बुधवार, 17 जून 2026
ओखल: पहाड़ के गांवों का धड़कता दिल अब ‘खामोश’
कभी हर आंगन की शान होती थी पत्थर की ओखल
मसालों की खुशबू के साथ जुड़ी हैं पीढ़ियों की यादें
आधुनिक मशीनों ने छीनी परंपरागत रसोई की पहचान
ओखल में कूटा मसाला आज भी देता है असली स्वाद
देहरादून। पहाड़ की संस्कृति केवल लोकगीतों, मेलों और मंदिरों में ही नहीं बसती, बल्कि वह उन छोटी-छोटी चीजों में भी सांस लेती है जो सदियों से लोगों के जीवन का हिस्सा रही हैं। ऐसी ही एक विरासत है पत्थरों की बनी ओखल जो कभी पहाड़ के हर गांव, हर आंगन और हर रसोई की पहचान हुआ करती थी। आज भले ही उसकी जगह मिक्सर और ग्राइंडर ने ले ली हो, लेकिन ओखल की खट-खट की आवाज आज भी पहाड़ के बुजुर्गों के कानों में गूंजती है।
एक समय था जब सुबह की पहली किरण के साथ गांव के घरों से ओखल में मसाले कूटने की आवाज सुनाई देती थी। यह केवल रसोई का काम नहीं होता था, बल्कि पूरे परिवार के जीवन की लय का हिस्सा होता था। पत्थर की ओखल में लहसुन, अदरक, भांग, जीरा, जख्या और लाल मिर्च कूटते हुए महिलाएं लोकगीत गाती थीं। उस खट-खट की आवाज में पहाड़ की जिंदगी की सरलता और आत्मीयता बसती थी।
पहाड़ के लोग कहते हैं कि ओखल में कूटा मसाला केवल मसाला नहीं होता था, उसमें मेहनत, धैर्य और अपनापन भी घुला होता था। पत्थर पर कूटने से मसालों का स्वाद और सुगंध वैसी निकलती थी, जैसी मशीनों में पिसने से नहीं आती। भांग की चटनी हो, सिलबट्टे पर पिसा नमक हो या ओखल में कूटी गई हरी मिर्च, इन सबका स्वाद आज भी लोगों की यादों में ताजा है। पहाड़ के गांवों में ओखल केवल रसोई का उपकरण नहीं थी। यह घर की समृ(ि और परंपरा का प्रतीक भी मानी जाती थी। कई घरों में बड़ी-बड़ी पत्थर की ओखलें वर्षों तक एक ही स्थान पर रहती थीं। एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक उनका उपयोग होता रहता था।
बुजुर्ग बताते हैं कि शादी-ब्याह, त्योहार और विशेष अवसरों पर बड़ी मात्रा में मसाले और अनाज कूटने के लिए ओखल का उपयोग किया जाता था। गांव की महिलाएं एक-दूसरे के घर जाकर सामूहिक रूप से काम करती थीं। काम के साथ हंसी-मजाक और लोकगीतों का ऐसा संगम होता था जो आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में कहीं खो गया है। समय बदला, तकनीक आई और पहाड़ की रसोई भी बदल गई। बिजली से चलने वाले मिक्सर और ग्राइंडर ने काम को आसान बना दिया। कुछ ही मिनटों में मसाले तैयार होने लगे। सुविधा बढ़ी, लेकिन कहीं न कहीं स्वाद और आत्मीयता का एक हिस्सा पीछे छूट गया।
आज कई गांवों में पत्थर की ओखल आंगन के किसी कोने में उपेक्षित पड़ी दिखाई देती है। कुछ घरों में वह अब फूलों के गमले का आधार बन गई है तो कहीं केवल पुरानी यादों की निशानी भर रह गई है। ओखल केवल एक वस्तु नहीं, बल्कि पहाड़ की लोक संस्कृति का जीवंत दस्तावेज है। इसमें पहाड़ की महिलाओं का श्रम, पारिवारिक जीवन की आत्मीयता और पारंपरिक खान-पान की पूरी कहानी छिपी है।
जब भी कोई बुजुर्ग ओखल को देखता है तो उसे अपने बचपन का गांव, मां के हाथों का स्वाद और परिवार के साथ बिताए वह दिन याद आ जाते हैं जब जीवन में सुविधाएं कम थीं, लेकिन अपनापन बहुत अधिक था। आज जब दुनिया अपनी जड़ों की ओर लौटने की बात कर रही है, तब पत्थर की ओखल जैसी पारंपरिक धरोहरों को भी सहेजने की जरूरत है। यह केवल एक पत्थर नहीं, बल्कि पहाड़ की स्मृतियों, स्वाद और संस्कृति का हिस्सा है। शायद आने वाली पीढ़ियां कभी यह न जान सकें कि सुबह-सुबह ओखल की खट-खट की आवाज कैसी लगती थी। लेकिन पहाड़ के बुजुर्गों के लिए वह आवाज आज भी किसी लोकगीत की तरह दिल में गूंजती है।
पत्थरों की वह ओखल आज भी गांव के किसी पुराने आंगन में चुपचाप खड़ी है। वह बोलती नहीं, लेकिन उसकी खामोशी कहती है कि उसने पीढ़ियों को पाला है, रिश्तों को जोड़ा है और पहाड़ की रसोई को स्वाद दिया है। समय बदल गया, लोग बदल गए, लेकिन ओखल में बसी यादें आज भी पहाड़ के दिल में जिंदा हैं।
विकास की ‘बिजली’ चमकेगी और दर्द देगा ‘विस्थापन’
उत्तराखंड-हिमाचल बार्डर पर किशाऊ बांध महापरियोजना की सुगबुगाहट
बरसों की कागजी दौड़ व बैठकों के दौर के बाद आखिरकार जमीन पर उतरेगी महापरियोजना
उत्तराखंड-हिमाचल ही नहीं पूरे उत्तर भारत की बिजली, पानी और सिंचाई का संकट होगा कम
हजारों को रोजगार, क्षेत्र के विकास की जगी उम्मीद, पर्यावरण की चिंता व विस्थापन का दर्द
देहरादून। यमुना नदी पर प्रस्तावित किशाऊ बांध परियोजना को उत्तराखंड की सबसे महत्वाकांक्षी जलविद्युत और बहुउद्देशीय परियोजनाओं में गिना जाता है। वर्षों से फाइलों और बैठकों में उलझी यह परियोजना अब धरातल पर उतरने की दिशा में आगे बढ़ रही है। नई दिल्ली में छह राज्यों के मुख्यमंत्री और गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में आयोजित बैठक में इस परियोजना को हरी झंडी मिलने के साथ छह राज्यों के बीच एमओयू पर हस्ताक्षर हुए। केद्र सरकार का दावा है कि किशाऊ बांध न केवल उत्तराखंड बल्कि पूरे उत्तर भारत की ऊर्जा, सिंचाई और पेयजल जरूरतों को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। वहीं स्थानीय स्तर पर इसे विकास और चुनौतियों के दोहरे पहलू के रूप में देखा जा रहा है। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की सीमा पर यमुना नदी पर बनने वाली यह परियोजना लंबे समय से चर्चा में रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि परियोजना तय समय पर पूरी होती है तो यह प्रदेश के आर्थिक और सामाजिक विकास की तस्वीर बदल सकती है।
उत्तराखंड को ऊर्जा प्रदेश कहा जाता है। राज्य की नदियां बिजली उत्पादन की अपार संभावनाएं रखती हैं। किशाऊ बांध परियोजना से बड़ी मात्रा में बिजली उत्पादन होने की संभावना है, जिससे उत्तराखंड की ऊर्जा क्षमता में उल्लेखनीय वृ(ि होगी। ऊर्जा क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि इससे न केवल प्रदेश की जरूरतें पूरी होंगी बल्कि अतिरिक्त बिजली अन्य राज्यों को भी उपलब्ध कराई जा सकेगी। इससे राज्य की आय में भी वृ(ि होने की उम्मीद है। किशाऊ परियोजना का महत्व केवल बिजली उत्पादन तक सीमित नहीं है। इसका सबसे बड़ा लाभ यमुना बेसिन से जुड़े क्षेत्रों को मिलेगा। दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान जैसे राज्यों में पेयजल और सिंचाई के लिए अतिरिक्त जल उपलब्ध कराने में यह परियोजना महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार जल संरक्षण और जल प्रबंधन की दृष्टि से भी यह परियोजना भविष्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर तैयार की गई है। जलवायु परिवर्तन और घटते जल स्रोतों के दौर में बड़े जलाशयों का महत्व और बढ़ गया है। किसी भी बड़ी परियोजना की तरह किशाऊ बांध से भी हजारों लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार मिलने की संभावना है। निर्माण कार्यों में स्थानीय युवाओं को रोजगार के अवसर मिल सकते हैं। साथ ही सड़क, पुल, संचार और अन्य आधारभूत सुविधाओं का विस्तार भी होगा। परियोजना क्षेत्र में बाजार, परिवहन और अन्य आर्थिक गतिविधियों के बढ़ने की उम्मीद है। इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को नई गति मिल सकती है। जहां एक ओर परियोजना विकास के नए अवसर लेकर आ रही है, वहीं दूसरी ओर प्रभावित गांवों के लोगों की चिंताएं भी कम नहीं हैं। बांध बनने से कई गांवों और कृकृषि भूमि के जलमग्न होने की आशंका जताई जाती रही है।
स्थानीय लोग मांग कर रहे हैं कि पुनर्वास और मुआवजा नीति को पूरी पारदर्शिता के साथ लागू किया जाए। उनका कहना है कि विकास जरूरी है, लेकिन प्रभावित परिवारों के अधिकारों और भविष्य की सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। हिमालयी क्षेत्र पहले से ही भूस्खलन, भू-धंसाव और प्राकृतिक आपदाओं के प्रति संवेदनशील माना जाता है। ऐसे में बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं को लेकर पर्यावरणविदों की चिंताएं भी सामने आती रही हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि परियोजना के निर्माण और संचालन के दौरान पर्यावरणीय मानकों का कड़ाई से पालन करना होगा। नदी पारिस्थितिकी, वन क्षेत्र और जैव विविधता पर पड़ने वाले प्रभावों का लगातार अध्ययन आवश्यक होगा।
उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से पर्यटन, कृकृषि और जलविद्युत पर आधारित है। किशाऊ परियोजना राज्य के राजस्व और औद्योगिक विकास को नई दिशा दे सकती है। यदि परियोजना के लाभ स्थानीय लोगों तक पहुंचते हैं तो यह सीमांत क्षेत्रों में विकास का नया अध्याय लिख सकती है। किशाऊ बांध परियोजना को लेकर उम्मीदें भी बड़ी हैं और आशंकाएं भी। सरकार इसे विकास का इंजन मान रही है, जबकि प्रभावित क्षेत्र के लोग अपने भविष्य को लेकर आश्वस्त होना चाहते हैं। आने वाले वर्षों में यह परियोजना केवल एक बांध नहीं होगी, बल्कि यह तय करेगी कि उत्तराखंड विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाने में कितना सफल होता है। यदि पुनर्वास, पर्यावरण और स्थानीय हितों का ध्यान रखते हुए परियोजना को आगे बढ़ाया गया तो किशाऊ बांध वास्तव में उत्तराखंड की तस्वीर बदलने वाला साबित हो सकता है।
उत्तराखंड के विकास के इतिहास में कई परियोजनाएं आईं और गईं, लेकिन किशाऊ बांध को लेकर जो उम्मीदें हैं, वह इसे एक साधारण परियोजना से कहीं अधिक महत्वपूर्ण बनाती हैं। अब निगाहें इस बात पर हैं कि यह सपना धरातल पर कब और किस रूप में साकार होता है।
मंगलवार, 16 जून 2026
भाजपा-कांग्रेस के लिए नाक और साख की जंग
विधानसभा चुनाव में भाजपा-कांग्रेस की सबसे बड़ी परीक्षा
उत्तराखंड चुनाव 2027 है सत्ता से ज्यादा प्रतिष्ठा की लड़ाई
भाजपा बचाएगी साख, कांग्रेस तलाशेगी वापसी का रास्ता
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 अब केवल सत्ता हासिल करने की लड़ाई नहीं रह गया है, बल्कि प्रदेश की दो प्रमुख राजनीतिक पार्टियों भाजपा और कांग्रेस के लिए नाक और साख का सवाल बनता जा रहा है। एक तरफ भाजपा लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटकर नया राजनीतिक इतिहास रचने की कोशिश में है, तो दूसरी ओर कांग्रेस एक दशक से चले आ रहे सत्ता के सूखे को समाप्त कर अपनी खोई राजनीतिक जमीन वापस पाने की चुनौती से जूझ रही है। चुनाव में अभी समय है, लेकिन राजनीतिक गतिविधियां जिस तेजी से बढ़ रही हैं, उससे साफ है कि दोनों दल इस मुकाबले को प्रतिष्ठा की लड़ाई मानकर चल रहे हैं। प्रदेश से लेकर दिल्ली तक बैठकों का दौर चल रहा है और संगठनात्मक ढांचे को मजबूत करने पर जोर दिया जा रहा है।
उत्तराखंड बनने के बाद राज्य की राजनीति में सत्ता परिवर्तन का इतिहास रहा है। लंबे समय तक यह धारणा बनी रही कि प्रदेश में हर चुनाव में सरकार बदलती है। लेकिन 2022 में भाजपा ने इस मिथक को तोड़ते हुए लगातार दूसरी बार सरकार बनाई। अब भाजपा की नजर तीसरी बार सत्ता हासिल करने पर है। यदि पार्टी ऐसा करने में सफल रहती है तो यह उत्तराखंड की राजनीति में एक नया अध्याय होगा। मुख्यमंत्री, सरकार और संगठन सभी चुनावी तैयारी में जुट गए हैं। सरकार की योजनाओं को जनता तक पहुंचाने के साथ-साथ संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत किया जा रहा है। भाजपा के लिए यह चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि लगातार तीसरी जीत पार्टी की नीतियों, संगठन और नेतृत्व पर जनता की मुहर मानी जाएगी।
दूसरी तरफ कांग्रेस के सामने अस्तित्व और साख की चुनौती है। 2017 और 2022 के विधानसभा चुनाव में हार के बाद पार्टी लगातार सत्ता से बाहर है। ऐसे में 2027 का चुनाव कांग्रेस के लिए केवल राजनीतिक मुकाबला नहीं बल्कि अपनी प्रासंगिकता साबित करने का अवसर भी है। कांग्रेस को उम्मीद है कि बेरोजगारी, पलायन, महंगाई, भर्ती घोटाले, भू-कानून और क्षेत्रीय मुद्दों के सहारे वह जनता के बीच अपनी पकड़ मजबूत कर सकती है। पार्टी नेतृत्व लगातार कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने और संगठन को नई ऊर्जा देने में जुटा है। यदि कांग्रेस इस चुनाव में भी सत्ता तक नहीं पहुंच पाती है तो पार्टी के सामने संगठनात्मक और राजनीतिक चुनौतियां और बढ़ सकती हैं। यही वजह है कि कांग्रेस नेतृत्व इस चुनाव को बेहद गंभीरता से ले रहा है।
उत्तराखंड का चुनाव केवल प्रदेश नेतृत्व तक सीमित नहीं है। भाजपा और कांग्रेस दोनों के केंद्रीय नेतृत्व की नजर भी इस चुनाव पर है। भाजपा के लिए यह प्रधानमंत्री और पार्टी नेतृत्व की लोकप्रियता को बरकरार रखने की परीक्षा होगी, जबकि कांग्रेस के लिए राष्ट्रीय स्तर पर अपने पुनरुत्थान की रणनीति को मजबूती देने का अवसर। इसी कारण दोनों दलों के राष्ट्रीय नेता लगातार उत्तराखंड की राजनीतिक गतिविधियों पर नजर बनाए हुए हैं। संगठनात्मक बैठकों और चुनावी तैयारियों में दिल्ली की सक्रियता साफ दिखाई दे रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2027 का चुनाव मुद्दों, नेतृत्व और संगठनात्मक क्षमता की संयुक्त परीक्षा होगा। भाजपा जहां अपने विकास कार्यों और योजनाओं के आधार पर जनता का विश्वास दोबारा हासिल करना चाहेगी, वहीं कांग्रेस सरकार विरोधी माहौल को अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश करेगी। फिलहाल इतना तय है कि उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 दोनों दलों के लिए प्रतिष्ठा की सबसे बड़ी राजनीतिक लड़ाई बन चुका है। भाजपा के लिए सत्ता बचाना और कांग्रेस के लिए सत्ता में लौटना केवल चुनावी लक्ष्य नहीं, बल्कि नाक और साख का सवाल बन गया है।
दिल्ली से देहरादून तक मंथन
संगठन को धार देने में जुटे भाजपा और कांग्रेस के राष्ट्रीय नेता
बूथ से सत्ता तक का गणित, भाजपा-कांग्रेस की बैठकें हुई तेज
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 भले अभी दूर हो, लेकिन राजनीतिक दलों ने चुनावी तैयारी का बिगुल बजा दिया है। सत्तारूढ़ भाजपा और मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस दोनों ही संगठन को मजबूत करने के लिए राष्ट्रीय नेतृत्व के साथ लगातार बैठकें कर रहे हैं। देहरादून से लेकर दिल्ली तक बैठकों का दौर जारी है, जिसमें बूथ प्रबंधन, कार्यकर्ताओं की सक्रियता, क्षेत्रीय समीकरण और चुनावी रणनीति पर मंथन किया जा रहा है। भाजपा और कांग्रेस दोनों यह समझ चुकी हैं कि उत्तराखंड जैसे छोटे राज्य में चुनावी जीत का आधार मजबूत संगठन ही होता है। यही वजह है कि दोनों दल चुनावी मैदान में उतरने से पहले अपनी संगठनात्मक कमजोरियों को दूर करने में जुटे हैं।
भाजपा ने मिशन 2027 के तहत बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत बनाने की रणनीति तैयार की है। प्रदेश नेतृत्व लगातार राष्ट्रीय पदाधिकारियों और केंद्रीय नेताओं के साथ बैठकें कर रहा है। पार्टी का जोर उन बूथों और विधानसभा क्षेत्रों पर है जहां पिछले चुनावों में अपेक्षित प्रदर्शन नहीं हो पाया था। भाजपा नेतृत्व कार्यकर्ताओं को यह संदेश देने में जुटा है कि विधानसभा चुनाव में जीत की नींव बूथों पर ही रखी जाएगी। इसके लिए बूथ समितियों का पुनर्गठन, पन्ना प्रमुखों की सक्रियता और सरकार की योजनाओं को घर-घर तक पहुंचाने पर विशेष जोर दिया जा रहा है।
प्रदेश के वरिष्ठ नेताओं और मंत्रियों को भी अलग-अलग क्षेत्रों की जिम्मेदारी सौंपे जाने की चर्चा है। संगठन का लक्ष्य चुनाव से पहले कार्यकर्ताओं में नया उत्साह भरना और किसी भी प्रकार की गुटबाजी को समाप्त करना है। कांग्रेस भी आगामी चुनाव को सत्ता में वापसी के अवसर के रूप में देख रही है। पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व की मौजूदगी में लगातार संगठनात्मक बैठकों का आयोजन किया जा रहा है। प्रदेश संगठन को मजबूत करने, कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने और जिला स्तर पर समन्वय बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है।
कांग्रेस नेतृत्व का मानना है कि यदि संगठन मजबूत रहा तो सरकार के खिलाफ जनता के मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाया जा सकेगा। इसी कारण पार्टी बूथ स्तर तक अपनी इकाइयों को सक्रिय करने और निष्क्रिय कार्यकर्ताओं को फिर से जोड़ने की कोशिश कर रही है। राष्ट्रीय नेताओं के साथ बैठकों में प्रदेश के राजनीतिक हालात, स्थानीय मुद्दों और संभावित चुनावी चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा हो रही है। पार्टी विशेष रूप से युवा, महिला और सोशल मीडिया नेटवर्क को मजबूत करने पर भी फोकस कर रही है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर भाजपा और कांग्रेस दोनों के केंद्रीय नेतृत्व की सक्रियता बढ़ना इस बात का संकेत है कि चुनाव को गंभीरता से लिया जा रहा है। दोनों दलों के लिए उत्तराखंड प्रतिष्ठा का चुनाव बनने जा रहा है। भाजपा लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटने का रिकार्ड बनाना चाहती है, जबकि कांग्रेस एक दशक बाद सत्ता में वापसी का सपना देख रही है। ऐसे में संगठनात्मक मजबूती ही दोनों दलों की सबसे बड़ी प्राथमिकता बन गई है।
आने वाले महीनों में दोनों दलों के राष्ट्रीय नेताओं के उत्तराखंड दौरे बढ़ सकते हैं। कार्यकर्ता सम्मेलन, प्रशिक्षण शिविर, जनसंवाद कार्यक्रम और संगठनात्मक बैठकें चुनावी माहौल को और तेज करेंगी। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि चुनावी जंग भले 2027 में होनी है, लेकिन उसकी बुनियाद अभी से रखी जा रही है। उत्तराखंड की राजनीति में फिलहाल मुद्दों से ज्यादा संगठन की मजबूती पर जोर दिखाई दे रहा है। भाजपा और कांग्रेस दोनों यह मानकर चल रही हैं कि मजबूत संगठन ही 2027 की सत्ता की चाबी साबित होगा।
‘तकली’ की घूमती धुरी अब थमी
पहाड़ की ऊन, भेड़-बकरियां और सदियों पुरानी आजीविका विलुप्ति के कगार पर
कभी हर आंगन में गूंजती थी तकली की खनक, आज नई पीढ़ी को इसका नाम तक नहीं मालूम
कभी थी गढ़वाल और कुमाऊं की पारंपरिक अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा
देहरादून। पहाड़ की संस्कृति केवल उसके मंदिरों, मेलों और लोकगीतों में ही नहीं बसती, बल्कि उन छोटे-छोटे औजारों में भी जीवित रही है जिन्होंने सदियों तक लोगों की आजीविका को सहारा दिया। इन्हीं में से एक थी तकली जो पहाड़ की महिला और पुरूषों के हाथों में घूमती थी और भेड़ों की ऊन को धागे में बदल देती थी। यही धागा आगे चलकर गर्म कपड़ों, पट्टू, थुलमा, पंखी और कई पारंपरिक वस्त्रों का आधार बनता था। आज समय बदल गया है। मशीनों से बने कपड़ों और बाजार की चकाचौंध के बीच तकली की धीमी गति कहीं खो गई है। पहाड़ के गांवों में कभी आम दृश्य रही तकली अब संग्रहालयों और बुजुर्गों की यादों तक सिमटती जा रही है।
एक समय था जब गढ़वाल और कुमाऊं के अधिकांश गांवों में भेड़-बकरियां पालना आम बात थी। ऊंचाई वाले इलाकों में रहने वाले परिवार सैकड़ों भेड़ों के झुंड रखते थे। गर्मियों में ये झुंड बुग्यालों की ओर निकल जाते और सर्दियों में निचले इलाकों की ओर लौट आते। भेड़ों से प्राप्त ऊन केवल घरेलू जरूरतों को ही पूरा नहीं करती थी, बल्कि व्यापार का भी महत्वपूर्ण साधन थी। ग्रामीण ऊन बेचकर अपनी आर्थिक जरूरतें पूरी करते थे। कई परिवारों की पूरी आजीविका इसी पर निर्भर थी।
भेड़ों से ऊन काटने के बाद उसे साफ किया जाता था। फिर गांव की महिलाएं और पुरूष तकली की मदद से उस ऊन को बारीक धागे में बदलती थीं। घर के आंगन, चौक और खेतों की मेड़ों पर बैठकर महिलाएं बातचीत के साथ-साथ तकली चलाती थीं। यह केवल काम नहीं था बल्कि सामाजिक जीवन का हिस्सा था। लोकगीतों और कहानियों के बीच तकली घूमती रहती और धीरे-धीरे ऊन मजबूत धागे में बदल जाती। यही धागा बाद में करघों पर कपड़ों का रूप लेता था। सड़कें बढ़ीं, बाजार गांवों तक पहुंचे और सस्ते मशीन निर्मित कपड़े उपलब्ध होने लगे। इसके बाद ऊन और हाथ से बने वस्त्रों की मांग घटने लगी। भेड़ पालन में बढ़ती लागत, चरागाहों का सिमटना और युवा पीढ़ी का अन्य रोजगारों की ओर रुझान भी इस परंपरा के कमजोर होने का बड़ा कारण बना। आज कई गांवों में भेड़ों के बड़े झुंड दिखाई नहीं देते। तकली चलाने वाली बुजुर्ग महिलाएं और पुरूष तो हैं, लेकिन सीखने वाले हाथ नहीं हैं।
तकली का गायब होना केवल एक औजार का गायब होना नहीं है। इसके साथ एक पूरी जीवनशैली, लोक ज्ञान और पारंपरिक अर्थव्यवस्था भी खत्म होती जा रही है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि भेड़ पालन, ऊन उत्पादन और पारंपरिक हस्तशिल्प को बढ़ावा दिया जाए तो यह रोजगार का नया माध्यम बन सकता है। पर्यटन और हस्तशिल्प बाजारों से जोड़कर इस विरासत को पुनर्जीवित किया जा सकता है।
70 वर्षीय ग्रामीण महिलाएं आज भी याद करती हैं कि कैसे शाम ढलते ही घर के आंगन में बैठकर तकली चलाई जाती थी। सर्दियों के लिए थुलमा और पंखी तैयार किए जाते थे। गांव के हर घर में ऊन की खुशबू और मेहनत की गर्माहट महसूस होती थी। अब वह दिन केवल स्मृतियों में हैं। तकली की घूमती धुरी धीरे-धीरे थम रही है और उसके साथ पहाड़ की एक अनमोल विरासत भी खामोश होती जा रही है।
उत्तराखंड में बढ़ी राजनीतिक हलचल
कांग्रेस की प्रदेश प्रभारी के दौरे से पहले भाजपा हुई सक्रिय
नितिन नवीन के मसूरी पहुंचते ही तेज हुई राजनीतिक चर्चाएं
भाजपा-कांग्रेस के कार्यक्रम से पहले बढ़ा राजनीतिक तापमान
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में विधानसभा चुनाव 2027 की आहट अब साफ सुनाई देने लगी है। कांग्रेस की प्रदेश प्रभारी के प्रस्तावित उत्तराखंड दौरे से ठीक पहले भाजपा प्रदेश अध्यक्ष नितिन नवीन का अचानक मसूरी पहुंचना राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है। भाजपा इसे संगठनात्मक कार्यक्रम और नियमित गतिविधि बता रही है, लेकिन राजनीतिक जानकार इसके समय और संदेश को लेकर कई मायने निकाल रहे हैं। मसूरी में नितिन नवीन की मौजूदगी ऐसे समय में सामने आई है जब कांग्रेस अपनी नई रणनीति के साथ संगठन को सक्रिय करने की तैयारी कर रही है। ऐसे में भाजपा अध्यक्ष का पहाड़ की राजनीति के केंद्र माने जाने वाले मसूरी में पहुंचना सियासी तौर पर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
भाजपा लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी का लक्ष्य लेकर चल रही है। पार्टी नेतृत्व बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करने और कार्यकर्ताओं में उत्साह बनाए रखने के लिए लगातार बैठकों और संवाद कार्यक्रमों पर जोर दे रहा है। सूत्रों के अनुसार भाजपा नेतृत्व आगामी चुनाव को देखते हुए संगठनात्मक ढांचे की समीक्षा, कार्यकर्ताओं की सक्रियता और जनसंपर्क अभियानों पर विशेष फोकस कर रहा है। मसूरी दौरे को भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
दूसरी ओर कांग्रेस की प्रदेश प्रभारी का उत्तराखंड दौरा भी संगठनात्मक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पार्टी लंबे समय से सत्ता से बाहर है और 2027 के चुनाव को वापसी के अवसर के रूप में देख रही है। कांग्रेस नेतृत्व जिला और ब्लाक स्तर पर संगठन को मजबूत करने, कार्यकर्ताओं की नाराजगी दूर करने और चुनावी रणनीति तैयार करने में जुटा है। प्रभारी के दौरे के दौरान संगठन की समीक्षा और आगामी राजनीतिक कार्यक्रमों पर चर्चा होने की संभावना है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मसूरी केवल पर्यटन नगरी ही नहीं बल्कि प्रदेश की राजनीति का भी महत्वपूर्ण केंद्र रही है। यहां होने वाली बैठकों और नेताओं की गतिविधियों को अक्सर बड़े राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जाता है। नितिन नवीन का मसूरी दौरा भाजपा कार्यकर्ताओं में ऊर्जा भरने के साथ-साथ विपक्ष को यह संदेश देने का प्रयास भी माना जा रहा है कि पार्टी चुनावी तैयारी में किसी भी स्तर पर पीछे नहीं है। भाजपा और कांग्रेस दोनों के केंद्रीय नेतृत्व की बढ़ती दिलचस्पी यह संकेत दे रही है कि उत्तराखंड का चुनाव राष्ट्रीय राजनीति के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। दोनों दल संगठन को मजबूत करने और कार्यकर्ताओं को चुनावी मोड में लाने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि आने वाले महीनों में राष्ट्रीय नेताओं के दौरे और बढ़ेंगे तथा चुनावी गतिविधियां और तेज होंगी। अभी चुनाव में समय है, लेकिन नेताओं के दौरे, संगठनात्मक बैठकें और बढ़ती राजनीतिक सक्रियता यह साफ संकेत दे रही है कि उत्तराखंड में चुनावी बिसात बिछनी शुरू हो चुकी है। कांग्रेस प्रभारी के दौरे से पहले भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन की मसूरी मौजूदगी ने राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है और दोनों दलों के बीच चुनावी प्रतिस्पर्धा की झलक अभी से दिखाई देने लगी है।
‘कमजोर कड़ियों’ को मजबूत करने में जुटी भाजपा-कांग्रेस
हारे हुए बूथों का एक्स-रे कर रही भाजपा, पन्ना प्रमुखों से लेकर संगठन को किया जा रहा है री-बूट
पिछली गलतियों से सबक लेकर भाजपा के मजबूत गढ़ों में सेंध लगाने का मास्टर प्लान किया तैयार
सत्ता विरोधी लहर को मात देने के लिए भाजपा की पैनी नजर, तो वापसी के लिए कांग्रेस का आक्रामक रुख
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर भाजपा और कांग्रेस ने अभी से अपनी चुनावी रणनीति को धार देना शुरू कर दिया है। दोनों दलों का सबसे बड़ा फोकस उन विधानसभा सीटों पर है, जहां पिछली बार उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। भाजपा जहां अपनी हारी हुई सीटों और बूथों की समीक्षा कर जीत की हैट्रिक का रास्ता तलाश रही है, वहीं कांग्रेस उन सीटों को दोबारा जीतने और भाजपा के गढ़ में सेंध लगाने की रणनीति बना रही है। भाजपा ने विशेष रूप से हारे हुए बूथों पर फोकस करने और संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने का अभियान शुरू किया है।
प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 में अभी कई महीने शेष हैं, लेकिन प्रदेश की राजनीति में चुनावी बिसात बिछनी शुरू हो गई है। सत्ता में बैठी भाजपा और विपक्षी कांग्रेस दोनों ने अपनी पिछली हार का पोस्टमार्टम शुरू कर दिया है। दोनों दलों के रणनीतिकार उन विधानसभा क्षेत्रों की फाइलें खंगाल रहे हैं, जहां पिछली बार हार का सामना करना पड़ा था। भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती सत्ता विरोधी माहौल को नियंत्रित करने और लगातार तीसरी बार सरकार बनाने की है। पार्टी नेतृत्व मानता है कि यदि पिछली बार हारी हुई सीटों और कमजोर बूथों पर प्रदर्शन सुधारा गया तो 2027 का चुनाव अपेक्षाकृत आसान हो सकता है। इसी कारण संगठन स्तर पर बूथों की समीक्षा, कार्यकर्ताओं की सक्रियता और स्थानीय समीकरणों का आकलन किया जा रहा है।
दूसरी ओर कांग्रेस को विश्वास है कि भाजपा सरकार के खिलाफ बढ़ती जन असंतुष्टि, बेरोजगारी, पलायन, महंगाई और अधूरे वादों के मुद्दे उसे राजनीतिक बढ़त दिला सकते हैं। कांग्रेस उन सीटों पर विशेष ध्यान दे रही है जहां पिछली बार जीत का अंतर कम रहा था। पार्टी स्थानीय नेताओं को सक्रिय करने और क्षेत्रीय मुद्दों को प्रमुखता से उठाने की रणनीति पर काम कर रही है। भाजपा संगठन ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि चुनावी जीत का रास्ता बूथों से होकर गुजरता है। पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने हारे हुए बूथों और सीटों का विस्तृत विश्लेषण शुरू किया है। प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में उन कारणों की समीक्षा की जा रही है जिनकी वजह से पार्टी को हार का सामना करना पड़ा था। स्थानीय नाराजगी, गुटबाजी, टिकट वितरण और संगठनात्मक कमजोरियों को चिन्हित किया जा रहा है।
संगठन पदाधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को गांव-गांव जाकर फीडबैक लेने की जिम्मेदारी दी गई है। भाजपा की कोशिश है कि चुनाव से पहले किसी भी प्रकार की नाराजगी को दूर कर एकजुटता का संदेश दिया जाए। कांग्रेस भी इस बार कोई मौका गंवाना नहीं चाहती। पार्टी ने उन सीटों की सूची तैयार की है जहां जीत का अंतर बेहद कम रहा था। कांग्रेस नेताओं का मानना है कि यदि संगठन को मजबूत किया गया और स्थानीय मुद्दों को सही ढंग से उठाया गया तो कई सीटों पर तस्वीर बदल सकती है। प्रदेश नेतृत्व लगातार जिलों और विधानसभा क्षेत्रों में बैठकों के जरिए कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने में जुटा है। कांग्रेस की रणनीति भाजपा सरकार के खिलाफ जनभावनाओं को चुनावी समर्थन में बदलने की है।
दोनों दलों में संभावित उम्मीदवारों के प्रदर्शन पर भी नजर रखी जा रही है। जिन नेताओं की अपने क्षेत्रों में सक्रियता कम पाई जाएगी, उनके टिकट पर संकट खड़ा हो सकता है। पार्टी संगठन अब केवल राजनीतिक पहचान नहीं बल्कि जमीनी पकड़ और जनसंपर्क को भी टिकट का आधार बनाने की तैयारी में है। गढ़वाल और कुमाऊं के पर्वतीय क्षेत्रों से लेकर तराई के मैदानी इलाकों तक राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। गांवों की चौपालों, बाजारों और सामाजिक आयोजनों में नेताओं की मौजूदगी बढ़ने लगी है। चुनाव भले दूर हो, लेकिन राजनीतिक दलों ने जनता के बीच अपनी उपस्थिति दर्ज करानी शुरू कर दी है।
उत्तराखंड की राजनीति में यह दौर चुनावी तैयारी का पहला अध्याय माना जा रहा है। भाजपा अपनी सत्ता बचाने और इतिहास रचने की कोशिश में है, जबकि कांग्रेस सत्ता में वापसी का अवसर तलाश रही है। फिलहाल दोनों दलों की नजर उन सीटों पर है जहां पिछली हार ने उन्हें सबक दिया था। आने वाले महीनों में यही सीटें चुनावी रणभूमि का सबसे बड़ा केंद्र बनने वाली हैं।
भाजपा: सत्ता-संगठन में ‘परफेक्ट ट्यूनिंग’
रूठे नेताओं को मनाकर भीतरघात का खतरा टालने की कोशिश
कमजोर कड़ियों को मजबूत कर क्लीन स्वीप की चल रही तैयारी
चुनावी शंखनाद से पहले कुनबे को एक रखने की कवायद शुरू
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के साथ ही भाजपा ने संगठन और सत्ता के बीच समन्वय मजबूत करने के साथ-साथ नाराज नेताओं को साधने की कवायद भी तेज कर दी है। हाल के दिनों में पार्टी नेतृत्व लगातार संगठन को मजबूत करने, हारी हुई सीटों पर विशेष फोकस करने और कार्यकर्ताओं व नेताओं को एकजुट रखने पर जोर दे रहा है।
उत्तराखंड विधानसभा चुनाव भले अभी कुछ महीने दूर हों, लेकिन भाजपा ने चुनावी बिसात बिछानी शुरू कर दी है। पार्टी नेतृत्व को यह एहसास है कि लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी का रास्ता केवल सरकारी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि संगठनात्मक एकजुटता से होकर गुजरता है। यही वजह है कि भाजपा के बड़े नेता अब उन नेताओं और कार्यकर्ताओं को मनाने में जुट गए हैं जो पिछले कुछ वर्षों में टिकट, दायित्व या संगठनात्मक उपेक्षा को लेकर नाराज रहे हैं। भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती उन विधानसभा क्षेत्रों की है जहां 2022 के चुनाव में पार्टी को हार का सामना करना पड़ा था या जीत का अंतर बेहद कम रहा था। पार्टी नेतृत्व इन सीटों पर विशेष रणनीति बना रहा है और सांसदों, विधायकों तथा वरिष्ठ नेताओं को जिम्मेदारी सौंप रहा है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि चुनाव से पहले किसी भी प्रकार की अंदरूनी नाराजगी भाजपा के लिए नुकसानदायक साबित हो सकती है। यही कारण है कि संगठन स्तर पर ऐसे नेताओं से संवाद बढ़ाया जा रहा है जो पिछले चुनावों के बाद खुद को हाशिये पर महसूस कर रहे थे। कई वरिष्ठ नेताओं को फिर से सक्रिय भूमिका देकर कार्यकर्ताओं में संदेश देने का प्रयास किया जा रहा है कि पार्टी सभी को साथ लेकर चलना चाहती है।
भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व ने भी हालिया बैठकों में सरकार और संगठन के बीच बेहतर समन्वय पर जोर दिया है। पार्टी सांसदों और विधायकों को निर्देश दिए गए हैं कि वह अपने-अपने क्षेत्रों में प्रभावशाली लोगों, सामाजिक संगठनों और पुराने कार्यकर्ताओं से संपर्क बढ़ाएं। इसके पीछे मकसद चुनावी माहौल बनने से पहले संगठन को पूरी तरह सक्रिय करना है। दूसरी ओर टिकट की दावेदारी को लेकर भी भाजपा सतर्क दिखाई दे रही है। प्रदेश नेतृत्व पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि उम्मीदवार चयन का आधार केवल जीतने की क्षमता होगी और इसके लिए कई स्तरों पर सर्वे कराए जाएंगे। ऐसे में टिकट की उम्मीद लगाए बैठे नेताओं को अभी से अनुशासन में रहने का संदेश दिया जा रहा है।
भाजपा की रणनीति साफ हैकृपहले संगठन को एकजुट करना, फिर सरकार की उपलब्धियों को गांव-गांव तक पहुंचाना और अंत में चुनावी मैदान में पूरी ताकत के साथ उतरना। पार्टी को लगता है कि यदि नाराज नेताओं को समय रहते मना लिया गया तो 2027 की राह अपेक्षाकृत आसान हो सकती है। लेकिन यदि असंतोष खुलकर सामने आया तो विपक्ष को भाजपा के खिलाफ बड़ा मुद्दा मिल सकता है। कुल मिलाकर उत्तराखंड भाजपा में इन दिनों चुनावी तैयारी के साथ-साथ मनाओ और साथ लाओ अभियान भी चल रहा है। आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि पार्टी अपने रूठे नेताओं को कितनी सफलता से मना पाती है और इसका असर 2027 के चुनावी समीकरणों पर कितना पड़ता है।
दून में खो गया ‘रिटायरमेंट पैराडाइज’
दम तोड़ रही दून घाटी, प्रदूषण, जाम और अपराध के साए में अपनों का शहर
अपराध के ग्रहण ने छीना दून का पुराना गौरव और रिटायरमेंट सिटी का तमगा
शिक्षा नगरी में अब बढ़ने लगा है खौफ, जीवन की गुणवत्ता को लेकर लोग चिंतित
देहरादून। कभी अपनी शांत फिजाओं, हरियाली, साफ-सुथरे वातावरण और सुकून भरे जीवन के लिए पहचानी जाने वाली दून घाटी आज तेजी से बदल रही है। पहाड़ों की गोद में बसी यह खूबसूरत वादी अब बढ़ते अपराध, यातायात अव्यवस्था, अतिक्रमण, प्रदूषण और अनियोजित शहरीकरण जैसी समस्याओं से जूझ रही है, जिस दून को कभी रिटायरमेंट सिटी और शिक्षा नगरी कहा जाता था, वहां अब लोगों के बीच सुरक्षा और जीवन की गुणवत्ता को लेकर चिंता बढ़ने लगी है।
राजधानी बनने के बाद देहरादून का तेजी से विस्तार हुआ। विकास की रफ्तार ने शहर को नई पहचान दी, लेकिन इसके साथ कई समस्याएं भी जन्म लेती गईं। आबादी बढ़ी, वाहनों की संख्या कई गुना बढ़ गई और शहर की सड़कों पर दबाव लगातार बढ़ता गया। सुबह और शाम के समय प्रमुख मार्गों पर लगने वाले लंबे जाम अब दूनवासियों की दिनचर्या का हिस्सा बन चुके हैं।
दून घाटी की सबसे बड़ी पहचान उसकी हरियाली और प्राकृतिक सौंदर्य रहा है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में लगातार हो रहे निर्माण कार्यों, पेड़ों की कटाई और कंक्रीट के जंगलों ने इस पहचान को चुनौती दी है। शहर के आसपास की कृकृषि भूमि और खुले क्षेत्र तेजी से कालोनियों में बदल रहे हैं। परिणामस्वरूप पर्यावरणीय संतुलन प्रभावित हो रहा है और भूजल स्तर पर भी दबाव बढ़ रहा है। सिर्फ पर्यावरण ही नहीं, सामाजिक माहौल में भी बदलाव महसूस किया जा रहा है। कभी शांत और सुरक्षित माने जाने वाले शहर में अब चोरी, लूट, साइबर ठगी, नशे से जुड़े अपराध और आपराधिक घटनाओं की खबरें लगातार सामने आ रही हैं। बाहरी राज्यों से बढ़ते पलायन और तेजी से बढ़ती आबादी के बीच कानून-व्यवस्था बनाए रखना भी प्रशासन के लिए चुनौती बनता जा रहा है।
शिक्षा और संस्कृति के लिए प्रसि( दून में आज युवा पीढ़ी के सामने भी नई चुनौतियां खड़ी हो रही हैं। नशे का बढ़ता जाल, सोशल मीडिया से जुड़े अपराध और बदलती जीवनशैली समाज के लिए चिंता का विषय बन रहे हैं। कई सामाजिक संगठन और बु(िजीवी समय-समय पर इस मुद्दे पर चिंता जता चुके हैं। जानकार बताते हैं कि समस्या विकास की नहीं, बल्कि अनियोजित विकास की है। यदि समय रहते शहर के लिए दीर्घकालिक योजना नहीं बनाई गई तो दून घाटी अपनी मूल पहचान खो सकती है। यातायात सुधार, हरित क्षेत्रों का संरक्षण, जल स्रोतों की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था को मजबूत करने जैसे कदम अब बेहद जरूरी हो गए हैं।
दून की पहचान केवल राजधानी होने से नहीं, बल्कि उसकी संस्कृति, प्रकृति और शांत जीवनशैली से रही है। आज जरूरत इस बात की है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाया जाए ताकि आने वाली पीढ़ियां भी उसी दून को देख सकें, जिसकी खूबसूरती और शांति कभी पूरे देश में मिसाल मानी जाती थी। दून घाटी के सामने खड़ी चुनौतियां केवल प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं हैं। शहर के नागरिकों, जनप्रतिनिधियों और समाज के हर वर्ग को मिलकर यह तय करना होगा कि विकास की दौड़ में दून अपनी आत्मा न खो दे। क्योंकि यदि दून की शांति और प्राकृतिक पहचान खत्म हो गई, तो केवल एक शहर नहीं, बल्कि उत्तराखंड की एक महत्वपूर्ण विरासत भी खो जाएगी।
‘मिक्सी’ के शोर में खो गया पहाड़ के ‘सिलबट्टे’ स्वाद
केवल भोजन का जरिया नहीं, बल्कि पहाड़ की विरासत और जीवंतता की पहचान थी रसोई
भांग के बीज, लहसुन और हरी मिर्च के साथ सिलबट्टे पर पिसे नमक का स्वाद आज भी यादों में जिंदा
आधुनिक दौर में भी हैं लोग पहाड़ के इस पारंपरिक और सेहतमंद स्वाद के मुरीद
देहरादून। पहाड़ की रसोई केवल भोजन बनाने की जगह नहीं, बल्कि संस्कृति, परंपरा और स्वाद का संगम है। इस रसोई की पहचान रहे सिलबट्टे की खट-खट की आवाज आज भले कम सुनाई देती हो, लेकिन इसके स्वाद की चर्चा आज भी गांव से लेकर शहर तक होती है। पहाड़ के घरों में कभी हर दिन सिलबट्टे पर मसाले, नमक, लहसुन, हरी मिर्च और भांग के बीज पीसे जाते थे। इनसे बनने वाली चटनियों और व्यंजनों का स्वाद ऐसा होता था कि खाने वाला उंगलियां चाटता रह जाए।
सिलबट्टा केवल एक पत्थर नहीं, बल्कि पहाड़ की पाक परंपरा का अभिन्न हिस्सा रहा है। पहाड़ी महिलाएं सुबह-सुबह सिल पर मसाले पीसती थीं। मसालों के पिसने के साथ ही उनकी खुशबू पूरे घर में फैल जाती थी। यही वजह थी कि पहाड़ के भोजन में एक अलग ही सोंधापन और प्राकृतिक स्वाद महसूस होता था। सिलबट्टे पर मसाले पीसने से उनमें मौजूद प्राकृतिक तेल और सुगंध बरकरार रहती है। मिक्सर की तेज गति से पैदा होने वाली गर्मी मसालों के स्वाद और खुशबू को कुछ हद तक प्रभावित कर देती है, जबकि सिलबट्टे पर धीरे-धीरे पिसे मसाले अपना मूल स्वाद बनाए रखते हैं। यही कारण है कि सिलबट्टे की चटनी और मिक्सर की चटनी के स्वाद में साफ अंतर महसूस होता है।
उत्तराखंड की प्रसि( भांग की चटनी, तिल की चटनी, लहसुन-मिर्च का नमक और भांगजीरा से तैयार मसाले जब सिलबट्टे पर पिसते हैं तो उनमें एक अलग ही स्वाद पैदा होता है। पहाड़ के बुजुर्ग आज भी दावा करते हैं कि सिलबट्टे पर पिसी भांग की चटनी का मुकाबला कोई आधुनिक मशीन नहीं कर सकती। गांवों में आज भी कई घर ऐसे हैं जहां पारंपरिक व्यंजन बनाते समय सिलबट्टे का इस्तेमाल किया जाता है। शादी-ब्याह और विशेष अवसरों पर बनने वाले व्यंजनों के लिए लोग आज भी सिलबट्टे को प्राथमिकता देते हैं। इसका कारण केवल स्वाद नहीं, बल्कि उससे जुड़ी भावनाएं और पारंपरिक पहचान भी है।
हालांकि बदलती जीवनशैली और समय की कमी के कारण सिलबट्टे की जगह मिक्सर ने ले ली है, लेकिन इसके बावजूद पहाड़ की नई पीढ़ी भी पारंपरिक स्वाद को पहचानने लगी है। कई लोग गांव जाने पर सिलबट्टे पर बनी चटनी और मसालों का स्वाद लेने की इच्छा रखते हैं। यही वजह है कि कुछ परिवारों ने आज भी अपनी रसोई में सिलबट्टे को संभालकर रखा हुआ है।
सिलबट्टा पहाड़ की उस विरासत का प्रतीक है, जो बताती है कि स्वाद केवल मसालों में नहीं, बल्कि उन्हें तैयार करने की प्रक्रिया में भी छिपा होता है। आधुनिकता की दौड़ में भले सिलबट्टे की खट-खट धीमी पड़ गई हो, लेकिन उसके स्वाद की मिठास आज भी लोगों की यादों में जिंदा है।
उत्तराखंड में ‘मोदी ब्रांड’ के सहारे भाजपा
उत्तराखंड में भाजपा ने गांव-गांव तक पहुंचा दिया चुनावी संदेश
भाजपा की प्रदेश में मोदी लहर को फिर से बनाने की है कवायद
मोदी सरकार के 12 साल पूरे होने पर प्रदेशभर में हो रहे हैं कार्यक्रम
मंत्री, विधायक और संगठन पदाधिकारी जिलों में कर रहे जनसंपर्क
लाभार्थी सम्मेलनों के जरिए वोटरों तक पहुंचने की बनी है रणनीति
विकास और राष्ट्रवाद के मुद्दों पर चुनावी माहौल बनाने की कोशिश
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 भले ही अभी दूर हो, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी बिसात बिछानी शुरू कर दी है। भाजपा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के 12 वर्ष पूरे होने को एक बड़े राजनीतिक अभियान में बदल चुकी है। प्रदेश के हर जिले में कार्यक्रम आयोजित कर भाजपा न केवल केंद्र सरकार की उपलब्धियां गिना रही है, बल्कि 2027 के चुनाव के लिए माहौल बनाने की कोशिश भी कर रही है। प्रदेश के कैबिनेट मंत्री, सांसद, विधायक, जिला प्रभारी और संगठन के पदाधिकारी लगातार जिलों का दौरा कर रहे हैं। जनसभाएं, संवाद कार्यक्रम, लाभार्थी सम्मेलन, चौपाल और प्रेस वार्ताओं के माध्यम से भाजपा जनता के बीच यह संदेश देने में जुटी है कि उत्तराखंड के विकास की कहानी प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व से जुड़ी हुई है।
भाजपा की रणनीति का केंद्र बिंदु मोदी ब्रांड है। पार्टी अच्छी तरह जानती है कि उत्तराखंड में प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता आज भी उसके सबसे मजबूत राजनीतिक हथियारों में से एक है। केदारनाथ धाम से प्रधानमंत्री मोदी का भावनात्मक जुड़ाव, चारधाम परियोजनाओं में केंद्र की भूमिका और सीमांत क्षेत्रों के विकास को भाजपा चुनावी नैरेटिव का हिस्सा बना रही है। भाजपा का सबसे बड़ा फोकस उन लाखों लोगों पर है जो केंद्र सरकार की विभिन्न योजनाओं से लाभान्वित हुए हैं। उज्ज्वला योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना, आयुष्मान भारत, किसान सम्मान निधि, हर घर जल और मुफ्त राशन जैसी योजनाओं के लाभार्थियों को पार्टी अपने सबसे मजबूत समर्थक वर्ग के रूप में देख रही है।
संगठन की ओर से बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं को निर्देश दिए गए हैं कि वह लाभार्थियों से संपर्क करें और उन्हें केंद्र सरकार की योजनाओं की जानकारी के साथ-साथ भाजपा की नीतियों से जोड़ें। यही कारण है कि हाल के कार्यक्रमों में लाभार्थी सम्मेलन प्रमुख आकर्षण बने हुए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा अभी से चुनावी विमर्श अपने पक्ष में मोड़ने का प्रयास कर रही है। पार्टी चाहती है कि 2027 का चुनाव स्थानीय असंतोष, बेरोजगारी, पलायन और महंगाई जैसे मुद्दों के बजाय विकास, राष्ट्रवाद और मोदी नेतृत्व के इर्द-गिर्द घूमे।
भाजपा नेताओं के भाषणों में लगातार यह संदेश दिया जा रहा है कि उत्तराखंड में सड़क, रेल, स्वास्थ्य और धार्मिक पर्यटन के क्षेत्र में अभूतपूर्व कार्य हुए हैं। ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना, ऑल वेदर रोड, केदारनाथ पुनर्निर्माण, मानसखंड मंदिर माला मिशन और सीमांत गांवों के विकास को उपलब्धियों के रूप में गिनाया जा रहा है। भाजपा प्रदेश में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के कार्यों को भी प्रधानमंत्री मोदी की नीतियों से जोड़कर प्रस्तुत कर रही है। समान नागरिक संहिता, नकल विरोधी कानून, सख्त भू-कानून और निवेश को बढ़ावा देने जैसे फैसलों को डबल इंजन सरकार की सफलता के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। पार्टी नेतृत्व मानता है कि यदि केंद्र और राज्य सरकार की उपलब्धियों को एक साथ जनता के सामने रखा जाए तो इसका राजनीतिक लाभ 2027 में मिल सकता है।
भाजपा के इस व्यापक अभियान ने कांग्रेस की चिंता भी बढ़ा दी है। कांग्रेस लगातार बेरोजगारी, महंगाई, पलायन, स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति और भर्ती घोटालों जैसे मुद्दों को उठाकर भाजपा को घेरने की कोशिश कर रही है। लेकिन भाजपा की कोशिश है कि चुनावी बहस को राष्ट्रीय नेतृत्व और विकास के मुद्दों पर केंद्रित रखा जाए। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि भाजपा की सबसे बड़ी ताकत उसका मजबूत संगठन और मोदी की लोकप्रियता है, जबकि कांग्रेस अभी भी संगठनात्मक मजबूती और नेतृत्व के सवालों से जूझती दिखाई देती है।
भाजपा के कार्यक्रमों की श्रृंखला को राजनीतिक गलियारों में विधानसभा चुनाव 2027 के लिए शुरुआती चुनावी अभियान के रूप में देखा जा रहा है। पार्टी कार्यकर्ताओं को सक्रिय किया जा रहा है, बूथ समितियों को मजबूत बनाया जा रहा है और सोशल मीडिया के माध्यम से युवा मतदाताओं तक पहुंचने की रणनीति पर काम चल रहा है। स्पष्ट है कि भाजपा उत्तराखंड में 2027 की चुनावी लड़ाई को केवल राज्य सरकार के प्रदर्शन तक सीमित नहीं रखना चाहती। पार्टी का पूरा जोर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 12 वर्षों के कार्यकाल, केंद्र सरकार की योजनाओं और राष्ट्रीय नेतृत्व की छवि को चुनावी मुद्दा बनाने पर है। आने वाले महीनों में यह अभियान और तेज होने की संभावना है, क्योंकि भाजपा सत्ता की हैट्रिक लगाने के लक्ष्य के साथ मैदान में उतर चुकी है।
पहाड़ की मिट्टी का वरदान है ‘चौलाई’
पहाड़ की पारंपरिक फसल में छिपा है सेहत का खजाना
चौलाई को बाजार मिला तो बदल जाएंगी किसानों की तस्वीर
आज दुनियाभर में सुपरफूड के रूप में बढ़ रही इसकी पहचान
देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ों में यदि किसी फसल ने सदियों से लोगों की भूख मिटाने के साथ-साथ उन्हें ताकत और सेहत भी दी है, तो वह है चौलाई। कभी गांवों के खेतों में आमतौर पर उगाई जाने वाली यह पारंपरिक फसल आज सुपरफूड के रूप में दुनिया भर में अपनी पहचान बना रही है। लेकिन विडंबना यह है कि जिस चौलाई को पहाड़ के लोग वर्षों से खाते आ रहे हैं, उसकी असली कीमत अब दुनिया समझने लगी है।
पहाड़ की सीढ़ीनुमा खेती में उगने वाली चौलाई केवल एक अनाज नहीं, बल्कि यहां की संस्कृति, परंपरा और जीवनशैली का अभिन्न हिस्सा रही है। बदलते समय के साथ भले ही लोगों की खान-पान की आदतें बदल गई हों, लेकिन चौलाई का महत्व आज भी कम नहीं हुआ है। गढ़वाल और कुमाऊं के अधिकांश क्षेत्रों में चौलाई की खेती वर्षों से होती रही है। कम पानी और कम संसाधनों में तैयार होने वाली यह फसल पहाड़ के किसानों के लिए हमेशा भरोसेमंद रही है। बरसात के मौसम में बोई जाने वाली चौलाई शरद )तु तक तैयार हो जाती है।
पहाड़ के बुजुर्ग बताते हैं कि पहले लगभग हर गांव में चौलाई के खेत दिखाई देते थे। घरों में इसकी रोटी बनती थी, लड्डू बनाए जाते थे और धार्मिक आयोजनों में भी इसका विशेष महत्व होता था। विशेषज्ञों के अनुसार चौलाई में प्रोटीन, कैल्शियम, आयरन, फाइबर और कई आवश्यक खनिज तत्व भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। यही वजह है कि इसे आज सुपरफूड की श्रेणी में रखा जा रहा है। पहाड़ के लोगों का मानना है कि चौलाई शरीर को ताकत देने के साथ-साथ लंबे समय तक ऊर्जा बनाए रखती है। खेतों में दिनभर काम करने वाले लोग चौलाई की रोटी और अन्य व्यंजन खाकर कठिन श्रम करते थे।
आज जब लोग मोटे अनाजों और पारंपरिक खाद्य पदार्थों की ओर लौट रहे हैं, तब चौलाई की मांग लगातार बढ़ रही है। उत्तराखंड के गांवों में चौलाई का नाम आते ही सबसे पहले चौलाई के लड्डू याद आते हैं। गुड़ के साथ तैयार किए जाने वाले ये लड्डू केवल स्वादिष्ट ही नहीं बल्कि पौष्टिक भी होते हैं। मेले, त्योहार और धार्मिक आयोजनों में चौलाई के लड्डुओं की विशेष मांग रहती है। बचपन की यादों में आज भी गांव के बुजुर्ग चौलाई के मीठे लड्डुओं का स्वाद महसूस करते हैं।
पहाड़ों से बढ़ते पलायन का असर चौलाई की खेती पर भी पड़ा है, जिन खेतों में कभी चौलाई लहलहाती थी, उनमें से कई आज बंजर पड़े हैं। खेती से युवाओं के दूर होने और बाजार की कमी के कारण चौलाई का उत्पादन भी प्रभावित हुआ है। हालांकि सरकार और विभिन्न संस्थाएं मोटे अनाजों को बढ़ावा देने के लिए प्रयास कर रही हैं। किसानों को चौलाई की व्यावसायिक खेती के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है ताकि उनकी आय बढ़ सके।
आज चौलाई केवल गांवों तक सीमित नहीं है। बड़े शहरों से लेकर विदेशों तक इसकी मांग बढ़ रही है। स्वास्थ्य के प्रति जागरूक लोग चौलाई का आटा, लड्डू, कुकीज और अन्य उत्पाद पसंद कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि उत्तराखंड के किसान वैज्ञानिक तरीके से चौलाई की खेती करें और बेहतर बाजार उपलब्ध हो तो यह फसल उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
चौलाई उत्तराखंड की उस समृ( विरासत का प्रतीक है, जिसने सदियों तक पहाड़ के लोगों को पोषण और ऊर्जा दी। आधुनिक जीवनशैली में जब लोग प्राकृतिक और पौष्टिक भोजन की तलाश कर रहे हैं, तब चौलाई एक बार फिर लोगों की थाली में सम्मान के साथ लौट रही है। यह केवल एक फसल नहीं, बल्कि पहाड़ की मेहनत, आत्मनिर्भरता और प्रकृति से जुड़ी जीवनशैली की कहानी है। चौलाई के हर दाने में उत्तराखंड की मिट्टी की खुशबू और पहाड़ के लोगों के संघर्ष की गाथा छिपी हुई है।
शनिवार, 13 जून 2026
‘मीडिया संवाद में संवाद गायब’
सवालों से दूरी या संवाद का नया माडल, भाजपा मुख्यालय के मीडिया संवाद पर उठे सवाल
पत्रकारों को बुलाया, उपलब्धियां सुनाई, राष्ट्रगान और कार्यक्रम समाप्त, कोई सवाल-जवाब नहीं
भाजपा मुख्यालय में आयोजित संवाद पर छिड़ी बहस, कांग्रेस बोली-प्रेस कान्फ्रेंस या प्रस्तुति सभा
देहरादून। दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी होने का दावा करने वाली भाजपा के प्रदेश मुख्यालय में आयोजित मीडिया संवाद कार्यक्रम अब राजनीतिक और पत्रकारिता जगत में चर्चा का विषय बन गया है। कार्यक्रम में पत्रकारों को आमंत्रित तो किया गया, लेकिन जिस तरह पूरा आयोजन संचालित हुआ, उसने संवाद और प्रेस कान्फ्रेंस की परंपराओं को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
भाजपा मुख्यालय में आयोजित कार्यक्रम की शुरुआत वंदे मातरम् से हुई। इसके बाद मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री के 12 वर्षों के कार्यकाल की उपलब्धियों को विस्तार से रखा। केंद्र सरकार की योजनाओं, विकास कार्यों और उपलब्धियों पर करीब एक घंटे तक प्रस्तुति दी गई। कार्यक्रम के अंत में राष्ट्रगान हुआ और आयोजन समाप्त घोषित कर दिया गया। लेकिन पूरे कार्यक्रम के दौरान सबसे अधिक जिस बात की चर्चा रही, वह थी पत्रकारों के सवालों के लिए मंच का न खुलना। आमतौर पर मीडिया संवाद या प्रेस वार्ता का उद्देश्य पत्रकारों और सत्ता पक्ष के बीच प्रत्यक्ष संवाद माना जाता है, जहां पत्रकार जनहित से जुड़े प्रश्न पूछते हैं और सरकार या संगठन अपना पक्ष रखता है। लेकिन इस आयोजन में संवाद की जगह एकतरफा प्रस्तुति देखने को मिली।
राजनीतिक गलियारों में इसे लेकर तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं। आलोचकों का कहना है कि यदि पत्रकारों को केवल उपलब्धियां सुनाने के लिए बुलाया जाए और उनसे सवाल पूछने का अवसर ही न दिया जाए, तो ऐसे कार्यक्रम का स्वरूप मीडिया संवाद कम और प्रचार कार्यक्रम अधिक प्रतीत होता है। वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका केवल सूचना ग्रहण करने की नहीं, बल्कि सत्ता से जवाब मांगने की भी होती है। पत्रकार जनता की ओर से सवाल पूछते हैं और यही प्रक्रिया लोकतांत्रिक जवाबदेही को मजबूत बनाती है। ऐसे में सवाल-जवाब का अभाव स्वाभाविक रूप से बहस को जन्म देता है। विपक्षी दलों ने भी इस मुद्दे को हाथों-हाथ लिया है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी नेताओं का कहना है कि यदि सरकार और संगठन अपने कामकाज को लेकर आश्वस्त हैं तो उन्हें पत्रकारों के सवालों से परहेज नहीं होना चाहिए। विपक्ष इसे संवाद से अधिक एकतरफा संप्रेषण की संज्ञा दे रहा है।
हालांकि भाजपा नेताओं का तर्क है कि कार्यक्रम का उद्देश्य प्रधानमंत्री के कार्यकाल की उपलब्धियों को साझा करना था और यह एक विशेष प्रस्तुति थी, न कि पारंपरिक प्रेस कान्फ्रेंस। पार्टी का कहना है कि मीडिया के साथ नियमित रूप से संवाद और प्रेस वार्ताएं होती रहती हैं। फिर भी देहरादून में हुए इस आयोजन ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया हैकृक्या राजनीति में मीडिया संवाद का स्वरूप बदल रहा है? क्या प्रेस कान्फ्रेंस अब सवालों और जवाबों का मंच कम और उपलब्धियों के प्रस्तुतीकरण का माध्यम अधिक बनती जा रही हैं? लोकतंत्र में प्रेस और सत्ता के रिश्ते की मजबूती सवाल पूछने और जवाब देने की संस्कृति पर टिकी होती है। ऐसे में भाजपा मुख्यालय का यह आयोजन सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि मीडिया और राजनीति के बदलते संबंधों पर नई बहस की शुरुआत भी बन गया है।
‘कंक्रीट’ के जंगलों में गुम हो गई ‘मंडुए की रोटी’ की खुशबू
मंडुए की रोटी में था पहाड़ की मिट्टी की खुशबू और मां के हाथों का स्वाद
पिज्जा-बर्गर के दौर में मंडुए की रोटी हमारे पहाड़ की है असली पहचान
कभी थी मजबूरी की थाली, आज दुनिया के लिए है सेहत का खजाना
देहरादून। जब पहाड़ की सुबह धूप की पहली किरणों के साथ जागती है, जब दूर कहीं गौशाला से आती घंटियों की आवाज और चूल्हे में जलती लकड़ियों की खुशबू गांव की हवा में घुलती थी, तब पहाड़ की रसोई में एक ऐसी खुशबू फैलती है, जो सिर्फ भूख नहीं मिटाती बल्कि यादों को भी जगा देती है। यह खुशबू होती है मंडुए की रोटी की। लोहे के तवे पर सिकती काली-सुनहरी मंडुए की रोटी, ऊपर से लगाया गया घर का घी और साथ में भांग की चटनी, गहत की दाल या पहाड़ी सब्जी यह सिर्फ एक भोजन नहीं, बल्कि पहाड़ की संस्कृति, मेहनत और आत्मनिर्भर जीवनशैली की पहचान है।
पहाड़ के गांवों में आज भी कई घरों की सुबह मंडुए की रोटी से शुरू होती है। बुजुर्ग महिलाओं के हाथों में मंडुए का आटा आते ही जैसे पुरानी यादें जीवंत हो उठती हैं। आटे को गूंथने से लेकर गोल रोटी बनाने तक हर प्रक्रिया में पहाड़ की परंपरा बसती है। कई लोगों के लिए मंडुए की रोटी का स्वाद बचपन की उन सुबहों की याद है, जब मां चूल्हे के पास बैठकर रोटियां सेंकती थीं और बच्चे स्कूल जाने से पहले गरम-गरम रोटी खाकर निकलते थे। आज जब शहरों की भागदौड़ में लोग पैकेट बंद भोजन की ओर बढ़ रहे हैं, वहीं पहाड़ की यह साधारण सी रोटी अपने भीतर प्रकृति और अपनापन समेटे हुए है।
एक समय था जब मंडुआ पहाड़ के गरीब और मेहनतकश लोगों का मुख्य भोजन माना जाता था। पहाड़ की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में जहां गेहूं और चावल की खेती आसान नहीं थी, वहां मंडुआ किसानों का सहारा बना। कम पानी में भी उगने वाली यह फसल पहाड़ के किसानों की जीवनरेखा रही। खेतों में मेहनत करने वाले लोग मंडुए की रोटी खाकर दिनभर पहाड़ की चढ़ाई और कठिन काम करते थे। लेकिन समय बदला, जिस मंडुए को कभी पिछड़ेपन की निशानी माना जाता था, वही आज पोषण और स्वास्थ्य के कारण दुनिया भर में पहचान बना रहा है।
बता दें कि मंडुआ पोषक तत्वों से भरपूर माना जाता है। इसमें फाइबर, कैल्शियम और कई जरूरी पोषक तत्व पाए जाते हैं। यही वजह है कि आज शहरों में भी लोग पारंपरिक अनाजों की ओर लौट रहे हैं। लेकिन पहाड़ के लोगों के लिए मंडुआ कोई नया फैशन नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही जीवनशैली का हिस्सा है। मंडुए की रोटी की कहानी सिर्फ रसोई तक सीमित नहीं है। इसके पीछे किसान की मेहनत, पहाड़ की मिट्टी और महिलाओं का संघर्ष छिपा है।
गांव की महिलाएं मंडुआ बोने से लेकर उसे काटने, सुखाने और पीसने तक की पूरी प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। पहले घरों में हाथ की चक्की से मंडुआ पीसा जाता था, जिसकी खुशबू आज भी बुजुर्गों को पुराने दिनों की याद दिलाती है। पलायन के कारण पहाड़ के कई गांव खाली हो गए, खेत बंजर होने लगे, लेकिन मंडुए ने अपनी जगह नहीं छोड़ी। आज भी कई गांवों में बुजुर्ग अपने खेतों में मंडुआ उगाते हैं और नई पीढ़ी को अपनी परंपरा से जोड़ने का प्रयास करते हैं।
मंडुए की रोटी हमें याद दिलाती है कि पहाड़ की असली ताकत सिर्फ ऊंचे पहाड़ और नदियां नहीं, बल्कि वहां के लोगों की मेहनत और उनकी सादगी भी है। मंडुए की रोटी का स्वाद शब्दों में बांधना आसान नहीं। इसमें पहाड़ की ठंडी हवा है, खेतों की मिट्टी की खुशबू है, मां के हाथों का प्यार है और उस जीवन का एहसास है, जिसमें कम साधनों में भी खुशियां भरपूर थीं। आज भले ही बड़े शहरों में लोग इसे स्वास्थ्य के नाम पर अपना रहे हैं, लेकिन पहाड़ के लिए मंडुए की रोटी हमेशा से भावनाओं की रोटी रही है।
जिंदगी की जंग से हारा ‘गोल्डन बॉय’
निशानेबाज जसपाल राणा के निधन से उत्तराखंड राज्य में शोक की लहर
पहाड़ों की पगडंडियों से वैश्विक मंच तक हर कदम पर देश का मान बढ़ाया
दुनिया को अपनी उंगलियों के इशारे पर झुकाया आज यादों का तमगा छोड़ गया
एक खिलाड़ी नहीं बल्कि नई पीढ़ी को निशानेबाजी की राह दिखाने वाला ही चला गया
देहरादून। कभी जिस हाथ ने लक्ष्य पर निशाना साधकर देश के लिए गौरव हासिल किया था, वही हाथ आज हमेशा के लिए थम गया। उत्तराखंड की धरती ने अपना वह बेटा खो दिया, जिसने छोटे से पहाड़ी परिवेश से निकलकर दुनिया के खेल मंच पर भारत का नाम रोशन किया था। जसपाल राणा के निधन की खबर ने न केवल खेल जगत बल्कि पूरे उत्तराखंड को गहरे शोक में डुबो दिया है।
जसपाल राणा सिर्फ एक निशानेबाज नहीं थे वह पहाड़ के उन सपनों की कहानी थे जो सीमित संसाधनों के बावजूद आसमान छूने का हौसला रखते हैं। उनके जाने से प्रदेश ने एक ऐसा खिलाड़ी खो दिया, जिसने खेल को पहचान दी और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक रास्ता तैयार किया। उत्तराखंड के पहाड़ी परिवेश से निकलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाना आसान नहीं था। लेकिन जसपाल राणा ने अपनी मेहनत, अनुशासन और दृदृढ़ इच्छाशक्ति के दम पर वह मुकाम हासिल किया, जहां पहुंचना हर खिलाड़ी का सपना होता है।
कम उम्र में ही उन्होंने निशानेबाजी की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई। अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में उनके शानदार प्रदर्शन ने भारत को गर्व के कई मौके दिए। एशियन गेम्स और कामनवेल्थ गेम्स जैसे बड़े मंचों पर उन्होंने देश के लिए पदक जीते। उत्तराखंड अक्सर अपनी प्राकृतिक सुंदरता, संस्कृति और वीरता के लिए जाना जाता रहा है, लेकिन खेलों की दुनिया में जसपाल राणा ने प्रदेश का नाम एक नई ऊंचाई दी थी। उन्होंने यह साबित किया कि पहाड़ों के गांवों में पलने वाले सपने भी अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंच सकते हैं। उनके प्रदर्शन ने उत्तराखंड के युवाओं को यह विश्वास दिया कि खेल भी भविष्य बनाने का रास्ता हो सकता है।
जसपाल राणा का योगदान केवल उनके अपने पदकों तक सीमित नहीं रहा। खिलाड़ी के रूप में सफलता हासिल करने के बाद उन्होंने कोच की भूमिका निभाई और नई प्रतिभाओं को तराशने का काम किया। युवा निशानेबाजों को तैयार करने में उनका योगदान याद किया जाएगा। उनके मार्गदर्शन में कई खिलाड़ियों ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई। वह मानते थे कि एक खिलाड़ी की असली सफलता केवल खुद जीतने में नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ी को जीतने के लिए तैयार करने में है। जसपाल राणा की खेल यात्रा के पीछे परिवार का बड़ा योगदान रहा। उनके पिता नारायण सिंह राणा भी निशानेबाजी से जुड़े रहे और उन्होंने बेटे को इस खेल की शुरुआती सीख दी। पिता से मिली प्रेरणा और खुद की मेहनत ने जसपाल को देश के शीर्ष निशानेबाजों में शामिल किया।
यह सफर केवल एक खिलाड़ी का सफर नहीं था, बल्कि एक परिवार की उस तपस्या की कहानी थी, जिसने उत्तराखंड को गर्व करने का मौका दिया। खेल की दुनिया में कुछ नाम केवल रिकार्ड और पदकों से नहीं पहचाने जाते, बल्कि उनके व्यक्तित्व और योगदान से याद किए जाते हैं। जसपाल राणा भी ऐसे ही नामों में शामिल हैं। उनका जाना उत्तराखंड के खेल जगत के लिए एक बड़ी कमी है। आने वाले वर्षों में जब भी प्रदेश में निशानेबाजी और खेल प्रतिभाओं की बात होगी, जसपाल राणा का नाम सम्मान के साथ लिया जाएगा।
पहाड़ की शांत वादियों से निकलकर दुनिया के मंच तक पहुंचने वाले जसपाल राणा अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी मेहनत, उपलब्धियां और खिलाड़ियों के प्रति उनका समर्पण हमेशा प्रेरणा देता रहेगा। उत्तराखंड ने अपना एक अनमोल रत्न खो दिया है।
‘हैट्रिक’ की राह में अपनों की ‘बेरुखी’
न जनता की नाराजगी झेलेंगे, न कार्यकर्ताओं की दूरी,अपनों को मनाने में जुटी भाजपा
सियासी बिसात पर शह-मात का खेल शुरू, हमलों से पहले ढाल तैयार करने की होड़
तीसरी बार सत्ता का ख्वाब, लेकिन पहले मोर्चे दुरुस्त करने का अग्निपरीक्षा का प्लान
पार्टी नेताओं की नाराजगी के मोर्चों को साधने की कवायद, गांव-गांव पहुंचने लगे नेता
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की उलटी गिनती भले ही अभी बाकी हो, लेकिन सियासी दलों ने चुनावी बिसात बिछानी शुरू कर दी है। सत्ता में लगातार तीसरी बार वापसी के लक्ष्य के साथ मैदान में उतरने की तैयारी कर रही भाजपा अब उन मोर्चों को मजबूत करने में जुट गई है, जहां उसे आने वाले चुनाव में नुकसान की आशंका दिखाई दे रही है। पार्टी के भीतर यह मंथन तेज है कि चुनावी रण में उतरने से पहले जनता की नाराजगी, कार्यकर्ताओं की दूरी और विपक्ष के हमलों से पैदा हो रहे राजनीतिक नुकसान को कैसे कम किया जाए।
भाजपा के लिए 2027 का चुनाव केवल सरकार के कामकाज का मूल्यांकन नहीं होगा, बल्कि यह भी परीक्षा होगी कि पार्टी जनता के बीच अपनी पकड़ कितनी मजबूत बनाए रख पाती है। यही वजह है कि संगठन से लेकर सरकार तक अब डैमेज कंट्रोल की रणनीति पर काम होता दिखाई दे रहा है।
उत्तराखंड की राजनीति में हर चुनाव सत्ता के प्रति जनता के मूड को बदलने वाला साबित हुआ है। राज्य गठन के बाद लंबे समय तक यहां सरकारों के बदलने का ट्रेंड रहा है। हालांकि भाजपा ने 2022 में इस मिथक को तोड़ते हुए लगातार दूसरी बार सत्ता हासिल की थी, लेकिन 2027 में उसके सामने चुनौती इस रिकॉर्ड को आगे बढ़ाने की है। पार्टी नेतृत्व जानता है कि पांच साल के कार्यकाल के अंतिम दौर में सरकार के खिलाफ स्थानीय स्तर पर छोटी-छोटी नाराजगियां भी चुनाव में बड़ा असर डाल सकती हैं। इसलिए अब फोकस उन मुद्दों पर है, जिन पर जनता सीधे सवाल उठा रही है।
उत्तराखंड में रोजगार और पलायन लंबे समय से चुनावी मुद्दे रहे हैं। पहाड़ के गांवों से युवाओं का लगातार बाहर जाना, खाली होते गांव, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी और स्थानीय स्तर पर रोजगार के सीमित अवसर विपक्ष के लिए बड़े हथियार बन सकते हैं। भाजपा सरकार विकास योजनाओं और निवेश के दावों के जरिए इन सवालों का जवाब देने की तैयारी में है, लेकिन पार्टी के रणनीतिकारों को यह भी अहसास है कि केवल योजनाओं की घोषणा से काम नहीं चलेगा, बल्कि उसका असर जमीन पर दिखाई देना जरूरी है। इसी कारण सरकार और संगठन के स्तर पर उन क्षेत्रों की पहचान की जा रही है जहां जनता तक योजनाओं का लाभ पहुंचाने में कमी रही है।
2027 के चुनाव में टिकट वितरण भाजपा के लिए सबसे अहम रणनीतिक फैसलों में से एक होगा। पार्टी अपने विधायकों और संभावित उम्मीदवारों की जमीनी पकड़ को परखने में जुटी है। सूत्रों के मुताबिक जिन क्षेत्रों में विधायकों के प्रति नाराजगी या जनता से दूरी की शिकायतें सामने आ रही हैं, वहां संगठन स्तर पर फीडबैक लिया जा रहा है। पार्टी यह आकलन कर रही है कि कौन से चेहरे चुनावी माहौल में मजबूत साबित हो सकते हैं और किन सीटों पर नए चेहरों की जरूरत पड़ सकती है।
यह रणनीति इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि उत्तराखंड में कई विधानसभा सीटों पर मुकाबला बेहद करीबी रहता है और उम्मीदवार की व्यक्तिगत छवि चुनाव परिणाम को प्रभावित करती है। भाजपा की चुनावी ताकत उसका मजबूत संगठन माना जाता है, लेकिन समय के साथ कई क्षेत्रों में पुराने कार्यकर्ताओं की नाराजगी और गुटबाजी भी चुनौती बन सकती है।
पार्टी अब सक्रिय कार्यकर्ताओं के साथ संवाद बढ़ाने, पुराने नेताओं को साथ जोड़ने और बूथ स्तर पर संगठन को मजबूत करने की दिशा में काम कर रही है। भाजपा का प्रयास है कि चुनाव के समय तक हर बूथ पर सक्रिय टीम तैयार हो और कार्यकर्ताओं में उत्साह बना रहे। कांग्रेस समेत विपक्षी दल भाजपा सरकार को बेरोजगारी, महंगाई, कानून व्यवस्था, भू-कानून, मूल निवास और पहाड़ की पहचान जैसे मुद्दों पर घेरने की तैयारी कर रहे हैं। भाजपा की रणनीति इन मुद्दों पर विपक्ष को आक्रामक होने से पहले ही जवाब तैयार करने की है। पार्टी सरकार की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने के साथ-साथ भावनात्मक और क्षेत्रीय मुद्दों पर भी अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
उत्तराखंड छोटा राज्य होने के बावजूद राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील माना जाता है। यहां कुछ हजार वोटों का अंतर कई सीटों का समीकरण बदल सकता है। इसलिए भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व भी राज्य की चुनावी तैयारियों पर नजर बनाए हुए है। संगठन, सरकार और जनप्रतिनिधियों के बीच बेहतर तालमेल बनाना भाजपा की प्राथमिकताओं में शामिल है। पार्टी नहीं चाहती कि चुनाव के समय कोई ऐसा मुद्दा सामने आए, जिसे समय रहते संभाला जा सकता था। भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह अपने विकास के एजेंडे को जनता के भरोसे में बदल पाए। सत्ता में रहने के कारण सरकार को उपलब्धियों के साथ-साथ असंतोष का जवाब भी देना होगा।
2027 का चुनाव भाजपा के लिए केवल सत्ता बचाने की लड़ाई नहीं, बल्कि उत्तराखंड में लगातार तीसरी बार सरकार बनाने की ऐतिहासिक कोशिश होगी। इसलिए चुनावी रण में उतरने से पहले पार्टी हर उस कमजोरी को दूर करना चाहती है, जो भविष्य में नुकसान का कारण बन सकती है। डैमेज कंट्रोल की यह कवायद आने वाले महीनों में और तेज होने के संकेत हैं। अब नजर इस बात पर होगी कि भाजपा की रणनीति जमीन पर कितना असर दिखाती है और जनता का मूड 2027 में किस दिशा में जाता है।
सरहद के प्रहरी 140 करोड़ का विश्वास: राष्ट्रपति
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की गरिमामई उपस्थिति में आईएमए की पासिंग आउट परेड सम्पन्न
आईएमए की पासिंग आउट परेड का निरीक्षण कर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सलामी ली
481भारतीय,16 मित्र देशों के 34 विदेशी कैडेट बने सैन्य अधिकारी, 9 महिला कैडेटों ने रचा इतिहास
देहरादून। देश की राष्ट्रपति एवं सशस्त्र सेनाओं की सर्वाेच्च कमांडर द्रौपदी मुर्मू देहरादून स्थित भारतीय सैन्य अकादमी में आयोजित पासिंग आउट परेड में मुख्य अतिथि एवं समीक्षा अधिकारी के रूप में शामिल हुईं। राष्ट्रपति ने भारतीय सैन्य अकादमी के 158वें नियमित और 141वें तकनीकी स्नातक पाठ्यक्रम की भव्य पासिंग आउट परेड की समीक्षा की और नवप्रशिक्षित सैन्य अधिकारियों को शुभकामनाएं दीं।
अपने संबोधन में राष्ट्रपति ने पास आउट होने वाले कैडेट्स को भारत माता की रक्षा के लिए कर्तव्यनिष्ठा, समर्पण, अनुशासन और राष्ट्रभक्ति की भावना के साथ कार्य करने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि सैन्य अधिकारी केवल देश की सीमाओं के प्रहरी ही नहीं, बल्कि 140 करोड़ भारतीयों के विश्वास, सम्मान और आकांक्षाओं के भी संरक्षक हैं। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अपने संबोधन में सभी कैडेट्स को सफल प्रशिक्षण के लिए बधाई दी। उन्होंने प्रशिक्षण देने वाले अधिकारियों की मेहनत की भी सराहना की। राष्ट्रपति ने कहा कि यहां से केवल सैन्य प्रशिक्षण ही नहीं बल्कि दया और करुणा जैसे मानवीय मूल्य भी मिलते हैं, जिन्हें अधिकारी आगे अपने सेवा जीवन में अपनाएंगे। उन्होंने सभी ऑफिसर कैडेट्स को उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएं दीं।
राष्ट्रपति ने कहा कि तेजी से बदलते वैश्विक सुरक्षा परिदृश्य और तकनीकी प्रगति के इस दौर में भारतीय सेना को निरंतर नवाचार, आधुनिकता और अनुकूलनशीलता के साथ आगे बढ़ना होगा। उन्होंने युवा अधिकारियों से अग्रिम मोर्चे से नेतृत्व करने, उच्च नैतिक मूल्यों का पालन करने तथा सैनिकों के कल्याण और सैन्य प्रभावशीलता के बीच संतुलन स्थापित करने का आह्वान किया।
इस अवसर पर उत्तराखण्ड के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, भारतीय सैन्य अकादमी के समादेशक लेफ्टिनेंट जनरल नागेन्द्र सिंह सहित सैन्य एवं नागरिक प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारी, गणमान्य अतिथि तथा बड़ी संख्या में उपस्थित लोगों ने इस ऐतिहासिक अवसर के साक्षी बनकर नवप्रशिक्षित अधिकारियों का उत्साहवर्धन किया।
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आईएमए से पास आउट हुए देश-विदेश के 515 सैन्य अफसर
आज भारतीय सैन्य अकादमी में 158वीं पासिंग आउट परेड संपन्न हो गई है। इस बार कुल 515 अधिकारी कैडेट पास आउट हुए। इनमें 481 भारतीय अधिकारी कैडेट और 16 मित्र देशों के 34 विदेशी अधिकारी कैडेट शामिल हैं। पासिंग आउट परेड में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुईं। इस बार की पासिंग आउट परेड कई मायनों में ऐतिहासिक रही है। पहली बार आईएमए से प्रशिक्षण प्राप्त करने वाली 9 महिला कैडेट्स भी परेड में कदमताल करती दिखीं। इन 9 महिला कैडेट्स ने एक वर्ष का कठोर सैन्य प्रशिक्षण पूरा किया है। अब यह अंतिम पग पार कर सेना का हिस्सा बन गई हैं। प्रशिक्षण पूरा करने के बाद ये सभी भारतीय सेना और अपने-अपने देशों की सेनाओं में अधिकारी के रूप में नई जिम्मेदारियां संभालेंगे। करीब सवा सात बजे उत्तराखंड के राज्यपाल गुरमीत सिंह रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी आईएमए पासिंग आउट परेड में शामिल होने के लिए परेड स्थल पहुंचे। इसके बाद करीब 7 बजकर 30 मिनट पर आईएमए पीओपी की मुख्य अतिथि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू परेड स्थल पर पहुंचीं। राष्ट्रपति ने विशेष घोड़ा बग्गी पटियाला कोच से परेड की समीक्षा की।
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पासआउट कैडेट्स पर हेलीकाप्टर से पुष्पवर्षा
समारोह के दौरान पासआउट कैडेट्स पर हेलीकाप्टर से पुष्पवर्षा की गई, जिससे पूरा माहौल उत्सव और गर्व से भर गया। इसके बाद तीन हेलीकाप्टरों ने भारतीय तिरंगा, सेना का ध्वज और आईएमए का ध्वज लेकर परेड ग्राउंड के ऊपर फ्लाईपास्ट किया। इस वर्ष की पासिंग आउट परेड में विभिन्न कोर्सों के उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले कैडेट्स को सम्मानित भी किया गया। स्वार्ड आफ आनर विशाल कुमार को मिला, जिन्होंने आरईजी कोर्स में प्रथम स्थान भी प्राप्त किया। प्रिंस राज को सिल्वर मेडल, तेजस भट्ट को ब्रान्ज मेडल, जबकि टेक्निकल ग्रेजुएट कोर्स में हृषभ मिश्रा ने प्रथम स्थान प्राप्त किया। इसके अलावा टीईएस कोर्स में करन पांडे और स्पेशल कमीशन में बोधराज थापा को भी सम्मान मिला। बांग्लादेश के कैडेट को बेस्ट फारेन कैडेट पुरस्कार दिया गया।
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देश को पहली बार आईएमए से मिलीं नौ महिला सैन्य अफसर
आईएमए में शनिवार को एक और इतिहास रचा गया। अकादमी की पासिंग आउट परेड में पहली बार नौ महिला सैन्य अफसर पासआउट होकर भारतीय सेना का हिस्सा बनीं। कदमताल करते हुए कैडेट्स ने सैन्य अनुशासन, समर्पण और राष्ट्रसेवा की भावना का प्रदर्शन किया। परेड का सबसे खास और ऐतिहासिक क्षण वह रहा, जब पहली बार आईएमए से प्रशिक्षित नौ महिला कैडेट्स सैन्य अफसर के रूप में पासआउट हुईं। इस वर्ष की पासिंग आउट परेड में शामिल 515 कैडेट्स में नौ महिला कैडेट्स सहित कुल 481 भारतीय कैडेट थे। इनके अलावा 16 मित्र देशों के 34 कैडेट्स ने भी प्रशिक्षण पूरा किया और अपने-अपने देशों की सेनाओं का हिस्सा बने। परेड के बाद पीपिंग सेरेमनी का आयोजन किया गया, जिसमें नव नियुक्त सैन्य अधिकारियों के कंधों पर रैंक सजाई गई। यह दूसरा अवसर है जब किसी महिला राष्ट्रपति ने आईएमए की पासिंग आउट परेड में मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत की। इससे पहले पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल भी परेड की सलामी ले चुकी हैं। इस बार की परेड ने न केवल 515 युवा अधिकारियों को सेना को सौंपा, बल्कि पहली बार नौ महिला सैन्य अफसरों के पासआउट होने के साथ भारतीय सैन्य इतिहास में एक नया अध्याय भी जोड़ दिया।
शुक्रवार, 12 जून 2026
‘गहत की दाल’ आज बनी वैश्विक ‘सुपरफूड’
पहाड़ी रसोई की शान, जो विज्ञान की कसौटी पर भी है महान
रसोई का सहारा गहत आज सुपरफूड के रूप में बनी पहचान
गहत में है पहाड़ की परंपरा और पोषण का है अनमोल संगम
देहरादून। गढ़वाल में गहत, कुमाऊं में कुल्थ केवल स्वाद ही नहीं, बल्कि पहाड़ों की इस औषधीय दाल के आगे आज आधुनिक विज्ञान भी नतमस्तक है। जो स्थान पहाड़ों में अपनों के सत्कार का है, वही स्थान पहाड़ी थाली में गहत का है। सदियों से जो दाल उत्तराखंड के सुदूर गांवों की रसोई में लोहे की कड़ाई पर सुलगती आंच पर पकती रही, आज उसने आधुनिक पोषण विज्ञान की दुनिया में तहलका मचा रखा है।
पहाड़ों में यदि किसी दाल को सबसे अधिक सम्मान मिला है तो वह है गहत की दाल। गढ़वाल में इसे गहत और कुमाऊं में कुल्थ कहा जाता है। सदियों से पहाड़ी रसोई का हिस्सा रही यह दाल आज आधुनिक पोषण विज्ञान की कसौटी पर भी खरी उतर रही है। कभी ग्रामीण परिवारों के भोजन का सामान्य हिस्सा मानी जाने वाली गहत अब सुपरफूड के रूप में पहचान बना रही है।
पहाड़ की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में उगने वाली गहत केवल एक फसल नहीं बल्कि स्थानीय जीवनशैली का अभिन्न हिस्सा है। कम पानी, कम संसाधनों और कठिन जलवायु में भी यह फसल आसानी से तैयार हो जाती है। यही कारण है कि इसे पहाड़ के किसानों की भरोसेमंद फसल माना जाता रहा है। गहत की दाल का स्वाद अन्य दालों से अलग होता है। पहाड़ी घरों में इसे सिलबट्टे पर मसाले पीसकर धीमी आंच में पकाया जाता है। सर्दियों के दिनों में गर्मागर्म गहत की दाल और मंडुवे या गेहूं की रोटी का स्वाद आज भी लोगों को बचपन की यादों में ले जाता है।
गहत से केवल दाल ही नहीं बल्कि परांठे, डुबके, फाणु और रस जैसे कई पारंपरिक व्यंजन भी बनाए जाते हैं। गांवों में किसी विशेष अवसर या मेहमान के आने पर भी गहत के व्यंजन परोसे जाते रहे हैं। गहत की दाल शरीर को गर्म रखती है और ठंड के मौसम में विशेष लाभ पहुंचाती है। बुजुर्गों का मानना है कि यह पथरी की समस्या में भी लाभकारी होती है। यही कारण है कि पहाड़ों में इसे घरेलू उपचार का हिस्सा भी माना जाता रहा है। आयुर्वेद और आधुनिक पोषण विशेषज्ञ भी गहत को प्रोटीन, फाइबर, आयरन और अन्य पोषक तत्वों से भरपूर मानते हैं। स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता के बीच अब शहरों में भी इसकी मांग तेजी से बढ़ रही है।
एक समय था जब गहत की दाल केवल पहाड़ी घरों तक सीमित थी, लेकिन अब देश के बड़े शहरों और आनलाइन बाजारों में भी इसकी मांग बढ़ रही है। जैविक उत्पादों की बढ़ती लोकप्रियता ने गहत को नई पहचान दी है। उत्तराखंड के किसान भी इसे नकदी फसल के रूप में देखने लगे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि गहत के उत्पादन और विपणन को बढ़ावा दिया जाए तो यह किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ उत्तराखंड की पारंपरिक कृकृषि को भी नई मजबूती दे सकती है।
आज जब फास्ट फूड और आधुनिक खानपान की संस्कृति तेजी से बढ़ रही है, तब गहत जैसी पारंपरिक फसलें हमें अपनी जड़ों से जोड़ने का काम कर रही हैं। पहाड़ की मिट्टी में उपजी यह दाल न केवल स्वाद का खजाना है बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वास्थ्य और परंपरा की अमूल्य विरासत भी है।
भाजपा के ‘रिपोर्ट कार्ड’ पर कांग्रेस की ‘चार्जशीट’
जनता पूछेगी कहां है रोजगार, पलायन और विकास का हिसाब
भाजपा गिनाएगी उपलब्धियां, कांग्रेस उठाएगी अधूरे वादों का मुद्दा
उत्तराखंड के चुनावी रण में जनता बनेगी सबसे बड़ी निर्णायक
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के साथ ही प्रदेश की राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया है। भाजपा जहां अपने दस वर्षों के शासनकाल की उपलब्धियों को जनता के सामने रखने की तैयारी कर रही है, वहीं कांग्रेस सरकार के अधूरे वादों और जमीनी समस्याओं को चुनावी हथियार बनाने में जुट गई है। राजनीतिक दलों ने संगठनात्मक तैयारियां तेज कर दी हैं और चुनावी रणनीति का केंद्र अब जनता से किए गए वादों का हिसाब-किताब बनने लगा है।
प्रदेश में रोजगार, पलायन, स्वास्थ्य सुविधाएं, शिक्षा, सड़कों की स्थिति, पर्वतीय क्षेत्रों में खाली होते गांव, महंगाई और किसानों की समस्याएं ऐसे मुद्दे हैं जिन पर विपक्ष सरकार को घेरने की तैयारी कर रहा है। कांग्रेस का आरोप है कि पिछले चुनावों में किए गए कई बड़े वादे आज भी धरातल पर पूरी तरह नहीं उतर पाए हैं। दूसरी ओर भाजपा का दावा है कि चारधाम ऑल वेदर रोड, रेल परियोजनाएं, निवेश, पर्यटन और बुनियादी ढांचे के विकास के क्षेत्र में अभूतपूर्व कार्य हुए हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2027 का चुनाव केवल नए वादों का नहीं बल्कि पुराने वादों के मूल्यांकन का चुनाव होगा। राज्य गठन के 26 वर्ष बाद भी पहाड़ से पलायन एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। कई गांव आबादी खो चुके हैं और रोजगार की तलाश में युवा मैदानों और महानगरों की ओर जा रहे हैं। ऐसे में विपक्ष इन मुद्दों को लेकर जनता के बीच जाने की तैयारी में है।
उत्तराखंड में बेरोजगारी हमेशा से चुनावी विमर्श का हिस्सा रही है। सरकारी नौकरियों में भर्ती प्रक्रिया, पेपर लीक प्रकरण और निजी क्षेत्र में सीमित अवसरों को लेकर युवाओं में असंतोष समय-समय पर सामने आता रहा है। विपक्ष इसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनाने की रणनीति पर काम कर रहा है। वहीं भाजपा भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और नए रोजगार अवसरों को अपनी उपलब्धि के रूप में पेश करेगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि चुनाव के करीब आते-आते क्षेत्रीय असंतुलन का मुद्दा भी फिर जोर पकड़ सकता है। पर्वतीय जिलों में स्वास्थ्य, शिक्षा और सड़क सुविधाओं को लेकर उठते सवाल चुनावी बहस का हिस्सा बनेंगे। वहीं मैदानी क्षेत्रों में शहरीकरण, ट्रैफिक, भूमि और कानून-व्यवस्था के मुद्दे चर्चा में रहेंगे।
भाजपा ने 2027 की तैयारियों को लेकर बूथ स्तर तक संगठन को सक्रिय करने की रणनीति शुरू कर दी है। पार्टी का लक्ष्य लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी का है। इसके लिए हारे हुए बूथों पर विशेष फोकस किया जा रहा है। उधर कांग्रेस संगठन को मजबूत करने के साथ-साथ जनता के बीच सरकार की कथित विफलताओं को ले जाने की तैयारी में है। पार्टी नेताओं का मानना है कि सत्ता विरोधी माहौल और अधूरे वादे उनके लिए राजनीतिक अवसर बन सकते हैं।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि 2027 के चुनाव में घोषणापत्रों से ज्यादा चर्चा उन वादों की होगी जो पहले किए गए थे। जनता यह जानना चाहेगी कि रोजगार के कितने अवसर बने, पलायन कितना रुका, स्वास्थ्य सेवाएं कितनी बेहतर हुईं और पहाड़ों का विकास कितना आगे बढ़ा। ऐसे में चुनावी जंग विकास के दावों और अधूरे वादों के बीच सिमटती दिखाई दे रही है। उत्तराखंड की राजनीति में अगले कुछ महीनों में बयानबाजी और तेज होगी, लेकिन अंतिम फैसला जनता करेगी, जो इस बार नेताओं से नए सपनों से ज्यादा पुराने वादों का हिसाब मांगती नजर आ रही है।
बुधवार, 10 जून 2026
मंत्री से भाजपा असहज
चुनावी साल से पहले बढ़ी उत्तराखंड में सियासी बेचौनी
कैबिनेट मंत्री के बयान विपक्ष को दे रहे हमले का मौका
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल एक बार फिर अपनी हरकतों को लेकर चर्चा में हैं। इससे भाजपा के लिए असहज स्थिति पैदा हो गई है। सोशल मीडिया पर मंत्री के उप चुनाव के दौरान अभद्र भाषा का प्रयोग करने वाला वीडियो वायरल हो रहा है।
प्रदेश की राजनीति पर नजर रखने वाले जानकारों का मानना है कि सुबोध उनियाल भाजपा के उन नेताओं में शामिल हैं जो अपनी बेबाक राय रखने के लिए जाने जाते हैं। कई बार उनकी भाषा विपक्ष के बजाय पार्टी के भीतर ही चर्चा का विषय बन जाते हैं। यही वजह है कि जब भी कोई विवादित या अलग राय सामने आती है तो राजनीतिक गलियारों में उसकी गूंज लंबे समय तक सुनाई देती है।
भाजपा इस समय मुख्यमंत्री धामी के नेतृत्व में चुनावी रणनीति को धार देने में जुटी है। पार्टी की कोशिश है कि संगठन और सरकार के बीच पूरी तरह समन्वय का संदेश जाए। ऐसे समय में किसी भी वरिष्ठ नेता का अलग रुख या बयान विपक्ष को सरकार और संगठन के बीच मतभेदों का मुद्दा उठाने का अवसर दे देता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि सुबोध उनियाल का अपना स्वतंत्र राजनीतिक आधार और लंबा अनुभव है। यही कारण है कि उनके बयानों को सामान्य राजनीतिक प्रतिक्रिया के बजाय गंभीरता से देखा जाता है। कई बार उनके वक्तव्य यह संकेत भी देते हैं कि पार्टी के भीतर विभिन्न मुद्दों पर अलग-अलग राय मौजूद है। हालांकि भाजपा सार्वजनिक रूप से इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा बताती रही है।
कांग्रेस भी ऐसे मौकों को हाथ से जाने नहीं देना चाहती। विपक्ष लगातार यह आरोप लगाता रहा है कि भाजपा के भीतर सब कुछ सामान्य नहीं है और वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी समय-समय पर सामने आती रहती है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि जब सरकार के मंत्री ही सवाल खड़े करने लगें तो विपक्ष के आरोपों को बल मिलता है।
भाजपा नेतृत्व के सामने चुनौती यह है कि चुनावी माहौल में किसी भी प्रकार की अंदरूनी असहमति की चर्चा कार्यकर्ताओं और मतदाताओं तक न पहुंचे। पार्टी फिलहाल विकास, निवेश, रोजगार और धार्मिक पर्यटन जैसे मुद्दों को लेकर जनता के बीच जाने की तैयारी में है। ऐसे में विवादों से बचना और एकजुटता का संदेश देना उसकी प्राथमिकता है।
पहाड़ की ‘पगडंडियों’ पर उतरे नेता
चुनावी सरगर्मियां पहाड़ की पगडंडियों तक पहुंची
चौपालों, मंदिरों और मेलों में पहुंचने लगे हैं नेताजी
मतदाताओं के मूड को भांपने की शुरू हुई कवायद
देहरादून। उत्तराखंड में चुनावी बिगुल भले ही आधिकारिक रूप से न बजा हो, लेकिन राजनीतिक दलों और नेताओं ने गांवों की पगडंडियां नापनी शुरू कर दी हैं। आने वाले महीनों में यह गतिविधियां और तेज होंगी। चुनावी सरगर्मियां अभी से पहाड़ की पगडंडियों तक पहुंचने लगी हैं। जिन गांवों में चुनाव के बाद नेताओं की आवाजाही कम हो जाती थी, वहां अब फिर से राजनीतिक चहल-पहल दिखाई देने लगी है। कोई गांव की चौपाल में बैठकर लोगों की समस्याएं सुन रहा है तो कोई धार्मिक आयोजनों, मेलों और सामाजिक कार्यक्रमों में अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहा है।
दरअसल, भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दल इस बात को अच्छी तरह समझते हैं कि उत्तराखंड की राजनीति का असली मूड देहरादून के दफ्तरों में नहीं, बल्कि पहाड़ के गांवों और कस्बों में तय होता है। यही कारण है कि संभावित प्रत्याशी और वरिष्ठ नेता अभी से गांव-गांव जाकर जनता का रुख जानने की कोशिश कर रहे हैं।
एक समय था जब चुनावी मौसम में ही गांवों में नेताओं की भीड़ दिखाई देती थी, लेकिन इस बार स्थिति कुछ अलग है। कई विधानसभा क्षेत्रों में नेता छोटे-छोटे जनसंपर्क कार्यक्रमों के जरिए ग्रामीणों से संपर्क साध रहे हैं। गांव की चौपाल, चाय की दुकान और मंदिर परिसर फिर से राजनीतिक चर्चा के केंद्र बनने लगे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और पेयजल जैसे मुद्दे आज भी प्रमुख हैं। नेता इन मुद्दों को सुन रहे हैं और जनता को भरोसा दिला रहे हैं कि उनकी समस्याओं का समाधान प्राथमिकता के आधार पर कराया जाएगा।
पर्वतीय जिलों में पलायन का मुद्दा आज भी सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है। गांवों में खाली होते घर, बंद पड़े स्कूल और खेती से दूर होती नई पीढ़ी लोगों की चिंता का विषय हैं। ऐसे में जो नेता गांवों तक पहुंच रहे हैं, उन्हें सबसे अधिक सवाल रोजगार और पलायन पर सुनने पड़ रहे हैं। युवाओं का एक बड़ा वर्ग सरकारी नौकरियों, स्वरोजगार और पर्यटन आधारित रोजगार के अवसरों को लेकर जवाब मांग रहा है। यही कारण है कि राजनीतिक दल भी अपने भविष्य के चुनावी एजेंडे में इन मुद्दों को प्रमुखता देने की तैयारी कर रहे हैं।
सत्तारूढ़ भाजपा लगातार तीसरी बार सरकार बनाने का लक्ष्य लेकर चल रही है। मुख्यमंत्री के नेतृत्व में सरकार विकास, निवेश, सड़क और धार्मिक पर्यटन परियोजनाओं को अपनी उपलब्धियों के रूप में जनता के बीच ले जा रही है। पार्टी के नेता गांवों में जाकर सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों से संवाद कर रहे हैं और विकास कार्यों का फीडबैक ले रहे हैं। भाजपा की रणनीति यह संदेश देने की है कि डबल इंजन सरकार ने उत्तराखंड के विकास को नई गति दी है और इसी गति को आगे बढ़ाने के लिए जनता का समर्थन जरूरी है।
वहीं कांग्रेस सत्ता विरोधी माहौल की संभावनाओं को भुनाने की तैयारी में है। पार्टी के नेता महंगाई, बेरोजगारी, पलायन और स्थानीय मुद्दों को लेकर जनता के बीच जा रहे हैं। कांग्रेस का प्रयास है कि गांवों में भाजपा के खिलाफ माहौल तैयार किया जाए और सरकार की कमियों को प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाया जाए। पार्टी संगठन भी बूथ स्तर पर अपनी सक्रियता बढ़ाने की कवायद में जुटा है ताकि चुनाव से पहले कार्यकर्ताओं को फिर से सक्रिय किया जा सके।
कई विधानसभा क्षेत्रों में स्थानीय नेता और संभावित निर्दलीय उम्मीदवार भी अभी से सक्रिय दिखाई दे रहे हैं। सामाजिक कार्यक्रमों में उनकी मौजूदगी बढ़ी है। वह स्थानीय मुद्दों को उठाकर अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि पहाड़ की राजनीति में व्यक्तिगत संपर्क और जनसरोकारों का महत्व आज भी बरकरार है। सोशल मीडिया के दौर में भी गांव की चौपाल और घर-घर संपर्क का कोई विकल्प नहीं बन पाया है।
उत्तराखंड में अर्द्धकुंभ पर ‘सियासत’ का संगम
उत्तराखंड में धर्म के मुद्दे पर भाजपा और कांग्रेस आ गए हैं आमने-सामने
भाजपा ने बताया आस्था का सम्मान,कांग्रेस ने उठाए व्यवस्थाओं पर सवाल
करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ा विषय पर राजनीति का लगा तड़का
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की आहट के बीच धर्म और आस्था की राजनीति एक बार फिर केंद्र में आ गई है। हरिद्वार में अर्द्धकुंभ के आयोजन को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच सियासी संग्राम तेज हो गया है। सत्ता पक्ष इसे सनातन संस्कृति और धार्मिक परंपराओं के संरक्षण का बड़ा कदम बता रहा है, जबकि विपक्ष इसे चुनावी वर्ष से पहले धार्मिक भावनाओं को भुनाने की कोशिश करार दे रहा है।
अर्द्धकुंभ को लेकर शुरू हुई बहस अब केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह प्रदेश की राजनीति का बड़ा मुद्दा बनती जा रही है। भाजपा का कहना है कि देवभूमि उत्तराखंड की पहचान उसकी आध्यात्मिक विरासत और धार्मिक परंपराएं हैं। ऐसे में अर्द्धकुंभ का आयोजन करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ा विषय है, जिस पर राजनीति नहीं होनी चाहिए।
दूसरी ओर कांग्रेस का आरोप है कि सरकार धार्मिक आयोजनों को प्रचार का माध्यम बना रही है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि यदि सरकार वास्तव में श्रद्धालुओं की चिंता करती है तो उसे हरिद्वार की यातायात, पार्किंग, गंगा सफाई और बुनियादी सुविधाओं पर अधिक ध्यान देना चाहिए। विपक्ष का तर्क है कि अर्द्धकुंभ के नाम पर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश की जा रही है। उत्तराखंड में धर्म और आस्था हमेशा से चुनावी विमर्श का अहम हिस्सा रहे हैं। चारधाम यात्रा, समान नागरिक संहिता, लव जिहाद कानून और धार्मिक पर्यटन जैसे मुद्दों पर भाजपा पहले ही अपनी मजबूत पकड़ बना चुकी है। अब अर्द्धकुंभ का मुद्दा भी उसी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
भाजपा इस मुद्दे के जरिए अपने पारंपरिक वोट बैंक को मजबूत करने की कोशिश में दिख रही है, जबकि कांग्रेस धार्मिक आयोजनों के विरोध की छवि से बचते हुए सरकार को व्यवस्थाओं और खर्चों के सवालों पर घेरने की रणनीति अपना रही है। यही कारण है कि दोनों दल सीधे तौर पर आस्था का विरोध नहीं कर रहे, बल्कि आयोजन के स्वरूप और सरकार की मंशा को लेकर एक-दूसरे पर निशाना साध रहे हैं।
‘चौंसू’ है हजारों साल पुरानी पहाड़ी ‘विरासत’
‘चौंसू’ की सोंधी खुशबू और लोहे की कढ़ाई के जादू की दीवानगी
पहाड़ की थाली का स्वाद, परंपरा और सेहत का अनमोल संगम है चौंसू
काली उड़द की दाल को भूनकर तैयार होने वाली चौंसू रसोई का हिस्सा
हर उत्तराखंडी के खून और यादों में बसा है चौंसू का वह सोंधा स्वाद
देहरादून। पहाड़ की कड़कड़ाती ठंड हो या सावन की रिमझिम फुहार, उत्तराखंड के घरों में जब लोहे की कढ़ाई में चौंसू पकता है, तो उसकी सोंधी खुशबू पूरे मोहल्ले को बता देती है कि आज रसोई में कुछ खास बन रहा है। गढ़वाल और कुमाऊं के पारंपरिक खान-पान का राजा चौंसू सिर्फ एक व्यंजन नहीं, बल्कि पहाड़ों की संस्कृति, सेहत और यादों का एक खूबसूरत हिस्सा है।
चौंसू बनाने के लिए सबसे पहले काली उड़द की दाल को हल्का भून लिया जाता है। इसके लिए साबुत या छिलके वाली काली उड़द की दाल को धीमी आंच पर तवे या कढ़ाई में तब तक भूना जाता है, जब तक कि उसमें से एक सोंधी सी महक न आने लगे। भूनने के बाद इस दाल को सिल-बट्टे पर दरदरा पीसा जाता है। चौंसू हमेशा लोहे की कढ़ाई में ही बनाया जाता है। लोहे की कढ़ाई में पकने के कारण इसका रंग गाढ़ा काला-भूरा हो जाता है और इसका स्वाद कई गुना बढ़ जाता है। इसके बाद शुरू होता है इसे पकाने का पारंपरिक तरीका। सरसों के तेल में जख्या या जीरे का तड़का लगाया जाता है। फिर पिसी हुई दाल को मसाले और हींग के साथ भूनकर पानी डाला जाता है। इसे धीमी आंच पर देर तक पकाया जाता है। जैसे-जैसे चौंसू उबलता है, इसकी तरी गाढ़ी और मखमली होती जाती है।
पहाड़ की महिलाएं आज भी मानती हैं कि असली चौंसू वही है जो लकड़ी के चूल्हे पर धीमी आंच में पकाई जाए। इससे इसका स्वाद और सुगंध कई गुना बढ़ जाती है। चौंसू स्वाद के साथ-साथ स्वास्थ्य के लिए भी बेहद लाभकारी मानी जाती है। काली उड़द प्रोटीन, आयरन, कैल्शियम और फाइबर से भरपूर होती है। पहाड़ के कठिन भौगोलिक जीवन में लोगों को ऊर्जा प्रदान करने के लिए यह व्यंजन महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है। इसके साथ ही चौंसू शरीर को ताकत देने के साथ पाचन तंत्र को भी मजबूत करती है। यही कारण है कि पुराने समय में खेतों में काम करने वाले लोग इसे विशेष रूप से पसंद करते थे।
उत्तराखंड के गांवों से लगातार हो रहे पलायन के कारण कई पारंपरिक व्यंजन धीरे-धीरे लोगों की थाली से दूर होते जा रहे हैं। बावजूद इसके चौंसू आज भी अपनी जगह बनाए हुए है। शहरों में रहने वाले उत्तराखंडी परिवार भी अपने बच्चों को पहाड़ के स्वाद और संस्कृति से जोड़ने के लिए चौंसू बनाना नहीं भूलते। आज सोशल मीडिया और पर्यटन के बढ़ते प्रभाव के कारण उत्तराखंड के पारंपरिक व्यंजनों की चर्चा देशभर में हो रही है। चौंसू भी अब केवल गांवों तक सीमित नहीं रही, बल्कि पहाड़ी व्यंजनों की पहचान बनकर नए लोगों को आकर्षित कर रही है।
स्थानीय होटल और होमस्टे संचालक भी अपने मेन्यू में चौंसू को शामिल कर रहे हैं, ताकि पर्यटक पहाड़ के असली स्वाद का अनुभव कर सकें।
उत्तराखंड में एक कहावत जैसी है कि चौंसू का मजा तब तक अधूरा है, जब तक थाली में गरमा-गरम भात न हो। घी की एक चम्मच, हरी मिर्च और ककड़ी का पहाड़ी पिस्यूं लूण इसके स्वाद में चार चांद लगा देते हैं। दोपहर के धूप में बैठकर चौंसू-भात खाने का आनंद किसी फाइव-स्टार होटल के खाने से कहीं बढ़कर है।
भाजपा-कांग्रेस ने शुरू की ‘नेट प्रैक्टिस’
भाजपा सत्ता की हैट्रिक के लिए बूथों को कर रही मजबूत
कांग्रेस जनाक्रोश को राजनीतिक ताकत में बदलने की तैयारी
भाजपा और कांग्रेस संगठन दे रहे चुनावी रण के लिए धार
दलों में बूथ से लेकर सोशल मीडिया तक सक्रियता बढ़ी
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 में अभी समय शेष है, लेकिन प्रदेश की राजनीति में चुनावी आहट साफ सुनाई देने लगी है। सत्ता में काबिज भाजपा और मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस दोनों ने संगठनात्मक मोर्चे पर अपनी गतिविधियां तेज कर दी हैं। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि 2027 की लड़ाई केवल नेताओं के चेहरे या चुनावी घोषणाओं से नहीं, बल्कि संगठन की ताकत से तय होगी। भाजपा जहां लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी का इतिहास रचने की तैयारी कर रही है, वहीं कांग्रेस दस साल के वनवास को खत्म कर सत्ता में लौटने का सपना संजोए हुए है। ऐसे में दोनों दलों का फोकस संगठन को धारदार बनाने पर है।
प्रदेश में भाजपा का संगठन इस समय बूथ सशक्तीकरण अभियान, लाभार्थी संपर्क और सरकार की उपलब्धियों को जन-जन तक पहुंचाने की रणनीति पर काम कर रहा है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को पार्टी का सबसे बड़ा चुनावी चेहरा मानते हुए संगठन उनके नेतृत्व में चुनावी जमीन तैयार कर रहा है। भाजपा की कोशिश है कि समान नागरिक संहिता, नकल विरोधी कानून, चारधाम परियोजना और निवेश जैसे मुद्दों को राजनीतिक उपलब्धि के रूप में जनता के बीच स्थापित किया जाए। दूसरी ओर कांग्रेस संगठन को फिर से जीवंत बनाने की चुनौती से जूझ रही है। पार्टी नेतृत्व यह मानकर चल रहा है कि बेरोजगारी, महंगाई, पलायन, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी और पर्वतीय क्षेत्रों में विकास की धीमी रफ्तार जैसे मुद्दे सत्ता विरोधी माहौल बना सकते हैं। इसी कारण कांग्रेस लगातार जनसभाओं, पदयात्राओं और मुद्दा आधारित आंदोलनों के जरिए जनता से जुड़ने का प्रयास कर रही है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के उत्तराखंड दौरे और लगातार बढ़ती राजनीतिक सक्रियता को भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। कांग्रेस संगठन गांव-गांव तक अपनी पहुंच बढ़ाने और निष्क्रिय कार्यकर्ताओं को फिर से सक्रिय करने का प्रयास कर रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तराखंड की राजनीति में संगठन हमेशा निर्णायक भूमिका निभाता रहा है। वर्ष 2022 के चुनाव में भाजपा ने मजबूत बूथ प्रबंधन और संगठनात्मक समन्वय के दम पर सत्ता बरकरार रखी थी। वहीं कांग्रेस को कई सीटों पर संगठनात्मक कमजोरी का नुकसान उठाना पड़ा था। यही कारण है कि इस बार कांग्रेस भी बूथ स्तर पर अपनी पकड़ मजबूत करने में जुटी हुई है। दिलचस्प बात यह है कि दोनों दल युवाओं और पहली बार मतदान करने वाले मतदाताओं पर विशेष ध्यान दे रहे हैं। सोशल मीडिया प्लेटफार्म भी अब चुनावी रणक्षेत्र का अहम हिस्सा बन चुके हैं। भाजपा और कांग्रेस दोनों की आईटी और सोशल मीडिया टीमें लगातार सक्रिय दिखाई दे रही हैं।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि आने वाले महीनों में संगठनात्मक फेरबदल, नई नियुक्तियां और बड़े नेताओं के दौरे बढ़ेंगे। चुनावी रणनीति का असली केंद्र अब गांव, बूथ और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म बनने जा रहे हैं। फिलहाल उत्तराखंड की राजनीति में एक नई प्रतिस्पर्धा शुरू हो चुकी है। यह प्रतिस्पर्धा जनसभाओं से ज्यादा संगठन की मजबूती को लेकर है। भाजपा और कांग्रेस दोनों समझती हैं कि 2027 की सत्ता की चाबी देहरादून, हरिद्वार या हल्द्वानी में नहीं, बल्कि बूथ स्तर पर सक्रिय कार्यकर्ताओं के हाथ में होगी। इसलिए चुनावी रण को धार देने की सबसे बड़ी जंग इस समय संगठन के मोर्चे पर लड़ी जा रही है। फिलहाल इतना तय है कि उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की औपचारिक घोषणा भले अभी दूर हो, लेकिन राजनीतिक दलों ने चुनावी शंखनाद कर दिया है। संगठन को मजबूत बनाने की यह होड़ आने वाले दिनों में और तेज होती दिखाई देगी।
भड्डू का ‘स्वाद’ और ‘पुरखों’ की याद
मिट्टी की खुशबू, कांसे की गरिमा और पहाड़ का सदियों पुराना स्वाद
आधुनिक किचन के दौर में भी पहाड़ की रसोई में जिंदा है भड्डू की परंपरा
कांसे के इस बर्तन में बनी दाल आज भी दिलाती है पुरखों के स्वाद की याद
देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ों में भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि संस्कृति, परंपरा और प्रकृति से जुड़ा जीवन दर्शन है। यहां की रसोई में कई ऐसे बर्तन और व्यंजन हैं, जो सदियों से लोगों की जीवनशैली का हिस्सा बने हुए हैं। इन्हीं में से एक है भड्डू, कांसे से बना पारंपरिक बर्तन, और उसमें पकने वाली दाल, जिसका स्वाद आज भी पहाड़ के लोगों को अपने गांव और पुरखों की याद दिला देता है।
पहाड़ की कड़ाके की ठंड में जब चूल्हे पर धीरे-धीरे भड्डू में दाल पकती है, तो उसकी सोंधी खुशबू पूरे घर में फैल जाती है। लकड़ी की आग, कांसे का बर्तन और स्थानीय दालों का मेल ऐसा स्वाद रचता है, जिसे आधुनिक गैस चूल्हे और स्टील के बर्तन भी नहीं दे पाते। भड्डू कांसे से बना एक पारंपरिक बर्तन होता है, जिसका उपयोग विशेष रूप से दाल, झोली और अन्य पारंपरिक व्यंजन पकाने के लिए किया जाता रहा है। पहाड़ के लगभग हर पुराने घर में भड्डू कभी न कभी रसोई का अहम हिस्सा रहा है।
बुजुर्ग बताते हैं कि कांसे के बर्तन में भोजन धीरे-धीरे और समान रूप से पकता है। इससे दाल का स्वाद और सुगंध दोनों बढ़ जाते हैं। यही कारण है कि आज भी कई परिवार त्योहारों, पारिवारिक आयोजनों और विशेष अवसरों पर भड्डू में दाल बनाना पसंद करते हैं। उत्तराखंड में गहत, भट्ट, मसूर, उड़द और राजमा जैसी स्थानीय दालों को भड्डू में पकाने की परंपरा रही है। चूल्हे की धीमी आंच पर घंटों तक पकने वाली दाल में एक अलग ही गाढ़ापन और स्वाद आ जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी माना जाता है कि भड्डू में बनी दाल केवल भोजन नहीं, बल्कि सेहत का खजाना है। स्थानीय मसालों और जाखिया के तड़के के साथ परोसी गई दाल पहाड़ी भोजन की आत्मा मानी जाती है।
पहाड़ के लोगों के लिए भड्डू केवल एक बर्तन नहीं, बल्कि परिवार की धरोहर है। कई घरों में यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी विरासत के रूप में चला आ रहा है। शादी-ब्याह में दहेज के सामान में भी कभी भड्डू शामिल किया जाता था। बुजुर्ग महिलाएं बताती हैं कि जब नई बहू घर आती थी तो उसे भड्डू में दाल बनाना सिखाया जाता था। यह केवल खाना बनाने की कला नहीं, बल्कि परिवार की परंपराओं को आगे बढ़ाने का तरीका था।
समय के साथ स्टील, एल्युमिनियम और नान-स्टिक बर्तनों ने रसोई में अपनी जगह बना ली। गैस चूल्हों और तेज रफ्तार जीवनशैली ने भी पारंपरिक बर्तनों के उपयोग को कम कर दिया। आज कई युवा भड्डू का नाम तो जानते हैं, लेकिन उसके उपयोग और महत्व से अनजान हैं। हालांकि अच्छी बात यह है कि पारंपरिक खान-पान और लोक संस्कृति के प्रति बढ़ती रुचि के कारण भड्डू एक बार फिर लोगों का ध्यान आकर्षित कर रहा है।
राज्य के कई होमस्टे और ग्रामीण पर्यटन केंद्र अब पर्यटकों को भड्डू में बनी दाल और पारंपरिक पहाड़ी भोजन परोस रहे हैं। इससे न केवल स्थानीय संस्कृति को बढ़ावा मिल रहा है, बल्कि नई पीढ़ी भी अपनी जड़ों से जुड़ रही है। पर्यटक जब भड्डू में बनी गहत या भट्ट की दाल का स्वाद चखते हैं, तो उन्हें पहाड़ की संस्कृति और जीवनशैली की एक अलग झलक देखने को मिलती है।
पहाड़ की रसोई में चूल्हे पर चढ़ा भड्डू केवल दाल नहीं पकाता, बल्कि वह संस्कृति, परंपरा और स्मृतियों को भी सहेजता है। बदलते दौर में भले ही आधुनिक बर्तनों ने उसकी जगह कम कर दी हो, लेकिन भड्डू की दाल का स्वाद आज भी पहाड़ की पहचान और पहाड़ की आत्मा को जीवित रखे हुए है। जब तक पहाड़ की रसोई में भड्डू की खुशबू रहेगी, तब तक वहां की सांस्कृतिक विरासत भी महकती रहेगी।
सोमवार, 8 जून 2026
'THE CJP EFFECT'
‘काकरोच’ बने देश के युवाओं की नई सियासी पहचान
कोर्ट रूम के एक ‘तंज’ से हो गया बड़ा डिजिटल ब्लास्ट
बिना बड़े नेताओं व पारंपरिक राजनीतिक ढांचे की आवाज
व्यवस्था से नाराज युवाओं के एक तबकों को मिला नया मंच
देहरादून। देश की राजनीति में जहां अरबों रुपये के चुनावी फंड और बड़े-बड़े दिग्गजों का दबदबा कायम है, वहीं सोशल मीडिया की स्क्रीन से निकला एक नया प्रयोग मुख्यधारा के नेताओं की नींद उड़ा रहा है। नाम हैकृकाकरोच जनता पार्टी। यह कोई पारंपरिक राजनीतिक दल नहीं, बल्कि सिस्टम के खिलाफ उपजा युवाओं का वो आक्रोश है, जो अब नारों से नहीं, सीधे समाधान की मांग कर रहा है।
मई 2026 में जब सुप्रीम कोर्ट में एक सुनवाई के दौरान युवाओं की स्थिति को लेकर काकरोच जैसे शब्द का इस्तेमाल हुआ, तो इंटरनेट पर गुस्सा फूट पड़ा। पुणे के अभिजीत दीपके ने व्यंग्य के रूप में इंस्टाग्राम पर एक पेज शुरू किया। महज 5 दिनों के भीतर इस काकरोच जनता पार्टी ने फालोअर्स के मामले में सत्ताधारी भाजपा के आफिशियल हैंडल को भी पीछे छोड़ दिया। आलसी और बेरोजगारों की आवाज़ की टैगलाइन के साथ देश का जेन-जी युवा इससे जुड़ता चला गया।
जब आलोचकों ने इसे सिर्फ फोन चलाने वाले युवाओं का शौक कहा तब युवाओं ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर नीट पेपर लीक और शिक्षा मंत्रालय की नाकामियों के खिलाफ बड़ा प्रदर्शन कर सबको चौंका दिया। विपक्ष के नेताओं के साथ-साथ पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक ने भी खुद को मानद काकरोच घोषित कर युवाओं के इस अनूठे विरोध का समर्थन किया। अब देश का युवा मुफ्त की रेवड़ियों, जातिगत समीकरणों या बड़े-बड़े भाषणों से बहलने वाला नहीं है। उन्हें पारदर्शी परीक्षाएं, रोजगार और बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे बुनियादी मुद्दों पर ठोस एक्शन चाहिए।
भले ही काकरोच जनता पार्टी चुनाव आयोग में रजिस्टर्ड दल नहीं है, लेकिन इसने यह साबित कर दिया है कि सोशल मीडिया की ताकत सरकारों को घुटने टेकने पर मजबूर कर सकती है। काकरोच जनता पार्टी का दावा है कि वह किसी एक नेता, परिवार या विचारधारा के इर्द-गिर्द नहीं, बल्कि आम लोगों के मुद्दों को केंद्र में रखकर अपनी मुहिम चला रही है। महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, शिक्षा, स्वास्थ्य और आम नागरिकों की रोजमर्रा की समस्याओं को लेकर पार्टी के कार्यकर्ता राजधानी में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार काकरोच को प्रतीक के रूप में चुनना अपने आप में एक संदेश है। काकरोच को ऐसा जीव माना जाता है जो विपरीत परिस्थितियों में भी जीवित रहता है। पार्टी इसे आम आदमी के संघर्ष और जीवटता का प्रतीक बताती है। उनका कहना है कि जिस तरह आम जनता तमाम मुश्किलों के बावजूद जीवन की लड़ाई लड़ती है, उसी भावना को यह प्रतीक दर्शाता है।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि बिना मजबूत संगठन और प्रभावशाली नेतृत्व के किसी आंदोलन को लंबे समय तक बनाए रखना आसान नहीं होता। लेकिन सोशल मीडिया और जन भागीदारी के इस दौर में नए राजनीतिक प्रयोगों की संभावनाओं से भी इनकार नहीं किया जा सकता। देश में युवाओं के बीच रोजगार, किसानों के बीच आय, मध्यम वर्ग के बीच महंगाई और शहरी क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं को लेकर असंतोष की चर्चा समय-समय पर होती रही है। यदि काकरोच जनता पार्टी इन मुद्दों को संगठित रूप से उठाने और लोगों को जोड़ने में सफल रहती है, तो यह मुख्यधारा की राजनीति पर दबाव बनाने का काम कर सकती है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि भले ही नई राजनीतिक ताकतें तत्काल सत्ता तक न पहुंचें, लेकिन वह जनमत निर्माण और राजनीतिक विमर्श को प्रभावित करने की क्षमता रखती हैं। कई बार ऐसे ही आंदोलनों ने बड़े दलों को अपनी नीतियां बदलने पर मजबूर किया है। दिल्ली की राजनीति में अपनी जगह बनाना किसी भी नए संगठन के लिए आसान नहीं है। संसाधन, संगठन, कार्यकर्ता नेटवर्क और जनविश्वास जैसी कई चुनौतियां सामने होती हैं। इसके अलावा आंदोलन को केवल विरोध की राजनीति तक सीमित न रखकर ठोस वैकल्पिकदृदृष्टि प्रस्तुत करनी होगी।
फिलहाल काकरोच जनता पार्टी एक राजनीतिक जिज्ञासा और चर्चा का विषय बनी हुई है। लेकिन इतिहास गवाह है कि जनता के मुद्दों पर खड़े हुए कई छोटे आंदोलन समय के साथ बड़े राजनीतिक बदलावों का कारण बने हैं। दिल्ली में सुनाई दे रही काकरोच पार्टी की आहट भविष्य में कितनी दूर तक जाएगी, यह तो समय बताएगा, लेकिन इतना तय है कि इसने व्यवस्था से असंतुष्ट लोगों के बीच एक नई बहस जरूर छेड़ दी है।
दिल्ली में गिरफ्तारी, उत्तराखंड में सियासी घमासान
---धामी ने की हस्तक्षेप की पहल तो कांग्रेस ने खोला मोर्चा
---मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने दिल्ली की सीएम से की बात
---कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष ने उठाए जांच की निष्पक्षता पर सवाल
देहरादून। दिल्ली के मालवीय नगर अग्निकांड में उत्तराखंड मूल के युवक केशव नेगी की गिरफ्तारी को लेकर उत्तराखंड की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। एक ओर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने मामले में सक्रियता दिखाते हुए दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता से बातचीत कर निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने का आग्रह किया है, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस ने इस मुद्दे को लेकर सरकार पर दबाव बढ़ाना शुरू कर दिया है।
मुख्यमंत्री धामी ने दिल्ली की मुख्यमंत्री से फोन पर बातचीत कर यह स्पष्ट किया कि हादसे में दोषी चाहे कोई भी हो, उसे सजा मिलनी चाहिए, लेकिन किसी निर्दाेष को बिना पर्याप्त तथ्यों के कार्रवाई का सामना न करना पड़े। धामी की इस पहल को उत्तराखंड के लोगों के हितों की रक्षा के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।
बता दें कि दिल्ली के मालवीय नगर स्थित एक होटल में हुए भीषण अग्निकांड की जांच अब राजनीतिक रंग लेने लगी है। इस हादसे में 22 लोगों की मौत के बाद दिल्ली पुलिस ने होटल के शेफ के रूप में कार्यरत उत्तराखंड मूल के केशव नेगी को गिरफ्तार किया है। गिरफ्तारी के बाद उत्तराखंड में राजनीतिक हलकों में बहस छिड़ गई है कि आखिर एक कर्मचारी को मुख्य आरोपी बनाना कितना उचित है, जबकि होटल में सुरक्षा मानकों के उल्लंघन और प्रबंधन की जिम्मेदारी जैसे कई बड़े सवाल अभी भी जांच के दायरे में हैं। दिल्ली पुलिस का दावा है कि प्रारंभिक जांच में शेफ की कथित लापरवाही की भूमिका सामने आई है। वहीं होटल मालिक और अन्य संबंधित लोगों के खिलाफ भी कार्रवाई की गई है तथा जांच जारी है।
मामले पर कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने भी तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर होटल के मालिकों और सुरक्षा मानकों की जिम्मेदारी तय किए बिना एक कर्मचारी को मुख्य आरोपी के रूप में प्रस्तुत करना कितना उचित है। कांग्रेस का आरोप है कि जांच की दिशा को लेकर कई सवाल खड़े हो रहे हैं और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि उत्तराखंड के एक युवक को जल्दबाजी में आरोपी बनाकर पूरे मामले की जिम्मेदारी उस पर डालने की कोशिश नहीं होनी चाहिए। पार्टी ने जरूरत पड़ने पर कानूनी सहायता और राजनीतिक स्तर पर भी मामला उठाने के संकेत दिए हैं।
केशव नेगी की गिरफ्तारी के बाद उनके पैतृक क्षेत्र में भी चिंता और नाराजगी का माहौल देखने को मिल रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि हादसे की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और वास्तविक जिम्मेदार लोगों को कानून के दायरे में लाया जाना चाहिए। कई सामाजिक संगठनों ने भी मांग की है कि जांच केवल निचले स्तर के कर्मचारियों तक सीमित न रहे, बल्कि होटल प्रबंधन, सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक जिम्मेदारियों की भी गहन पड़ताल की जाए।
दिल्ली अग्निकांड में हुई जनहानि ने पूरे देश को झकझोर दिया है। ऐसे में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि हादसे के लिए वास्तविक जिम्मेदार कौन है। मुख्यमंत्री धामी की सक्रियता और कांग्रेस के आक्रामक रुख ने इस मामले को राजनीतिक विमर्श का विषय जरूर बना दिया है, लेकिन आम लोगों की प्राथमिक चिंता न्याय और सच्चाई सामने आने की है। फिलहाल उत्तराखंड की निगाहें जांच एजेंसियों की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं। यदि जांच पारदर्शी और तथ्य आधारित रही तो विवाद शांत हो सकता है, लेकिन यदि किसी भी स्तर पर पक्षपात या जल्दबाजी की आशंका बनी रही तो यह मामला उत्तराखंड की राजनीति में बड़ा मुद्दा बन सकता है।
सत्ता की ‘राह’ में विरोधी लहर का ‘रोड़ा’
---लगातार दो कार्यकाल के बाद जनता के मूड को भांपने में जुटे राजनीतिक दल
---विकास बनाम जन असंतोष की लड़ाई में बदल सकता है विधानसभा का चुनाव
---इस पर मिथक टूटेगा या फिर मतदाता सत्ता परिवर्तन कर देगा सरकार को जवाब
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 भले ही अभी दूर दिखाई दे रहा हो, लेकिन राज्य की राजनीति में चुनावी बिसात बिछनी शुरू हो गई है। सत्तारूढ़ भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं, बल्कि एंटी-इंकम्बेंसी यानी सत्ता विरोधी लहर बन सकती है। वर्ष 2017 और 2022 में लगातार जीत हासिल करने वाली भाजपा तीसरी बार सत्ता में वापसी का सपना देख रही है, लेकिन इसके रास्ते में जनता की नाराजगी सबसे बड़ा रोड़ा बन सकती है।
राज्य गठन के बाद उत्तराखंड की राजनीति का इतिहास बताता है कि यहां मतदाता सत्ता परिवर्तन के लिए जाने जाते रहे हैं। हालांकि 2022 में भाजपा ने इस मिथक को तोड़ते हुए लगातार दूसरी बार सरकार बनाई, लेकिन अब तीसरे कार्यकाल की दहलीज पर खड़ी पार्टी को जनता के सवालों का सामना करना पड़ सकता है।
भाजपा सरकार चारधाम आल वेदर रोड, )षिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना, निवेश सम्मेलन, समान नागरिक संहिता और धार्मिक पर्यटन जैसे बड़े मुद्दों को अपनी उपलब्धि के रूप में पेश कर रही है। दूसरी ओर विपक्ष बेरोजगारी, पलायन, महंगाई, पेयजल संकट, स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली और भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं को लेकर सरकार को घेरने की तैयारी में है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि विकास परियोजनाओं का लाभ आम जनता तक प्रभावी रूप से नहीं पहुंचा तो एंटी-इंकम्बेंसी का असर चुनावी नतीजों में दिखाई दे सकता है। प्रदेश के पर्वतीय जिलों में पलायन आज भी बड़ा मुद्दा बना हुआ है। गांव खाली हो रहे हैं और युवाओं का रोजगार के लिए मैदानों व अन्य राज्यों की ओर जाना जारी है। चुनाव के दौरान विपक्ष इन मुद्दों को प्रमुखता से उठाकर सत्ता विरोधी माहौल बनाने का प्रयास करेगा। कई क्षेत्रों में सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा सुविधाओं को लेकर स्थानीय असंतोष भी भाजपा के लिए चिंता का विषय बन सकता है। विशेष रूप से युवा मतदाताओं और बेरोजगारों की नाराजगी चुनावी समीकरण बदलने की क्षमता रखती है।
भाजपा ने पिछले वर्षों में कई मुख्यमंत्री बदले हैं। वर्तमान नेतृत्व को 2027 में जनता के बीच अपनी स्वीकार्यता साबित करनी होगी। वहीं कांग्रेस भी मजबूत नेतृत्व और संगठन के दम पर सत्ता विरोधी माहौल को अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश करेगी। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि कांग्रेस जनता के मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाने में सफल रहती है और भाजपा संगठन स्तर पर असंतोष को नियंत्रित नहीं कर पाती, तो एंटी-इंकम्बेंसी बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकती है।
2027 के चुनाव में पहली बार मतदान करने वाले युवाओं की बड़ी संख्या चुनावी परिणामों को प्रभावित करेगी। रोजगार, शिक्षा और डिजिटल अवसर उनके प्रमुख मुद्दे होंगे। वहीं महिला मतदाताओं के लिए महंगाई, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा जैसे विषय अहम रहेंगे। भाजपा के पास विकास कार्यों और केंद्र सरकार की योजनाओं का मजबूत आधार है, लेकिन जनता की बढ़ती अपेक्षाएं और स्थानीय मुद्दों पर असंतोष एंटी-इंकम्बेंसी को जन्म दे सकता है। ऐसे में 2027 का चुनाव विकास बनाम असंतोष की सीधी लड़ाई में बदलता दिखाई दे रहा है।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि उत्तराखंड की सत्ता का भविष्य विपक्ष की ताकत से ज्यादा इस बात पर निर्भर करेगा कि भाजपा जनता के बीच मौजूद नाराजगी को कितना कम कर पाती है। यही कारण है कि 2027 की चुनावी जंग में एंटी-इंकम्बेंसी सबसे बड़ा और निर्णायक फैक्टर बनकर उभर सकती है।
‘फास्ट फूड’ के दौर में ‘झंगोरे की खीर’ का जलवा
---मीठा खाने की चाहत भी पूरी और वजन बढ़ने का डर भी खत्म, यह पूरी तरह से ग्लूटेन-फ्री
---देश के बड़े रेस्टोरेंट्स में पहाड़ी थाली के साथ बनी झंगोरे की खीर परोसना स्टेटस सिंबल
---कभी पर्वतीय घरों की पारंपरिक मिठाई अब सेहतमंद भोजन के रूप में बना रही पहचान
देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ों की पहचान केवल प्राकृतिक सौंदर्य और देवस्थलों तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां का पारंपरिक खान-पान भी अपनी अलग पहचान रखता है। इन्हीं पारंपरिक व्यंजनों में एक नाम है झंगोरे की खीर जो वर्षों से पर्वतीय संस्कृति और खान-पान का अभिन्न हिस्सा रही है। बदलते दौर में जहां आधुनिक खाद्य पदार्थों का चलन बढ़ा है, वहीं झंगोरे की खीर अपनी पौष्टिकता और स्वाद के कारण फिर से लोगों की पसंद बनती जा रही है।
झंगोरा, जिसे अंग्रेजी में बार्नयार्ड मिलेट कहा जाता है। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में उगाई जाने वाली प्रमुख फसलों में शामिल है। कम पानी और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में भी इसकी खेती आसानी से हो जाती है। यही कारण है कि इसे पहाड़ की जीवनशैली और कृषि संस्कृति का आधार माना जाता रहा है।
पहाड़ के गांवों में झंगोरे की खीर केवल एक मिठाई नहीं बल्कि परंपरा का हिस्सा है। शादी-विवाह, पूजा-पाठ, नामकरण संस्कार और धार्मिक आयोजनों में इसे विशेष रूप से बनाया जाता है। दूध, घी, मेवा और झंगोरे से तैयार होने वाली यह खीर मेहमानों के स्वागत का भी प्रमुख व्यंजन रही है। बुजुर्ग बताते हैं कि पहले जब बाजारों में मिठाइयों की उपलब्धता कम थी, तब झंगोरे की खीर ही पर्वतीय परिवारों की सबसे खास मिठाई हुआ करती थी। इसका स्वाद आज भी लोगों को अपने बचपन और गांव की याद दिला देता है।
विशेषज्ञों के अनुसार झंगोरा फाइबर, प्रोटीन, आयरन और कई आवश्यक खनिज तत्वों से भरपूर होता है। इसमें ग्लूटेन नहीं होता, जिससे यह स्वास्थ्य के प्रति जागरूक लोगों की पहली पसंद बन रहा है। मधुमेह और वजन नियंत्रित रखने वालों के लिए भी इसे लाभदायक माना जाता है। यही वजह है कि जिस झंगोरे को कभी केवल पहाड़ की फसल माना जाता था, आज वह देश और विदेश के बाजारों में सुपरफूड के रूप में पहचान बना रहा है।
पर्वतीय क्षेत्रों से लगातार हो रहे पलायन के बावजूद झंगोरे की खीर आज भी गांवों की रसोई में अपनी जगह बनाए हुए है। कई स्वयं सहायता समूह और स्थानीय उद्यमी झंगोरे से जुड़े उत्पादों को बाजार तक पहुंचाने का काम कर रहे हैं। इससे स्थानीय किसानों को भी नई उम्मीद मिली है। झंगोरे की खीर केवल एक व्यंजन नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। इसमें पहाड़ की मिट्टी की खुशबू, खेतों की मेहनत और पारंपरिक जीवनशैली की झलक दिखाई देती है। आधुनिकता के इस दौर में भी जब लोग अपने पारंपरिक स्वाद की ओर लौट रहे हैं, तब झंगोरे की खीर उत्तराखंड की पहचान को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने का काम कर रही है। आज के दौर में पिज्जा-बर्गर के दीवाने अब देवभूमि के इस पारंपरिक स्वाद के आगे सरेंडर कर रहे हैं। कभी गरीबों का राशन समझा जाने वाला झंगोरा अब बड़े-बड़े होटलों के डेजर्ट मेन्यू की शान बन चुका है। स्वाद ऐसा कि उंगलियां चाटते रह जाएं और सेहत ऐसी कि डाक्टर भी हैरान रह जाएं।
रविवार, 7 जून 2026
वक्त और फैशन बदला पर नहीं बदला ‘गलोबंद’ का टशन
---सामाजिक पहचान व सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है गलोबंद
---गढ़वाल और कुमाऊं में पारंपरिक महिलाओं का प्रमुख आभूषण
---विशेष रूप से पहना जाता है विवाह व मांगलिक अवसरों पर
---कई परिवारों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी विरासत के रूप में है यह संरक्षित
---पहाड़ के लोकगीतों व लोक संस्कृति में है इसका विशेष स्थान
देहरादून। उत्तराखंड की समृ( लोक संस्कृति में अनेक ऐसे प्रतीक हैं जो केवल परंपरा का हिस्सा नहीं, बल्कि समाज की पहचान भी हैं। इन्हीं में से एक है गलोबंद जो सदियों से पहाड़ की महिलाओं के गले की शोभा बढ़ाने के साथ-साथ उनकी सांस्कृतिक अस्मिता का प्रतीक बना हुआ है। आधुनिकता की तेज़ रफ्तार के बावजूद गलोबंद आज भी उत्तराखंड की लोक विरासत में अपना विशेष स्थान बनाए हुए है।
पहाड़ की महिलाओं का पारंपरिक श्रृंगार विविध आभूषणों से सुसज्जित रहा है। नथ, पौंजी, हंसुली, गुलूबंद, चरेऊ और गलोबंद जैसे आभूषण न केवल सौंदर्य बढ़ाते हैं, बल्कि स्थानीय संस्कृति और सामाजिक परंपराओं को भी अभिव्यक्त करते हैं। इनमें गलोबंद सबसे विशिष्ट माना जाता है। काले मखमली कपड़े या मोटे धागे की पट्टी पर सोने, चांदी अथवा धातु के कलात्मक टुकड़ों को पिरोकर बनाया जाने वाला यह आभूषण गले से सटा रहता है और महिलाओं के व्यक्तित्व में अलग ही गरिमा जोड़ देता है।
लोक संस्कृति के जानकार बताते हैं कि गलोबंद का इतिहास कई पीढ़ियों पुराना है। पुराने समय में जब पहाड़ के गांवों में आधुनिक आभूषण आसानी से उपलब्ध नहीं थे, तब स्थानीय कारीगर हाथों से गलोबंद तैयार करते थे। प्रत्येक डिजाइन में स्थानीय कला और पारंपरिक सौंदर्यबोध की झलक दिखाई देती थी। कई परिवारों में गलोबंद केवल गहना नहीं, बल्कि पारिवारिक विरासत माना जाता था, जिसे मां अपनी बेटी और सास अपनी बहू को सौंपती थी।
उत्तराखंड के विवाह समारोहों में गलोबंद का विशेष महत्व रहा है। दुल्हन के श्रृंगार में इसे शुभता और सम्मान का प्रतीक माना जाता है। मांगल गीतों और लोक नृत्यों में भी गलोबंद का बार-बार उल्लेख मिलता है। पहाड़ की लोक गायिकाओं द्वारा गाए जाने वाले कई गीतों में महिलाओं के श्रृंगार और आभूषणों का वर्णन मिलता है, जिनमें गलोबंद प्रमुख स्थान रखता है।
समय के साथ फैशन बदलता गया, लेकिन गलोबंद की लोकप्रियता कम नहीं हुई। आज यह पारंपरिक परिधान के साथ-साथ आधुनिक परिधानों में भी नए रूप में दिखाई देने लगा है। राज्य के सांस्कृतिक मेलों, उत्तरायणी, नंदा देवी महोत्सव और विभिन्न लोक उत्सवों में युवा पीढ़ी भी गलोबंद पहनकर अपनी संस्कृति से जुड़ाव का प्रदर्शन कर रही है। सोशल मीडिया के दौर में भी पारंपरिक पहाड़ी वेशभूषा और गलोबंद की तस्वीरें व्यापक रूप से पसंद की जा रही हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्वीकरण के इस दौर में जब स्थानीय परंपराएं धीरे-धीरे सिमटती जा रही हैं, तब गलोबंद जैसे सांस्कृतिक प्रतीक नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का कार्य कर रहे हैं। यह केवल गले का आभूषण नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक स्मृति, लोक कला और महिलाओं की पहचान का जीवंत दस्तावेज है।
आज भी जब किसी पर्व, विवाह या सांस्कृतिक आयोजन में पारंपरिक वेशभूषा पहने कोई पहाड़ी महिला गलोबंद धारण करती है, तो उसमें केवल सौंदर्य नहीं झलकता, बल्कि सदियों पुरानी लोक परंपरा की चमक दिखाई देती है। यही कारण है कि गलोबंद उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत का ऐसा अनमोल आभूषण है, जिसकी चमक समय के साथ और अधिक निखरती जा रही है।
पहाड़ की संस्कृति केवल मंदिरों, लोकगीतों और पर्वों तक सीमित नहीं है। यहां के पारंपरिक आभूषण भी इस विरासत के महत्वपूर्ण वाहक हैं। गलोबंद उन्हीं में से एक है, जो आज भी पहाड़ की महिलाओं के गले में संस्कृति, गौरव और पहचान बनकर दमक रहा है।
उत्तराखंड में वक्त से पहले चुनावी शंखनाद
भाजपा-कांग्रेस ने कसी कमर, सत्ता और सियासत की बिसात बिछनी शुरू
राहुल गांधी के दौरे से लेकर भाजपा के बूथ मैनेजमेंट अभियान तक
चुनाव में अभी समय, लेकिन राजनीतिक दल आए चुनावी मोड में
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 में भले ही अभी कई महीने शेष हों, लेकिन राज्य की राजनीति में चुनावी शंखनाद साफ सुनाई देने लगा है। भाजपा और कांग्रेस दोनों ने अपने-अपने स्तर पर तैयारियां तेज कर दी हैं। नेताओं के लगातार दौरे, संगठनात्मक बैठकों का दौर, बूथ स्तर तक पहुंचने की कवायद और चुनावी मुद्दों की तलाश इस बात का संकेत है कि राज्य में चुनावी जंग समय से पहले ही शुरू हो चुकी है।
भाजपा सत्ता की हैट्रिक लगाने के लक्ष्य के साथ मैदान में है। पार्टी का पूरा फोकस उन बूथों और क्षेत्रों पर है, जहां पिछले चुनावों में उसे अपेक्षित सफलता नहीं मिली थी। संगठन को और मजबूत बनाने और कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने के लिए शीर्ष नेतृत्व लगातार उत्तराखंड का दौरा कर रहा है। हाल के दिनों में भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व ने भी चुनावी रणनीति को लेकर विशेष बैठकों का सिलसिला शुरू किया है।
दूसरी ओर कांग्रेस भी इस चुनाव को अस्तित्व की लड़ाई मानकर चल रही है। कांग्रेस बूथ स्तर तक संगठन मजबूत करने और गुटबाजी को कम करने की रणनीति पर काम कर रही है।
2027 के चुनाव में रोजगार, पलायन, महंगाई, चारधाम यात्रा की व्यवस्थाएं, आपदा प्रबंधन, सैन्य परिवारों से जुड़े विषय और पहाड़-मैदान का संतुलित विकास प्रमुख मुद्दे बन सकते हैं। कांग्रेस बेरोजगारी, अग्निवीर योजना और युवाओं के सवालों को केंद्र में लाने की कोशिश कर रही है, जबकि भाजपा विकास परियोजनाओं, सड़क, रेल और धार्मिक पर्यटन को अपनी उपलब्धि के रूप में जनता के सामने रखेगी।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि 2027 में केवल मुद्दों की नहीं बल्कि नेतृत्व की भी लड़ाई होगी। भाजपा मुख्यमंत्री नेतृत्व और संगठन की मजबूती के सहारे मैदान में उतरेगी, जबकि कांग्रेस को जनता के सामने एकजुट नेतृत्व का संदेश देना होगा। पिछले कुछ वर्षों में कांग्रेस के भीतर चली आ रही गुटबाजी भी चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकती है।
अभी तक चुनावी गतिविधियां बड़े नेताओं के दौरों तक सीमित दिख रही हैं, लेकिन आने वाले महीनों में यह लड़ाई गांवों, बूथों और सोशल मीडिया तक पहुंचने वाली है। राजनीतिक दलों ने अपने कार्यकर्ताओं को सक्रिय करना शुरू कर दिया है और जनसंपर्क अभियानों की रूपरेखा भी तैयार होने लगी है।
उत्तराखंड की राजनीति में 2027 का चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन या सत्ता बचाने की लड़ाई नहीं होगा, बल्कि यह राज्य के भविष्य के विकास माडल, युवाओं की उम्मीदों और पहाड़ की पहचान से जुड़े सवालों का भी चुनाव होगा। फिलहाल तस्वीर साफ हैकृचुनाव में अभी समय बाकी है, लेकिन चुनावी जंग शुरू हो चुकी है।
उच्यणू है ‘अनहोनी’ का ‘पहाड़ी’ इलाज
जब आधुनिक दवाएं भी हार मान लें, वहां उम्मीद की आखिरी किरण जगाती है देवभूमि की यह थाती
लंबी बीमारी हो या अचानक आया कोई बड़ा संकट ‘उच्यणू’ की एक पोटली में छिपी होती है सुकून की उम्मीद
संकट के वक्त जब समझ न आए कोई रास्ता, तब ईष्ट देवों के आगे शीश नवाकर ऐसे रखा जाता है उच्यणू
आधुनिक चिकित्सा के दौर में भी उत्तराखंड के कई गांवों में जीवित है यह अनोखा लोकविश्वास
लोकसंस्कृति, आस्था और सामुदायिक विश्वास का अनूठा संगम है पहाड़ की अनोखी परंपरा
देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ों में आज भी ऐसी अनेक परंपराएं जीवित हैं, जो आधुनिकता की तेज रफ्तार के बावजूद लोगों के जीवन का हिस्सा बनी हुई हैं। इन्हीं में से एक है ‘उच्यणू’। जब किसी व्यक्ति की बीमारी लंबे समय तक ठीक नहीं होती, परिवार पर लगातार संकट आते हैं या किसी अनहोनी का कारण समझ नहीं आता, तब गांवों में आज भी उच्यणू रखा जाता है।
गढ़वाल और कुमाऊं के अनेक ग्रामीण इलाकों में प्रचलित यह परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि लोकजीवन और सांस्कृतिक चेतना का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है। लोगों का विश्वास है कि कभी-कभी कुलदेवता, ग्रामदेवता या स्थानीय देवी-देवताओं के रूठ जाने से परिवार पर संकट आ सकता है। ऐसे में देवताओं की इच्छा और नाराजगी का कारण जानने के लिए उच्यणू आयोजित किया जाता है।
उच्यणू के दौरान गांव के जागरिया, पश्वा या देववक्ता को बुलाया जाता है। ढोल-दमाऊं और मंत्रोच्चारण के बीच देवी-देवताओं का आह्वान किया जाता है। लोकमान्यता है कि इस प्रक्रिया में देवता पश्वा पर अवतरित होकर परिवार की समस्या का कारण बताते हैं और उसके समाधान का मार्ग भी सुझाते हैं।
पहाड़ के बुजुर्ग बताते हैं कि पहले जब चिकित्सा सुविधाएं सीमित थीं, तब उच्यणू सामाजिक और मानसिक सहारे का माध्यम भी था। बीमारी के दौरान पूरा गांव एक परिवार के साथ खड़ा होता था। लोग एक-दूसरे के दुख-दर्द में सहभागी बनते थे और सामूहिक रूप से समाधान खोजने का प्रयास करते थे।
समाजशास्त्रियों के अनुसार उच्यणू केवल धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह सामुदायिक एकजुटता का प्रतीक भी है। इसके माध्यम से लोकपरंपराएं, लोकसंगीत, लोकभाषा और सांस्कृतिक विरासत पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती रही हैं।
हालांकि नई पीढ़ी के बीच वैज्ञानिक सोच और आधुनिक चिकित्सा के प्रसार के कारण इस परंपरा का प्रभाव कुछ क्षेत्रों में कम हुआ है, फिर भी दूरस्थ गांवों में उच्यणू आज भी लोगों की आस्था का केंद्र बना हुआ है। कई परिवार आधुनिक उपचार के साथ-साथ देवताओं का आशीर्वाद लेने के लिए भी इस परंपरा का सहारा लेते हैं।
उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत में उच्यणू केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि पहाड़ के उस जीवन दर्शन का हिस्सा है जिसमें प्रकृति, देवता और मनुष्य एक-दूसरे से गहरे जुड़े हुए माने जाते हैं। बदलते समय में भी यह परंपरा पहाड़ की लोकआस्था और सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखने का कार्य कर रही है।
पहाड़ की ‘अनमोल’ विरासत है ‘फाणु’
---फाणु है पहाड़ की थाली का स्वाद, सेहत और संस्कृति का अनमोल संगम
---गढ़वाल-कुमाऊं की रसोई से निकलकर आधुनिक खानपान में भी अपनी पहचान बना रहा है फाणु
---कभी ग्रामीण जीवन की जरूरत था तो आज बन रहा है पहाड़ी विरासत का सबसे बड़ा प्रतीक
देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ों की पहचान केवल हिमालय, देवालय और प्राकृतिक सौंदर्य तक सीमित नहीं है। यहां की संस्कृति और खानपान भी उतने ही समृ( हैं। इन्हीं पारंपरिक व्यंजनों में एक नाम है फाणु जो सदियों से पहाड़ी रसोई का अभिन्न हिस्सा रहा है। आज जब लोग फास्ट फूड और आधुनिक व्यंजनों की ओर आकर्षित हो रहे हैं, तब भी फाणु अपनी पौष्टिकता और विशिष्ट स्वाद के कारण लोगों की थाली में सम्मानजनक स्थान बनाए हुए है।
फाणु केवल एक व्यंजन नहीं, बल्कि पहाड़ के जीवन संघर्ष, प्रकृति से जुड़ाव और पारंपरिक ज्ञान का प्रतीक है। यह व्यंजन मुख्य रूप से गहत, भट्ट, उड़द और अन्य स्थानीय दालों से तैयार किया जाता है। दालों को भिगोकर पीसा जाता है और फिर धीमी आंच पर मसालों के साथ पकाया जाता है। इसकी गाढ़ी बनावट और अनूठा स्वाद इसे अन्य दालों से अलग पहचान देता है।
पुराने समय में पहाड़ का जीवन कठिन था। खेतों में घंटों काम करना, दूर-दूर तक पैदल चलना और सीमित संसाधनों में जीवन यापन करना आम बात थी। ऐसे में शरीर को भरपूर ऊर्जा देने वाले भोजन की आवश्यकता होती थी। फाणु इसी जरूरत को पूरा करता था। प्रोटीन और पोषक तत्वों से भरपूर यह व्यंजन किसानों और मेहनतकश लोगों के लिए ऊर्जा का प्रमुख स्रोत माना जाता था।
स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि सर्दियों के दिनों में फाणु और मंडुवे की रोटी का स्वाद और ताकत दोनों ही बेजोड़ होते थे। यही कारण है कि यह व्यंजन पीढ़ी दर पीढ़ी पहाड़ी परिवारों में बनता चला आ रहा है। आधुनिक पोषण विशेषज्ञ भी फाणु को स्वास्थ्यवर्धक भोजन मानते हैं। गहत और भट्ट जैसी दालों में भरपूर प्रोटीन, फाइबर और खनिज तत्व पाए जाते हैं। यह पाचन तंत्र को मजबूत करने के साथ-साथ शरीर को आवश्यक पोषण भी प्रदान करता है। पहाड़ में इसे पारंपरिक रूप से स्वास्थ्यवर्धक भोजन के रूप में देखा जाता रहा है।
एक समय ऐसा था जब फाणु केवल गांवों और पारंपरिक रसोई तक सीमित था, लेकिन अब उत्तराखंड के कई होटल, होम-स्टे और रेस्तरां इसे विशेष व्यंजन के रूप में परोस रहे हैं। पर्यटन के बढ़ते प्रभाव के साथ देश-विदेश से आने वाले पर्यटक भी पहाड़ के इस पारंपरिक स्वाद को पसंद कर रहे हैं।
बदलती जीवनशैली और आधुनिक खानपान के प्रभाव के कारण कई पारंपरिक व्यंजन धीरे-धीरे लोगों की थाली से गायब हो रहे हैं। हालांकि फाणु अभी भी अपनी पहचान बनाए हुए है, लेकिन नई पीढ़ी को इससे जोड़ना बड़ी चुनौती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्थानीय व्यंजनों को पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था से जोड़ा जाए तो न केवल उनकी लोकप्रियता बढ़ेगी बल्कि पहाड़ की सांस्कृतिक विरासत भी संरक्षित रहेगी।
फाणु केवल दालों से बना एक व्यंजन नहीं है, बल्कि यह उत्तराखंड की मिट्टी, मेहनत और परंपरा का स्वाद है, जिस तरह हिमालय पहाड़ की पहचान है, उसी तरह फाणु पहाड़ की रसोई की आत्मा है। बदलते समय में इस पारंपरिक व्यंजन को बचाए रखना केवल स्वाद का नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक जड़ों को संजोने का भी प्रश्न है।
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