन और पलायन ने हिमालयी समाज की पारंपरिक जीवनशैली को प्रभावित किया है। कई गांव खाली हो रहे हैं। अनेक पारंपरिक मेले और अनुष्ठान सीमित होते जा रहे हैं। युवा पीढ़ी का अपनी लोकभाषाओं, लोककथाओं और देव परंपराओं से जुड़ाव भी पहले जैसा नहीं रहा। इसके साथ ही जंगलों, जलस्रोतों और पारंपरिक सामुदायिक संसाधनों पर भी दबाव बढ़ा है। ऐसे समय में यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या विकास और परंपरा के बीच संतुलन बनाया जा सकता है? आज पर्यावरण विशेषज्ञ सस्टेनेबल डेवलपमेंट और नेचर-बेस्ड साल्यूशंस की बात करते हैं। लेकिन हिमालयी समाज सदियों से अपने जीवन में इन सिद्धांतों का पालन करता आया है। प्राकृतिक संसाधनों का सीमित उपयोग, सामुदायिक वन संरक्षण, जलस्रोतों की देखभाल, जैव विविधता का सम्मान और प्रकृति के प्रति आध्यात्मिक दृष्टिकोणकृये सभी ऐसे तत्व हैं, जिनसे आधुनिक पर्यावरण नीति भी सीख ले सकती है। देव संस्कृति केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि हिमालय की सांस्कृतिक पहचान का आधार है। यदि यह परंपरा कमजोर होती है, तो उसके साथ लोकभाषाएं, लोककथाएं, लोकसंगीत, पारंपरिक ज्ञान और प्रकृति से जुड़ी जीवनशैली भी प्रभावित होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि सांस्कृतिक संरक्षण और पर्यावरण संरक्षण को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। हिमालय की इस विरासत को जीवित रखने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी नई पीढ़ी पर है। यदि युवा अपनी लोकसंस्कृति, देव परंपराओं और प्रकृति के प्रति सम्मान की भावना को समझेंगे, तो यह विरासत भविष्य तक सुरक्षित रह सकेगी। इसके लिए विद्यालयों, विश्वविद्यालयों, सांस्कृतिक संस्थाओं और स्थानीय समुदायों की साझी भूमिका महत्वपूर्ण है। गढ़वाल, कुमाऊँ और हिमाचल की देव संस्कृति हमें यह सिखाती है कि प्रकृति पर अधिकार नहीं, उसके साथ संतुलित सह-अस्तित्व ही सभ्यता की वास्तविक पहचान है। यह परंपरा केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि भविष्य के लिए भी एक प्रासंगिक संदेश है। जब दुनिया पर्यावरण संकट से जूझ रही है, तब हिमालय की यह लोकपरंपरा याद दिलाती है कि विकास का सबसे टिकाऊ माडल वही है, जिसमें जंगल केवल संसाधन नहीं, देवता हों, नदियां केवल जलधारा नहीं, जीवन हों और पर्वत केवल चट्टानें नहीं, हमारी सांस्कृतिक चेतना के प्रहरी हों।

सेवा के मंच पर वोटों की ‘फील्डिंग’

जनसेवा और सामाजिक प्रभाव को राजनीतिक ताकत में बदलने का प्लान भाजपा के एनजीओ समन्वय एवं विकास सम्मेलन ने खड़े किए कई सवाल चुनाव से पहले सामाजिक संगठनों के जरिए तैयार हो रहा है चुनावी नेटवर्क देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में विधानसभा चुनाव 2027 की दस्तक अब साफ सुनाई देने लगी है। राजनीतिक दल केवल सभाओं, रैलियों और सदस्यता अभियानों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि समाज के उन वर्गों तक पहुंच बनाने की कवायद तेज हो गई है, जिनका सीधा प्रभाव जनमत पर पड़ता है। इसी कड़ी में भाजपा के एनजीओ प्रकोष्ठ द्वारा देहरादून में आयोजित एनजीओ समन्वय एवं विकास सम्मेलन ने राजनीतिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है। सम्मेलन का संदेश थाकृबदलाव की शुरुआत आपके एक कदम से। मंच से सामाजिक संस्थाओं को संगठित करने, विकास की धारा से जोड़ने और समाज सेवा को नई दिशा देने की बात कही गई। लेकिन राजनीतिक गलियारों में इससे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह वास्तव में समाज सेवा का मंच था, या फिर चुनावी रणनीति का वह हिस्सा, जहां सामाजिक संस्थाओं के प्रभाव को राजनीतिक ताकत में बदलने की कोशिश की जा रही है? यही वह सवाल है, जो इस सम्मेलन को सामान्य कार्यक्रम से आगे ले जाकर राजनीतिक विश्लेषण का विषय बना देता है। उत्तराखंड में अब तक भाजपा, कांग्रेस और अन्य दल किसान, महिला, युवा, शिक्षक, व्यापार और पेशेवर वर्गों के अलग-अलग प्रकोष्ठ बनाकर संगठन विस्तार करते रहे हैं। लेकिन एनजीओ क्षेत्र को इस स्तर पर संगठित करने की पहल पहली बार इतनी स्पष्ट दिखाई दी। राज्यभर से सामाजिक संस्थाओं के प्रतिनिधियों को एक मंच पर बुलाना महज औपचारिक आयोजन नहीं माना जा रहा। चुनावी राजनीति में सामाजिक पूंजी को सबसे प्रभावी पूंजी माना जाता है। जिन संस्थाओं का गांव-गांव, वार्ड-वार्ड और समुदायों में वर्षों का संपर्क है, उनकी बात लोगों तक अपेक्षाकृत अधिक विश्वसनीय ढंग से पहुंचती है। यहीं से राजनीतिक विश्लेषण शुरू होता है। गैर-सरकारी संगठन केवल समाज सेवा नहीं करते। वह गांवों में महिला स्वयं सहायता समूहों के साथ काम करते हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण, नशा मुक्ति, बाल अधिकार, जल संरक्षण, स्वरोजगार और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन तक उनकी भूमिका रहती है। कई संस्थाएं हजारों स्वयंसेवकों के नेटवर्क के साथ काम करती हैं। यानी उनके पास वह सामाजिक पहुंच है, जिसे राजनीतिक दल वर्षों की मेहनत के बाद तैयार करते हैं। ऐसे में यदि कोई राजनीतिक दल इस पूरे वर्ग से संगठित संवाद शुरू करता है, तो उसके दूरगामी राजनीतिक अर्थ निकाले जाना स्वाभाविक है। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक चुनाव केवल पार्टी कार्यकर्ताओं के भरोसे नहीं लड़े जाते। आज चुनावी रणनीति में ऐसे प्रभावशाली वर्गों की भूमिका बढ़ गई है जो प्रत्यक्ष राजनीति में नहीं होते, लेकिन समाज में उनकी स्वीकार्यता होती है। यदि किसी क्षेत्र में वर्षों से काम कर रही सामाजिक संस्था किसी नीति या सरकार के पक्ष में सकारात्मक वातावरण बनाती है, तो उसका असर मतदाताओं पर पड़ सकता है। यही कारण है कि राजनीतिक दल सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और स्वयंसेवी संगठनों के साथ संवाद बढ़ाने की कोशिश करते हैं। हालांकि, इस सम्मेलन के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि ऐसा ही उद्देश्य था, लेकिन यह सवाल राजनीतिक बहस का हिस्सा अवश्य बन गया है। उत्तराखंड में केंद्र और राज्य सरकार की अनेक योजनाएं स्वयंसेवी संस्थाओं की भागीदारी से भी संचालित होती हैं। महिला सशक्तिकरण, पोषण, कौशल विकास, जल संरक्षण, जैविक खेती, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में एनजीओ सक्रिय रहते हैं। यदि यही संस्थाएं किसी राजनीतिक दल के साथ सार्वजनिक मंच साझा करती हैं, तो विपक्ष यह प्रश्न उठा सकता है कि कहीं सरकारी योजनाओं और राजनीतिक संदेशों की सीमाएं धुंधली तो नहीं हो रही हैं। दूसरी ओर, भाजपा का तर्क यह हो सकता है कि सामाजिक संस्थाओं से संवाद लोकतांत्रिक प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा है और इससे समाज सेवा के कार्यों को गति मिलती है। राजनीति में चुनाव केवल जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों से नहीं जीते जाते। अब सामाजिक प्रभाव रखने वाले समूह भी चुनावी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं। महिला समूह...युवा क्लब...धार्मिक संगठन...सांस्कृतिक मंच...स्वयंसेवी संस्थाएं... इन सभी की स्थानीय स्तर पर अपनी पहचान होती है। यदि किसी दल का इनसे संवाद मजबूत होता है, तो वह चुनावी अभियान को अप्रत्यक्ष रूप से भी लाभ पहुंचा सकता है। यही वजह है कि भाजपा का यह सम्मेलन सामान्य संगठनात्मक गतिविधि से कहीं अधिक राजनीतिक महत्व रखता दिखाई देता है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इस सम्मेलन को आने वाले दिनों में बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना सकते हैं। वह यह सवाल उठा सकते हैंकृक्या समाज सेवा करने वाली संस्थाओं को राजनीतिक मंचों से जोड़ना उचित है? क्या इससे एनजीओ की निष्पक्षता प्रभावित होगी? क्या भविष्य में सरकारी सहायता प्राप्त संस्थाओं पर किसी प्रकार का राजनीतिक दबाव बनेगा?क्या सामाजिक संस्थाएं राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का हिस्सा बन जाएंगी? इन सवालों के जवाब आने वाले समय में राजनीतिक बहस का विषय बन सकते हैं। भाजपा इस पूरे मामले को अलग नजरिये से देख सकती है। पार्टी का पक्ष यह हो सकता है कि लोकतंत्र में किसी भी सामाजिक संस्था को किसी भी राजनीतिक दल से संवाद करने का अधिकार है। यदि कोई संस्था समाज के विकास, पर्यावरण, महिला सशक्तिकरण या जनकल्याण के मुद्दों पर सरकार और राजनीतिक दलों से समन्वय करती है, तो इसमें कोई असामान्य बात नहीं है। पार्टी यह भी कह सकती है कि सम्मेलन का उद्देश्य सामाजिक संस्थाओं के अनुभवों को जोड़ना और विकास कार्यों में उनकी भागीदारी बढ़ाना था, न कि उन्हें राजनीतिक रूप से संबद्ध करना। भारत में स्वयंसेवी संस्थाओं की पहचान उनकी निष्पक्षता और जनसेवा से बनती है। यदि किसी संस्था पर किसी दल विशेष के निकट होने की धारणा बनती है, तो उसके कामकाज पर भी सवाल उठ सकते हैं। इसीलिए विशेषज्ञ मानते हैं कि सामाजिक संस्थाओं और राजनीतिक दलों के बीच संवाद हो सकता है, लेकिन उसकी प्रवृति पारदर्शी और स्पष्ट होनी चाहिए। लोकतंत्र में नागरिक समाज की स्वतंत्र भूमिका को बनाए रखना उतना ही आवश्यक है, जितना राजनीतिक दलों का सामाजिक संवाद। भाजपा पहले से बूथ स्तर तक मजबूत संगठन होने का दावा करती है। अब यदि वह समाज के विभिन्न वर्गों के साथ भी अपने रिश्ते मजबूत करती है, तो उसका चुनावी आधार और व्यापक हो सकता है। दूसरी ओर, कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के सामने चुनौती होगी कि वह भी सामाजिक संगठनों और नागरिक समाज के बीच अपनी उपस्थिति मजबूत करें। यानी आने वाले महीनों में केवल राजनीतिक रैलियां ही नहीं, बल्कि सामाजिक मंच भी चुनावी गतिविधियों का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकते हैं। अब प्रश्न उठता है कि क्या यह सम्मेलन केवल सामाजिक समन्वय का प्रयास था? या फिर 2027 विधानसभा चुनाव से पहले सामाजिक प्रभाव रखने वाले संगठनों के माध्यम से राजनीतिक पहुंच बढ़ाने की रणनीति? इसका स्पष्ट उत्तर अभी किसी के पास नहीं है। लेकिन इतना तय है कि उत्तराखंड की चुनावी राजनीति अब बूथ, मंडल और जिलों से आगे बढ़कर समाज के प्रभावशाली नेटवर्क तक पहुंच चुकी है।

यूकेडी की हुंकार अब ‘नया उत्तराखंड’

उत्तराखंड चुनाव में नया उत्तराखंड के संकल्प के साथ पहचान तलाशने मैदान में उतरेगा यूकेडी नया उत्तराखंड का एजेंडा या खोई हुई राजनीतिक जमीन वापस पाने की यह है आखिरी लड़ाई राज्य आंदोलन की विरासत, क्षेत्रीय अस्मिता और जनसरोकारों के सहारे चुनावी रणभूमि में उतरेगा यूकेडी देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के साथ प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर क्षेत्रीय दल उत्तराखंड क्रांति दल अपनी पहचान और प्रासंगिकता स्थापित करने की कोशिश में जुट गया है। पार्टी ने नया उत्तराखंड का संकल्प लेकर चुनावी मैदान में उतरने का ऐलान किया है। यह सिर्फ एक राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि उन मुद्दों को फिर से केंद्र में लाने का प्रयास है जिनके आधार पर अलग उत्तराखंड राज्य का आंदोलन खड़ा हुआ था। यूकेडी का दावा है कि राज्य बनने के 26 वर्षों बाद भी उत्तराखंड अपने मूल उद्देश्यों से भटक गया है। पलायन, बेरोजगारी, संसाधनों का असमान उपयोग, भूमि संरक्षण, स्थानीय युवाओं के अधिकार और पहाड़ों का विकास जैसे मुद्दे आज भी अधूरे हैं। पार्टी इन्हीं सवालों को लेकर जनता के बीच जाने की रणनीति बना रही है। यूकेडी के अनुसार नया उत्तराखंड केवल नई सरकार बनाने का अभियान नहीं, बल्कि शासन की सोच बदलने का संकल्प है। पार्टी का मानना है कि पिछले दो दशकों में प्रदेश की राजनीति राष्ट्रीय दलों के बीच सत्ता परिवर्तन तक सीमित हो गई, जबकि राज्य आंदोलन के मूल उद्देश्य पीछे छूट गए। यूकेडी अपने एजेंडे में पांच बड़े बिंदुओं को केंद्र में रख रही हैकृमजबूत भू-कानून, मूल निवास आधारित अधिकार, स्थानीय युवाओं को रोजगार, पलायन रोकने की ठोस नीति, प्राकृतिक संसाधनों पर उत्तराखंड का अधिकार। इसके साथ ही प्रदेश में पिछले कुछ वर्षों से सबसे अधिक चर्चा भू-कानून को लेकर रही है। यूकेडी लगातार मांग करती रही है कि हिमालयी राज्य की भौगोलिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों को देखते हुए उत्तराखंड में भी हिमाचल प्रदेश जैसी सख्त भूमि संरक्षण नीति लागू की जाए। पार्टी का कहना है कि यदि जमीन पर नियंत्रण कमजोर होता गया तो आने वाले वर्षों में स्थानीय लोग अपनी ही भूमि पर हाशिये पर पहुंच जाएंगे। यूकेडी लंबे समय से मूल निवास आधारित नीति लागू करने की मांग करती रही है। पार्टी का तर्क है कि सरकारी नौकरियों और विभिन्न योजनाओं में स्थानीय युवाओं को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। उनका कहना है कि उत्तराखंड के संसाधनों पर पहला अधिकार उत्तराखंड के लोगों का होना चाहिए। यही मुद्दा राज्य आंदोलन के दौरान भी प्रमुख मांगों में शामिल था। उत्तराखंड के हजारों गांव आज भी खाली होने की समस्या से जूझ रहे हैं। यूकेडी का कहना है कि सरकारों ने पलायन आयोग तो बना दिया, लेकिन गांवों में रोजगार और मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने की दिशा में अपेक्षित परिणाम नहीं मिले। पार्टी का दावा है कि नया उत्तराखंड तभी बनेगा जब गांव आबाद होंगे और युवाओं को अपने घरों के पास रोजगार मिलेगा। यूकेडी सरकारी विभागों में आउटसोर्सिंग और ठेका व्यवस्था की लगातार आलोचना करती रही है। पार्टी का कहना है कि स्थायी रोजगार के अवसर घट रहे हैं जबकि अस्थायी नियुक्तियों का दायरा बढ़ रहा है। युवा मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए पार्टी स्थानीय उद्योग, कृषि आधारित रोजगार, पर्यटन और स्वरोजगार को प्राथमिकता देने की बात कर रही है। जल, जंगल और जमीन हमेशा से यूकेडी की राजनीति का मूल आधार रहे हैं। पार्टी का आरोप है कि बड़े विकास परियोजनाओं का लाभ स्थानीय लोगों तक पर्याप्त रूप से नहीं पहुंच पाया। यूकेडी चाहती है कि जलविद्युत परियोजनाओं, खनन, वन संपदा और पर्यटन से होने वाली आय का बड़ा हिस्सा स्थानीय क्षेत्रों के विकास पर खर्च हो। बता दें कि उत्तराखंड आंदोलन में यूकेडी की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। राज्य बनने के बाद पार्टी धीरे-धीरे संगठनात्मक कमजोरियों, गुटबाजी और सीमित जनाधार के कारण पीछे चली गई। अब पार्टी फिर से राज्य आंदोलन की भावनाओं को जनता के बीच ले जाकर अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करना चाहती है। यूकेडी का आरोप है कि पिछले 26 वर्षों में सत्ता बदलती रही लेकिन व्यवस्था नहीं बदली। पार्टी भाजपा और कांग्रेस दोनों पर राज्य आंदोलन की भावनाओं के साथ न्याय न करने का आरोप लगा रही है। यूकेडी का कहना है कि दोनों राष्ट्रीय दलों ने उत्तराखंड को राष्ट्रीय राजनीति के नजरिये से देखा, जबकि राज्य की स्थानीय जरूरतें अलग हैं। 2027 के चुनाव में पहली बार मतदान करने वाले युवाओं की संख्या काफी अधिक होगी। यूकेडी का पूरा प्रयास है कि वह रोजगार, शिक्षा, स्टार्टअप, कृषि, डिजिटल अर्थव्यवस्था और स्थानीय अवसरों के मुद्दे उठाकर युवाओं को अपने साथ जोड़े। यदि पार्टी युवाओं के बीच प्रभाव बना पाती है तो उसका चुनावी प्रदर्शन पहले की तुलना में बेहतर हो सकता है। हालांकि नया उत्तराखंड का विजन जितना आकर्षक दिखाई देता है, उसे जमीन पर उतारना उतना ही कठिन है। यूकेडी के सामने सबसे बड़ी चुनौतियां हैंकृपूरे प्रदेश में मजबूत संगठन खड़ा करना, 70 सीटों पर प्रभावी उम्मीदवार उतारना, सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े दलों से मुकाबला करना, गुटबाजी से बचना, युवाओं और नए मतदाताओं का विश्वास जीतना, अपने एजेंडे को केवल चुनावी घोषणा नहीं, बल्कि विश्वसनीय विकल्प के रूप में स्थापित करना। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यूकेडी अपने पारंपरिक प्रभाव वाले पर्वतीय क्षेत्रों में मजबूत प्रदर्शन करती है, तो कई सीटों पर भाजपा और कांग्रेस दोनों के समीकरण प्रभावित हो सकते हैं। भले ही पार्टी सत्ता तक न पहुंचे, लेकिन कम अंतर वाली सीटों पर वोटों का बंटवारा चुनावी परिणामों को बदल सकता है। यूकेडी का नया उत्तराखंड संकल्प प्रदेश की राजनीति में क्षेत्रीय विमर्श को फिर से केंद्र में लाने की कोशिश है। यह एजेंडा राज्य आंदोलन की उन अधूरी आकांक्षाओंकृस्थानीय अधिकार, रोजगार, पलायन रोकना, भू-कानून और संसाधनों पर स्थानीय भागीदारीकृको दोबारा राजनीतिक बहस का विषय बनाता है। लेकिन चुनावी राजनीति में केवल मुद्दे पर्याप्त नहीं होते। संगठन, नेतृत्व, संसाधन, विश्वसनीयता और जनसंपर्क भी उतने ही निर्णायक होते हैं। 2027 का चुनाव इसलिए यूकेडी के लिए केवल सीटें जीतने की लड़ाई नहीं, बल्कि यह साबित करने की परीक्षा भी होगा कि क्या वह आज के उत्तराखंड में एक प्रभावी क्षेत्रीय विकल्प बन सकती है, या फिर नया उत्तराखंड का संकल्प भी चुनावी घोषणापत्र के पन्नों तक सीमित रह जाएगा।

रविवार, 2 अगस्त 2026

udaydinmaan: पहाड़ की ‘खामोश’ क्रांति पर सिस्टम की ‘चोट’

udaydinmaan: पहाड़ की ‘खामोश’ क्रांति पर सिस्टम की ‘चोट’: महिला मंगल दल गांव की पहरेदार महिला मंगल दल का वादों का सहारा बिना पद संभाली जल-जंगल और जमीन पर लड़ा युद्ध गांव की सरकार आज भी है समाज की संस...

‘नारी’ अस्मिता पर सियासी ‘तमाशा’

सहानुभूति का मुखौटा पहन राजनीतिक मोहरे बिछाने का आरोप गंभीर मामलों पर एकजुटता के बजाय आर-पार के मूड में दल महिला सुरक्षा पर भाजपा ने किया कांग्रेस पार्टी पर तीखा हमला भाजपा बोली-संवेदनशील मुद्दों पर राजनीति करना कांग्रेस की आदत देहरादून। महिलाओं की सुरक्षा को लेकर देश की राजनीति एक बार फिर गरमा गई है। भाजपा ने कांग्रेस पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया है कि महिलाओं की सुरक्षा जैसे अत्यंत संवेदनशील और गंभीर विषय पर राजनीति करना कांग्रेस की पुरानी आदत रही है। भाजपा नेताओं का कहना है कि कांग्रेस हर आपराधिक घटना को राजनीतिक अवसर में बदलने की कोशिश करती है, जबकि ऐसे मामलों में सभी दलों को मिलकर पीड़ितों के साथ खड़ा होना चाहिए। यह बयान ऐसे समय आया है जब हाल के दिनों में महिलाओं के खिलाफ अपराधों के कई मामलों को लेकर राजनीतिक दल आमने-सामने हैं। कांग्रेस लगातार सरकार की कानून-व्यवस्था और महिला सुरक्षा के मुद्दे पर आलोचना कर रही है, जबकि भाजपा का कहना है कि कांग्रेस का उद्देश्य न्याय सुनिश्चित करना नहीं, बल्कि राजनीतिक लाभ हासिल करना है। भाजपा के प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर के नेताओं ने संयुक्त रूप से कांग्रेस की रणनीति पर सवाल उठाए हैं। पार्टी का आरोप है कि कांग्रेस चुनिंदा घटनाओं को उठाकर राजनीतिक माहौल बनाने की कोशिश करती है और कई बार तथ्यों की पूरी जांच से पहले ही सरकार को कठघरे में खड़ा कर देती है। भाजपा नेताओं का कहना है कि महिलाओं की सुरक्षा पर गंभीर बहस होनी चाहिए, लेकिन इसे राजनीतिक हथियार नहीं बनाया जाना चाहिए। भाजपा का तर्क है कि केंद्र और राज्य सरकारों ने महिला सुरक्षा के लिए कानूनों को सख्त करने, फास्ट ट्रैक कोर्ट, महिला हेल्पलाइन, वन-स्टाप सेंटर और पुलिस तंत्र को मजबूत करने जैसे कई कदम उठाए हैं। पार्टी नेताओं का कहना है कि किसी भी अपराधी को बख्शा नहीं जाएगा, चाहे उसका राजनीतिक संबंध किसी भी दल से क्यों न हो। भाजपा के आरोपों पर कांग्रेस ने भी पलटवार किया है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि महिलाओं की सुरक्षा का मुद्दा राजनीति का नहीं, बल्कि जनसुरक्षा और शासन की जवाबदेही का विषय है। उनका कहना है कि यदि अपराध बढ़ रहे हैं या कानून-व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं तो विपक्ष का दायित्व है कि वह सरकार से जवाब मांगे। कांग्रेस का आरोप है कि भाजपा आलोचना से बचने के लिए हर सवाल को राजनीतिक साजिश बताने की कोशिश करती है। कांग्रेस का कहना है कि महिलाओं की सुरक्षा पर सरकार की नीतियों और उनके क्रियान्वयन की समीक्षा लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है। पार्टी नेताओं ने यह भी कहा कि पीड़ित परिवारों को न्याय दिलाने की मांग करना राजनीति नहीं, बल्कि संवैधानिक जिम्मेदारी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद केवल महिला सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि आगामी चुनावी रणनीति का भी हिस्सा बन चुका है। उत्तराखंड सहित कई राज्यों में अगले विधानसभा चुनावों की तैयारी शुरू हो चुकी है और कानून-व्यवस्था, महिला सुरक्षा, बेरोजगारी और शिक्षा जैसे मुद्दे प्रमुख चुनावी एजेंडा बनते जा रहे हैं। ऐसे में दोनों दल इन मुद्दों पर अपनी राजनीतिक धार तेज करने में जुटे हैं। भाजपा महिला सुरक्षा के सवाल पर अपनी सरकारी योजनाओं और कानूनी सुधारों को सामने रख रही है, जबकि कांग्रेस सरकार की जवाबदेही, पुलिस व्यवस्था और अपराध नियंत्रण के मुद्दे को प्रमुखता से उठा रही है। दोनों दलों की रणनीति स्पष्ट हैकृमहिला मतदाताओं के बीच अपनी विश्वसनीयता मजबूत करना। महिलाओं की सुरक्षा भारतीय राजनीति का ऐसा मुद्दा है जिस पर जनता की भावनाएं गहराई से जुड़ी होती हैं। इसलिए किसी भी घटना के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाएं तेजी से सामने आती हैं। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार बढ़ते आरोप-प्रत्यारोप के बीच सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या इस राजनीतिक संघर्ष से महिलाओं की सुरक्षा व्यवस्था वास्तव में मजबूत होगी? महिलाओं की सुरक्षा पर राजनीतिक बहस लोकतंत्र में स्वाभाविक है, लेकिन यह बहस तब सार्थक होगी जब उसका केंद्र चुनावी लाभ नहीं, बल्कि सुरक्षा व्यवस्था में वास्तविक सुधार होगा। यदि राजनीतिक दल इस मुद्दे को केवल आरोप-प्रत्यारोप का माध्यम बनाएंगे तो सबसे बड़ा नुकसान उस विश्वास का होगा, जिसकी सबसे अधिक आवश्यकता देश की महिलाओं को है। जनता अब केवल बयान नहीं, बल्कि ठोस परिणाम देखना चाहती है।

नैरेटिव का ‘जहर’ और वोट की ‘जंग’

हैट्रिक की जिद बनाम बदलाव की जंग भाजपा का नैरेटिव सेट करने पर जोर कांग्रेस को दिख रही वापसी की राह राजनीतिक मोहरों से बिगड़ेगा समीकरण देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 अभी दूर है, लेकिन राजनीतिक तापमान लगातार बढ़ रहा है। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ने चुनावी शतरंज बिछानी शुरू कर दी है। पिछले चुनावों में जहां मुकाबला विकास बनाम वादों तक सीमित था, वहीं इस बार लड़ाई केवल सीटों की नहीं, बल्कि जनता के मन में नैरेटिव स्थापित करने की है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि 2027 का चुनाव उत्तराखंड की राजनीति का सबसे अलग और सबसे आक्रामक चुनाव साबित हो सकता है। भाजपा लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी का इतिहास रचने की तैयारी में है, जबकि कांग्रेस इसे सत्ता परिवर्तन का सबसे बड़ा अवसर मान रही है। दूसरी ओर क्षेत्रीय दल और नए राजनीतिक समूह भी युवाओं और स्थानीय मुद्दों के सहारे अपनी जगह बनाने की कोशिश में हैं। भाजपा का पूरा चुनावी अभियान अब तक के विकास कार्यों, सड़क, रेल, चारधाम आल वेदर रोड, रोपवे, निवेश, पर्यटन, समान नागरिक संहिता और डबल इंजन सरकार की अवधारणा के इर्द-गिर्द रहने की संभावना है। पार्टी यह संदेश देना चाहती है कि उत्तराखंड को राजनीतिक स्थिरता और तेज विकास केवल भाजपा ही दे सकती है। हालांकि भाजपा के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। स्थानीय स्तर पर जनप्रतिनिधियों के प्रति नाराजगी, बेरोजगारी, पलायन, भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं पर उठे सवाल, महंगाई और ग्रामीण क्षेत्रों की समस्याएं विपक्ष को लगातार मुद्दे दे रही हैं। ऐसे में पार्टी संगठन और सरकार दोनों को एंटी-इनकंबेंसी की धार को कुंद करना होगा। कांग्रेस बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं, महंगाई, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा और किसानों के मुद्दों को लेकर सरकार को घेरने की रणनीति पर काम कर रही है। पार्टी का प्रयास है कि सत्ता विरोधी भावना को संगठित जनसमर्थन में बदला जाए। लेकिन कांग्रेस की सबसे बड़ी परीक्षा उसके अपने संगठन की मजबूती होगी। यदि गुटबाजी और नेतृत्व के सवाल हावी रहे, तो जनता के मुद्दे भी चुनावी लाभ में नहीं बदल पाएंगे। चुनाव से पहले संगठनात्मक एकजुटता कांग्रेस की सबसे बड़ी राजनीतिक आवश्यकता होगी। उत्तराखंड में बड़ी संख्या में युवा मतदाता पहली बार मतदान करेंगे। रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता, स्टार्टअप, स्वरोजगार, डिजिटल अवसर और शिक्षा उनके प्रमुख मुद्दे हैं। पिछले कुछ वर्षों में भर्ती परीक्षाओं और पेपर लीक जैसे मामलों ने युवाओं के बीच व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े किए। अब सभी दल युवाओं को अपने पक्ष में करने के लिए अलग-अलग रणनीति बना रहे हैं। सोशल मीडिया इस बार चुनाव प्रचार का सबसे प्रभावी हथियार बन सकता है। महिला सुरक्षा, स्वास्थ्य, शिक्षा, स्वरोजगार, स्वयं सहायता समूह, गैस, पानी और सामाजिक सुरक्षा जैसे मुद्दे चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। भाजपा और कांग्रेस दोनों महिलाओं के बीच अपनी पैठ मजबूत करने की तैयारी में हैं। उत्तराखंड की राजनीति में क्षेत्रीय संतुलन हमेशा महत्वपूर्ण रहा है। पलायन, खाली होते गांव, सड़क, स्वास्थ्य सुविधाएं और शिक्षा जैसे मुद्दे पर्वतीय क्षेत्रों में लगातार चर्चा का विषय हैं, जबकि मैदानी क्षेत्रों में शहरीकरण, रोजगार, उद्योग और बुनियादी सुविधाएं प्रमुख चुनावी मुद्दे हैं। जो दल इन दोनों क्षेत्रों की अपेक्षाओं में संतुलन स्थापित करेगा, उसे चुनावी लाभ मिल सकता है। 2027 का चुनाव केवल जनसभाओं का नहीं होगा। फेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और व्हाट्सऐप पर नैरेटिव बनाने की प्रतिस्पर्धा पहले ही शुरू हो चुकी है। वीडियो, फैक्ट-चेक, आरोप-प्रत्यारोप और त्वरित राजनीतिक प्रतिक्रियाएं चुनाव प्रचार की दिशा तय करेंगी। डिजिटल अभियान अब किसी भी दल की चुनावी रणनीति का केंद्रीय हिस्सा बन चुका है। क्षेत्रीय दल, निर्दलीय उम्मीदवार और नए राजनीतिक मंच भले सत्ता की सीधी दौड़ में न दिखें, लेकिन कई सीटों पर वे परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं। त्रिकोणीय या बहुकोणीय मुकाबले का लाभ किसे मिलेगा, यह स्थानीय समीकरण तय करेंगे। 2027 का चुनाव केवल सरकार बदलने या बचाने का चुनाव नहीं होगा। यह तय करेगा कि उत्तराखंड का राजनीतिक विमर्श विकास, रोजगार, पलायन, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर केंद्रित रहता है या फिर पहचान, भावनात्मक मुद्दों और चुनावी नैरेटिव के इर्द-गिर्द घूमता है। उत्तराखंड की चुनावी बिसात बिछ चुकी है। भाजपा अपने शासन और विकास माडल पर भरोसा जता रही है, जबकि कांग्रेस जनसरोकारों और सत्ता विरोधी माहौल को राजनीतिक ऊर्जा में बदलने की कोशिश कर रही है। लेकिन अंतिम फैसला जनता करेगीकृऔर वह केवल नारों से नहीं, बल्कि यह देखकर कि किस दल के पास आने वाले पांच वर्षों के लिए सबसे विश्वसनीय दृष्टि, मजबूत संगठन और व्यवहारिक रोडमैप है।

पहाड़ की ‘खामोश’ क्रांति पर सिस्टम की ‘चोट’

महिला मंगल दल गांव की पहरेदार महिला मंगल दल का वादों का सहारा बिना पद संभाली जल-जंगल और जमीन पर लड़ा युद्ध गांव की सरकार आज भी है समाज की संस्कारशाला देहरादून। पहाड़ों में यदि किसी संस्था ने बिना किसी बड़े प्रचार, राजनीतिक मंच या सरकारी पद के समाज को सबसे अधिक जोड़ा है, तो वह है महिला मंगल दल। गांव की चौपाल से लेकर जंगलों की रक्षा, जल स्रोतों के संरक्षण, सामाजिक जागरूकता, नशामुक्ति अभियान, स्वच्छता, लोक संस्कृति और आपदा के समय राहत कार्य तककृमहिला मंगल दल दशकों से पहाड़ की सामाजिक धड़कन बने हुए हैं। आज जब पलायन, जल संकट, जंगलों में आग, बदलते सामाजिक ताने-बाने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की चुनौतियों से जूझ रहा है, तब महिला मंगल दलों की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। लेकिन विडंबना यह है कि जिन महिलाओं ने गांवों को जीवंत बनाए रखा, वह स्वयं अक्सर सरकारी योजनाओं और नीति-निर्माण के केंद्र से दूर दिखाई देती हैं। पहाड़ के इतिहास में महिलाओं ने केवल परिवार नहीं संभाला, बल्कि जंगल, जल और जमीन की रक्षा के लिए भी संघर्ष किया। चिपको आंदोलन ने दुनिया को यह संदेश दिया कि पहाड़ की महिलाएं पर्यावरण संरक्षण की सबसे बड़ी प्रहरी हैं। उसी सामाजिक चेतना की निरंतरता आज भी महिला मंगल दलों में दिखाई देती है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह दल केवल औपचारिक संगठन नहीं हैं, बल्कि सामुदायिक नेतृत्व का जीवंत उदाहरण हैं। गांव में कोई धार्मिक आयोजन हो, स्कूल का कार्यक्रम, स्वच्छता अभियान, जल स्रोत की सफाई, पौधारोपण या किसी जरूरतमंद परिवार की सहायताकृसबसे पहले महिला मंगल दल ही सक्रिय दिखाई देता है। पहाड़ की महिलाएं खेती, पशुपालन, दुग्ध उत्पादन, स्वयं सहायता समूह, स्थानीय उत्पादों और पारंपरिक हस्तशिल्प से जुड़ी हुई हैं। महिला मंगल दल इन गतिविधियों को संगठित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यदि सरकार इन दलों को स्थानीय उत्पादों की ब्रांडिंग, विपणन, प्रशिक्षण और डिजिटल प्लेटफार्म से जोड़ दे, तो पहाड़ की अर्थव्यवस्था को नई दिशा मिल सकती है। मंडुवा, झंगोरा, गहत, भट्ट, लाल चावल, जड़ी-बूटियां और स्थानीय हस्तशिल्प जैसे उत्पाद राष्ट्रीय बाजार तक पहुंच सकते हैं। आज पहाड़ के हजारों गांव पलायन की मार झेल रहे हैं। पुरुष रोजगार के लिए शहरों की ओर जा रहे हैं, जबकि गांवों की जिम्मेदारी महिलाओं पर बढ़ती जा रही है। ऐसे में महिला मंगल दल केवल सामाजिक संस्था नहीं, बल्कि गांवों को जीवित रखने वाली ताकत बन चुके हैं। कई गांवों में यह संगठन खाली पड़े खेतों को सामूहिक खेती से जोड़ने, वर्षा जल संरक्षण, जैविक खेती और सामुदायिक श्रमदान जैसे कार्यों में भी योगदान दे रहे हैं। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही महिला मतदाताओं की भूमिका पर सभी राजनीतिक दलों की नजर रहती है। महिला मंगल दल सीधे तौर पर गैर-राजनीतिक संगठन माने जाते हैं, लेकिन उनके माध्यम से गांवों की वास्तविक समस्याएं सामने आती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में पानी, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, राशन, गैस, वन अधिकार और आजीविका जैसे मुद्दों पर सबसे स्पष्ट आवाज इन्हीं समूहों से निकलती है। यही कारण है कि चुनावी मौसम में जनप्रतिनिधि और राजनीतिक दल महिला समूहों से संवाद बढ़ाने का प्रयास करते हैं। हालांकि यह भी उतना ही आवश्यक है कि महिला मंगल दलों को केवल चुनावी मंच का हिस्सा न बनाया जाए, बल्कि उनके सुझावों को ग्राम विकास योजनाओं और स्थानीय नीति निर्माण में भी महत्व मिले। एक चिंता यह भी है कि आधुनिक जीवनशैली, पलायन और बदलती सामाजिक परिस्थितियों के कारण नई पीढ़ी की महिलाओं का महिला मंगल दलों से जुड़ाव पहले जैसा नहीं रहा। यदि समय रहते इन संगठनों को डिजिटल प्रशिक्षण, नेतृत्व विकास और स्वरोजगार से नहीं जोड़ा गया, तो उनकी सामाजिक ऊर्जा कमजोर पड़ सकती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि महिला मंगल दलों को पंचायतों, स्वयं सहायता समूहों, पर्यटन, जैविक खेती, वन प्रबंधन और आपदा प्रबंधन से व्यवस्थित रूप से जोड़ा जाए, तो वह ग्रामीण विकास के सबसे प्रभावी मॉडल बन सकते हैं। उत्तराखंड की पहचान केवल हिमालय, चारधाम और प्राकृतिक सौंदर्य नहीं है। उसकी सबसे बड़ी ताकत उसके गांव और उन गांवों की महिलाएं हैं। महिला मंगल दलों ने वर्षों से बिना किसी बड़े संसाधन के सामाजिक एकता, पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण विकास की मशाल जलाए रखी है। आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकारें उन्हें केवल सांस्कृतिक आयोजनों तक सीमित न रखें, बल्कि ग्रामीण विकास, महिला सशक्तिकरण, जल संरक्षण, जैविक कृषि, स्थानीय अर्थव्यवस्था और आपदा प्रबंधन की नीतियों में साझेदार बनाएं। यदि उत्तराखंड के गांवों को आत्मनिर्भर बनाना है, तो महिला मंगल दलों को केवल सम्मान नहीं, बल्कि निर्णय प्रक्रिया में भी सशक्त स्थान देना होगा। क्योंकि पहाड़ की असली रीढ़ सड़कें नहीं, बल्कि यह महिलाएं हैं जो हर कठिन परिस्थिति में गांव को जीवित रखे हुए हैं।

शनिवार, 1 अगस्त 2026

udaydinmaan: कंडाली की ‘छपाक’ और बचपन का ‘शोर’

udaydinmaan: कंडाली की ‘छपाक’ और बचपन का ‘शोर’: पहाड़ की पगडंडियों, गदेरों और बेफिक्र दिनों की वह ख़ूबसूरत दास्तान दो मिनट का रोना और फिर पहाड़ की पगडंडियों पर वही खेल शुरू नंगे पांव दौड़ना, ...

कंडाली की ‘छपाक’ और बचपन का ‘शोर’

पहाड़ की पगडंडियों, गदेरों और बेफिक्र दिनों की वह ख़ूबसूरत दास्तान दो मिनट का रोना और फिर पहाड़ की पगडंडियों पर वही खेल शुरू नंगे पांव दौड़ना, गदेरों में छलांगें व बिछुआ घास की वह मीठी चुभन हर पहाड़ी के दिल में आज भी जिंदा है बचपन का वह खट्टा-मीठा दर्द देहरादून। अरे... कंडाली लग गई! यह आवाज कभी पहाड़ के हर गांव में सुनाई देती थी। अगले ही पल बच्चों का शोर, हंसी और भागमभाग शुरू हो जाती थी। कोई हाथ सहला रहा होता, कोई पत्ते रगड़ रहा होता, तो कोई साथी को चिढ़ाते हुए कहता अब समझ आया, खेत में दौड़ने का नतीजा! पहाड़ में बचपन का मतलब सिर्फ स्कूल जाना नहीं था। बचपन का मतलब थाकृनंगे पांव पगडंडियों पर दौड़ना, जंगलों में गाय-बकरियां चराना, गदेरों में मछलियां पकड़ना, पेड़ों पर चढ़ना और इन्हीं सबके बीच कभी न कभी कंडाली की छपाक खाना। यह छपाक सिर्फ शरीर पर नहीं लगती थी, बल्कि पहाड़ के हर बच्चे की यादों में हमेशा के लिए दर्ज हो जाती थी। कंडाली का पौधा दिखने में जितना साधारण, उसका स्पर्श उतना ही तेज। इसके महीन कांटे त्वचा में चुभते और कुछ ही सेकंड में हाथ-पैर जलने लगते। ऐसा लगता मानो किसी ने सैकड़ों सूइयां एक साथ चुभो दी हों। लेकिन पहाड़ के बच्चों के लिए यह कोई बड़ी बात नहीं थी। दो मिनट रोने के बाद फिर वही खेल शुरू। आज की तरह उस समय हर घर में दवा नहीं होती थी। दादी कहती थींकृबांज का पत्ता रगड़ दो, कोई कहता बिच्छू बूटी का असर अपने आप उतर जाएगा, तो कोई मिट्टी या ठंडा पानी लगाने की सलाह देता। कुछ देर बाद जलन कम हो जाती और बच्चे फिर जंगल की ओर निकल पड़ते। कई गांवों में कंडाली सिर्फ गलती से नहीं लगती थी। दोस्तों की शरारत में भी इसका खूब इस्तेमाल होता था। किसी की पीठ पर हल्की सी कंडाली छुआ दी और फिर पूरा गांव हंसी से गूंज उठता। उस समय गुस्सा भी आता था और दोस्ती भी उतनी ही मजबूत रहती थी। समय बदला। विज्ञान ने बताया कि यही कंडाली पोषक तत्वों का खजाना है। इससे स्वादिष्ट साग बनता है, आयुर्वेदिक दवाइयां तैयार होती हैं और आज यह जैविक खेती व पहाड़ी व्यंजनों की पहचान बन चुकी है जो पौधा कभी बच्चों को रुलाता था, वही आज शहरों के बड़े-बड़े होटलों के मेन्यू में जगह बना चुका है। मोबाइल, इंटरनेट और कोचिंग के दौर में पहाड़ का बचपन भी बदल गया है। अब बच्चे जंगलों में कम जाते हैं। पगडंडियों की जगह सड़कें हैं, गदेरों की जगह मोबाइल गेम्स और पेड़ों पर चढ़ने की जगह सोशल मीडिया ने ले ली है। इसलिए नई पीढ़ी शायद कभी उस एहसास को नहीं समझ पाएगी, जब कंडाली की छपाक लगते ही पूरा दोस्ताना ठहाकों में बदल जाता था। पहाड़ छोड़ चुके लाखों लोग जब अपने गांव लौटते हैं और कहीं खेत की मेड़ पर कंडाली का पौधा देखते हैं, तो अनायास मुस्कुरा देते हैं। उन्हें याद आता हैकृवह बचपन...वह पगडंडी...वह खेत...वह बारिश... और कंडाली की वह तेज जलन, जो आज सबसे मीठी याद बन चुकी है। कभी जिस बिच्छू घास से बचकर भागते थे, आज उसी की तस्वीर देखकर बचपन लौट आता है। शायद इसलिए पहाड़ के लोग कहते हैंकृकंडाली की छपाक भूल सकते हो, लेकिन उससे जुड़ी यादें कभी नहीं।

खाकी में ‘बगावत’ या जवानों का ‘दर्द’

निलंबित शेर सिंह के पीछे खड़ा हुआ एक और सिपाही छात्र आंदोलन से उठी चिंगारी अब बनने लगी है शोला उत्तराखंड पुलिस के अंदरूनी असंतोष आ गया है सामने देहरादून। उत्तराखंड पुलिस में अनुशासन और असंतोष को लेकर चल रही बहस ने नया मोड़ ले लिया। छात्र आंदोलन के दौरान दिए गए बयान के बाद निलंबित किए गए कांस्टेबल शेर सिंह के समर्थन में अब एक और पुलिसकर्मी के सामने आ गया है। शेर सिंह प्रकरण पहले ही राज्य की राजनीति और सोशल मीडिया में चर्चा का विषय बना हुआ था। अब दूसरे पुलिसकर्मी के सामने आने से यह मामला एक व्यक्तिगत विवाद से आगे बढ़कर संस्थागत चर्चा का विषय बन गया है। पुलिस बल एक अनुशासित सेवा है। सेवा नियमों के अनुसार कर्मचारियों से अपेक्षा की जाती है कि वे सार्वजनिक मंचों पर ऐसे बयान न दें, जिनसे विभाग की निष्पक्षता या अनुशासन पर प्रश्न उठें। दूसरी ओर, यह मामला इस बहस को भी जन्म देता है कि सरकारी सेवाओं में कार्यरत कर्मचारियों की व्यक्तिगत अभिव्यक्ति की सीमा क्या होनी चाहिए और किन परिस्थितियों में विभागीय कार्रवाई उचित मानी जाती है। यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब राज्य में विभिन्न राजनीतिक और छात्र संगठनों के आंदोलन चर्चा में हैं। विपक्ष इस मामले को कर्मचारियों के असंतोष और सरकार के रवैये से जोड़ सकता है, जबकि सत्तापक्ष का जोर इस बात पर रहेगा कि वर्दीधारी बलों में अनुशासन सर्वाेच्च है और सेवा नियमों का पालन अनिवार्य है। पुलिस की प्रेस विज्ञप्ति सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर भी बहस तेज हो गई है। एक वर्ग इसे पुलिस कर्मियों के भीतर बढ़ती बेचौनी का संकेत बता रहा है, जबकि दूसरा वर्ग इसे व्यक्तिगत घटनाओं को अनावश्यक रूप से व्यापक रूप देने की कोशिश मान रहा है। अब निगाहें इस बात पर हैं कि संबंधित पुलिसकर्मी के मामले में विभाग क्या कार्रवाई करता है। यदि विभागीय जांच शुरू होती है, तो यह स्पष्ट होगा कि पुलिस मुख्यालय इस प्रकरण को किस दृष्टिकोण से देख रहा है।

‘वोटर लिस्ट’ पर उत्तराखंड में ‘संग्राम’

हजारों नागरिकों के वोट पर मंडराया संकट या सिर्फ यह है जुबानी जंग मतदाता सूची की खामियों को मुद्दा बनाकर कांग्रेस का हल्ला बोल उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव के रण से पहले बढ़ी राजनीतिक तपिश देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया अब राजनीतिक विवाद का नया केंद्र बन गई है। कांग्रेस ने इस पूरी प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं और खामियों का आरोप लगाते हुए राज्यभर में मोर्चा खोल दिया है। पार्टी का दावा है कि यदि समय रहते कमियां दूर नहीं की गईं तो हजारों वास्तविक मतदाता मतदान के अधिकार से वंचित हो सकते हैं। वहीं सत्तारूढ़ भाजपा इन आरोपों को पूरी तरह निराधार बताते हुए कह रही है कि चुनाव आयोग पूरी प्रक्रिया पारदर्शिता और निर्धारित नियमों के अनुसार संचालित कर रहा है। चुनावी वर्ष से पहले मतदाता सूची का पुनरीक्षण हमेशा महत्वपूर्ण माना जाता है, लेकिन इस बार यह केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रह गई है। यह राजनीतिक संघर्ष का नया अखाड़ा बनती दिखाई दे रही है। प्रदेश कांग्रेस का आरोप है कि एसआईआर के दौरान कई स्थानों पर मतदाताओं के नाम बिना पर्याप्त सूचना के हटाए जा रहे हैं, नए मतदाताओं के पंजीकरण में अनावश्यक देरी हो रही है और बूथ स्तर पर पर्याप्त सत्यापन नहीं किया जा रहा। पार्टी नेताओं का कहना है कि पर्वतीय क्षेत्रों में बड़ी संख्या में लोग रोजगार के कारण अस्थायी रूप से बाहर रहते हैं। ऐसे परिवारों के नाम हटने का खतरा बढ़ गया है। कांग्रेस का कहना है कि यदि किसी पात्र मतदाता का नाम सूची से बाहर हो गया तो लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकतकृमताधिकारकृकमजोर होगी। इसी मुद्दे को लेकर पार्टी जिला मुख्यालयों से लेकर राज्य स्तर तक ज्ञापन, धरना और विरोध प्रदर्शन की तैयारी कर रही है। भाजपा ने कांग्रेस के आरोपों को चुनाव से पहले भ्रम फैलाने की रणनीति बताया है। पार्टी नेताओं का कहना है कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण पूरी तरह चुनाव आयोग की संवैधानिक प्रक्रिया है, जिसमें राजनीतिक दलों के बूथ एजेंटों को भी आपत्तियां और सुझाव देने का अवसर मिलता है। भाजपा का तर्क है कि यदि किसी मतदाता का नाम गलत तरीके से हटाया गया है तो उसके लिए निर्धारित अपील और दावा-आपत्ति की व्यवस्था पहले से मौजूद है। ऐसे में कांग्रेस का विरोध केवल राजनीतिक माहौल बनाने की कोशिश है। इस पूरे विवाद के केंद्र में चुनाव आयोग है। आयोग का उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक शुद्ध और अद्यतन बनाना है ताकि मृत, स्थानांतरित या दोहरे नामों को हटाया जा सके और नए पात्र मतदाताओं को जोड़ा जा सके। हालांकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में केवल सूची की शुद्धता ही नहीं, बल्कि प्रत्येक पात्र नागरिक का नाम सुरक्षित रखना भी उतना ही आवश्यक है। यही कारण है कि आयोग की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर सभी दलों की निगाहें टिकी हुई हैं। उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में एसआईआर की प्रक्रिया मैदानी राज्यों से कहीं अधिक जटिल है। बड़ी संख्या में लोग रोजगार, शिक्षा और व्यवसाय के लिए दिल्ली, चंडीगढ़, मुंबई या अन्य शहरों में रहते हैं, जबकि उनका स्थायी निवास गांवों में है। कई गांवों में पलायन के कारण परिवार वर्ष के अधिकांश समय बाहर रहते हैं। यदि ऐसे मामलों में पर्याप्त सत्यापन के बिना नाम हटाए जाते हैं तो विवाद स्वाभाविक रूप से बढ़ सकता है। यही मुद्दा कांग्रेस जोर-शोर से उठा रही है। इस बार पहली बार मतदान करने वाले युवाओं का पंजीकरण भी महत्वपूर्ण मुद्दा है। कांग्रेस का आरोप है कि कई कालेजों और दूरदराज क्षेत्रों में जागरूकता अभियान पर्याप्त नहीं है। वहीं भाजपा दावा कर रही है कि युवा मतदाताओं को जोड़ने के लिए व्यापक अभियान चलाया जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि एसआईआर का विवाद केवल मतदाता सूची तक सीमित नहीं है। इसके पीछे आगामी विधानसभा चुनाव की रणनीति भी जुड़ी हुई है। कांग्रेस इसे लोकतंत्र और मताधिकार की रक्षा का मुद्दा बनाकर जनता के बीच ले जाना चाहती है, जबकि भाजपा चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर भरोसा जताते हुए विपक्ष के आरोपों को चुनावी राजनीति का हिस्सा बता रही है। यदि यह मुद्दा लगातार गर्माता है तो आने वाले महीनों में यह बेरोजगारी, महंगाई और पलायन जैसे मुद्दों के साथ चुनावी विमर्श का प्रमुख हिस्सा बन सकता है। अब निगाहें इस बात पर हैं कि चुनाव आयोग कांग्रेस द्वारा उठाए गए मुद्दों पर क्या प्रतिक्रिया देता है और पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान प्राप्त दावों एवं आपत्तियों का किस प्रकार निस्तारण करता है। यदि प्रक्रिया पारदर्शी, समयबद्ध और तथ्यपरक रही तो विवाद स्वतः शांत हो सकता है। लेकिन यदि किसी भी स्तर पर बड़ी संख्या में पात्र मतदाताओं के नाम छूटने या हटने की शिकायतें सामने आती हैं, तो यह मामला राजनीतिक से आगे बढ़कर संवैधानिक बहस का विषय भी बन सकता है। मतदाता सूची लोकतंत्र की बुनियाद है। इसलिए उस पर उठने वाला हर सवाल स्वाभाविक रूप से गंभीर होता है। विपक्ष का अधिकार है कि वह संभावित खामियों की ओर ध्यान दिलाए, वहीं चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है कि वह प्रत्येक शिकायत की निष्पक्ष जांच कर प्रक्रिया की विश्वसनीयता बनाए रखे। फिलहाल उत्तराखंड में एसआईआर केवल एक प्रशासनिक कवायद नहीं, बल्कि चुनावी राजनीति का नया रणक्षेत्र बन चुका है।

जनगणना में भी पहाड़ ‘अदृश्य’

अपनी गणना, अपना गांव, संसद में महेंद्र भट्ट ने उठाई पर्वतीय जनगणना की मांग बड़ा सवाल,कृक्या मैदानी पैमानों में सिमट कर रह गई है पहाड़ की आबादी पलायन वखाली होते गांवों की सच्चाई, आंकड़ों में लौटेंगे खाली होते गांव देहरादून। उत्तराखंड को अक्सर देवभूमि कहा जाता है। चुनाव आते हैं तो वीरभूमि भी कहा जाता है। पर्यटन की बात होती है तो स्वर्ग कहा जाता है। लेकिन जब सरकारी फाइलों में गिनती होती है, तब यही उत्तराखंड अक्सर सिर्फ एक संख्या बनकर रह जाता है। संसद में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद महेंद्र भट्ट ने उत्तराखंड के लिए विशेष पर्वतीय जनगणना माडल की मांग उठाई है। उन्होंने कहा कि अपनी गणना, अपना गांव की तर्ज पर ऐसी जनगणना होनी चाहिए, जो पहाड़ की वास्तविक आबादी, पलायन और गांवों की सच्चाई को दर्ज करे। सवाल यह नहीं है कि यह मांग किसने उठाई। सवाल यह है कि क्या भारत की मौजूदा जनगणना व्यवस्था वास्तव में पहाड़ को देख भी रही है? उत्तराखंड में हजारों गांव ऐसे हैं जहां मकान खड़े हैं, लेकिन लोग नहीं। दरवाजों पर ताले हैं, खेतों में झाड़ियां हैं और स्कूलों में बच्चों की संख्या हर साल घट रही है। लेकिन जब जनगणना होती है तो वह पूछती हैकृआप अभी कहां रहते हैं? वह यह नहीं पूछती कि आपका गांव कौन-सा है? वह यह नहीं पूछती कि आप हर त्योहार पर किस गांव लौटते हैं? वह यह भी नहीं पूछती कि यदि गांव में रोजगार मिल जाए तो क्या आप वापस लौटेंगे?यही वह खाली जगह है, जिसकी ओर संसद में इशारा किया गया। उत्तराखंड का पलायन कोई नई खबर नहीं है। इस पर आयोग बने, रिपोर्टें आईं, समितियां बनीं और घोषणाएं हुईं। लेकिन गांव आज भी खाली हैं। सरकारें कहती हैं कि सड़क बना दी। लोग पूछते हैंकृरोजगार कहां है? सरकार कहती है इंटरनेट पहुंच गया। लोग पूछते हैंकृयुवा वापस क्यों नहीं लौटे? सरकार कहती है पर्यटन बढ़ा। लोग पूछते हैंकृस्थायी आजीविका कितनों को मिली? यही वजह है कि आज जनगणना केवल जनसंख्या गिनने का विषय नहीं रह गया है। यह विकास माडल की परीक्षा बन गया है। यह बात भी स्वीकार करनी होगी कि यह मांग ऐसे समय आई है जब उत्तराखंड विधानसभा चुनाव दूर नहीं हैं। भाजपा जानती है कि पलायन, सीमांत गांव, खाली होते घर और पहाड़ की उपेक्षा ऐसे मुद्दे हैं जिन पर हर सरकार से सवाल पूछे जाते रहे हैं। इसलिए यदि भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष संसद में यह कहता है कि उत्तराखंड के लिए अलग पर्वतीय जनगणना माडल होना चाहिए, तो यह केवल प्रशासनिक सुझाव नहीं है। यह एक राजनीतिक संदेश भी है कि पार्टी पहाड़ की पहचान और उसकी विशेष परिस्थितियों को राष्ट्रीय बहस में लाना चाहती है। लेकिन राजनीति का दूसरा पक्ष भी है। महेंद्र भट्ट जिस दल के प्रदेश अध्यक्ष हैं, उसी दल की सरकार राज्य में भी है और केंद्र में भी। इसलिए विपक्ष पूछेगा यदि आज की जनगणना व्यवस्था पहाड़ के साथ न्याय नहीं कर रही थी तो पिछले वर्षों में इसे बदलने की पहल क्यों नहीं हुई? यदि पलायन सबसे बड़ी चुनौती है तो खाली गांवों को आबाद करने की नीतियों का परिणाम क्या निकला? यदि सीमांत गांव रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं तो वहां स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार की स्थिति अब भी कमजोर क्यों है? लोकतंत्र में यही स्वाभाविक है। जो सवाल विपक्ष से पूछे जाते हैं, वही सवाल सत्ता से भी पूछे जाएंगे। यह बात शायद कम लोग जानते हैं कि जनगणना केवल लोगों की गिनती नहीं करती। उसी के आधार पर योजनाएं बनती हैं, संसाधनों का वितरण होता है, स्कूल, अस्पताल, सड़कें और कई सरकारी सुविधाओं की प्राथमिकताएं तय होती हैं। यदि किसी गांव की आबादी कागज पर कम दिखाई देती है तो वहां विकास योजनाएं भी सीमित हो सकती हैं। यदि बाहर रहने वाले लोग पूरी तरह शहरों की आबादी में दर्ज हो जाते हैं, तो पहाड़ की वास्तविक सामाजिक संरचना सरकारी नजर से ओझल हो सकती है। यही कारण है कि विशेषज्ञ लंबे समय से पर्वतीय राज्यों के लिए अलग दृष्टिकोण की बात करते रहे हैं। यदि इस अवधारणा पर गंभीरता से काम होता है और प्रत्येक नागरिक का अपने मूल गांव से संबंध भी दर्ज किया जाता है, तो सरकार के पास पहली बार यह स्पष्ट तस्वीर होगी किकृकितने लोग अस्थायी रूप से बाहर हैं। कितने गांव पूरी तरह खाली होने की कगार पर हैं। किन क्षेत्रों में रोजगार देकर आबादी लौटाई जा सकती है। किन सीमांत गांवों को विशेष सहायता की आवश्यकता है। लेकिन इसके लिए केवल नारा नहीं, मजबूत कानूनी ढांचा, स्पष्ट प्रक्रिया और विश्वसनीय डेटा संग्रह की व्यवस्था भी चाहिए। संसद में मुद्दा उठ जाना अच्छी बात है। बहस भी हो जाएगी। समाचार भी बन जाएगा। लेकिन पहाड़ के लोग शायद एक और सवाल पूछेंगे। क्या अगली जनगणना के बाद हमारे गांवों में लोग भी लौटेंगे? क्योंकि उत्तराखंड की सबसे बड़ी समस्या यह नहीं है कि गांवों की गिनती कम हो रही है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि गांवों में जिंदगी कम होती जा रही है। यदि जनगणना उस जिंदगी को वापस लाने की दिशा में पहला कदम बनती है, तो यह केवल आंकड़ों का सुधार नहीं होगा, बल्कि पहाड़ के भविष्य का दस्तावेज होगा और यदि यह केवल संसद की बहस बनकर रह गई, तो अगली जनगणना में शायद कुछ और गांव नक्शे पर तो मिलेंगे, लेकिन उनमें रहने वाले लोग नहीं। यही उत्तराखंड की सबसे बड़ी विडंबना है।

जंतर-मंतर से सियासी ‘भूचाल’

अपशब्दों पर प्रधानमंत्री मोदी ने दिखाया बड़ा दिल भटके बच्चों को सजा नहीं, सही दिशा की है जरूरत विरोध के तीखे सुरों के बीच पीएम का वीडियो संदेश देश में सोशल मीडिया की कटुता पर छिड़ी नई बहस नई दिल्ली। दिल्ली के जंतर-मंतर से उठी एक घटना ने केवल भारत की राजनीति ही नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संवाद, राजनीतिक असहमति और सार्वजनिक शिष्टाचार पर भी नई बहस छेड़ दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक वीडियो संदेश में कहा कि प्रदर्शन के दौरान उन्हें और उनकी दिवंगत मां को अपशब्द कहे गए, लेकिन वह संबंधित युवाओं को भटके हुए बच्चे मानते हैं और उन्हें दंडित करने के बजाय मार्गदर्शन देने के पक्षधर हैं। यह बयान ऐसे समय आया है जब भारत में छात्र आंदोलनों, राजनीतिक ध्रुवीकरण और सोशल मीडिया पर बढ़ती तीखी भाषा को लेकर व्यापक चर्चा चल रही है। लोकतंत्र में सरकार का विरोध नागरिकों का अधिकार है। भारत का संविधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है और जंतर-मंतर लंबे समय से लोकतांत्रिक विरोध का प्रतीक माना जाता रहा है। लेकिन इस घटना ने एक मूलभूत प्रश्न खड़ा किया हैकृक्या राजनीतिक असहमति के नाम पर व्यक्तिगत या पारिवारिक अपमान स्वीकार्य है? प्रधानमंत्री ने अपने संदेश में कहा कि अपशब्द किसी समस्या का समाधान नहीं हैं और समाज का दायित्व है कि वह भटके हुए युवाओं को सही दिशा दिखाए, न कि केवल दंड की मांग करे। दुनिया के कई लोकतंत्रोंकृअमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और अन्य देशोंकृमें भी राजनीतिक ध्रुवीकरण के साथ सार्वजनिक संवाद की भाषा लगातार कठोर हुई है। चुनावी रैलियों, सोशल मीडिया और विरोध प्रदर्शनों में व्यक्तिगत हमले बढ़े हैं। ऐसे माहौल में यदि कोई शीर्ष निर्वाचित नेता सार्वजनिक रूप से संयम, क्षमा और संवाद की बात करता है, तो वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा का विषय बन सकता है। दूसरी ओर, आलोचक यह भी पूछ सकते हैं कि केवल भाषा पर नहीं, बल्कि विरोध प्रदर्शनों से जुड़े अन्य मुद्दोंकृजैसे पुलिस कार्रवाई, छात्रों की शिकायतें और आंदोलन के मूल कारणोंकृपर भी समान गंभीरता से संवाद होना चाहिए। प्रधानमंत्री का संदेश भावनात्मक भी था और राजनीतिक भी। उन्होंने कहा कि उनकी दिवंगत मां को भी अपशब्द कहे गए, लेकिन इसके बावजूद वे युवाओं को दंडित करने के बजाय उन्हें माफ करना चाहते हैं और समाज से भी यही आग्रह करते हैं। यह संदेश समर्थकों के बीच संयम और नैतिक नेतृत्व के रूप में देखा जा रहा है। वहीं आलोचक यह तर्क दे सकते हैं कि राष्ट्रीय बहस केवल भाषा तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि उन कारणों पर भी होनी चाहिए जिनसे विरोध प्रदर्शन पैदा हुए। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। इसलिए यहां की राजनीतिक घटनाएं वैश्विक मीडिया और अंतरराष्ट्रीय नीति विश्लेषकों की नजर में रहती हैं। यह घटना दो समानांतर संदेश देती हैकृ लोकतंत्र में विरोध की जगह है। लेकिन लोकतंत्र की गुणवत्ता इस बात से भी तय होती है कि विरोध किस भाषा और मर्यादा के साथ व्यक्त किया जाता है। यदि असहमति संवाद में बदले तो लोकतंत्र मजबूत होता है। यदि वह केवल व्यक्तिगत अपमान में बदल जाए, तो सार्वजनिक विमर्श कमजोर पड़ता है। जंतर-मंतर की यह घटना केवल एक राजनीतिक विवाद नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्कृति की परीक्षा भी है। प्रधानमंत्री का क्षमा का संदेश एक महत्वपूर्ण राजनीतिक हस्तक्षेप है, लेकिन उतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि विरोध की मूल शिकायतों पर खुला और संस्थागत संवाद जारी रहे। आखिरकार, किसी भी परिपक्व लोकतंत्र की पहचान केवल इस बात से नहीं होती कि वहां कितनी तेज आवाजें उठती हैं, बल्कि इस बात से होती है कि असहमति को किस गरिमा, संवेदनशीलता और लोकतांत्रिक मर्यादा के साथ सुना और व्यक्त किया जाता है।

शुक्रवार, 31 जुलाई 2026

udaydinmaan: देवभूमि की ‘अदृश्य’ अदालत

udaydinmaan: देवभूमि की ‘अदृश्य’ अदालत: जब सरकारी तंत्र से आगे निकल आती है ऐड़ी-आछरी की लोक आस्था ऐड़ी-आछरी है पहाड़ों की लोक आस्था, रहस्य व लोकजीवन की जीवंत परंपरा गांवों की चौपाल से...