रविवार, 10 मई 2026
ऊमी: अन्न, आस्था और प्रकृति का पर्व
उत्तराखंड के पहाड़ों की संस्कृति में प्रकृति के साथ गहरे रिश्ते की अनोखी परंपरा
नए गेहूँ का पहला दाना पहले देवता के नाम, फिर हमारे लिए बनता है प्रसाद
‘ऊमी’ निकालने की परंपरा सिर्फ अन्न का भोग नहीं, बल्कि यह है एक सोच कृ
प्रकृति के प्रति सम्मान, जीवन के प्रति आभार और समाज के प्रति जुड़ाव
देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ों में एक परंपरा है, जो आज भी पहाड़ के गांवों में निभाई जाती है। फाल्गुन की विदाई और चैत्र के आगमन के साथ ही जब खेतों में गेहूँ की बालियाँ सुनहरी आभा बिखेरने लगती हैं, तो ग्रामीण भारत की फिजाओं में एक खास तरह की सोंधी खुशबू घुल जाती है। यह खुशबू है ‘ऊमी’ की होती है।
पहाड़ में गेहॅू की कच्ची-पक्की बालियों को धीमी आंच पर भूनकर जब इन्हें हाथों से रगड़कर दाने निकाले जाते हैं, तो वह ‘ऊमी’ कहलाती है। पहाड़ के गांवों में नए अन्न का पहला दाना घर का कोई सदस्य तब तक नहीं चखता, जब तक इसे कुल देवता, क्षेत्रपाल या ग्राम देवता को अर्पित न कर दिया जाए। मान्यता है कि क्षेत्रपाल देवता ने कड़कती धूप और ठंड में फसल की रक्षा की है, इसलिए पहला हक उन्हीं का है।
उत्तराखंड के पहाड़ी जीवन में हर परंपरा के पीछे प्रकृति, आस्था और जीवन दर्शन का अद्भुत मेल दिखाई देता है। इस परंपरा के पीछे गहरी मान्यता है कि अन्न केवल मानव श्रम का परिणाम नहीं, बल्कि प्रकृति और दैवीय कृपा का संयुक्त वरदान है। इसलिए इसे सीधे उपभोग करने से पहले उस शक्ति को समर्पित करना आवश्यक माना जाता है, जिसने इसे संभव बनाया।
आज के दौर में तेजी से बदलती जीवनशैली और शहरीकरण के कारण ऐसी परंपराएं धीरे-धीरे कम होती जा रही हैं। खेतों से जुड़ाव कम हो रहा है और बाजार आधारित जीवन शैली बढ़ रही है। इसके बावजूद कई गांवों में आज भी ऊमी को उत्साह के साथ बनाकर उत्सव के रूप में मनाते हैं। आज जब दुनिया पर्यावरण संरक्षण की बात कर रही है, तब पहाड़ की यह परंपरा हमें सिखाती है कि प्रकृति के साथ संतुलन और सम्मान ही सच्ची समृ(ि का मार्ग है।
बाक्स
गांवों के ऑगन में ऊमी की खुशबू
अग्नि में तपे इन दानों को जब गुड़ या शक्कर के साथ मिलाकर भगवान को भोग लगाया जाता है, तो वह ऊमी एक दिव्य प्रसाद में बदल जाती है। गाँव की चौपालों और आंगन में जब घर-घर से ऊमी की खुशबू आती है, तो मानों पूरी प्रकृति उत्सव मना रही होती है। बड़े-बुजुर्ग बताते हैं कि यह प्रसाद परिवार में सुख-शांति और अन्न के भंडार भरे रहने का प्रतीक है। आयुर्वेद के अनुसार )तु परिवर्तन के समय नया अनाज सीधे खाना भारी हो सकता है, लेकिन अग्नि में भूनने से यह सुपाच्य और हल्का हो जाता है। यह पाचन तंत्र को मजबूत करता है और शरीर को नई ऊर्जा प्रदान करता है।
दूनघाटी में शिक्षा के मंदिरों में ‘शोर संस्कृति’
सुलगते सवाल
शिक्षा के मंदिर या फिर इवेंट मैनेजमेंट के केंद्र
महंगे कलाकारों पर करोड़ों के दांव का मकसद
गरीब मेधावियों की अनदेखी अखिर कब तक
कालेजों ने शिक्षा की गुणवत्ता को किया दरकिनार
स्टार पावर के दम पर अपनी ब्रांडिंग करने में जुटे
देहरादून। दूनघाटी में प्राइवेट यूनिवर्सिटी में शोर संस्कृति का नया ट्रेड शुरू हो गया है। यूनिवर्सिटी लाखों-करोड़ों की फीस लेने के बाद छात्र-छात्राओं को संगीत की धुनों पर थिरकते नजर आ रहे हैं। हालांकि यूनिवर्सिटी प्रशासन ऐसे कार्यक्रमों को छात्र-छात्रओं के सर्वांगीण विकास के लिए जरूरी बताता है। वहीं दूसरी ओर समाज का एक वर्ग इन आयोजनों पर होने वाले भारी-भरकम खर्च को लेकर सवाल खड़े कर रहा है। आज बहस इस बात पर छिड़ गई है कि क्या प्राइवेट यूनिवर्सिटी अपनी मूल दिशा से भटककर मनोरंजन के अड्डे बनते जा रहे हैं।
दूनघाटी की प्राइवेट यूनिवर्सिटी में सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजनों में नामी गायकों, डीजे और कलाकारों को बुलाने की एक होड़ सी मची है। एक ही रात के लिए लाखों-करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा दिए जा रहे हैं। सवाल यह उठता है कि जिस छात्र की फीस से यह पैसा आता है, क्या उसे बदले में वैसी विश्वस्तरीय शैक्षणिक सुविधाएं मिल रही हैं? जानकारों का मानना है कि प्राइवेट यूनिवर्सिटी अब शिक्षा की गुणवत्ता के बजाय स्टार पावर के दम पर अपनी ब्रांडिंग करने में जुटे हैं।
वही दूसरी ओर आलोचकों का कहना है कि यूनिवर्सिटी अब पढ़ाई, शोध और नवाचार के बजाय नाचने-गाने के अड्डे में तब्दील होती दिख रही हैं। जब साल भर का फोकस कल्चरल इवेंट्स और सेलिब्रिटी नाइट्स पर रहेगा, तो छात्र के भीतर बौ(िक गंभीरता कैसे विकसित होगी। अभिभावकों का कहना है कि आज भी कई छात्र आर्थिक अभाव के कारण अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर पा रहे हैं। ऐसे में भव्य आयोजनों पर खर्च को लेकर असंतोष स्वाभाविकहै। उनका मानना है कि विश्वविद्यालयों को अपनी प्राथमिकताएं तय करनी चाहिए और शिक्षा के मूल उद्देश्यकृज्ञान और समान अवसरकृको सर्वोपरि रखना चाहिए।
अब सबसे गंभीर प्रश्न आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चों को लेकर आता है। ए ओर जहां यूनिवर्सिटी आर्टिस्ट्स को बुलाने के लिए बजट का पिटारा खोल देती है। वही जब बात किसी गरीब परिवार के प्रतिभाशाली छात्र की फीस माफी या छात्रवृत्ति की आती है, तो नियम-कायदों का हवाला दिया जाता है। यूनिवर्सिटी करोड़ों रूपये चंद घंटों के शोर में बर्बाद हुआ, उसे ग्रामीण क्षेत्रों के उन बच्चों के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता था जो संसाधन न होने के कारण उच्च शिक्षा से वंचित रह जाते हैं?
बता दें कि उत्तराखंड जैसे पहाड़ी प्रदेश में, जहां कई माता-पिता पेट काटकर अपने बच्चों को शहर पढ़ने भेजते हैं, वहां विश्वविद्यालयों की नैतिक जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। मनोरंजन आवश्यक है, लेकिन वह शिक्षा की लागत और गरीबों के हक को मारकर नहीं होना चाहिए।
शिक्षा विशेषज्ञों के अनुसार यह बहस केवल एक संस्थान तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र से जुड़ा सवाल है। जरूरी है कि विश्वविद्यालय शिक्षा और सांस्कृतिक गतिविधियों के बीच संतुलन बनाए रखें, ताकि न तो प्रतिभाओं का दमन हो और न ही शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित हो।
कांग्रेस के लिए ‘टर्निंग प्वाइंट’
कांग्रेस पार्टी मिशन उत्तराखंड
संगठन में जान फूंकेगी कुमारी शैलजा, कांग्रेस में हलचल तेज
संगठन मजबूती और चुनावी रणनीति पर रहेगा खास फोकस
चुनाव से पहले आंतरिक मतभेद सार्वजनिक होने से बचाना
देहरादून। उत्तराखंड कांग्रेस में नई ऊर्जा भरने और सांगठनिक बिखराव को रोकने के लिए कांग्रेस प्रदेश प्रभारी कुमारी शैलजा छह मई से प्रदेश के दौरे पर है। सूत्रों की माने तो उत्तराखंड कांग्रेस पिछले कुछ समय से गुटबाजी और आंतरिक असंतोष की चुनौतियों से जूझ रही है। ऐसे में कुमारी शैलजा का दौरा ‘डैमेज कंट्रोल’ के तौर पर भी देखा जा रहा है। वह प्रदेश के वरिष्ठ नेताओं, पदाधिकारियों और जिला स्तर के कार्यकर्ताओं के साथ बैठकें कर संगठनात्मक समन्वय पर जोर देंगी। पार्टी नेतृत्व चाहता है कि चुनाव से पहले किसी भी तरह का आंतरिक मतभेद सार्वजनिक रूप से सामने न आए।
सूत्रों की मानें तो कुमारी शैलजा के इस दौरे का मुख्य एजेंडा पार्टी के भीतर चल रही अंतर्कलह को शांत करना है। कुमाऊं से लेकर गढ़वाल तक, कांग्रेस के दिग्गज नेताओं के बीच तालमेल की कमी जगजाहिर है। प्रभारी का प्रयास होगा कि सभी गुटों को एक मंच पर लाकर एकजुट कांग्रेश का संदेश दिया जाए। कुमारी शैलजा का कार्यक्रम सिर्फ बैठकों तक सीमित नहीं रहेगा। वह कार्यकर्ता सम्मेलनों और जनसभाओं को भी संबोधित करेंगी, जिससे जमीनी स्तर पर पार्टी की सक्रियता बढ़े।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कुमारी शैलजा का सख्त मिजाज और संगठनात्मक अनुभव उत्तराखंड कांग्रेस के लिए बूस्टर डोज साबित हो सकता है, जहाँ भाजपा अपनी डबल इंजन सरकार के कार्यों को गिना रही है, वहीं शैलजा का दौरा कांग्रेस कार्यकर्ताओं में यह विश्वास पैदा करने की कोशिश है कि पार्टी अभी भी मुख्य मुकाबले में मजबूती से खड़ी है।
इसके साथ ही उत्तराखंड में आगामी चुनाव से पहले कुमारी शैलजा का दौरा कांग्रेस के लिए ‘टर्निंग प्वाइंट’ साबित हो सकता है। अगर यह दौरा संगठन में एकजुटता और कार्यकर्ताओं में उत्साह पैदा करने में सफल रहता है, तो कांग्रेस की चुनावी संभावनाओं को नई दिशा मिल सकती है।अब देखना होगा कि यह दौरा सिर्फ औपचारिकता बनकर रह जाता है या वास्तव में पार्टी के लिए मजबूत राजनीतिक आधार तैयार करता है।
6 मई से गढ़वाल मंडल का दौरा
कांग्रेस की प्रदेश प्रभारी कुमारी शैलजा अपना 6 मई से अपना गढ़वाल मंडल का दौरा करने जा रही हैं। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने बताया कि आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस पार्टी पूरी तरह से तैयार है। कांग्रेस प्रदेश प्रभारी )षिकेश से लेकर बदरीनाथ, केदारनाथ और टिहरी के दौरे पर आ रही हैं।
पूरब से पश्चिम तक दिख रही बदलते भारत की नई सियासी तस्वीर
धर्म, राष्ट्रवाद और विकास के संगम ने बदल दी राजनीति की दिशा
भारत की बदलती सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना का भी है संकेत
गुवाहाटी के कामाख्या मंदिर की पहाड़ियों पर सूर्य की पहली किरण से लेकर गुजरात के कच्छ के रण में डूबते सूरज की लालिमा तक देश की धमनियों में आज भगवा रंग एक नए उत्साह के साथ बह रहा है। कभी केवल वैराग्य और संन्यास का प्रतीक माना जाने वाला भगवा रंग आज आधुनिक भारत की पहचान और आत्मविश्वास का पर्याय बन चुका है। भगवा रंग को देश की राजनीति से जोड़कर भाजपा ने इसे आज अपना हथियार बनाकर देश के 70 प्रतिशत हिस्से पर अपनी पकड़ को मजबूत किया है।
प्राचीन काल में भगवा रंग धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक माना जाने वाला अब राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आ चुका है और जनमानस की सोच में भी गहराई तक उतर चुका है। देश में पूरब से लेकर पश्चिम तक, उत्तर से दक्षिण तक भगवा लहर केवल एक राजनीतिक ट्रेंड नहीं, बल्कि भारत की बदलती सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना का संकेत भी है।
पश्चिम बंगाल, असम और ओडिशा जैसे राज्यों में पहले जहां क्षेत्रीय दलों का वर्चस्व था, वहीं अब भगवा विचारधारा ने मजबूत चुनौती पेश की है। खासकर पश्चिम बंगाल में हाल के वर्षों में राजनीतिक संघर्ष का केंद्र यही विचारधारा बन गई है। यहां जय श्रीराम जैसे नारों ने चुनावी माहौल को पूरी तरह बदल दिया। इसी प्रकार गुजरात और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में भगवा पहले से ही सियासत का अहम हिस्सा रहा है। यहां यह केवल राजनीतिक रणनीति नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान और गौरव का प्रतीक बन चुका है।
उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और मध्य प्रदेश में भगवा राजनीति अपने चरम पर है। यहां धार्मिक स्थलों के विकास, मंदिर निर्माण और सांस्कृतिक आयोजनों ने इस विचारधारा को और मजबूत किया है। दक्षिण भारत जहां परंपरागत रूप से क्षेत्रीय दलों और अलग राजनीतिक विचारधाराओं का प्रभाव रहा है, वहां भी भगवा धीरे-धीरे अपनी जगह बना रहा है। तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों में अब यह केवल सीमित प्रभाव तक नहीं रहा, बल्कि राजनीतिक चर्चा का अहम हिस्सा बन चुका है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि इसके पीछे कई कारण हैंकृराष्ट्रवाद की भावना, धार्मिक पहचान का पुनर्जागरण,मजबूत नेतृत्व और सोशल मीडिया के जरिए विचारधारा का तेज प्रसार के साथ ही विकास के साथ सांस्कृतिक जुड़ाव का संदेश भी लोगों को आकर्षित कर रहा है। राजनैतिक दलों की बात करें तो वर्तमान में देश की राजनीति में भी भगवा रंग का प्रभुत्व देखने को मिल रहा है। राजनैतिक विशेषज्ञों की माने तो देश के लगभग 70 प्रतिशत हिस्से पर भगवा रंग चढ़ाने में भाजपा का हाथ है। देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के रणनीतिकारों की राजनैतिक चाल सफल होती दिख रही है। शायद यही कारण है कि भगवा का रंग देश पर चढ़ रहा है।
बंद कमरों में जीत का ‘अमृत’ मंथन
---चुनावी रणनीति पर मंथन, जीत का खाका तैयार करने में जुटे राजनैतिक दल
---संगठन से लेकर सोशल मीडिया तक बना रहे है राजनैतिक दल नई रूपरेखा
---रणनीति परंपरागत न होकर पूरी तरह डेटा और डिलीवरी पर होगी आधारित
देहरादून। प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनावों के लिए राजनीति गर्माने लगी है। सत्ता पक्ष और विपक्षकृदोनों ही अपने-अपने स्तर पर चुनावी रणनीति को धार देने में जुट गए हैं। राजनैतिक दलों के बंद कमरों में सियासी मंथन से जीत के अमृत निकालने की कोशिश की जा रही है, जो सत्ता की राह को आसान बना सके। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो इस बार की रणनीति परंपरागत न होकर पूरी तरह डेटा और डिलीवरी पर आधारित होगा। अभी तक राजनैतिक दल प्रदेश के नेताओं के साथ बैठकों में रणनीति पर विचार कर रहे हैं और जल्द ही राष्ट्रीय नेताओं के साथ प्रदेश में विधानसभा चुनाव की जीत के लिए सियासी मंथन होगा। इसके लिए भाजपा और कांग्रेस के बडे़ नेताओं के उत्तराखंड दौरे तय हो गए हैं।
सूत्रों की माने तो अभी तक प्रदेश स्तरीय नेताओं की बैठकों मंे विधानसभा चुनाव में जीत के लिए बनी रणनीति को पार्टी हाईकमान को भेज दिया गया है और पार्टी हाईकमान की स्वीकृति के बाद इस पर फिर से मंथन होगा। वैसे भी विधानसभा चुनाव में सफलता की कुंजी माने जाने वाले बूथ प्रबंधन को इस बार भी सबसे अधिक प्राथमिकता दी जा रही है। प्रत्येक बूथ पर कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारी तय करने, मतदाता सूची के पुनरीक्षण और छूटे हुए मतदाताओं को जोड़ने के लिए विशेष अभियान चलाने की योजना बनाई जा रही है। राजनैतिक बैठकों में मंथन का सबसे बड़ा केंद्र बिंदु राज्य का साइलेंट वोटर है। इसमें विशेष रूप से पहाड़ की मातृशक्ति और युवा वर्ग शामिल हैं। रणनीतिकार जानते हैं कि रैलियों में दिखने वाली भीड़ अक्सर वोटों में तब्दील नहीं होती, इसलिए इस बार फोकस डोर-टू-डोर संवाद और महिलाओं के कल्याण की योजनाओं को घर-घर तक पहुंचाने पर है।
इसके साथ ही उत्तराखंड के संदर्भ में भू-कानून, पलायन और रोजगार जैसे मुद्दे हमेशा हावी रहते हैं। रणनीति इस बार ऐसी बनाई जा रही है, जिसमें राष्ट्रीय नेतृत्व की छवि का मेल स्थानीय मुद्दों से कराया जा सके। बैठकों में इस बात पर मंथन हो रहा है कि कैसे क्षेत्रीय अस्मिता को ठेस पहुंचाए बिना विकास के बड़े दावों को पेश किया जाए। राजनीतिक मंथन का अमृत वही दल चख पाएगा, जो जनता की भावनाओं और जमीनी हकीकत के बीच सही संतुलन बना पाएगा। इस बार मुकाबला केवल चेहरे का नहीं, बल्कि भरोसे का है।
सूत्रों के अनुसार पार्टी नेतृत्व जल्द प्रदेश स्तर के नेताओं के साथ-साथ जिला और मंडल स्तर के पदाधिकारियों के साथ बैठक कर जमीनी फीडबैक लेना और उसी के आधार पर चुनावी रणनीति को अंतिम रूप देने की दिशा में कार्य कर रहा है। कुल मिलाकर, यह रणनीतिक मंथन आगामी चुनाव की दिशा और दशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। अब देखना होगा कि यह योजनाएं जमीनी स्तर पर कितना असर दिखा पाती हैं। यह आने वाले चुनाव के परिणाम पर निर्भर करेगा और सत्य का पता भी चल पाएगा।
दूनघाटी बनेगी सियासी ‘रणभूमि’
विधानसभा का विशेष सत्र में नारी सम्मान लोकतंत्र में अधिकार पर होगी चर्चा
भाजपा इस अधिकार को बता रही है अपनी उपलब्धि और कांग्रेस सरकार की नाकामी
विधानसभा सत्र से पूर्व भाजपा और कांग्रेस नेताओं के बयान पक्ष-विपक्ष में आने लगे
देहरादून। 28 अप्रैल को विधानसभा का विशेष सत्र है और यह सत्र भी सियासी रणभूमि बनने वाला है। राजनैतिक सूत्रों की माने तो सत्र तो नारी शक्ति वंदन पर चर्चा के लिए है, लेकिन सदन में बहस कम, शोर ज्यादा होगा। यह वही मुद्दा है जो सालों से राजनीतिक दलों के घोषणापत्र में सजता रहा है और संसद में अटकता रहा है। एक ओर भाजपा जहां इसे अपनी उपलब्धि बताना चाहती है और कांग्रेस इसे अधूरा वादा कहती है।
विधानसभा का कोई भी सत्र हो उसमें हो-हल्ला होना लाजमी है। सत्ता पक्ष अपनी मनमर्जी चलाती है और विपक्ष सरकार का विरोध करती है। यह प्रथा लंबे समय से चली आ रही है। विधानसभा के सदन में राजनीति न हो यह हो नहीं सकता है। इसके साथ ही विधानसभा में नेता मर्यादा को तार-तार न करें यह भी हो नहीं सकता है। हालांकि विधानसभा सत्र के लिए सभी तैयारियां पूरी हो गई हैं इसके बाद भी सत्र के दौरान पक्ष और विपक्ष को असली चेहरा तो दिखेगा ही।
विधानसभा सत्र से पूर्व भाजपा और कांग्रेस नेताओं के बयान आने लगे है। भाजपा इसे अपनी उपलब्धि बताकर प्रचारित कर रही है। वही कांग्रेस इसे भाजपा सरकार की नाकामी बात रही है। कांग्रेस तो सदन से लेकर सड़क तक आंदोलन करने के मूड में है। शायद यही कारण है कि कांग्रेस ने अपनी चारधाम यात्रा को फिलहाल रदद कर दिया है। क्योंकि सदन में हो-हल्ला करने का समय है तो इसे कांग्रेस गवा नहीं सकती है।
विधानसभा सत्र के बहाने कांग्रेस की रणनीति साफ दिख रही है कि पहले सदन में सरकार को घेरो, फिर सड़क पर उतरकर माहौल बनाओ। यह राजनीति का क्लासिक माडल है अंदर हमला, बाहर अभियान। लेकिन जनता पूछ रही है इस रणनीति में उसका स्थान कहां है? क्या वह सिर्फ भीड़ है, या फिर वोट बैंक?
कांग्रेस चारधाम यात्रा निकलेगी, बयान आएंगे, सदन में हंगामा होगा, टीवी डिबेट होंगी, लेकिन स्वास्थ्य सेवाएं सुधरेंगी या नहीं, यात्रियों की सुरक्षा बढ़ेगी या नहीं, यह अब भी सवाल ही है। देहरादून से लेकर बदरीनाथ तक और विधानसभा से लेकर गांव तक राजनीति अपनी पूरी ताकत में है। कांग्रेस चुनावी साल में सदन से लेकर सड़क तक अपनी ताकत न दिखाये यह हो नहीं सकता है।
‘हां मैं तांत्रिक हूं ...’
सोशल मीडिया पर एक पोस्ट लिखकर खुद को तांत्रिक माना
पूर्व सीएम हरीश रावत ने खोले अपने राजनीतिक जीवन के पन्ने
पूर्व में कांग्रेस के एक नेता ने किया था नेता और तांत्रिक का जिक्र
देहरादून। कांग्रेस लंबे समय से सत्ता से दूर है और सत्ता में वापसी के लिए छटपटा रही है। इसके चलते कांग्रेस के अंदर भी कुछ ठीक नहीं चल रहा है। कांग्रेस के बडे़े नेता के कुछ दिन पूर्व के राजनैतिक अवकाश का मुद्दा अभी खत्म भी नहीं हुआ था कि एक नया मुद्दा कांग्रेस के लिए मुसीबत बनने वाला है। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट लिखकर खुद को तांत्रिक माना है। इसके बाद सूबे की राजनीति में एक नया तूफान आ गया है।
बता दें कि कुछ दिन पहले हल्द्वानी में कांग्रेस की प्रदेश प्रभारी कुमारी शैलजा के सामने कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय सचिव प्रकाश जोशी ने अपने संबोधन में नेता और तांत्रिक का जिक्र किया था। उन्होंने कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए नेता और तांत्रिक के बीच का अंतर समझने की बात कही थी। उनके इस बयान के बाद उत्तराखंड में चर्चा तेज हो गई थी कि आखिर कांग्रेस में यह तांत्रिक कौन है। अब पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने अपनी चुप्पी तोड़ते हुए सेशल मीडिया अकाउंट पर एक लंबी पोस्ट लिख कर खुद को तांत्रिक बताया है।
अपनी पोस्ट में उन्होंने लिखा है कि मैं तांत्रिक हूं। 1968 में देश के सभी दिग्गज आदरणीय इंदिरा गांधी जी के विरु( हो गए थे। सिंडिकेट-इंडिकेट का संघर्ष था। लखनऊ विश्वविद्यालय में उन्हें आमंत्रित किया। राज नारायण और तत्कालीन मुख्यमंत्री टीएम सिंह आदि के प्रबल विरोध के बावजूद लखनऊ विश्वविद्यालय में उनकी सभा करवाई। सबके मन को जीतकर वह दिल्ली चली गई। उन्होंने इतिहास बनाया और मैं युवक कांग्रेस का कार्यकर्ता बन गया। वर्ष 1977 में हमारे जिलों में कांग्रेस लगभग खाली हो गई। मैं, इंदिरा भक्त कांग्रेसजनों और युवा कांग्रेसजनों के साथ कांग्रेस का झंडा थामकर खड़ा रहा। सन् 1990 के बाद पहाड़ों में कांग्रेस संकट में आईई। कई सूरमा दाएं-बाएं हो गए। राज्य आंदोलन के फलस्वरूप कांग्रेस को खलनायक चित्रित करने लगे। यहां तक कि सन् 1996 में लोकसभा का चुनाव लड़ने के लिए उम्मीदवार नहीं मिल पा रहे थे, तब भी मैं साथियों के साथ कांग्रेस का झंडा थामे खड़ा रहा।
आज के कालखंड में भी चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों के खिलाफ झंडा थामे खड़ा हूं। केंद्र सरकार का दंश झेला और झेल रहा हूं। मगर कांग्रेस और उत्तराखंडियत का झंडा थामे अटल खड़ा हूं। मैं हारा, मगर हार के बाद न कांग्रेस छोड़ी, न क्षेत्र छोड़ा। यदि अल्मोड़ा संसदीय सीट आरक्षित नहीं होती, हारता-जीतता मगर वहीं से लड़ता। हरिद्वार ने मुझे अपनाया, तो मैं अभी पूरी शक्ति और समर्पण के साथ हरिद्वार के भाईई-बहनों के साथ हूं। मैंने हर चुनाव में सीट नहीं बदली है। कार्यकर्ताओं के साथ हार में भी खड़ा रहा हूं। यही कारण है कि जिन विधानसभा सीटों में मैं हारा, दूसरे चुनाव में कांग्रेस जीती है। शायद इसलिए मैं तांत्रिक हूं, शायद इसीलिए मैं घमंडी हूं और गलतफहमी का शिकार हूं। तंत्र का सहारा लिए अब भी खड़ा हूं। मगर यह तंत्र कार्यकर्ताओं और उत्तराखंडियत पर विश्वास रखने वाले भाईई-बहनों का है।
देवभूमि के रण में ‘एंटी-इंकंबेंसी’
भाजपा का सीएम धामी का चेहरा और विकास पर दांव
कांग्रेस पार्टी सत्ता में वापसी के लिए कर रही जद्दोजहद
भाजपा करवा रही है वर्तमान विधायकों का परफार्मेंस सर्वे
देहरादून। उत्तराखंड में सत्ता की कुर्सी तक पहुँचने का रास्ता पहाड़ों की चढ़ाई जितना ही कठिन माना जाता है। हालाँकि 2022 में भाजपा ने मिथक तोड़ते हुए दोबारा सत्ता हासिल की थी, लेकिन 2027 की डगर दोनों मुख्य दलोंकृभाजपा और कांग्रेसकृके लिए नई चुनौतियाँ लेकर आ रही है। भाजपा ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह आगामी चुनाव मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में ही लड़ेगी। भाजपा अपने वर्तमान विधायकों का परफार्मेंस सर्वे करा रही है ताकि एंटी-इंकंबेंसी ‘सत्ता विरोधी लहर’ को कम करने के लिए टिकट वितरण में बदलाव किया जा सके। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस इस बार परिवर्तन के नारे के साथ मैदान में उतरने की तैयारी में है।
उत्तराखंड में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक माहौल तेजी से गर्म होता जा रहा है। राज्य की दो प्रमुख पार्टियांकृभारतीय जनता पार्टी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेसकृअपनी-अपनी रणनीतियों को अंतिम रूप देने में जुट गई हैं। इसके अलावा आम आदमी पार्टी और क्षेत्रीय दल भी इस बार चुनावी मैदान में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे मुकाबला और दिलचस्प होता नजर आ रहा है।
इस चुनाव में सबसे बड़ा मुद्दा बेरोजगारी, पलायन और महंगाई बना हुआ है। पहाड़ी क्षेत्रों से लगातार हो रहा पलायन राज्य के लिए एक बड़ी चुनौती है, जिसे लेकर विपक्ष सरकार पर लगातार सवाल उठा रहा है। वहीं, सत्ताधारी भाजपा विकास कार्यों, सड़क, स्वास्थ्य और पर्यटन के क्षेत्र में अपनी उपलब्धियों को गिनाकर जनता का समर्थन हासिल करने की कोशिश कर रही है। युवाओं के लिए रोजगार और महिलाओं की सुरक्षा जैसे मुद्दे भी चुनावी बहस के केंद्र में हैं।
राजनीतिक समीकरणों की बात करें तो इस बार टिकट वितरण और स्थानीय नेतृत्व की भूमिका काफी अहम रहने वाली है। कई सीटों पर बगावत और असंतोष की स्थिति भी देखने को मिल सकती है, जो चुनाव परिणामों को प्रभावित कर सकती है। इसके साथ ही, नए मतदाताओं की भूमिका भी निर्णायक साबित हो सकती है, जिनके मुद्दे और अपेक्षाएं पारंपरिक राजनीति से अलग हैं। वहीं दूसरी ओर चुनाव आयोग की तैयारियां भी जोरों पर हैं और जल्द ही चुनाव की तारीखों की घोषणा होने की संभावना है। भारत निर्वाचन आयोग राज्य में निष्पक्ष और शांतिपूर्ण मतदान सुनिश्चित करने के लिए सुरक्षा और प्रशासनिक व्यवस्थाओं को मजबूत कर रहा है।
दूसरी ओर कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल जैसे नेताओं की सक्रियता और स्थानीय मुद्दों अंकिता भंडारी केस, बेरोजगारी और अग्निवीर योजना को लेकर कांग्रेस सरकार को घेरने की कोशिश कर रही है। इसके साथ ही पार्टी के भीतर की गुटबाजी और मजबूत संगठनात्मक ढांचे की कमी कांग्रेस के लिए अभी भी एक बड़ा रोड़ा बनी हुई है। वही प्रदेश में आम आदमी पार्टी और यूकेडी पिछली बार के प्रदर्शन के बाद अपनी खोई हुई जमीन तलाश रही है, जबकि उत्तराखंड क्रांति दल मूल निवास और भू-कानून जैसे भावनात्मक मुद्दों पर क्षेत्रीय मतदाताओं को एकजुट करने का प्रयास कर रहा है।
उत्तराखंड का आगामी विधानसभा चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का सवाल नहीं, बल्कि राज्य के भविष्य की दिशा तय करने वाला अहम पड़ाव है। अब देखना दिलचस्प होगा कि जनता किसे अपना विश्वास देती है और किसके हाथ में राज्य की बागडोर सौंपती है। 2026 का अंत होते-होते उत्तराखंड की सड़कों पर चुनावी रैलियों का शोर बढ़ जाएगा। जहाँ भाजपा डबल इंजन की ताकत और धामी के युवा चेहरे पर भरोसा कर रही है, वहीं कांग्रेस जनता के बीच असंतोष को वोटों में बदलने की ताक में है।
पहाड़ बनाम मैदान का बदलता संतुलन
क्षेत्रीय असंतुलन चुनावी रणनीतियों को करेगा चुनाव में प्रभावित
हालिया निकाय चुनावों में निर्दलीयों की जीत से बढ़ी दलों की चिंता
भाजपा के मजबूत बूथ मैनेजमेंट पर कांग्रेस की रणनीति है कमजोर
देहरादून। चुनावी साल में राजनीति के नजरिए से प्रदेश की असली बात न हो तो फिर क्या बात हो सकती है। प्रदेश की सरकारों के एसी रूमों में बनी रणनीतियों के चलते आज पहाड़ खाली हो गये हैं और मैदान ओवरफ्लो। इससे साफ जाहिर होता है कि इसके दुष्परिणाम क्या होंगे। उत्तराखंड का चुनावी गणित हमेशा से ‘पहाड़ बनाम मैदान’ के संतुलन पर टिका रहा है। मैदानी क्षेत्रों में जहां जनसंख्या अधिक है, वहीं पहाड़ी क्षेत्रों में मुद्दे अलग और अधिक संवेदनशील होते हैंकृजैसे पलायन, सड़क और स्वास्थ्य सुविधाएं। इस बार भी यही क्षेत्रीय असंतुलन चुनावी रणनीतियों को प्रभावित कर रहा है।
यह साल विधानसभा चुनावों का सेमीफाइनल है और इस साल सत्ता के गलियारों से निकलकर पहाड़ की कंदराओं तक राजनेताओं के पहुंच का सिलसिला शुरू हो गया है। सूबे में एक ओर जहां भाजपा अपने विकास कार्यों और हिंदुत्व के एजेंडे को धार दे रही है, जबकि कांग्रेस छोटे क्षेत्रीय दलों और निर्दलीयों के साथ मिलकर एक नया विकल्प पेश करने की फिराक में है। चुनावी साल में भाजपा और कांग्रेस के लिए हर बार नई मुसीबते सामने आती हैं। इस बार भी ऐसा लगता है कि छोटे दलों की सक्रियता फिर से इन दलों को परेशान कर सकती है।
चुनावी साल में भाजपा जहाँ अपने मिशन रिपीट के जोश को बरकरार रखने की कोशिश में है, वहीं कांग्रेस अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने के लिए नई रणनीति बुन रही है। हालिया निकाय चुनावों में भाजपा ने नगर निगमों और पालिकाओं में बढ़त तो बनाई, लेकिन निर्दलीयों की बड़ी जीत ने दोनों प्रमुख दलों की चिंता बढ़ा दी है। विशेषकर पहाड़ी जिलों में निर्दलीय प्रत्याशियों का दबदबा यह संकेत देता है कि जनता अब केवल पार्टी के नाम पर नहीं, बल्कि उम्मीदवार के स्थानीय रसूख और काम पर मुहर लगा रही है।
विपक्ष में बैठी कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती आंतरिक गुटबाजी को खत्म करना है। हालांकि, बेरोजगारी, भू-कानून और अंकिता भंडारी प्रकरण जैसे मुद्दों पर पार्टी ने सरकार को घेरने की कोशिश की है, लेकिन संगठन के स्तर पर अभी भी कांग्रेस को एक ऐसी धार की तलाश है जो भाजपा के मजबूत बूथ मैनेजमेंट का मुकाबला कर सके।
आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर प्रदेश में सत्ता और विपक्ष दोनों अपनी-अपनी रणनीतियों को धार दे रहे हैं। लेकिन इस बार का चुनाव पारंपरिक मुद्दों से आगे बढ़कर ‘नए समीकरणों’ और ‘बदलते मतदाता व्यवहार’ का चुनाव बनता दिख रहा है। राज्य में सत्तारूढ़ दल के सामने सबसे बड़ा सवाल एंटी-इंकम्बेंसी को लेकर है। मतदाता अब सिर्फ घोषणाओं से नहीं, बल्कि जमीनी बदलाव के आधार पर निर्णय लेने के मूड में दिखाई दे रहा है।
उत्तराखंड की राजनीति में समय-समय पर तीसरे विकल्प की चर्चा होती रही है। क्षेत्रीय दल और निर्दलीय उम्मीदवार कुछ सीटों पर प्रभाव डाल सकते हैं, खासकर वहां जहां स्थानीय मुद्दे और उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़ मजबूत होती है। हालांकि, पूरे राज्य में तीसरे मोर्चे का प्रभाव सीमित ही रहने की संभावना है, लेकिन यह बड़े दलों के वोट शेयर को जरूर प्रभावित कर सकता है। इस बार भी अभी तक यूकेडी के युवा ब्रिगेड की प्रदेश के पहाड़ी जिलों में सक्रियता भाजपा और कांग्रेस को सोचने पर मजबूर कर रही है। इसके साथ ही अपनी रणनीति भी बदलने की ओर इशारा कर रही है। चुनाव परिणाम क्या होंगे यह तो बाद में पता चलेगा, लेकिन चुनाव के इस सेमीफाइलन साल में भाजपा और कांग्रेस के लिए यूकेडी बड़ी समस्या के रूप में दिख रही है।
‘मैत का मसाण’ एक लोक पीड़ा
पहाड़ में लोक विश्वास और परंपरा की है यह एक अनोखी कथा
मैत का मसाण ऐसी कड़वी सच्चाई है, जो कभी पीछा नहीं छोड़ती
उत्तराखंड के लोकगीतों व न्यौली में मिलता है इसका विस्तृत वर्णन
देहरादून। पहाड़ की लोक संस्कृति में मायका एक बेटी के लिए भावनाओं का सबसे सुरक्षित कोना होता है। लेकिन मैत का मसाण एक ऐसी कड़वी सच्चाई है, जो उनका पीछा नहीं छोड़ती है। एक बेटी, जिसने पूरा बचपन एक घर की चौखट के भीतर बिताया, शादी के बाद उसी घर के लिए पराई हो जाती है और उसके साथ ही मैत का मसाण भी उसके साथ चला जाता है।
पहाड़ी गांवों में सामाजिक ढांचा कुछ इस तरह बुना गया है कि बेटी को दान की वस्तु मानकर विदा किया जाता है। शादी के बाद उसका गोत्र और कुल बदल जाता है। विडंबना देखिए कि जिस आंगन में उसने चलना सीखा, मृत्यु के बाद वहां उसे दो गज जमीन मिलना भी दुश्वार हो जाता है। मैत का मसाण शब्द दरअसल उस पुरुष प्रधान सोच का प्रतीक है, जो यह मानती है कि स्त्री का अस्तित्व केवल उसके पति के घर से जुड़ा है। यदि कोई विवाहित महिला अपने मायके में अंतिम सांस लेती है, तो अक्सर शव को ससुराल भेजने की जद्दोजहद शुरू हो जाती है, ताकि कुल की परंपरा न टूटे।
उत्तराखंड के कई लोकगीतों और न्यौली में इस विछोह का वर्णन मिलता है। झुमैलो और चौती जैसे गीतों में बेटियां गाती हैं कि बाबा के घर में मेरा क्या है? बस एक याद मैत का मसाण बनने का डर असल में एक स्त्री के उस अकेलेपन को दर्शाता है, जहाँ वह न पूरी तरह ससुराल की हो पाती है और न ही मायके का उस पर कोई कानूनी या सामाजिक दावा बचता है। यह केवल एक धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक चोट भी है जो महिलाओं को ताउम्र अहसास कराती है कि उनका अपना कोई स्थायी घर नहीं है।
बता दें कि देवभूमि उत्तराखंड अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ रहस्यमयी लोककथाओं और परंपराओं के लिए भी जानी जाती है। इन्हीं लोकविश्वासों में एक नाम अक्सर सुनने को मिलता हैकृमैत का मसाण। पहाड़ों में प्रचलित यह कथा सिर्फ डर या अंधविश्वास की कहानी नहीं, बल्कि समाज की मान्यताओं, भावनाओं और सांस्कृतिक सोच को दर्शाती है।
मसाण शब्द उत्तराखंड के लोकजीवन में उन आत्माओं या शक्तियों के लिए इस्तेमाल होता है, जिन्हें असमय या असंतुष्ट माना जाता है। वहीं मैत का अर्थ होता है मायका या जन्मस्थान। इस तरह मैट का मसाण उस आत्मा को कहा जाता है, जो अपने मायके से जुड़ी मानी जाती है। लोकमान्यता है कि ऐसी आत्माएं अपने अपनों के आसपास रहती हैं और कभी-कभी संकेतों के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज कराती हैं।
ग्रामीण इलाकों में इस तरह की कहानियां पीढ़ी दर पीढ़ी सुनाई जाती रही हैं। खासकर बुजुर्ग लोग इसे एक चेतावनी या सीख के रूप में भी बताते हैंकृकि जीवन में रिश्तों, परंपराओं और संस्कारों का सम्मान जरूरी है। कई जगहों पर इससे जुड़े छोटे-छोटे अनुष्ठान और पूजा-पाठ भी किए जाते हैं, ताकि घर-परिवार में शांति बनी रहे।
हालांकि, आधुनिक समय में लोग इन बातों को अलग-अलग नजरिए से देखते हैं। कुछ लोग इसे आस्था और संस्कृति का हिस्सा मानते हैं, तो कुछ इसे सिर्फ लोककथा या कल्पना समझते हैं। लेकिन एक बात साफ है कि मैत का मसाण जैसी कहानियां उत्तराखंड की समृ( लोकसंस्कृति का अहम हिस्सा हैं और इन्हें समझना, उस क्षेत्र की पहचान को समझने जैसा है।
मैट का मसाण केवल एक रहस्यमयी कथा नहीं, बल्कि उत्तराखंड के लोगों की भावनाओं, विश्वासों और सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ी एक गहरी परंपरा हैकृजो आज भी पहाड़ों की हवा में जीवित है।
आज जब नारी शक्ति और समानता की बातें हो रही हैं, तो इन पुरानी और दकियानूसी परंपराओं पर भी सवाल उठने लगे हैं। नई पीढ़ी अब इस बात को स्वीकार करने लगी है कि बेटी का अधिकार भी माता-पिता की मिट्टी पर उतना ही है जितना बेटे का। कई प्रगतिशील परिवारों ने इन वर्जनाओं को तोड़कर बेटियों को मायके में ही अंतिम विदाई दी है। हालांकि, दूरस्थ ग्रामीण अंचलों में आज भी मैत का मसाण एक वर्जना है। इस सोच को बदलने की जरूरत है ताकि पहाड़ की बेटियों को जीते जी ही नहीं, बल्कि मृत्यु के पश्चात भी अपने घर में पूरा सम्मान और स्थान मिल सके।
दिन में ‘बंदर’ और रात को ‘सुअर’
पहाड़ की दास्तान
---दिन में बंदरों पर पहरा, रात को सुअरों का आतंक
---पलायन के बीच खेती बचाना ग्रामीणों की चुनौती
---जंगली जानवरों से प्रभावित है पहाड़ के सभी गांव
देहरादून। मुझे अपने बचपन के वह दिन याद हैं जब पहाड़ छोटे-छोटे खेतों में जब सुबह की पहली किरण पड़ती थी, तो कभी यहाँ हरियाली मुस्कुराती थी। कोदा, झंगोरा और गहत की महक से मन तृप्त होता था। लेकिन आज मंजर बदल चुका है। अब पहाड़ में सुबह लोग हल की मूंठ नहीं थामते, बल्कि हाथ में गुलेल और पत्थर लेकर बंदरों को भगाने के साथ सुबह की शुरूआत होती है।
बता दें कि पहाड़ की सुबह कभी खेतों में हरियाली, बैलों की घंटियों और धान-गेहूं की खुशबू से शुरू होती थी। गांव की महिलाएं पहाड़ के पगडंडियों वाले खेतों की ओर निकलती थीं और यहां के पुरूष अपनी मेहनत से पत्थरों के बीच अनाज बोते थे। लेकिन आज वही खेत सूने पड़े हैं। बंदरों और जंगली सुअरों ने पहाड़ और पहाड़ के लोगों की बची-खुची उम्मीद भी रौंद दी है।
उत्तराखंड के पर्वतीय इलाकों में खेती अब संघर्ष बन चुकी है। किसान दिन-रात मेहनत कर फसल तैयार करता है, लेकिन कटाई से पहले ही बंदरों के झुंड और जंगली सुअर खेतों में घुसकर सब कुछ बर्बाद कर देते हैं। मक्का, गेहूं, आलू, मंडुवा और सब्जियां अब इंसानों से ज्यादा जंगली जानवरों का भोजन बन रही हैं।
रुद्रप्रयाग जिले के रूमसी गांव के जगतराम कहते हैं अब खेती नहीं, जंग लड़ रहे हैं। यह दर्द अकेले उनका नहीं, बल्कि पूरे उत्तराखंड के पहाड़ी अंचल का है। दिन के उजाले में बंदरों की टोली हमला करती है। वह केवल अनाज नहीं खाते, बल्कि फसल को तहस-नहस कर देते हैं। छोटे-छोटे बच्चों की तरह पाली गई पौध को जब बंदर उखाड़ कर फेंक देते हैं, तो किसान की आंखों में आंसू नहीं, एक गहरी शून्यता उतर आती है।
सूरज ढलते ही जंगली सुअर सामने आ जाते है। टिन के कनस्तरों को पीटकर सुअरों को भगाने की कोशिश होती है, लेकिन अक्सर सुअर कुछ ही मिनटों में पूरी मेहनत को मिट्टी में मिला देते हैं। आज पहाड़ में जंगली जानवरों के डर से खेती छोड़ने वाले परिवारों की संख्या बढ़ती जा रही है।
ग्रामीणों का कहना है कि पहले जंगल और गांव के बीच संतुलन था, लेकिन अब जंगलों का दायरा बदलने और मानव हस्तक्षेप बढ़ने से जंगली जानवर आबादी की ओर आने लगे हैं। आज के समय में स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि कई गांवों में लोगों ने खेती छोड़ दी है, जो खेत कभी अन्न उगाते थे, वहां अब घास और झाड़ियां नजर आती हैं। गांव की बूढ़ी आंखें आज भी उस दौर को याद करती हैं, जब पहाड़ आत्मनिर्भर था और खेत जीवन की पहचान थे। अगर ऐसा ही रहा तो आने वाली पीढ़ियां पहाड़ के खेतों को केवल किताबों में ही हरे-भरे देखने और पढ़ने के लिए मजबूर हो जाएगी।
पहाड़ की ‘खोली’ के गणेश
पत्थरों की विरासत और लकड़ी पर उकेरे होते थे भगवान
यह है आस्था, प्रकृति और लोकजीवन का अद्भुत संगम
आज पहाड़ में कई घरों में लटके हैं ताले और दीवारें ढह रही
खंडहरों में खोली के गणेश आज भी अपनी जगह पर अडिग
संतोष बेंजवाल
देहरादून। हिमालय की वादियों में जब सर्द हवाएं चलती हैं और धुंध की चादर पुराने गांवों को ढक लेती है, तब भी ऊंचे पहाड़ों पर बने पठाल की छत वाले घरों की चौखटें एक अलग ही चमक बिखेरती हैं। इन घरों के मुख्य द्वार, जिसे पहाड़ी में खोली कहा जाता है, पर विराजे गणेश जी केवल एक मूर्ति नहीं, बल्कि उस घर के सबसे बुजुर्ग सदस्य की तरह पहरेदार होते हैं।
पहाड़ के गांवों में जाने पर गढ़रत्न नरेंद्र सिंह नेगी का यह मांगल गीत याद आता है-दैणा होया खोली का गणेशा हे...दैणा होया मोरी का नारेणा हे... पहाड़ के उन पुराने घरों को देखकर जिनकी खोलियों में आज भी गणेश जी विराजमान है। आपको बता दें कि पुराने समय में जब पहाड़ में घर बनते थे, तो सबसे पहले स्थानीय शिल्पकार को बुलाया जाता था। वह केवल मिस्त्री नहीं, बल्कि एक कलाकार होता था। टुन या देवदार की सख्त लकड़ी पर जब उसकी छैनी चलती थी, तो वह सबसे पहले चौखट के ठीक बीचों-बीच सिरदल पर एक छोटा सा सिंहासन बनाता था।
उस छोटे से खांचे में भगवान गणेश की आकृति उकेरी जाती थी। हाथ में मोदक, बड़ी सूंड और सौम्य आंखेंकृ गणेश जी का यह स्वरूप विघ्नहर्ता के रूप में घर की दहलीज पर बैठ जाता था। माना जाता था कि जिस घर की खोली में गणेश होंगे, वहाँ दुख और दरिद्रता कभी प्रवेश नहीं कर पाएगी।
यह दर्शाता है कि देवभूमि उत्तराखंड के पहाड़ों में धार्मिक आस्था केवल मंदिरों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लोकजीवन की हर परत में रची-बसी है। गढ़वाल और कुमाऊं के ग्रामीण इलाकों में आज प्रकृति, परिवार और संस्कृति के गहरे संबंध खोली के गणेश के रूप में दिखते हैं। पहले पहाड़ के हर घरों के मुख्य द्वार पर गणेश की आकृति होती थी, लेकिन बदलते परिवेश में यह अब यह कम दिखती है।
पहाड़ी की संस्कृति और स्थापत्य कला में खोली का गणेश मात्र एक मूर्ति नहीं, बल्कि घर की मर्यादा, सुरक्षा और सौभाग्य का प्रतीक है। पहाड़ों के पुराने घरों की नक्काशीदार लकड़ी की चौखट ‘खोली’ के ऊपर विराजमान गणेश जी की यह परंपरा आज भी पहाड़ की पहचान है। पहाड़ी भाषा में खोली का अर्थकृमुख्य द्वार या देहरी होता है। हिंदू धर्म में गणेश जी को विघ्नहर्ता और प्रथम पूज्य माना गया है। शायद यही कारण रहा होगा कि हमारे बुर्जूगों ने इसे सर्वोच्च स्थान दिया होगा।
आज जब हम पहाड़ के वीरान होते गांवों की ओर देखते हैं, तो दिल बैठ जाता है। कई घरों में ताले लटके हैं, दीवारें ढह रही हैं, लेकिन उन खंडहरों की चौखटों पर आज भी वह खोली का गणेश अपनी जगह पर अडिग है। पलायन ने इंसान को तो घर से दूर कर दिया, लेकिन गणेश जी आज भी उसी सूनी देहरी की रक्षा कर रहे हैं। कई लोग अब इन पुरानी चौखटों को उखाड़कर शहरों में ले जा रहे हैं, ताकि आधुनिक कंक्रीट के घरों में अपने पूर्वजों की उस आस्था को फिर से जीवित कर सकें।
पहाड़ के गांव की सरहद पर ‘अदृष्य प्रहरी’
देवभूमि उत्तराखंड के कण-कण में माना जाता है देवताओं का वास
यहाँ की सबसे अनूठी परंपरा है क्षेत्रपाल या भूमिपाल की अवधारणा
पहाड़ के हर गांव में क्षेत्र रक्षक के रूप में करते हैं क्षेत्रपाल देवता वास
देहरादून। गांव में स्थित किसी पुराने पेड़ के नीचे, पत्थरों से बना एक छोटा सा मंदिर, जहां लोहे के त्रिशूल, घंटियां और पत्थर की मूर्तियां क्षेत्रपाल देवता के मंदिर में होती हैं। पहाड़ के हर गांव की सरहद पर एक ऐसा रक्षक देवता विराजमान होता है। यह देवता सिर्फ पूजा के प्रतीक नहीं, बल्कि क्षेत्र के रक्षक, मार्गदर्शक और न्याय के प्रतीक माने जाते हैं।
पहाड़ की परंपरा के अनुसार हर गांव की अपनी एक निश्चित सीमा होती है। इस सीमा की रक्षा का उत्तरदायित्व क्षेत्र रक्षक देवता का होता है। मान्यता है कि जब गांव के लोग सो जाते हैं, तब देवता अपने दिव्य घोड़े पर सवार होकर हाथ में मशाल लेकर गांव की सरहदों का चक्कर लगाते हैं और हिंसक पशुओं व बुरी आत्माओं से गांव की रक्षा करते हैं। गांव में कोई भी शुभ कार्य होकृचाहे शादी-ब्याह हो, जनेऊ संस्कार हो या नई फसल की कटाईकृसबसे पहले क्षेत्रपाल को याद किया जाता है।
क्षेत्रपाल देवताओं के मंदिर आलीशान नहीं होते। अक्सर किसी विशाल पीपल या बांज के पेड़ के नीचे, पत्थरों से बना एक छोटा सा थान होता है। वहां लोहे के त्रिशूल, घंटियां और पत्थर की मूर्तियां स्थापित होती हैं। यह सादगी इस बात का प्रतीक है कि देवता प्रकृति के कितने करीब हैं और हर ग्रामीण के लिए सुलभ हैं। पहाड़ के लोग कानून से ज्यादा अपने ग्राम देवता और क्षेत्रपाल से डरते हैं। यह विश्वास गांव में अनुशासन और नैतिकता बनाए रखने का काम करता है। ऐसी मान्यता है कि यदि गांव में कोई चोरी होती है या आपसी विवाद सुलझ नहीं पाता, तो क्षेत्रपाल के थान पर न्याय की गुहार लगाई जाती है।
आधुनिक युग में भी पहाड़ की यह परंपरा अटूट है। यह विज्ञान के लिए कौतूहल हो सकता है, लेकिन एक पहाड़ी के लिए यह उसकी आस्था और पहचान है। यह क्षेत्र रक्षक देवता केवल पत्थर की मूर्तियां नहीं, बल्कि हिमालयी संस्कृति के वह प्रहरी हैं, जिन्होंने सदियों से इन दुर्गम गांवों को जीवंत बनाए रखा है। आज भले ही युवा रोजगार के लिए शहरों की ओर पलायन कर रहे हों, लेकिन अपने गांव और क्षेत्र देवता के प्रति उनकी आस्था आज भी कायम है।
खेत की मेड़ पर ‘डाइनिंग टेबल’
--आपसी मेलजोल और प्रेम का सबसे बड़ा प्रतीक है ‘पंगत’
--पहाड़ की परंपराकृमें एक साथ बैठकर भोजन करने की प्रथा
--रिश्तों, श्रम और सादगी का यह उत्सव आज भी है जीवित
--पहली ग्रास अक्सर जमीन पर देवता या प्रकृति को देते हैं
देहरादून। उत्तराखंड के ऊंचे पहाड़ों पर जब धूप की पहली किरणें सीढ़ीदार खेतों को छूती हैं, तो केवल खेती का काम शुरू नहीं होता, बल्कि एक सांस्कृतिक उत्सव की शुरुआत होती है। पहाड़ में खेती केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि आपसी मेलजोल और प्रेम का सबसे बड़ा प्रतीक है। यहाँ की एक सुंदर परंपरा हैकृपंगत में बैठकर खेत में ही भोजन करना।
खेतों में एक साथ बैठकर खाना खाने की यह परंपरा उत्तराखंड के पहाड़ों की आत्मा है। यह हमें सिखाती है कि सादगी में भी खुशी होती है और मिल-बांटकर जीने में ही असली समृ(ि छिपी है। पहाड़ की यह परंपरा आज भी रिश्तों को मजबूत करने और जीवन को सहज बनाने का संदेश देती है। आज पलायन के कारण पहाड़ के कई खेत बंजर हो और मकान बीरान हो गए हैं, लेकिन जो लोग आज भी वहाँ टिके हैं, उन्होंने इस परंपरा को जीवित रखा है। खेत में बैठकर एक साथ भोजन करना हमें सिखाता है कि खुशी अकेले नहीं, बल्कि मिल-बाँटकर जीने में है। मिट्टी की वह सोंधी खुशबू और अपनों के साथ साझा किया गया वह पिसा हुआ नमक आज भी हर उस पहाड़ी की यादों में बसा है जो अपने गांव से दूर शहर में बैठा है।
उत्तराखंड के पहाड़ों में जीवन सिर्फ संघर्ष की कहानी नहीं, बल्कि सामूहिकता और अपनत्व की जीवंत परंपराओं का भी प्रतीक है। इन्हीं परंपराओं में एक खूबसूरत परंपरा हैकृखेतों में काम के बीच एक साथ बैठकर खाना खाना। यह सिर्फ भूख मिटाने का समय नहीं, बल्कि रिश्तों को सींचने, थकान मिटाने और जीवन को साझा करने का अवसर होता है। पहाड़ की कठिन भौगोलिक परिस्थिति में अकेले खेती करना लगभग असंभव है। इसलिए यहाँ सामूहिक मदद की परंपरा है। जब गाँव में किसी एक के खेत की रोपाई या कटाई होती है, तो पूरा गाँव अपनी कुदाल और दरांती लेकर पहुँच जाता है।
अकेले कुमाऊं के कुछ हिस्सों में खेतों में काम के दौरान हुड़का बजाकर लोकगीत गाए जाते हैं। धुनों की ताल पर हाथ चलते हैं और थकान का नामोनिशान नहीं होता। दोपहर होते-होते जब सूरज सिर पर आ जाता है, तो काम रोक दिया जाता है। किसी बड़े बांज या बुरांश के पेड़ की छाँव में, या सीधे खेत की मेड़ पर ही बैठने का इंतजाम होता है। खेत में बैठकर खाने का स्वाद किसी फाइव-स्टार होटल के खाने से कहीं ऊपर होता है। यह भोजन केवल भूख मिटाने के लिए नहीं होता, बल्कि यह गाँव की सोशल नेटवर्किंग का समय होता है। बुजुर्ग यहाँ बैठकर पुरानी कहानियाँ सुनाते हैं। युवा अपनी भविष्य की योजनाओं और शहर की बातों पर चर्चा करते हैं। महिलाएं अपने लोकगीतों जैसे झुमैलो या चांचरी के जरिए सुख-दुख साझा करती हैं। भोजन शुरू करने से पहले, पहली ग्रास कौर अक्सर जमीन पर देवता या प्रकृति के नाम से रखी जाती है। यह इस बात का प्रतीक है कि हम जो खा रहे हैं, वह उस मिट्टी की ही देन है।
हालांकि, बदलते समय और पलायन के कारण यह परंपरा धीरे-धीरे कम होती जा रही है। गांवों में लोगों की संख्या घट रही है और खेती का दायरा भी सिमट रहा है। इसके बावजूद जहां भी यह परंपरा जीवित है, वहां यह आज भी उतनी ही गर्मजोशी और आत्मीयता के साथ निभाई जाती है। प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्रों में जून से लेकर अगस्त तक धान की रौपाई के समय यह परंपरा हर जगह दिख जाती है। इसके साथ ही आज के दौर में जहां शादी व अन्य समारोहों में टेंट का प्रचलन बढ़ गया है। इसके बाद भी पहाड़ के गांवों में आज भी कई स्थानों पर इस परंपरा को निभाया जाता है। बदलते दौर में पहाड़ को अगर आपने करीब से देखना है तो आ जाइए मेने पहाड़।
‘डिजिटल कुरुक्षेत्र’ में पक्ष और विपक्ष की ‘अग्नि परीक्षा’
चुनावी रंण में एक अदृश्य जंग सोशल मीडिया पर भी दिखेगी
मतदाताओं की सोच प्रभावित कर चुनावी रणनीति का केंद्र बनेगा
सोशल मीडिया अब जनमत निर्माण का बनेगा एक बड़ा साधन
पार्टियां कंटेंट क्रिएशन और डिजिटल मैनेजमेंट पर कर रही निवेश
देहरादून। सूबे में आगामी विधानसभा चुनाव में जहां एक ओर रैलियां, जनसभाएं और रोड शो दिखेगा। वहीं दूसरी ओर एक अदृश्य जंग सोशल मीडिया पर लड़ी जाएगी। विधानसभा चुनाव में सोशल मीडिया की भूमिका भले ही आंखों से दिखाई न दे, लेकिन इसका प्रभाव बेहद गहरा हो सकता है। यह न केवल मतदाताओं की सोच को प्रभावित कर रहा है, बल्कि चुनावी रणनीति का केंद्र भी बन सकता है। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि इस बार की असली जंग सड़कों के साथ-साथ स्क्रीन पर भी लड़ी जाएगी है। इस यु( में पक्ष और विपक्ष की अग्नि परीक्षा होना लाजमी है।
बता दें कि सोशल मीडिया के युग में अदृश्य चुनावी यु( न हो यह हो ही नहीं सकता है। राजनीतिक दल अब सोशल मीडिया को सिर्फ प्रचार का माध्यम नहीं, बल्कि रणनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं। फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और व्हाट्सएप जैसे प्लेटफार्म पर माइक्रो-टारगेटिंग के जरिए अलग-अलग वर्गों तक अलग संदेश पहुंचाया जाएगा है। युवा, महिलाएं और पहली बार वोट देने वाले मतदाता इस डिजिटल अभियान के मुख्य केंद्र में हैं। छोटे-छोटे मैसेज, वीडियो क्लिप और ग्राफिक्स के जरिए राजनीतिक नैरेटिव तैयार किया जा रहा है। व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी कहे जाने वाले इस अनौपचारिक नेटवर्क के जरिए सूचनाएं तेजी से फैलती हैंकृचाहे वह सही हों या भ्रामक। यही कारण है कि सोशल मीडिया अब जनमत निर्माण का एक बड़ा साधन बनेगा है।
सोशल मीडिया की सबसे बड़ी ताकत यह है कि यह उन मतदाताओं तक भी पहुंच बना लेता है जो सार्वजनिक रूप से अपनी राय जाहिर नहीं करते। घर-घर तक पहुंचने वाले मोबाइल फोन और सस्ते इंटरनेट ने साइलेंट वोटर को सीधे राजनीतिक संवाद का हिस्सा बनते है। नेताओं की छवि गढ़ने और विरोधियों के खिलाफ माहौल बनाने में सोशल मीडिया अहम भूमिका निभा सकता है। एक वायरल वीडियो या पोस्ट कुछ ही घंटों में लाखों लोगों तक पहुंचकर धारणा बदल सकता है। यही वजह है कि पार्टियां अब कंटेंट क्रिएशन और डिजिटल मैनेजमेंट पर भारी निवेश कर रही हैं।
सोशल मीडिया पर जहां राष्ट्रीय मुद्दे तेजी से ट्रेंड करते हैं, वहीं स्थानीय समस्याओं को भी अब डिजिटल मंच मिल गया है। गांव की सड़क, पानी या रोजगार से जुड़ी समस्याएं भी वायरल होकर बड़े मुद्दे बन सकते हैं, जिससे चुनावी एजेंडा प्रभावित होता है। सत्ता पक्ष जहां अपनी उपलब्धियों को डिजिटल माध्यम से प्रचारित कर रहा है, वहीं विपक्ष इन प्लेटफार्म्स का उपयोग सरकार की कमियों को उजागर करने के लिए कर रहा है। दोनों के बीच यह डिजिटल मुकाबला चुनाव से पूर्व ही तेज हो गया है।
राजनैतिक विशेषज्ञों की माने तो आम मतदाता को आगामी विधानसभा चुनाव में ‘डिजिटल कुरुक्षेत्र’ के बारे में पूरी जानकारी रखनी होगी। हालांकि अभी चुनाव आयोग ने चुनाव की घोषणा तो नहीं की है, लेकिन अभी से सर्तक और जानकारी पूरी रखनी मतदाता की भी जिम्मेदारी है। क्योंकि वर्तमान जो दौर चल रहा है उससे आगामी विधानसभा चुनाव में मतदाता को ही नुकसान गलत पार्टी या नेता चुनकर हो सकता है। चुनाव अभी दूर है और सोशल मीडिया पर अभी से अदृश्य चुनावी वार चलने लगा है। इसलिए अभी से सावधान रहें।
पर्वतों से 2027 की जंग में परिवर्तन की लहर
कांग्रेस पार्टी की बड़े नेता की उत्तराखंड में बड़ी रैली करने की तैयारी
आक्रामक होकर कांग्रेस सत्ता पक्ष को हर मोर्चे पर देगा बड़ी चुनौती
युवा और महिला मोर्चा को भी सक्रिय भूमिका में लाने की रणनीति
देहरादून। उत्तराखंड में सियासत में पारा चढ़ने लगा है। आगामी विधानसभा चुनावों के लिए विपक्षी दल कांग्रेस ने कमर कस ली है। कांग्रेस प्रदेश सरकार को पलायन, बेरोजगारी, अग्निपथ योजना, भ्रष्टाचार, पेपर लीक, बढ़ती महंगाई, अंकिता भंडारी जैसे मुद्दों पर हमलावर रुख अपनाए हुए है।
पार्टी सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस अपने बड़े नेता की उत्तराखंड में बड़ी रैलियां करने की तैयारी में हैं। इसके जरिए कांग्रेस राज्य की जनता को बदलाव का संदेश देने की कोशिश करेगी। वैसे भी कांग्रेस प्रदेश प्रभारी कुमारी शैलजा ने स्पष्ट किया है कि पार्टी इस बार जमीन से जुड़े चेहरों पर दांव लगाएगी। देहरादून के राजपुर रोड स्थित कांग्रेस मुख्यालय में हुई हालिया बैठक में साफ संदेश हर बूथ, कांग्रेस मजबूत दिया गया।
पार्टी नेतृत्व ने बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करने पर विशेष ध्यान देना शुरू कर दिया है। जिला और ब्लाक स्तर पर कार्यकर्ताओं की बैठकें लगातार आयोजित की जा रही हैं, ताकि चुनावी तैयारियों को धार दी जा सके। युवा और महिला मोर्चा को भी सक्रिय भूमिका में लाने की रणनीति बनाई जा रही है।
वैसे भी राज्य में मुख्य मुकाबला भारतीय जनता पाटी और कांग्रेस के बीच माना जा रहा है। ऐसे में कांग्रेस अपनी रणनीति को आक्रामक बनाते हुए सत्ता पक्ष को हर मोर्चे पर चुनौती देने की तैयारी में है। इससे आने वाले विधानसभा चुनाव में इस बार मुकाबला कठिन होने वाला है।
बाक्स
भाजपा ने देवभूमि को केवल नारों में उलझाया है। हम काम की राजनीति और पहाड़ की जवानी को बचाने के संकल्प के साथ मैदान में उतर रहे हैं। जनता बदलाव का मन बना चुकी है।
गणेश गोदियाल, अध्यक्ष, उत्तराखंड कांग्रेस
डिजिटल’ चमक बनाम ‘जमीनी’ सच्चाई
--देवभूमि में सियासत अब केवल पहाड़ों की पगडंडियों तक सीमित नहीं रही
--हाई-स्पीड इंटरनेट और सोशल मीडिया पर ‘डिजिटल वार’ में हुई तब्दील
--उत्तराखंड की राजनीति में होने वाला है ‘डेटा’ और ‘डेमोग्राफी’ का बड़ा खेल
देहरादून। चुनावी साल में देवभूमि की सियासत अब केवल पहाड़ों की पगडंडियों तक सीमित नहीं रही, बल्कि वह हाई-स्पीड इंटरनेट और सोशल मीडिया के जरिए ‘डिजिटल वार’ में तब्दील हो चुकी है। आने वाले समय में उत्तराखंड की राजनीति में ‘डेटा’ और ‘डेमोग्राफी’ का बड़ा खेल होने वाला है। डिजिटल माध्यमों से सूचनाएं फैल रही हैं, लेकिन आने वाले विधानसभा चुनाव में वोट उसी दल को मिलेगा जो पहाड़ की धूल और धूप में जनता के बीच खड़ा होग।
बता दें कि राज्य सरकार और राजनीतिक दल लगातार ‘डिजिटल उत्तराखंड’ के नारे को आगे बढ़ा रहे हैं। ई-गवर्नेंस, आनलाइन सेवाएं, स्मार्ट सिटी, और सोशल मीडिया पर सक्रियताकृइन सबके जरिए विकास की एक आधुनिक तस्वीर पेश की जा रही है। सरकारी योजनाओं की जानकारी अब मोबाइल एप और पोर्टल के जरिए गांव-गांव तक पहुंचाने का दावा किया जा रहा है। नेताओं की डिजिटल रैलियां, फेसबुक लाइव और व्हाट्सऐप कैंपेन चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा बन चुके हैं।
डिजिटल चमक-धमक के बावजूद उत्तराखंड की जीत का रास्ता आज भी उन्हीं कठिन चढ़ाइयों और गांवों से होकर गुजरता है। प्रदेश में इस समय भू-कानून और मूल निवास इस वक्त का सबसे संवेदनशील मुद्दा है। जमीन पर लोग अपनी संस्कृति और संसाधनों को बचाने के लिए लामबंद हो रहे हैं। यह मुद्दा सोशल मीडिया पर तो है ही, लेकिन इसकी जड़ें पहाड़ के हर घर के चूल्हे तक पहुंच चुकी हैं। इसके साथ ही पलायन और रोजगार भी बड़ा मुद्दा बन गया है। ‘खंडित’ होते गांवों को बचाना और स्थानीय युवाओं को पहाड़ में ही रोजगार देना आज भी सबसे बड़ी चुनौती है। सड़कों का जाल बिछने के बावजूद, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में पलायन एक कड़वी सच्चाई बनी हुई है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या यह डिजिटल क्रांति पहाड़ के आखिरी गांव तक पहुंच पाई है? कई दूरस्थ इलाकों में आज भी नेटवर्क की समस्या, इंटरनेट की धीमी गति और डिजिटल साक्षरता की कमी बड़ी चुनौती बनी हुई है। डिजिटल दावों के बीच जमीनी हकीकत कुछ और कहानी बयां करती है। उत्तराखंड में ’पलायन’ सबसे बड़ा मुद्दा बना हुआ है। गांव खाली हो रहे हैं और युवा रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। बेरोजगारी का संकट भी गहराता जा रहा है, खासकर शिक्षित युवाओं में असंतोष बढ़ रहा है।
स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भी चिंता का विषय है। पहाड़ी क्षेत्रों में अस्पतालों की कमी, डाक्टरों की अनुपलब्धता और आपातकालीन सेवाओं का अभाव आज भी लोगों के लिए परेशानी का कारण है। कई गांवों में आज भी सड़क और परिवहन की सुविधा सीमित है। शिक्षा के क्षेत्र में भी स्कूलों की स्थिति, शिक्षकों की कमी और संसाधनों का अभाव जमीनी सच्चाई को उजागर करता है।
राजनीतिक दल अब यह समझ चुके हैं कि केवल डिजिटल प्रचार से चुनाव नहीं जीते जा सकते। इसलिए एक ओर जहां सोशल मीडिया पर आक्रामक कैंपेन चल रहा है, वहीं दूसरी ओर ‘डोर-टू-डोर’ संपर्क, जनसभाएं और स्थानीय मुद्दों पर फोकस भी बढ़ाया जा रहा है। उत्तराखंड की राजनीति के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह डिजिटल विकास और जमीनी जरूरतों के बीच संतुलन कैसे बनाए। जब तक गांवों में रोजगार, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं की स्थिति नहीं सुधरेगी, तब तक डिजिटल दावों की चमक अधूरी ही मानी जाएगी। आने वाले चुनावों में यह देखना दिलचस्प होगा कि जनता ‘डिजिटल वादों’ को ज्यादा तवज्जो देती है या ‘जमीनी मुद्दों’ को प्राथमिकता देती है या नहीं।
भाजपा को फिर ‘मोदी लहर’ की ‘उम्मीद’
भाजपा को उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में मोदी फैक्टर से बड़ी हैं उम्मीदें
2017 और 2022 के उत्तराखंड चुनाव में मोदी फैक्टर ने जिताया था पार्टी को
कांग्रेस सत्ता में वापसी के लिए सरकार की नामामियों को आमजन को गिना रही
देहरादून। उत्तराखंड राज्य बनने से लेकर 2017 तक का इतिहास रहा है कि यहां का मतदाता बदलाव में विश्वास करता है और इसे जमीनी हकीकत में परिवर्तित करता है। लेकिन 2017 के विधानसभा चुनाव के बाद से मतदाता मोदी लहर में गोते लगाने लगा और उसी में रम गया। इसका यह प्रत्यक्ष उदाहरण है कि सूबे में मतदाताओं ने लगातार दो बार भाजपा को ही सत्ता सौंप दी। वहीं दूसरी ओर ंउत्तराखंड में बीजेपी को उम्मीद है कि इस बार भी पिछली बार की तरह ’मोदी लहर’ के सहारे पार्टी सत्ता में वापसी की उम्मीद है।
बता दें कि 2017 और 2022 में भाजपा की ऐतिहासिक जीत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का प्रभाव महत्वपूर्ण था। उन चुनावों में भाजपा की प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस सीटें लाने में सफल नहीं हुई थी। सत्ता से दूर बैठी कांग्रेस के लिए इस बार जमीन पर मेहनत करने की ज्यादा जरूरत है। हालांकि, राजनीतिक जानकार इस बार भाजपा की संभावनाओं को ज्यादा नहीं आंकते हैं। उनका कहना है कि लगातार दो बार सरकार में रहते हुए कई आरोप और युवाओं के मन को भाजपा अभी तक भांप नहीं पाई है और अपने विकास कार्यों के साथ-साथ मोदी लहर को भी जीत का आधार बनाकर चल रही है।
भाजपा की मानें तो सरकार ने प्रदेश में विकास के लिए केंद्र के सहयोग से बहुत काम किए है। भाजपा की मानें तो प्रदेश में बुनियादी ढांचा और कनेक्टिविटी, सांस्कृतिक और पर्यटन का विकास के साथ-साथ कई ऐसे फैसले लिए है, जो देश के लिए नजरी बने है। इसके साथ ही विकास की उस गंगा को गांव-गांव तक पहुंचाया है, जिसकी लंबे समय से प्रदेश की जनता वाट जोह रही थी। उत्तराखंड में पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में सरकार द्वारा लागू किए गए समान नागरिक संहिता और धर्मांतरण विरोधी कानूनों को मोदी ने साहसी कदम बताया है, जिससे जनता के बीच उनकी स्वीकार्यता बढ़ी है। यही नहीं राज्य में लगातार विकास, राष्ट्रीय सुरक्षा और हिंदुत्व के एजेंडे पर केंद्रित है। इससे प्रदेश की जनता का रूख भाजपा की ओर है।
वही दूसरी ओर राजनीतिक जानकार कहते हैं कि फिलहाल राज्य की जनता बीजेपी से बहुत खुश नहीं है। 2017 और 2022 के विधानसभा चुनाव में मोदी फैक्टर ने पार्टी की नैया पार लगाई थी, लेकिन इस बार क्या मोदी लहर चल पाएगी या नहीं यह चुनाव की घोषणा और परिणाम के बाद ही पता चल पाएगा। राजनीतिक जानकारों की माने तो इस बार परिस्थितियां विपरीत होती लग रही है। हालांकि भाजपा मोदी लहर के साथ-साथ विकास को भी अपनी जीत का आधार मानकर चल रही है, लेकिन हकीकत का पता बाद में चल पाएगा। विधानसभा चुनाव में अभी समय है और भाजपा जहां इस बार भी मोदी लहर की उम्मीद लगाए है। वही कांग्रेस भी भाजपा को घेरने की अपनी पूरी रणनीति बनाकर चुनावी मैदान में उतरने को तैयार है।
पहाड़ की राजनीति में ‘नई करवट’
उत्तराखंड विधानसभा चुनाव की आहट तेज
सत्ता और विपक्ष दोनों ने की रणनीतियां तेज
पहाड़ और मैदान तक राजनीतिक तापमान बढ़ा
चुनावी मैदान में ‘विकल्प’ की तलाशकृमें मतदाता
देहरादून। उत्तराखंड का आगामी विधानसभा चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का सवाल नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक विकल्पों की परीक्षा भी है। उत्तराखंड की चुनावी राजनीति इस बार एक दिलचस्प मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है। विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आते हैं, मतदाता के सामने सबसे बड़ा सवाल यही हैकृक्या पारंपरिक दलों के बीच ही चुनाव सीमित रहेगा या कोई ठोस विकल्प उभरकर सामने आएगा?
राज्य में लंबे समय से सत्ता का केंद्र दो प्रमुख दलों भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के इर्द-गिर्द घूमता रहा है। हर चुनाव में सत्ता का झुकाव इन दोनों के बीच बदलता रहा है, लेकिन इस बार मतदाता के मन में तीसरे विकल्प को लेकर उत्सुकता और असंतोष दोनों दिखाई दे रहे हैं।
बेरोजगारी, महंगाई, स्वास्थ्य सेवाओं की कमी और लगातार पलायन जैसे मुद्दों ने जनता को सोचने पर मजबूर किया है। खासकर युवाओं और शहरी मतदाताओं के बीच यह सवाल उठ रहा है कि क्या बार-बार एक ही राजनीतिक विकल्पों के बीच चुनाव करना ही लोकतंत्र की मजबूरी है, या कोई नया रास्ता भी संभव है।
इस चुनाव में छोटे दल और नए राजनीतिक प्रयोग भी चर्चा में हैं। आम आदमी पार्टी जैसे दल शिक्षा और स्वास्थ्य के माडल के आधार पर खुद को विकल्प के रूप में पेश कर रहे हैं। वहीं क्षेत्रीय दल और निर्दलीय उम्मीदवार स्थानीय मुद्दों के सहारे अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश में हैं।हालांकि, सवाल यह भी है कि क्या यह विकल्प सिर्फ चुनावी शोर तक सीमित रहेंगे या वास्तव में मतदाता के भरोसे पर खरे उतर पाएंगे। उत्तराखंड जैसे छोटे राज्य में संगठनात्मक मजबूती और जमीनी नेटवर्क किसी भी नए दल के लिए बड़ी चुनौती है।
इस बार चुनाव में यह बहस भी अहम हो सकती है कि मतदाता राष्ट्रीय मुद्दों को प्राथमिकता देगा या स्थानीय समस्याओं को। पारंपरिक दल जहां बड़े विजन और राष्ट्रीय नेतृत्व को सामने रख रहे हैं, वहीं विकल्प बनने की कोशिश कर रहे दल स्थानीय मुद्दोंकृजैसे गांवों का खाली होना, रोजगार के अवसर और शिक्षाकृको केंद्र में रख रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विकल्प केवल दलों से नहीं, बल्कि मतदाता की सोच से भी तय होता है। अगर जनता बदलाव चाहती है, तो नए विकल्पों के लिए रास्ता खुल सकता है। लेकिन अगर भरोसा अनुभव और स्थिरता पर जाता है, तो पारंपरिक दलों की पकड़ बरकरार रह सकती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तराखंड में सत्ता परिवर्तन का इतिहास रहा है, लेकिन इस बार का चुनाव कई मायनों में अलग हो सकता है। यदि सत्तारूढ़ दल अपने विकास के एजेंडे को प्रभावी ढंग से जनता तक पहुंचाने में सफल रहता है, तो वह इस परंपरा को तोड़ सकता है। वहीं विपक्ष अगर जनता के मुद्दों को मजबूती से उठाता है, तो मुकाबला कड़ा होने की पूरी संभावना है।
उत्तराखंड में चुनावी मुद्दे हमेशा स्थानीय रहे हैं। इस बार भी बेरोजगारी, पलायन, स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा और सड़क-जल जैसी बुनियादी सुविधाएं प्रमुख मुद्दों में शामिल हैं। खासकर पहाड़ी जिलों में बढ़ते पलायन को लेकर जनता में गहरी नाराजगी है।हालांकि राज्य की राजनीति में मुख्य मुकाबला राष्ट्रीय दलों के बीच रहता है, लेकिन क्षेत्रीय दल भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिश में हैं। यह दल स्थानीय मुद्दों को उठाकर वोट बैंक में सेंध लगाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं।
कुल मिलाकर, उत्तराखंड का प्रस्तावित विधानसभा चुनाव सिर्फ सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि राज्य के भविष्य की दिशा तय करने वाला अहम मोड़ साबित हो सकता है। जनता के सामने विकल्प हैं, और निर्णय भी उसी के हाथ में हैकृकि वह विकास की कहानी पर भरोसा करती है या बदलाव की मांग को प्राथमिकता देती है।
अब सर्किट हाउस एनेक्सी में दिखेगी राज्य की लोक संस्कृति
लोकसंस्कृति की झलक के साथ आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित होगा राज्य अतिथि गृह
आवास सचिव डा. आर राजेश कुमार के औचक निरीक्षण में तेज हुई कायाकल्प की प्रक्रिया
देहरादून। राज्य की अतिथि सुविधाओं को आधुनिक और आकर्षक बनाने की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है। राज्य अतिथि गृह सर्किट हाउस एनेक्सी देहरादून में नवीनीकरण कार्य को लेकर स्थलीय निरीक्षण किया गया। निरीक्षण की अध्यक्षता आवास व राज्य संपत्ति सचिव डा.आर राजेश कुमार ने की।
निरीक्षण के दौरान यह तय किया गया कि सर्किट हाउस एनेक्सी को केवल मरम्मत तक सीमित नहीं रखा जाएगा, बल्कि इसे उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान और आधुनिक सुविधाओं के समन्वय के रूप में विकसित किया जाएगा। विशेष रूप से मीटिंग हाल के संपूर्ण नवीनीकरण के साथ उसकी दीवारों पर राज्य की लोक संस्कृति को दर्शाने वाली पेंटिंग्स लगाने के निर्देश दिए गए हैं, जिससे यहां आने वाले अतिथियों को प्रदेश की समृ( परंपरा की झलक मिल सके।
नवीनीकरण कार्य को चरणब( तरीके से पूरा किया जाएगा। प्रथम चरण में मुख्य भवन के कक्ष संख्या 1 से 12 तक ;भूतल के 1 से 6 और प्रथम तल के 7 से 12द्ध का कायाकल्प किया जाएगा। इसके साथ ही डोरमैट्री के भूतल पर स्थित कक्ष संख्या 19 से 22 तक के चार कमरों का भी नवीनीकरण किया जाएगा। इन कमरों को आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित करने के साथ उनकी आंतरिक साज-सज्जा को भी बेहतर बनाया जाएगा।
द्वितीय चरण में गेस्ट हाउस परिसर में उपलब्ध स्थान का उपयोग करते हुए इसके विस्तार की संभावनाओं पर विचार किया जाएगा। इसके अतिरिक्त, गेस्ट हाउस में ठहरने वाले अतिथियों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए नए गद्दों की खरीद और प्रत्येक कक्ष में डीटीएच कनेक्शन की व्यवस्था सुनिश्चित करने के भी निर्देश दिए गए हैं।
कांग्रेस के दिग्गजों में ‘संग्राम’
2027 के विस चुनाव में कांग्रेस सत्ता में वापसी का कर रही दावा
चुनावी साल में कांग्रेसी एकजुट होने के बजाय आपस में उलझ रहे
गुटबाजी और नेताओं में बीच एक-दूसरे के प्रति तीखी बयानबाजी
देहरादून। सोशल मीडिया के दौर में अपनी बात जनता के सामने रखने वालों की लिस्ट लंबी होती जा रही है और सभी खुद को सबसे बड़ा बता रहे है। यहां बात हो रही हैं कांग्रेस पार्टी के नेताओं की। चुनावी साल में कांग्रेस के दिग्गज नेताओं में संग्राम साफ दिख रहा है। सत्ता में वापसी के लिए जहां कांग्रेसियों को एकजुट होना था वहीं कांग्रेसी आपस में ही उलझ रहे हैं। ऐसे में 2027 में सत्ता पर काबिज होने की संभावनाएं भी धूमिल होती जा रही है।
बता दें कि 2027 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस सत्ता में वापसी के दावे कर रही है, लेकिन पार्टी में चुनाव वर्ष के शुरूआत में ही जिस तरह की गुटबाजी व नेताओं में बीच एक-दूसरे के प्रति तीखी बयानबाजी हो रही है। खासकर सोशल मीडिया पर नेता खुद को महान मानने के साथ ही हमने कांग्रेस के लिए यह किया वह किया कहकर कांग्रेस को ही पलीता लगा रहे है। वैसे भी प्रदेश की राजनीति में 2017 और उसके बाद हुए विधानसभा व लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को लगातार करारी हार का सामना करना पड़ा। 2027 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस सत्ता में वापसी के दावे कर रही है, लेकिन पार्टी में चुनाव वर्ष के शुरूआत में ही जिस तरह की गुटबाजी व नेताओं में बीच एक-दूसरे के प्रति तीखी बयानबाजी हो रही है।
राजनीतिक विश्लेषज्ञों की माने तो कांग्रेस के अंदर वर्तमान में जो द्वंद चल रहा है यह आने वाले विधानसभा चुनाव के लिए ठीक नहीं है। वैसे कांग्रेस में आपसी लड़ाई कोई नई बात नहीं है, लेकिन जिस प्रकार से कांग्रेस के नेता स्वयं को सर्वोच्च मान रहे है। यह आपसी मतभेद चरम पर रहे हैं और इससे आने वाले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की राह में कांटे बिछ सकते है।
कांग्रेस उत्तराखंड में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए लगातार सक्रिय है। पार्टी का मानना है कि अगर सिटिंग विधायकों और स्थानीय प्रभावशाली चेहरों को शामिल किया जाए तो 2027 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को सीधा टक्कर दी जा सकती है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने स्पष्ट कहा है कि कुल 18 नेताओं में से 6 पहले चरण में शामिल हो चुके हैं, जबकि बाकी 12 नेताओं की सूची हाईकमान को भेज दी गई है।
हाईईकमान करेगा फैसला
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने कहा कि पार्टी में कौन शामिल होगा और कौन नहीं, इसका फैसला हाईकमान लेगा। कांग्रेस भवन में गणेश गोदियाल ने कहा कि पार्टी के किसी भी नेता को सोशल मीडिया में बयानबाजी करने के बजाए पार्टी फोरम पर अपनी बात रखी चाहिए। उन्होंने पार्टी में शामिल होने वाले 18 लोगों की सूची हाईकमान को दी थी, इसमें स्क्रीनिंग के बाद पहले चरण में छह नेताओं को शामिल किया गया। सभी को बिना किसी शर्त के पार्टी में लिया गया, अन्य नामों पर भी हाईकमान जल्द ही निर्णय लेगा। कांग्रेस की हर महीने प्रभावशाली लोगों को पार्टी में शामिल करने की रणनीति जारी रहेगी। उन्होंने कहा कि भाजपा से नाराज लोग बड़ी संख्या में कांग्रेस में शामिल होना चाहते हैं, जो लगातार संपर्क कर रहे हैं।
दायित्वों का पिटारा फिर खुला
सरकार ने सात और लोगों को दायित्व बांटे
दायित्व सूची में 80 के करीब पहुंचा आंकड़ा
आयोगों, बोर्डों व परिषदों में जिम्मेदारियां दी
देहरादून। चुनावी साल में भाजपा अपने कार्यकर्ताओं को खुश करने में लगी है और इसके लिए उत्तराखंड में कार्यकर्ताओं को सरकार में दायित्व बांटे जा रहे हैं। अभी तक धामी सरकार ने लगभग 80 भाजपा कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारियां दी हैं। धामी सरकार ने प्रदेश में दायित्वधारियों की दूसरी सूची भी जारी की है। सरकार ने सात और लोगों को दायित्व बांटे हैं। वही, इससे पहले शुक्रवार को ही विभिन्न आयोगों, परिषदों और समितियों में 14 लोगों को नियुक्त कर कर दायित्व बांटे गए थे।
बता दें कि कैबिनेट विस्तार के बाद सरकार और संगठन से जुड़े नेताओं और कार्यकर्ताओं को समायोजित करने के लिए दायित्वों का वितरण किया जा रहा है। चुनावी साल में संगठन की रणनीति है कि आमजन के बीच जाने के लिए लंबी फोज तैयार की जाए। इसके लिए धामी सरकार ने दायित्वों का पिटारा खोल दिया है। नई सूची के अनुसार राजपाल कश्यप, रुचि गिरी, राव खाले खां, प्रेमलता, दीप प्रकाश नेवलिया, योगेश रजवार और मनोज गौतम को सरकार ने दायित्व बांटे है।
राजनैतिक विशेषज्ञों की माने तो प्रदेश में यह अनुमान लगाया जा रहा है कि अब तक करीब 80 के आसपास नेताओं को विभिन्न आयोगों, बोर्डों और परिषदों में जिम्मेदारियां दी जा चुकी हैं। माना जा रहा है कि आने वाले समय में दायित्वों की सूची और लंबी हो सकती है। चुनावी साल में सरकारों द्वारा इस प्रकार के प्रयोग किए जाते रहे हैं।
इन्हें मिली जिम्मेदारी
राव खाले खां दृ सदस्य, किसान आयोग
योगेश रजवार दृ सदस्य, बाल संरक्षक आयोग
दीप प्रकाश नेवलिया दृ सदस्य, समाज कल्याण अनुश्रवण समिति
मनोज गौतम दृ सदस्य, अनुसूचित जाति आयोग
प्रेमलता दृ सदस्य, महिला आयोग
रूचि गिरी दृ सदस्य, अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग
राजपाल कश्यप दृ सदस्य, अन्य पिछड़ा वर्ग कल्याण परिषद
तिवारी सरकार ने बांटे थे 200 से अधिक दायित्व
राज्य गठन के बाद पहली निर्वाचित सरकार ने कार्यकर्ताओं को खुश करने के लिए दायित्व बांटने की प्रथा शुरू की थी। यह उस समय चर्चा का विषय बन गया था। उसके बाद से लगातार जिसकी सरकार रही उसने पार्टी कार्यकर्ताओं को जमकर मलाई खिलाई है। नारायण दत्त तिवारी के नेतृत्व वाली सरकार ने 200 से अधिक नेताओं को विभिन्न पदों पर दायित्व दिया था। उस समय प्रदेश से लेकर राष्ट्रीय मीडिया में यह खबर जमकर ट्रोल हुई थी।
आस्था और परंपरा के नाम पर ‘नई बहस’
क्रासर--चारधाम से जुड़ी समितियों ने शुरू की बहस
--बीकेटीसी के बाद गंगोत्री में राजनीति गर्मा दी
--राजनीति और समाज दोनों आये आमने-सामने
--कांग्रेस ने बताया राजनीतिक एजेंडा, भाजपा संतुलित
देहरादून। चारधाम में आस्था और परंपरा के नाम पर लिए गए फैसलों ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है। गंगोत्री धाम और बदरी केदार मंदिर समिति से जुड़े फैसलों के बाद राज्य की राजनीति और समाज आमने-सामने आ गए हैं और चारधाम में गैर हिंदूओं के प्रवेश पर रोक के बाद सियासत तेज हो गई है।
बता दें कि कुछ समय पहले बदरी केदार मंदिर समिति ने बदरीनाथ धाम और केदारनाथ धाम में गैर सनातनियों के प्रवेश को लेकर सख्त रुख अपनाया था। इसके बाद अब गंगोत्री धाम से भी इसी तरह का निर्णय सामने आया है, जिसने इस पूरे मुद्दे को और ज्यादा संवेदनशील बना दिया है। गंगोत्री मंदिर समिति ने गैर सनातनियों के प्रवेश पर रोक लगाने के साथ-साथ कुछ विशेष शर्तें भी तय की हैं।
समिति के फैसले के अनुसार यदि कोई गैर सनातनी गंगोत्री धाम में प्रवेश करना चाहता है, तो उसे पंचगव्य का पान करना होगा। पंचगव्य, जो कि सनातन परंपरा में बेहद पवित्र माना जाता है, पांच तत्वों गोमूत्र, गोबर, दूध, दही और घी से मिलकर तैयार होता है। सनातन धर्म में गाय को माता का दर्जा दिया गया है, इसलिए इन तत्वों का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व बहुत अधिक माना जाता है। समिति का तर्क है कि पंचगव्य का सेवन व्यक्ति की आस्था को स्पष्ट करता है और उसे शु( बनाता है, जिससे वह धाम में प्रवेश के योग्य हो जाता है।
मामले में कांग्रेस इसे चुनाव से पहले का राजनीतिक एजेंडा बता रही है, जिसका मकसद सामाजिक सौहार्द को प्रभावित कर चुनावी लाभ लेना है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि मुस्लिम समाज मूर्ति पूजा में विश्वास नहीं रखता, इसलिए वह पहले से ही ऐसे मंदिरों में दर्शन के लिए नहीं जाता। ऐसे में इस तरह के फैसले अनावश्यक हैं और केवल समाज में विभाजन पैदा करने के लिए लिए गए हैं।
दूसरी ओर सत्ताधारी दल भाजपा इस मुद्दे पर संतुलित रुख अपनाती नजर आ रही है। पार्टी के विधायक विनोद चमोली ने कहा कि इस तरह के कठोर फैसलों की शायद जरूरत नहीं थी, क्योंकि मुस्लिम समाज खुद ही मूर्ति पूजा नहीं करता और ऐसे धामों में नहीं आता। सोशल मीडिया के लिए रील बनाने या मनोरंजन के उद्देश्य से पहुंचते हैं, जिससे धामों की गरिमा प्रभावित होती है। ऐसे लोगों को रोकने के लिए ही समिति ने यह कदम उठाया हो सकता है।
गौरतलब है कि उत्तराखंड के चारधाम बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री देश ही नहीं बल्कि दुनिया भर के श्र(ालुओं के लिए आस्था का केंद्र हैं। ऐसे में इन धामों से जुड़े किसी भी फैसले का असर व्यापक स्तर पर पड़ता है।
उत्तराखंड में बढ़ने लगी ‘सियासी तपिश’
क्रासर--
राजनीतिक पार्टियां दिख रही हैं मैदान में सक्रिय
क्षेत्रिय दल और अन्य संगठन चुनाव मोड में आये
यूकेडी भाजपा-कांग्रेस की ‘राह’ में बनेगा बाधा
देहरादून। उत्तराखंड में 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी तपिश बढ़ने लगी है। प्रदेश की प्रमुख राजनीतिक पार्टियां अभी से मैदान में सक्रिय नजर आ रही हैं। इसके साथ ही क्षेत्रिय दल और अन्य संगठन चुनाव मोड में आ गए है। इस बार भी मुख्य मुकाबला सत्तारूढ़ भाजपा और विपक्षी कांग्रेस के बीच होने की संभावना है। इसके साथ ही क्षेत्रिय दल यूकेडी दोनों की ‘राह’ में बाधा बन सकती है।
सूबे में 2027 के विधानसभा चुनाव होने हैं। इससे उत्तराखंड में ‘सियासी तपिश’ बढ़ने लगी है। एक ओर जहां भाजपा चुनावी मोड में आ गई है वही दूसरी ओर कांग्रेस भी अपनी तैयारियों को अंतिम रूप दे रही है। क्षेत्रिय दल और अन्य संगठन भी सक्रिय हो गए है। इसके चलते प्रदेश में चुनावी माहोल अभी से तैयार होने लगा है।
चुनाव को लेकर कांग्रेस ने अपनी सक्रियता बढ़ा दी है और विभिन्न मुद्दों को लेकर सरकार को घेरने की रणनीति पर काम कर रही है। हालांकि, पार्टी के भीतर नेताओं के बीच आपसी खींचतान और गुटबाजी को लेकर चर्चाएं भी सामने आ रही हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि कांग्रेस आंतरिक मतभेदों को समय रहते सुलझा नहीं पाती, तो इसका असर चुनावी प्रदर्शन पर पड़ सकता है। पार्टी अपने संभावित गठबंधन सहयोगियों के साथ भी रणनीति बनाने में जुटी हुई है, ताकि भाजपा को कड़ी टक्कर दी जा सके।
दूसरी ओर, भाजपा संगठनात्मक स्तर पर तेजी से तैयारी कर रही है। पार्टी ने अपने विभिन्न संगठनात्मक प्रकोष्ठों और समितियों का गठन कर लिया है और जल्द ही वरिष्ठ कार्यकर्ताओं को नई जिम्मेदारियां सौंपी हैं। भाजपा लगातार बूथ स्तर तक बैठकों का आयोजन कर कार्यकर्ताओं को सक्रिय कर रही है।
प्रदेश में अन्य छोटे और क्षेत्रीय दल भी अपनी-अपनी रणनीति बनाने में जुटे हैं, हालांकि मुख्य राजनीतिक मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच ही केंद्रित होता दिख रहा है। आने वाले समय में संगठनात्मक मजबूती, नेतृत्व की एकजुटता और जमीनी मुद्दों पर पकड़ ही यह तय करेगी कि 2027 में उत्तराखंड की सत्ता किसके हाथ में जाएगी।
राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो इस बार प्रदेश में चुनाव आसान नहीं होने वाला है। एक ओर जहां लंबे समय से कांग्रेस आक्रामक है वही दूसरी ओर क्षेत्रिय दल यूकेडी की सक्रियता प्रदेश की राजनीति में नया मोड ला सकती है। आने वाले चुनाव में जहां भाजपा-कांग्रेस की तैयारियां शुरू हो गई है। दूसरी ओर यूकेडी भी पिछले लंबे समय से दोनों दलों को घेरने के साथ-साथ प्रदेश की 70 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा कर चुकी है। इससे आने वाला चुनाव दिलचस्प होने की संभावना है।
यूकेडी में युवाओं की फौज, भाजपा-कांग्रेस ‘टेंशन’ में
क्रासर--विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारी में जुटा यूकेडी
--प्रदेश की 70 सीटों पर चुनाव लड़ने का किया दावा
--एक बूथ, दस युवा नारे के दी जा रही चुनाव को धार
देहरादून। उत्तराखंड का एकमात्र क्षेत्रीय राजनीतिक दल यूकेडी में युवाओं की फौज से भाजपा-कांग्रेस की ‘टेंशन’ बढ़ गई है। यूकेडीईआने वाले विधानसभा चुनाव में प्रदेश की 70 सीटों पर युवाओं की टीम के साथ मैदान में उतरेगा। यह दावा यूकेडी के यूथ ब्रिगेड का है। यूकेडी की घोषणा से भाजपा-कांग्रेस की राह आसान नहीं होगी।
बता दें कि यूकेडी राज्य बनने के बाद साल 2002 के विधानसभा चुनाव में चार, 2007 में तीन, 2022 के विधानसभा चुनाव में एक भी सीट नहीं जीत पाई थी। लेकिन आने वाले विधानसभा चुनाव में यूकेडी के 70 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा से भाजपा-कांग्रेस ‘चिंतित’ है। प्रदेश में लंबे समय से युवा विभिन्न समस्याओं से लेकर कई अन्य मुद्दों को लेकर सड़क से लेकर सदन तक अपना गुस्सा जाहिर कर चुका है। इससे सरकार और भाजपा सहित कांग्रेस चिंतित है।
आगामी विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियों को लेकर उत्तराखंड क्रांति दल ने सक्रियता तेज कर दी है। यूकेडी के केंद्रीय अध्यक्ष सुरेंद्र कुकरेती ने बड़ा ऐलान किया कि पार्टी राज्य की सभी 70 विधानसभा सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारेगी। उन्होंने कहा कि यूकेडी उत्तराखंड के मूल मुद्दों को लेकर जनता के बीच जाएगी और मजबूत विकल्प के रूप में उभरेगी। यूकेडी के इस दावे के बाद राजनीतिक विशेषज्ञों की मानें तो आने वाले विधानसभा चुनाव में अगर युवाओं ने एकजुटता दिखाई तो भाजपा-कांग्रेस की राह आसान नहीं होगी।
उल्लेखनीय है कि यूकेडी की यूथ ब्रिगेड़ लंबे समय से बीजेपी और कांग्रेस पर तीखे हमले बोल रही है। यहीं नहीं दोनों दलों पर प्रदेश का अहित करने का आरोप व राजधानी के मुद्दे पर सरकार और भाजपा-कांग्रेस पर तीखा पहार करने के साथ ही इन्हें उत्तराखंड के हितों के खिलाफ बता रही हैं। यूकेडी नेताओं का आरोप है कि उत्तराखंड राज्य का निर्माण जिन सपनों और उद्देश्यों के साथ हुआ था बीजेपी और कांग्रेस ने बारी-बारी से सत्ता में आकर उन सपनों को तोड़ने का काम किया है।
आगामी विधानसभा चुनाव में 70 सीटों पर चुनाव लड़ने का मन बना चुकी यूकेडी आमजन के बीच जा रही है। पहाड़ के युवा और महिलाएं पार्टी को नई दिशा देने का काम कर रही हैं। पार्टी सूत्रों की माने तो यूकेडी ’एक बूथ, दस युवा’ के नारे के साथ संगठन को मजबूत कर रही है। युवाओं और महिलाओं को संगठन से जोड़ने का अभियान तेज किया गया है। आने वाले विधानसभा चुनाव में यूकेडी के अभी के प्रदर्शन को लेकर भाजपा-कांग्रेस अभी से ‘टेंशन’ में आ गई है। इसके लिए दोनों दल अपनी-अपनी रणनीति तय करने में लगी है ताकी चुनाव में इसका फायदा मिल सके।
इन मुद्दों को लेकर घेर रहे भाजपा-कांग्रेस को
यूकेडी के युवा नेताओं की माने तो भाजपा-कांग्रेस ने प्रदेश के जल, जंगल और जमीन को माफियाओं के हवाले कर दिया गया है, जबकि, आम जनता आज भी मूल निवास, सशक्त भू-कानून और गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाए जाने जैसे मुद्दों पर न्याय की प्रतीक्षा कर रही है। राज्य में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और पलायन जैसे मूलभूत मुद्दों पर सरकारें पूरी तरह विफल साबित हुई हैं। पहाड़ से लगातार हो रहे पलायन ने गांवों को खाली कर दिया है, लेकिन सरकार के पास इसे रोकने के लिए कोई ठोस नीति नहीं है।
शुक्रवार, 8 मई 2026
देवभूमि पर ‘अपनों’ का ‘दाग’
क्रासर
देवभूमि में संगठन-सत्ता के बीच पिस रही है कानून-व्यवस्था
उत्तराखंड में महिला अपराधों ने बढ़ाया प्रदेश में सियासी पारा
सूबे में बेटियों की सुरक्षा पर बड़ा विपक्षी पूछ रहे हैं सवाल
भाजपा नेताओं के नाम आने से गरमाया राजनीतिक माहौल
देहरादून। उत्तराखंड में सत्ता, संगठन और कानून व्यवस्था कटघरे में है। चंपावत से लेकर हरिद्वार तक ऐसी कई घटनाएं सामने आई हैं, जिन्होंने सरकार की बेटी बचाओ के नारों पर सवाल खड़े किए हैं। प्रदेश में महिलाओं के विरु( अपराध और उनमें सत्ताधारी दल से जुड़े चेहरों की संलिप्तता ने प्रदेश के राजनीतिक माहौल को गरमा दिया है। अंकिता भंडारी हत्याकांड के बाद जनता के भीतर जो आक्रोश पैदा हुआ था, वह अभी पूरी तरह शांत भी नहीं हुआ कि नए मामलों ने फिर बहस छेड़ दी है।
सबसे ताजा और चौंकाने वाला मामला मुख्यमंत्री के निर्वाचन क्षेत्र चंपावत से सामने आया है। यहाँ एक 10वीं की छात्रा के साथ गैंगरेप के मामले में भाजपा के एक मंडल उपाध्यक्ष, एक पूर्व प्रधान और एक छात्र पर गंभीर आरोप लगे हैं। पीड़ित एक दोस्त की मेहंदी की रस्म में गई थी, जहाँ से उसे बंधक बनाकर इस घृणित कार्य को अंजाम दिया गया। इससे पूर्व हरिद्वार में एक पूर्व भाजपा महिला मोर्चा नेत्री ने अपने ही प्रेमी और उसके साथियों को अपनी नाबालिग बेटी का यौन शोषण करने की अनुमति दी। वही अल्मोड़ा के भाजपा ब्लाक प्रमुख भगवत बोरा पर एक 14 वर्षीय किशोरी के साथ दुष्कर्म का आरोप लगा था। मामला तब बढ़ा जब आरोपी ने पीड़िता के परिवार को धमकाने की कोशिश की।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले महिला सुरक्षा एक बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकता है। खासतौर पर पहाड़ की महिलाओं और युवाओं के बीच यह भावना मजबूत हो रही है कि राजनीति में चरित्र और जवाबदेही पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए। सवाल केवल किसी एक पार्टी या नेता का नहीं, बल्कि उस भरोसे का है जो जनता लोकतंत्र और शासन व्यवस्था पर करती है। सत्ता में बैठे लोग महिलाओं की सुरक्षा और न्याय के मुद्दे पर कितने गंभीर हैं।
उत्तराखंड में पिछले कुछ समय में सत्तारूढ़ भाजपा के कुछ नेताओं और उनके करीबियों पर गंभीर आरोप लगने का क्रम जारी हैं, जिससे प्रदेश की राजनीति में उबाल है। विपक्ष इन मुद्दों को कानून-व्यवस्था की विफलता बताकर सरकार को घेर रहा है। राजनैतिक विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले विधानसभा चुनाव में इन मुद्दों की आंच से भाजपा को नुकसान भी हो सकता है।
बाक्स
इंसाफ की सबसे लंबी लड़ाई
उत्तराखंड के इतिहास में सबसे ज्यादा चर्चित अंकिता भंडारी हत्याकांड में मई 2025 में कोटद्वार कोर्ट ने मुख्य आरोपी पुलकित आर्य ;पूर्व भाजपा नेता का बेटाद्ध और उसके साथियों को दोषी करार दिया। हालांकि यह मामला हत्या का था, लेकिन इसमें स्पेशल सर्विस के नाम पर यौन उत्पीड़न के दबाव की बात सामने आई थी, जिसने पूरे राज्य को हिला कर रख दिया था।
साफ्ट हिदुत्व’ और ‘विकास’ का एजेंडा
क्रासर
--मुख्यमंत्री लगातार ले रहे हैं बडे़ फैसले, भाजपा कर रही बड़ी रैलियां
--सरकार को घेरने की रणनीति पर कांग्रेस पार्टी लगातार कार्य कर रही
--कांग्रेस के लिए पैदा कर दी हैं भाजपा सरकार ने कई नईईचुनौतियां
देहरादून। प्रदेश में 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं। चुनावी साल में एक ओर भाजपा जहां ’साफ्ट हिदुत्व’ और ’विकास’ के एजेंडे के साथ चुनाव की तैयारियां कर रही है। वही दूसरी ओर कांग्रेस के लिए भाजपा सरकार ने कई नईईचुनौतियां पैदा कर रही है। एक ओर जहां प्रदेश सरकार चुनावी मोड में आ गई है। वही कांग्रेस भी मैदान मंे आक्रामक होकर उतरने को तैयार है।
उत्तराखंड में भाजपा सरकार पूरी तरह चुनावी मोड में आ गई है। इसके लिए सरकार बडे़ फैसले लेने में लगी है ताकी आगामी विधानसभा चुनाव में मजबूती के साथ मैदान में उतरा जा सके। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी जहां लगातार बडे़ फैसले ले रहे हैं वही भाजपा प्रदेश में बड़ी रैलियां आयोजित कर रही है। दूसरी ओर प्रमुख विपक्षी कांग्रेस भी विधानसभा चुनाव के लिए पूरी तैयारी के साथ भाजपा सरकार को घेरने के लिए रणनीति पर कार्य कर रही है।
बता दें कि प्रदेश सरकार चुनावी मोड में नजर आ रही है और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी लगातार बड़े फैसले ले रहे हैं। वही भाजपा हिंदुत्व और विकास को लेकर जनता के सामने जाने की तैयारी में हैं। भाजपा जहां सरकार की उपलब्धियों को अपनी जीत में परिवर्तित करने में लगी है वही इसके लिए भाजपा प्रदेश में बडे़ नेताओं की रैलियां आयोजित करवा रही है। इसके साथ ही सूबे के अलग-अलग क्षेत्रों में महिला आरक्षण विल को लेकर भी जनसमर्थन जुटाने में लगी है। दूसरी ओर कांग्रेस बिल के विरोध में धरना और प्रदर्शन करने में लगी है। इसके साथ ही कांग्रेस सरकार की नाकामियों को लेकर मैदान में उतरने को तैयार है।
प्रदेश में सरकार द्वारा लिए गए हालिया फैसलों से यह लग रहा है कि प्रदेश सरकार चुनावी मोड में आ गई है। चुनावी साल में मुख्यमंत्री धामी ने उत्तराखंड मदरसा बोर्ड को भंग करने की एक बड़ी घोषणा की है। सरकार का कहना है कि जुलाईई 2026 से सभी मदरसों में अनिवार्य रूप से उत्तराखंड शिक्षा बोर्ड का पाठ्यक्रम लागू किया जाएगा, जो मदरसे इसे नहीं मानेंगे, उन्हें बंद करने की चेतावनी दी गई है। इस कदम को राज्य में शिक्षा सुधार और समान नागरिक संहिता की दिशा में एक और बड़ा कदम माना जा रहा है।
यही नहीं आगामी चुनावों को देखते हुए मुख्यमंत्री धामी काफी सक्रिय हैं। उन्होंने राज्य के 29 विधानसभा क्षेत्रों की चरणवार समीक्षा शुरू की है। इसके तहत वह लंबित घोषणाओं और विकास कार्यों का जायजा ले रहे हैं। इसका मुख्य उद्देश्य शासन के प्रदर्शन को बेहतर बनाना और जनता के बीच सरकार की पहुंच को मजबूत करना है। चुनावी साल में सीएम धामी के सक्रिय होने से यह तो साफ हो गया है कि आगामी विधानसभा चुनाव उन्हीं के नेतृत्व में लगा जाएगा। शायद यही कारण है कि वह लगातार क्षेत्रों में जा रहे है। हालांकि विधानसभा चुनाव की अभी घोषणा होना बाकी है, लेकिन प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस भी चुनावी मोड में आ गए है।
‘परंपरा’ पर लगा ‘विराम’
उत्तराखंड में मार्च महीने को लेकर स्थापित धारणा की ध्वस्त
मंत्रिमंडल विस्तार से टूटी सत्ता परिवर्तन की पुरानी परिपाटी
भाजपा हाईकमान ने भाजपा में सब कुछ ठीक का दिया संदेश
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीतिक अस्थिरता लंबे समय से देखी जा रही थी और यह अस्थिरता एक अजीब परंपरा का रूप ले चुकी थी। प्रदेश में भाजपा की सरकार के समय राजनीतिक अस्थिरता की परंपरा रही है। लेकिन वर्तमान में फिलहाल इस पर विराम लग गया है ऐसा राजनैतिक विशेषज्ञों का मानना है।
बता दें कि लंबे समय से भाजपा के शासनकाल में नेतृत्व परिवर्तन की परंपरा रही है। अभी तक प्रदेश में जब-जब भाजपा की सरकार रही तब-तब सरकार के कार्यकाल का अंतिम वर्ष आते-आते नेतृत्व परिवर्तन लगभग तय मान लिया जाता था और यह परंपरा जैसी बन गई थी। लेकिन वर्तमान में भाजपा के अंदर सब कुछ ठीक नहीं है का संदेश आमजन तक जा चुका था। ऐसे में भाजपा हाईकमान को उचित फैसला तो लेना ही था। राजनीतिक विशेषज्ञों की माने तो भाजपा में उपजे असंतोष का ही परिणाम है कि प्रदेश सरकार को अंतिम वर्ष में मंत्री पद बांटने पडे़।
माना जा रहा है कि प्रदेश में भाजपा की स्थिति ठीक नहीं होने के कारण भाजपा केंद्रीय नेतृत्व के आदेश पर प्रदेश में चार सालों के इंतजार के बाद कैबिनेट विस्तार किया गया। इसके साथ ही प्रदेश में चल रही तमाम अटकलों पर लगाम लगने का संदेश भी दिया है। ज्ञात हो कि धामी के नेतृत्व में पहली बार भाजपा ने उत्तराखंड में मुख्यमंत्री को रिपीट कर स्थिरता का संदेश दिया था और अब पांचवें वर्ष में मंत्रिमंडल विस्तार कर यह स्पष्ट कर दिया गया है कि यह सरकार परंपरागत राजनीति से अलग, आत्मविश्वास और प्रदर्शन की राजनीति पर चल रही है। वही दूसरी ओर जहां विरोधी दल यह अनुमान लगा रहे थे कि इतिहास खुद को दोहराएगा और धामी को भी बदला जाएगा। लेकिन फिलहाल ऐसा कुछ होगा दिख नहीं रहा है। अगर ऐसा होता तो चुनावी साल में मंत्रीमंडल विस्तार नहीं होता।
सूत्रों की माने तो भाजपा हाईकमान ने मंत्रिमंडल विस्तार कर राजनीतिक संदेश दिया है कि भाजपा में सब ठीक है। फैसले ने एक और संकेत साफ कर दिया है भाजपा अब उत्तराखंड में नेतृत्व को लेकर किसी प्रयोग के मूड में नहीं है। धामी केवल वर्तमान के मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि भविष्य की राजनीति के केंद्र बिंदु बन चुके हैं। इसके साथ ही धामी की छवि को ‘स्थायी नेतृत्व’ है का संदेश दिया है।
कांग्रेस की प्रतिक्रिया नकारात्मक: चौहान
भाजपा के प्रदेश मीडिया प्रभारी मनवीर सिंह चौहान ने कहा कि धामी सरकार के मंत्रिमंडल मे विस्तार से कार्यकर्ताओं मे उत्साह है और कांग्रेस की प्रतिक्रिया इसमें नकारात्मक और हताशा से भरी हुईई है। धामी के नेतृत्व में प्रदेश सरकार निरंतर विकास, सुशासन और पारदर्शिता के साथ आगे बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस को कांग्रेस मे मंत्री अथवा दायित्व स्टेटस सिंबल बन जाता है, लेकिन भाजपा का मिशन सेवा है और इसी धेय के साथ हर कार्यकर्ता को दायित्व सौंपा जाता है।
कांग्रेस पृष्ठभूमि के लोगों को बनाया मंत्री: गोदियाल
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने कहा कि राज्य में मंत्रिमंडल का विस्तार भाजपा की अंदरूनी कलह को दबाने के लिए किया गया है, जिसमें भाजपा ने अपने कार्यकर्ताओं और वरिष्ठ विधायकों को सम्मान देने की बजाय कांग्रेस से दल बदल कर गये विधायकों को अधिक तवज्जो दी है। इसीलिए मंत्रिमंडल विस्तार में कांग्रेस पृष्ठभूमि के लोगों को मंत्री बनाया गया है। इससे आने वाले समय में भाजपा के अंदर असंतोष ओर पनपेगा और यह सबके सामने जल्द आ जाएगा।
‘प्रश्नों’ को जवाब का ‘इंतजार’
उत्तराखंड विधानसभा के बजट सत्र
600 से ज्यादा सवालों से गरमाएगा सदन
विपक्ष ने किया सड़क से सदन तक हंगामा
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा के बजट सत्र में विधायकों के प्रश्नों को जवाब का इंतजार रहेगा। विपक्ष के आक्रामक रूख से सरकार परेशान रहेगी। यह हम नहीं कह रहे है अभी तक के इतिहास में ऐसा ही होता आया है।
बता दें कि विधानसभा सत्र के पहले दिन राज्यपाल के अभिभाषण के साथ ही सीएम ने बजट पेश किया। सत्र के दूसरे दिन की कार्ययोजना के हिसाब से प्रश्नकाल होगा। इसके साथ ही सरकार आर्थिक सर्वेक्षण की रिपोर्ट और कैग की सात रिपोर्ट सदन पटल पर रखने के साथ ही कुछ अध्यादेश भी सदन पटल पर रखे जाएंगे।
कार्ययोजना के अनुसार इस बार पक्ष-विपक्ष के विधायकों के 600 प्रश्न मिले हैं। अभी तक के इतिहास की बात करें तो सीएम के पास सबसे अधिक विभाग हैं और सीएम हमेशा प्रश्नों से बचते आये हैं। इससे विपक्ष को बोलने का मौका मिलता है और वह सरकार को चारों ओर से घेरने में कामयाब रहता है।
ज्ञात हो कि पहले दिन सड़क से सदन तक विपक्ष ने खूब हंगामा किया और आज भी विपक्ष चुप नहीं बैठने वाला है। पहले दिन सत्र शुरू होते ही विपक्ष ने सदन से वाकआउट कर सड़क पर भी प्रदर्शन किया। विपक्ष सदन की समययावधि बढ़ाने की मांग कर रहा है।
भाजपा में आकर खुली ‘किस्मत’
कांग्रेस मुक्त करने वाली भाजपा हुई कांग्रेस युक्त
सरकार में सात मंत्री कांग्रेस की पृष्ठभूमि वाले
देहरादून। कांग्रेस पार्टी के नेताओं की माने तो प्रदेश को कांग्रेस मुक्त करने का नारा देने वाली भाजपा अब खुद कांग्रेस युक्त हो गई है। वर्तमान कैबिनेट विस्तार के बाद धामी सरकार में अब बड़ी संख्या उन नेताओं की हो गई है, जिनकी राजनीतिक जड़ें कभी कांग्रेस में रही हैं।
बता दें कि भाजपा और कांग्रेस में दल छोड़कर आने और जाने वालों का लंबा इतिहास रहा है। खासकर चुनाव के समय भाजपा से कांग्रेस और कांग्रेस से भाजपा में आने व जाने वालों की लिस्ट लंबी होती है। भाजपा से कांग्रेस में जाने वालों को तो अभी तक कोई फायदा नहीं मिला। कार्यकर्ता और पदाधिकारी जिस कारण भाजपा को छोड़कर कांग्रेस में गए वहा भी उन्हें उन्हीं परेशानियों का सामना करना पड़ा, लेकिन कांग्रेस छोडकर भाजपा में आने में से कई नेताओं की किस्मत खुली है।
राजनीतिक विशेषज्ञ बताते हैं कि वर्तमान भाजपा सरकार में कांग्रेस की पृष्ठभूमि वाले मंत्रियों को देखकर तो ऐसा ही लगता है। वर्तमान में चर्चा यह है कि धामी सरकार में अब बड़ी संख्या उन नेताओं की हो गईई है, जिनकी राजनीतिक जड़ें कभी कांग्रेस में रही हैं।
कैबिनेट में जिन पांच विधायकों को जगह दी गईई है, उनमें से केवल मदन कौशिक, खजान दास तो पूरी तरह से भाजपा पृष्ठभूमि के हैं। बाकी भरत सिंह चौधरी, राम सिंह कैड़ा, प्रदीप बत्रा कांग्रेसी बैकग्राउंड के रहे हैं। इसके साथ ही कैबिनेट के पुराने मंत्रियों को देखें तो सतपाल महाराज, सुबोध उनियाल, सौरभ बहुगुणा, रेखा आर्य भी कांग्रेस बैंकग्राउंड के रहे हैं।
सोशल मीडिया पर इस पर कई मीम्स भी बनकर वायरल हो रहे है। कैबिनेट विस्तार के बाद जहां सोशल मीडिया पर लोग इन मीम्स को जहां खूब शेयर कर रहे हैं। वही कुछ दिनों से सीएम बदलने के मीम्स अब कही नहीं दिख रहे हैं। कैबिनेट विस्तार के बाद सोशल मीडिया यूजर की बहस में अब सिर्फ कांग्रेस वाली भाजपा का ही जिक्र हो रहा है।
उत्तराखंड बीजेपी में ‘भूचाल’
देहरादून। उत्तराखंड में राजनीतिक माहौल गरमाने लगा है। बीजेपी में अंदरखाने चल रही कलह अब खुलकर सामने आ गई है। बीजेपी के वरिष्ठ नेता और पूर्व बीकेटीसी अध्यक्ष अजेंद्र अजय के एक सोशल मीडिया पोस्ट ने उत्तराखंड बीजेपी में भूचाल ला दिया है। अजेंद्र अजय ने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर बीजेपी से मोहभंग होने की बात कही है, जिसके बाद से सियासी गलियारों में हलचल मच गईई है।
सोशल मीडिया पोस्ट में बीजेपी से मोहभंग होने की बात कहते हुए अजेंद्र अजय ने लिखा है कि उत्तराखंड में वर्तमान में जिस प्रकार का राजनीतिक परिदृश्य देखने को मिल रहा है, उससे राजनीति के प्रति मोहभंग सा होता जा रहा है। मोदी जी ने कहा था कि तीसरा दशक उत्तराखंड का होगा। तीसरा दशक ऐसा होगा, हम जैसे कार्यकर्ताओं और देवभूमि की जनता ने कभी कल्पना भी नहीं की थी। उनकी पोस्ट के बाद बीजेपी के भीतर चल रही अंर्तकलह की खबरों पर मुहरर लग गई है।
प्रदेश को सरकार का ‘चुनावी झुनझुना’
क्रासर--धामी मंत्रिमंडल में किए पांच नए मंत्री शामिल
--भाजपा के विधायकों की मनोकामना हुई पूर्ण
--राज्यपाल ने दिलाई नए मंत्रियों को शपथ ई
देहरादून। प्रदेश में सत्तारूढ़ भाजपा नेे विधायकों की मनोकामना पूर्ण कर दी है। सूबे में मंत्रियों के पद लंबे समय से रिक्त थे और भाजपा सरकार ने चुनावी साल में इन्हें भरा। राजनीति के विशेषज्ञों की माने तो चुनावी साल में भाजपा सरकार का यह प्रदेश के लिए ‘चुनावी झुनझुना’ है।
बता दें कि लंबे समय से प्रदेश में विकास की गति अवरू( थी और मंत्री पद खाली थे, लेकिन सरकार ने इन्हें नहीं दिया। अब सरकार का मात्र एक साल बचा है और भाजपा सरकार ने पांच नए मंत्री बनाकर सूबे की जनता के साथ मजाक किया है। क्योंकि जब तक नए मंत्री विभागों के काम-काज को समझेंगे तब तक चुनाव का समय हो जाएगा। राजनीति के विशेषज्ञों की माने तो इससे साफ जाहिर होता है कि सरकार का यह चुनावी एजेंडा है।
सरकार और संगठन में सब कुछ ठीक-ठाक नहीं है इसकी चर्चा प्रदेश में लंबे समय से होती आ रही है। कई बार इसके परिणाम सड़क से लेकर सदन तक दिखे हैं जब सरकार के मंत्री और कार्यकर्ता आपस में उलझे और अपनी बयानबाजी को लेकर चर्चा में रहे है। इससे सगठन के साथ ही सरकार की छवि को काफी हानि हो रही है। हालांकि यह अभी स्पष्ट नहीं कहा जा सकता है, लेकिन ऐन चुनाव से पहले विधायकों को सरकार में शामिल कर मंत्री बनाने से स्पष्ट हो गया है।
बता दें कि उत्तराखंड राज्य में साल 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले धामी मंत्रिमंडल का विस्तार हो गया है। राज्य सरकार ने मंत्रिमंडल विस्तार के जरिए क्षेत्रीय, जातीय और महिला-युवा संतुलन साधने की कोशिश की है। साल 2022 में सरकार के गठन के बाद से ही मंत्रिमंडल के कईई पद खाली चल रहे थे, जिसके बाद से ही समय-समय पर मंत्रिमंडल विस्तार की सुगबुगाहट उठती रही है। ऐसे में वर्तमान सरकार के कार्यकाल को चार साल पूरा होने से ठीक तीन दिन पहले मंत्रिमंडल का विस्तार कर दिया गया है।
साल 2022 में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी समेत 9 विधायकों ने मंत्री पद की शपथ ली थी। ऐसे में सरकार के गठन के साथ ही तीन मंत्रिमंडल के पद खाली चल रहे थे, लेकिन कुछ समय बाद ही यानी 26 अप्रैल 2023 को परिवहन मंत्री चंदन रामदास के निधन के बाद एक और मंत्रिमंडल का पद खाली हो गया। इसके साथ ही 16 मार्च 2025 में वित्त मंत्री प्रेमचंद अग्रवाल की ओर से दिए गए विवादित बयान के बाद उन्हें भी अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। ऐसे में धामी मंत्रिमंडल में पांच मंत्री के पद खाली चल रहे थे।
अब मंत्रियों की संख्या हुई 12
लोक भवन में नव नियुक्त कैबिनेट मंत्रियों का शपथ ग्रहण समारोह आयोजित किया गया। शपथ ग्रहण समारोह के दौरान राज्यपाल गुरमीत सिंह ने पांच विधायकों को मंत्री पद की शपथ दिलाई। ऐसे में अब धामी मंत्रिमंडल में मंत्रियों की संख्या बढ़कर 12 हो गई है।
इन विधायकों को मिली जगह
रुद्रप्रयाग विधानसभा सीट से विधायक भरत चौधरी
रुड़की विधानसभा सीट से विधायक प्रदीप बत्रा
हरिद्वार विधानसभा सीट से विधायक मदन कौशिक
राजपुर विधानसभा सीट से विधायक खजान दास
भीमताल विधानसभा सीट से विधायक राम सिंह कैड़ा
दायित्व भी जल्द बंटेंगे
सरकार ने निगमों, बोर्ड व आयोगों में पार्टी पदाधिकारियों को दायित्वधारी बनाया है। अभी दायित्वधारियों के कई पद खाली हैं। सूत्रों के अनुसार अब जल्द ही दो दर्जन और पदों पर दायित्वधारी बनाए जाएंगे।
विधानसभा चुनाव अगले वर्ष
अगले वर्ष विधानसभा चुनाव होने हैं। प्रदेश में राजनीतिक स्थायित्व के संदेश के इस क्रम में पार्टी अपने विधायकों एवं कार्यकर्ताओं का भी मनोबल बढ़ाने की तैयारी कर रही है। मंत्रिमंडल के विस्तार और दायित्व वितरण के माध्यम से पार्टी का मनोबल बढ़ाने के साथ ही संदेश भी दिया जाना है।
41 घंटे 10 मिनट चला सदन
1.11 लाख करोड़ का बजट ध्वनिमत से पारित
विधानसभा सत्र अनिश्चितकाल के लिए स्थगित
बजट सत्र में सीएम ने गिनाईं सरकार की उपलब्धिया
कई मुद्दों से गरमाया सदन, बाहर विपक्ष ने दिया धरना
देहरादून। पांच दिवसीय बजट सत्र पर सदन में चर्चा के साथ आधी रात सदन को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया। सरकार ने एक लाख करोड़ से ज्यादा का बजट पारित किया। इसके साथ ही चर्चा के दौरान जहां सत्ता पक्ष ने बजट को विकसित उत्तराखंड 2047 के संकल्प और सभी वर्गों को पूरा करने वाला बताया। वहीं, विपक्ष ने इसे निराशाजनक बताते हुए कहा कि इसमें आमजन के लिए कुछ नहीं है।
बता दें कि विधानसभा सत्र के पहले दिन वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए 111703.21 करोड़ रुपये का बजट पेश किया था। वर्तमान वित्तीय वर्ष की तुलना में इस बजट के आकार में 10.41 प्रतिशत की वृ(ि की गई है। सरकार को नए वित्तीय वर्ष में 111703.21 करोड़ का राजस्व प्राप्त होने का अनुमान है। इसमें 67525.77 करोड़ राजस्व प्राप्तियों व 42617.35 करोड़ पूंजीगत प्राप्तियों का योगदान शामिल होगा। कर मुक्त बजट में राजस्व घाटे का अनुमान नहीं है। वही, 12579.70 करोड़ राजकोषीय घाटा होने का अनुमान लगाया गया है।
बजट सत्र में वित्तीय वर्ष 2026-27 के बजट और 12 विधेयकों को पारित किए गए। दौरान विधानसभा को 50 अल्प सूचित प्रश्न प्राप्त हुए और तारांकित प्रश्न 545 प्राप्त हुए। विधानसभा सत्र के दौरान 291 प्रश्नों के उत्तर दिए गए। विधानसभा के बजट सत्र के दौरान चार अध्यादेशों को मंजूरी दी गई।
उत्तराखंड की राजनीति में आएगा ‘भूचाल’
सूर्य, मंगल और राहु के कारण होगी राजनीति में हलचल
विधानसभा के बजट सत्र में विपक्ष करेगा जोरदार हंगामा
विधानसभा चुनाव के लिए होगा सकारात्मक माहौल तैयार
देहरादून। विधानसभा चुनाव आने वाले है और विपक्ष सरकार को विधानसभा के बहाने अवश्य घेरेगा। फिलहाल ग्रह और नक्षत्रों के परिवर्तन से प्रदेश की राजनीति में भूचाल आने की संभावना है। गैरसैंण में विधानसभा का बजट सत्र है और विपक्ष इस सत्र में हंगामा करेगा ही। यदि सत्ता पक्ष संयम और समझदारी से काम लेता है तो ग्रहों की अनुकूल स्थिति राज्य की राजनीति में स्थिरता और सकारात्मक बदलाव ला सकती है।
ज्योतिष के अनुसार मार्च 2026 के दौरान सूर्य, मंगल और राहु की युति के कारण राज्य में राजनीति में हलचल हो सकती है। ग्रहों का गोचर अनजाने में विवाद की स्थिति पैदा कर सकता है। उत्तराखंड विधानसभा के बजट सत्र को लेकर उत्तराखंड ज्योतिष रत्न आचार्य डा. चंडी प्रसाद घिल्डियाल ने ज्योतिषीय आकलन जारी किया है।
उन्होंने बताया कि बृहस्पति के मार्गी होने का प्रभाव शासन और नीति निर्माण की प्रक्रिया पर सकारात्मक पड़ेगा। इससे सरकार के निर्णय लेने की गति बढ़ेगी और प्रशासनिक स्तर पर मजबूती देखने को मिल सकती है। यह समय सरकार के लिए जनता के बीच अपनी छवि मजबूत करने का अवसर भी बन सकता है। इसके साथ ही 2027 के चुनावों के लिए सकारात्मक माहौल तैयार किया जा सकता है।
ग्रहों की वर्तमान स्थिति मंत्रियों और अधिकारियों के बीच बेहतर समन्वय के संकेत दे रही है, जिससे लंबे समय से लंबित परियोजनाओं को गति मिल सकती है। उनके अनुसार बुध और गुरु की अनुकूल स्थिति सरकार की निर्णय क्षमता को परिपक्व बनाएगी और यह समय राजनीतिक चुनौतियों के बीच सरकार के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। इस दौरान मंत्रिमंडल विस्तार और राजनीतिक समन्वय से जुड़े विषयों पर भी चर्चा संभव है।
राजनैतिक दलों में ‘अंतर्कलह’
क्रासर--कांग्रेस का आरोप-सरकार और संगठन में है तालमेल की कमी
--नेता प्रतिपक्ष यशपाल ने मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर सरकार को घेरा
--भाजपा का आरोप-कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष नहीं बना पाए अपनी टीम
--कहा-कांग्रेस के सभी नेता चाहते हैं पार्टी में पद, हो रही है खींचतान
देहरादून। चुनावी साल में राजनैतिक दलों में घमासान न हो यह हो ही नहीं सकता है और एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप न हो यह भी नहीं हो सकता है। यही नहीं राजनैतिक दलों में ‘अंतर्कलह’ यह तो आम बात है। चुनावी साल में हर नेता अपना टिकट पक्का करना चाहता है और इसके लिए वह किसी भी ‘हद’ तक जा सकता है। यहां भाजपा और कांग्रेस की बात करें तो दोनों दलों में ‘अंतर्कलह’ साफ देखा जा सकता है। राजनैतिक दलों की प्रदेश को लेकर जो भी ‘रणनीति’ हो, लेकिन यह साफ है कि दोनों दलों में कुछ ठीक नहीं चल रहा है।
भाजपा की बात करें तो भाजपा की प्रदेश में अभी सरकार है। भाजपा के लिए विधानसभा चुनाव में जीत पक्की करने के लिए समय, संसाधन और जनता का विश्वास कायम रखने के लिए बहुत कुछ था, लेकिन प्रमुख विपक्षी कांग्रेस की माने तो संगठन और सरकार में सब कुछ ठीक-ठाक नहीं हैं। अगर कांग्रेस की माने तो भाजपा में ‘अंतर्कलह’ है और इसका खामियाजा उसे आने वाले चुनाव में भुगतना होगा। यही नहीं कांग्रेस का आरोप है कि सरकार प्रदेश में ठीक काम नहीं कर रही है। इससे संगठन और सरकार के मध्य किसी भी बात को लेकर एक राय नहीं है।
बता दें कि अगर कांग्रेस के आरोपों को सही माना जाए तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। क्योंकि प्रदेश में भाजपा की सरकार है और भाजपा में कई ऐसे अच्छे नेता है जिन्हें संगठन में दूर रखा हुआ है। प्रदेश में जहां मंत्री पद खाली है और सरकार इन चार सालों में इस पर फैसला नहीं ले पायी। यह दर्शाता है कि ‘अंतर्कलह’ के कारण इस पर फाइनल मोहर नहीं लग पा रही है। इसके साथ ही भाजपा नेताओं के ‘बिगडे़ बोल’ कई बार भाजपा और सरकार के लिए मुसीबत बन रहे है। यही नहीं जिस पार्टी की सरकार सत्ता में होती है उसके कार्यकर्ता चाहते हैं कि सरकार के सत्ता में होने का उन्हें फायदा मिले, लेकिन प्रदेश में दायित्वधारियों को लेकर चर्चाएं तो होती हैं, लेकिन कुछ दिनों बाद वह चर्चा फिर बंद हो जाती है। इसका मतलब सरकार और संगठन में सब ठीक नहीं है।
दूसरी ओर कांग्रेस की बात करें तो कांग्रेस ने प्रदेश अध्यक्ष तो बदल दिया, लेकिन अभी तक कांग्रेस की टीम खड़ी नहीं हो पायी है। भाजपा के नेताओं का आरोप है कि कांग्रेस अपने घर के झगडे़े से निपटे तो कांग्रेस अध्यक्ष अपनी टीम खड़ी करें, लेकिन कांग्रेस में जो ‘अंतर्कलह’ चल रहा है उससे कांग्रेस के नेता भी खुद की पार्टी के विरोध में बयानवाजी कर रहे हैं। एक ओर कांग्रेस प्रदेश सरकार पर आक्रामक हो रखी है वहीं कांग्रेस नेताओं के आपसी खींचतान से कांग्रेस की टीम खड़ी नहीं हो पा रही है। सूत्रों की माने तो कांग्रेस में हर नेता ही चाहत है कि उसे टीम में पद मिले। शायद यही कारण है कि कांग्रेस भी ‘अंतर्कलह’ का शिकार हो गई है।
सरकार और संगठन में तालमेल नहीं: यशपाल
उत्तराखंड में मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच कांग्रेस ने भाजपा सरकार पर बड़ा राजनीतिक हमला बोला है। नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता यशपाल आर्य ने भाजपा सरकार और संगठन के बीच तालमेल की कमी का आरोप लगाते हुए कहा कि यही वजह है कि लंबे समय से मंत्रिमंडल विस्तार नहीं हो पा रहा है। यशपाल आर्य ने कहा कि भाजपा सरकार में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। पार्टी के भीतर ही कईई विधायक नाराज बताए जा रहे हैं और सरकार तथा संगठन के बीच सामंजस्य की कमी साफ दिखाई दे रही है।
उत्तराखंड में यूकेडी की ‘दहाड़’
यूकेडी की युवा ब्रिगेड ने प्रदेश सरकार की नाम में दम
विभिन्न मुद्दों को लेकर लंबे समय सड़कों पर हैं युवा
युवाओं के हुजूम से प्रदेश सरकार दिख रही है असहज
देहरादून। चुनावी साल में यूकेडी आक्रामक रूख सरकार के लिए मुसीबत पैदा कर रहा है। प्रदेश के विभिन्न मुद्दों को लेकर विगत लंबे समय से यूकेडी की युवा ब्रिगेड ने प्रदेश सरकार की नाम में दम कर रखा है। प्रदेश हित से जुड़ा छोटा हो या बड़ा मुद्दा यूकेडी से जुडे़ युवाओं का हुजूम सड़क पर दिख जाता है और प्रदेश सरकार इससे असहज नजर आती है।
बता दें कि उत्तराखंड राज्य में यह चुनावी साल है और सरकार किसी भी हाल में अपने पक्ष में अपनी किरकिरी नहीं करना चाहती है। क्योंकि लगातार दो साल से सत्ता पर काबिज सरकार आने वाले चुनाव में हैट्रिक लगाने के लिए कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ना चाहती है। हालांकि प्रदेश सरकार और संगठन मिलकर प्रदेश में ऐसा वातावरण तैयार करने में लगी है कि प्रदेश में सबकुछ ठीक है, लेकिन कई बार कई मुद्दों को लेकर सरकार युवाओं के आगे झूकने को मजबूर हो जाती है।
प्रदेश में लंबे समय से कई मुद्दों को लेकर यूकेडी की युवा ब्रिगेड सड़क से लेकर सदन तक हंगामा कर रही है। यही नहीं यूकेडी की युवा ब्रिगेड में जेड जेन को लेकर भी सरकार के मन में आशंका है कि अगर ऐसा ही चलता रहा तो आने वाले विधानसभा चुनाव में युवा उसकी गणित को बिगाड़ सकते है। हालांकि सगठन की ओर से ऑल ईज वेल कहा जा रहा है, लेकिन हकीकत सरकार को भी पता है। पिछले कुछ समय से प्रदेश में जो युवाओं ने माहौल बनाया है और प्रदेश की मूल भावना को लेकर यूकेडी की युवा ब्रिगेड जो तंज कसकर आंदोलन कर रही है उससे आने वाले समय में भाजपा और कांग्रेस के लिए मुसीबत खड़ी हो सकती है।
विधानसभा चुनाव के लिए जहां भाजपा और कांग्रेस ने अपनी रणनीति तैयार की है उस पर यूकेडी की युवा ब्रिगेड बड़ा प्रहार कर सकती है। इसके कई उदाहरण अभी तक सामने आ चुके है। अब फिलहाल बात गैरसैंण सत्र की करें तो यूकेडी की युवा ब्रिगेड ने जिस प्रकार से सत्र के पहले ही दिन अपनी उपस्थिति दर्ज कर दहाड़ मारी है उससे सरकार और भाजपा संगठन सकते में है। क्योंकि सरकार ने सत्र के लिए जो प्लान बनाया था उसके विपरीत यूकेडी की युवा ब्रिगेड ने अपने प्रदर्शन से सरकार को स्पष्ट संदेश दे दिया है कि आने वाले विधानसभा चुनाव में वह एका के साथ मैदान में उतरकर सरकार और भाजपा संगठन के लिए मुसीबत पैदा करेंगे।
फिर ‘हिंदूत्व’ पर भाजपा का ‘दांव’
भाजपा तैयार कर रही है हिंदूत्व के आधार पर अपने लिए जमीन तैयार
केंद्रीय मंत्री अमित शाह ने उत्तराखंड में दे दिए है इस बात के संकेत
हिंदुत्व के साथ मतदाताओं को अपने पक्ष में लामबंद की रणनीति तैयार
देहरादून। उत्तराखंड में भी हिंदुत्व के मुद्दे पर राजनीतिक ध्रुवीकरण जिस तेजी से हुआ है, उससे भाजपा सत्ता में पहुंची और उसमें निरंतरता भी आई है। इस कारण पहले वर्ष 2017 और फिर वर्ष 2022 में प्रदेश में भाजपा की सरकारें बनीं। धर्मनगरी में घुसपैठियों पर सख्ती और समान नागरिक संहिता की पहल के साथ जनसांख्यिकीय असंतुलन से निपटने का इरादा, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने चुनावी शंखनाद के दौरान हर उस विषय को छुआ, जिससे हिंदू मतदाता गहरे प्रभावित होता है।
प्रदेश में अगले वर्ष विधानसभा चुनाव होने हैं और भाजपा की हरिद्वार रैली में इसका शंखनाद हो चुका है। केंद्रीय मंत्री अमित शाह की हरिद्वार में हिंदुत्व की दहाड़ से साफ हो गया है कि भाजपा फिर प्रदेश में हिंदुत्व का कार्ड खेलेगी। क्योंकि जिस हिसाब से विपक्ष हावी है उसे कमजोर करने के लिए नई रणनीति के साथ मैदान में उतरना आवश्यक है। यही कारण है कि भाजपा इस बार भी हिंदुत्व के कार्ड पर चुनावी मैदान में उतरेगी।
बता दें कि वर्ष 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव में लगातार तीसरी बार जीत पाने के लिए भाजपा को अपने इस आजमाए हुए अस्त्र पर ही भरोसा है। हिंदुत्व के साथ मतदाताओं को लामबंद करने में विकास कार्यों की गति तेज करने, सुशासन और भ्रष्टाचार पर जीरो टालरेंस की नीति को दी गईई प्राथमिकता ने खाद-पानी का काम किया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने की जनसभा के साथ ही यह भी स्पष्ट हो गया कि पार्टी हिंदुत्व की अपनी परंपरागत लीक पर ही मजबूती से कदम बढ़ाती दिखाई देगी।
‘सीक्रेट’ मीटिंग और ‘शक्ति’ प्रदर्शन
क्रासर--बैठक में कैबिनेट विस्तार को लेकर हो सकती है चर्चा
--दायित्व बंटवारे को लेकर भी हो सकती है फाइनल बात
--हरिद्वार के बहाने भाजपा करना चाहती है शक्ति प्रदर्शन
देहरादून। विधानसभा चुनाव का अभी बिगुल नहीं बजा है, लेकिन चुनावी साल में अगर समय से पहले तैयारी से ‘राह’ आसान होगी। भाजपा विधानसभा चुनाव में प्रचंड जीत के लिए अभी से तैयारी में जुट गई है। इसी को देखते हुए भाजपा ‘सीक्रेट’ मीटिंग के साथ अपने बडे़े नेता के सामने ‘शक्ति’ प्रदर्शन कर रही है।
प्रदेश में आगामी साल में विधानसभा चुनाव होने हैं और इसके लिए भाजपा अभी से मैदान में कूद गई है। आज केंद्रीय मंत्री अमित शाह हरिद्वार में कई कार्यक्रमों में भाग लेंगे और पार्टी के नाराज कार्यकर्ताओं सहित सूबे के बडे़ भाजपा नेताओं के साथ बैठक करेंगे। इसके लिए प्रदेश भाजपा कई दिनों से तैयारी कर रही थी। शुक्रवार को भाजपा प्रदेश मुख्यालय में कई दौर की ‘गुप्त’ बैठकों में कई विषयों पर चर्चा की गई।
बता दें कि मंत्रीमंडल विस्तार, दायित्वधारियों का मामला, पार्टी से नाराज चल रहे कार्यकर्ताओं को लेकर आज हरिद्वार की गुप्त बैठक के बाद फैसला होने की संभावना है। सूत्रों के अनुसार केंद्रीय अमित शाह जहां कई कार्यक्रमों में भाग लेंगे, वहीं हरिद्वार में एक विशाल जनसभा को भी संबोधित करेंगे। जनसभा को सफल बनाने के लिए भाजपा ने पूरा जोर लगा रखा है। देहरादून-हरिद्वार-रूड़की से लेकर सभी जिलों से भाजपा कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों को भारी संख्या में हरिद्वार पहुंचने के लिए कहा गया है। इससे साफ जाहिर है कि हरिद्वार में जनसभा के बहाने भाजपा केंद्रीय मंत्री अमित शाह के सामने शक्ति प्रदर्शन करना चाहती हैं।
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चुनाव की रणनीति होगी तैयार: महेंद्र
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने बताया कि हरिद्वार में ’टोली बैठक’ आयोजन किया जाएगा, जिसमें कोर ग्रुप के 14 अलावा सदस्यों के अलावा 9 और सदस्यों को शामिल किया गया है। इस तरह से इस टोली बैठक में कुल 24 बड़े नेता शामिल होंगे। प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने बताया कोर ग्रुप के साथ कुछ और लोगों को जोड़ा गया है, इसे टोली बैठक नाम दिया गया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के साथ कुल 24 लोगों की यह बैठक होगी। बैठक में आगामी 2027 विधानसभा चुनाव से संबंधित महत्वपूर्ण चर्चाएं होंगी। इसके साथ ही चुनाव की रणनीति तैयार की जाएगी। उन्होंने कहा प्रदेश में दायित्व बंटवारे और कैबिनेट विस्तार को लेकर भी इस बैठक में चर्चा की जा सकती है।
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हरिद्वार बना राजनीति का गढ़
केंद्रीय मंत्री अमित शाह का हरिद्वार दौरा प्रदेश भाजपा के लिए एक मौका है उनके सामने अपनी शक्ति दिखाने का। इसके लिए हरिद्वार एक सप्ताह से राजनीति का गढ़ बना हुआ है। संगठन, सरकार और प्रशानिक तैयारियां यहां साफ देखी जा सकती है। भाजपा के दावों की बात करें तो कार्यक्रम में प्रदेश के अलग-अलग जिलों से बड़ी संख्या में कार्यकर्ता और आम लोग शामिल होंगे। अनुमान लगाया जा रहा है कि इस आयोजन में करीब डेढ़ लाख लोग शामिल हो सकते हैं। कार्यक्रम के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह एक विशाल जनसभा को संबोधित करेंगे। इस जनसभा को भाजपा के लिए शक्ति प्रदर्शन के रूप में भी देखा जा रहा है।
‘आमजन’ चुनावी साल में ‘देवतुल्य’
क्रासर--चुनावी साल में नेताओं को आखिरकार आ ही गई जनता की याद
--किसी न किसी बहाने दे रहे है नेताजी जनता की ‘चौखट’ पर दस्तक
--शुभकामना संदेशों, होली मिलन समारोहों में दिखाया अलग अंदाज
देहरादून। राजनीति भी क्या गजब चीज है। क्योंकि यहां सब चलता है। प्रजातंत्र में जनता को चार साल तक घंटों लाइन में खड़ा रखने वाले नेताओं के लिए आमजन कब ‘देवतुल्य’ हो जाये पता नहीं चलता है। यही तो असली ‘राजनीति’ है भाई। चुनाव आते ही नेताओं को जनता की याद आ जाती है और वह जनता की चौखट पर जाकर उसे ही अपना सब कुछ मान लेते हैं।
सूबे में विधानसभा के चुनाव होने वाले है और नेेताओं की सक्रियता देखी जा सकती है। चुनावी साल में अगर जनता को समय पर याद नहीं किया गया तो जनता नाराज हो जाएगी और जनता के रूठने का नेताओं को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसलिए कोई भी नेता जनता से ‘पंगा’ नहीं लेना चाहता है और किसी न किसी बहाने जनता की ‘चौखट’ पर दस्तक दे रहा है। छोटा हो या बड़ा कार्यक्रम नेताजी उसमें शामिल होकर जनता को सबसे बड़ा शुभचिंतक प्रदर्शित कर रहे हैं।
चुनावी साल में नेताजी कोई भी मौका नहीं चूकना चाहते हैं। होली तो नेताओं के लिए लंबा आयोजन था जनता के साथ घुलने-मिलने का और नेताओं ने इसका भी पूरा फायदा लिया। होली की शुभकामनाओं से लेकर घर-घर दस्तक और होली मिलन समारोहों के बहाने जनता के बीच ‘पैठ’ बनाने की हर छोटी-बड़ी चाल चली गई और यह प्रदर्शित किया गया कि हम ही हैं आपके असली शुभचिंतक।
होली पर राजनीति के ‘रंग’ कुछ अलग ही दिखे। यह पहली बार नहीं हुआ है, ऐसा तो लंबे समय से होता आया है। लेकिन इस बार नेताओं ने जनता को चुनाव से पहले ही ‘देवतुल्य’ बना दिया है। होली के बहाने इसके कई उदाहरण दिखे। शुभकामना संदेशों, होली मिलन समारोहों में नेताजी आमजन से ऐसे मिल रहे थे, जैसे कि इन्होंने ही उनकी नैया पार लगाई होगी। क्योंकि चुनाव के साल में यह सब ‘ड्रामा’ नहीं किया गया तो आने वाले समय में देवतुल्य जनता नाराज हो जाएगी।
चार साल तक जनता को कीडे़-मकोडे़ समझने वाले नेताजी जनता की और मधुमखियों की तरह आजकल इसलिए आकर्षित नहीं हो रहे हैं, क्योंकि विधानसभा चुनाव में किस नेता को टिकट मिल जाए पता नहीं। इसलिए जनता के बीच पैठ तो बनानी ही पडे़गी। आपको बता दूं कि अभी बीते चार साल तक नेताजी आमजन का फोन उठाने में अपनी तौहीन समझते थे मिलना तो बहुत दूर की बात है। नेताजी से मिलने के लिए आमजन मीलों पैदल चलकर,घंटों लाइन में रहकर, भूखे और प्यासे रहकर कई-कई दिनों तक नेताजी आमजन को दर्शन तक नहीं देते थे। नेताजी के लिए आज वहीं आमजन देवतुल्य बन गए है। आने वाले विधानसभा चुनाव में आमजन नेताजी के चार साल की बेरूखी को याद रखते हैं या नहीं यह तो आने वाले समय में पता चलेगा, लेकिन कुछ समय के लिए ही सही नेताजी की जनता से ‘देवतुल्य’ मित्रता कुछ सुकून तो दे रही है।
उत्तराखंड में राजनीतिक ‘घमासान’
प्रदेश के 6 बड़े नेताओं पर कांग्रेस की नजर, 3 कुमाऊं मंडल और 3 गढ़वाल मंडल से
देहरादून। उत्तराखंड में राजनीतिक घमासान तेज हो गया है। राज्य में प्रमुख दल भाजपा और कांग्रेस की इस ‘जंग’ का आगाज काफी समय पहले हो गया था।
विधानसभा चुनाव 2027 से पहले राज्य के 6 बड़े नेता कांग्रेस ज्वांइन करने वाले हैं, जिन नेताओं की कांग्रेस ज्वाइन करने की चर्चा है वह उत्तराखंड की 6 महत्वपूर्ण विधानसभा सीटों से जुड़े हैं। यानी कांग्रेस विधानसभा चुनाव 2027 के 9 महीने पहले ही विधानसभा सीटों पर फील्डिंग सेट करने की तैयारी कर चुकी है। सूत्रों के अनुसार इन 6 नेताओं और 6 विधानसभा सीटों में गढ़वाल मंडल से तीन तो कुमाऊं मंडल से भी तीन सीटें शामिल हैं। खास बात यह है कि इन नेताओं की ज्वाइनिंग दिल्ली में होगी।
बता दें कि उत्तराखंड कांग्रेस ने एक नया ट्रेंड सेट किया है। जब अंकिता भंडारी मामले पर कांग्रेस को प्रेस कान्फ्रेंस करनी थी तो तब भी उन्होंने स्थान दिल्ली चुना था। आज जब उत्तराखंड के 6 बड़े नेताओं के कांग्रेस ज्वाइन करने की चर्चा है तो तब भी यह कार्यक्रम दिल्ली में होने जा रहा है। ऐसी चर्चा है कि कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल के साथ पार्टी के राष्ट्रीय स्तर के नेता भी इस मौके पर मौजूद रहेंगे।
उत्तराखंड के दो गांवों में नहीं मनाते हैं ग्रामीण होली
150 साल पुरानी मान्यता
रुद्रप्रयाग जिले के खुरजान व क्वीली के ग्रामीण निभा रहे हैं परंपरा
गांवों में होली पर रंग और ढोल-नगाड़ों संग नहीं मनाया जाता जश्न
इष्टदेवी को नहीं है शोर-शराबा, हुड़दंग और चमकीले रंग पसंद
देहरादून। देशभर में फागुन के महीने में लोग रंगों और गुलाल में सराबोर नजर आते हैं और होली का त्योहार देभर में रंग, गुलाल और खुशियों के साथ मनाया जाता है। लेकिन उत्तराखंड राज्य के रुद्रप्रयाग जिले में दो गांव ऐसे भी हैं, जहां डेढ़ सदी से होली के त्योहार पर सन्नाटा पसरा रहता है। इन गांवों में लोग होली पर सिर्फ पकवान बनाकर होली का आनंद लेते है। इन गांवों के ग्रामीण परंपरा का निर्वहन करते हुए 150 से अधिक साल से होली खेलने से परहेज करते है।
ग्रामीण बताते हैं कि इसके पीछे एक धार्मिक मान्यता और पुरानी लोककथा है। ग्रामीणों के अनुसार उनकी इष्टदेवी मां त्रिपुरा सुंदरी को शोर-शराबा, हुड़दंग और चमकीले रंग पसंद नहीं हैं। गांव के लोगों का विश्वास है कि यदि वहे होली खेलेंगे तो देवी की शांति भंग होगी और इसका दुष्परिणाम पूरे गांव को भुगतना पड़ सकता है। इसी कारण यहां के लोग सादगी और शांति के साथ सामान्य दिन की तरह समय बिताते हैं। वह देवी की पूजा-अर्चना तो करते हैं, लेकिन रंगों का प्रयोग नहीं करते हैं।
ग्रामीणों का मानना है कि देवी की कृपा से ही उनका गांव सुरक्षित और खुशहाल है। यह परंपरा बताती है कि भारत के अलग-अलग हिस्सों में त्योहारों को लेकर अपनी-अपनी मान्यताएं और परंपराएं हैं, जहां एक ओर देशभर में होली रंगों और उत्साह का प्रतीक है, वहीं उत्तराखंड के दो गांवों में यह दिन आस्था, श्र(ा और अनुशासन का प्रतीक बन गया है।
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महामारी के बाद बदली परंपरा
ग्रामीणों के अनुसार, लगभग 150 से 300 साल पहले गांव के लोगों ने होली खेलने की कोशिश की थी। इसके कुछ ही समय बाद गांव में हैजा जैसी भयंकर महामारी फैल गई और कई लोगों की जान चली गई। ग्रामीणों ने इस घटना को दैवीय प्रकोप माना और यह मान लिया कि देवी होली के शोर-शराबे से नाराज हो गई थी। तभी से गांव में होली खेलने पर पूरी तरह रोक लगा दी गई और तब से आज तक यह परंपरा चली आ रही है।
गैरसैंण है उत्तराखंड की ‘आत्मा’
‘वेडिंग डेस्टिनेशन’ वाला पर्यटन मंत्री का बयान पर्वतीय क्षेत्र के लोगों के दिल पर दे गया ‘जख्म’
भराड़ीसैंण स्थित विधानमंडल भवन पर पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज के एक ‘बयान’ हास्यास्पद
भराड़ीसैंण राज्य का प्रशासनिक और राजनीतिक केंद्र ही नहीं, पर्वतीय क्षेत्र की भौगोलिक और सामाजिक आत्मा
देहरादून। गैरसैंण उत्तराखंड की ‘आत्मा’ है। यह राज्य की मांग को लेकर लंबे समय तक आंदोलन करने वाले पर्वतीय क्षेत्र के उन लोगों की है, जिन्होंने लंबा आंदोलन किया। आंदोलन के दौरान भूख, प्यास, प्राणों की आहुति और संघर्ष आज भी उन आंदोलनकारियों को याद है जो आज उस इतिहास के गवाह हैं। गैरसैंण में राज्य का प्रशासनिक और राजनीतिक केंद्र ही नहीं है, बल्कि राज्य की भौगोलिक और सामाजिक आत्मा यहां बसती है। ऐसे में ‘वेडिंग डेस्टिनेशन’ वाला बयान पर्वतीय क्षेत्र के लोगों के दिल पर ‘जख्म’ दे गया है।
गैरसैंण में विधानसभा के बजट सत्र के दौरान राज्य के पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज के एक ‘बयान’ ने सभी के आंखों में आसु ला दिए, जिन्होंने राज्य आंदोलन में अपनी सक्रिय भूमिका निभायी। पहले तो राज्य बने इतने लंबे समय बाद गैरसैंण राजधानी तो नहीं बनी, लेकिन सरकार इसे ग्रीष्मकालीन राजधानी के तौर पर प्रचारित कर रही है। वर्तमान में यहां सत्र का आयोजन हो रहा है, तो पहाड़वासियों को लगा था कि आने वाले समय में यह राजधानी बन ही जाएगी। राज्य के पर्यटन मंत्री ने गैरसैंण को ‘टैंट हाउस’ बनाने का बयान देकर घी में आग देने का काम करने के साथ ही पहाड़वासियों की आत्मा पर चोट मार दी है।
बता दें कि उत्तराखंड राज्य का निर्माण पहाड़ के लोगों की भावनाओं के अनुरूप बनना था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। यह कहना है पहाड़ के लोगों का। राज्य निर्माण आंदोलन के दौरान जिस मांग को लेकर पहाड़ के आमजन सड़क पर उतरकर ‘कोदा, झंगोरा’ खाएंगे उत्तराखंड बनाएंगे का नारा दिया गया था वह पर्वतीय क्षेत्र की आत्मा की आवाज थी, लेकिन सत्ता में बैठे लोगों को यह आवाज नहीं सुनाई दी। राज्य का निर्माण तो हुआ पर राज्यवासियों के अनुरूप नहीं। आंदोलनकारियों की दिल की तमन्ना थी कि राज्य की राजधानी वहां होनी चाहिए, जहां राज्य की आत्मा का वास हो, लेकिन सत्ताधीशों को यह मंजूर नहीं था।
पर्यटन मंत्री का एक ‘शब्द’ जिसने पर्वतीय क्षेत्र के लोगों की भावना को आहत कर दिया है। क्योकि गैरसैंण एक स्थान ही नहीं, बल्कि एक बडे़ आंदोलन की स्मृति का केंद्र है, जिसमें पहाड़ के हजारों युवाओं ने अपने सपने और अपने जीवन दांव पर लगाए थे। गैरसैंण को लेकर पर्यटन मंत्री का बयान राजनीतिक विवाद ही नहीं, पहाड़ के लोगों के दिल में एक गहरी टीस पैदा करता है।
उत्तराखंड के कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज का वह बयान भराड़ीसैंण स्थित विधानमंडल भवन को भविष्य में वेडिंग डेस्टिनेशन के रूप में विकसित करने की संभावना का जिक्र किया। इसके बाद प्रदेश की राजनीति में भूचाल आ गया है। भाजपा के नेता जहां पर्यटन मंत्री को बचाने में लगी है वहीं अन्य दलों ने इसे सड़क से लेकर सदन तक मुद्दा बना दिया है और आने वाले समय में यह आग की तरह प्रदेश में फैल सकता है।
47 मंदिरों में गैर सनातनियों के प्रवेश पर रोक
बीकेटीसी का फैसला
बदरी-केदार मंदिर समिति ने बजट बैठक में पारित किया प्रस्ताव
वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए 121.7 करोड़ का बजट पारित
देहरादून। बदरी-केदार मंदिर समिति ने बदरी-केदार सहित 47 मंदिरों में गैर हिंदुओं के लिए प्रवेश वर्जित करने का निर्णय लिया है।
बदरी केदार मंदिर समिति के अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी ने कहा कि बीकेटीसी के अधीन आने वाले मंदिरों में गैर हिंदुओं के प्रवेश वर्जित का प्रस्ताव पारित किया गया है। देहरादून स्थित बीकेटीसी के शिविर कार्यालय में बजट बैठक बीकेटीसी के अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी की अध्यक्षता में हुईई बजट बैठक के दौरान आगामी वित्तीय वर्ष 2026- 27 के लिए 121.7 करोड़ रुपए का बजट पारित किया गया। इसके साथ ही सबसे महत्वपूर्ण प्रस्ताव पर भी मुहर लगी, जिस पर देशभर की निगाहें टिकी हुई थी। दरअसल, बजट बैठक के दौरान बदरीनाथ और केदारनाथ समेत बीकेटीसी के अंडर आने वाले उत्तराखंड के 47 मंदिरों में गैर सनातनियों के प्रवेश वर्जित का प्रस्ताव रखा गया। इस पर सहमति बनने के साथ ही इस प्रस्ताव को पारित कर दिया गया।
इन मंदिरों में प्रवेश पर लगाया प्रतिबंध
बीकेटीसी ने इन 47 मंदिरों में गैर हिंदुओं के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाया है। बदरीनाथ और केदारनाथ धाम के साथ ही त्रियुगीनारायण मंदिर, नरसिंह मंदिर, विश्वनाथ मंदिर, ओंकारेश्वर मंदिर, कालीमठ मंदिर, ब्रह्मकपाल शिला एवं परिक्रमा- बदरीनाथ, तप्त कुंड, शंकराचार्य समाधि, मद्महेश्वर, तुंगनाथ, रुद्रनाथ, कल्पेश्वर, योगध्यान बदरी, भविष्य बदरी, आदि बदरी, वृ( बदरी, माता मूर्ति मंदिर, वासुदेव मंदिर, गौरी कुंड मंदिर, आदिकेदारेश्वेर मंदिर, पांच शिला बदरीनाथ ;नारद शिला, नृसिंह शिला, बाराही शिला, गरुड़ शिला और मार्कण्डेय शिलाद्ध, पांच धाराएं ;प्रह्लाद धारा, कूर्मा धारा, भृगु धारा, उर्वशी धारा और इंदिरा धाराद्ध, ऊखीमठ में उषा का मंदिर, कालिशिला और वसुधारा शामिल हैं। बीकेटीसी और गंगोत्री यमुनोत्री मंदिर समितियां पहले ही साफ कर चुकी हैं कि गैर हिंदू मतलब जो सनातन धर्म को नहीं मानते उनका प्रवेश मंदिर में वर्जित किया गया है।
बीकेटीसी के पास है इनकी व्यवस्था
बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति के अधीन बदरी-केदार समेत 47 अन्य मंदिर आते हैं। बीकेटीसी इन मंदिरों की व्यवस्था देखती है। बीकेटीसी 1939 के अधिनियम के तहत काम करती है। बदरी-केदार मंदिर समिति बदरीनाथ और केदारनाथ समेत अन्य मंदिरों के कपाट खुलने और बंद होने की व्यवस्था करती है। इसके साथ ही इन मंदिरों के विकास और तीर्थयात्रियों की सुख-सुविधाओं के लिए बजट पास करना भी इनका जिम्मा है।
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