रविवार, 23 अगस्त 2026

मिशन 2027 के लिए बूथ पर ‘कमल’

बूथ सशक्तिकरण से भाजपा का चुनावी आगाज संगठन को जमीनी स्तर पर धार देने की तैयारी प्रदेश महामंत्री के नेतृत्व में गठित की गई टीम देहरादून। उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों को लेकर भाजपा ने अब अपनी रणनीति को पूरी तरह बूथ स्तर तक ले जाने की कवायद तेज कर दी है। संगठन को चुनावी मोड में लाते हुए पार्टी बूथ सशक्तिकरण अभियान के जरिये धरातल पर अपनी चुनावी रणनीति का आगाज करने जा रही है। इसके लिए प्रदेश महामंत्री के नेतृत्व में बूथ सशक्तिकरण अभियान की टीम का गठन किया गया है। भाजपा का फोकस अब केवल बड़े राजनीतिक कार्यक्रमों और नेताओं की सभाओं तक सीमित रहने के बजाय बूथ स्तर पर संगठन को मजबूत करने पर है। पार्टी की रणनीति है कि प्रत्येक बूथ पर कार्यकर्ताओं की सक्रियता बढ़ाई जाए, स्थानीय स्तर पर मतदाताओं से संपर्क मजबूत किया जाए और संगठन की योजनाओं एवं सरकार की उपलब्धियों को घर-घर तक पहुंचाया जाए। भाजपा की चुनावी राजनीति में बूथ प्रबंधन हमेशा से महत्वपूर्ण रहा है। आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए पार्टी एक बार फिर इसी माडल को मजबूत करने में जुटी है। बूथ सशक्तिकरण अभियान के तहत कमजोर बूथों की पहचान, कार्यकर्ताओं की सक्रियता, पन्ना स्तर तक संपर्क और स्थानीय मुद्दों की जानकारी जुटाने पर जोर दिए जाने की रणनीति है। पार्टी की कोशिश यह भी है कि बूथ स्तर पर संगठन केवल चुनाव के समय सक्रिय दिखाई न दे, बल्कि लगातार जनता के बीच मौजूद रहे। इसके लिए बूथ अध्यक्ष से लेकर पन्ना प्रमुख और अन्य जिम्मेदार कार्यकर्ताओं की भूमिका को अधिक प्रभावी बनाने की तैयारी की जा रही है। बूथ सशक्तिकरण अभियान को व्यवस्थित रूप से संचालित करने के लिए प्रदेश महामंत्री के नेतृत्व में टीम गठित की गई है। यह टीम संगठनात्मक जिलों और मंडलों के साथ समन्वय करते हुए बूथों की स्थिति का आकलन करेगी और आवश्यकतानुसार कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारियां सौंपेगी। भाजपा की रणनीति में यह अभियान इसलिए भी अहम है क्योंकि विधानसभा चुनाव में हर सीट का परिणाम बूथ स्तर के प्रदर्शन से तय होता है। पार्टी कमजोर बूथों को चिन्हित कर वहां संगठन की पकड़ मजबूत करने पर विशेष ध्यान दे सकती है। बूथ सशक्तिकरण अभियान को केवल संगठनात्मक कवायद न रखकर सरकार की योजनाओं और उपलब्धियों से भी जोड़ने की तैयारी है। भाजपा कार्यकर्ताओं के माध्यम से केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं की जानकारी आम लोगों तक पहुंचाने के साथ ही लाभार्थियों से संपर्क मजबूत करने की रणनीति पर काम करेगी। पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि सरकार की उपलब्धियों और संगठन के संदेश को स्थानीय स्तर के मुद्दों से कैसे जोड़ा जाए। उत्तराखंड में रोजगार, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, महंगाई और आपदा जैसे सवाल जनता के बीच महत्वपूर्ण हैं। बूथ स्तर का कार्यकर्ता इन मुद्दों पर जनता की प्रतिक्रिया संगठन तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभा सकता है। 2027 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की सीधी टक्कर कांग्रेस से मानी जा रही है। ऐसे में बूथ सशक्तिकरण अभियान को पार्टी की चुनावी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। भाजपा जहां अपने मजबूत संगठनात्मक ढांचे का लाभ उठाना चाहती है, वहीं कांग्रेस भी लगातार संगठन को सक्रिय करने और सरकार के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश कर रही है। भाजपा के लिए चुनौती सत्ता विरोधी रुझानों को रोकने के साथ-साथ युवा, महिला और पहली बार मतदान करने वाले मतदाताओं तक प्रभावी ढंग से पहुंच बनाने की भी है। बूथ स्तर का नेटवर्क इस काम में पार्टी के लिए सबसे उपयोगी माध्यम बन सकता है। भाजपा की ओर से बूथ सशक्तिकरण अभियान की टीम का गठन इस बात का संकेत है कि 2027 की चुनावी तैयारियां अब बैठकों और रणनीति दस्तावेजों से आगे बढ़कर जमीन पर उतरने लगी हैं। आने वाले महीनों में संगठनात्मक गतिविधियों, बूथ बैठकों और मतदाता संपर्क अभियानों में तेजी देखने को मिल सकती है। कुल मिलाकर भाजपा ने चुनावी रण में उतरने से पहले अपना सबसे मजबूत हथियार धारदार करने की तैयारी शुरू कर दी हैकृबूथ। अब देखना होगा कि बूथ सशक्तिकरण अभियान संगठन को कितनी मजबूती देता है और 2027 के चुनावी मुकाबले में भाजपा की जमीन कितनी पुख्ता कर पाता है।

एसआईआर पर ‘सियासी’ टकराव

बीएलओ और बीएलए-2 को धमकाने का आरोप चुनाव आयोग से मिला भाजपा का प्रतिनिधिमंडल प्रक्रिया बाधित करने वालों पर कार्रवाई की मांग देहरादून। उत्तराखंड में विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर सियासी टकराव लगातार तेज होता जा रहा है। भाजपा ने कांग्रेस पर एसआईआर प्रक्रिया को प्रभावित करने और बूथ स्तर पर काम कर रहे बीएलओ तथा पार्टी के बीएलए-2 को कथित रूप से धमकाने का आरोप लगाया है। भाजपा प्रतिनिधिमंडल ने चुनाव आयोग से मुलाकात कर मामले में हस्तक्षेप की मांग करते हुए एसआईआर की प्रक्रिया बाधित करने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग की। भाजपा का आरोप है कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया को लेकर कांग्रेस कार्यकर्ताओं की ओर से बूथ स्तर पर भ्रम और दबाव का माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है। पार्टी का कहना है कि निर्वाचन प्रक्रिया से जुड़े अधिकारियों और राजनीतिक दलों के अधिकृत प्रतिनिधियों को स्वतंत्र रूप से अपना काम करने दिया जाना चाहिए। भाजपा प्रतिनिधिमंडल ने चुनाव आयोग के समक्ष अपनी शिकायत रखते हुए कहा कि एसआईआरजैसी महत्वपूर्ण प्रक्रिया में किसी भी तरह का राजनीतिक हस्तक्षेप लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए उचित नहीं है। पार्टी ने आयोग से मांग की कि बीएलओ और बीएलए-2 के काम में बाधा डालने, उन्हें धमकाने अथवा दबाव बनाने की शिकायतों की निष्पक्ष जांच कराई जाए। भाजपा नेताओं का कहना है कि मतदाता सूची का शुद्ध और पारदर्शी होना चुनाव की विश्वसनीयता के लिए बेहद जरूरी है। यदि बूथ स्तर पर ही प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रयास होगा तो इसका असर पूरी चुनावी प्रक्रिया पर पड़ सकता है। दूसरी ओर कांग्रेस एसआईआर को लेकर पहले से ही निर्वाचन आयोग और भाजपा पर सवाल उठाती रही है। कांग्रेस का आरोप है कि पुनरीक्षण की प्रक्रिया में यदि वास्तविक मतदाताओं के नाम प्रभावित होते हैं तो इसका सीधा असर मताधिकार पर पड़ेगा। पार्टी ने बूथ स्तर पर निगरानी और अपने प्रतिनिधियों की सक्रिय भूमिका की बात कही है। यही वजह है कि एसआईआर अब महज प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रह गई है। मतदाता सूची को लेकर दोनों प्रमुख राजनीतिक दल आमने-सामने हैं और हर पक्ष दूसरे पर चुनावी लाभ के लिए प्रक्रिया को प्रभावित करने का आरोप लगा रहा है। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 में प्रस्तावित हैं। ऐसे में मतदाता सूची का पुनरीक्षण राजनीतिक दलों के लिए बेहद संवेदनशील मुद्दा बन गया है। चुनाव से पहले मतदाता सूची में नाम जुड़ने, हटने या संशोधन की प्रक्रिया पर राजनीतिक दलों की नजर स्वाभाविक रूप से बनी हुई है। भाजपा का कहना है कि एसआईआर का उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक शुद्ध और विश्वसनीय बनाना है। पार्टी ने आयोग से आग्रह किया कि प्रक्रिया में किसी भी तरह की बाधा को गंभीरता से लिया जाए और कानून के तहत कार्रवाई हो। वहीं कांग्रेस की ओर से लगातार यह सवाल उठाया जा रहा है कि कहीं पुनरीक्षण की प्रक्रिया के नाम पर वास्तविक मतदाताओं के नाम प्रभावित न हों। ऐसे में आने वाले दिनों में एसआईआर को लेकर दोनों दलों की सियासी बयानबाजी और तेज होने के आसार हैं। एसआईआर को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच बढ़ते आरोप-प्रत्यारोप ने निर्वाचन आयोग के सामने भी चुनौती बढ़ा दी है। आयोग के लिए सबसे महत्वपूर्ण यह होगा कि पूरी प्रक्रिया राजनीतिक विवाद से अलग, पारदर्शी और नियमों के मुताबिक पूरी हो। मतदाता सूची में एक भी वास्तविक मतदाता का नाम गलत तरीके से हटना गंभीर विषय है, वहीं अपात्र नामों की मौजूदगी भी चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर सकती है। इसलिए राजनीतिक आरोपों के बीच असली कसौटी प्रक्रिया की पारदर्शिता और शिकायतों के समयबद्ध निस्तारण की होगी। फिलहाल एसआईआर उत्तराखंड में चुनावी राजनीति का नया मोर्चा बन चुका है। भाजपा आयोग के दरवाजे पर पहुंचकर कांग्रेस पर प्रक्रिया बाधित करने का आरोप लगा रही है, जबकि कांग्रेस पहले से ही एसआईआर को लेकर सवाल उठा रही है। 2027 के चुनाव से पहले मतदाता सूची को लेकर छिड़ी यह सियासी जंग आने वाले दिनों में और धार पकड़ सकती है।

शनिवार, 22 अगस्त 2026

udaydinmaan: 60 में पेंशन और 61 में ‘अफसरशाही’

udaydinmaan: 60 में पेंशन और 61 में ‘अफसरशाही’: आमजन के लिए उम्र की सीमा, साहबों के लिए आजीवन कुर्सी कभी सलाहकार तो कभी विशेषज्ञ, पद बदलते हैं पर चेहरा वही पेंशन भी जेब में और भारी-भरकम सं...

60 में पेंशन और 61 में ‘अफसरशाही’

आमजन के लिए उम्र की सीमा, साहबों के लिए आजीवन कुर्सी कभी सलाहकार तो कभी विशेषज्ञ, पद बदलते हैं पर चेहरा वही पेंशन भी जेब में और भारी-भरकम संविदा का वेतन भी जारी अफसरों के लिए अनलिमिटेड एक्सटेंशन पर उठे गंभीर सवाल देहरादून। उत्तराखंड में सरकारी नौकरी की एक अजीब कहानी है। कर्मचारी की उम्र 60 साल होती है, फाइलों में सेवा समाप्त हो जाती है, पेंशन शुरू हो जाती है, लेकिन कुछ अफसरों की सरकारी पारी खत्म नहीं होती। कुर्सी बदल जाती है, पदनाम बदल जाता है, कभी सलाहकार तो कभी विशेषज्ञ, कभी आयोग तो कभी किसी समिति में नई भूमिका मिल जाती है। यानी सरकारी नौकरी का कैलेंडर आम आदमी के लिए चलता है, लेकिन कुछ खास अफसरों के लिए शायद अतिरिक्त पन्ने भी रखे गए हैं। सवाल यह नहीं है कि किसी सेवानिवृत्त अफसर की विशेषज्ञता का इस्तेमाल क्यों किया जाए। सवाल यह है कि किस आधार पर, कितने समय के लिए और किस पारदर्शी प्रक्रिया के तहत? उत्तराखंड में सेवानिवृत्त सरकारी सेवकों की जनहित और अपरिहार्यता की स्थिति में पुनर्नियुक्ति का प्रावधान है। शासन के एक आदेश में सलाहकार, परामर्शी, विशेष कार्याधिकारी और विशेषज्ञ समन्वयक जैसे पदों पर संविदा के आधार पर तैनाती की व्यवस्था का उल्लेख है। यहीं से असली सवाल पैदा होता है। अगर सरकार को किसी अफसर का अनुभव इतना जरूरी लगता है कि रिटायरमेंट के बाद भी उसे सरकारी काम सौंपना पड़े, तो फिर क्या राज्य में नई पीढ़ी के अधिकारियों और विशेषज्ञों की कमी है? और अगर कमी है तो उसे दूर करने की योजना क्या है? उत्तराखंड का युवा नौकरी के लिए परीक्षा देता है। हजारों युवा सालों तैयारी करते हैं। रिक्तियों का इंतजार करते हैं। भर्ती परीक्षाओं की तारीख देखते हैं। कभी परीक्षा टलती है, कभी परिणाम का इंतजार होता है। दूसरी तरफ सरकारी व्यवस्था में ऐसी तस्वीर दिखाई देती है जिसमें रिटायर होने के बाद भी अनुभवी अफसरों के लिए सरकारी दरवाजे बंद नहीं होते। यह विरोधाभास सवाल पूछता है। क्या सरकारी व्यवस्था अनुभव के नाम पर एक ही चेहरे को बार-बार मौका देती रहेगी? सरकार कह सकती है कि अनुभवी अफसरों की जरूरत है। बिल्कुल है। अनुभव किसी भी प्रशासन की पूंजी है। लेकिन अनुभव और स्थायी सरकारी पुनर्वास में अंतर है। किसी विशेष परियोजना के लिए विशेषज्ञ की जरूरत हो तो निश्चित अवधि की नियुक्ति समझ में आती है। लेकिन अगर रिटायरमेंट के बाद लगातार नई जिम्मेदारियां मिलती रहें तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या सरकारी व्यवस्था में पदों का एक अनौपचारिक पोस्ट-रिटायरमेंट क्लब तैयार हो रहा है? और यह सवाल सिर्फ एक सरकार का नहीं है। सत्ता बदलती है, चेहरे बदलते हैं, लेकिन यह व्यवस्था कई बार अपना रास्ता खोज लेती है। लोकतंत्र में कुर्सी किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं होती। सरकारी पद जनता के पैसे से चलते हैं। इसलिए जनता को यह जानने का अधिकार है कि रिटायरमेंट के बाद किसी अधिकारी की पुनर्नियुक्ति क्यों की गई, उसके लिए चयन की प्रक्रिया क्या रही, कितने उम्मीदवारों पर विचार हुआ और उसकी नियुक्ति की समयसीमा क्या है। वरना विशेषज्ञता शब्द धीरे-धीरे पहचान का दूसरा नाम बन सकता है। उत्तराखंड जैसे युवा राज्य में यह बहस और जरूरी है। यहां बेरोजगार युवाओं की सबसे बड़ी शिकायत सिर्फ नौकरी की कमी नहीं, बल्कि अवसरों की समानता को लेकर भी है। जब युवा देखता है कि एक ओर सरकारी पदों के लिए उम्र सीमा खत्म हो जाती है और दूसरी ओर कुछ रिटायर अफसरों के लिए सरकारी व्यवस्था में नई भूमिकाएं निकल आती हैं, तो उसके मन में सवाल पैदा होना स्वाभाविक है। सरकार को इस व्यवस्था के लिए एक साफ नीति बनानी चाहिए। रिटायरमेंट के बाद नियुक्ति अपवाद हो, परंपरा नहीं। हर पुनर्नियुक्ति के साथ कारण सार्वजनिक हो। पद की अवधि तय हो। काम का स्पष्ट दायरा हो। प्रदर्शन की समीक्षा हो। और जहां काम किसी नियमित सेवा अधिकारी या नए विशेषज्ञ से कराया जा सकता है, वहां सिर्फ पुराने प्रशासनिक संपर्कों के आधार पर नियुक्ति न हो। क्योंकि लोकतंत्र में अनुभव जरूरी है, लेकिन अवसरों का दरवाजा हमेशा एक ही पीढ़ी के लिए खुला रहना जरूरी नहीं है। उत्तराखंड को अब यह तय करना होगा कि सरकारी सेवा का मतलब 60 साल की उम्र में खत्म होने वाली नौकरी है या फिर कुछ लोगों के लिए सरकारी व्यवस्था में चलती रहने वाली दूसरी पारी? अगर दूसरी पारी जरूरी है तो उसके नियम सबके सामने होने चाहिए। वरना जनता यही पूछेगीकृकि सरकारी नौकरी से रिटायरमेंट हुआ है या सिर्फ पदनाम से?

बेटी का न्याय बनाम ‘सियासी जंग’

अंकिता भंडारी केस में आखिर कब तक चलेगी बयानबाजी सीबीआई जांच पर खिंची तलवारों के बीच सवाल दरकिनार अंकिता की आत्मा को न्याय चाहिए, राजनीति की रोटियां नहीं प्रकरण पर सियासत तेज,जांच अदालत में या बयानों के मंच पर देहरादून। अंकिता प्रकरण उत्तराखंड के लिए सिर्फ एक मुकदमा नहीं है। यह उस भरोसे का सवाल है, जो एक बेटी के परिवार से लेकर पूरे समाज तक फैला हुआ है। ऐसे मामले में सबसे जरूरी चीज हैकृन्याय। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि न्याय की इस लंबी यात्रा के बीच राजनीति लगातार अपना रास्ता खोज लेती है। कांग्रेस आरोप लगा रही है कि अंकिता प्रकरण में सीबीआई जांच को लेकर सरकार और जांच एजेंसी की भूमिका सवालों के घेरे में है। दूसरी ओर सत्ता पक्ष का कहना है कि कांग्रेस इस संवेदनशील मामले को राजनीतिक मुद्दा बनाने में जुटी है और केंद्रीय जांच ब्यूरो तथ्यों एवं साक्ष्यों के आधार पर नियमानुसार जांच कर रही है। यहीं से असली सवाल पैदा होता हैकृकि क्या किसी जांच की दिशा बयानबाजी से तय होगी या सबूतों से? किसी भी आपराधिक मामले में अदालत के सामने आरोप नहीं, साक्ष्य टिकते हैं। जांच एजेंसी का काम प्रेस कांफ्रेंस में फैसला सुनाना नहीं, बल्कि उपलब्ध तथ्यों, दस्तावेजों, बयानों और वैज्ञानिक साक्ष्यों की पड़ताल करना है। सीबीआई हो या कोई दूसरी जांच एजेंसी, उसकी जांच का अंतिम मूल्यांकन अदालत में होना है। लेकिन राजनीति को अदालत का इंतजार कम ही पसंद आता है। एक तरफ कांग्रेस सवाल पूछ रही है। दूसरी तरफ भाजपा उन सवालों को राजनीतिक साजिश बताकर खारिज कर रही है। टीवी स्क्रीन और सोशल मीडिया पर आरोप-प्रत्यारोप का शोर बढ़ता जा रहा है। मगर इस शोर में सबसे महत्वपूर्ण आवाज कहीं पीछे छूटने का खतरा हैकृअंकिता के परिवार की न्याय की आवाज। कांग्रेस यदि सीबीआई जांच पर सवाल उठाती है तो उसे सिर्फ राजनीतिक बयान देने के बजाय ठोस तथ्यों के साथ अपनी आपत्तियां सामने रखनी चाहिए। कौन-सा साक्ष्य नजरअंदाज हुआ? किस बिंदु पर जांच में कमी है? किस तथ्य की अनदेखी की गई? जनता को यह बताया जाना चाहिए। उधर सरकार और भाजपा के पास भी केवल यह कह देना पर्याप्त नहीं कि सीबीआई स्वतंत्र एजेंसी है। जनता का भरोसा सिर्फ इस वाक्य से नहीं बनता। जांच की प्रक्रिया में पारदर्शिता, अदालत में मजबूत पैरवी और पीड़ित परिवार को समय पर न्यायकृयही भरोसा पैदा करते हैं। क्योंकि जनता अब राजनीतिक दावों से आगे देखना चाहती है। अंकिता प्रकरण में वर्षों से न्याय की प्रतीक्षा कर रहे परिवार के लिए हर नया बयान शायद पुराने जख्म को फिर खोलता है। इसलिए राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि किसी बेटी की त्रासदी को चुनावी पोस्टर, प्रेस नोट और राजनीतिक भाषण का विषय बनाने से न्याय नहीं मिलता और यहां एक असुविधाजनक सवाल दोनों पक्षों से है। अगर जांच सही है तो अदालत में साक्ष्य बोलने दीजिए। अगर जांच में कमी है तो ठोस तथ्य सामने रखिए। सिर्फ राजनीति हो रही है कहकर हर सवाल को खारिज कर देना भी लोकतांत्रिक जवाब नहीं है। और हर जांच को साजिश बताकर संदेह पैदा करना भी न्याय प्रक्रिया को मजबूत नहीं करता। उत्तराखंड के लोगों ने इस प्रकरण में बहुत कुछ देखा हैकृआक्रोश, आंदोलन, राजनीतिक आरोप, वादे और फिर लंबी कानूनी प्रक्रिया। अब जनता को बहस नहीं, परिणाम चाहिए। राजनीति अपनी जगह है। जांच अपनी जगह। अदालत अपनी जगह। अंकिता के मामले में सबसे जरूरी यह है कि जांच निष्पक्ष हो, साक्ष्यों के आधार पर हो और अदालत के सामने पूरा सच पहुंचे। दोषी कौन है, इसका फैसला राजनीतिक दलों के मंच से नहीं, कानून और न्यायालय की प्रक्रिया से होना चाहिए। क्योंकि आखिर में सवाल यह नहीं रहेगा कि किस पार्टी ने कितनी प्रेस कांफ्रेंस कीं। सवाल यह रहेगा कि अंकिता को न्याय मिला या नहीं? और इस सवाल का जवाब किसी पार्टी के प्रवक्ता के पास नहीं, न्याय की प्रक्रिया के पास होना चाहिए।

वोटर लिस्ट पर ‘सियासी जंग’

ड्रामेबाजी और घुसपैठिए के बयानों में उलझा लोकतंत्र का असली सवाल मतदाता सूची के बहाने कांग्रेस की घेराबंदी और भाजपा का काउंटर अटैक अगर सूची में खोट नहीं तो इतने सवाल क्यों और खोट है तो सुधार कब होगा विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर कांग्रेस आक्रामक, भाजपा ने साधा निशाना देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में इन दिनों एक दिलचस्प तस्वीर दिखाई दे रही है। एक तरफ कांग्रेस विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर लगातार सवाल उठा रही है, दूसरी तरफ भाजपा कांग्रेस की इस मुहिम को ड्रामेबाजी बताकर उसके जमीनी संगठन पर सवाल खड़े कर रही है। भाजपा का तर्क है कि कांग्रेस जमीनी राजनीति में कमजोर हो चुकी है और अब मतदाता सूची के मुद्दे को राजनीतिक हथियार बनाने की कोशिश कर रही है। लेकिन लोकतंत्र में असली सवाल यह नहीं कि कौन किसे ड्रामेबाज कह रहा है। असली सवाल यह है कि मतदाता सूची में गड़बड़ी है तो उसे ठीक कौन करेगा और अगर गड़बड़ी नहीं है तो इतने सवाल क्यों उठ रहे हैं? भाजपा कह रही है कि उत्तराखंड की सरकार यहां की जनता चुनेगी, कोई घुसपैठिया नहीं। राजनीतिक संदेश साफ हैकृमतदाता सूची की शुचिता को राष्ट्रीय सुरक्षा और पहचान के सवाल से जोड़कर कांग्रेस पर दबाव बनाना। भाजपा के लिए यह मुद्दा चुनावी रणनीति का हिस्सा भी है और अपने समर्थक मतदाताओं को सक्रिय करने का माध्यम भी। कांग्रेस के सामने चुनौती दूसरी है। सिर्फ प्रेस कांफ्रेंस, बयान और आरोपों से चुनाव नहीं जीते जाते। चुनाव बूथ पर लड़ा जाता है। मतदाता से संपर्क, संगठन की सक्रियता, स्थानीय मुद्दों पर पकड़ और कार्यकर्ताओं की मौजूदगीकृयही जमीनी राजनीति की असली परीक्षा है। यदि कांग्रेस एसआईआर को लेकर गंभीर है तो उसे बूथ स्तर तक अपने प्रतिनिधि उतारने होंगे, प्रभावित मतदाताओं की सूची तैयार करनी होगी और तथ्य के साथ चुनाव आयोग के सामने आपत्तियां रखनी होंगी। वरना भाजपा का ड्रामेबाजी वाला आरोप कांग्रेस के खिलाफ राजनीतिक हथियार बन सकता है। लेकिन भाजपा को भी यह नहीं भूलना चाहिए कि मतदाता सूची कोई राजनीतिक प्रचार का दस्तावेज नहीं, लोकतंत्र की बुनियाद है। किसी वास्तविक भारतीय मतदाता का नाम केवल प्रक्रिया की गड़बड़ी के कारण छूटता है तो उसका नुकसान किसी पार्टी को नहीं, लोकतंत्र को होता है। इसलिए एसआईआर को लेकर उठ रहे हर गंभीर सवाल का जवाब तथ्यों से देना जरूरी है। घुसपैठिया नहीं, जनता चुनेगी सरकारकृयह राजनीतिक नारा सुनने में प्रभावी हो सकता है, लेकिन लोकतंत्र की असली ताकत मतदाता की पहचान से आगे उसकी स्वतंत्र पसंद में है। मतदाता कौन है, यह कानून और चुनावी प्रक्रिया तय करेगी और किसे वोट देना है, यह जनता तय करेगी और यहीं 2027 की लड़ाई दिलचस्प होती जा रही है। भाजपा अपने संगठन और बूथ नेटवर्क के भरोसे कांग्रेस पर बढ़त का दावा कर रही है। कांग्रेस सत्ता विरोधी माहौल, बेरोजगारी, भर्ती विवाद, महंगाई, पलायन और स्थानीय मुद्दों को हथियार बनाने की कोशिश में है। लेकिन इन मुद्दों को वोट में बदलने के लिए कांग्रेस को बयानबाजी से कहीं आगे जाना होगा। कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा खतरा भाजपा नहीं, उसकी अपनी जमीनी निष्क्रियता है। यदि पार्टी के नेता राजधानी में एसआईआर पर रोज बयान देते रहें और गांव-कस्बे के बूथ पर कार्यकर्ता दिखाई न दे, तो राजनीति प्रेस नोट में जरूर जिंदा रह सकती है, चुनाव में नहीं। दूसरी ओर भाजपा यदि संगठन की ताकत के भरोसे यह मान ले कि चुनाव पहले ही जीत लिया गया है तो वह भी गलती करेगी। उत्तराखंड का मतदाता कई बार सत्ता को चौंकाने की क्षमता रखता है। पहाड़ के गांव से लेकर मैदानी शहर तक मतदाता अपने मुद्दों पर फैसला करता है और चुनाव के दिन राजनीतिक समीकरणों की सारी गणित बदल सकता है। इसलिए एसआईआर का मुद्दा सिर्फ कांग्रेस बनाम भाजपा की लड़ाई नहीं होना चाहिए। यह सवाल होना चाहिए कि किसका नाम मतदाता सूची में है, किसका नाम नहीं है और क्यों नहीं है। चुनावी शोर में यह बुनियादी सवाल दबना नहीं चाहिए। क्योंकि सरकार न भाजपा का मीडिया मैनेजमेंट चुनेगा, न कांग्रेस की प्रेस कांफ्रेंस। सरकार वही चुनेगा जिसके सामने आखिर में मतदाता अपना वोट डालेगा और उस मतदाता को घुसपैठिया कहकर नहीं, उसके अधिकार और भरोसे के साथ देखना होगा। 2027 की असली लड़ाई अभी शुरू हुई है। एसआईआर उसका एक अध्याय है। फैसला पूरी किताब पर होगा।

शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

udaydinmaan: गुलदार और भालू के बाद ‘नई आफत’

udaydinmaan: गुलदार और भालू के बाद ‘नई आफत’: पहाड़ों में खूंखार आवारा कुत्तों का कहर, गांवों और रास्तों पर बना दहशत का माहौल चमोली के नारायणबगड़ में हिंसक कुत्तों के डर से 10 स्कूलों में ...

गुलदार और भालू के बाद ‘नई आफत’

पहाड़ों में खूंखार आवारा कुत्तों का कहर, गांवों और रास्तों पर बना दहशत का माहौल चमोली के नारायणबगड़ में हिंसक कुत्तों के डर से 10 स्कूलों में 4 दिन का अवकाश घोषित स्कूल बंद होने के चलते अब घर बैठे आनलाइन माध्यम से पढ़ाई करने को मजबूर छात्र मीलों पैदल सफर तय कर स्कूल जाने वाले नौनिहालों और अभिभावकों की उड़ी रातों की नींद देहरादून। पहाड़ में वन्यजीवों के बाद अब आवारा और हिंसक कुत्तों का आतंक भी लोगों के लिए चिंता का सबब बनता जा रहा है। चमोली जिले के नारायणबगड़ क्षेत्र में आवारा और हिंसक कुत्तों के बढ़ते आतंक को देखते हुए प्रशासन ने स्कूली बच्चों की सुरक्षा के मद्देनजर बड़ा फैसला लिया है। क्षेत्र के दस विद्यालयों में 20 अगस्त से 23 अगस्त तक छात्र-छात्राओं के लिए अवकाश घोषित कर दिया गया है। इस दौरान विद्यालयों में ऑनलाइन माध्यम से पढ़ाई जारी रखने के निर्देश दिए गए हैं। पहाड़ के दूरदराज इलाकों में बच्चों का स्कूल तक पहुंचना पहले ही किसी चुनौती से कम नहीं है। कई बच्चे पैदल रास्तों से होकर विद्यालय पहुंचते हैं। ऐसे में रास्तों में हिंसक कुत्तों के झुंड का खतरा बच्चों और अभिभावकों की चिंता बढ़ा रहा है। प्रशासन को बच्चों की सुरक्षा के लिए स्कूल बंद करने जैसा कदम उठाना पड़ा, यह स्थिति की गंभीरता को दर्शाता है। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में कभी बाघ और गुलदार की दस्तक, कभी भालू का आतंक और अब आवारा कुत्तों के झुंड ग्रामीण आबादी के सामने नई चुनौती बनते जा रहे हैं। सवाल यह है कि जिन पहाड़ी क्षेत्रों में बच्चों को रोजाना कई किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल पहुंचना पड़ता है, वहां उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी आखिर किसकी है? नारायणबगड़ क्षेत्र में आवारा और हिंसक कुत्तों के आतंक को लेकर जिलाधिकारी चमोली की ओर से दिए गए निर्देशों के बाद मुख्य शिक्षा अधिकारी कार्यालय ने विद्यालयों के लिए आदेश जारी किया। आदेश में संबंधित विकासखंड शिक्षा अधिकारी और उप शिक्षा अधिकारी को इसका अनुपालन सुनिश्चित कराने के निर्देश दिए गए हैं। इसके साथ ही अवकाश की अवधि में संबंधित विद्यालयों के शिक्षकों को आनलाइन माध्यम से शिक्षण कार्य संचालित करने को कहा गया है, ताकि बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह प्रभावित न हो।इस संबंध में मुख्य शिक्षा अधिकारी, चमोली की ओर से जारी आदेश में कहा गया है कि नारायणबगड़ क्षेत्र में आवारा और हिंसक कुत्तों के अत्यधिक आतंक को देखते हुए जिलाधिकारी चमोली के निर्देशों के अनुपालन में छात्र-छात्राओं की सुरक्षा के दृष्टिगत यह निर्णय लिया गया है। आदेश के मुताबिक नारायणबगड़ क्षेत्र के राजकीय इंटर कालेज नारायणबगड़, राजकीय बालिका इंटर कालेज नारायणबगड़, सरस्वती शिशु मंदिर नारायणबगड़, उत्तरांचल विद्या निकेतन नारायणबगड़, राजकीय प्राथमिक विद्यालय नारायणबगड़, श्री गुरु राम राय पब्लिक स्कूल पैंती, राजकीय प्राथमिक विद्यालय नलंगाव, राजकीय इंटर कालेज नलंगाव, माडर्न चिल्ड्रन एकेडमी नारायणबगड़ और उत्तराखंड विद्या निकेतन नारायणबगड़ में यह आदेश लागू रहेगा। बाक्स वन्यजीवों के बाद आवारा कुत्तों का संकट उत्तराखंड में मानव-वन्यजीव संघर्ष लंबे समय से गंभीर समस्या बना हुआ है। पहाड़ के गांवों में बाघ, गुलदार और भालू की आवाजाही से ग्रामीणों में भय बना रहता है। अब कई क्षेत्रों में आवारा और हिंसक कुत्तों के झुंड भी लोगों की सुरक्षा के लिए चुनौती बन रहे हैं। नारायणबगड़ का ताजा मामला इस बात का संकेत है कि पहाड़ी क्षेत्रों में मानव सुरक्षा का संकट केवल जंगल से आने वाले वन्यजीवों तक सीमित नहीं रह गया है। सड़कों, बाजारों और आबादी के आसपास घूमने वाले आवारा कुत्ते भी प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती बन चुके हैं। चार दिन के लिए स्कूल बंद करने का फैसला बच्चों की सुरक्षा के लिहाज से तत्काल राहत जरूर है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि 23 अगस्त के बाद क्या होगा? यदि कुत्तों के आतंक पर स्थायी नियंत्रण नहीं हुआ तो बच्चों की पढ़ाई, अभिभावकों की चिंता और ग्रामीणों की सुरक्षा का सवाल फिर सामने खड़ा होगा। अब निगाह प्रशासन की अगली कार्रवाई पर है कि वह केवल स्कूल बंद करने तक सीमित रहता है या आवारा और हिंसक कुत्तों की समस्या के स्थायी समाधान के लिए ठोस कदम भी उठाता है।

‘एक्स्ट्रा इनकम’ का लाइसेंस

उत्तराखंड में डाक्टरों को भी जल्द ही मिलेगा शाम का बाजार मजबूरी से निकलकर एक्स्ट्रा इनकम बनी देशभर में अधिकार डाक्टरों की निजी प्रैक्टिस की छूट से व्यवस्था पर उठेंगे सवाल देहरादून। सरकारी नौकरी में तनख्वाह मिलती है। तनख्वाह के बदले कर्मचारी से उम्मीद की जाती है कि वह अपने पद की जिम्मेदारी ईमानदारी से निभाएगा। लेकिन धीरे-धीरे इस व्यवस्था में एक नया शब्द घुस आया हैकृएक्स्ट्रा इनकम। पहले यह शब्द फुसफुसाकर बोला जाता था। अब लगता है कि इसे व्यवस्था ने बाकायदा स्वीकार करना शुरू कर दिया है। पुलिस में ऊपर की कमाई की कहानियां पुरानी हैं। सरकारी दफ्तरों में फाइल आगे बढ़ाने की अपनी फीस है। कहीं काम कराने की कीमत है, कहीं काम रोकने की कीमत। कहीं ठेका है तो कहीं कमीशन। कहीं परमिट है तो कहीं सिफारिश। जनता को धीरे-धीरे समझा दिया गया कि सरकारी नौकरी की असली कमाई वेतन पर्ची में नहीं, उसके बाहर है और अब बेचारे डाक्टर भी बच गए थे। सरकार ने कहाकृउन्हें भी शाम को मरीज देखने दीजिए। खबर सुनकर शायद कोई कहेगा कि इसमें बुराई क्या है? डाक्टर हैं, मेहनत करेंगे, अतिरिक्त कमाई करेंगे। लेकिन असली सवाल यहीं से शुरू होता है। अगर सरकारी अस्पताल की नौकरी के बाद उसी सरकारी अस्पताल में निजी प्रैक्टिस होगी, तो मरीज सरकारी रहेगा या निजी? डाक्टर सरकारी रहेगा या निजी? अस्पताल सरकारी रहेगा या कमाई का साझा मंच? उत्तराखंड में सरकारी चिकित्सकों को शाम के समय सरकारी अस्पतालों में सशर्त निजी प्रैक्टिस की अनुमति देने की तैयारी है। यानी अब व्यवस्था का मॉडल कुछ ऐसा दिखाई दे रहा हैकृदिन में सरकार की नौकरी, शाम को उसी व्यवस्था में निजी कमाई। इसे सुविधा कहिए, सुधार कहिए या डाक्टरों को रोकने की कोशिश। लेकिन जनता का सवाल इससे खत्म नहीं होता। क्योंकि सरकारी अस्पताल में आने वाला गरीब मरीज यह सोचकर आता है कि यहां उसे निजी अस्पताल की तुलना में राहत मिलेगी। वह डाक्टर की फीस और अस्पताल के खर्च से बचने की उम्मीद लेकर आता है। अगर उसी सरकारी परिसर में निजी प्रैक्टिस का रास्ता खुलता है तो सबसे पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि सरकारी सेवा और निजी सेवा के बीच दीवार कहां होगी? कहीं ऐसा तो नहीं कि सरकारी व्यवस्था धीरे-धीरे ऐसी दुकान बन जाए जिसमें काउंटर दो होंकृएक सरकार के नाम पर और दूसरा निजी कमाई के नाम पर? यह सवाल डाक्टरों के खिलाफ नहीं है। बिल्कुल नहीं। डाक्टर मेहनत करते हैं, कठिन परिस्थितियों में काम करते हैं, दूरदराज के इलाकों में सेवाएं देते हैं। स्वास्थ्य विभाग में डाक्टरों की कमी भी वास्तविक समस्या है और सरकारी आंकड़ों में मेडिकल आफिसर और विशेषज्ञों के पदों पर रिक्तियां दर्ज हैं। लेकिन सवाल व्यवस्था का है। अगर डाक्टरों को रोकने के लिए उन्हें अतिरिक्त कमाई का रास्ता देना जरूरी हो गया है, तो अगला सवाल यह होना चाहिए कि पुलिस को क्या दिया जाएगा? फिर पटवारी क्यों पीछे रहे? फिर तहसील का कर्मचारी क्यों पीछे रहे? फिर वह क्लर्क क्यों पीछे रहे जिसकी मेज पर आपकी फाइल पड़ी है? फिर हर सरकारी विभाग में एक बोर्ड क्यों न लगा दिया जाए।कृसरकारी सेवा समय-सुबह से शाम तक और एक्स्ट्रा इनकम का समय-शाम के बाद। व्यंग्य लग रहा है? लेकिन खतरा यहीं है। जब व्यवस्था किसी अनौपचारिक एक्स्ट्रा इनकम को रोकने में असफल होती है, तो उसके सामने दो रास्ते होते हैं। पहलाकृभ्रष्टाचार और अनौपचारिक कमाई पर कठोर कार्रवाई। दूसराकृउसे किसी न किसी रूप में वैध या स्वीकार्य बनाने का रास्ता। दूसरा रास्ता आसान है। जनता भी धीरे-धीरे अभ्यस्त हो जाती है। पहले लोग कहते थेकृबिना पैसे काम नहीं होता। फिर कहने लगेकृसाहब की भी मजबूरी है। अब कहीं ऐसा न हो कि अगली पीढ़ी पूछेकृकि सरकारी नौकरी में एक्स्ट्रा इनकम कितनी है?यही असली खतरा है। सरकार को डाक्टरों के लिए अतिरिक्त कमाई का रास्ता खोलना है तो नियम इतने साफ होने चाहिए कि सरकारी सेवा की कीमत पर निजी कमाई का खेल न हो। मरीज को पहले यह अधिकार होना चाहिए कि उसे सरकारी अस्पताल में सरकारी सेवा किस कीमत पर और किस व्यवस्था में मिलेगी। क्योंकि सरकारी अस्पताल गरीब की मजबूरी नहीं, उसका अधिकार है। सरकारी डाक्टर सिर्फ एक कर्मचारी नहीं होता। वह राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था का चेहरा होता है। जिस डाक्टर को जनता अपने टैक्स से वेतन देती है, उससे जनता को यह उम्मीद भी होती है कि उसका इलाज प्राथमिकता होगा, न कि उसकी जेब और यही सवाल पुलिस और दूसरे विभागों पर भी लागू होता है। सरकारी नौकरी अगर सेवा है तो सेवा की कीमत वेतन है। अगर वेतन कम है तो वेतन बढ़ाइए। काम का दबाव ज्यादा है तो व्यवस्था सुधारिए। डाक्टरों की कमी है तो भर्ती कीजिए। अस्पतालों में सुविधाएं नहीं हैं तो सुविधाएं बढ़ाइए। लेकिन हर समस्या का समाधान एक्स्ट्रा इनकम क्यों बनता जा रहा है? कहीं ऐसा तो नहीं कि सरकार व्यवस्था सुधारने के बजाय व्यवस्था की कमियों को कमाई का अवसर बनाकर छोड़ रही है? जनता को सरकारी अस्पताल में इलाज चाहिए, सरकारी दफ्तर में काम चाहिए, पुलिस से सुरक्षा चाहिए और विभागों से जवाबदेही। उसे यह नहीं चाहिए कि हर सेवा के साथ कोई एक्स्ट्रा जुड़ा हुआ हो। क्योंकि जिस दिन सरकारी सेवा और निजी कमाई के बीच की रेखा मिट गई, उस दिन सबसे बड़ा नुकसान गरीब का होगा। फिर सरकारी अस्पताल अस्पताल नहीं रहेगा, सरकारी दफ्तर दफ्तर नहीं रहेगा और सरकारी नौकरी नौकरी नहीं रहेगीकृसब कुछ एक बाजार में बदल जाएगा और बाजार में सबसे कमजोर हमेशा वही होता है जिसके पास पैसे कम होते हैं। इसलिए सवाल डाक्टरों को अतिरिक्त कमाई की अनुमति देने से ज्यादा बड़ा है। क्या सरकार सरकारी व्यवस्था को मजबूत कर रही है या धीरे-धीरे जनता को यह समझा रही है कि हर सरकारी सेवा के पीछे एक एक्स्ट्रा देना सामान्य बात है? क्योंकि ‘एक्स्ट्रा इनकम’ की यह छोटी-सी दरार कल पूरी व्यवस्था की दीवार में बड़ा छेद बन सकती है।

आजादी के ‘महामंत्र’ पर राजनीति

वंदे मातरम के गायन पर आमने-सामने भाजपा और कांग्रेस पूरे गायन पर उठे सवाल और सियासत का बन गया नया केंद्र भाजपा ने बनाया हथियार, कांग्रेस की मंशा पर उठाए सवाल देहरादून। जिस देश की आजादी की लड़ाई में वंदे मातरम सिर्फ एक गीत नहीं, बल्कि अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ प्रतिरोध की आवाज बन गया था, उसी देश में इसके गायन को लेकर राजनीतिक विवाद खड़ा होना निश्चित तौर पर गंभीर सवाल पैदा करता है। कांग्रेस की ओर से कार्यक्रमों में वंदे मातरम के पूरे गायन को लेकर उठे सवालों ने भाजपा को कांग्रेस पर हमला करने का मौका दे दिया है। भाजपा इसे राष्ट्रभावना से जोड़कर कांग्रेस के खिलाफ राजनीतिक हथियार बना रही है, जबकि कांग्रेस की ओर से इसे राजनीतिक मुद्दा बनाए जाने पर सवाल उठाए जा रहे हैं। आजादी के आंदोलन के दौर में वंदे मातरम ने लोगों के भीतर राष्ट्रीय चेतना जगाने का काम किया। स्वतंत्रता सेनानियों के नारों में यह गूंजता था और ब्रिटिश शासन के विरोध का प्रतीक बन चुका था। ऐसे में इस गीत को लेकर किसी भी तरह का विवाद भावनात्मक रूप से देश के बड़े वर्ग को प्रभावित करता है। भाजपा का आरोप है कि कांग्रेस का रवैया राष्ट्रवादी प्रतीकों को लेकर हमेशा से दोहरा रहा है। पार्टी नेताओं का कहना है कि जिस वंदे मातरम को स्वतंत्रता सेनानियों ने अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष में अपनी आवाज बनाया, उसके गायन से कांग्रेस का पीछे हटना दुर्भाग्यपूर्ण है। भाजपा इस मुद्दे को कांग्रेस की कथित तुष्टीकरण की राजनीति से जोड़कर भी देख रही है। हालांकि इस पूरे विवाद का दूसरा पहलू भी है। वंदे मातरम के इतिहास, इसके विभिन्न पदों और स्वतंत्रता आंदोलन में इसकी भूमिका को समझे बिना इसे सिर्फ राजनीतिक नारे में बदल देना भी उचित नहीं होगा। राष्ट्रगीत का सम्मान और उसके राजनीतिक इस्तेमाल के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है। असल सवाल यह है कि क्या देशभक्ति का प्रमाण अब इस बात से तय होगा कि कौन कितना जोर से वंदे मातरम गाता है? अगर कोई दल या नेता इसके गायन को लेकर सवाल उठाता है तो उससे सवाल जरूर होना चाहिए। लेकिन इसी के साथ यह भी पूछा जाना चाहिए कि आजादी के आंदोलन के प्रतीकों का इस्तेमाल सिर्फ चुनावी राजनीति के लिए क्यों किया जा रहा है? वंदे मातरम् की ताकत उसकी धुन में नहीं, उस इतिहास में है जिसमें यह करोड़ों भारतीयों की आवाज बना था। इसलिए इसे राजनीतिक अखाड़े में खींचने के बजाय उसके ऐतिहासिक महत्व और राष्ट्रीय भावना का सम्मान किया जाना चाहिए। कांग्रेस के लिए भी यह राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील मामला है। अगर उसके किसी कार्यक्रम में राष्ट्रगीत के गायन को लेकर असमंजस या अनिच्छा दिखाई देती है तो पार्टी को देश के सामने अपना पक्ष साफ करना चाहिए। उसे यह स्पष्ट करना होगा कि क्या वह वंदे मातरम के सम्मान और उसके गायन के खिलाफ है या केवल उसके राजनीतिक इस्तेमाल का विरोध कर रही है। क्योंकि जनता के लिए संदेश महत्वपूर्ण है। जिस गीत को स्वतंत्रता आंदोलन में देश की आजादी के लिए संघर्ष कर रहे लोगों ने अपनी आवाज बनाया, उसके प्रति किसी भी राजनीतिक दल की असंवेदनशीलता सवालों के घेरे में आएगी। लेकिन भाजपा को भी यह समझना होगा कि राष्ट्रभक्ति किसी एक राजनीतिक दल की निजी संपत्ति नहीं है। वंदे मातरम किसी पार्टी का गीत नहीं, देश के स्वतंत्रता संघर्ष की ऐतिहासिक विरासत है। इसलिए इसे लेकर राजनीति जितनी कम होगी, सम्मान उतना ही ज्यादा रहेगा। देश को आज भी वंदे मातरम की जरूरत हैकृलेकिन राजनीतिक हथियार के रूप में नहीं, उस साझा राष्ट्रीय चेतना के प्रतीक के रूप में जिसने कभी अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती देने का साहस दिया था।

लोकतंत्र की पहली शर्त पर ‘पालिटिकल वार’

उत्तराखंड में मतदाता सूची पर बढ़ी रार, मतदाता सूची की शुद्धि पर गरमाई राजनीति वास्तविक मतदाताओं के नाम कटने का खतरा, कांग्रेस ने सत्यापन की उठाई मांग सूची की सफाई पर विरोध क्यों, भाजपा बोली फर्जी नामों को हटाना बेहद जरूरी देहरादून। लोकतंत्र की सबसे पहली शर्त है कि मतदाता सूची साफ हो, सही हो और उसमें वही नाम हों जो वास्तव में मतदान के पात्र हैं। लेकिन उत्तराखंड में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर सियासत लगातार गरमाती जा रही है। कांग्रेस इस प्रक्रिया पर सवाल उठा रही है, जबकि भाजपा इसे मतदाता सूची को शुद्ध करने की जरूरी कवायद बता रही है। सवाल अब यह उठ रहा है कि अगर एसआईआर का मकसद मतदाता सूची को अधिक पारदर्शी और त्रुटिरहित बनाना है तो कांग्रेस को इससे परेशानी क्यों हो रही है? कांग्रेस का तर्क है कि पुनरीक्षण की प्रक्रिया में वास्तविक मतदाताओं के नाम कटने का खतरा है और किसी भी पात्र नागरिक को मतदान के अधिकार से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। पार्टी लगातार मांग कर रही है कि प्रक्रिया पारदर्शी हो और प्रत्येक नाम हटाने से पहले उचित सत्यापन किया जाए। लेकिन भाजपा कांग्रेस के इस विरोध को राजनीतिक चश्मे से देख रही है। भाजपा नेताओं का सवाल है कि अगर मतदाता सूची में फर्जी, डुप्लीकेट या अपात्र नाम हैं तो उन्हें हटाने का विरोध क्यों? लोकतंत्र में मतदाता सूची जितनी साफ होगी, चुनाव उतने ही निष्पक्ष होंगे। यहीं से एसआईआर सिर्फ प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रह जाता, बल्कि राजनीतिक बहस का मुद्दा बन जाता है। कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर वह चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता की बात करती है तो उसे मतदाता सूची के शुद्धिकरण का सिद्धांततः विरोध क्यों करना चाहिए? उसे यह स्पष्ट करना होगा कि वह एसआईआर के खिलाफ है या उस तरीके के खिलाफ जिसमें एसआईआर को लागू किया जा रहा है। दूसरी तरफ सरकार और निर्वाचन तंत्र की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। सिर्फ यह कह देना पर्याप्त नहीं कि सूची शुद्ध की जा रही है। यह भी सुनिश्चित करना होगा कि वास्तविक मतदाता का नाम गलती से न कटे। खासकर पहाड़ी और दूरदराज के इलाकों में जहां पलायन, अस्थायी निवास और दस्तावेजों से जुड़े सवाल पहले से जटिल हैं, वहां विशेष सावधानी की जरूरत है। मतदाता सूची की शुचिता लोकतंत्र की बुनियाद है। इसमें फर्जी नाम नहीं होने चाहिए, लेकिन किसी वास्तविक नागरिक का नाम भी सिर्फ तकनीकी गलती से नहीं हटना चाहिए। कांग्रेस को बताना होगा कि उसे शुद्ध मतदाता सूची से परेशानी है या प्रक्रिया से और सरकार को बताना होगा कि वह शुद्धिकरण के नाम पर किसी वास्तविक मतदाता के अधिकार की रक्षा कैसे करेगी। आखिर चुनाव सिर्फ जीतने-हारने का खेल नहीं है। मतदाता सूची में दर्ज हर नाम लोकतंत्र में एक नागरिक की आवाज है। इसलिए एसआईआर पर राजनीति हो सकती है, लेकिन मतदाता के अधिकार से खिलवाड़ नहीं। 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के बीच मतदाता सूची पर उठते सवालों को हल्के में लेना किसी भी दल के लिए राजनीतिक रूप से भारी पड़ सकता है। कांग्रेस हो या भाजपाकृदोनों को याद रखना होगा कि लोकतंत्र में सबसे बड़ा वोट बैंक कोई पार्टी नहीं, खुद मतदाता है।

चुनावी रण से पहले ‘मीडिया मैनेजमेंट’ एक्टिव

भाजपा फुल एक्टिव, कांग्रेस सुस्त, बाकी दलों की आवाज कहां मीडिया मैनेजमेंट के मोर्चे पर भाजपा सबसे आगे, कांग्रेस है पीछे चुनाव से पहले कांग्रेस के पास मौके, लेकिन प्रचार मशीनरी बंद भाजपा चला रही विज्ञप्ति-बाण, कांग्रेस का संचार तंत्र अभी सुस्त देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की औपचारिक घोषणा भले अभी बाकी हो, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी तैयारियों का रिहर्सल शुरू कर दिया है। कहीं बूथ मजबूत किए जा रहे हैं, कहीं संगठन की बैठकें हो रही हैं और कहीं टिकट के दावेदार शक्ति प्रदर्शन में जुटे हैं। लेकिन इस पूरी चुनावी तैयारी में एक ऐसा मोर्चा भी है, जहां भाजपा फिलहाल बाकी दलों से काफी आगे दिखाई दे रही हैकृमीडिया मैनेजमेंट। अखबारों के न्यूजरूम तक पहुंचने वाली प्रेस विज्ञप्तियों पर नजर डालें तो तस्वीर काफी दिलचस्प है। भाजपा की ओर से एक दिन में पांच से दस तक विज्ञप्तियां पहुंच रही हैं। बयान, कार्यक्रम, संगठनात्मक बैठकें, सरकार की उपलब्धियां, विपक्ष पर हमले और स्थानीय गतिविधियांकृहर मुद्दे को मीडिया तक पहुंचाने की कोशिश दिखाई दे रही है। इसके उलट कांग्रेस की तरफ से कई दिनों में महज एक-दो विज्ञप्तियां ही पहुंचती हैं। पार्टी के पास मुद्दे हैं, नेता हैं, बयान हैं और सरकार को घेरने के मौके भी हैं, लेकिन उन्हें लगातार और व्यवस्थित तरीके से मीडिया तक पहुंचाने की मशीनरी उतनी सक्रिय नजर नहीं आती। चुनाव में यह अंतर सिर्फ प्रेस विज्ञप्तियों का नहीं, राजनीतिक संचार की तैयारी का संकेत है। भाजपा ने लंबे समय से यह समझ लिया है कि चुनाव सिर्फ मैदान में नहीं लड़ा जाता। चुनाव की लड़ाई अखबारों, टीवी चैनलों, डिजिटल प्लेटफार्म और सोशल मीडिया पर भी लड़ी जाती है। इसलिए पार्टी के पास संगठन के साथ-साथ संदेश पहुंचाने का तंत्र भी लगातार सक्रिय रहता है। एक कार्यक्रम हुआ नहीं कि तस्वीरें तैयार। नेता ने बयान दिया नहीं कि प्रेस नोट तैयार। सरकार ने कोई उपलब्धि गिनाई नहीं कि उसका प्रचार शुरू। विपक्ष ने कोई आरोप लगाया नहीं कि उसका जवाब भी तैयार। यानी भाजपा का संदेश हैकृखबर खत्म होने से पहले हमारी प्रतिक्रिया खबर में होनी चाहिए। इसके सामने कांग्रेस का मीडिया तंत्र कई बार ऐसा दिखाई देता है जैसे पार्टी को खबर बनने के बाद खबर याद आती हो। कांग्रेस के पास बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं, कानून-व्यवस्था, महंगाई, पलायन, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मुद्दों की कमी नहीं है। सरकार को घेरने के लिए उसके पास सामग्री की पूरी फाइल है। लेकिन सवाल यह है कि उस फाइल को रोज जनता तक पहुंचाने वाला कौन है? राजनीति में मुद्दा होना पर्याप्त नहीं है। मुद्दे को जनता की भाषा में लगातार सामने रखना भी पड़ता है। कांग्रेस अगर सप्ताह में एक-दो बार प्रेस नोट जारी करके यह मान ले कि उसने विपक्ष की भूमिका निभा दी, तो भाजपा की लगातार चलने वाली मीडिया मशीनरी के सामने उसका संदेश स्वाभाविक रूप से कमजोर पड़ेगा और बाकी दल? उनकी स्थिति तो और भी कठिन है। उत्तराखंड क्रांति दल राज्य की अस्मिता, मूल निवास और क्षेत्रीय मुद्दों की राजनीति को फिर से धार देने की कोशिश कर रहा है। आम आदमी पार्टी सरकार और विपक्ष दोनों पर सवाल उठा सकती है। बसपा का अपना सामाजिक आधार है। वाम दलों के पास मुद्दों की कमी नहीं। छोटे क्षेत्रीय और नए राजनीतिक समूह भी चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे हैं। लेकिन मीडिया में मौजूदगी के मामले में इनमें से अधिकांश दल या तो कभी-कभार दिखाई देते हैं या चुनाव के करीब आते ही सक्रिय होने की उम्मीद में बैठे हैं। यहीं सबसे बड़ा खतरा है। क्योंकि मीडिया कोई चुनावी लाउडस्पीकर नहीं है, जिसे मतदान से दो महीने पहले आन कर दिया जाए। जनता को लगातार बताना पड़ता है कि पार्टी क्या सोचती है, क्या चाहती है और सत्ता में आने पर क्या करेगी। भाजपा इस मोर्चे पर फिलहाल बाकी दलों से आगे है। लेकिन कांग्रेस के लिए यह स्थिति चेतावनी भी है और अवसर भी। अगर कांग्रेस सचमुच 2027 को गंभीरता से ले रही है तो उसे सिर्फ बड़े नेताओं के दौरों और प्रेस कान्फ्रेंस तक सीमित रहने के बजाय डेली मीडिया नैरेटिव बनाना होगा। हर दिन का एक मुद्दा, सरकार पर एक सवाल, जनता की एक समस्या और उसका राजनीतिक समाधानकृयह लगातार जनता तक जाना चाहिए। क्योंकि चुनाव में जनता को वही दिखाई देता है जो लगातार दिखाई देता है। यहां एक और दिलचस्प सवाल हैकृक्या मीडिया मैनेजमेंट चुनाव जिताता है? सिर्फ मीडिया मैनेजमेंट से चुनाव नहीं जीता जा सकता। लेकिन खराब मीडिया मैनेजमेंट चुनावी संदेश को जरूर कमजोर कर सकता है। भाजपा अगर रोज दस बातें जनता तक पहुंचा रही है और कांग्रेस रोज एक बात भी मुश्किल से पहुंचा रही है तो जनता के सामने किसकी मौजूदगी ज्यादा होगी, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है और छोटे दलों के लिए तो चुनौती और बड़ी है। उनके पास संसाधन कम हो सकते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उनके पास खबरें नहीं हैं। आज डिजिटल मीडिया, सोशल मीडिया, स्थानीय पत्रकारों और क्षेत्रीय मुद्दों के माध्यम से कम खर्च में भी मजबूत राजनीतिक संवाद बनाया जा सकता है। लेकिन उसके लिए चाहिएकृनियमितता, रणनीति और राजनीतिक संदेश की स्पष्टता। उत्तराखंड की राजनीति में 2027 की जमीन तैयार हो रही है। भाजपा संगठन और मीडिया दोनों स्तर पर पहले से सक्रिय दिखाई दे रही है। कांग्रेस सरकार विरोधी माहौल को राजनीतिक विकल्प में बदलने की कोशिश कर रही है, लेकिन उसके संदेश की निरंतरता सवालों में है। यूकेडी और दूसरे छोटे दल जनता के मुद्दे उठा रहे हैं, मगर उनकी आवाज का विस्तार सीमित है। आखिर चुनाव सिर्फ यह नहीं है कि कौन जनता के बीच गया। यह भी है कि कौन जनता के दिमाग में लगातार मौजूद रहा और मीडिया की इस लड़ाई में अभी तस्वीर साफ है।कृभाजपा रोज दस्तक दे रही है, कांग्रेस कभी-कभार दरवाजा खटखटा रही है और बाकी दल शायद यह इंतजार कर रहे हैं कि चुनाव की तारीख घोषित हो और दरवाजा अपने आप खुल जाए। लेकिन राजनीति में दरवाजे अपने आप नहीं खुलते, उन्हें रोज खटखटाना पड़ता है।

गुरुवार, 20 अगस्त 2026

udaydinmaan: भाजपा का ‘आपरेशन 2027’ शुरू

udaydinmaan: भाजपा का ‘आपरेशन 2027’ शुरू: 19 जिलों में भाजपा की नई तैनाती, चुनावी बिसात पर संगठन प्रभारी-सह प्रभारियों की नियुक्ति महज संगठन विस्तार ही नहीं विस चुनाव से पहले बूथ तक ...

भाजपा का ‘आपरेशन 2027’ शुरू

19 जिलों में भाजपा की नई तैनाती, चुनावी बिसात पर संगठन प्रभारी-सह प्रभारियों की नियुक्ति महज संगठन विस्तार ही नहीं विस चुनाव से पहले बूथ तक पकड़ मजबूत करने की कवायद देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के बीच भाजपा ने संगठन को चुनावी मोड में डालना शुरू कर दिया है। पार्टी ने प्रदेश के 19 सांगठनिक जिलों के लिए प्रभारी और सह प्रभारी नियुक्त कर दिए हैं। पहली नजर में यह सामान्य संगठनात्मक फेरबदल दिखाई दे सकता है, लेकिन चुनावी राजनीति के लिहाज से देखें तो भाजपा का यह कदम काफी महत्वपूर्ण है। पार्टी ने जिलों में ऐसे समय पर जिम्मेदारियां तय की हैं, जब चुनावी मैदान तैयार हो रहा है और टिकट से लेकर बूथ प्रबंधन तक हर स्तर पर राजनीतिक समीकरण तेजी से आकार ले रहे हैं। भाजपा की राजनीति में संगठन केवल चुनाव के समय सक्रिय होने वाला ढांचा नहीं है। बूथ से लेकर प्रदेश स्तर तक लगातार सक्रिय रहने वाला कैडर उसका सबसे बड़ा राजनीतिक हथियार माना जाता है। यही वजह है कि 19 सांगठनिक जिलों में प्रभारी और सह प्रभारियों की नियुक्ति को 2027 की चुनावी रणनीति की शुरुआती बड़ी कवायद के तौर पर देखा जा रहा है। उत्तराखंड की 70 विधानसभा सीटों का चुनाव केवल बड़े राजनीतिक नारों से नहीं जीता जाता। यहां पहाड़ और मैदान की अलग-अलग राजनीतिक जरूरतें हैं। कुमाऊं और गढ़वाल के भीतर भी क्षेत्रवार मुद्दे और जातीय-सामाजिक समीकरण अलग हैं। ऐसे में प्रदेश मुख्यालय से चुनावी रणनीति बनाने के बजाय उसे जिले और मंडल स्तर तक पहुंचाना भाजपा की प्राथमिकता होगी। नए प्रभारी और सह प्रभारी इसी काम की कड़ी होंगे। उनकी जिम्मेदारी केवल बैठकों तक सीमित नहीं रहेगी। संगठन की वास्तविक स्थिति, बूथ कमेटियों की सक्रियता, स्थानीय नेताओं के बीच तालमेल, सरकार की योजनाओं का प्रचार और जनता के बीच पार्टी की पकड़ जैसे मुद्दों पर भी नजर रखनी होगी। यानी भाजपा चुनाव आने से पहले ही यह जान लेना चाहती है कि कौन सा बूथ मजबूत है, कहां संगठन कमजोर है और कहां पार्टी के भीतर ही असंतोष चुनावी नुकसान का कारण बन सकता है। भाजपा के लिए 2027 का चुनाव केवल संगठन की परीक्षा नहीं है। प्रदेश की सरकार के कामकाज का भी जनमत संग्रह होगा। धामी सरकार डबल इंजन सरकार के विकास मॉडल को चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश करेगी। लेकिन विपक्ष बेरोजगारी, पलायन, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, आपदा प्रबंधन और युवाओं से जुड़े सवालों को लेकर सरकार को घेरने की तैयारी में है। ऐसे में जिला प्रभारियों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। उन्हें केवल पार्टी का पक्ष जनता तक पहुंचाना नहीं होगा, बल्कि जनता के सवालों और नाराजगी की रिपोर्ट भी ऊपर तक पहुंचानी होगी। क्योंकि चुनावी राजनीति में सबसे खतरनाक स्थिति वह होती है जब पार्टी के पास कागजों में मजबूत संगठन हो, लेकिन जमीन पर मतदाता उससे दूरी बनाने लगे। 2027 के चुनाव से पहले भाजपा के सामने एक और बड़ी चुनौती टिकट की होगी। हर विधानसभा क्षेत्र में संभावित दावेदार सक्रिय हो चुके हैं। कई पुराने चेहरे टिकट की उम्मीद लगाए बैठे हैं, तो नए नेता भी संगठन में अपनी पकड़ मजबूत करने में जुटे हैं। जिला प्रभारी और सह प्रभारी ऐसे समय में पार्टी के भीतर शक्ति संतुलन बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। उन्हें यह भी देखना होगा कि टिकट की होड़ संगठनात्मक गुटबाजी में न बदल जाए। क्योंकि भाजपा के लिए सबसे बड़ा खतरा विपक्ष से पहले अपनों की नाराजगी हो सकती है। टिकट कटने के बाद बगावत, भीतरघात या निर्दलीय मैदान में उतरने की स्थिति पार्टी के चुनावी गणित को बिगाड़ सकती है। भाजपा की यह कवायद कांग्रेस के लिए भी राजनीतिक संदेश है। कांग्रेस अभी संगठन को मजबूत करने और चुनावी चेहरे को लेकर अपनी रणनीति स्पष्ट करने में जुटी है। ऐसे में भाजपा यदि डेढ़ साल पहले ही जिलेवार संगठन की जिम्मेदारी तय कर रही है तो इसका अर्थ साफ हैकृपार्टी चुनाव को अंतिम छह महीने की लड़ाई नहीं मान रही। भाजपा चाहती है कि चुनाव की घोषणा होने से पहले ही उसका संगठन मतदाता तक पहुंच चुका हो। सरकार की उपलब्धियां बूथ तक पहुंचें, लाभार्थियों से संपर्क हो, स्थानीय मुद्दों की पहचान हो और कमजोर सीटों पर पहले से काम शुरू किया जाए। हालांकि भाजपा की संगठनात्मक ताकत किसी से छिपी नहीं है, लेकिन चुनाव केवल संगठन के दम पर नहीं जीते जाते। अंततः मतदाता यह तय करता है कि सरकार ने उसके जीवन में कितना बदलाव किया। 19 जिलों में प्रभारी-सह प्रभारी नियुक्त करना भाजपा की तैयारी का संकेत जरूर है, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि 2027 का चुनाव पार्टी के लिए आसान होगा। पहाड़ की नाराजगी, युवाओं के रोजगार के सवाल, सरकारी नौकरियों की भर्ती, पलायन, महिलाओं की सुरक्षा और महंगाई जैसे मुद्दे चुनावी हवा का रुख बदल सकते हैं। इसलिए भाजपा के सामने चुनौती सिर्फ संगठन खड़ा करने की नहीं, बल्कि संगठन को जनता की नब्ज पढ़ने वाली मशीन बनाने की है। 2027 की चुनावी बिसात पर भाजपा ने पहली बड़ी चाल चल दी है। अब देखना यह होगा कि जिला प्रभारी और सह प्रभारी पार्टी के लिए सिर्फ बैठकें और रिपोर्ट तैयार करते हैं या वास्तव में जमीन पर संगठन की कमजोर नसों को पकड़ पाते हैं। क्योंकि चुनाव बूथ पर लड़ा जाएगा, लेकिन उसका फैसला जनता के मन में होगा।

एसआईआर की सुनवाई में कांग्रेस की ‘निगरानी’

कांग्रेस पार्टी की हर दावे-आपत्ति पर नजर रखने की है तैयारी मतदाता सूची को लेकर चुनावी साल में बढ़ेगी सियासी तपिश एसआईआर में आपत्तियों के दौरान मौजूद रहेंगे कांग्रेस प्रतिनिधि देहरादून। उत्तराखंड में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर सियासी हलचल अब और तेज होने के आसार हैं। कांग्रेस ने संकेत दिया है कि एसआईआर के तहत होने वाली सुनवाई के दौरान वह अपने प्रतिनिधियों को मौजूद रखेगी। पार्टी का तर्क है कि मतदाता सूची से जुड़े दावे और आपत्तियों की प्रक्रिया में पारदर्शिता बनी रहे और किसी भी पात्र मतदाता का नाम प्रभावित न हो। कांग्रेस का यह फैसला ऐसे समय आया है जब प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियां धीरे-धीरे रफ्तार पकड़ रही हैं। चुनावी राजनीति में मतदाता सूची महज प्रशासनिक दस्तावेज नहीं, बल्कि पूरी चुनावी प्रक्रिया की बुनियाद होती है। ऐसे में एसआईआर की हर गतिविधि अब राजनीतिक दलों की निगाह में रहने वाली है। कांग्रेस की रणनीति साफ दिखाई दे रही है। पार्टी सुनवाई के दौरान अपने प्रतिनिधियों के जरिए यह देखने की कोशिश करेगी कि दावे और आपत्तियों पर निर्धारित नियमों के अनुसार कार्रवाई हो रही है या नहीं। कांग्रेस को आशंका है कि प्रक्रिया के दौरान यदि किसी पात्र मतदाता का नाम सूची से हटता है या किसी आपत्ति का निस्तारण पारदर्शी तरीके से नहीं होता, तो उसका सीधा असर आने वाले विधानसभा चुनाव पर पड़ सकता है। यही कारण है कि पार्टी अब केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित रहने के बजाय प्रक्रिया के स्तर पर निगरानी बढ़ाने की तैयारी में है। उत्तराखंड में एसआईआर अब सिर्फ प्रशासनिक कवायद नहीं रह गया है। इसके साथ राजनीतिक दलों की चिंता भी जुड़ गई है। चुनाव से पहले मतदाता सूची में होने वाला कोई भी बदलाव सीधे चुनावी गणित को प्रभावित कर सकता है। कांग्रेस पहले भी एसआईआर की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाती रही है। पार्टी की कोशिश है कि सुनवाई के दौरान उसके प्रतिनिधि मौजूद रहें और जरूरत पड़ने पर आपत्ति या शिकायत को संबंधित स्तर तक पहुंचाया जा सके। भाजपा की ओर से इस पर क्या रुख अपनाया जाता है, यह भी महत्वपूर्ण होगा। यदि सत्तारूढ़ दल और विपक्ष एसआईआर को लेकर आमने-सामने आते हैं तो मतदाता सूची आने वाले महीनों में उत्तराखंड की राजनीति का बड़ा मुद्दा बन सकती है। कांग्रेस के लिए यह फैसला केवल प्रशासनिक निगरानी का विषय नहीं है। यह उसके संगठन की जमीनी क्षमता की भी परीक्षा है। प्रतिनिधि नियुक्त करना आसान है, लेकिन उन्हें हर स्तर पर सक्रिय रखना बड़ी चुनौती होगी। उन्हें मतदाता सूची समझनी होगी, दावे-आपत्तियों की प्रक्रिया की जानकारी रखनी होगी और स्थानीय स्तर पर मतदाताओं के साथ संपर्क बनाए रखना होगा। यानी एसआईआर कांग्रेस के लिए संगठन को बूथ तक सक्रिय करने का अवसर भी बन सकता है। भाजपा लंबे समय से अपने बूथ संगठन को अपनी सबसे बड़ी ताकत बताती रही है। ऐसे में कांग्रेस यदि एसआईआर की सुनवाई में अपने प्रतिनिधियों को सक्रिय करती है तो भाजपा को भी अपने संगठन की सक्रियता बनाए रखनी होगी। 2027 के चुनाव में मुकाबला केवल चुनावी सभाओं और नारों का नहीं होगा। मतदाता सूची से लेकर बूथ प्रबंधन तक हर स्तर पर राजनीतिक दलों की तैयारियां निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं। एसआईआर की प्रक्रिया के दौरान यदि बड़ी संख्या में नाम हटने, जोड़ने या दावों-आपत्तियों को लेकर विवाद सामने आते हैं तो मामला राजनीतिक रंग ले सकता है। कांग्रेस इसे चुनावी पारदर्शिता का सवाल बनाएगी, जबकि भाजपा संभवतः प्रक्रिया को नियमों के तहत होने वाली सामान्य चुनावी कवायद बताएगी। लेकिन असली सवाल यह होगा कि अंतिम मतदाता सूची कितनी विश्वसनीय और स्वीकार्य बनती है। 2027 की चुनावी जंग अभी दूर है, लेकिन मतदाता सूची पर निगरानी की लड़ाई शुरू हो चुकी है। कांग्रेस ने सुनवाई में प्रतिनिधि उतारने का फैसला लेकर साफ कर दिया है कि वह एसआईआर को केवल सरकारी प्रक्रिया मानकर चुप बैठने वाली नहीं है। अब देखना होगा कि यह निगरानी लोकतांत्रिक पारदर्शिता तक सीमित रहती है या आने वाले दिनों में उत्तराखंड की सियासत का नया चुनावी रणक्षेत्र बन जाती है।

वोट की चोट के नारों से सत्ता में ‘खलबली’

सालों की मेहनत, कोचिंग का कर्ज और लगातार रद्द होती परीक्षाओं से सब्र का बांध टूटा नारों में बदला बेरोजगारों का आक्रोश, 2027 के सियासी समीकरण बिगाड़ने का अल्टीमेटम शहर-शहर मोदी के खिलाफ जनता का गुस्सा, युवाओं की नाराजगी बनी बड़ी चुनौती देहरादून/नई दिल्ली। सियासत में नाराजगी कोई नई चीज नहीं है। लेकिन जब नाराजगी सवाल पूछने लगे, जब सवाल नारे बन जाएं और नारे चुनावी बातचीत का हिस्सा बनने लगें, तब सत्ता को ठहरकर सुनना पड़ता है। आज देश के कई हिस्सों में युवाओं के बीच कुछ ऐसा ही माहौल दिखाई दे रहा है। सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाओं में गड़बड़ी और पेपर लीक जैसे मुद्दे लगातार चर्चा में हैं। कहीं युवा कह रहे हैंकृगलती से भी वोट नहीं देंगे। कहीं सरकार के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे हैं और कहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियों पर सवाल उठाते हुए युवाओं का गुस्सा खुलकर सामने आ रहा है। इस गुस्से को समझने के लिए सिर्फ राजनीतिक भाषण सुनना काफी नहीं होगा। उस युवा को सुनना होगा जो वर्षों से परीक्षा की तैयारी कर रहा है। वह परिवार सुनना होगा जिसने कोचिंग और रहने पर पैसा खर्च किया। वह अभ्यर्थी सुनना होगा जिसकी परीक्षा रद्द हो गई या जिसकी मेहनत पर प्रश्नपत्र लीक होने की खबर ने पानी फेर दिया। यही वह जगह है जहां पेपर लीक की राजनीति, बेरोजगारी की चिंता और चुनावी नाराजगी एक-दूसरे से जुड़ती दिखाई देती है। प्रधानमंत्री मोदी की ओर से राजनीतिक विरोधियों पर किए गए तीखे तंजों के बीच विपक्ष और सोशल मीडिया ने भी अपनी शब्दावली गढ़ ली है। काकरोच जनता पार्टी जैसा व्यंग्य इसी राजनीतिक भाषा की नई अभिव्यक्ति है। नाम चाहे जो हो, असली सवाल नाम का नहीं है। सवाल यह है कि जनता किसे वोट देगी और क्यों देगी? लोकतंत्र में चुनाव सिर्फ सरकार की उपलब्धियों का उत्सव नहीं होते। वह जनता की शिकायतों की सुनवाई भी होते हैं और जब युवा अपने अनुभवों को राजनीतिक सवाल में बदलने लगते हैं तो चुनावी समीकरणों में उसका असर पड़ना स्वाभाविक है। आज का युवा केवल यह नहीं पूछ रहा कि देश कितना आगे बढ़ा। वह यह भी पूछ रहा है कि मेरी नौकरी कहां है? मेरी परीक्षा सुरक्षित क्यों नहीं है? मेरी मेहनत की गारंटी कौन देगा? इन सवालों का जवाब किसी नारे से नहीं दिया जा सकता। पेपर लीक की घटनाओं ने प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता पर बड़ा सवाल खड़ा किया है। परीक्षा की तैयारी करने वाला युवा सिर्फ किताब नहीं पढ़ता। वह अपनी उम्र के कई साल उस परीक्षा के नाम कर देता है। जब परीक्षा व्यवस्था पर सवाल उठता है तो नुकसान सिर्फ एक परीक्षा का नहीं होता। नुकसान उस भरोसे का होता है जिसके आधार पर लाखों युवा अपने भविष्य की योजना बनाते हैं। यही वजह है कि पेपर लीक का मुद्दा अब विपक्ष के भाषणों से आगे निकलकर युवाओं की निजी जिंदगी का सवाल बन चुका है। सरकारें जांच की घोषणा कर सकती हैं। एजेंसियां जांच कर सकती हैं। गिरफ्तारियां हो सकती हैं। लेकिन जिस युवा ने दो-तीन साल तैयारी में लगाए, उसके समय का क्या? यही सवाल चुनावी राजनीति में सबसे ज्यादा असहज करने वाला हो सकता है। भाजपा की ताकत उसका संगठन है। उसका बूथ नेटवर्क है। उसका चुनावी प्रबंधन है। उसके पास प्रधानमंत्री मोदी का बड़ा राजनीतिक चेहरा है। लेकिन दूसरी तरफ एक ऐसा वर्ग भी है जिसे किसी राजनीतिक दल का स्थायी वोटर मान लेना खतरनाक होगाकृयुवा। यह युवा जाति, क्षेत्र और परंपरागत राजनीतिक पहचान से आगे जाकर रोजगार, परीक्षा, शिक्षा और अवसर की भाषा में सवाल पूछ रहा है। सोशल मीडिया ने इस गुस्से को और तेज कर दिया है। एक शहर में हुआ प्रदर्शन दूसरे शहर तक पहुंच जाता है। एक अभ्यर्थी का वीडियो हजारों युवाओं तक पहुंच जाता है। एक पेपर लीक की खबर देखते ही दूसरे राज्यों के युवा अपने अनुभव साझा करने लगते हैं। यानी पहले जिस नाराजगी को सत्ता स्थानीय घटना मानकर टाल सकती थी, वह अब कुछ ही घंटों में राष्ट्रीय राजनीतिक मुद्दा बन सकती है। शहरों की सड़कों पर दिखाई दे रहा गुस्सा अगर गांवों और कस्बों तक पहुंच गया, और युवाओं की नाराजगी मतदान के फैसले में बदल गई, तो 2027 की राजनीति में यह सिर्फ विपक्ष की कहानी नहीं होगीकृयह सत्ता के लिए सबसे बड़ा सवाल बन सकती है और सवाल वही रहेगाकृकि जिस युवा ने नौकरी के लिए अपनी जवानी लगाई, अगर वह सरकार से कहे कि अब वोट सोच-समझकर देंगे, तो क्या सत्ता उसकी आवाज सुनेगी? वोट नहीं देंगे से किसे देंगे तक का सवाल हालांकि चुनावी राजनीति का सबसे बड़ा सवाल अभी बाकी है। सरकार से नाराज होना और विपक्ष को वोट देनाकृदो अलग बातें हैं। अगर कोई युवा कहता है कि वह मौजूदा सरकार को वोट नहीं देगा, तो अगला सवाल होगाकृवह किसे वोट देगा?यही विपक्ष की असली परीक्षा है। सत्ता के खिलाफ गुस्सा पैदा करना आसान है। उस गुस्से को राजनीतिक विकल्प में बदलना कठिन है। युवाओं की नाराजगी को वोट में बदलने के लिए विपक्ष को सिर्फ मोदी विरोध से आगे जाना होगा। उसे रोजगार, परीक्षा सुधार, भर्ती कैलेंडर, पेपर लीक पर जवाबदेही और युवाओं के भविष्य का स्पष्ट रोडमैप देना होगा।वरना चुनाव के बाद यही गुस्सा फिर सोशल मीडिया पर लौट सकता है। चुनावी साल में सबसे बड़ा सवाल सियासत में अक्सर बड़े मुद्दों के बीच छोटे-छोटे सवाल दब जाते हैं। लेकिन कभी-कभी वही छोटे सवाल चुनाव का बड़ा मुद्दा बन जाते हैं। एक बेरोजगार युवक का सवाल। एक रद्द हुई परीक्षा का सवाल। एक पेपर लीक से टूटे भरोसे का सवाल। एक परिवार की आर्थिक चिंता का सवाल और फिर वह वाक्यकृगलती से भी वोट नहीं देंगे। यह वाक्य अपने आप में चुनाव का परिणाम नहीं बताता। लेकिन यह जरूर बताता है कि सत्ता के सामने सवाल खड़े हो चुके हैं। अब देखना यह है कि इन सवालों का जवाब भाषणों से दिया जाता है या नीतियों से। क्योंकि लोकतंत्र में जनता को हमेशा चुप नहीं कराया जा सकता। कभी-कभी जनता चुप रहती है, कभी सड़क पर आती है और कभी ईवीएम के सामने खड़ी होकर जवाब देती है।

उत्तराखंड कांग्रेस में ‘हलचल’

कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक में हरीश रावत शिरकत ने बढ़ाई सियासी हलचल लंबे राजनीतिक अनुभव के बल पर रावत एक बार फिर पार्टी में अपनी धमक नए नेतृत्व की चर्चाओं के बीच उनकी सक्रियता से समीकरण बदलने के आसार देहरादून। उत्तराखंड कांग्रेस की राजनीति में एक बार फिर पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की सक्रियता चर्चा में है। कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक में उनकी शिरकत ने प्रदेश की सियासत में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है। लंबे समय से उत्तराखंड की राजनीति में हरीश रावत की भूमिका को लेकर तरह-तरह के कयास लगाए जाते रहे हैं, ऐसे में पार्टी के शीर्ष मंच पर उनकी मौजूदगी को महज औपचारिकता मानने के बजाय राजनीतिक संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। हरीश रावत उत्तराखंड कांग्रेस के उन नेताओं में शामिल हैं जिनकी प्रदेश की राजनीति में अपनी अलग पहचान और व्यापक राजनीतिक अनुभव है। मुख्यमंत्री से लेकर केंद्रीय मंत्री तक की जिम्मेदारी संभाल चुके रावत लगातार प्रदेश की राजनीति में सक्रिय रहे हैं। हालांकि पिछले कुछ समय में कांग्रेस के भीतर नई पीढ़ी के नेतृत्व और संगठनात्मक बदलाव को लेकर जिस तरह की कवायद हुई है, उसमें रावत की सक्रियता को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। बैठक में उनकी मौजूदगी ने इन चर्चाओं को फिर हवा दे दी है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कांग्रेस हाईकमान उत्तराखंड की राजनीति में हरीश रावत के अनुभव का फिर से अधिक इस्तेमाल करने की तैयारी में है? 2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठन को एकजुट रखने और सत्ता विरोधी माहौल को अपने पक्ष में राजनीतिक वोट में बदलने की है। ऐसे में हरीश रावत जैसे अनुभवी नेता की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। रावत प्रदेश के राजनीतिक भूगोल, सामाजिक समीकरण और कांग्रेस संगठन की अंदरूनी राजनीति से लंबे समय से परिचित हैं। पहाड़ से लेकर मैदानी क्षेत्रों तक उनकी राजनीतिक पहुंच को पार्टी चुनावी रणनीति में इस्तेमाल करना चाहे तो यह कांग्रेस के लिए फायदेमंद हो सकता है। उत्तराखंड कांग्रेस में पिछले कुछ समय से नेतृत्व को लेकर कई स्तरों पर बदलाव देखने को मिले हैं। नई प्रदेश कार्यकारिणी, संगठन को मजबूत करने की कोशिश और आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच पार्टी को पुराने अनुभवी नेताओं और नए नेतृत्व के बीच संतुलन बनाना होगा। हरीश रावत की सक्रियता इसी संतुलन की राजनीति का हिस्सा मानी जा सकती है। हालांकि इसका यह अर्थ निकालना जल्दबाजी होगा कि रावत को कोई नई औपचारिक जिम्मेदारी मिलने जा रही है। लेकिन कांग्रेस की शीर्ष निर्णय लेने वाली संस्था की बैठक में उनकी भागीदारी यह जरूर बताती है कि पार्टी में उनका राजनीतिक महत्व पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। उत्तराखंड में अगला विधानसभा चुनाव कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए महत्वपूर्ण होगा। भाजपा जहां लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी की कोशिश करेगी, वहीं कांग्रेस सत्ता में लौटने के लिए मजबूत रणनीति बनाने में जुटी है। कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा सवाल केवल भाजपा विरोधी वोट को एकजुट करने का नहीं, बल्कि अपने भीतर के मतभेदों को नियंत्रित करने का भी है। प्रदेश कांग्रेस में अलग-अलग नेताओं के अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र हैं। ऐसे में हरीश रावत की भूमिका केवल चुनावी चेहरा होने तक सीमित नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर समन्वय कायम करने में भी महत्वपूर्ण हो सकती है। राजनीति में किसी वरिष्ठ नेता की एक बैठक में मौजूदगी को लेकर अंतिम निष्कर्ष निकालना ठीक नहीं होता। लेकिन चुनावी साल की ओर बढ़ते उत्तराखंड में हर राजनीतिक गतिविधि के अपने मायने होते हैं। हरीश रावत की बैठक में मौजूदगी ने कम से कम इतना संकेत जरूर दिया है कि पूर्व मुख्यमंत्री अभी राजनीतिक पारी के किनारे खड़े होकर सिर्फ घटनाक्रम देखने वाले नेता नहीं हैं। वे राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी की गतिविधियों में भागीदारी कर रहे हैं और उत्तराखंड के संदर्भ में उनकी राजनीतिक उपयोगिता भी बनी हुई है। अब नजर इस बात पर होगी कि कांग्रेस हाईकमान आगामी महीनों में रावत को किस भूमिका में देखता है। क्या उन्हें प्रदेश में चुनावी रणनीति की जिम्मेदारी दी जाएगी? क्या वह वरिष्ठ नेताओं के बीच समन्वय की भूमिका निभाएंगे? या फिर कांग्रेस उन्हें एक बड़े चुनावी अभियान के चेहरे के तौर पर इस्तेमाल करेगी? फिलहाल इतना तय है कि हरीश रावत की सक्रियता ने उत्तराखंड कांग्रेस की सियासत में पुराने समीकरणों की फाइल फिर खोल दी है। 2027 की चुनावी बिसात जैसे-जैसे बिछेगी, रावत की भूमिका भी उतनी ही ज्यादा चर्चा में आने की संभावना है।

गलती से भी वोट नहीं देंगे

शहर-शहर मोदी के खिलाफ गुस्सा, सड़क पर जनता सत्ता के खिलाफ नाराजगी ने बदली राजनीतिक भाषा प्रदर्शन और सोशल मीडिया के नारों में दिखाअसंतोष अब सवाल सिर्फ विरोध का नहीं, वोट के फैसले का देहरादून। देश की राजनीति में नाराजगी अक्सर भाषणों में दिखाई देती है, लेकिन जब यही नाराजगी सड़क पर उतरने लगे तो सत्ता के लिए सवाल थोड़ा कठिन हो जाता है। इन दिनों अलग-अलग मुद्दों को लेकर शहरों में हो रहे प्रदर्शन और सोशल मीडिया पर उभरते विरोध के बीच एक वाक्य तेजी से राजनीतिक चर्चा का हिस्सा बन रहा हैकृगलती से भी वोट नहीं देंगे। यह सिर्फ एक नारा है या बदलते जनमत का संकेत, इसका फैसला चुनाव में होगा। लेकिन इतना जरूर है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार को लेकर विपक्षी राजनीति का स्वर अब पहले से ज्यादा आक्रामक है। महंगाई, रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाओं की गड़बड़ियां, पेपर लीक और युवाओं के भविष्य जैसे मुद्दे इस नाराजगी को लगातार खाद-पानी दे रहे हैं। आज का राजनीतिक विरोध सिर्फ किसी पार्टी के कार्यालय या बड़ी रैली तक सीमित नहीं है। शहरों में छोटे-छोटे प्रदर्शन हो रहे हैं, युवा अपनी समस्याओं के साथ सामने आ रहे हैं और सोशल मीडिया पर सरकार से सीधे सवाल पूछे जा रहे हैं। एक समय था जब किसी आंदोलन की आवाज को स्थानीय बताकर नजरअंदाज किया जा सकता था। अब मोबाइल कैमरा उस आंदोलन को कुछ ही मिनटों में हजारों लोगों तक पहुंचा देता है। यही वजह है कि बेरोजगारी या परीक्षा व्यवस्था से जुड़ी किसी घटना का असर केवल संबंधित राज्य तक सीमित नहीं रहता। दूसरे राज्यों के युवा भी उसमें अपना भविष्य देखने लगते हैं। युवाओं के बीच सबसे बड़ा सवाल रोजगार का है। इसके साथ प्रतियोगी परीक्षाओं में गड़बड़ी और पेपर लीक जैसी घटनाओं ने भरोसे को चोट पहुंचाई है। एक अभ्यर्थी के लिए परीक्षा केवल परीक्षा नहीं होती। उसके पीछे वर्षों की तैयारी, परिवार का खर्च और भविष्य की उम्मीद जुड़ी होती है। जब परीक्षा प्रक्रिया सवालों में घिरती है तो गुस्सा सिर्फ व्यवस्था से नहीं, पूरी राजनीतिक व्यवस्था से होने लगता है। यही गुस्सा अब चुनावी सवाल में बदलने की कोशिश हो रही है। नौकरी चाहिए, भाषण नहीं। पेपर लीक बंद करो। भर्ती कैलेंडर दो। ऐसे सवालों का जवाब राजनीतिक नारों से देना मुश्किल है। प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता भारतीय राजनीति की बड़ी वास्तविकता है। भाजपा के चुनावी अभियानों का केंद्र भी लंबे समय से मोदी का चेहरा रहा है। ऐसे में उनके खिलाफ उठने वाली आवाज को हल्के में लेना भी संभव नहीं, लेकिन उसे पूरे देश की राय मान लेना भी जल्दबाजी होगी। सड़क पर विरोध करने वाला हर व्यक्ति विपक्ष का मतदाता हो, यह जरूरी नहीं। लेकिन राजनीति में संकेतों की अपनी अहमियत होती है। यदि सरकार के समर्थक वर्ग के भीतर भी रोजगार, परीक्षा और महंगाई जैसे मुद्दों पर सवाल बढ़ते हैं, तो यह सत्ता के लिए चेतावनी जरूर बन सकता है। यहां विपक्ष के सामने भी बड़ी चुनौती है। सिर्फ यह कहना कि जनता मोदी से नाराज है, पर्याप्त नहीं होगा। जनता पूछेगीकृतो विकल्प क्या है? युवा पूछेगा कि रोजगार पर आपकी नीति क्या है? परीक्षाओं को पारदर्शी बनाने के लिए क्या करेंगे? पेपर लीक रोकने की जिम्मेदारी किसकी होगी? सरकारी भर्तियां समय पर कैसे होंगी? यानी सत्ता से नाराजगी को वोट में बदलने के लिए विपक्ष को सिर्फ विरोध नहीं, भरोसे का विकल्प भी देना होगा। चुनाव अभी दूर हो सकते हैं, लेकिन राजनीति में माहौल पहले बनता है और मतदान बाद में होता है। आज का प्रदर्शन कल का वोट बनेगा, यह तय नहीं। लेकिन आज का सवाल कल के चुनावी मुद्दे में बदल सकता है। गलती से भी वोट नहीं देंगे कहने वाली भीड़ अगर मतदान के दिन भी उसी गुस्से के साथ खड़ी रही, तो सत्ता के लिए यह सामान्य विरोध नहीं रहेगा। क्योंकि लोकतंत्र में जनता पहले सवाल पूछती है, फिर बहस करती है और अंत में वोट के जरिए फैसला सुनाती है। फिलहाल शहरों की सड़कों पर जो आवाज सुनाई दे रही है, वह सत्ता को हटाने का फैसला नहीं है। मगर यह इतना जरूर कह रही है कि जनता को सिर्फ उपलब्धियों की सूची नहीं, अपने सवालों के जवाब भी चाहिए और चुनावी राजनीति में यही सवाल सबसे भारी पड़ते हैं कि नौकरी कहां है? परीक्षा सुरक्षित क्यों नहीं? महंगाई का बोझ कब घटेगा? और अगर जनता नाराज है, तो क्या सत्ता उसकी आवाज सुन रही है?

बुधवार, 19 अगस्त 2026

udaydinmaan: यूकेडी की 70 सीटों पर ‘अकेले’ हुंकार

udaydinmaan: यूकेडी की 70 सीटों पर ‘अकेले’ हुंकार: उत्तराखंड बचाओ यात्रा से अपनी चुनावी जमीन नापेगा यूकेडी यूकेडी के टिकट दावेदार दिखाएंगे अपने समर्थकों संग ताकत विधानसभा चुनाव से पहले यूकेडी...

यूकेडी की 70 सीटों पर ‘अकेले’ हुंकार

उत्तराखंड बचाओ यात्रा से अपनी चुनावी जमीन नापेगा यूकेडी यूकेडी के टिकट दावेदार दिखाएंगे अपने समर्थकों संग ताकत विधानसभा चुनाव से पहले यूकेडी ने तेज की सियासी सक्रियता यात्रा के जरिए संगठन व टिकट दावेदारों की ताकत को परखेगी देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में 2027 के विधानसभा चुनाव का माहौल धीरे-धीरे जमीन पर उतरने लगा है। भाजपा और कांग्रेस के साथ अब राज्य आंदोलन की राजनीतिक विरासत का दावा करने वाला उत्तराखंड क्रांति दल यानी यूकेडी भी अपनी चुनावी जमीन मजबूत करने में जुट गया है। पार्टी ने सभी 70 विधानसभा सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान किया है। ऐसे में प्रस्तावित उत्तराखंड बचाओ यात्रा को केवल जनसंपर्क अभियान नहीं, बल्कि आगामी चुनाव के लिए संगठन और संभावित प्रत्याशियों की ताकत परखने की कवायद के तौर पर भी देखा जा रहा है। यात्रा के दौरान यूकेडी के टिकट दावेदार अपने-अपने विधानसभा क्षेत्रों से समर्थकों को जुटाकर संगठन के सामने अपनी राजनीतिक पकड़ का प्रदर्शन कर सकते हैं। यानी यह यात्रा एक तरह से कौन कितना मजबूत का अनौपचारिक इम्तिहान भी बन सकती है। जिन दावेदारों के पीछे कार्यकर्ताओं और समर्थकों की भीड़ दिखाई देगी, वह पार्टी नेतृत्व के सामने अपनी दावेदारी को मजबूती से रखने की कोशिश करेंगे। यूकेडी के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल चुनाव लड़ना नहीं, बल्कि हर विधानसभा क्षेत्र में ऐसा संगठन खड़ा करना है जो मतदान तक सक्रिय रह सके। पार्टी यदि सभी 70 सीटों पर चुनाव लड़ने की रणनीति पर आगे बढ़ती है तो उसे बड़ी संख्या में मजबूत स्थानीय चेहरों की जरूरत होगी। यही वजह है कि संभावित प्रत्याशियों के लिए अब केवल पार्टी का टिकट मांगना पर्याप्त नहीं होगा। उन्हें यह भी साबित करना होगा कि उनके पास क्षेत्र में कार्यकर्ताओं का नेटवर्क, स्थानीय मुद्दों की पकड़ और चुनाव लड़ने की क्षमता है। यात्रा इसी शक्ति परीक्षण का मंच बन सकती है। किस विधानसभा क्षेत्र से कितने लोग यात्रा में पहुंचते हैं, कौन-सा दावेदार अपने साथ संगठन के कितने कार्यकर्ताओं को जोड़ पाता है और स्थानीय स्तर पर किस चेहरे को ज्यादा समर्थन मिलता हैकृइन सब पर पार्टी के भीतर स्वाभाविक रूप से नजर रहेगी। यूकेडी ने हाल के महीनों में अपने पुराने क्षेत्रीय मुद्दों को फिर से राजनीतिक केंद्र में लाने की कोशिश की है। मूल निवास, भू-कानून, जल-जंगल-जमीन, पलायन और उत्तराखंड की विशिष्ट पहचान जैसे सवाल पार्टी के एजेंडे में प्रमुख हैं। जून में पार्टी की बैठकों में भी मूल निवास और जल-जंगल-जमीन पर उत्तराखंडवासियों के अधिकार को प्रमुख मुद्दा बनाने पर जोर दिया गया था। अगस्त में यूकेडी ने संकल्प, नए उत्तराखंड का नाम से अपना नीतिगत एजेंडा जारी करते हुए अनुच्छेद 371 के तहत विशेष संवैधानिक प्रावधान, मूल निवास को कानूनी मान्यता, व्यापक भू-कानून, रोजगार और पलायन रोकने जैसे मुद्दों को प्राथमिकता दी। यानी उत्तराखंड बचाओ यात्रा के जरिए पार्टी कोशिश कर सकती है कि चुनावी बहस को केवल भाजपा बनाम कांग्रेस के द्वंद्व तक सीमित न रहने दिया जाए। यूकेडी के संभावित प्रत्याशियों के लिए यह यात्रा दोहरी परीक्षा होगी। एक तरफ उन्हें पार्टी के मुद्दों को जनता तक पहुंचाना होगा, दूसरी तरफ अपने क्षेत्र में अपनी व्यक्तिगत स्वीकार्यता भी दिखानी होगी। खासकर उन सीटों पर जहां कई नेता टिकट की दौड़ में हैं, वहां समर्थकों की मौजूदगी राजनीतिक संदेश देने का काम कर सकती है। लेकिन भीड़ को वोट में बदलना अलग चुनौती होगी। उत्तराखंड की राजनीति में कई बार बड़े जनसमूह और चुनावी परिणाम के बीच बड़ा अंतर देखने को मिला है। इसलिए पार्टी के सामने सवाल केवल भीड़ जुटाने का नहीं, बल्कि भीड़ को बूथ तक पहुंचाने वाले संगठन का है। 2027 का चुनाव यूकेडी के लिए राजनीतिक अस्तित्व और पुनर्स्थापना का बड़ा अवसर माना जा सकता है। राज्य गठन के आंदोलन से निकली पार्टी लंबे समय से विधानसभा में अपनी पुरानी राजनीतिक जमीन तलाश रही है। इस बार पार्टी जिस तरह 70 सीटों पर अकेले उतरने की बात कर रही है, उससे उसके सामने संभावनाओं के साथ जोखिम भी बढ़ गया है। दूसरी ओर, भाजपा सत्ता में वापसी की रणनीति पर काम कर रही है और कांग्रेस भी सत्ता परिवर्तन की तैयारी में है। ऐसे में यूकेडी को दोनों बड़े दलों के बीच अपनी अलग राजनीतिक जगह बनानी होगी। उत्तराखंड बचाओ यात्रा इसलिए सिर्फ एक राजनीतिक यात्रा नहीं, बल्कि यूकेडी के लिए अपनी ताकत, संगठन और संभावित प्रत्याशियों की परीक्षा भी बन सकती है। अब देखना यह होगा कि यात्रा खत्म होने के बाद पार्टी के पास सिर्फ तस्वीरों में दिखाई देने वाली भीड़ होगी या फिर विधानसभा क्षेत्रों में खड़ा होने वाला ऐसा संगठन भी, जो 2027 के चुनावी मैदान में मुकाबला कर सके। क्योंकि चुनाव में नारा भीड़ जुटाता है, लेकिन बूथ ही वोट जुटाता है।

भाजपा ने सजाई ‘हैट्रिक’ की फील्डिंग

2027 में चुनावी हैट्रिक का संकल्प, भाजपा ने कसी कमर गढ़वाल संभाग की बैठक में सांसद-विधायकों को टास्क भाजपा ने अपनी संगठनात्मक रणनीति को दी अंतिम धार बूथ से लेकर विधानसभा तक सक्रियता बढ़ाने की तैयारी देहरादून। उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव की सियासी उलटी गिनती के बीच भाजपा ने अपनी चुनावी मशीनरी को पूरी तरह सक्रिय करने की दिशा में बड़ा कदम बढ़ाया है। गढ़वाल संभाग की संगठनात्मक बैठक में सांसदों, विधायकों और पार्टी पदाधिकारियों ने आगामी विधानसभा चुनाव की रणनीति पर मंथन किया। बैठक का केंद्रीय संदेश साफ रहाकृ2027 में लगातार तीसरी बार सत्ता हासिल कर चुनावी हैट्रिक लगानी है। भाजपा के लिए यह बैठक महज संगठनात्मक समीक्षा नहीं, बल्कि चुनावी तैयारी की जमीन पर अंतिम रूपरेखा तय करने की कवायद के तौर पर देखी जा रही है। पार्टी अब सरकार के कामकाज को जनता तक पहुंचाने के साथ-साथ बूथ स्तर पर संगठन को और मजबूत करने, कमजोर क्षेत्रों को चिन्हित करने तथा कार्यकर्ताओं को चुनावी मोड में लाने पर जोर दे रही है। गढ़वाल संभाग की बैठक में सांसदों और विधायकों की मौजूदगी ने इसे और महत्वपूर्ण बना दिया। पार्टी नेतृत्व की कोशिश है कि जनप्रतिनिधियों और संगठन के बीच बेहतर तालमेल बनाया जाए। चुनावी साल में यह तालमेल इसलिए भी अहम है क्योंकि भाजपा की चुनावी रणनीति केवल प्रत्याशियों के भरोसे नहीं, बल्कि बूथ स्तर तक फैले संगठन पर टिकी होती है। सांसदों और विधायकों को अपने-अपने क्षेत्रों में संगठन के साथ लगातार संवाद बनाए रखने, कार्यकर्ताओं की सक्रियता बढ़ाने और सरकार की योजनाओं को जनता तक पहुंचाने पर जोर दिया गया। साथ ही ऐसे क्षेत्रों की पहचान पर भी ध्यान है जहां पार्टी को चुनावी दृष्टि से अतिरिक्त मेहनत की जरूरत पड़ सकती है। भाजपा 2027 में सत्ता की हैट्रिक का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रही है। राज्य गठन के बाद उत्तराखंड की राजनीति में सत्ता परिवर्तन की परंपरा रही है। ऐसे में लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटना भाजपा के लिए केवल चुनाव जीतने का लक्ष्य नहीं, बल्कि राज्य की स्थापित राजनीतिक प्रवृत्ति को बदलने की चुनौती भी है। भाजपा लगातार दो विधानसभा चुनाव जीत चुकी है। अब पार्टी की नजर तीसरी जीत पर है। इसके लिए संगठन को सरकार के कामकाज, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की राजनीतिक लोकप्रियता के साथ स्थानीय स्तर पर संगठन की पकड़ को चुनावी ताकत में बदलना होगा। भाजपा की रणनीति में एक तरफ सरकार की उपलब्धियों को चुनावी मुद्दा बनाने की तैयारी है तो दूसरी तरफ संगठन को विपक्ष के हमलों का जवाब देने के लिए तैयार किया जा रहा है। सड़क, चारधाम यात्रा, पर्यटन, महिला सशक्तीकरण, रोजगार, निवेश, समान नागरिक संहिता और राज्य से जुड़े विकास कार्यों को लेकर सरकार की उपलब्धियां जनता तक पहुंचाने की कोशिश होगी। इसके साथ ही कांग्रेस के संभावित चुनावी मुद्दों और सरकार विरोधी माहौल को लेकर भी पार्टी संगठन को सक्रिय किया जा रहा है। लेकिन भाजपा के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि सरकार की उपलब्धियों का संदेश बूथ तक कितनी मजबूती से पहुंचता है। 2027 के चुनाव में भाजपा की रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा कमजोर बूथ और कमजोर विधानसभा क्षेत्रों की पहचान हो सकता है, जिन बूथों पर पिछले चुनावों में पार्टी का प्रदर्शन अपेक्षाकृत कमजोर रहा, वहां संगठनात्मक गतिविधियां बढ़ाने की योजना पर काम किया जा रहा है। पार्टी के लिए बूथ स्तर पर पन्ना प्रमुख से लेकर मंडल और विधानसभा स्तर तक जिम्मेदारियों को सक्रिय रखना महत्वपूर्ण होगा। यही भाजपा का वह संगठनात्मक माडल है जिसने उसे लगातार चुनावी सफलता दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भाजपा के चुनावी मोड में आने के साथ कांग्रेस पर भी दबाव बढ़ना स्वाभाविक है। विपक्ष पहले ही सरकार को महंगाई, बेरोजगारी, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और आपदा प्रबंधन जैसे मुद्दों पर घेरने की तैयारी में है। ऐसे में भाजपा की रणनीति केवल अपनी उपलब्धियां गिनाने तक सीमित नहीं रहने वाली। पार्टी को विपक्ष के आरोपों का जवाब देने के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर नाराजगी और असंतोष को भी संभालना होगा। खासकर टिकट के दावेदारों और मौजूदा विधायकों के बीच तालमेल चुनाव से पहले पार्टी के लिए महत्वपूर्ण चुनौती होगी। संगठन की बैठकों के जरिए इसी तरह के संभावित अंतर्विरोधों को समय रहते नियंत्रित करने की कोशिश की जा रही है। उत्तराखंड का अगला विधानसभा चुनाव केवल भाजपा और कांग्रेस के बीच चेहरे और मुद्दों की लड़ाई नहीं होगा। यह दोनों दलों के संगठनात्मक नेटवर्क की भी परीक्षा होगी। भाजपा के पास मजबूत कैडर और बूथ नेटवर्क की ताकत है, जबकि कांग्रेस सत्ता विरोधी माहौल को अपने पक्ष में करने की रणनीति पर काम कर रही है। इसके अलावा क्षेत्रीय दलों और छोटे राजनीतिक समूहों की सक्रियता भी चुनावी समीकरण प्रभावित कर सकती है। ऐसे में गढ़वाल संभाग की बैठक से भाजपा ने एक संदेश जरूर दिया हैकृ2027 का चुनाव अभी दूर नहीं है और पार्टी अब चुनावी तैयारी को टालने के मूड में नहीं है। अब असली परीक्षा बैठक में बने संकल्प को जमीन पर उतारने की है। सांसद-विधायक से लेकर मंडल अध्यक्ष और बूथ कार्यकर्ता तक यदि एक ही चुनावी रणनीति पर सक्रिय हो जाते हैं तो भाजपा की हैट्रिक की राह मजबूत हो सकती है। लेकिन यदि स्थानीय नाराजगी, टिकट की खींचतान और सरकार विरोधी मुद्दे संगठन की ताकत पर भारी पड़े, तो यही चुनाव भाजपा के लिए सबसे कठिन परीक्षा भी बन सकता है।

कांग्रेस ने की भाजपा की ‘घेराबंदी’

अंकिता भंडारी को साढ़े तीन साल बाद भी न्याय नहीं राहुल गांधी से मुलाकात के बाद भाजपा में है घबराहट युवा आयोग के गठन को कांग्रेस ने बताया डैमेज कंट्रोल देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले अंकिता भंडारी हत्याकांड, बेरोजगारी और युवाओं के मुद्दे एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में आते दिखाई दे रहे हैं। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने भाजपा सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि अंकिता भंडारी को साढ़े तीन साल बाद भी न्याय नहीं मिला है। उन्होंने आरोप लगाया कि राहुल गांधी से उत्तराखंड के युवाओं की मुलाकात के बाद भाजपा सरकार में बेचौनी दिखाई देने लगी है और अब युवा आयोग का गठन इसी घबराहट में किया गया कदम है। गोदियाल ने कहा कि यदि सरकार वास्तव में युवाओं की समस्याओं को लेकर गंभीर है तो उसे पहले उन युवाओं से माफी मांगनी चाहिए, जिन पर आंदोलन के दौरान लाठीचार्ज हुआ और मुकदमे दर्ज किए गए। कांग्रेस नेता ने युवा आयोग के गठन को युवाओं के आक्रोश को शांत करने की कोशिश बताते हुए कहा कि केवल आयोग बना देने से युवाओं के सवाल खत्म नहीं होंगे। कांग्रेस के लिए उत्तराखंड में युवाओं के मुद्दे को राजनीतिक रूप से धार देने का एक बड़ा अवसर राहुल गांधी के साथ बेरोजगार युवाओं की मुलाकात को माना जा रहा है। कांग्रेस का दावा है कि युवाओं ने रोजगार, भर्ती परीक्षाओं और प्रदेश में रोजगार के अवसरों से जुड़े सवाल सीधे राहुल गांधी के सामने रखे। इसके बाद भाजपा सरकार की ओर से युवाओं को लेकर उठाए गए कदमों को कांग्रेस राजनीतिक दबाव का परिणाम बता रही है। गोदियाल के आरोपों का राजनीतिक अर्थ यही है कि कांग्रेस 2027 के चुनाव में युवा मतदाताओं को एक बड़े चुनावी समूह के रूप में देख रही है। भाजपा लगातार अपने संगठन और सरकार की उपलब्धियों के सहारे चुनावी तैयारी में जुटी है, वहीं कांग्रेस बेरोजगारी और भर्ती परीक्षाओं के मुद्दे को सत्ता विरोधी भावना से जोड़ने की कोशिश कर रही है। उत्तराखंड में अंकिता भंडारी हत्याकांड भावनात्मक और राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील मुद्दा रहा है। कांग्रेस लगातार इस मामले में न्याय की मांग उठाती रही है। गोदियाल ने कहा कि जिस बेटी के मामले ने पूरे उत्तराखंड को झकझोर दिया, उसके परिवार को न्याय मिलने में देरी सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करती है। कांग्रेस इसे केवल एक आपराधिक मामला नहीं, बल्कि उत्तराखंड की बेटियों की सुरक्षा और सम्मान से जुड़ा सवाल बनाकर उठाती रही है। 2027 के चुनाव में इस मुद्दे का प्रभाव कितना होगा, यह आने वाला समय बताएगा, लेकिन कांग्रेस इसे भाजपा सरकार के खिलाफ अपने राजनीतिक नैरेटिव का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाने की कोशिश कर रही है। भाजपा सरकार द्वारा युवा आयोग के गठन की कवायद को कांग्रेस ने सकारात्मक पहल मानने के बजाय सवालों के घेरे में रखा है। कांग्रेस का कहना है कि युवाओं को आयोग नहीं, रोजगार और पारदर्शी भर्ती व्यवस्था चाहिए। पार्टी की दलील है कि यदि भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता हो, परीक्षाएं समय पर हों, रिक्त पदों पर नियुक्तियां हों और युवाओं की आवाज सरकार तक पहुंचे तो अलग से राजनीतिक डैमेज कंट्रोल की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। कांग्रेस का हमला सीधे सरकार की नीयत और नीति दोनों पर है। गोदियाल का सबसे तीखा राजनीतिक संदेश उन युवाओं को लेकर है जो विभिन्न आंदोलनों में सड़कों पर उतरे थे। उनका कहना है कि सरकार को पहले यह स्वीकार करना चाहिए कि युवाओं के आंदोलनों से निपटने में कठोर रवैया अपनाया गया।लाठीचार्ज और मुकदमों का मुद्दा कांग्रेस पहले भी उठाती रही है। अब पार्टी इसे युवा आयोग के मुद्दे के साथ जोड़कर सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस का सवाल हैकृजिस युवा को अपने हक की आवाज उठाने पर मुकदमा झेलना पड़ा, क्या आयोग बनने के बाद उसका मुकदमा खत्म हो जाएगा? जिस युवा पर लाठी चली, क्या सरकार उससे माफी मांगेगी? उत्तराखंड की राजनीति में युवा मतदाता हमेशा महत्वपूर्ण रहे हैं। लेकिन बेरोजगारी और भर्ती परीक्षाओं से जुड़े विवादों ने इस वर्ग की राजनीतिक चेतना को और मुखर किया है। भाजपा के सामने चुनौती यह है कि वह अपने विकास और रोजगार के दावों को युवाओं के अनुभव से कैसे जोड़ती है। कांग्रेस की चुनौती भी कम नहीं है। केवल सरकार पर आरोप लगाकर युवा मतदाताओं का भरोसा हासिल करना आसान नहीं होगा। युवाओं को ठोस रोजगार नीति, पारदर्शी भर्ती व्यवस्था और स्थानीय स्तर पर अवसर चाहिए। चुनावी घोषणाओं से ज्यादा उनकी नजर इस बात पर होगी कि कौन-सा दल इन समस्याओं का व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत करता है। अंकिता भंडारी से लेकर बेरोजगारी तक कांग्रेस जिस तरह मुद्दों को जोड़ रही है, उससे साफ है कि 2027 की चुनावी लड़ाई केवल सत्ता परिवर्तन बनाम सत्ता वापसी तक सीमित नहीं रहने वाली। भाजपा जहां संगठन की ताकत और सरकार की उपलब्धियों के साथ मैदान में उतरने की तैयारी कर रही है, वहीं कांग्रेस कोशिश कर रही है कि युवाओं, महिलाओं और सरकार से नाराज वर्गों को एक साझा राजनीतिक मंच दिया जाए। गोदियाल का बयान इसी रणनीति का हिस्सा माना जा सकता है। अब भाजपा के सामने सवाल है कि वह कांग्रेस के इन हमलों का जवाब राजनीतिक बयानबाजी से देती है या युवाओं के सवालों पर ठोस कार्रवाई करके। क्योंकि 2027 में युवा केवल भाषण नहीं सुनेंगेकृवह अपने अनुभव का हिसाब भी मांगेंगे।

मंगलवार, 18 अगस्त 2026

udaydinmaan: पहाड़ से सत्ता की नई पटकथा

udaydinmaan: पहाड़ से सत्ता की नई पटकथा: भारतीय जनता पार्टी के लिए पौड़ी जनपद बन गया है पावर सेंटर गढ़वाल का केंद्र पौड़ी फिर सियासी भविष्य तय करने का आधार राजनीतिक हलचल आगामी विधानसभ...

पहाड़ से सत्ता की नई पटकथा

भारतीय जनता पार्टी के लिए पौड़ी जनपद बन गया है पावर सेंटर गढ़वाल का केंद्र पौड़ी फिर सियासी भविष्य तय करने का आधार राजनीतिक हलचल आगामी विधानसभा चुनाव की दिशा तय करेगी देहरादून। उत्तराखंड की सियासत में पौड़ी एक बार फिर राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में उभरता दिखाई दे रहा है। भाजपा की संगठनात्मक गतिविधियों, नेताओं की सक्रियता और पहाड़ की राजनीति को लेकर बन रही रणनीतियों के बीच पौड़ी पर सियासी निगाहें टिक गई हैं। सवाल यह है कि क्या आने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा पौड़ी को केवल एक लोकसभा क्षेत्र या राजनीतिक भूगोल के रूप में देख रही है, या फिर इसे पहाड़ की सत्ता-सियासत के नए पावर सेंटर के तौर पर विकसित किया जा रहा है? पौड़ी का राजनीतिक महत्व केवल इसलिए नहीं है कि यह गढ़वाल की राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। उत्तराखंड की राजनीति में पौड़ी लंबे समय से नेतृत्व की प्रयोगशाला भी रहा है। यहां से निकले कई चेहरे प्रदेश की राजनीति को प्रभावित करते रहे हैं। यही वजह है कि जब भाजपा पहाड़ में अपने संगठन को मजबूत करने और 2027 के विधानसभा चुनाव की जमीन तैयार करने में जुटी है, तब पौड़ी की गतिविधियां अपने आप में राजनीतिक संकेत देने लगी हैं। भाजपा की राजनीति में संगठन सबसे महत्वपूर्ण हथियार माना जाता है। बूथ से लेकर मंडल और जिला स्तर तक संगठन को मजबूत करने की कवायद लगातार चल रही है। पौड़ी में भी पार्टी की गतिविधियों को इसी नजर से देखा जा रहा है। पार्टी के लिए चुनौती केवल सत्ता विरोधी माहौल को संभालना नहीं है, बल्कि पहाड़ के उन सवालों का राजनीतिक जवाब तलाशना भी है, जो पिछले कुछ वर्षों में लगातार चर्चा में रहे हैं। पलायन, रोजगार, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, वन अधिकार और स्थानीय युवाओं के अवसर जैसे मुद्दे भाजपा के लिए चुनावी परीक्षा बन सकते हैं। ऐसे में पौड़ी को मजबूत करना गढ़वाल की कई विधानसभा सीटों के राजनीतिक समीकरणों को साधने की रणनीति का हिस्सा माना जा सकता है। पौड़ी की राजनीतिक सक्रियता का एक दूसरा पहलू नेतृत्व से जुड़ा है। उत्तराखंड की राजनीति में गढ़वाल और कुमाऊं के बीच संतुलन हमेशा महत्वपूर्ण रहा है। भाजपा के भीतर भी अलग-अलग क्षेत्रों से आने वाले नेताओं की राजनीतिक भूमिका समय-समय पर चर्चा में रहती है। पौड़ी अगर पार्टी के लिए रणनीतिक केंद्र बनता है तो इसका असर केवल स्थानीय राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा। इससे गढ़वाल क्षेत्र में टिकट वितरण, संगठनात्मक जिम्मेदारियों और चुनावी नेतृत्व को लेकर भी संकेत निकल सकते हैं। यही कारण है कि पौड़ी की हर राजनीतिक हलचल को अब केवल स्थानीय घटना मानकर नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा। विधानसभा चुनाव में अभी समय है, लेकिन उत्तराखंड की राजनीति में चुनावी तैयारी जल्दी शुरू हो जाती है। भाजपा के सामने 2027 में लगातार सत्ता में बने रहने की चुनौती होगी। ऐसे में पार्टी को पहाड़ में अपनी पकड़ बनाए रखने के साथ-साथ उन इलाकों में भी सक्रियता बढ़ानी होगी जहां जनता स्थानीय मुद्दों पर ज्यादा मुखर है। पौड़ी इस लिहाज से एक महत्वपूर्ण ट्रायल ग्राउंड बन सकता है। पार्टी यदि यहां संगठन, जनसंपर्क और स्थानीय मुद्दों के बीच बेहतर तालमेल बनाने में सफल होती है तो इसका माडल गढ़वाल के दूसरे हिस्सों में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। लेकिन दूसरी तरफ विपक्ष भी इस सक्रियता को केवल संगठनात्मक कवायद के रूप में नहीं देखेगा। कांग्रेस समेत अन्य दल भाजपा के इस राजनीतिक विस्तार की काट तलाशने में जुटेंगे। पौड़ी की राजनीति का सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या संगठनात्मक ताकत को जमीन के सवालों से जोड़ा जा सकेगा? पौड़ी और पूरे पहाड़ में राजनीतिक चर्चा का केंद्र केवल पार्टी नहीं है। गांवों से पलायन, खाली होते खेत, युवाओं के रोजगार, सरकारी स्कूलों की स्थिति, अस्पतालों में सुविधाओं की कमी और सड़क-संचार की समस्याएं आज भी जनता के बीच महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। यदि भाजपा पौड़ी को पावर सेंटर बनाती है तो उसे इन सवालों के जवाब भी देने होंगे। केवल बैठकों और राजनीतिक कार्यक्रमों से चुनावी जमीन तैयार नहीं होती। जमीन तब तैयार होती है जब जनता को लगता है कि उसकी आवाज सत्ता के गलियारों तक पहुंच रही है। भाजपा की बढ़ती सक्रियता कांग्रेस के लिए भी चुनौती है। कांग्रेस यदि पौड़ी और गढ़वाल में अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करना चाहती है तो उसे केवल भाजपा विरोध के भरोसे आगे बढ़ना मुश्किल होगा। उसे स्थानीय नेतृत्व, मुद्दों और संगठनकृतीनों मोर्चों पर सक्रिय होना पड़ेगा। यही वजह है कि पौड़ी आने वाले महीनों में राजनीतिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है। भाजपा इसे संगठन की मजबूती के लिए इस्तेमाल करती है या चुनावी रणनीति के केंद्रीय मंच के रूप में विकसित करती है, यह देखने वाली बात होगी। फिलहाल इतना साफ है कि पौड़ी की पहाड़ियों में सिर्फ मौसम नहीं बदल रहा, सियासत का तापमान भी बढ़ रहा है। 2027 की लड़ाई जैसे-जैसे करीब आएगी, पौड़ी का राजनीतिक महत्व और बढ़ सकता है। सवाल अब यही हैकृक्या गढ़वाल का यह पहाड़ी शहर उत्तराखंड की अगली सत्ता की पटकथा लिखने वाला नया पावर सेंटर बनेगा?

भाजपा में गढ़वाल का दबदबा

उत्तराखंड तके 2027 से पहले सियासी समीकरणों की नई तस्वीर क्षेत्रीय संतुलन की सियासत, गढ़वाल पर टिकी भाजपा की नजर सत्ता-संगठन के संवेदनशील संतुलन को साधने में जुटी है पार्टी देहरादून। उत्तराखंड भाजपा की मौजूदा राजनीति में गढ़वाल क्षेत्र की भूमिका लगातार चर्चा के केंद्र में है। संगठन से लेकर सरकार तक गढ़वाल के नेताओं की सक्रियता ने पार्टी के भीतर क्षेत्रीय संतुलन और राजनीतिक प्रभाव को लेकर नई बहस छेड़ दी है। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा जिस तरह पहाड़ के राजनीतिक समीकरणों को साधने में जुटी है, उसमें गढ़वाल का बढ़ता प्रभाव पार्टी की रणनीति का अहम हिस्सा माना जा रहा है। उत्तराखंड की राजनीति में गढ़वाल और कुमाऊं का संतुलन हमेशा संवेदनशील विषय रहा है। राज्य गठन के बाद सत्ता और संगठन में दोनों मंडलों की हिस्सेदारी को लेकर राजनीतिक चर्चाएं होती रही हैं। ऐसे में भाजपा के भीतर गढ़वाल के नेताओं की बढ़ती सक्रियता को केवल संयोग मानना आसान नहीं है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी कुमाऊं से आते हैं, लेकिन भाजपा की प्रदेश राजनीति में गढ़वाल से जुड़े कई प्रभावशाली चेहरे सक्रिय हैं। सरकार, संगठन और पार्टी के विभिन्न राजनीतिक अभियानों में इन नेताओं की भूमिका लगातार दिखाई देती रही है। गढ़वाल की राजनीतिक ताकत का एक कारण यह भी है कि क्षेत्र में भाजपा का संगठन लंबे समय से मजबूत रहा है। पहाड़ की कई विधानसभा सीटों पर पार्टी का कैडर नेटवर्क चुनावी राजनीति में उसकी बड़ी ताकत माना जाता है। यही संगठनात्मक ढांचा भाजपा को चुनाव के समय बढ़त दिलाने में मदद करता रहा है। पौड़ी, चमोली, रुद्रप्रयाग, टिहरी, उत्तरकाशी और देहरादून के पर्वतीय हिस्से भाजपा की रणनीति में इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इन क्षेत्रों का असर गढ़वाल की व्यापक राजनीतिक दिशा पर पड़ता है। गढ़वाल की राजनीति में पौड़ी का महत्व अलग है। यह क्षेत्र लंबे समय से राज्य की राजनीति को नेतृत्व देने वाले नेताओं की जमीन रहा है। भाजपा के लिए भी पौड़ी केवल एक लोकसभा क्षेत्र नहीं, बल्कि गढ़वाल की राजनीतिक नब्ज समझने का महत्वपूर्ण केंद्र है। पौड़ी में संगठनात्मक सक्रियता बढ़ना इस बात का संकेत माना जा रहा है कि पार्टी 2027 से पहले गढ़वाल के राजनीतिक समीकरणों को और मजबूत करना चाहती है। लेकिन यहां एक सवाल भी हैकृक्या भाजपा गढ़वाल के प्रभावशाली नेताओं के बीच बेहतर समन्वय बना पाएगी? क्योंकि सत्ता और संगठन में प्रभाव बढ़ने के साथ भीतर की प्रतिस्पर्धा भी बढ़ना स्वाभाविक है। गढ़वाल के बढ़ते प्रभाव की चर्चा के साथ क्षेत्रीय संतुलन का सवाल भी उठता है। उत्तराखंड की राजनीति में गढ़वाल बनाम कुमाऊं का विमर्श नया नहीं है। दोनों क्षेत्रों की अपनी राजनीतिक पहचान और सामाजिक-राजनीतिक अपेक्षाएं हैं। भाजपा के लिए चुनौती यह है कि वह गढ़वाल में अपने प्रभाव को बढ़ाते हुए कुमाऊं को किसी तरह की राजनीतिक उपेक्षा का संदेश न जाने दे। मुख्यमंत्री का कुमाऊं से होना पार्टी के लिए क्षेत्रीय संतुलन का एक महत्वपूर्ण आधार है, लेकिन संगठनात्मक स्तर पर संतुलन बनाए रखना भी उतना ही जरूरी होगा। भाजपा के लिए 2027 का चुनाव केवल सत्ता में वापसी का चुनाव नहीं होगा। पार्टी के सामने लगातार दो सरकारों के बाद जनता के बीच अपनी स्वीकार्यता बनाए रखने की चुनौती होगी। गढ़वाल में पार्टी को जहां अपने मजबूत संगठन का लाभ मिल सकता है, वहीं स्थानीय मुद्दे भी चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं। पलायन, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, आपदा और पर्यटन के सवाल पहाड़ के मतदाताओं के लिए लगातार महत्वपूर्ण बने हुए हैं। ऐसे में गढ़वाल के नेताओं के सामने केवल पार्टी का पक्ष रखने की चुनौती नहीं होगी, बल्कि जनता के स्थानीय सवालों का जवाब देने की भी जिम्मेदारी होगी। उत्तराखंड भाजपा में गढ़वाल का बढ़ता दबदबा फिलहाल एक राजनीतिक संकेत जरूर है, लेकिन इसे स्थायी सत्ता समीकरण मानना जल्दबाजी होगी। चुनाव से पहले राजनीतिक समीकरण तेजी से बदलते हैं। फिर भी मौजूदा तस्वीर यह बताती है कि भाजपा गढ़वाल को अपनी चुनावी रणनीति का महत्वपूर्ण आधार मानकर चल रही है। संगठन की मजबूती, स्थानीय नेतृत्व और क्षेत्रीय मुद्दों को साथ जोड़ना पार्टी के लिए निर्णायक हो सकता है। 2027 की जंग में भाजपा के लिए गढ़वाल सिर्फ सीटों का गणित नहीं, सत्ता की चाबी भी है। अब देखना यह होगा कि पार्टी इस दबदबे को चुनावी बढ़त में बदल पाती है या फिर गढ़वाल के भीतर उठ रहे स्थानीय सवाल ही उसके लिए सबसे बड़ी चुनौती बन जाते हैं।

उत्तराखंड भाजपा में बदलाव की ‘आहट’

केंद्रीय टीम से दुष्यंत गौतम का नाम कटते ही उत्तराखंड भाजपा में सुगबुगाहट तेज लंबे समय से राज्य के समीकरण साध रहे गौतम की विदाई के सियासी मायने अहम आधिकारिक घोषणा का इंतजार, लेकिन संगठन के भीतर प्रभारी को लेकर चर्चाएं गर्म देहरादून। भाजपा की नई केंद्रीय कार्यकारिणी की तस्वीर सामने आने के बाद उत्तराखंड भाजपा के सियासी गलियारों में भी हलचल तेज हो गई है। उत्तराखंड के मौजूदा प्रदेश प्रभारी दुष्यंत गौतम का नाम नई केंद्रीय कार्यकारिणी में शामिल नहीं होने के बाद अब उनके प्रदेश प्रभारी पद को लेकर भी अटकलें शुरू हो गई हैं। हालांकि पार्टी की ओर से इस संबंध में अभी कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन संगठन के भीतर संभावित बदलाव को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है। दुष्यंत गौतम पिछले कुछ समय से उत्तराखंड भाजपा की चुनावी और संगठनात्मक रणनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। ऐसे में केंद्रीय स्तर पर नई टीम में उनका नाम नहीं होना राजनीतिक नजरिए से अहम माना जा रहा है। अब सवाल यह है कि क्या केंद्रीय संगठन में उनकी भूमिका बदलने के साथ उत्तराखंड में भी प्रभारी के स्तर पर बदलाव किया जाएगा? उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियां धीरे-धीरे तेज हो रही हैं। भाजपा के लिए लगातार सत्ता में बने रहने की चुनौती है। ऐसे समय में प्रदेश प्रभारी का पद बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। प्रभारी की भूमिका केवल संगठनात्मक बैठकों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि टिकट चयन, चुनावी रणनीति, केंद्रीय नेतृत्व और प्रदेश संगठन के बीच समन्वय तथा अंदरूनी राजनीतिक समीकरणों को साधने में भी अहम होती है। यही वजह है कि दुष्यंत गौतम के भविष्य को लेकर चल रही चर्चाओं को 2027 की चुनावी तैयारियों से जोड़कर देखा जा रहा है। भाजपा में केंद्रीय संगठन में बदलाव के बाद कई नेताओं की जिम्मेदारियों में फेरबदल होना सामान्य संगठनात्मक प्रक्रिया है। किसी नेता का केंद्रीय कार्यकारिणी में शामिल न होना अपने आप में यह प्रमाण नहीं है कि उसे किसी प्रदेश के प्रभारी पद से भी हटाया जा रहा है। लेकिन राजनीति में समय और परिस्थितियां संकेत जरूर देती हैं। यदि भाजपा केंद्रीय संगठन को नई ऊर्जा और नई जिम्मेदारियों के साथ आगे बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रही है, तो राज्यों के प्रभारियों में भी बदलाव की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। उत्तराखंड के मामले में यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण होगा क्योंकि प्रदेश भाजपा में 2027 को लेकर संगठनात्मक तैयारियां पहले ही शुरू हो चुकी हैं। उत्तराखंड भाजपा में संभावित प्रभारी बदलाव की चर्चा के साथ यह सवाल भी उठ रहा है कि यदि नया प्रभारी नियुक्त होता है तो उसका राजनीतिक और क्षेत्रीय प्रोफाइल क्या होगा? गढ़वाल और कुमाऊं के बीच संतुलन उत्तराखंड की राजनीति में हमेशा महत्वपूर्ण रहा है। भाजपा भी संगठनात्मक नियुक्तियों में इस संतुलन को ध्यान में रखती रही है। ऐसे में नए प्रभारी के चयन में राजनीतिक अनुभव के साथ-साथ उत्तराखंड के दोनों मंडलों की राजनीतिक संवेदनशीलता को समझने की क्षमता भी अहम हो सकती है। उत्तराखंड भाजपा के लिए आने वाला समय बेहद महत्वपूर्ण है। सरकार के सामने उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने की चुनौती है तो संगठन के सामने सत्ता विरोधी भावनाओं को रोकने की। विपक्ष लगातार बेरोजगारी, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य और आपदा जैसे मुद्दों पर सरकार को घेर रहा है। ऐसे में यदि प्रभारी बदला जाता है तो इसे केवल संगठनात्मक बदलाव नहीं, बल्कि 2027 के लिए भाजपा की नई चुनावी टीम तैयार करने की कवायद के तौर पर भी देखा जा सकता है। फिलहाल दुष्यंत गौतम को उत्तराखंड प्रभारी पद से हटाए जाने को लेकर कोई आधिकारिक निर्णय सामने नहीं आया है। इसलिए मौजूदा चर्चाओं को अभी अटकलों के तौर पर ही देखा जाना चाहिए। लेकिन इतना जरूर है कि केंद्रीय कार्यकारिणी की नई तस्वीर ने उत्तराखंड भाजपा के संगठनात्मक भविष्य को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि आने वाले दिनों में प्रदेश प्रभारी बदला जाता है तो यह 2027 से पहले भाजपा की रणनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत होगा। अब निगाहें भाजपा हाईकमान के अगले फैसले पर टिकी हैं।

‘शुद्धिकरण’ पर बढ़ा घमासान

कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने सचिवालय और पुलिस मुख्यालय का घेराव कर सरकार को घेरा 21वीं सदी में भी इंसान की मौजूदगी से मंच को पवित्र और अशुद्ध मानने वाली सोच पर सवाल अनुसूचित जाति विभाग के आह्वान के बाद विरोध-प्रदर्शन तेज, घटनाक्रम ने राजनीति का पारा चढ़ाया देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में एक मंच ने ऐसा क्या कर दिया कि उसके शुद्धिकरण की जरूरत पड़ गई? सवाल मंच का नहीं है। सवाल उस सोच का है, जो किसी व्यक्ति के वहां खड़े होने के बाद मंच को ‘शुद्ध’ करने की जरूरत महसूस करती है। हल्द्वानी की घटना अब देहरादून पहुंच चुकी है। उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस अनुसूचित जाति विभाग के आह्वान पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने सचिवालय और पुलिस मुख्यालय का घेराव किया। नारे लगे। विरोध हुआ। सरकार से जवाब मांगा गया। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा सवाल शायद यह है कि हम 2026 में खड़े हैं या उस मानसिकता में, जहां इंसान की मौजूदगी से जगह अशुद्ध और किसी दूसरे की मौजूदगी से पवित्र हो जाती है? कांग्रेस ने इस घटना को सामाजिक भेदभाव और दलित सम्मान से जोड़ते हुए प्रदेशभर में विरोध का फैसला किया है। जाहिर है, चुनावी राजनीति में हर मुद्दे का अपना गणित होता है। लेकिन कुछ सवाल ऐसे होते हैं जिन्हें केवल चुनावी गणित से नहीं देखा जा सकता। किसी सार्वजनिक मंच का शुद्धिकरण अगर किसी व्यक्ति की जातिगत पहचान से जुड़ा है, तो यह सिर्फ एक राजनीतिक घटना नहीं रह जाती। यह समाज के सामने आईना रख देती है। राजनीति में मंच इसलिए बनाया जाता है कि वहां से जनता की बात की जाए। भाषण दिए जाएं। सवाल उठाए जाएं। सरकार की योजनाएं बताई जाएं। विपक्ष अपनी बात रखे। लेकिन अगर उसी मंच पर खड़े होने वाले व्यक्ति की जाति मंच को अशुद्ध बना देती है, तो फिर सवाल मंच पर नहीं, उस सोच पर होना चाहिए और अगर कांग्रेस इस सवाल को उठाती है तो भाजपा को भी इसका जवाब देना चाहिए। जवाब राजनीतिक आरोपों से नहीं, साफ शब्दों में। क्या ऐसी किसी घटना का समर्थन किया जाता है? क्या ऐसी सोच स्वीकार्य है? क्या संविधान के सामने जाति के आधार पर पवित्र और अपवित्र की कोई श्रेणी बची है? इन सवालों के जवाब जरूरी हैं। कांग्रेस कार्यकर्ताओं का सचिवालय और पुलिस मुख्यालय तक पहुंचना बताता है कि पार्टी इस मुद्दे को सिर्फ सोशल मीडिया की बहस बनाकर छोड़ना नहीं चाहती। कांग्रेस इसे सामाजिक सम्मान और संविधान के सवाल के रूप में पेश कर रही है। लेकिन यहां कांग्रेस के सामने भी सवाल है। क्या यह लड़ाई केवल प्रदर्शन और नारों तक सीमित रहेगी? क्या पार्टी गांवों में जाकर बताएगी कि सामाजिक बराबरी का मतलब क्या है? क्या पार्टी अपने भीतर भी जातिगत भेदभाव के सवालों पर उतनी ही गंभीर होगी? क्योंकि सामाजिक न्याय सिर्फ सत्ता के खिलाफ भाषण देने से नहीं आता। उसके लिए समाज के भीतर भी लड़ाई लड़नी पड़ती है। उत्तराखंड खुद को देवभूमि कहता है। यहां मंदिर हैं, तीर्थ हैं, परंपराएं हैं। लेकिन इसी समाज में अगर किसी इंसान की मौजूदगी के बाद किसी मंच को शुद्ध करने की जरूरत पड़ती है तो यह सवाल देवभूमि से ज्यादा समाज की मानसिकता पर खड़ा होता है। धर्म और आस्था निजी विषय हो सकते हैं। लेकिन जब सार्वजनिक जीवन में जाति के आधार पर सम्मान और अपमान तय होने लगे तो लोकतंत्र बीच में आ जाता है और लोकतंत्र का संविधान कहता हैकृनागरिक बराबर हैं।न मंच किसी जाति का है, न सड़क किसी जाति की है, न सचिवालय किसी जाति का है और न पुलिस मुख्यालय। फिर शुद्धिकरण किसका? मंच का या मानसिकता का? उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की आहट के साथ राजनीतिक दलों की सक्रियता बढ़ रही है। ऐसे में सामाजिक न्याय, बेरोजगारी, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य और महंगाई जैसे मुद्दे चुनावी विमर्श का हिस्सा बनेंगे। मंच शुद्धिकरण का यह विवाद भी राजनीतिक रंग ले चुका है। कांग्रेस इसे दलित सम्मान और संविधान की लड़ाई बताएगी। भाजपा इसे कांग्रेस की राजनीतिक रणनीति बता सकती है। लेकिन जनता के सामने सवाल इससे बड़ा है। क्या राजनीति जाति के नाम पर मंच धोती रहेगी या समाज से जाति का मैल धोने की कोशिश भी करेगी? सच तो यह है कि पानी से मंच साफ हो सकता है, लेकिन सदियों की सोच पानी से नहीं धुलती। उसके लिए संविधान पढ़ना पड़ता है। बराबरी को स्वीकार करना पड़ता है। और सबसे जरूरीकृइंसान को इंसान समझना पड़ता है।

काकरोच के बाद अब ‘दिमागी नक्सल’ पार्टी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तंज से निकली नई सियासी कहानी बयान अब समर्थकों और विरोधियों की राजनीतिक पहचान संसद से निकलकर राजनीति अब सोशल मीडिया में शिफ्ट विरोधी पक्ष ऐसे बयानों को सत्ता के खिलाफ आक्रामक मुद्दा देहरादून। भारतीय राजनीति में तंज, विशेषण और राजनीतिक जुमलों का इस्तेमाल कोई नई बात नहीं है, लेकिन सोशल मीडिया के दौर में यही शब्द कभी-कभी सत्ता के खिलाफ नए राजनीतिक नैरेटिव का आधार भी बन जाते हैं। काकरोच जैसे राजनीतिक तंज के बाद अब दिमागी नक्सल शब्द भी इसी तरह चर्चा में है। प्रधानमंत्री की ओर से किए गए तंज के बाद इस नाम से एक राजनीतिक मंच/समूह के गठन और उससे बड़ी संख्या में लोगों के जुड़ने के दावे ने सियासी बहस को नया मोड़ दे दिया है। यह घटनाक्रम अपने आप में इस बात का संकेत है कि आज की राजनीति केवल संसद, रैलियों और चुनावी सभाओं तक सीमित नहीं रही। सोशल मीडिया पर बोले गए एक शब्द को समर्थक अपने तरीके से राजनीतिक पहचान में बदल सकते हैं और विरोधी उसी शब्द को सत्ता के खिलाफ हथियार बना सकते हैं। राजनीति में किसी विरोधी को निशाना बनाने के लिए दिए गए विशेषण अक्सर कुछ समय के लिए सुर्खियां बनते हैं। लेकिन जब वही शब्द विरोध करने वाले समूह की पहचान बन जाए तो मामला दिलचस्प हो जाता है। दिमागी नक्सल को लेकर सामने आए राजनीतिक प्रयोग को भी इसी नजरिए से देखा जा रहा है। समर्थकों का दावा है कि प्रधानमंत्री के तंज के बाद बड़ी संख्या में लोग इस मंच से जुड़े हैं। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि और संगठन की वास्तविक सदस्य संख्या को अलग-अलग तरीके से देखना जरूरी है। सवाल यह है कि क्या यह महज सोशल मीडिया की प्रतिक्रिया है या फिर आने वाले समय में इसका कोई संगठित राजनीतिक रूप भी दिखाई देगा? भारतीय राजनीति में कई बार किसी दल या नेता को दिए गए विरोधी के विशेषण ने ही उसकी पहचान को मजबूत किया है। राजनीतिक विरोधियों के आरोपों को पलटकर अपने पक्ष में इस्तेमाल करना चुनावी रणनीति का हिस्सा रहा है। दिमागी नक्सल को लेकर भी यही प्रयोग दिखाई देता है, जिस शब्द का इस्तेमाल आलोचना या तंज के रूप में किया गया, उसी को समर्थक राजनीतिक व्यंग्य और प्रतिरोध के प्रतीक के रूप में पेश कर रहे हैं। यह सोशल मीडिया राजनीति के उस नए दौर को दिखाता है जहां नकारात्मक प्रचार भी कभी-कभी राजनीतिक ब्रांडिंग में बदल सकता है। इस नए राजनीतिक मंच से लाखों लोगों के जुड़ने का दावा किया जा रहा है। अगर यह संख्या वास्तविक और सक्रिय राजनीतिक समर्थन में बदलती है तो निश्चित तौर पर यह मुख्यधारा की पार्टियों के लिए विचार करने का विषय होगा। लेकिन किसी डिजिटल प्लेटफार्म पर फालोअर या सदस्य संख्या और वास्तविक चुनावी समर्थन में बड़ा अंतर होता है। चुनाव बूथ पर लड़ा जाता है, जहां संगठन, उम्मीदवार, स्थानीय मुद्दे और मतदाता का भरोसा निर्णायक होता है। यही इस नए राजनीतिक प्रयोग की सबसे बड़ी परीक्षा होगी। देश की राजनीति में भाजपा और कांग्रेस के बीच मुकाबले के बीच कई छोटे राजनीतिक प्रयोग समय-समय पर सामने आते रहे हैं। कुछ आंदोलनों ने राजनीतिक दल का रूप लिया तो कुछ सोशल मीडिया की सीमाओं से आगे नहीं बढ़ पाए। दिमागी नक्सल नाम से सामने आया राजनीतिक प्रयोग भी अब इसी कसौटी पर देखा जाएगा। क्या यह केवल प्रधानमंत्री के बयान की प्रतिक्रिया तक सीमित रहेगा या बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, लोकतांत्रिक संस्थाओं और सामाजिक मुद्दों को लेकर अपना स्वतंत्र राजनीतिक एजेंडा तैयार करेगा? यदि यह मंच केवल एक राजनीतिक तंज का जवाब बनकर रह गया तो इसकी उम्र सीमित हो सकती है। लेकिन यदि यह अपने नाम से आगे निकलकर नीति, संगठन और जमीन से जुड़े मुद्दों पर स्पष्ट कार्यक्रम तैयार करता है, तब इसकी राजनीतिक प्रासंगिकता बढ़ सकती है। इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा संदेश शायद यही है कि राजनीति में शब्दों को हल्के में लेना अब आसान नहीं है। सत्ता का एक तंज सोशल मीडिया में हजारों पोस्ट, मीम और अभियान का आधार बन सकता है और वही अभियान किसी दिन राजनीतिक संगठन का रूप लेने का दावा भी कर सकता है। लेकिन लोकतंत्र में अंततः फैसला नारों से नहीं, जनता के वोट से होता है। इसलिए दिमागी नक्सल नाम का यह प्रयोग कितना बड़ा राजनीतिक विकल्प बनता है, यह आने वाला समय बताएगा। फिलहाल इतना जरूर है कि जिस शब्द को राजनीतिक तंज के रूप में इस्तेमाल किया गया, वही अब विरोध की पहचान बनने की कोशिश कर रहा है। काकरोच से लेकर दिमागी नक्सल तक की यह राजनीति बताती है कि भारतीय लोकतंत्र में राजनीतिक भाषा का नया दौर शुरू हो चुका हैकृजहां सत्ता का तंज भी कभी-कभी विपक्ष की नई कहानी लिख देता है।

सोमवार, 17 अगस्त 2026

udaydinmaan: ‘देवभूमि में डर्टी पालिटिक्स’

udaydinmaan: ‘देवभूमि में डर्टी पालिटिक्स’: प्रदेश में आपदा, बदहाल सड़कें और पलायन जैसे गंभीर मुद्दे वही दिल्ली से लेकर दून तक राजनीतिक बयानबाजी चरम पर कांग्रेस ने कई मुद्दों को ढाल ब...

एसआईआर पर सियासत तेज

पूर्व सीएम की बेटी विधायक अनुपमा ने लगाए गंभीर आरोप स्कैम और साजिश के दावे से गरमाया सूबे का चुनावी माहौल देहरादून। उत्तराखंड में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर सियासी बहस लगातार तेज होती जा रही है। अब एक पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की बेटी की विधायक अनुपमा रावत ओर से प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल उठाए जाने के बाद राजनीतिक माहौल और गरमा गया है। उन्होंने इसे कथित तौर पर बड़ा स्कैम बताते हुए आरोप लगाया कि मतदाताओं की आपत्तियों के नाम पर एक सुनियोजित प्रक्रिया चल रही है। उत्तराखंड में एसआईआर की प्रक्रिया पहले ही राजनीतिक दलों के बीच बहस का विषय बनी हुई है। निर्वाचन विभाग की ओर से मतदाता सूची के सत्यापन और आवश्यक दस्तावेज जुटाने की प्रक्रिया को चुनावी सूची को अधिक शुद्ध और अद्यतन बनाने की कवायद बताया जा रहा है। वहीं विपक्षी दलों का आरोप है कि इस प्रक्रिया में आम मतदाता, खासकर बुजुर्गों और ऐसे लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है जिनके पास पुराने दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं। इसी बीच पूर्व मुख्यमंत्री की बेटी विधायक अनुपमा रावत की टिप्पणी ने राजनीतिक विवाद को नया आयाम दे दिया है। उनका आरोप है कि आपत्ति की प्रक्रिया का इस्तेमाल सामान्य मतदाता सत्यापन से आगे जाकर राजनीतिक उद्देश्य के लिए किया जा सकता है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और निर्वाचन प्रक्रिया के संबंध में अंतिम स्थिति निर्वाचन आयोग के आधिकारिक रिकार्ड और जांच से ही स्पष्ट होगी। एसआईआर को लेकर सबसे बड़ा सवाल केवल यह नहीं है कि मतदाता सूची में कितने नाम जुड़ेंगे या हटेंगे। बड़ा सवाल यह है कि पूरी प्रक्रिया पर आम मतदाता कितना भरोसा कर पाएगा। लोकतंत्र में मतदाता सूची महज नामों की सूची नहीं होती। यही वह आधार है जिसके सहारे नागरिक अपने मताधिकार का इस्तेमाल करता है। इसलिए किसी भी मतदाता को यह आशंका नहीं होनी चाहिए कि दस्तावेजों की कमी, प्रशासनिक गलती या किसी आपत्ति के कारण उसका नाम सूची से बाहर हो सकता है। यही वजह है कि एसआईआर जैसी प्रक्रिया में पारदर्शिता सबसे महत्वपूर्ण है। निर्वाचन आयोग और प्रशासन को यह साफ करना होगा कि किसी मतदाता के खिलाफ आपत्ति किस आधार पर दर्ज की जा रही है, उसे अपनी बात रखने का कितना अवसर मिलेगा और अंतिम निर्णय से पहले उसकी सुनवाई किस स्तर पर होगी। साजिश और स्कैम जैसे आरोप राजनीतिक रूप से बेहद गंभीर हैं। ऐसे आरोप केवल बयानबाजी तक सीमित नहीं रहने चाहिए। यदि किसी के पास ठोस तथ्य, दस्तावेज या प्रक्रिया में अनियमितता के प्रमाण हैं तो उन्हें सार्वजनिक किया जाना चाहिए और सक्षम निर्वाचन अधिकारियों के सामने रखा जाना चाहिए। दूसरी ओर निर्वाचन मशीनरी की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। केवल यह कह देना पर्याप्त नहीं होगा कि प्रक्रिया नियमों के तहत चल रही है। जब समाज में संदेह पैदा हो जाए तो प्रशासन को तथ्यों के साथ उस संदेह का समाधान करना पड़ता है। उत्तराखंड में चुनावी राजनीति पहले ही 2027 विधानसभा चुनाव की ओर बढ़ रही है। ऐसे समय में मतदाता सूची से जुड़ा कोई भी विवाद स्वाभाविक रूप से राजनीतिक रंग लेगा। इसलिए एसआईआर की प्रक्रिया को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर रखकर संचालित करना जरूरी है। उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में समस्या का एक अलग सामाजिक पक्ष भी है। बड़ी संख्या में परिवारों के पुराने रिकार्ड अलग-अलग स्थानों पर हैं। पलायन के कारण लोगों के पते बदले हैं। कई बुजुर्गों के पास पुराने दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में यदि सत्यापन की प्रक्रिया कठोर होती है तो सबसे पहले वही नागरिक प्रभावित हो सकते हैं जो प्रशासनिक प्रक्रियाओं तक आसानी से नहीं पहुंच पाते। इसलिए एसआईआर में दस्तावेज मांगने के साथ-साथ नागरिकों की वास्तविक परिस्थितियों को भी समझना होगा। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव नजदीक आने के साथ एसआईआर अब केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रह गया है। सत्ता पक्ष इसे मतदाता सूची को शुद्ध करने की कवायद बता सकता है, जबकि विपक्ष इसे मताधिकार और लोकतांत्रिक अधिकारों से जोड़कर सवाल उठा रहा है। राजनीति अपनी जगह है, लेकिन मतदाता सूची का सवाल उससे कहीं बड़ा है। यदि कोई अपात्र व्यक्ति सूची में है तो उसे हटाया जाना चाहिए। यदि कोई पात्र नागरिक छूट गया है तो उसका नाम जोड़ा जाना चाहिए। लेकिन दोनों काम एक समान पारदर्शिता और निष्पक्षता से होने चाहिए। पूर्व मुख्यमंत्री की बेटी के आरोपों ने इस बहस को जरूर तेज कर दिया है, लेकिन अब गेंद निर्वाचन तंत्र के पाले में है। आरोपों का जवाब राजनीतिक बयान से नहीं, बल्कि आंकड़ों, प्रक्रिया और पारदर्शिता से देना होगा। क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होता कि कौन किस पर आरोप लगा रहा है। सबसे बड़ा सवाल होता हैकृक्या हर पात्र नागरिक का वोट सुरक्षित है? और एसआईआर की पूरी प्रक्रिया का जवाब इसी एक सवाल में छिपा है।

कांग्रेस हाईकमान का उत्तराखंड पर फोकस

राहुल गांधी के दौरे और मल्लिकार्जुन खरगे की रैली के बाद पार्टी ने राज्य में चुनावी गतिविधियां तेज की कांग्रेस उत्तराखंड को केवल राज्य इकाई न मानकर सत्ता में वापसी का मुख्य अवसर देख रही कांग्रेस को सरकार के खिलाफ माहौल बनाने के साथ-साथ करना होगा बूथ संगठन को भी मजबूत देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के बीच कांग्रेस हाईकमान ने प्रदेश की सियासत पर अपनी नजरें गड़ा दी हैं। पिछले कुछ समय में राष्ट्रीय नेतृत्व के नेताओं की सक्रियता, संगठनात्मक बैठकों और चुनावी तैयारियों ने संकेत दिया है कि कांग्रेस अब उत्तराखंड को केवल एक राज्य इकाई के रूप में नहीं, बल्कि सत्ता में वापसी की अहम राजनीतिक संभावना के तौर पर देख रही है। जून में राहुल गांधी के दौरे और उसके बाद कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की हल्द्वानी रैली के बाद पार्टी की चुनावी गतिविधियों में तेजी आई है। कांग्रेस के लिए उत्तराखंड इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि राज्य में भाजपा लगातार दूसरी बार सरकार बनाने के बाद अब सत्ता की हैट्रिक की कोशिश में है। ऐसे में कांग्रेस के सामने सिर्फ सरकार के खिलाफ माहौल बनाने की चुनौती नहीं है, बल्कि उसे अपने संगठन को बूथ तक मजबूत करके चुनावी मुकाबले को बराबरी पर लाना होगा। उत्तराखंड कांग्रेस में लंबे समय से संगठन को लेकर सवाल उठते रहे हैं। प्रदेश कार्यकारिणी के गठन में देरी भी पार्टी के भीतर चर्चा का विषय रही। जून में सामने आई रिपोर्टों के मुताबिक हाईकमान प्रदेश में छोटी लेकिन सक्रिय टीम बनाकर नेताओं की जिम्मेदारियां तय करने पर जोर दे रहा था। अब राष्ट्रीय नेतृत्व का फोकस केवल संगठन घोषित करने तक सीमित नहीं दिख रहा। विधानसभा स्तर पर आंतरिक सर्वे के जरिए पार्टी यह जानने की कोशिश कर रही है कि किस सीट पर संगठन की स्थिति क्या है, कौन से नेता प्रभावी हैं और जनता के बीच कौन से मुद्दे चुनाव को प्रभावित कर सकते हैं। यह बदलाव महत्वपूर्ण है। कांग्रेस यदि इस बार पुराने राजनीतिक समीकरणों के भरोसे चुनाव लड़ने के बजाय सीटवार रणनीति तैयार करती है तो मुकाबले की तस्वीर बदल सकती है। उत्तराखंड में कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह भाजपा विरोध को वोट में कैसे बदले। बेरोजगारी, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ी, महंगाई और पहाड़ की बुनियादी समस्याएं कांग्रेस के लिए मुद्दे हैं। लेकिन मुद्दा उठाना और उसे चुनावी संगठन के जरिए मतदाता तक पहुंचाना दो अलग बातें हैं। कांग्रेस को यह भी तय करना होगा कि उसका चुनावी नैरेटिव क्या होगा। क्या पार्टी केवल सरकार की कमियां गिनाएगी या उत्तराखंड के अगले पांच वर्षों के लिए कोई स्पष्ट राजनीतिक और विकास माडल भी सामने रखेगी? यही वह सवाल है जिसका जवाब हाईकमान को प्रदेश नेतृत्व से चाहिए। कांग्रेस के सामने एक और महत्वपूर्ण प्रश्न नेतृत्व का है। पार्टी में कई वरिष्ठ नेता हैं और हर नेता का अपना क्षेत्रीय प्रभाव है। लेकिन चुनावी राजनीति में सामूहिक नेतृत्व और मुख्यमंत्री चेहरे की बहस के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं होगा। हाईकमान के सामने चुनौती यह भी है कि टिकट वितरण से पहले नेताओं के बीच खींचतान को कैसे रोका जाए। एक परिवार, एक टिकट जैसे मुद्दे भी पार्टी के भीतर चर्चा में रहे हैं। यदि टिकट को लेकर अंतिम समय तक असमंजस रहा तो संगठनात्मक तैयारी प्रभावित हो सकती है। इसलिए हाईकमान शायद इस बार पहले से फीडबैक लेकर सीटों और संभावित उम्मीदवारों पर काम करना चाहता है। कांग्रेस पर दबाव इसलिए भी है क्योंकि भाजपा ने भी 2027 के लिए संगठन को सक्रिय करना शुरू कर दिया है। हाल में भाजपा ने अपनी प्रदेश कार्यकारिणी का विस्तार किया है और संगठनात्मक स्तर पर चुनावी तैयारियों को आगे बढ़ाया है। ऐसे में कांग्रेस के लिए समय कम है। चुनाव चाहे निर्धारित समय पर हों या समय से पहले होने की अटकलें राजनीतिक माहौल में बनी रहें, विपक्षी दल को हर परिस्थिति के लिए तैयार रहना होगा। फिलहाल चुनाव समय से पहले कराने को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं है। उत्तराखंड की राजनीति को केवल देहरादून या मैदानी क्षेत्रों के राजनीतिक समीकरणों से नहीं समझा जा सकता। पहाड़ की नाराजगी, मैदानी क्षेत्रों की अपेक्षाएं, युवाओं का रोजगार संकट, पलायन और महिलाओं की राजनीतिक भूमिकाकृये सभी चुनावी परिणाम तय करने वाले मुद्दे हो सकते हैं। कांग्रेस यदि हाईकमान के फोकस को जमीन तक ले जाना चाहती है तो उसे हर विधानसभा क्षेत्र की अलग राजनीतिक कहानी समझनी होगी। पहाड़ की सीट पर पहाड़ का मुद्दा और मैदानी सीट पर स्थानीय मुद्देकृएक ही नारे से पूरा उत्तराखंड नहीं जीता जा सकता। राष्ट्रीय नेतृत्व का उत्तराखंड की ओर देखना कांग्रेस के लिए निश्चित रूप से सकारात्मक संकेत है, लेकिन हाईकमान की सक्रियता अपने आप में चुनावी जीत की गारंटी नहीं है। असल परीक्षा प्रदेश कांग्रेस की है। क्या वरिष्ठ नेता व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से ऊपर उठकर एकजुट होंगे? क्या संगठन बूथ स्तर तक पहुंचेगा? क्या टिकट वितरण में सर्वे और जमीनी फीडबैक को महत्व मिलेगा? क्या कांग्रेस युवाओं और महिलाओं के लिए ठोस राजनीतिक एजेंडा तैयार करेगी? और सबसे अहमकृक्या पार्टी भाजपा के खिलाफ नाराजगी को अपने पक्ष में मतदान में बदल पाएगी? उत्तराखंड में कांग्रेस के लिए 2027 केवल सत्ता में वापसी का चुनाव नहीं है। यह संगठन की विश्वसनीयता और राजनीतिक अस्तित्व की भी बड़ी परीक्षा है। हाईकमान ने अगर उत्तराखंड पर फोकस बढ़ाया है तो अब प्रदेश कांग्रेस को यह साबित करना होगा कि दिल्ली से आया फोकस पहाड़ के गांवों तक पहुंच भी रहा है। क्योंकि चुनाव हाईकमान की बैठकों में नहीं, आखिरकार बूथ और मतदाता के बीच जीता जाता है।

भाजपा का ‘मंथन’ और 2027 का ‘रोडमैप’

130 मंडलों के अध्यक्ष जुटे, 2027 की तैयारी को बूथ तक ले जाने की कवायद सरकारी योजनाओं और उपलब्धियों को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने का आह्वान बैठक के दौरान जमीनी स्तर की समस्याओं, संगठन की मौजूदा स्थिति पर चर्चा देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर भाजपा ने संगठन को जमीन पर और मजबूत करने की कवायद तेज कर दी है। भाजपा के कुमाऊं संभाग के जिला अध्यक्षों और मंडल अध्यक्षों की महत्वपूर्ण संगठनात्मक बैठक हुई। बैठक में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट की मौजूदगी में संगठन की स्थिति, आगामी कार्यक्रमों और चुनावी रणनीति पर विस्तार से मंथन किया गया। बैठक में कुमाऊं संभाग के आठ जिलों से जिला अध्यक्षों के साथ करीब 130 मंडल अध्यक्ष शामिल हुए। भाजपा नेतृत्व के स्तर पर इसे संगठन को बूथ तक सक्रिय करने की दिशा में महत्वपूर्ण बैठक माना जा रहा है। बैठक का शुभारंभ दीप प्रज्वलन और राष्ट्रगीत वंदे मातरम के साथ हुआ। मुख्यमंत्री धामी ने कहा कि भाजपा कैडर आधारित पार्टी है और संगठन को लगातार मजबूत करने के लिए इस तरह की बैठकें जरूरी हैं। उन्होंने पदाधिकारियों से सरकार की योजनाओं और उपलब्धियों को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने तथा जमीनी स्तर पर संगठन को और प्रभावी बनाने का आह्वान किया। बैठक में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर संगठनात्मक गतिविधियों पर भी चर्चा हुई। मुख्यमंत्री ने जिला और मंडल अध्यक्षों से संगठन की मौजूदा स्थिति, जमीनी समस्याओं और आगामी कार्ययोजना पर सीधे संवाद करने को कहा। उन्होंने कहा कि कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों के संवाद से सरकार तक जमीनी स्तर की समस्याएं और सुझाव पहुंचते हैं। संगठन और सरकार के बीच यह संवाद लगातार मजबूत होना चाहिए। भाजपा के लिए कुमाऊं का राजनीतिक महत्व काफी अधिक है। ऐसे में आठ जिलों और 130 मंडलों के पदाधिकारियों को एक मंच पर बुलाकर संगठन की समीक्षा करना महज नियमित बैठक से आगे की कवायद के रूप में देखा जा रहा है। मुख्यमंत्री ने बैठक में सरकार की योजनाओं और उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए पदाधिकारियों से इन्हें जन-जन तक पहुंचाने की अपील की। उनका जोर इस बात पर रहा कि सरकारी योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे और संगठन कार्यकर्ता सरकार और जनता के बीच प्रभावी सेतु की भूमिका निभाएं। भाजपा की चुनावी रणनीति में यह पहल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सत्ता में रहते हुए पार्टी को सरकार के कामकाज का लाभ चुनावी मैदान में लेने के लिए संगठनात्मक मशीनरी को सक्रिय रखना होगा। कांग्रेस पर धामी का हमला मुख्यमंत्री धामी ने कांग्रेस पर भी निशाना साधा। उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की ओर से भाजपा और दलितों से जुड़े मुद्दों पर दिए गए बयानों को लेकर कांग्रेस पर निशाना साधा और आरोपों को खारिज किया। धामी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास के संकल्प के साथ काम कर रही है। उन्होंने कांग्रेस पर राष्ट्रगीत के अपमान, सनातन और महिला विरोधी होने तथा एक विशेष समुदाय के वोट बैंक की राजनीति करने जैसे आरोप भी लगाए। मुख्यमंत्री ने कहा कि कांग्रेस लगातार चुनावी हार के बावजूद अपनी गलतियों से सीखने को तैयार नहीं है। यानी संगठन की बैठक में भी भाजपा का राजनीतिक संदेश साफ रहाकृसंगठन को मजबूत करो और साथ ही विपक्ष के खिलाफ राजनीतिक नैरेटिव को भी धार दो। संगठन को लेकर दिया रोडमैप भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने कहा कि पार्टी संगठन लगातार विस्तार और मजबूती की दिशा में काम कर रहा है। उन्होंने मंडल और जिला स्तर पर कार्यकर्ताओं की सक्रियता बढ़ाने तथा संगठनात्मक कार्यक्रमों को प्रभावी ढंग से संचालित करने पर जोर दिया। बैठक में सरकार के काम को जनता तक पहुंचाने और संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने की रणनीति पर भी चर्चा हुई। भाजपा नेतृत्व की कोशिश साफ दिखाई देती है कि चुनाव से काफी पहले संगठन के हर स्तर को सक्रिय किया जाए, ताकि अंतिम समय में केवल प्रत्याशी और चुनावी मुद्दों के भरोसे न रहना पड़े। आठ जिले, 130 मंडल और चुनावी संदेश बैठक में नैनीताल, ऊधमसिंह नगर, काशीपुर, चंपावत, पिथौरागढ़, रानीखेत, अल्मोड़ा और बागेश्वर समेत कुमाऊं संभाग के आठ जिलों के जिला अध्यक्ष और 130 मंडल अध्यक्ष शामिल हुए। कुमाऊं में भाजपा का यह संगठनात्मक मंथन कांग्रेस के लिए भी राजनीतिक संदेश माना जा सकता है। कांग्रेस जहां 2027 की तैयारी में संगठन को मजबूत करने और सीटवार समीकरणों पर काम करने की कोशिश कर रही है, वहीं भाजपा ने पहले से ही अपने संगठनात्मक ढांचे को सक्रिय करने पर जोर बढ़ा दिया है। अब देखना यह होगा कि 130 मंडलों में तैयार की जा रही रणनीति जमीन पर कितनी प्रभावी साबित होती है।