सोमवार, 31 अगस्त 2026
udaydinmaan: मुद्दा मंच का और ‘निशाना’ 2027
udaydinmaan: मुद्दा मंच का और ‘निशाना’ 2027: हल्द्वानी के मंच से उठी सियासी चिंगारी दिल्ली तक पहुंची कांग्रेस ने इसे लोकतंत्र और संविधान का बताया है अपमान भाजपा का कांग्रेस पर धार्मिक...
मंच शुद्धिकरण पर ‘महासंग्राम’
खरगे मामले में अल्मोड़ा में सड़कों पर उतरी कांग्रेस, एफआईआर की मांग पर अड़ी
मंच शुद्धिकरण पर कांग्रेस का वार, एफआईआर के लिए कोतवाली पहुंचा काफिला
अल्मोड़ा में गरजे कांग्रेसी,लोकतंत्र में यह कैसी राजनीति? दोषियों पर मुकदमा करो
देहरादून। हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के कार्यक्रम स्थल के कथित शुद्धिकरण का मामला अब अल्मोड़ा में भी सियासी चिंगारी भड़काने लगा है। सोमवार को कांग्रेस कार्यकर्ता बड़ी संख्या में कोतवाली पहुंचे और घटना के जिम्मेदार लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग को लेकर पुलिस पर दबाव बनाया। कांग्रेसियों ने साफ कहा कि राजनीतिक विरोध की आड़ में सामाजिक और धार्मिक भावनाओं को भड़काने की कोशिश किसी कीमत पर स्वीकार नहीं की जाएगी।
कोतवाली पहुंचे कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं ने कहा कि लोकतंत्र में सत्ता और विपक्ष के बीच वैचारिक संघर्ष स्वाभाविक है, लेकिन किसी राजनीतिक दल के कार्यक्रम स्थल का कथित तौर पर गंगाजल से शुद्धिकरण करना विरोध की राजनीति को एक अलग ही स्तर पर ले जाता है। कांग्रेस ने सवाल उठाया कि क्या अब राजनीतिक असहमति का जवाब धार्मिक प्रतीकों के जरिए दिया जाएगा? कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने पुलिस को ज्ञापन सौंपते हुए मांग की कि पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कर वीडियो और अन्य उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर संबंधित लोगों की पहचान की जाए और उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज किया जाए। नेताओं ने कहा कि कानून सबके लिए बराबर है और राजनीतिक प्रभाव के कारण किसी को कार्रवाई से बचने नहीं दिया जाना चाहिए।
कांग्रेस नेताओं ने पुलिस-प्रशासन को सीधे निशाने पर लेते हुए कहा कि यदि घटना सामने आने के बावजूद एफआईआर दर्ज नहीं होती है तो इससे कानून-व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े होंगे। उनका कहना था कि कानून की किताब में आरोपी का राजनीतिक झंडा नहीं देखा जाता, अपराध देखा जाता है। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदेश में लगातार ऐसी राजनीति को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिसमें असली मुद्दों से ध्यान हटाकर धार्मिक और भावनात्मक विषयों को आगे किया जा रहा है। कांग्रेस ने चेतावनी दी कि यदि पुलिस ने मामले में तत्काल कार्रवाई नहीं की तो पार्टी कार्यकर्ता सड़कों पर उतरकर आंदोलन करेंगे।
हल्द्वानी का मंच शुद्धिकरण प्रकरण अब केवल एक शहर तक सीमित नहीं रह गया है। कांग्रेस इसे लोकतांत्रिक मर्यादा, सामाजिक सौहार्द और संवैधानिक मूल्यों से जोड़कर प्रदेशभर में मुद्दा बनाने की तैयारी में दिखाई दे रही है। अल्मोड़ा में कोतवाली पहुंचकर एफआईआर की मांग इसी राजनीतिक रणनीति का अगला कदम माना जा रहा है। विधानसभा चुनाव से पहले उत्तराखंड की सियासत पहले ही गरम है। ऐसे में मंच शुद्धिकरण का विवाद भाजपा और कांग्रेस के बीच बढ़ती तल्खी को और हवा दे सकता है।
मुद्दा मंच का और ‘निशाना’ 2027
हल्द्वानी के मंच से उठी सियासी चिंगारी दिल्ली तक पहुंची
कांग्रेस ने इसे लोकतंत्र और संविधान का बताया है अपमान
भाजपा का कांग्रेस पर धार्मिक भावनाओं के दोहन का आरोप
देहरादून। उत्तराखंड के हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के कार्यक्रम स्थल के कथित शुद्धीकरण को लेकर शुरू हुआ विवाद अब प्रदेश की सियासत से निकलकर राष्ट्रीय राजनीति का मुद्दा बन गया है। गंगाजल छिड़कने और हवन के जरिए मंच के शुद्धीकरण की घटना पर कांग्रेस और भाजपा आमने-सामने हैं। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इसे लोकतांत्रिक मूल्यों और संविधान के खिलाफ बताया है, वहीं भाजपा इसे कांग्रेस की राजनीति पर पलटवार के तौर पर पेश कर रही है।
मामला बढ़ने के बाद कांग्रेस ने सीधे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से हस्तक्षेप की मांग की है। राहुल गांधी ने शुद्धीकरण की घटना को लेकर जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की मांग करते हुए इसे लोकतांत्रिक मर्यादाओं से जोड़ दिया। कांग्रेस का आरोप है कि राजनीतिक विरोध के नाम पर विपक्ष के राष्ट्रीय अध्यक्ष के मंच का शुद्धीकरण करना सामाजिक विभाजन और राजनीतिक असहिष्णुता की मानसिकता को दर्शाता है।
हल्द्वानी की घटना ने उत्तराखंड के राजनीतिक तापमान को अचानक बढ़ा दिया है। विधानसभा चुनाव से पहले जहां भाजपा और कांग्रेस संगठन को मजबूत करने में जुटे हैं, वहीं यह विवाद दोनों दलों को एक-दूसरे पर वैचारिक हमला करने का नया अवसर दे रहा है। कांग्रेस इस पूरे मामले को केवल एक राजनीतिक कार्यक्रम से जुड़ा विवाद नहीं मान रही। पार्टी इसे सामाजिक समरसता, संविधान और लोकतांत्रिक परंपराओं से जोड़कर बड़ा मुद्दा बनाने की तैयारी में है। दूसरी ओर भाजपा का तर्क है कि कांग्रेस स्वयं धार्मिक प्रतीकों और आस्थाओं को राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करती रही है और अब विरोध होने पर लोकतंत्र की दुहाई दे रही है। यही वजह है कि हल्द्वानी का स्थानीय विवाद अब भाजपा बनाम कांग्रेस की व्यापक वैचारिक लड़ाई का चेहरा बनता दिखाई दे रहा है।
राहुल गांधी के सीधे हमले ने उत्तराखंड कांग्रेस को भी आक्रामक तेवर अपनाने का मौका दिया है। प्रदेश कांग्रेस नेताओं ने भाजपा से सवाल किया है कि क्या राजनीतिक मतभेद के कारण किसी दूसरे दल के राष्ट्रीय नेता के कार्यक्रम स्थल को अपवित्र माना जा सकता है? कांग्रेस का कहना है कि लोकतंत्र में राजनीतिक विरोध की अनुमति है, लेकिन विरोध की सीमा संवैधानिक और सामाजिक मर्यादाओं से बाहर नहीं जानी चाहिए। कांग्रेस की रणनीति साफ दिखाई दे रही हैकृमुद्दे को केवल हल्द्वानी तक सीमित न रखकर इसे राष्ट्रीय स्तर पर लोकतंत्र बनाम कथित धार्मिक राजनीति के विमर्श में बदलना।
भाजपा कांग्रेस के आरोपों को स्वीकार करने के बजाय पलटवार की रणनीति पर चल रही है। पार्टी नेताओं का कहना है कि कांग्रेस को धार्मिक भावनाओं और हिंदू आस्था से जुड़े मुद्दों पर राजनीति करने से पहले अपने राजनीतिक व्यवहार पर नजर डालनी चाहिए। भाजपा का प्रयास इस विवाद को कांग्रेस की कथित तुष्टिकरण की राजनीति और सनातन से जुड़े उसके बयानों से जोड़ने का है। पार्टी का संदेश है कि कांग्रेस यदि धार्मिक भावनाओं से जुड़े प्रतीकों का राजनीतिक इस्तेमाल करेगी तो भाजपा भी उसी राजनीतिक मैदान में जवाब देने से पीछे नहीं हटेगी।
उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव को अभी समय है, लेकिन दोनों प्रमुख दलों की तैयारियां तेज हो चुकी हैं। ऐसे में हल्द्वानी का शुद्धीकरण विवाद महज एक घटना नहीं, बल्कि आने वाले चुनावी विमर्श की झलक भी माना जा रहा है। पहाड़ की राजनीति में बेरोजगारी, पलायन, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, आपदा और महंगाई जैसे मुद्दे लगातार मौजूद हैं। मगर राजनीतिक दलों के लिए भावनात्मक और धार्मिक मुद्दे चुनावी ध्रुवीकरण का आसान माध्यम भी बनते रहे हैं। हल्द्वानी की घटना ने एक बार फिर यही सवाल खड़ा किया है कि 2027 का चुनाव विकास के सवालों पर लड़ा जाएगा या फिर धार्मिक-सामाजिक पहचान के मुद्दे चुनावी एजेंडे पर हावी होंगे।
इस विवाद का सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल यही है कि क्या किसी राजनीतिक मंच का धार्मिक तरीके से शुद्धीकरण महज आस्था का विषय है या इसके पीछे राजनीतिक संदेश भी छिपा है। भाजपा इसे आस्था और राजनीतिक प्रतिक्रिया के नजरिए से देख रही है, जबकि कांग्रेस इसे विपक्ष के प्रति असम्मान और सामाजिक विभाजन की राजनीति बता रही है। दोनों दलों की व्याख्या अलग है, लेकिन राजनीतिक असर एककृविवाद लगातार बड़ा होता जा रहा है। हल्द्वानी से उठी यह चिंगारी अब दिल्ली तक पहुंच चुकी है। राहुल गांधी के मैदान में उतरने के बाद भाजपा के लिए इसे स्थानीय विवाद तक सीमित रखना मुश्किल होगा। कांग्रेस इसे संविधान और लोकतंत्र का सवाल बनाएगी तो भाजपा इसे सनातन, आस्था और तुष्टिकरण की राजनीति के खिलाफ अपने अभियान से जोड़ेगी। यानी चुनावी रणभेरी बजने से पहले ही उत्तराखंड में एक नया राजनीतिक अखाड़ा तैयार हैकृमुद्दा मंच का है, लेकिन निशाना 2027 है।
राहुल गांधी पर हल्द्वानी में मुकदमा
हल्द्वानी मंच शुद्धिकरण मामले में शिकायत, दलितों के अपमान का लगा आरोप
श्रीराम सेना धर्मार्थ सेवा न्यास की तहरीर पर पुलिस ने राहुल गांधी पर केस दर्ज
देहरादून। हल्द्वानी मंच शुद्धीकरण मामले ने अब नया राजनीतिक और कानूनी मोड़ ले लिया है। श्रीराम सेना धर्मार्थ सेवा न्यास की ओर से कांग्रेस नेता राहुल गांधी के खिलाफ पुलिस को तहरीर दी गई है। शिकायतकर्ताओं ने जातिसूचक शब्दों के इस्तेमाल का आरोप लगाते हुए जांच और कानूनी कार्रवाई की मांग की है, जिसके बाद हल्द्वानी कोतवाली में कांग्रेस नेता राहुल गांधी के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है।
उत्तराखंड के हल्द्वानी में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के कार्यक्रम स्थल के शुद्धीकरण का मामले पर राजनीति तेज है। अब इस मामले में एक और नया मोड़ सामने आया है। श्रीराम सेना धर्मार्थ सेवा न्यास के दो कार्यकर्ता विनोद कुमार आर्य और अमित कुमार ने कांग्रेस सांसद एवं लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के खिलाफ पुलिस को तहरीर सौंपी है, जिसके आधार पर कोतवाली पुलिस ने कांग्रेस नेता के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया है। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि राहुल गांधी की ओर से अनुसूचित जाति के खिलाफ जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया गया।
पुलिस से मामले की जांच कर कानूनी कार्रवाई की मांग की गई है। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि सार्वजनिक मंच से की गई कथित टिप्पणी से अनुसूचित जाति के लोगों की भावनाएं आहत हुई हैं। उन्होंने पुलिस से पूरे मामले की निष्पक्ष जांच करने और आरोप सही पाए जाने पर संबंधित धाराओं में मुकदमा दर्ज कर कार्रवाई करने की मांग की है। गौरतलब है कि हल्द्वानी के रामलीला मैदान में हुए शुद्धिकरण कार्यक्रम को लेकर पहले से ही राजनीतिक बयानबाजी तेज है।
मंजूनाथ टीसी, एसएसपी, नैनीताल ने कहा कि दलित समाज से आने वाले अमित नाम के व्यक्ति ने एक शिकायत दी थी, जिस के आधार पर मुकदमे दर्ज किया गया है। तहरीर में कहा था कि राहुल गांधी के बयान व प्रेस कांफ्रेंस से उन्हें और उनके समाज को चोट पहुंची है। इस बारे में दलित समाज के लोगों से कोई भी जानकारी नहीं ली गई और यह समाज के लिए सही नहीं है। शिकायत के आधार पर पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर आगे की कार्रवाई तेज कर दी है।
कांग्रेस इस मामले को लेकर विरोध दर्ज करा रही है, जबकि दूसरी ओर शुद्धिकरण कराने वाले पक्ष की ओर से लगातार अपनी बात रखी जा रही है। अब राहुल गांधी के खिलाफ दी गई इस तहरीर के बाद मामला और गरमा गया है। हालांकि पुलिस ने तहरीर के आधार पर मुकदमा दर्ज किया है। इसके साथ ही मामले की विवेचना पुलिस क्षेत्राधिकारी अमित कुमार सैनी को सौंपी गई है। शिकायतकर्ता अमित कुमार मंच शुद्धिकरण मामले में उनकी संस्था द्वारा रामलीला मचान में गंदगी फैली हुई थी, जिसको लेकर उस स्थान पर सफाई अभियान चला कर शुद्धिकरण किया गया था। इस मामले में कांग्रेस नेता राहुल गांधी अनर्गल बयानबाजी कर रहे हैं, जिसको लेकर समाज के व्यक्तियों के साथ राहुल गांधी के खिलाफ तहरीर सौंपी है।
गौर हो कि 8 अगस्त को हल्द्वानी के रामलीला मैदान में कांग्रेस की एक रैली आयोजित हुई थी, जिसके बाद कथित तौर पर हिंदूवादी संगठन की ओर से मैदान में शुद्धिकरण यज्ञ का मामला सामने आने के बाद राजनीति तेज हो गई।
उत्तराखंड की राजनीति का ‘गोल्डन रूल’
उत्तराखंड की सियासत में नहीं चलता जाति-धर्म का गणित
पहाड़ की जनता ने विकास, ईमानदारी,जनहित को तरजीह दी
पहचान की राजनीति से ज्यादा मुद्दों की राजनीति रही है हावी
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति की सबसे बड़ी ताकत उसकी सामाजिक बुनावट रही है। पहाड़ से मैदान तक समाज अनेक जातियों, समुदायों और वर्गों में बंटा होने के बावजूद चुनावी राजनीति में उत्तराखंड की जनता ने लंबे समय तक जाति, धर्म और वर्ग के आधार पर स्थायी खांचे स्वीकार नहीं किए। यहां मतदाता की अपनी राजनीतिक समझ रही है और वह समय-समय पर सरकारों और नेताओं को उनके कामकाज के आधार पर परखता रहा है।
उत्तराखंड का गठन ही लंबे जनआंदोलन की उस भावना से हुआ था, जिसमें क्षेत्रीय अस्मिता, रोजगार, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य और पहाड़ के विकास को केंद्रीय मुद्दा बनाया गया। आंदोलन के दौर में जाति और धर्म से ऊपर उठकर लोग एक साझा मांग के साथ सड़कों पर उतरे। यही सामाजिक चेतना आज भी प्रदेश की राजनीति की बुनियाद में दिखाई देती है।
उत्तराखंड की राजनीति को केवल पहाड़ और मैदान के बीच विभाजन के नजरिए से भी पूरी तरह नहीं समझा जा सकता। देहरादून, हरिद्वार, ऊधमसिंह नगर और नैनीताल जैसे मैदानी जिलों की अपनी राजनीतिक प्राथमिकताएं हैं तो सीमांत और पर्वतीय जिलों के अपने सवाल। इसके बावजूद चुनावों में मतदाता कई बार स्थानीय मुद्दों और उम्मीदवार की छवि को पार्टी के पारंपरिक समीकरणों पर भारी कर देता है। यही कारण है कि उत्तराखंड में किसी एक जाति या समुदाय को स्थायी वोट बैंक मान लेना राजनीतिक दलों के लिए आसान नहीं रहा है।
उत्तराखंड धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण प्रदेश है। चारधाम, प्रमुख शक्तिपीठ और अनेक स्थानीय देव परंपराएं यहां की सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा हैं। लेकिन धार्मिक आस्था और चुनावी राजनीति को एक ही तराजू में रखना हमेशा सही नहीं रहा। प्रदेश का मतदाता धार्मिक हो सकता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वह अपने रोजमर्रा के सवालों को भूल जाता है। सड़क टूटने पर सड़क चाहिए, अस्पताल में डाक्टर चाहिए, स्कूल में शिक्षक चाहिए और युवाओं को रोजगार चाहिए। पहाड़ में पलायन रोकना है तो स्थानीय स्तर पर आर्थिक अवसर चाहिए। आस्था अपनी जगह है और शासन का सवाल अपनी जगह।
उत्तराखंड में जातीय पहचानें मौजूद हैं और राजनीतिक दल चुनावों में सामाजिक समीकरणों का आकलन भी करते हैं। मगर यहां जाति को चुनाव जीतने की गारंटी मान लेना जोखिम भरा रहा है। एक ही जाति या समुदाय के मतदाता अलग-अलग राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के पक्ष में मतदान करते रहे हैं। इसका कारण उत्तराखंड की सामाजिक संरचना और राजनीतिक चेतना दोनों में देखा जा सकता है। छोटे राज्य में स्थानीय रिश्ते, उम्मीदवार की व्यक्तिगत छवि, क्षेत्रीय जुड़ाव और उसके कामकाज का असर कई बार व्यापक जातीय समीकरणों पर भारी पड़ता है।
आगामी विधानसभा चुनाव में राजनीतिक दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वह जनता को किस मुद्दे पर अपने साथ जोड़ते हैं। क्या चुनाव बेरोजगारी, पलायन, महंगाई, स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क और आपदा प्रबंधन पर होगा या फिर जाति, धर्म और पहचान के भावनात्मक मुद्दे चुनावी विमर्श पर हावी होंगे? उत्तराखंड का मतदाता राजनीतिक दलों को यह संदेश देता रहा है कि उसे केवल भावनाओं से नहीं, परिणामों से मतलब है। सत्ता में बैठी सरकार से वह सवाल करता है और विपक्ष से भी विकल्प की स्पष्टता मांगता है।
उत्तराखंड की सामाजिक एकता को सबसे बड़ी चुनौती तब मिलती है जब राजनीतिक लाभ के लिए समाज को छोटे-छोटे खांचों में बांटने का प्रयास होता है। जाति, धर्म या वर्ग के आधार पर राजनीतिक धु्रवीकरण अल्पकाल में चुनावी लाभ दे सकता है, लेकिन दीर्घकाल में यह सामाजिक ताने-बाने को कमजोर करता है। उत्तराखंड की जनता ने राज्य आंदोलन से लेकर आज तक कई राजनीतिक बदलाव देखे हैं। सरकारें बदलीं, चेहरे बदले और चुनावी मुद्दे बदले, लेकिन जनता की मूल आकांक्षाएं बहुत हद तक वही हैंकृसम्मान के साथ रोजगार, बेहतर शिक्षा-स्वास्थ्य, सुरक्षित सड़कें, मजबूत गांव और पलायन से मुक्ति।
इसलिए 2027 की चुनावी लड़ाई में भी राजनीतिक दलों के सामने सवाल सिर्फ यह नहीं होगा कि किस जाति या समुदाय को कैसे साधा जाए। बड़ा सवाल यह होगा कि क्या उत्तराखंड की जनता को विकास और जनहित का भरोसेमंद एजेंडा दिया जा सकता है? उत्तराखंड की असली पहचान किसी जाति, धर्म या वर्ग की राजनीति नहीं, बल्कि साझा पहाड़ी चेतना है। यहां मतदाता को बांटने की कोशिश भले हो सकती है, लेकिन उसे स्थायी खांचे में कैद करना आसान नहीं। सियासत चाहे जितने समीकरण बनाए, आखिर में फैसला उत्तराखंड की जनता अपने मुद्दों और अपनी समझ से ही करेगी।
मोदी माडल में ‘सत्ता’ से ज्यादा ‘सेवा’ का दावा
भाजपा के लिए सत्ता शक्ति नहीं, सेवा का है माध्यम
प्रदेश में जनसेवा के संदेश के साथ 2027 की तैयारी
संगठन का दावाकृसमाज और राष्ट्र सेवा का है साधन
देहरादून। भाजपा नेताओं की ओर से बार-बार दोहराया जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी के लिए सत्ता कभी शक्ति प्रदर्शन का माध्यम नहीं रही, बल्कि जनसेवा का अवसर है। यह दावा ऐसे समय में सामने आ रहा है जब उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियां तेज हो चुकी हैं और भाजपा लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी के लक्ष्य के साथ संगठन को सक्रिय कर रही है।
भाजपा की राजनीति में सेवा को केंद्रीय विचार के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। पार्टी नेताओं का कहना है कि सत्ता का अर्थ केवल सरकार चलाना नहीं, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति तक योजनाओं और सुविधाओं का लाभ पहुंचाना है। यही वजह है कि भाजपा अपने राजनीतिक अभियान में विकास के साथ गरीब कल्याण, जनकल्याण और राष्ट्र निर्माण को प्रमुखता दे रही है।
भाजपा नेताओं के अनुसार प्रधानमंत्री मोदी ने राजनीति में सत्ता की परिभाषा को बदलने का प्रयास किया है। उनके लिए सरकार का मतलब केवल प्रशासनिक व्यवस्था नहीं, बल्कि लोगों की समस्याओं का समाधान और जरूरतमंद तक सरकारी सहायता पहुंचाना है। भाजपा इस सोच को जनधन, आवास, शौचालय, उज्ज्वला, आयुष्मान भारत, जल जीवन मिशन और डिजिटल सेवाओं जैसी योजनाओं से जोड़कर पेश करती है। पार्टी का तर्क है कि शासन की सफलता का पैमाना यह होना चाहिए कि उसका लाभ समाज के उस व्यक्ति तक पहुंचे जो लंबे समय तक व्यवस्था से दूर रहा।
हालांकि उत्तराखंड में भाजपा के सामने इस दावे को जमीन पर साबित करने की बड़ी चुनौती है। पहाड़ी जिलों में आज भी पलायन, रोजगार, स्वास्थ्य सुविधाओं, शिक्षा, सड़क, आपदा और स्थानीय अर्थव्यवस्था जैसे सवाल राजनीतिक बहस के केंद्र में हैं। सरकार की योजनाओं और उपलब्धियों का प्रचार अपनी जगह है, लेकिन पहाड़ का मतदाता यह भी जानना चाहता है कि उसके गांव में रोजगार कब पहुंचेगा, अस्पताल में विशेषज्ञ चिकित्सक कब उपलब्ध होंगे, सड़कें कब सुरक्षित होंगी और आपदा के समय सरकारी तंत्र कितनी तेजी से उसके साथ खड़ा होगा। यानी भाजपा के लिए सेवा का दावा अब केवल राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि 2027 में जनता की कसौटी भी बनने वाला है।
भाजपा संगठन लगातार बूथ स्तर तक अपनी सक्रियता बढ़ा रहा है। पार्टी की रणनीति में कार्यकर्ताओं को सरकार की योजनाओं और उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने के साथ-साथ स्थानीय समस्याओं को संगठन के माध्यम से सरकार तक पहुंचाने पर भी जोर दिया जा रहा है। भाजपा नेताओं का मानना है कि पार्टी की असली ताकत उसका कैडर और कार्यकर्ता है। इसलिए सत्ता में रहते हुए भी संगठन को जनता से निरंतर संपर्क बनाए रखने की रणनीति पर काम किया जा रहा है।
भाजपा के सेवा वाले नैरेटिव ने विपक्ष के सामने भी चुनौती खड़ी की है। कांग्रेस लगातार सरकार की नीतियों और उपलब्धियों पर सवाल उठाती रही है। ऐसे में आगामी चुनाव में मुकाबला केवल भाजपा की उपलब्धियों बनाम विपक्ष के आरोपों का नहीं होगा, बल्कि दोनों पक्षों को यह साबित करना होगा कि वह उत्तराखंड की जनता के जीवन में वास्तविक बदलाव कैसे ला सकते हैं। भाजपा जहां मोदी सरकार की उपलब्धियों और धामी सरकार के कामकाज को जनसेवा के माडल के रूप में पेश करेगी, वहीं विपक्ष बेरोजगारी, महंगाई, पलायन, भर्ती और आपदा जैसे मुद्दों के जरिए सरकार को घेरने की कोशिश करेगा।
राजनीति में सत्ता को सेवा का माध्यम बताना भारतीय लोकतंत्र में नया विचार नहीं है। लगभग हर राजनीतिक दल जनता की सेवा को अपना लक्ष्य बताता है। असली सवाल यह है कि सत्ता में आने के बाद उस विचार का कितना हिस्सा जमीन पर दिखाई देता है। उत्तराखंड में 2027 का चुनाव इसी दावे की परीक्षा बन सकता है। भाजपा यदि लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटने का लक्ष्य लेकर चल रही है तो उसे जनता के सामने यह भी साबित करना होगा कि उसके लिए सत्ता वास्तव में सेवा का माध्यम है। क्योंकि चुनावी भाषण में सत्ता सेवा हो सकती है, लेकिन लोकतंत्र में उसकी अंतिम परीक्षा जनता के अनुभव से होती है।
रविवार, 30 अगस्त 2026
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खरगे के अपमान को कांग्रेस ने बनाया सामाजिक बराबरी की लड़ाई का मुद्दा
दिग्गजों से लेकर राहुल तक मैदान में, सम्मान बनाम मानसिकता की सियासत
देहरादून। हल्द्वानी के रामलीला मैदान में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की सभा के बाद हुए कथित शुद्धिकरण के मामले ने उत्तराखंड कांग्रेस को एकजुट होकर राजनीतिक मोर्चा खोलने का मौका दे दिया है, जिस विवाद को शुरुआत में स्थानीय स्तर की घटना माना जा रहा था, कांग्रेस ने उसे अब दलित सम्मान, सामाजिक बराबरी और वैचारिक लड़ाई का मुद्दा बना दिया है। खरगे की आठ अगस्त को हल्द्वानी में सभा हुई थी। इसके बाद 10 अगस्त को रामलीला मैदान में हवन और गंगाजल छिड़कने का कार्यक्रम हुआ। इसके बाद विवाद ने राजनीतिक रंग पकड़ लिया। भाजपा ने आयोजन से किसी भी तरह का संबंध होने से इनकार किया है, जबकि कांग्रेस लगातार इस मामले में कार्रवाई की मांग कर रही है। कांग्रेस के लिए यह विवाद इसलिए भी अहम हो गया है क्योंकि पार्टी इसे केवल खरगे के अपमान के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक बराबरी के सवाल के रूप में पेश कर रही है। राज्यसभा में खरगे ने भी इस घटना पर आपत्ति जताई थी। बाद में संसद में मामला उठा और भाजपा की ओर से जांच तथा कार्रवाई का आश्वासन दिया गया।
अब कांग्रेस के प्रदेश स्तर के दिग्गज नेताओं ने भी मोर्चा संभाल लिया है। प्रीतम सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल राज्यपाल से मिलकर निष्पक्ष जांच की मांग कर चुका है। यानी पार्टी इस मामले को सड़क से राजभवन और राजभवन से राष्ट्रीय राजनीति तक ले जाने की तैयारी में दिखाई दे रही है। 29 अगस्त को राहुल गांधी के इस मुद्दे पर खुलकर सामने आने के बाद विवाद की राजनीतिक धार और तेज हो गई। राहुल ने कथित शुद्धिकरण को छुआछूत से जोड़ते हुए भाजपा और आरएसएस पर निशाना साधा तथा कार्रवाई और एफआइआर की मांग की। इससे उत्तराखंड कांग्रेस के लिए साफ राजनीतिक संदेश गया हैकृमुद्दा छोड़ना नहीं है, बल्कि इसे राष्ट्रीय बहस में बनाए रखना है।
कांग्रेस को इसमें एक साथ कई राजनीतिक संदेश दिखाई दे रहे हैं। पहला, दलित सम्मान का सवाल। दूसरा, सामाजिक न्याय का मुद्दा। तीसरा, भाजपा की वैचारिक राजनीति पर हमला और चौथा, आगामी विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी के कार्यकर्ताओं को एकजुट करने का अवसर। हालांकि कांग्रेस के सामने चुनौती भी कम नहीं है। भाजपा लगातार कह रही है कि शुद्धिकरण कार्यक्रम से उसका कोई संबंध नहीं था। ऐसे में कांग्रेस के आरोपों को राजनीतिक बयानबाजी से आगे ले जाने के लिए उसे ठोस तथ्य और जांच के निष्कर्ष सामने रखने होंगे। यही कारण है कि कांग्रेस अब मामले की निष्पक्ष जांच की मांग पर जोर दे रही है। पार्टी का तर्क है कि यदि घटना गलत है तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए और यदि भाजपा का इससे कोई संबंध नहीं है तो वह भी निष्पक्ष जांच के माध्यम से स्पष्ट हो जाएगा।
उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियां तेज होने के बीच कांग्रेस इस विवाद को राजनीतिक रूप से हल्के में लेने के मूड में नहीं है। प्रदेश में दलित मतदाताओं की राजनीतिक भूमिका महत्वपूर्ण है। ऐसे में कांग्रेस की कोशिश साफ दिखाई दे रही है कि शुद्धिकरण विवाद को सामाजिक सम्मान के बड़े सवाल से जोड़कर भाजपा के खिलाफ राजनीतिक नैरेटिव तैयार किया जाए। दूसरी ओर भाजपा के सामने चुनौती यह है कि वह इस मामले को लगातार बढ़ते राजनीतिक विवाद में बदलने से कैसे रोके। पार्टी के सामने एक तरफ धार्मिक भावनाओं से जुड़ा पक्ष है तो दूसरी तरफ कांग्रेस के सामाजिक भेदभाव के आरोप। यही वजह है कि हल्द्वानी का रामलीला मैदान अब केवल एक मैदान नहीं रह गया है। यह उत्तराखंड की आने वाली चुनावी राजनीति में वैचारिक टकराव का नया प्रतीक बनता दिखाई दे रहा है।
प्रीतम सिंह से लेकर प्रदेश कांग्रेस के अन्य वरिष्ठ नेताओं और अब राहुल गांधी तक इस मुद्दे पर सक्रियता बताती है कि कांग्रेस इसे महज एक दिन की बयानबाजी नहीं बनाना चाहती। पार्टी इसे लगातार राजनीतिक विमर्श में रखने की रणनीति पर आगे बढ़ रही है। खास बात यह है कि कांग्रेस के भीतर लंबे समय से संगठन, नेतृत्व और चुनावी रणनीति को लेकर अलग-अलग आवाजें उठती रही हैं। ऐसे में यह मुद्दा पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को एक साझा राजनीतिक मंच भी दे रहा है। यानी हल्द्वानी में शुद्धिकरण का विवाद अब कांग्रेस के लिए केवल सम्मान का सवाल नहीं, बल्कि 2027 की सियासत का एक संभावित राजनीतिक हथियार बनता जा रहा है।
आने वाले दिनों में कांग्रेस का रुख और आक्रामक हुआ तो यह मुद्दा उत्तराखंड की चुनावी राजनीति में विकास बनाम वैचारिक संघर्ष की नई बहस खड़ी कर सकता है। अब देखना यह होगा कि कांग्रेस इस मुद्दे को कितनी दूर तक ले जाती है और भाजपा इसका जवाब किस राजनीतिक रणनीति से देती है।
यूकेडी के सियासी तेवर ‘तल्ख’
उत्तराखंडियत के मुद्दे पर भाजपा व कांग्रेस को घेरने की तैयारी
संगठन विस्तार से लेकर बूथ तक सक्रियता बढ़ाने पर दिया जोर
देहरादून। विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के साथ उत्तराखंड क्रांति दल ने भी अपने सियासी तेवर तल्ख करने शुरू कर दिए हैं। राज्य आंदोलन की राजनीतिक विरासत का दावा करने वाला दल अब भाजपा और कांग्रेस के बीच सिमटी प्रदेश की राजनीति में अपनी मजबूत जगह बनाने की रणनीति पर आगे बढ़ रहा है। पार्टी का फोकस एक बार फिर उत्तराखंडियत, मूल निवास, भू-कानून, रोजगार, पलायन और पहाड़ के अधिकारों जैसे मुद्दों पर है। यूकेडी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि राज्य गठन के आंदोलन से निकली उसकी राजनीतिक ताकत को चुनावी वोट में कैसे बदला जाए। पिछले चुनावों में संगठनात्मक कमजोरी और सीमित जनाधार के कारण दल उम्मीद के अनुरूप प्रदर्शन नहीं कर पाया। लेकिन 2027 को लेकर पार्टी अब पहले से ज्यादा सक्रिय नजर आ रही है।
यूकेडी का मानना है कि उत्तराखंड बनने के बाद भी पहाड़ के मूल सवाल जस के तस हैं। रोजगार की तलाश में युवाओं का पलायन, जमीनों की खरीद-फरोख्त, गांवों का खाली होना और पहाड़ में बुनियादी सुविधाओं की कमी को लेकर दल भाजपा और कांग्रेस दोनों को कठघरे में खड़ा करने की तैयारी में है। पार्टी की रणनीति साफ हैकृउत्तराखंड के सवाल पर किसी राष्ट्रीय दल को राजनीतिक स्पेस नहीं दिया जाए। मूल निवास और सशक्त भू-कानून यूकेडी के प्रमुख मुद्दों में हैं। पार्टी इन सवालों को केवल विधानसभा के भीतर उठाने के बजाय गांव-गांव तक ले जाने की तैयारी कर रही है। इसके साथ ही बेरोजगार युवाओं, पूर्व सैनिकों, महिलाओं और राज्य आंदोलनकारियों से जुड़े मुद्दों को भी राजनीतिक अभियान का हिस्सा बनाने पर जोर है।
उत्तराखंड की राजनीति में यूकेडी के लिए सबसे बड़ी चुनौती भाजपा और कांग्रेस के बीच बने मजबूत द्विध्रुवीय मुकाबले को तोड़ना है। क्षेत्रीय दल होने के बावजूद यूकेडी अभी तक ऐसा व्यापक जनाधार नहीं बना सका है जो उसे सत्ता के निर्णायक विकल्प के रूप में स्थापित कर सके। यही वजह है कि पार्टी अब केवल मुद्दों की राजनीति तक सीमित नहीं रहना चाहती। संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने, नए कार्यकर्ताओं को जोड़ने और संभावित प्रत्याशियों को समय रहते सक्रिय करने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं। यूकेडी की कोशिश है कि चुनाव आने तक पार्टी का चेहरा केवल राज्य आंदोलन की पार्टी तक सीमित न रहे, बल्कि जनता के सामने सत्ता का वैकल्पिक माडल भी पेश करे।
यूकेडी भाजपा और कांग्रेस दोनों पर पहाड़ के साथ न्याय न करने का आरोप लगाता रहा है। ऐसे में चुनावी मैदान में पार्टी का सबसे बड़ा हथियार यही नैरेटिव हो सकता है कि राष्ट्रीय दलों की सरकारों ने राज्य गठन की मूल अवधारणाओं को कमजोर किया। भू-कानून और मूल निवास के सवाल पर युवाओं में बढ़ती चर्चा को देखते हुए यूकेडी इन्हें चुनावी मुद्दा बनाने की तैयारी में है। पार्टी की कोशिश होगी कि इन मुद्दों को भावनात्मक नारों से आगे ले जाकर रोजगार, जमीन और स्थानीय अधिकारों से जोड़ा जाए। हालांकि यूकेडी के लिए केवल आक्रामक बयानबाजी पर्याप्त नहीं होगी। उसे यह भी साबित करना होगा कि वह चुनावी संगठन, प्रत्याशी चयन, संसाधन और बूथ प्रबंधन के मोर्चे पर भाजपा-कांग्रेस का मुकाबला करने की स्थिति में है। पार्टी के सामने बिखरे हुए क्षेत्रीय मतों को एकजुट करने और छोटे क्षेत्रीय समूहों को साथ लाने की चुनौती भी है। यदि यूकेडी इस दिशा में सफल होता है तो 2027 के चुनाव में वह कई सीटों पर मुकाबले को त्रिकोणीय बना सकता है।
आने वाला विधानसभा चुनाव यूकेडी के लिए केवल सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि राजनीतिक अस्तित्व और प्रासंगिकता की भी परीक्षा है। पार्टी जितनी आक्रामकता से भाजपा-कांग्रेस को घेरने की कोशिश करेगी, उतना ही जनता उसके सामने यह सवाल रखेगी कि राज्य के लिए उसके पास सिर्फ मुद्दे हैं या सरकार चलाने का ठोस रोडमैप भी। फिलहाल यूकेडी ने संकेत दे दिया है कि 2027 के रण में वह दर्शक बनकर नहीं बैठने वाला। उत्तराखंडियत की जमीन पर अपना झंडा फिर बुलंद करने के लिए यूकेडी ने कमर कस ली है। अब असली परीक्षा यह है कि आक्रामक तेवर वोट में कितने बदलते हैं।
राष्ट्रीय फलक पर गूंजा ‘शुद्धिकरण’ विवाद
मुद्दाविहीन कांग्रेस कर रही तुष्टिकरण की राजनीति,कांग्रेस बोली-भाजपा असली मुद्दों से ध्यान भटका रही
भाजपा का हमलाकृजनता के सवालों से बचने के लिए कांग्रेस धार्मिक और जातीय मुद्दों का सहारा
संसद से लेकर प्रदेश के गलियारों तक गरमाई राजनीति, 2027 की लड़ाई के साफ हुए शुरुआती संकेत
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियां तेज होने के साथ ही भाजपा और कांग्रेस के बीच सियासी टकराव भी लगातार धार पकड़ रहा है। भाजपा ने कांग्रेस पर मुद्दाविहीन राजनीति और तुष्टिकरण का आरोप लगाते हुए हमला तेज कर दिया है। पार्टी का कहना है कि कांग्रेस के पास जनता के सामने रखने के लिए कोई ठोस एजेंडा नहीं है, इसलिए वह धार्मिक, जातीय और भावनात्मक मुद्दों को हवा देकर राजनीतिक जमीन तलाश रही है। भाजपा नेताओं का तर्क है कि कांग्रेस को प्रदेश में बेरोजगारी, पलायन, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, आपदा और पर्यटन जैसे सवालों पर अपनी नीति स्पष्ट करनी चाहिए। इसके बजाय पार्टी ऐसे मुद्दों को तूल दे रही है, जिनसे समाज में राजनीतिक ध्रुवीकरण पैदा हो सकता है। हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की सभा के बाद सामने आए कथित शुद्धिकरण विवाद को लेकर कांग्रेस की आक्रामकता को भी भाजपा इसी रणनीति का हिस्सा बता रही है। भाजपा का कहना है कि स्थानीय घटना को राष्ट्रीय मुद्दा बनाने की कोशिश की जा रही है।
भाजपा का सबसे बड़ा राजनीतिक हमला यही है कि कांग्रेस के पास प्रदेश की जनता को देने के लिए कोई स्पष्ट विजन नहीं है। पार्टी नेताओं के अनुसार चुनाव नजदीक आते ही कांग्रेस जाति, धर्म और कथित सामाजिक भेदभाव जैसे मुद्दों को आगे कर रही है, जबकि प्रदेश के विकास से जुड़े सवालों पर उसका एजेंडा स्पष्ट नहीं है। भाजपा इसे तुष्टिकरण की राजनीति करार दे रही है। पार्टी का कहना है कि उत्तराखंड की जनता विकास, रोजगार और बेहतर सुविधाएं चाहती है, लेकिन कांग्रेस का राजनीतिक विमर्श लगातार ऐसे मुद्दों की ओर जा रहा है जो भावनाओं को भड़काने का काम करते हैं। भाजपा की रणनीति भी साफ दिखाई दे रही है। वह कांग्रेस को विकास के सवाल पर घेरने के साथ-साथ उसके राजनीतिक मुद्दों को वोट बैंक की राजनीति से जोड़कर जनता के बीच ले जाने की तैयारी में है।
कांग्रेस भाजपा के आरोपों को खारिज करते हुए पलटवार कर रही है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि सामाजिक सम्मान, संविधान, बेरोजगारी, महंगाई और युवाओं के भविष्य जैसे मुद्दों को तुष्टिकरण कहना भाजपा की राजनीतिक रणनीति है। कांग्रेस का आरोप है कि सरकार अपने कार्यकाल की उपलब्धियों के बजाय विपक्ष पर आरोप लगाने में ज्यादा ऊर्जा खर्च कर रही है। पार्टी का दावा है कि प्रदेश में बेरोजगारी, पलायन, महंगाई और आपदा जैसे सवाल आज भी जनता के सामने हैं और वह इन्हीं मुद्दों को लेकर चुनाव मैदान में जाएगी। यानी दोनों दलों ने अपनी-अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करनी शुरू कर दी है।
उत्तराखंड में 2027 का विधानसभा चुनाव भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधी राजनीतिक लड़ाई के साथ-साथ नैरेटिव की लड़ाई भी बनने जा रहा है। भाजपा जहां कांग्रेस को तुष्टिकरण और वोट बैंक की राजनीति के कठघरे में खड़ा करने की कोशिश कर रही है, वहीं कांग्रेस भाजपा को बेरोजगारी, महंगाई, पलायन और जनसमस्याओं पर जवाबदेह बनाने की तैयारी में है। इस राजनीतिक जंग में दोनों दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे जनता के सामने अपना एजेंडा कितनी मजबूती से रख पाते हैं। कांग्रेस के लिए चुनौती इसलिए भी बड़ी है कि उसे भाजपा के मजबूत संगठन और सत्ता विरोधी भावनाओं के बीच अपनी चुनावी जमीन तैयार करनी है। वहीं भाजपा के सामने सत्ता में वापसी की हैट्रिक का लक्ष्य है, जिसके लिए उसे सरकार के कामकाज को लेकर जनता के सवालों का जवाब भी देना होगा।
आने वाले महीनों में हल्द्वानी का शुद्धिकरण विवाद, धार्मिक पहचान, सामाजिक सम्मान और तुष्टिकरण जैसे मुद्दे उत्तराखंड की राजनीति में और उछल सकते हैं। चुनावी माहौल बनने के साथ राजनीतिक दल ऐसे मुद्दों को अपने-अपने पक्ष में इस्तेमाल करने की कोशिश करेंगे। लेकिन जनता के सामने सवाल इससे बड़ा है। क्या चुनाव की राजनीति बेरोजगार युवा को रोजगार देगी? क्या पहाड़ से पलायन रोकने का रोडमैप सामने आएगा? क्या आपदा प्रभावित गांवों को सुरक्षित बनाने की ठोस योजना बनेगी? क्या स्वास्थ्य और शिक्षा की बदहाल व्यवस्थाओं पर कोई दल स्पष्ट जवाब देगा? यही वह सवाल हैं जिनसे कोई भी राजनीतिक दल लंबे समय तक बच नहीं सकता।
भाजपा कांग्रेस को मुद्दाविहीन बताकर तुष्टिकरण की राजनीति का आरोप लगा रही है। कांग्रेस पलटकर भाजपा पर असली मुद्दों से ध्यान भटकाने का आरोप लगा रही है। दोनों दलों की सियासी तलवारें खिंच चुकी हैं। लेकिन 2027 के चुनाव में अंतिम फैसला नेताओं के बयानों से नहीं, मतदाता के सवालों से होगा। उत्तराखंड का मतदाता यह देखेगा कि कौन दल भावनाओं की राजनीति से आगे बढ़कर रोजगार, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, जमीन और आपदा जैसे सवालों पर ठोस जवाब देता है। क्योंकि चुनाव में मुद्दा वही नहीं होता जो राजनीतिक दल तय करेंकृमुद्दा वह भी होता है जिसे जनता अपने जीवन में रोज झेलती है।
उत्तराखंड में ‘वार्मअप मैच’ शुरू
उत्तराखंड में सियासी पारा उफान पर, चुनाव अभी दूर लेकिन रणभूमि सजने लगी
हैट्रिक के लिए बेचौन, कांग्रेस सत्ता वापसी और यूकेडी तीसरे मोर्चे की तलाश में
बयान, आरोप और मुद्दों के बीच उत्तराखंड में आम जनता के सवाल चले गए पीछे
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव अभी सामने नहीं हैं, लेकिन सियासत ने पहले ही चुनावी रंग पकड़ लिया है। देहरादून से हल्द्वानी और हरिद्वार से पहाड़ तक राजनीतिक दलों की सक्रियता बढ़ रही है। कहीं संगठन मजबूत करने की कवायद है तो कहीं टिकट के दावेदार शक्ति प्रदर्शन में जुटे हैं। कहीं भाजपा कांग्रेस पर तुष्टिकरण का आरोप लगा रही है तो कांग्रेस सामाजिक सम्मान और लोकतांत्रिक मूल्यों का सवाल उठा रही है। उधर उत्तराखंड क्रांति दल राष्ट्रीय दलों के बीच तीसरी ताकत बनने की कोशिश में फिर आक्रामक तेवर दिखा रहा है। यानी 2027 का चुनाव अभी आया नहीं, लेकिन उत्तराखंड की राजनीति ने मानो वार्मअप मैच शुरू कर दिया है।
सत्तारूढ़ भाजपा के सामने सबसे बड़ा राजनीतिक लक्ष्य लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी का है। पार्टी संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने और चुनावी तैयारियों को समय से पहले धार देने में जुटी है। भाजपा के लिए सबसे बड़ा हथियार सत्ता में रहते हुए किए गए काम और मजबूत संगठन है। लेकिन सत्ता की तीसरी पारी की राह केवल उपलब्धियों के सहारे आसान नहीं होगी। बेरोजगारी, महंगाई, पलायन, आपदा, सड़क और स्थानीय रोजगार जैसे सवाल विपक्ष को सरकार को घेरने का मौका दे रहे हैं। इसलिए भाजपा की रणनीति दोहरी दिखाई दे रही हैकृएक तरफ विकास और सरकार के काम का नैरेटिव, दूसरी तरफ कांग्रेस पर वैचारिक और राजनीतिक हमला।
दूसरी ओर कांग्रेस सत्ता में वापसी के लिए अपनी जमीन तैयार कर रही है। प्रदेश में पार्टी के वरिष्ठ नेता सक्रिय हैं और राष्ट्रीय नेताओं की आवाजाही भी बढ़ रही है। कांग्रेस सरकार को बेरोजगारी, महंगाई, पलायन और जनसमस्याओं पर घेरने की तैयारी में है। लेकिन हाल के दिनों में हल्द्वानी के शुद्धिकरण विवाद ने पार्टी को एक अलग राजनीतिक मोर्चा भी दे दिया है। खड़गे की रैली के बाद रामलीला मैदान में हुए कथित शुद्धिकरण को कांग्रेस ने सामाजिक भेदभाव और सम्मान से जोड़ दिया है, जबकि भाजपा ने आयोजन से दूरी बनाई है। यह विवाद अब स्थानीय घटना से आगे बढ़कर भाजपा-कांग्रेस की वैचारिक लड़ाई का नया प्रतीक बन चुका है। यही वह जगह है जहां कांग्रेस को सावधान भी रहना होगा। यदि पार्टी लगातार भावनात्मक और पहचान आधारित मुद्दों पर ही केंद्रित दिखाई देती है तो भाजपा को उसे मुद्दाविहीन और तुष्टिकरण की राजनीति के आरोप में घेरने का मौका मिलेगा।
लेकिन भाजपा के लिए भी तस्वीर उतनी आसान नहीं है। सिर्फ कांग्रेस पर आरोप लगाने से जनता के सवाल खत्म नहीं होंगे। पहाड़ का युवा रोजगार पूछेगा। गांव का खाली होता घर पलायन पूछेगा। आपदा प्रभावित परिवार पुनर्वास पूछेंगे। मरीज अस्पताल पूछेगा और अभिभावक शिक्षा की गुणवत्ता। राजनीति का तापमान चाहे जितना बढ़े, जनता के घर का तापमान रसोई गैस, महंगाई और रोजगार से ही तय होगा। यही भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती है कि वह राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच सरकार के काम का ठोस हिसाब जनता तक पहुंचाए। इस बीच उत्तराखंड क्रांति दल ने भी राष्ट्रीय दलों के बीच अपना स्पेस तलाशना शुरू कर दिया है। यूकेडी की सक्रियता भाजपा और कांग्रेस के लिए इसलिए महत्वपूर्ण हो सकती है क्योंकि राज्य में मूल निवास, भू-कानून, रोजगार और उत्तराखंडियत जैसे सवाल लगातार चर्चा में हैं।
हालिया राजनीतिक विश्लेषणों में भी यूकेडी को भाजपा-कांग्रेस के बीच संभावित तीसरे कोण के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि यूकेडी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने मुद्दों को वोट में बदलने की है। आंदोलन की विरासत और चुनावी संगठनकृदोनों अलग चीजें हैं। यदि पार्टी संगठन को बूथ तक ले जाने और प्रभावी प्रत्याशी खड़े करने में सफल होती है तो कुछ सीटों पर मुकाबले का गणित जरूर बदल सकता है। चुनाव से पहले सबसे ज्यादा हलचल टिकट को लेकर है। संभावित प्रत्याशी अपने-अपने क्षेत्रों में सक्रियता बढ़ा रहे हैं। जनसंपर्क, शक्ति प्रदर्शन और संगठन में पकड़ बनाने की कोशिश शुरू हो चुकी है। यहां तक कि कुछ सीटों पर अभी से संभावित चेहरों को लेकर चर्चाएं तेज हैं। इसका सीधा असर पार्टियों की अंदरूनी राजनीति पर पड़ रहा है। चुनाव से पहले टिकट की राजनीति अक्सर पार्टी के भीतर सबसे बड़ा चुनाव बन जाती है।
उत्तराखंड की मौजूदा राजनीति को देखें तो एक तरफ वास्तविक मुद्दे हैं और दूसरी तरफ राजनीतिक नैरेटिव। एक तरफ बेरोजगारी, पलायन, महंगाई, आपदा, भू-कानून और मूल निवास जैसे सवाल हैं। दूसरी तरफ शुद्धिकरण, तुष्टिकरण, सनातन, सामाजिक सम्मान और वैचारिक संघर्ष जैसे मुद्दे राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आ रहे हैं। आने वाले महीनों में यही तय करेगा कि चुनावी बहस किस दिशा में जाती है। क्या उत्तराखंड का चुनाव रोजगार और पलायन पर लड़ा जाएगा या पहचान और भावनाओं पर? फिलहाल दोनों धाराएं समानांतर चल रही हैं। उत्तराखंड की राजनीति की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि चुनाव आते ही पहाड़ के सवाल फिर राजनीतिक मंचों पर लौट आते हैं, लेकिन चुनाव खत्म होते ही उनकी धार कमजोर पड़ जाती है। इस बार जनता शायद सिर्फ भाषण सुनने के मूड में नहीं है। सोशल मीडिया और नई पीढ़ी ने राजनीतिक सवाल पूछने का तरीका बदल दिया है। युवा अब यह भी पूछ रहा है कि घोषणा कितनी हुई और जमीन पर क्या बदला। इसलिए 2027 की लड़ाई केवल भाजपा बनाम कांग्रेस नहीं होगी। यह भरोसे बनाम नाराजगी, काम बनाम वादे और पुराने राजनीतिक नैरेटिव बनाम नए उत्तराखंड के सवालों की लड़ाई भी होगी। फिलहाल देहरादून के सत्ता गलियारों से लेकर पहाड़ के गांवों तक एक ही सवाल तैर रहा हैकृ
लेकिन उससे बड़ा सवाल हैकृ कि कौन जनता के सवालों को सबसे पहले अपना चुनावी मुद्दा बनाएगा? क्योंकि उत्तराखंड में सियासी पारा भले अभी से उबल रहा हो, असली गर्मी तब महसूस होगी जब जनता अपना फैसला सुनाने के करीब पहुंचेगी।
शनिवार, 29 अगस्त 2026
udaydinmaan: खड़गे के मंच पर ‘शुद्धिकरण’ से सुलगा सियासी संग्राम
udaydinmaan: खड़गे के मंच पर ‘शुद्धिकरण’ से सुलगा सियासी संग्राम: राहुल का वारकृदलित अध्यक्ष नहीं, संविधान और लोकतंत्र का हुआ अपमान गंगाजल छिड़कने और हवन को लेकर भाजपा-संघ पर राहुल का तीखा हमला दिल्ली में मच...
खड़गे के मंच पर ‘शुद्धिकरण’ से सुलगा सियासी संग्राम
राहुल का वारकृदलित अध्यक्ष नहीं, संविधान और लोकतंत्र का हुआ अपमान
गंगाजल छिड़कने और हवन को लेकर भाजपा-संघ पर राहुल का तीखा हमला
दिल्ली में मचा गया सियासी घमासान राहुल गांधी ने बीजेपी और संघ को घेरा
चुनावी महासमर में मामले को कांग्रेस बनाएगी राष्ट्रीय मुद्दा, बैकफुट पर बीजेपी
संतोष बेंजवाल
देहरादून। उत्तराखंड के हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के मंच पर गंगाजल छिड़कने और शुद्धिकरण हवन के दुस्साहस ने देश की राजधानी दिल्ली में प्रचंड राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने इस पूरे घटनाक्रम को लेकर केंद्र की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर तीखा हमला बोला है। राहुल ने साफ शब्दों में कहा कि यह सिर्फ एक जनसभा के मंच का अपमान नहीं, बल्कि देश के संविधान, लोकतंत्र और दलित समाज के मुंह पर करारा तमाचा है।
नई दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय में आयोजित संवाददाता सम्मेलन में राहुल गांधी के तेवर बेहद आक्रामक नजर आए। उन्होंने इस कृत्य को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 17 ;अस्पृश्यता का अंतद्ध की सरेआम धज्जियां उड़ाने वाला करार दिया। राहुल गांधी ने तीखे बाण चलाते हुए कहा कि यह घटना बीजेपी और संघ की सदियों पुरानी संकीर्ण और जातिवादी मानसिकता का नग्न प्रदर्शन है। देश के कानून में छुआछूत एक गंभीर और गैर-जमानती अपराध है। जब देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के दलित राष्ट्रीय अध्यक्ष के साथ सरेआम ऐसा घिनौना कृत्य किया जा सकता है, तो जरा सोचिए कि देश के दूर-दराज के गांवों में रहने वाले आम दलितों और मासूम बच्चों के साथ ये लोग कैसा सुलूक करते होंगे?
राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की खामोशी पर हमला बोलते हुए मांग की कि दोषियों और इस षड्यंत्र के पीछे मौजूद चेहरों पर अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत आपराधिक मुकदमा दर्ज कर उन्हें सलाखों के पीछे भेजा जाए। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर इस पर तत्काल कड़ी कानूनी कार्रवाई नहीं हुई, तो कांग्रेस इसे राष्ट्रीय स्तर पर जनांदोलन का रूप देगी।
बता दें कि उत्तराखंड के हल्द्वानी के रामलीला मैदान में मल्लिकार्जुन खड़गे की एक जनसभा आयोजित हुई थी। रैली समाप्त होने के दो दिन बाद, एक स्थानीय संगठन के कार्यकर्ताओं द्वारा मंच पर शुद्धिकरण हवन करने और गंगाजल छिड़कने का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। इस घटना के सामने आते ही सियासी हलकों में हड़कंप मच गया और संसद से लेकर सड़कों तक आक्रोश की लहर दौड़ गई।
राहुल गांधी के सीधे वार के बाद भारतीय जनता पार्टी ने भी अपने बचाव में मोर्चा संभाला। बीजेपी प्रवक्ताओं और प्रदेश नेताओं ने आरोपों को खारिज करते हुए इसे कांग्रेस की राजनीतिक हताशा का परिणाम बताया। बीजेपी का तर्क है कि इस तरह के किसी भी निजी या स्थानीय संगठन के धार्मिक अनुष्ठान से पार्टी का कोई सीधा संबंध नहीं है। कांग्रेस जनमुद्दों से भटक चुकी है और समाज में सामाजिक वैमनस्य फैलाकर राजनीतिक रोटियां सेकने की नाकाम कोशिश कर रही है।
उत्तराखंड में आगामी 2027 के विधानसभा चुनावों से ठीक पहले हुए इस घटनाक्रम ने पूरे प्रदेश के राजनीतिक समीकरण को गरमा दिया है। राहुल गांधी के आक्रामक तेवरों से साफ संकेत मिल रहे हैं कि कांग्रेस इस शुद्धिकरण कांड को दलित स्वाभिमान और सामाजिक न्याय की ढाल बनाकर सत्तापक्ष को चौतरफा घेरने के मूड में है।
मंच शुद्धीकरण पर ‘महाभारत’
राहुल का प्रधानमंत्री पर सीधा हमला, पूछा कहां है एफआईआर
राहुल गांधी बोलेदृ मंच शुद्धीकरण नहीं, यह संविधान का अपमान
उत्तराखंड की सीमाएं लांघ राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में पहुंचा विवाद
प्रदेश में विस चुनाव से पहले सम्मान बनाम सत्ता की नई सियासी जंग
देहरादून। उत्तराखंड की सियासत में मंच शुद्धीकरण का विवाद अब प्रदेश की सीमाओं से बाहर निकलकर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र तक पहुंचता दिख रहा है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री से इस मामले में एफआईआर दर्ज कराने के निर्देश देने की मांग कर भाजपा पर सीधा हमला बोला है। राहुल के बयान के बाद कांग्रेस ने इसे महज राजनीतिक विवाद नहीं, बल्कि सामाजिक सम्मान और संवैधानिक बराबरी का सवाल बताते हुए भाजपा को घेरना शुरू कर दिया है।
मंच पर मौजूदगी के बाद कथित शुद्धीकरण की घटना ने उत्तराखंड की राजनीति में पहले ही सवाल खड़े कर दिए थे। अब राहुल गांधी के हस्तक्षेप ने इस विवाद को नई राजनीतिक धार दे दी है। कांग्रेस का कहना है कि अगर किसी व्यक्ति की जाति या सामाजिक पहचान के आधार पर उसके जाने के बाद किसी सार्वजनिक मंच का शुद्धीकरण किया जाता है, तो यह सिर्फ एक व्यक्ति का अपमान नहीं, बल्कि संविधान की मूल भावना पर सवाल है।
राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री से मांग की कि मामले में एफआईआर दर्ज कराने के निर्देश दिए जाएं। कांग्रेस इसे भाजपा के लिए असहज करने वाला सवाल बता रही है। पार्टी नेताओं का कहना है कि एक तरफ भाजपा सामाजिक समरसता और सबका साथ, सबका विकास की बात करती है, वहीं दूसरी ओर उत्तराखंड में शुद्धीकरण जैसी घटना सामने आना गंभीर विरोधाभास है। कांग्रेस अब पूछ रही है कि अगर घटना गलत है तो कार्रवाई क्यों नहीं और अगर सही है तो जिम्मेदारी किसकी है? यही सवाल आने वाले दिनों में भाजपा के लिए राजनीतिक चुनौती बन सकता है।
मंच शुद्धीकरण का मामला पहले ही प्रदेश की सियासत में बड़ा विवाद बन चुका है। कांग्रेस इस मुद्दे को लेकर लगातार सरकार और भाजपा पर हमलावर है। मामला राजभवन तक पहुंचने के बाद विवाद की गंभीरता और बढ़ गई है। अब राहुल गांधी के बयान ने इसे राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श से भी जोड़ दिया है। कांग्रेस नेताओं का आरोप है कि उत्तराखंड जैसे सामाजिक रूप से संवेदनशील राज्य में ऐसी घटनाएं समाज को बांटने वाली मानसिकता को मजबूती देती हैं। पार्टी इस मुद्दे को आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर सामाजिक न्याय, सम्मान और बराबरी के सवाल से जोड़ने की कोशिश कर रही है।
विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारी में जुटी भाजपा के सामने यह विवाद ऐसे समय आया है, जब पार्टी लगातार संगठन को चुनावी मोड में ला रही है। भाजपा जहां विकास, सरकार की उपलब्धियों और संगठन की मजबूती को चुनावी मुद्दा बनाना चाहती है, वहीं कांग्रेस ऐसे विवादों के जरिए सरकार को सामाजिक मुद्दों पर घेरने की रणनीति अपना रही है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि शुद्धीकरण की राजनीति आखिर उत्तराखंड को किस दिशा में ले जा रही है? राजनीतिक मंच पर विरोध होना लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन किसी व्यक्ति की सामाजिक पहचान को आधार बनाकर उसके बाद मंच को शुद्ध करने की धारणा अगर स्थापित होती है, तो यह केवल राजनीतिक कटाक्ष नहीं रह जाती।
उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे करीब आ रहे हैं, वैसे-वैसे छोटे दिखने वाले राजनीतिक विवाद भी बड़े चुनावी मुद्दों में बदल रहे हैं। मंच शुद्धीकरण भी अब उसी दिशा में बढ़ता दिखाई दे रहा है। कांग्रेस के लिए यह भाजपा को घेरने का बड़ा हथियार बन सकता है, जबकि भाजपा के सामने चुनौती है कि वह इस विवाद को लंबा खिंचने से कैसे रोकती है। राहुल गांधी के सीधे प्रधानमंत्री से एफआईआर के निर्देश देने की मांग करने के बाद गेंद अब भाजपा के पाले में है। सवाल सिर्फ एक मंच के शुद्धीकरण का नहीं है। सवाल यह है कि उत्तराखंड की राजनीति में 2027 का चुनाव विकास के मुद्दों पर लड़ा जाएगा या सामाजिक सम्मान और पहचान के सवाल भी इसकी धुरी बनेंगे?
हरक की ‘विरासत’ पर भाजपा की ‘सियासत’
उत्तराखंड की बदलती राजनीति के बीच अनुकृति के बयान के सियासी मायने
भाजपा की प्रवक्ता बनीं अनुकृति ने हरक सिंह रावत के योगदान को याद किया
सवाल यह कि पुराने रिश्तों की विरासत से नई राजनीतिक पारी कितनी मजबूत होगी
ससुर का सम्मान या पार्टी के भीतर खुद की जगह बनाने की कवायद
देहरादून। राजनीति में रिश्ते कभी सिर्फ रिश्ते नहीं होते। खासकर तब, जब रिश्ता उत्तराखंड की उस राजनीति से जुड़ा हो जिसने पिछले दो दशक में कई बार सत्ता का रुख बदला हो। भाजपा प्रवक्ता अनुकृति गुसाईं रावत ने जब अपने ससुर और पूर्व मंत्री डा. हरक सिंह रावत का नाम लेकर कहा कि उत्तराखंड में भाजपा को मजबूती देने में उनका बहुत बड़ा योगदान रहा है, तो यह महज पारिवारिक सम्मान का बयान नहीं माना जा रहा। इस बयान में उत्तराखंड की बदलती सियासत की एक तस्वीर भी दिखाई देती है।
हरक सिंह रावत का राजनीतिक सफर उत्तराखंड की राजनीति के उन अध्यायों में शामिल है, जहां दल बदलना, सत्ता समीकरण और व्यक्तिगत राजनीतिक प्रभाव एक-दूसरे से अलग नहीं दिखाई देते। भाजपा से कांग्रेस और कांग्रेस से भाजपा तक की उनकी यात्राओं ने प्रदेश की राजनीति में कई बार हलचल पैदा की। अब उसी राजनीतिक विरासत का एक हिस्सा भाजपा के भीतर अनुकृति गुसाईं रावत के रूप में दिखाई दे रहा है।
अनुकृति का बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भाजपा 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर संगठनात्मक स्तर पर लगातार अपनी जमीन मजबूत करने में जुटी है। ऐसे समय में पार्टी की नई प्रवक्ता का अपने ससुर के भाजपा में योगदान को सार्वजनिक रूप से रेखांकित करना क्या केवल अतीत को याद करना है या भविष्य की राजनीति का संकेत भी?
उत्तराखंड की राजनीति में हरक सिंह रावत का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं। अलग-अलग राजनीतिक दलों में उनकी सक्रियता और सरकारों में उनकी भूमिका ने उन्हें प्रदेश की राजनीति का प्रभावशाली चेहरा बनाया। यही कारण है कि जब परिवार की अगली पीढ़ी भाजपा में सक्रिय भूमिका निभाती है और पुराने राजनीतिक योगदान को याद करती है, तो उसके राजनीतिक अर्थ भी निकाले जाते हैं। अनुकृति का बयान इसी संदर्भ में देखा जा रहा है।
हालांकि राजनीति में किसी नेता की विरासत केवल परिवार के नाम से आगे नहीं बढ़ती। उसे संगठन स्वीकार करता है, कार्यकर्ता स्वीकार करते हैं और सबसे बड़ी बातकृमतदाता स्वीकार करते हैं। भाजपा में प्रवक्ता की भूमिका मिलने के बाद अनुकृति के सामने भी यही चुनौती है कि वह पारिवारिक पहचान से आगे निकलकर अपनी अलग राजनीतिक पहचान कितनी तेजी से बनाती हैं। भाजपा की राजनीति में संगठन सबसे ऊपर होने का दावा लगातार किया जाता रहा है। ऐसे में किसी पुराने और प्रभावशाली नेता की राजनीतिक विरासत से जुड़े चेहरे को संगठन में जिम्मेदारी मिलना अपने आप में दिलचस्प है।
क्या भाजपा उत्तराखंड में पुराने राजनीतिक प्रभाव वाले परिवारों को भी अपनी रणनीति में जगह दे रही है? क्या पार्टी 2027 के लिए हर वर्ग और हर राजनीतिक प्रभाव क्षेत्र को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रही है? या फिर यह सिर्फ संगठन में एक सामान्य जिम्मेदारी है, जिसे परिवार की राजनीतिक पृष्ठभूमि से जोड़कर देखा जा रहा है? इन सवालों के जवाब आने वाले समय में भाजपा की गतिविधियों से मिलेंगे।
उत्तराखंड की राजनीति में परिवारवाद पर खूब बहस होती रही है। कांग्रेस हो या भाजपा, दोनों दलों में ऐसे नेताओं की कमी नहीं रही जिनके राजनीतिक परिवारों ने अगली पीढ़ी को राजनीति का रास्ता दिखाया। लेकिन पहाड़ की राजनीति में मतदाता केवल नाम देखकर हमेशा फैसला नहीं करता। यहां सड़क चाहिए, रोजगार चाहिए, स्वास्थ्य सुविधा चाहिए, पलायन का जवाब चाहिए। गांव खाली हो रहे हैं तो सवाल परिवार की राजनीतिक विरासत से आगे जाकर पूछा जाता है। अनुकृति गुसाईं के सामने भी यही कसौटी होगी। ससुर का राजनीतिक योगदान अपनी जगह है। लेकिन नई पीढ़ी की राजनीति को पुराने खाते की जमा पूंजी पर हमेशा नहीं चलाया जा सकता। उसे अपना खाता खोलना पड़ता है।
विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियां जैसे-जैसे तेज होंगी, उत्तराखंड भाजपा में कई नए चेहरे दिखाई देंगे। कुछ संगठन से आएंगे, कुछ आंदोलन की राजनीति से, कुछ सामाजिक क्षेत्र से और कुछ राजनीतिक परिवारों की विरासत लेकर। अनुकृति गुसाईं का राजनीतिक सफर भी इसी बड़ी तस्वीर का हिस्सा है। उनका बयान एक तरह से अतीत को स्वीकार करता हैकृकि परिवार का राजनीतिक इतिहास भाजपा से जुड़ा रहा है और हरक सिंह रावत का पार्टी को मजबूत करने में योगदान रहा है। लेकिन भविष्य का सवाल अलग है।
क्या अनुकृति अपने ससुर की राजनीतिक पहचान की उत्तराधिकारी बनेंगी या अपनी अलग राजनीतिक पहचान गढ़ेंगी? उत्तराखंड की राजनीति में यह सवाल छोटा नहीं है। क्योंकि पहाड़ में राजनीतिक विरासत दरवाजा खोल सकती है, लेकिन अंदर जगह बनाना अभी भी अपने काम से ही पड़ता है और 2027 का चुनाव यही तय करेगा कि राजनीतिक परिवार की पहचान कितनी दूर तक जाती है और नई राजनीति की अपनी पहचान कहां से शुरू होती है।
उत्तराखंड में कांग्रेस का ‘मिशन कमबैक’
दिग्गजों के दौरों से कार्यकर्ताओं में जान फूंकने की रणनीति
भाजपा के सियासी किले में सेंध लगाने की चल रही तैयारी
जमीनी पकड़ मजबूत करने व सरकार को घेरने की कवायद
आने वाले महीनों में राष्ट्रीय नेताओं के कार्यक्रमों की तैयारी
संगठन से लेकर बूथ तक सक्रियता बढ़ाने की रणनीति तय
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 भले ही अभी कुछ दूर हों, लेकिन सियासी दलों ने चुनावी मैदान को गर्म करना शुरू कर दिया है। भाजपा के बाद अब कांग्रेस भी अपनी चुनावी तैयारियों को धार देने में जुट गई है। पार्टी आने वाले महीनों में प्रदेश में राष्ट्रीय स्तर के कई बड़े नेताओं के दौरे कराने की तैयारी में है। इन दौरों के जरिये कांग्रेस जहां कार्यकर्ताओं में उत्साह भरने की कोशिश करेगी, वहीं सरकार के खिलाफ माहौल बनाने और चुनावी मुद्दों को जनता के बीच ले जाने की रणनीति पर भी काम होगा। कांग्रेस के लिए 2027 की लड़ाई सिर्फ सत्ता में वापसी की कोशिश नहीं, बल्कि प्रदेश में अपने राजनीतिक आधार को दोबारा मजबूत करने की चुनौती भी है। ऐसे में पार्टी की नजर अब विधानसभा क्षेत्रों से लेकर बूथ स्तर तक संगठन को सक्रिय करने पर है। राष्ट्रीय नेताओं के प्रस्तावित दौरे इसी व्यापक चुनावी रणनीति का हिस्सा माने जा रहे हैं।
कांग्रेस की रणनीति में राष्ट्रीय नेतृत्व की मौजूदगी को खास महत्व दिया जा रहा है। पार्टी के बड़े नेता उत्तराखंड पहुंचकर कार्यकर्ताओं के साथ संवाद करेंगे और विभिन्न कार्यक्रमों में भाग लेंगे। इन दौरों के दौरान बेरोजगारी, महंगाई, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाने की तैयारी है। कांग्रेस की कोशिश है कि चुनावी माहौल बनने से पहले ही इन मुद्दों को जनता के बीच लगातार जिंदा रखा जाए। पार्टी का मानना है कि चुनाव के समय अचानक सक्रिय होने के बजाय अभी से संगठन को मैदान में उतारने से कार्यकर्ताओं और मतदाताओं के बीच सीधा संपर्क मजबूत किया जा सकता है। कांग्रेस की चुनावी रणनीति का सबसे अहम हिस्सा विधानसभा क्षेत्रों में संगठन को सक्रिय करना है। पार्टी स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारियां सौंपकर बूथ स्तर तक पहुंच बढ़ाने पर जोर दे रही है।
दरअसल, उत्तराखंड की 70 विधानसभा सीटों पर मुकाबला एक जैसा नहीं है। पहाड़ और मैदान की राजनीतिक प्राथमिकताएं अलग हैं। कुमाऊं और गढ़वाल की सियासी परिस्थितियां भी अलग-अलग हैं। ऐसे में कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती एक ऐसी रणनीति तैयार करने की है, जो पूरे प्रदेश पर समान रूप से लागू होने के बजाय स्थानीय मुद्दों के मुताबिक आगे बढ़े। कांग्रेस के सामने केवल भाजपा सरकार को घेरने की चुनौती नहीं है। मतदाता के सामने अपना विकल्प और स्पष्ट रोडमैप रखना भी पार्टी के लिए जरूरी होगा। पिछले चुनावों में कांग्रेस के प्रदर्शन को देखते हुए पार्टी नेतृत्व जानता है कि केवल सत्ता विरोधी माहौल के भरोसे चुनाव नहीं जीता जा सकता। यही वजह है कि संगठनात्मक सक्रियता के साथ कांग्रेस अपने मुद्दों और संभावित चुनावी एजेंडे को भी आकार देने में जुटी है। युवा मतदाताओं पर विशेष फोकस रहने की संभावना है। रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता और पलायन जैसे सवालों को कांग्रेस चुनावी विमर्श का हिस्सा बनाना चाहती है।
कांग्रेस के राष्ट्रीय नेताओं के उत्तराखंड दौरे पार्टी के लिए दोहरे राजनीतिक लाभ का माध्यम बन सकते हैं। एक ओर इससे प्रदेश संगठन को ऊर्जा मिलेगी, दूसरी ओर राष्ट्रीय नेतृत्व के मंच से प्रदेश सरकार के खिलाफ हमले को व्यापक राजनीतिक स्वर दिया जा सकेगा। हालांकि कांग्रेस के लिए यह भी चुनौती होगी कि राष्ट्रीय नेताओं की सभाओं और कार्यक्रमों को केवल भीड़ जुटाने तक सीमित न रखा जाए। इन कार्यक्रमों का सीधा लाभ बूथ संगठन और स्थानीय चुनावी अभियान को मिले, इसके लिए पार्टी को स्पष्ट फॉलोअप रणनीति बनानी होगी। भाजपा ने संगठनात्मक स्तर पर 2027 को लेकर अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। ऐसे में कांग्रेस अब उस अंतर को पाटने की कोशिश कर रही है। राष्ट्रीय नेताओं के दौरे इसी प्रतिस्पर्धा का हिस्सा हैं। लेकिन असली मुकाबला मंचों पर नहीं, मैदान में होगा।
कौन सा दल गांव तक पहुंचता है? किसके कार्यकर्ता चुनाव से महीनों पहले मतदाता के दरवाजे पर दिखाई देते हैं? कौन स्थानीय नाराजगी को राजनीतिक मुद्दे में बदल पाता है? और कौन युवा मतदाता को अपने साथ जोड़ पाता है? 2027 की चुनावी पिच पर इन सवालों के जवाब ही जीत-हार की दिशा तय करेंगे। कांग्रेस ने दिग्गजों के दौरे की तैयारी शुरू कर दी है। अब देखना यह होगा कि इन दौरों से पैदा होने वाली सियासी गर्मी कितनी जल्दी संगठन की जमीन तक पहुंचती है।
‘वादों’ के मंच पर जनता का ‘हिसाब’
चुनावी आहट के बीच सियासी सरगर्मियों का दौर शुरू
इस बार नारों से ज्यादा कसौटी पर होंगे जमीनी मुद्दे
जनता पूछेगी सवाल, नेताओं को देना होगा हिसाब
2027 की चुनावी आहट के साथ बदल रहा माहौल
वादों से ज्यादा काम का लेखा-जोखा मांगेंगे मतदाता
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के साथ सियासत का तापमान बढ़ने लगा है। राजनीतिक दल संगठन को मजबूत करने, यात्राएं निकालने और बड़े नेताओं के दौरे कराने में जुट गए हैं। मंच सजने लगे हैं, नारों की तैयारी होने लगी है और दावेदार भी अपनी-अपनी जमीन तलाशने लगे हैं। लेकिन इस बार चुनावी मैदान में सिर्फ नेता नहीं होंगे। जनता भी सवालों की अपनी सूची लेकर खड़ी होगी। पांच साल पहले किए गए वादों से लेकर आज की जमीनी हकीकत तक, मतदाता नेताओं से हिसाब मांग सकता है। सवाल यह नहीं होगा कि मंच से किसने कितना बड़ा दावा किया। सवाल यह होगा कि गांव में सड़क पहुंची या नहीं, अस्पताल में डाक्टर आया या नहीं, स्कूल में शिक्षक है या नहीं और जिस युवा से रोजगार का वादा किया गया था, उसके लिए वास्तव में क्या बदला?
उत्तराखंड की राजनीति में पलायन सबसे पुराना और सबसे कठिन सवाल है। वर्षों से सरकारें पलायन रोकने, गांवों को आबाद करने और स्थानीय स्तर पर रोजगार पैदा करने की बातें करती रही हैं। योजनाएं भी बनीं, घोषणाएं भी हुईं। लेकिन चुनावी चौपाल में शायद सवाल फिर वही होगाकृगांव क्यों खाली हो रहे हैं? जिस परिवार का बेटा रोजगार के लिए देहरादून, दिल्ली या चंडीगढ़ चला गया, वह घोषणाओं से ज्यादा अपने गांव की स्थिति देखेगा। बंद पड़े घर, खाली स्कूल और खेती से दूर होती नई पीढ़ी किसी भी चुनावी भाषण से ज्यादा बड़ा सवाल खड़ा करती है।
उत्तराखंड की चुनावी राजनीति में युवा मतदाता निर्णायक भूमिका में है। प्रतियोगी परीक्षाओं, भर्ती प्रक्रियाओं, बेरोजगारी और सरकारी नौकरियों को लेकर युवाओं के सवाल इस बार भी चुनावी विमर्श के केंद्र में रह सकते हैं। युवा पूछ सकता हैकृभर्ती कब निकली, परीक्षा कब हुई, परिणाम कब आया और नियुक्ति कब मिली? यह सवाल किसी एक दल तक सीमित नहीं रहेगा। सत्ता पक्ष से जवाब मांगा जाएगा तो विपक्ष से भी पूछा जाएगा कि उसके पास समाधान क्या है। पहाड़ों में स्वास्थ्य सुविधाएं हमेशा चुनावी मुद्दा रही हैं। कई स्थानों पर अस्पतालों की इमारतें हैं, लेकिन विशेषज्ञ चिकित्सक और जरूरी सुविधाएं पर्याप्त नहीं। गंभीर मरीज को आज भी बड़े शहरों का रुख करना पड़ता है। चुनाव के समय सवाल सीधा होगाकृक्या पहाड़ के व्यक्ति को इलाज के लिए पहाड़ छोड़ना ही पड़ेगा? इसी तरह शिक्षा की स्थिति, शिक्षकों की उपलब्धता और सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता भी जनता के सवालों में शामिल होगी।
उत्तराखंड में विकास का सबसे दिखाई देने वाला चेहरा सड़क है। लेकिन बारिश के मौसम में सड़क टूटती है, पहाड़ दरकता है और कई बार यातायात ठप हो जाता है। चारधाम और पर्यटन परियोजनाओं से लेकर गांव की संपर्क सड़क तक, गुणवत्ता और टिकाऊपन पर सवाल उठते रहे हैं। इस बार जनता सिर्फ यह नहीं पूछेगी कि सड़क बनी या नहीं। सवाल होगाकृसड़क कितने साल चली और किस कीमत पर बनी? उत्तराखंड में आपदा अब चुनावी मुद्दे से अलग नहीं रह सकती। हर बरसात में भूस्खलन, सड़क बंद होने, नदी-नालों के उफान और बस्तियों पर खतरे की खबरें सामने आती हैं। ऐसे में जनता यह भी पूछेगी कि आपदा आने के बाद राहत कितनी मिली, लेकिन उससे बड़ा सवाल होगाकृआपदा आने से पहले तैयारी कितनी थी? प्राकृतिक आपदाओं के लिहाज से संवेदनशील प्रदेश में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन का सवाल भी राजनीतिक दलों के सामने होगा।
उत्तराखंड के सामाजिक और आर्थिक ढांचे में महिलाओं की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। पानी, स्वास्थ्य, महंगाई, परिवार की आय, रोजगार और पलायन का सीधा असर उन पर पड़ता है। इसलिए महिला मतदाता से केवल भावनात्मक अपील पर्याप्त नहीं होगी। उसे यह जानना होगा कि उसके जीवन में पिछले पांच वर्षों में क्या बदला। चुनाव नजदीक आते ही राजनीतिक दल बड़े-बड़े मंच तैयार करेंगे। घोषणाएं होंगी, यात्राएं निकलेंगी और आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलेगा। लेकिन इस बार चुनावी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा शायद मंच नहीं, जनता की चौपाल होगी। क्योंकि मतदाता अब केवल यह सुनना नहीं चाहता कि प्रदेश कितना आगे बढ़ा। वह यह भी देखना चाहता है कि उसके गांव, उसके मोहल्ले और उसके परिवार की जिंदगी कितनी बदली।
2027 की चुनावी जंग में भाजपा और कांग्रेस दोनों के सामने अपनी-अपनी उपलब्धियां और दावे होंगे। छोटे दल भी अपने सवाल लेकर मैदान में उतरेंगे। लेकिन अंतिम फैसला उस मतदाता के हाथ में होगा जो पांच साल के अनुभव को अपने मतदान के दिन याद रखेगा। इस बार सवाल सिर्फ यह नहीं होगा कि कौन जीतेगा। बड़ा सवाल यह होगा कि जनता के सवालों का जवाब कौन बेहतर तरीके से दे पाएगा। क्योंकि चुनावी मौसम में नेता दरवाजे पर आएंगे। इस बार दरवाजा जनता खोलेगीकृऔर सवाल भी वही पूछेगी।
‘विधायक पर अवतरित हुए देवता’
भटवाड़ी के जौराई बुग्याल मेले में दिखा आस्था का अद्भुत रंग
गंगोत्री विधायक सुरेश चौहान पर नागराजा देवता अवतरित हुए
देवभूमि की सदियों पुरानी लोक आस्था और परंपरा का संगम
क्षेत्र में अचानक बदला माहौल और उमड़ा आस्था का सैलाब
देहरादून। भटवाड़ी विकासखंड के जौराई गांव में आयोजित बेलक-जौराई बुग्याल पर्यटन मेले में आस्था, परंपरा और लोक संस्कृति का अनूठा संगम देखने को मिला। मेले के दौरान उस समय माहौल पूरी तरह भक्तिमय हो गया, जब गंगोत्री विधायक सुरेश चौहान पर नागराजा देवता अवतरित हुए। देवता के अवतरण के बाद श्रद्धालुओं और ग्रामीणों में विशेष उत्साह देखने को मिला। बड़ी संख्या में मौजूद लोगों ने इसे देवभूमि की सदियों पुरानी लोक आस्था और परंपरा से जोड़कर देखा।
जौराई बुग्याल मेला केवल मनोरंजन या पर्यटन का आयोजन नहीं, बल्कि क्षेत्र की धार्मिक मान्यताओं, लोक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। मेले में आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में ग्रामीण और श्रद्धालु पहुंचे। पूजा-अर्चना, पारंपरिक अनुष्ठानों और लोक रीति-रिवाजों के बीच मेले का वातावरण पूरी तरह आध्यात्मिक नजर आया।
मेले में विधायक सुरेश चौहान भी शामिल हुए और उन्होंने क्षेत्रवासियों को मेले की शुभकामनाएं दीं। इसी दौरान देवता के अवतरण की मान्यता के साथ माहौल अचानक बदल गया। श्रद्धालु हाथ जोड़कर खड़े हो गए और बड़ी संख्या में लोग इस धार्मिक क्षण के साक्षी बने। ग्रामीणों के लिए यह दृश्य मेले के सबसे विशेष क्षणों में शामिल रहा।
स्थानीय लोगों का मानना है कि पहाड़ की लोक संस्कृति में देव परंपरा केवल धार्मिक विश्वास नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का भी महत्वपूर्ण आधार रही है। गांवों के मेलों और धार्मिक आयोजनों में देव डोली, देव अवतरण और पारंपरिक अनुष्ठानों की अपनी विशिष्ट भूमिका होती है। यही परंपराएं पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती रही हैं।
जौराई बुग्याल क्षेत्र की प्राकृतिक खूबसूरती के साथ इसकी सांस्कृतिक पहचान भी इसकी बड़ी ताकत है। पर्यटन के बढ़ते विस्तार के बीच स्थानीय लोगों के सामने अपनी पारंपरिक संस्कृति और धार्मिक विरासत को संरक्षित रखने की चुनौती भी है। मेले जैसे आयोजन इस लिहाज से महत्वपूर्ण माने जाते हैं, क्योंकि इनके माध्यम से नई पीढ़ी अपनी जड़ों, लोक मान्यताओं और पारंपरिक जीवनशैली से जुड़ती है।
विधायक सुरेश चौहान ने भी क्षेत्र की धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं को संरक्षित रखने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन स्थानीय संस्कृति को पहचान देने के साथ-साथ ग्रामीण पर्यटन को बढ़ावा देने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
जौराई बुग्याल मेले में इस बार जहां प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासत आकर्षण का केंद्र रही, वहीं विधायक पर नागराजा देवता के अवतरण की घटना ने आयोजन को धार्मिक आस्था के लिहाज से भी खास बना दिया। श्रद्धालुओं के बीच दिनभर इसी घटना की चर्चा रही।
शुक्रवार, 28 अगस्त 2026
udaydinmaan: उत्तराखंड के सियासी मैदान में ‘बयानवीर’
udaydinmaan: उत्तराखंड के सियासी मैदान में ‘बयानवीर’: चुनाव की आहट मिलते ही बंद कमरों की बैठकों से निकलकर सार्वजनिक मंचों पर छाने की होड़ सबसे मुखर चेहरा बनने की रेस में विपक्षी दलों के साथ ही पा...
उत्तराखंड के सियासी मैदान में ‘बयानवीर’
चुनाव की आहट मिलते ही बंद कमरों की बैठकों से निकलकर सार्वजनिक मंचों पर छाने की होड़
सबसे मुखर चेहरा बनने की रेस में विपक्षी दलों के साथ ही पार्टी की रणनीति पर उठ रहे सवाल
ोत्रीय दबदबा कायम रखने के लिए बयानबाजी बन गई है सियासी संदेश देने का सबसे बड़ा हथियार
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की आहट तेज होते ही सियासी मैदान में बयानवीरों की सक्रियता बढ़ गई है, जिन नेताओं की आवाज लंबे समय से संगठनात्मक बैठकों या सीमित राजनीतिक मंचों तक सुनाई दे रही थी, वह अब सार्वजनिक मंचों, प्रेस कांफ्रेंस और सोशल मीडिया पर लगातार नजर आने लगे हैं। कोई अपनी ही पार्टी की रणनीति पर सवाल उठा रहा है तो कोई विपक्ष के खिलाफ मोर्चा खोलकर खुद को सबसे मुखर चेहरा साबित करने में जुटा है। चुनाव अभी कुछ दूर है, लेकिन राजनीतिक तापमान तेजी से बढ़ रहा है। टिकट की दावेदारी, संगठन में जगह, राजनीतिक भविष्य और क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर नेताओं के बीच अंदरूनी खींचतान भी अब धीरे-धीरे सार्वजनिक होती दिख रही है। बयान अब केवल विपक्ष पर हमला करने का हथियार नहीं रह गए हैं, बल्कि कई बार अपनी ही पार्टी के भीतर संदेश देने का माध्यम भी बन रहे हैं।
उत्तराखंड की राजनीति में चुनाव से पहले नेताओं का मुखर होना कोई नई बात नहीं है। लेकिन इस बार सोशल मीडिया ने बयानबाजी को और धार दे दी है। सुबह दिया गया बयान दोपहर तक वायरल हो जाता है और शाम तक उस पर पार्टी के भीतर और बाहर प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हो जाता है। ऐसे में कई नेता शायद यह भी समझने लगे हैं कि राजनीतिक चर्चा में बने रहने का सबसे आसान रास्ता बयान देना है। विधानसभा चुनाव के करीब आते ही संभावित दावेदारों की सक्रियता बढ़ना स्वाभाविक है। हर सीट पर कई चेहरे अपनी जमीन मजबूत करने में जुटे हैं। ऐसे में नेताओं के लिए सिर्फ जनता के बीच जाना ही पर्याप्त नहीं रह गया है। उन्हें पार्टी नेतृत्व की नजर में भी अपनी उपयोगिता साबित करनी है। यहीं से बयानबाजी का खेल शुरू होता है।
किसी नेता का बयान अपनी ही सरकार या संगठन की कार्यशैली पर सवाल खड़ा करता है तो किसी दूसरे नेता का बयान सीधे पार्टी के भीतर चल रही खींचतान की ओर इशारा करता है। कई बार नेता किसी मुद्दे पर पार्टी लाइन से अलग राय रखते हुए दिखाई देते हैं। इसे कोई जनहित की आवाज बताता है तो कोई टिकट की राजनीति का हिस्सा। राजनीति में धारणा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितना संगठन। इसलिए हर बयान के पीछे राजनीतिक संदेश तलाशा जाने लगा है।
चुनाव के समय विपक्ष पर हमला करना राजनीति का सामान्य हिस्सा है। भाजपा के नेता कांग्रेस को निशाने पर ले रहे हैं तो कांग्रेस नेता भाजपा सरकार की नीतियों और कामकाज पर सवाल उठा रहे हैं। क्षेत्रीय दल भी अपनी जमीन तलाशने में जुटे हैं। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि कई बयान विपक्ष से ज्यादा अपनी पार्टी के भीतर चर्चा पैदा कर रहे हैं। नेता जब अपनी ही पार्टी के किसी फैसले पर सवाल उठाता है तो उसका निशाना वास्तव में कौन हैकृयह सवाल राजनीतिक गलियारों में घूमने लगता है। बयान देने वाला नेता भले ही इसे जनभावना की आवाज बताए, लेकिन पार्टी के भीतर इसे टिकट, पद या प्रभाव की राजनीति से जोड़कर देखा जाता है। यानी बयान विपक्ष के लिए हो सकता है, लेकिन संदेश अक्सर अपनों के लिए होता है।
पहले नेता बयान देते थे तो अगले दिन अखबारों में उसकी खबर आती थी। अब तस्वीर कुछ अलग है। सोशल मीडिया ने हर नेता को अपना छोटा सा मीडिया प्लेटफार्म दे दिया है। एक वीडियो, एक पोस्ट या कुछ पंक्तियों का बयान राजनीतिक बहस को जन्म देने के लिए काफी है। यही वजह है कि नेता अब मुद्दों पर प्रतिक्रिया देने में देर नहीं करना चाहते। कोई घटना हुई नहीं कि बयान तैयार। विपक्ष ने कुछ कहा नहीं कि पलटवार तैयार। पार्टी ने कोई फैसला किया नहीं कि समर्थन या विरोध का संदेश तैयार। राजनीति में सक्रियता जरूरी है, लेकिन लगातार बयान देने की होड़ ने कई बार मुद्दे की गंभीरता को पीछे छोड़ दिया है।
चुनावी राजनीति में बयान महत्वपूर्ण हो सकते हैं, लेकिन आखिरकार जनता के सामने सवाल काम का ही आता है। उत्तराखंड का मतदाता रोजगार, पलायन, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, महंगाई, आपदा और स्थानीय विकास जैसे मुद्दों पर जवाब चाहता है। ऐसे में बयानवीरों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे अपनी बयानबाजी को जनसरोकार से कितना जोड़ पाते हैं। सिर्फ यह बताना आसान है कि विपक्ष गलत है। यह बताना भी आसान है कि अपनी पार्टी में सब ठीक नहीं है। मुश्किल यह बताना है कि अगर जनता ने मौका दिया तो समाधान क्या होगा।
उत्तराखंड में 2027 की चुनावी पिच तैयार होने लगी है। राजनीतिक दल संगठन को मजबूत करने में जुटे हैं, संभावित प्रत्याशी अपनी जमीन नाप रहे हैं और नेता अपनी राजनीतिक हैसियत का आकलन कर रहे हैं। इसी बीच बयानवीरों की बढ़ती सक्रियता यह संकेत दे रही है कि आने वाले महीनों में सियासी शोर और बढ़ने वाला है। अब देखना यह होगा कि इन बयानों में कितने वास्तव में जनता के मुद्दे उठाते हैं और कितने टिकट की कतार में अपनी जगह बनाने की कवायद साबित होते हैं। क्योंकि चुनाव में बयान सुर्खियां तो बना सकते हैं, लेकिन वोटर के मन में जगह बनाने के लिए सिर्फ बयान काफी नहीं होते। आखिरकार माइक नेता के हाथ में होता है, लेकिन फैसला जनता के हाथ में।
उत्तराखंड में वोटर लिस्ट का ‘धर्मयुद्ध’
एसआईआर प्रक्रिया पर सियासत गर्म, संस्थाओं की शुचिता बनाम राजनीतिक नफा-नुकसान
प्रक्रिया पर सवाल उठाना हक, लेकिन क्या कागजों और तथ्यों के साथ मैदान में है विपक्ष
हर पात्र को मिले मताधिकार, पर राजनीतिक बयानबाजी से न बिगड़े संस्थागत व्यवस्था
कटघरे में खड़ा करने के बजाय संस्थागत प्रक्रिया और नियम-प्रमाण से निपटे विवाद
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर सियासत लगातार गरमा रही है। कांग्रेस जहां प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं और पारदर्शिता की कमी का सवाल उठाते हुए निर्वाचन आयोग के सामने अपनी आपत्तियां दर्ज करा रही है, वहीं भाजपा कांग्रेस पर एसआईआर की संवैधानिक प्रक्रिया में बाधा डालने का आरोप लगा रही है। मुद्दा अब केवल मतदाता सूची के पुनरीक्षण तक सीमित नहीं रह गया है। यह सवाल भी उठने लगा है कि चुनाव से ठीक पहले राजनीतिक दल संवैधानिक संस्थाओं की प्रक्रिया को किस नजरिये से देखते हैं। लोकतंत्र में मतदाता सूची की शुचिता जितनी महत्वपूर्ण है, उतना ही जरूरी यह भी है कि उस प्रक्रिया को राजनीतिक लाभ-हानि के चश्मे से देखने के बजाय नियम और प्रमाण के आधार पर परखा जाए।
कांग्रेस को यदि एसआईआर में किसी स्तर पर गड़बड़ी दिखाई दे रही है तो उसे तथ्यों और दस्तावेजों के साथ निर्वाचन आयोग के सामने रखना चाहिए। किसी मतदाता का नाम गलत तरीके से हटाया गया है तो उसका विवरण सामने आना चाहिए। किसी पात्र व्यक्ति को सूची से बाहर किया गया है तो उसकी शिकायत का समाधान कराने के लिए संस्थागत रास्ता अपनाया जाना चाहिए। यही जिम्मेदार विपक्ष की भूमिका है। लेकिन दूसरी तरफ यह भी सच है कि केवल आशंकाओं के आधार पर पूरी प्रक्रिया को कटघरे में खड़ा कर देना लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति अविश्वास पैदा कर सकता है।
उत्तराखंड में एसआईआर की प्रक्रिया प्रशासनिक स्तर पर चल रही है और जिला प्रशासन की वेबसाइटों पर भी इससे संबंधित सूचनाएं, बैठकें और प्रशिक्षण संबंधी विवरण सार्वजनिक किए जा रहे हैं। ऐसे में कांग्रेस को यह स्पष्ट करना होगा कि उसकी लड़ाई फर्जी मतदाताओं के खिलाफ है या वैध मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा के लिए। दोनों के बीच फर्क करना बेहद जरूरी है। अगर किसी व्यक्ति का नाम दो जगह है, व्यक्ति का निधन हो चुका है, वह स्थायी रूप से कहीं और चला गया है या मतदाता सूची में उसका नाम नियमों के विपरीत दर्ज है, तो उसका सत्यापन होना चाहिए। लेकिन इसी प्रक्रिया में किसी वास्तविक मतदाता का नाम केवल राजनीतिक पहचान, धर्म, जाति या क्षेत्र के आधार पर प्रभावित होता है तो उसका विरोध भी उतनी ही मजबूती से होना चाहिए। यही लोकतंत्र का संतुलन है।
कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह एसआईआर के मुद्दे को तुष्टिकरण बनाम ध्रुवीकरण की राजनीति में फंसने से बचाए। चुनावी राजनीति में हर दल अपने वोट बैंक की चिंता करता है, लेकिन मतदाता सूची किसी दल का वोट बैंक नहीं होती। वह लोकतंत्र की बुनियादी सूची है। कांग्रेस यदि वास्तव में मतदाता अधिकारों को लेकर गंभीर है तो उसे बूथ स्तर तक अपने प्रतिनिधियों को सक्रिय करना चाहिए। एक-एक आपत्ति की जांच करानी चाहिए और जहां गलती मिले, वहां निर्वाचन आयोग से सुधार की मांग करनी चाहिए। इससे उसका पक्ष भी मजबूत होगा और जनता के बीच यह संदेश भी जाएगा कि पार्टी चुनावी लाभ से ज्यादा चुनावी प्रक्रिया की शुचिता को महत्व देती है।
भाजपा के लिए भी यह सवाल कम महत्वपूर्ण नहीं है। यदि वह एसआईआर को लेकर कांग्रेस पर राजनीति करने का आरोप लगा रही है तो उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी हो। किसी भी पात्र मतदाता का नाम न कटे और किसी भी अपात्र नाम को राजनीतिक संरक्षण न मिले। केवल कांग्रेस के विरोध को राजनीतिक मुद्दा बनाने से ज्यादा जरूरी है कि भाजपा भी निर्वाचन प्रक्रिया की निष्पक्षता के पक्ष में खड़ी दिखाई दे।
दरअसल, चुनाव लोकतंत्र का सबसे बड़ा उत्सव तभी बन सकता है जब मतदाता सूची पर जनता का भरोसा कायम रहे। एसआईआर किसी राजनीतिक दल की जीत या हार का औजार नहीं हो सकता। यह निर्वाचन व्यवस्था की एक प्रक्रिया है। इसलिए कांग्रेस को विरोध करना है तो करे, सवाल पूछने हैं तो पूछे, शिकायत करनी है तो करेकृलेकिन हर सवाल तथ्य और प्रमाण के साथ होना चाहिए। इसी तरह सत्ता पक्ष को भी विपक्ष की हर आपत्ति को राजनीतिक साजिश बताकर खारिज करने के बजाय गंभीरता से जांच की मांग करनी चाहिए। उत्तराखंड चुनावी मोड में प्रवेश कर चुका है। ऐसे समय में राजनीतिक दलों के सामने असली परीक्षा भाषणों की नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति उनके व्यवहार की है।
कांग्रेस के लिए यह मौका है कि वह तुष्टिकरण की राजनीति के आरोपों से बाहर निकलकर एक जिम्मेदार और तथ्याधारित विपक्ष की भूमिका निभाए। उसे यह साबित करना होगा कि उसकी चिंता किसी खास समुदाय के वोटों को बचाने की नहीं, बल्कि हर पात्र नागरिक के मताधिकार को सुरक्षित रखने की है। क्योंकि लोकतंत्र में एक गलत नाम भी समस्या है और एक सही नाम का गलत तरीके से कटना भी उतनी ही बड़ी समस्या। इसलिए एसआईआर पर सियासत की जगह संविधान, कानून और तथ्य को केंद्र में रखने की जरूरत है। चुनाव आएंगे और जाएंगे, सरकारें बदलेंगी, विपक्ष सत्ता में आएगाकृलेकिन मतदाता सूची की विश्वसनीयता कमजोर हुई तो नुकसान किसी एक पार्टी का नहीं, पूरे लोकतंत्र का होगा।
भाजपा का ‘आपरेशन विस्तार’ पर फोकस
छोटे दलों से बड़े चेहरों तक साध रही सियासी बिसात
संगठन मजबूत करने के साथ विपक्ष में सेंधमारी पर जोर
2027 की हैट्रिक के लिए मैदान तैयार कर रही भाजपा
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की औपचारिक घोषणा भले ही अभी दूर हो, लेकिन सियासी दलों ने चुनावी तैयारियों को रफ्तार दे दी है। इनमें भारतीय जनता पार्टी सबसे आगे दिखाई दे रही है। पार्टी चुनाव की घोषणा का इंतजार करने के बजाय पहले से ही ऐसा राजनीतिक माहौल तैयार करने में जुटी है, जिसमें संगठन की ताकत, सामाजिक समीकरण और विपक्ष की कमजोरीकृतीनों एक साथ दिखाई दें। छोटे राजनीतिक दलों को अपने साथ मिलाने से लेकर दूसरे दलों के प्रभावशाली नेताओं को भाजपा की सदस्यता दिलाने तक, पार्टी का आपरेशन विस्तार लगातार जारी है।
भाजपा की रणनीति को केवल दल-बदल तक सीमित करके देखना शायद सही नहीं होगा। इसके पीछे 2027 में लगातार तीसरी बार सत्ता हासिल करने की व्यापक चुनावी रणनीति दिखाई दे रही है। पार्टी का लक्ष्य है कि चुनाव की घोषणा होने तक संगठनात्मक स्तर पर वह इतनी मजबूत स्थिति में पहुंच जाए कि विपक्ष को प्रतिक्रिया देने के लिए मजबूर होना पड़े। उत्तराखंड की राजनीति में कई छोटे राजनीतिक दल और क्षेत्रीय संगठन भले ही विधानसभा चुनाव में निर्णायक संख्या में सीटें न जीत पाते हों, लेकिन अलग-अलग क्षेत्रों और सामाजिक समूहों में उनकी पकड़ रहती है। भाजपा अब ऐसे संगठनों को अपने साथ जोड़कर चुनावी समीकरणों को मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
हालिया दौर में गोरखा डेमोक्रेटिक फ्रंट का भाजपा में विलय भी इसी रणनीति की एक कड़ी के रूप में देखा जा रहा है। भाजपा के लिए ऐसे संगठनों का साथ आना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पार्टी को केवल सदस्य नहीं मिलते, बल्कि उनके साथ जुड़े स्थानीय कार्यकर्ता, समर्थक और सामाजिक नेटवर्क भी भाजपा के संगठन का हिस्सा बनते हैं। यानी भाजपा की नजर केवल संख्या पर नहीं, सामाजिक पहुंच के विस्तार पर भी है। भाजपा की दूसरी रणनीति विपक्षी दलों के प्रभावशाली नेताओं को अपने पाले में लाने की है। उत्तराखंड की राजनीति में नेताओं का दल बदलना कोई नई बात नहीं है, लेकिन चुनाव से करीब एक साल पहले होने वाली ऐसी राजनीतिक गतिविधियों का असर कहीं ज्यादा होता है।
किसी बड़े नेता के भाजपा में आने से पार्टी को तत्काल राजनीतिक प्रचार मिलता है। उसके समर्थकों और स्थानीय प्रभाव का लाभ मिलने की उम्मीद रहती है। इससे विपक्ष के भीतर भी असमंजस पैदा होता है और कार्यकर्ताओं के मनोबल पर असर पड़ सकता है। यही वजह है कि भाजपा ऐसे चेहरों को अपने साथ जोड़ने में कोई मौका नहीं छोड़ना चाहती, जिनकी अपने क्षेत्र में राजनीतिक पहचान है। भाजपा की चुनावी रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा उसका संगठन है। पार्टी पहले ही बूथ स्तर तक चुनावी तैयारियों को मजबूत करने में जुटी है। 70 विधानसभा क्षेत्रों में संगठनात्मक सक्रियता बढ़ाने, बूथ समितियों को सक्रिय करने और स्थानीय स्तर पर राजनीतिक समीकरणों की समीक्षा का काम चल रहा है। इस रणनीति में नए नेताओं और छोटे दलों का भाजपा में आना अतिरिक्त ताकत के रूप में देखा जा रहा है।
पार्टी की कोशिश साफ हैकृचुनाव की घोषणा होने तक संगठन को चुनावी मोड में पूरी तरह सक्रिय कर दिया जाए। इसके बाद जब आचार संहिता लागू होगी तो राजनीतिक दलों के पास समय सीमित होगा। भाजपा इससे पहले ही अपना राजनीतिक आधार मजबूत करना चाहती है। भाजपा के लगातार विस्तार का सबसे सीधा राजनीतिक असर कांग्रेस पर पड़ना तय माना जा रहा है। कांग्रेस जहां सरकार के खिलाफ मुद्दे तलाश रही है, वहीं भाजपा चुनाव से पहले ही अपना कुनबा बढ़ाने में जुटी है। विपक्ष के सामने चुनौती दोहरी है। एक तरफ उसे भाजपा सरकार के खिलाफ जनता के बीच मुद्दे खड़े करने होंगे, दूसरी ओर अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं को एकजुट रखना होगा।
राजनीति में यह धारणा महत्वपूर्ण होती है कि कौन जीतने की स्थिति में दिखाई दे रहा है। यदि चुनाव से पहले लगातार दूसरे दलों के नेता भाजपा में शामिल होते रहे तो इससे भाजपा के पक्ष में राजनीतिक माहौल बनने का मनोवैज्ञानिक लाभ भी मिल सकता है। कांग्रेस के लिए इसलिए जरूरी होगा कि वह केवल भाजपा में शामिल होने वाले नेताओं की आलोचना करने तक सीमित न रहे, बल्कि अपने संगठन को भी सक्रिय करे और जनता के बीच अपनी वैकल्पिक राजनीतिक तस्वीर स्पष्ट करे।
भाजपा पहले ही 2027 में लगातार तीसरी बार सरकार बनाने का लक्ष्य सार्वजनिक रूप से रख चुकी है। ऐसे में चुनाव से पहले होने वाला हर राजनीतिक घटनाक्रम पार्टी के लिए महत्वपूर्ण है। भाजपा की रणनीति में एक तरफ उपलब्धियों का प्रचार है तो दूसरी तरफ संगठन विस्तार। एक तरफ बूथ प्रबंधन है तो दूसरी तरफ सामाजिक समीकरणों को साधने की कोशिश और इसी के साथ विपक्षी खेमे में सेंधमारी का सिलसिला भी दिखाई दे रहा है। यह रणनीति भाजपा को शुरुआती बढ़त जरूर देती है, लेकिन चुनाव का अंतिम फैसला संगठन विस्तार से नहीं, मतदाता के फैसले से होगा। किसी नेता का भाजपा में शामिल होना उसके क्षेत्र के पूरे वोट बैंक के भाजपा के साथ आने की गारंटी नहीं है। इसी तरह छोटे दल के विलय का अर्थ यह नहीं कि उसका हर समर्थक भाजपा को वोट देगा। असली चुनौती इन राजनीतिक उपलब्धियों को बूथ स्तर के वोट में बदलने की होगी।
उत्तराखंड की राजनीति में फिलहाल यही तस्वीर उभर रही है कि चुनाव की तारीख घोषित होने से पहले ही भाजपा ने चुनावी मैदान को अपने हिसाब से तैयार करना शुरू कर दिया है। पार्टी छोटे दलों को साथ ला रही है, दूसरे दलों के नेताओं को अपने पाले में कर रही है और संगठन को बूथ स्तर पर मजबूत करने में जुटी है। यानी भाजपा की रणनीति का संदेश साफ हैकृचुनाव की घोषणा बाद में होगी, चुनावी तैयारी पहले पूरी करनी है। अब देखना यह होगा कि कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दल भाजपा के इस आपरेशन विस्तार का जवाब किस रणनीति से देते हैं। क्योंकि उत्तराखंड का 2027 विधानसभा चुनाव सिर्फ सत्ता और विपक्ष की लड़ाई नहीं होगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि चुनाव से पहले संगठन, सामाजिक समीकरण और राजनीतिक नैरेटिव तैयार करने में कौन सा दल बाजी मारता है। भाजपा फिलहाल अपनी बिसात बिछा चुकी है। विपक्ष के पास अब उस बिसात को पढ़ने और अपनी चाल चलने का वक्त है।
कुनबा बढ़ाने की ‘होड़’ में वोट बैंक का ‘गणित’
चुनाव नजदीक आते ही सामाजिक वर्गों को साधने की रणनीति तेज
प्रदेश में असरदार गोरखा समाज का मिला उत्तराखंड भाजपा का साथ
पकड़ मजबूत करने की कवायद, कांग्रेस पार्टी की बढ़ गई है चुनौती
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की चुनावी बिसात बिछने के साथ ही राजनीतिक दलों का कुनबा बढ़ाने और सामाजिक समीकरण साधने का सिलसिला तेज हो गया है। इसी क्रम में गोरखा डेमोक्रेटिक फ्रंट का भारतीय जनता पार्टी में विलय भाजपा के लिए एक अहम राजनीतिक घटनाक्रम माना जा रहा है। भाजपा इसे संगठन के विस्तार के साथ-साथ गोरखा समाज के बीच अपनी स्वीकार्यता मजबूत होने के संकेत के तौर पर देख रही है। भाजपा का संदेश साफ हैकृ2027 में लगातार तीसरी बार सत्ता हासिल करने की तैयारी केवल नारों से नहीं, बल्कि समाज के अलग-अलग वर्गों को साथ जोड़कर की जा रही है। गोरखा डेमोक्रेटिक फ्रंट का पार्टी में विलय इसी रणनीति की एक कड़ी के रूप में देखा जा रहा है।
दरअसल उत्तराखंड की राजनीति में गोरखा समाज की भूमिका लंबे समय से महत्वपूर्ण रही है। देहरादून और आसपास के क्षेत्रों में गोरखा समाज की उल्लेखनीय उपस्थिति है। ऐसे में किसी राजनीतिक संगठन का भाजपा के साथ आना चुनावी दृष्टि से महज एक संगठन का विलय नहीं, बल्कि सामाजिक पहुंच बढ़ाने की कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है। भाजपा इसे अपने लिए इसलिए भी शुभ संकेत मान रही है क्योंकि विधानसभा चुनाव में अब कुछ ही समय बचा है और पार्टी पहले से ही बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करने की कवायद में जुटी है। ऐसे समय में अलग-अलग सामाजिक समूहों और क्षेत्रीय राजनीतिक ताकतों का भाजपा के साथ जुड़ना पार्टी के चुनावी अभियान को मनोवैज्ञानिक बढ़त देने वाला कदम माना जा रहा है।
हालांकि भाजपा के लिए असली परीक्षा अब शुरू होगी। किसी संगठन का विलय कागज पर जितना आसान दिखाई देता है, उसे चुनावी वोट में बदलना उतना ही चुनौतीपूर्ण होता है। गोरखा समाज के बीच भाजपा को यह साबित करना होगा कि विलय केवल चुनावी गणित का हिस्सा नहीं है, बल्कि समाज से जुड़े मुद्दों और अपेक्षाओं को भी पार्टी के राजनीतिक एजेंडे में पर्याप्त स्थान मिलेगा। यही विपक्ष के लिए भी बड़ा सवाल है। कांग्रेस और दूसरे राजनीतिक दल अब यह आकलन करने में जुटेंगे कि भाजपा के इस कदम का सामाजिक और चुनावी प्रभाव कितना हो सकता है। यदि विपक्ष ने इसे केवल एक राजनीतिक दल के विलय तक सीमित समझा तो भाजपा को इसका फायदा मिल सकता है। लेकिन यदि विपक्ष गोरखा समाज के स्थानीय मुद्दों, युवाओं की अपेक्षाओं, रोजगार, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सामाजिक सम्मान को लेकर ठोस रणनीति तैयार करता है तो मुकाबला दिलचस्प हो सकता है।
भाजपा की रणनीति पिछले कुछ समय से स्पष्ट दिखाई दे रही है। पार्टी एक ओर संगठनात्मक ढांचे को मजबूत कर रही है, दूसरी ओर छोटे राजनीतिक समूहों और प्रभावशाली सामाजिक चेहरों को अपने साथ जोड़ रही है। लक्ष्य केवल चुनाव जीतना नहीं, बल्कि चुनाव से पहले ऐसा राजनीतिक माहौल तैयार करना है जिसमें पार्टी का संगठनात्मक आत्मविश्वास दिखाई दे। गोरखा डेमोक्रेटिक फ्रंट का विलय इसी आत्मविश्वास को और बढ़ाने वाला घटनाक्रम माना जा रहा है। भाजपा इसे 2027 की हैट्रिक के लिए शुभ संकेत बता रही है। लेकिन चुनावी राजनीति में शुभ संकेत तभी परिणाम में बदलते हैं, जब संगठन की सक्रियता और जनता का समर्थन एक साथ दिखाई दे। 2022 में भाजपा ने लगातार दूसरी बार सत्ता में वापसी कर इतिहास बनाया था। अब उसके सामने उस प्रदर्शन को दोहराने के साथ-साथ सत्ता विरोधी माहौल की किसी भी संभावना को रोकने की चुनौती है।
ऐसे में हर राजनीतिक संगठन का साथ आना भाजपा के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण है कि पार्टी अपने पुराने समर्थकों के साथ नए सामाजिक समूहों को कितना प्रभावी ढंग से जोड़ पाती है। गोरखा डेमोक्रेटिक फ्रंट के विलय ने फिलहाल भाजपा के चुनावी खेमे में उत्साह जरूर बढ़ाया है। इसे पार्टी 2027 की राह में एक और सकारात्मक संकेत के तौर पर देख रही है। मगर विपक्ष के लिए भी यह चेतावनी है कि चुनाव अभी दूर जरूर है, लेकिन भाजपा ने अपनी चुनावी तैयारी को पहले ही गति दे दी है। अब सवाल यह नहीं कि भाजपा 2027 में हैट्रिक का सपना देख रही है या नहीं। सवाल यह है कि क्या विपक्ष उस सपने को चुनौती देने के लिए समय रहते अपना सामाजिक और राजनीतिक समीकरण तैयार कर पाएगा? गोरखा डेमोक्रेटिक फ्रंट का भाजपा में विलय इसी बड़े चुनावी मुकाबले की एक नई शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है।
गुरुवार, 27 अगस्त 2026
udaydinmaan: 45 मिनट की ‘खामोशी’ पर सवाल
udaydinmaan: 45 मिनट की ‘खामोशी’ पर सवाल: नेपाली प्रशासन को आपदा की पहली सूचना करीब 9ः 00 बजे मिली यही 45 मिनट का फासला अब नेपाल में तीखे विवाद का केंद्र भी बना सवाल मिनटों का नहीं,अ...
बेरोजगारी और पलायन पर आर-पार
चुनावी रण में रोजगार के सवाल को धार देने की तैयारी
उत्तराखंड के युवा मतदाताओं को साधने में जुटे राहुल गांधी
राहुल का सीधा संवाद, अब बैकफुट से फ्रंटफुट पर आएंगे
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की तैयारियां तेज होने के साथ ही कांग्रेस ने युवाओं के बीच अपनी राजनीतिक सक्रियता बढ़ानी शुरू कर दी है। इसी क्रम में कांग्रेस नेता राहुल गांधी के युवाओं से संवाद का कार्यक्रम प्रदेश की सियासत में नई हलचल पैदा कर सकता है। संवाद के केंद्र में रोजगार, शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाएं, भर्ती प्रक्रिया और युवाओं के भविष्य से जुड़े मुद्दे रहने की संभावना है। उत्तराखंड की राजनीति में युवा मतदाता हमेशा महत्वपूर्ण रहे हैं। पहाड़ी राज्य की सबसे बड़ी चुनौतियों में बेरोजगारी और पलायन शामिल हैं। बड़ी संख्या में युवा रोजगार और बेहतर अवसरों की तलाश में प्रदेश से बाहर जाते हैं। ऐसे में चुनाव से पहले युवाओं के बीच पहुंचना किसी भी राजनीतिक दल के लिए बेहद अहम माना जा रहा है। राहुल गांधी का युवाओं से संवाद इसी राजनीतिक जरूरत से जोड़कर देखा जा रहा है। कांग्रेस इसे महज एक राजनीतिक कार्यक्रम के बजाय युवाओं की समस्याओं को सीधे सुनने और उनके मुद्दों को चुनावी विमर्श के केंद्र में लाने के प्रयास के रूप में पेश कर सकती है।
उत्तराखंड में सरकारी नौकरियों की भर्ती, परीक्षाओं में अनियमितता के आरोप और पेपर लीक जैसे मुद्दे पिछले कुछ वर्षों से राजनीतिक बहस का हिस्सा रहे हैं। कांग्रेस लगातार इन मुद्दों को लेकर भाजपा सरकार पर निशाना साधती रही है। राहुल गांधी के संवाद में भी युवाओं से उनके अनुभव जानने और रोजगार के सवाल पर सरकार को घेरने की रणनीति दिखाई दे सकती है। कांग्रेस की कोशिश होगी कि युवाओं के बीच यह संदेश जाए कि पार्टी उनके रोजगार और भविष्य के सवालों को राजनीतिक प्राथमिकता दे रही है। हालांकि, कांग्रेस के सामने चुनौती सिर्फ सरकार पर सवाल उठाने की नहीं बल्कि वैकल्पिक रोजगार नीति का स्पष्ट खाका सामने रखने की भी होगी। युवा अब केवल आरोप-प्रत्यारोप सुनने के बजाय यह जानना चाहते हैं कि सत्ता में आने पर राजनीतिक दल उनके लिए क्या करेंगे।
उत्तराखंड में राजनीतिक दलों ने युवा मतदाताओं को लेकर अपनी रणनीति तेज कर दी है। सोशल मीडिया अभियान, युवा सम्मेलन, रोजगार के मुद्दों पर आंदोलन और संवाद कार्यक्रमों के जरिए राजनीतिक दल युवाओं तक पहुंच बनाने की कोशिश कर रहे हैं। राहुल गांधी का कार्यक्रम इस अभियान को राष्ट्रीय स्तर का राजनीतिक चेहरा दे सकता है। कांग्रेस के लिए यह मौका इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 2027 का चुनाव उसके लिए प्रदेश की सत्ता में वापसी की बड़ी लड़ाई होगा। पार्टी की कोशिश होगी कि राहुल गांधी का संवाद सिर्फ भाषण तक सीमित न रहे, बल्कि युवाओं की वास्तविक समस्याओं और स्थानीय मुद्दों को राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श से जोड़ा जाए।
उत्तराखंड का युवा सिर्फ नौकरी नहीं चाहता। वह गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कौशल विकास, स्थानीय स्तर पर रोजगार, उद्यमिता के अवसर और सम्मानजनक भविष्य चाहता है। पहाड़ के युवा के लिए चुनौती और बड़ी है, क्योंकि रोजगार के अवसरों की कमी पलायन को बढ़ाती है। ऐसे में राहुल गांधी के सामने युवाओं से संवाद के दौरान कई सवाल होंगेकृपहाड़ में रोजगार कैसे आएगा? सरकारी भर्ती प्रक्रिया को पारदर्शी कैसे बनाया जाएगा? निजी क्षेत्र में अवसर कैसे बढ़ेंगे? पलायन रोकने के लिए क्या मॉडल होगा? स्थानीय संसाधनों से रोजगार कैसे पैदा होंगे? इन सवालों के जवाब कांग्रेस के लिए चुनावी दृष्टि से महत्वपूर्ण होंगे।
कांग्रेस के लिए राहुल गांधी का युवाओं से संवाद सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं बल्कि चुनावी नैरेटिव बनाने की कवायद भी हो सकता है। यदि पार्टी युवाओं के मुद्दों को लगातार अभियान का केंद्र बनाती है तो रोजगार बनाम विकास, भर्ती बनाम वादे और पलायन बनाम स्थानीय अवसर जैसे सवाल चुनावी बहस में प्रमुखता हासिल कर सकते हैं। भाजपा की ओर से भी कांग्रेस के आरोपों का जवाब आना तय माना जा रहा है। ऐसे में युवाओं के मुद्दे पर आने वाले दिनों में सियासी टकराव और तेज हो सकता है। 2027 की चुनावी लड़ाई में कौन सा दल युवाओं का भरोसा जीतता है, यह आने वाला समय बताएगा। लेकिन इतना तय है कि उत्तराखंड की चुनावी राजनीति में अब युवाओं को सिर्फ भीड़ के रूप में नहीं देखा जा सकता। उन्हें सुनना होगा, उनके सवालों का जवाब देना होगा और रोजगार के सवाल पर ठोस रोडमैप भी दिखाना होगा। राहुल गांधी संवाद करेंगे, नेता भाषण देंगे, पार्टियां दावे करेंगी,कृलेकिन आखिरी फैसला वही युवा करेगा, जिसके हाथ में रोजगार का सवाल और सामने भविष्य की चिंता होगी।
45 मिनट की ‘खामोशी’ पर सवाल
नेपाली प्रशासन को आपदा की पहली सूचना करीब 9ः 00 बजे मिली
यही 45 मिनट का फासला अब नेपाल में तीखे विवाद का केंद्र भी बना
सवाल मिनटों का नहीं,अर्ली वार्निंग सिस्टम की पारदर्शिता व रफ्तार का
देहरादून। नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ के बाद अब तबाही के पानी के साथ एक और सवाल बहकर सामने आया हैकृक्या इस त्रासदी को कुछ हद तक टाला जा सकता था? सवाल सीधे चीन की ओर उठ रहे हैं। नेपाली मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, तिब्बत के केरुंग क्षेत्र में बाढ़ आने और नेपाल को इसकी जानकारी मिलने के बीच करीब 45 मिनट का अंतर रहा। यही 45 मिनट अब नेपाल में बहस का केंद्र बन गए हैं। रिपोर्टों के अनुसार, चीन के तिब्बती क्षेत्र केरुंग काउंटी में स्थानीय समयानुसार सुबह करीब 10ः 30 बजे बाढ़ की स्थिति सामने आई। नेपाल और चीन के समय में 2 घंटे 15 मिनट का अंतर है। इस हिसाब से घटना नेपाल के समयानुसार करीब 8ः15 बजे की बताई जा रही है, जबकि नेपाली प्रशासन को लगभग 9 बजे के आसपास इसकी जानकारी मिलने का दावा किया गया है। यानी सवाल सिर्फ 45 मिनट का नहीं है। सवाल यह है कि सीमा के उस पार पैदा हुई आपदा की सूचना सीमा के इस पार रहने वाले लोगों तक कितनी जल्दी पहुंचनी चाहिए थी।
आपदा के समय 45 मिनट सामान्य समय नहीं होते। नदी किनारे रहने वाले लोगों को हटाने, बाजार बंद कराने, पुलों और संवेदनशील रास्तों पर आवाजाही रोकने तथा सुरक्षाबलों को अलर्ट करने के लिए यही समय बेहद महत्वपूर्ण हो सकता है। यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि अगर 45 मिनट पहले चेतावनी मिल जाती तो कितनी जानें निश्चित रूप से बच जातीं। लेकिन इतना जरूर है कि समय रहते चेतावनी मिलने से एहतियाती कदम उठाने का अवसर बढ़ता। नेपाली अधिकारियों और रिपोर्टों में इसी को लेकर सवाल उठ रहे हैं और यही वह बिंदु है जहां प्राकृतिक आपदा एक कूटनीतिक सवाल में बदल जाती है।
नेपाल-तिब्बत सीमा क्षेत्र में आई बाढ़ ने रसुवा, नुवाकोट और आसपास के इलाकों में भारी तबाही मचाई। बाढ़ और मलबे ने सड़कें, पुल, मकान और दूसरी बुनियादी सुविधाएं तबाह कर दीं। शुरुआती रिपोर्टों में बड़ी संख्या में लोगों के मारे जाने और सैकड़ों के लापता होने की जानकारी सामने आई है। चीन के तिब्बती क्षेत्र में भी जान-माल का नुकसान हुआ है। इसलिए यह घटना किसी एक देश की त्रासदी नहीं है। यह हिमालयी क्षेत्र में सीमा पार आपदा-सूचना तंत्र की कमजोरी का भी बड़ा उदाहरण बनकर सामने आई है।
नेपाल में चीन पर समय पर सूचना साझा नहीं करने के आरोप लग रहे हैं। नेपाली विदेश मामलों के जानकारों और पत्रकारों ने भी इस मुद्दे पर सवाल उठाए हैं। हालांकि, यह भी महत्वपूर्ण है कि 45 मिनट की देरी और जान बचने की संभावित संख्या से जुड़े दावों की पूरी स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है। चीन की ओर से आधिकारिक स्तर पर क्या सूचना साझा की गई, कब की गई और दोनों देशों के बीच आपदा-सूचना साझा करने की निर्धारित व्यवस्था क्या थीकृइन सवालों के स्पष्ट जवाब सामने आना बाकी हैं। यही वजह है कि इस घटना को सीधे धोखा घोषित करने के बजाय पहले पूरे संचार रिकार्ड की जांच जरूरी है।
नेपाल और चीन के बीच राजनीतिक सीमा है, लेकिन पहाड़ों में बहने वाली नदियां किसी सीमा रेखा को नहीं मानतीं। तिब्बत में भूस्खलन, हिमनद या अचानक जलप्रवाह की घटना होती है तो उसका असर कुछ ही समय में नेपाल के निचले इलाकों में दिखाई दे सकता है। यही कारण है कि हिमालयी देशों के बीच रियल टाइम डेटा साझा करना बेहद जरूरी हो जाता है। जलस्तर, ग्लेशियर, भूस्खलन और अचानक आने वाले जलप्रवाह की सूचना यदि सीमा पार समय रहते पहुंच जाए तो प्रशासन को कम से कम लोगों को सुरक्षित स्थानों पर भेजने का मौका मिल सकता है। नेपाल की त्रासदी ने इसी जरूरत को और उजागर कर दिया है।
आज नेपाल पूछ रहा हैकृ45 मिनट की खामोशी क्यों रही? कल यही सवाल भारत, भूटान या हिमालय के किसी दूसरे हिस्से से भी पूछा जा सकता है। क्योंकि जलवायु परिवर्तन और बढ़ते तापमान के दौर में हिमालयी आपदाओं का जोखिम गंभीर होता जा रहा है। ऐसी स्थिति में पड़ोसी देशों के बीच आपदा-सूचना राजनीतिक विश्वास से ऊपर मानवीय जिम्मेदारी का विषय होनी चाहिए। बाढ़ पानी लेकर आई थी। लेकिन अपने पीछे उसने एक बड़ा सवाल छोड़ दिया हैकृकि अगर खतरा सीमा पार पैदा हो चुका था, तो चेतावनी सीमा पार पहुंचने में 45 मिनट क्यों लगी? इन 45 मिनटों का पूरा सच सामने आना जरूरी है। क्योंकि आपदा में कभी-कभी कुछ मिनट भी सिर्फ समय नहीं होतेकृवह जिंदगी और मौत के बीच का अंतर हो सकते हैं।
स्वाइन फ्लू की दस्तक
उत्तराखंड में तापमान में उतार-चढ़ाव से वायरल और श्वसन संबंधी संक्रमण का जोखिम बढ़ा
बुखार, खांसी, गले में खराश, नाक बहना और बदन दर्द इसके मुख्य लक्षण
देहरादून समेत मैदानी व पर्वतीय क्षेत्रों के अस्पतालों में सांस और वायरल के मरीज बढ़े
देहरादून। उत्तराखंड में बदलते मौसम के बीच स्वाइन फ्लू की दस्तक ने स्वास्थ्य विभाग की चिंता बढ़ा दी है। बारिश के बाद तापमान में उतार-चढ़ाव और वायरल संक्रमण के बढ़ते मामलों के बीच स्वास्थ्य महकमा सतर्कता बरतने की तैयारी में जुट गया है। हालांकि स्वाइन फ्लू को लेकर घबराने के बजाय सावधानी और समय पर चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है। स्वाइन फ्लू को आमतौर पर इन्फ्लुएंजा-ए संक्रमण के रूप में जाना जाता है। इसके लक्षण सामान्य फ्लू जैसे हो सकते हैंकृबुखार, खांसी, गले में खराश, नाक बहना, शरीर में दर्द और कमजोरी। कुछ लोगों में संक्रमण गंभीर रूप भी ले सकता है, खासकर यदि उन्हें पहले से कोई स्वास्थ्य समस्या हो।
उत्तराखंड में मानसून के दौरान लगातार बारिश और तापमान में बदलाव के कारण श्वसन संबंधी संक्रमणों का खतरा बढ़ सकता है। अस्पतालों की ओपीडी में वायरल और सांस से जुड़ी शिकायतों वाले मरीजों की संख्या बढ़ने पर स्वास्थ्य विभाग के सामने संक्रमण की निगरानी की चुनौती भी बढ़ जाती है। देहरादून सहित मैदानी और पर्वतीय क्षेत्रों में स्वास्थ्य संस्थानों को संदिग्ध मरीजों पर नजर रखने, आवश्यक जांच और उपचार की व्यवस्था सुनिश्चित करने की जरूरत है। अस्पतालों में संक्रमण नियंत्रण की व्यवस्था भी महत्वपूर्ण होगी।
स्वाइन फ्लू के लक्षण शुरुआत में सामान्य वायरल बुखार जैसे लग सकते हैं। यही कारण है कि कई बार लोग इसे सामान्य सर्दी-जुकाम समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। लगातार या तेज बुखार, सांस लेने में परेशानी, अत्यधिक कमजोरी अथवा हालत बिगड़ने पर चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है। बीमारी की पुष्टि केवल लक्षणों के आधार पर नहीं की जाती। जरूरत पड़ने पर डाक्टर जांच की सलाह दे सकते हैं और उसी के आधार पर उपचार तय होता है।
इन्फ्लुएंजा जैसे श्वसन संक्रमणों से बचाव के लिए हाथों की स्वच्छता, खांसते-छींकते समय मुंह और नाक ढकना तथा बीमार होने पर दूसरों से दूरी बनाए रखना उपयोगी सावधानियां हैं। स्कूल, कार्यालय और सार्वजनिक स्थानों पर भी साफ-सफाई और वेंटिलेशन पर ध्यान देना जरूरी है। स्वास्थ्य विभाग के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि संक्रमण की रोकथाम के साथ लोगों में अनावश्यक भय भी न फैले। स्वाइन फ्लू का नाम सुनते ही घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन लापरवाही भी उचित नहीं।
हर बार किसी संक्रामक बीमारी की दस्तक स्वास्थ्य व्यवस्था की तैयारियों की परीक्षा भी होती है। अस्पतालों में आवश्यक दवाओं, जांच की सुविधा, प्रशिक्षित स्टाफ और संक्रमण नियंत्रण व्यवस्था को मजबूत रखना जरूरी है। उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में चुनौती इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि दूरदराज के क्षेत्रों में विशेषज्ञ स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच आसान नहीं है। ऐसे में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर जिला अस्पतालों तक निगरानी और रेफरल व्यवस्था मजबूत रहना जरूरी होगा।
उत्तराखंड में रक्षाबंधन पर चुनावी ‘प्रेम’
नेताओं की कलाई पर लगा राखियों का अंबार
त्योहार के आड़ में शुरू हुआ कार्यक्रमों का दौर
भाईचारे से ज्यादा वोटों की गणित साधी जा रही
कलाई पर चढ़ती राखियों की परतें, मंच के बैनर
बहन की कलाई से चुनावी ताकत नाप रहे हैं नेता
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव अभी दूर हैं, लेकिन चुनावी मौसम की आहट इतनी साफ सुनाई देने लगी है कि अब राखी के धागे में भी राजनीति दिखाई देने लगी है। शहर से लेकर कस्बों तक रक्षाबंधन कार्यक्रमों की धूम है। कहीं महिला सम्मेलन के नाम पर बहनों को बुलाया जा रहा है, कहीं राखी बांधने का कार्यक्रम हो रहा है और कहीं मंच पर नेताओं की कलाई पर राखियों की इतनी परतें चढ़ रही हैं कि लगता है जैसे भाईचारे का प्रमाणपत्र बांटा जा रहा हो। सवाल यह नहीं कि राखी क्यों बांधी जा रही है। सवाल यह है कि राखी बांधने के बाद नेता क्या कर रहे हैं?
रक्षाबंधन भाई-बहन के रिश्ते का त्योहार है। लेकिन चुनाव के करीब आते-आते यह रिश्ता राजनीतिक फोटो फ्रेम में बदलता नजर आ रहा है। नेता बहनों के बीच पहुंच रहे हैं, राखियां बंधवा रहे हैं, आशीर्वाद ले रहे हैं और फिर तस्वीरें सोशल मीडिया पर पहुंच रही हैं। तस्वीर में नेता की कलाई है, सामने महिलाओं की भीड़ है और पीछे बड़े-बड़े बैनर हैं। राजनीति में अब शायद यही नया गणित हैकृजितनी राखियां, उतनी ताकत। लेकिन लोकतंत्र में ताकत राखियों की संख्या से नहीं, जनता के भरोसे से तय होती है।
उत्तराखंड की राजनीति में महिलाओं की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। पहाड़ के गांवों में घर, खेत, पानी, जंगल और पलायन की मार सबसे ज्यादा महिलाओं ने झेली है। पहाड़ की महिला सिर्फ वोटर नहीं है, वह परिवार के राजनीतिक फैसले को प्रभावित करने वाली महत्वपूर्ण आवाज भी है। शायद इसी वजह से चुनाव से पहले हर राजनीतिक दल और हर संभावित प्रत्याशी महिला मतदाताओं के बीच अपनी मौजूदगी दर्ज कराना चाहता है। राखी इस राजनीति का सबसे आसान और भावनात्मक माध्यम बन गई है।
नेता बहनों से राखी बंधवा रहे हैं। बहनें भी राखी बांध रही हैं। मंच पर मुस्कान है। कैमरे हैं। भाषण हैं। तालियां हैं। लेकिन मंच से उतरने के बाद वही पुराना सवाल खड़ा हैकृमहिलाओं के लिए किया क्या? जिस बहन ने राखी बांधी, उसके गांव में पानी की समस्या है तो उसका समाधान कब होगा? जिस महिला ने मंच पर आकर नेता को भाई माना, उसके परिवार का बेटा रोजगार के लिए प्रदेश से बाहर क्यों जा रहा है? जिस महिला ने तालियां बजाईं, उसके गांव की सड़क बरसात में क्यों बंद हो जाती है? पहाड़ की बेटी की शिक्षा, सुरक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य की चिंता चुनावी कैलेंडर के किस पन्ने पर लिखी है? इन सवालों का जवाब राखी की फोटो में नहीं मिलता और यही उत्तराखंड की चुनावी राजनीति की असली कहानी है।
दरअसल, चुनाव से पहले नेताओं की गतिविधियां बदल जाती हैं। जनता अचानक परिवार बन जाती है। कोई बहनों का भाई बन जाता है, कोई युवाओं का साथी, कोई किसानों का हितैषी और कोई पहाड़ का बेटा। चुनाव बीतते ही रिश्तों की यह शब्दावली धीरे-धीरे सरकारी फाइलों की भाषा में बदल जाती है। इस बार राखी का राजनीतिक मौसम भी कुछ ऐसा ही संदेश दे रहा है। किसी नेता के कार्यक्रम में कितनी महिलाएं पहुंचीं, कितनी राखियां बंधीं, कितने समर्थक आए और कितनी तस्वीरें वायरल हुईंकृइन सबका हिसाब रखा जा रहा है। मानो विधानसभा चुनाव का सर्वे किसी चुनावी एजेंसी ने नहीं, राखी की थाली ने कर दिया हो।लेकिन चुनावी राजनीति इतनी सरल नहीं है।
महिलाएं अब सिर्फ मंच पर बैठकर भाषण सुनने वाली भीड़ नहीं हैं। वह सवाल पूछती हैं। वे सरकारी योजनाओं का लाभ देखती हैं। वह अपने बच्चों के रोजगार को देखती हैं। महंगाई महसूस करती हैं। सड़क, अस्पताल और स्कूल की हालत जानती हैं। उन्हें पता है कि चुनाव के समय कौन उनके घर आया था और पांच साल में कौन कितनी बार आया। इसलिए राखी बांधने की प्रतियोगिता में जुटे नेताओं को यह भी याद रखना चाहिए कि राखी की डोर भावनात्मक जरूर है, लेकिन मतदाता की स्मृति उससे भी मजबूत होती है।
उत्तराखंड में 2027 का चुनाव सिर्फ कुर्सी का चुनाव नहीं होगा। यह पांच साल के कामकाज का हिसाब मांगने वाला चुनाव भी होगा। यहां बेरोजगारी है, पलायन है, आपदा है, सड़कें हैं, शिक्षा और स्वास्थ्य के सवाल हैं। युवाओं की बेचौनी है। गांवों के खाली होते घर हैं। पहाड़ और मैदान के बीच विकास के सवाल हैं। इन सवालों के बीच अगर राजनीति सिर्फ राखी बांधने और फोटो खिंचवाने तक सीमित रह गई तो लोकतंत्र का त्योहार जरूर मनेगा, लेकिन जनता के सवाल फिर पीछे छूट जाएंगे।
राखी बांधिए, जरूर बांधिए। बहनों का सम्मान कीजिए। उनके बीच जाइए। लेकिन राखी के साथ जिम्मेदारी भी बांधिए। कलाई पर बंधी राखी अगर नेता को यह याद दिलाए कि बहन के गांव में पानी पहुंचाना है, उसके बच्चों को रोजगार देना है, उसकी सड़क ठीक करनी है और उसके परिवार को सुरक्षित भविष्य देना है, तभी इस रिश्ते का अर्थ है। वरना यह सिर्फ एक और चुनावी फोटो होगी और उत्तराखंड की जनता अब फोटो नहीं, हिसाब देखना चाहती है।
इसलिए चुनाव से पहले सबसे ज्यादा राखी बंधवाने वाले नेता को यह भ्रम नहीं पालना चाहिए कि वही सबसे मजबूत है। असली ताकत उस दिन पता चलेगी, जब मतदाता की उंगली ईवीएम के बटन तक पहुंचेगी। कलाई पर राखी होगी। सामने उम्मीदवार होगा और बीच में पांच साल का हिसाब।
बुधवार, 26 अगस्त 2026
udaydinmaan: ‘चाय खतरे में है मित्तर’
udaydinmaan: ‘चाय खतरे में है मित्तर’: महंगाई पर तंज कसना पड़ गया एक लेखपाल को भारी चीनी पहुंची सत्तर लिखने पर जौनपुर के लेखपाल निलंबित हल्की-फुल्की टिप्पणी में लिखा था, चाय खतरे म...
‘चाय खतरे में है मित्तर’
महंगाई पर तंज कसना पड़ गया एक लेखपाल को भारी
चीनी पहुंची सत्तर लिखने पर जौनपुर के लेखपाल निलंबित
हल्की-फुल्की टिप्पणी में लिखा था, चाय खतरे में है मित्तर
लेखपाल के निलंबन के बाद सोशल मीडिया पर उठे सवाल
देहरादून। महंगाई पर सोशल मीडिया में एक हल्की-फुल्की टिप्पणी करना उत्तर प्रदेश के जौनपुर में एक लेखपाल को भारी पड़ गया। फेसबुक पर चाय और चीनी की बढ़ती कीमतों को लेकर पोस्ट लिखने वाले लेखपाल के खिलाफ प्रशासन ने कार्रवाई करते हुए उन्हें तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया। बताया जा रहा है कि लेखपाल ने फेसबुक पर लिखा थाकृ चाय खतरे में है मित्तर, चीनी पहुंच गई सत्तर। पोस्ट सामने आने के बाद मामला प्रशासनिक अधिकारियों तक पहुंचा। इसके बाद संबंधित लेखपाल के खिलाफ कार्रवाई की गई और उन्हें निलंबित कर दिया गया।
मामले ने सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की सीमा और सरकारी कर्मचारियों की सोशल मीडिया गतिविधियों को लेकर नई बहस छेड़ दी है। सवाल यह भी उठ रहा है कि महंगाई पर एक सामान्य टिप्पणी को प्रशासनिक कार्रवाई का आधार बनाया जाना किस हद तक उचित है। वहीं प्रशासन की ओर से कार्रवाई के पीछे क्या विस्तृत कारण हैं, यह स्पष्ट रूप से सामने आना अभी बाकी है।
सरकारी कर्मचारियों के लिए सोशल मीडिया के इस्तेमाल को लेकर पहले से ही सेवा नियम और आचरण संबंधी प्रावधान लागू हैं। ऐसे में किसी कर्मचारी की सोशल मीडिया पोस्ट को व्यक्तिगत टिप्पणी मानने के बजाय यदि उसे सरकारी सेवा आचरण के दायरे में देखा जाता है, तो विभागीय कार्रवाई की गुंजाइश बनती है।
हालांकि इस पूरे प्रकरण का सबसे दिलचस्प पहलू पोस्ट की भाषा है। महंगाई पर तंज कसते हुए लिखे गए महज एक वाक्य ने प्रशासनिक कार्रवाई का रूप ले लिया। चाय खतरे में है मित्तर जैसी पंक्ति अब जौनपुर के प्रशासनिक गलियारों से लेकर सोशल मीडिया तक चर्चा का विषय बनी हुई है।
यह घटना उस दौर में सामने आई है जब सोशल मीडिया सरकारी कर्मचारियों के लिए भी अपनी बात रखने का बड़ा माध्यम बन चुका है। कर्मचारी निजी जीवन में क्या पोस्ट कर सकते हैं और किस बिंदु पर उनकी सोशल मीडिया टिप्पणी सरकारी आचरण का विषय बन जाती हैकृइसको लेकर स्पष्टता और संतुलन दोनों जरूरी हैं।
फिलहाल लेखपाल के निलंबन ने एक संदेश जरूर दिया है कि सरकारी सेवा में रहते हुए सोशल मीडिया पर की गई टिप्पणी को केवल निजी अभिव्यक्ति मानकर छोड़ दिया जाना तय नहीं है। दूसरी ओर, कार्रवाई के कारणों की स्पष्ट जानकारी सामने आने के बाद ही यह तय हो सकेगा कि मामला महज एक फेसबुक पोस्ट का था या पोस्ट के पीछे कोई अन्य प्रशासनिक अथवा सेवा संबंधी उल्लंघन भी माना गया।
राहुल के ‘सनातन’ बयान पर बवाल
युवाओं में हिंदू धर्म की गलत छवि पेश करने का लगा आरोप
राजनीतिक फायदे के लिए आस्था से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं
युवा पीढ़ी के सामने धर्म की विकृत तस्वीर पेश करने का आरोप
देहरादून। कांग्रेस नेता राहुल गांधी के सनातन और हिंदू धर्म को लेकर दिए गए कथित बयान पर उत्तराखंड की सियासत गरमा गई है। भाजपा ने राहुल गांधी पर युवाओं के बीच सनातन धर्म की नकारात्मक छवि पेश करने का आरोप लगाते हुए तीखा हमला बोला है। पार्टी नेताओं का कहना है कि राजनीतिक विरोध अपनी जगह है, लेकिन करोड़ों लोगों की आस्था से जुड़े धर्म और परंपराओं को राजनीतिक लाभ के लिए निशाना बनाना स्वीकार्य नहीं हो सकता।
भाजपा नेताओं ने आरोप लगाया कि राहुल गांधी लगातार ऐसे मुद्दों को उठाकर राजनीतिक संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं, जिनका सीधा संबंध देश की धार्मिक और सांस्कृतिक संवेदनाओं से है। उनका कहना है कि युवा पीढ़ी के सामने सनातन की ऐसी तस्वीर पेश करने का प्रयास किया जा रहा है, जो उसके वास्तविक स्वरूप से मेल नहीं खाती।
भाजपा का कहना है कि सनातन परंपरा केवल पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं है। भारतीय दर्शन, संस्कृति, साहित्य, योग, अध्यात्म और सामाजिक जीवन में इसकी गहरी भूमिका रही है। ऐसे में हिंदू धर्मशास्त्रों और सनातन परंपरा पर टिप्पणी करने से पहले उसके व्यापक स्वरूप को समझना आवश्यक है। भाजपा नेताओं ने तंज कसते हुए कहा कि हिंदू धर्मशास्त्रों को समझने में राहुल गांधी को कई जन्म भी कम पड़ जाएंगे।
भाजपा नेताओं ने यह भी आरोप लगाया कि कांग्रेस की राजनीति में समय-समय पर बहुसंख्यक समाज की धार्मिक भावनाओं को लेकर विरोधाभासी रुख दिखाई देता रहा है। उनके अनुसार, एक तरफ कांग्रेस खुद को सभी धर्मों के सम्मान की राजनीति करने वाली पार्टी बताती है, वहीं दूसरी तरफ उसके प्रमुख नेता सनातन को लेकर ऐसी टिप्पणियां करते हैं, जिनसे विवाद खड़ा होता है।
भाजपा ने राहुल गांधी से सवाल किया कि यदि कांग्रेस वास्तव में धार्मिक सद्भाव और संविधान में विश्वास रखती है तो फिर सनातन धर्म को लेकर ऐसी टिप्पणियों की आवश्यकता क्यों पड़ती है। पार्टी नेताओं ने कहा कि किसी भी धर्म या समुदाय की आलोचना राजनीतिक बहस का विषय हो सकती है, लेकिन करोड़ों लोगों की आस्था को अपमानित करने वाली भाषा से सामाजिक सौहार्द प्रभावित होता है।
हालांकि, कांग्रेस की ओर से इन आरोपों को राजनीतिक रंग देने की कोशिश बताया जा सकता है। कांग्रेस का तर्क रहा है कि भाजपा धार्मिक मुद्दों को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में लाकर वास्तविक जनसमस्याओं से ध्यान भटकाने का प्रयास करती है। ऐसे में सनातन को लेकर छिड़ी यह बहस केवल बयानबाजी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे आगामी चुनावों की राजनीतिक रणनीति भी देखी जा रही है।
उत्तराखंड में यह मुद्दा इसलिए भी अहम है क्योंकि प्रदेश की सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान में धार्मिक परंपराओं की महत्वपूर्ण भूमिका है। चारधाम, तीर्थ परंपरा और स्थानीय देवी-देवताओं से जुड़ी आस्था प्रदेश के सामाजिक जीवन का हिस्सा है। ऐसे में राष्ट्रीय स्तर पर सनातन को लेकर होने वाली राजनीतिक बयानबाजी का असर उत्तराखंड की राजनीति में भी दिखाई देना स्वाभाविक है।
भाजपा फिलहाल इस मुद्दे को युवाओं और धार्मिक आस्था से जोड़कर कांग्रेस पर दबाव बनाने की कोशिश में है। पार्टी का संदेश साफ है कि सनातन के अपमान को राजनीतिक बहस का सामान्य हिस्सा नहीं बनने दिया जाएगा। दूसरी ओर कांग्रेस के सामने चुनौती है कि वह राहुल गांधी के बयानों को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब देते हुए अपनी राजनीतिक लाइन स्पष्ट करे।
आखिरकार सवाल यह है कि चुनावी राजनीति में धार्मिक विमर्श की सीमा क्या होनी चाहिए। राजनीतिक दलों के लिए यह जरूरी है कि वह आस्था से जुड़े विषयों पर बयान देते समय शब्दों की मर्यादा और सामाजिक संवेदनशीलता का ध्यान रखें। क्योंकि चुनाव आते-जाते रहेंगे, लेकिन समाज की धार्मिक आस्थाएं और सांस्कृतिक विरासत लंबे समय तक कायम रहती हैं।
चुनाव से पहले भाजपा का बड़ा मीडिया दांव
8 नए चेहरे, आक्रामक तेवर
विपक्षी हमलों का जवाब देने और उपलब्धियों को भुनाने की रणनीति
भाजपा का आठ नए प्रवक्ताओं के सहारे हवा का रुख मोड़ने की कवायद
चुनाव से पहले आक्रामक अंदाज में पक्ष रखने की तैयारी में है भाजपा
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच भाजपा ने अपने मीडिया मोर्चे को और धार देने की कवायद शुरू कर दी है। पार्टी ने प्रवक्ता टोली का विस्तार करते हुए आठ नए प्रवक्ताओं की घोषणा की है। इसे महज संगठनात्मक विस्तार के बजाय आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर भाजपा की व्यापक संचार रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। चुनावी माहौल बनने के साथ ही पार्टी अब सरकार की उपलब्धियों, विपक्ष के आरोपों और जनमुद्दों पर अपना पक्ष अधिक आक्रामक और नियमित तरीके से रखने की तैयारी में है।
भाजपा के लिए मीडिया और सोशल मीडिया चुनावी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं। ऐसे में प्रवक्ताओं की संख्या बढ़ाने का सीधा अर्थ यही है कि पार्टी अलग-अलग मुद्दों पर अधिक प्रभावी ढंग से अपना पक्ष जनता के सामने रखना चाहती है। आठ नए चेहरों को जिम्मेदारी देकर भाजपा ने संकेत दिया है कि चुनावी मैदान में केवल बूथ और संगठन ही नहीं, बल्कि नैरेटिव की लड़ाई भी उतनी ही महत्वपूर्ण होगी।
पार्टी के सामने इस समय दोहरी चुनौती है। एक ओर उसे प्रदेश सरकार के कामकाज को उपलब्धियों के रूप में जनता तक पहुंचाना है, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस समेत विपक्षी दलों के लगातार उठाए जा रहे सवालों का जवाब भी देना है। बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाएं, पलायन, सड़क और स्वास्थ्य सुविधाएं, कानून-व्यवस्था, आपदा प्रबंधन तथा एसआईआर जैसे मुद्दे आने वाले दिनों में चुनावी बहस के केंद्र में रह सकते हैं। ऐसे में भाजपा की नई प्रवक्ता टोली को इन मुद्दों पर पार्टी की स्पष्ट लाइन सामने रखनी होगी।
प्रवक्ता टोली का विस्तार यह भी बताता है कि भाजपा अब चुनावी संवाद को केवल प्रेस कांफ्रेंस तक सीमित रखने के पक्ष में नहीं है। टेलीविजन डिबेट, डिजिटल प्लेटफार्म, सोशल मीडिया और स्थानीय मीडिया के माध्यम से एक साथ राजनीतिक संदेश पहुंचाने की रणनीति पर पार्टी काम कर रही है। अलग-अलग क्षेत्रों और विषयों से जुड़े प्रवक्ताओं को आगे करने से पार्टी को स्थानीय मुद्दों पर भी तत्काल प्रतिक्रिया देने में मदद मिल सकती है।
दिलचस्प यह है कि भाजपा ने यह कदम ऐसे समय उठाया है जब कांग्रेस भी संगठन को चुनावी मोड में लाने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस की ओर से सरकार के खिलाफ बेरोजगारी, युवाओं, भर्ती और जनहित के मुद्दों को लेकर लगातार हमलावर रुख अपनाया जा रहा है। ऐसे में भाजपा की नई प्रवक्ता टोली का पहला लक्ष्य विपक्ष के हमलों का जवाब देना और सरकार के पक्ष में माहौल तैयार करना होगा।
लेकिन यहां भाजपा के लिए चुनौती भी कम नहीं है। प्रवक्ताओं की संख्या बढ़ाने से ज्यादा महत्वपूर्ण यह होगा कि सभी प्रवक्ताओं का संदेश एक हो। अलग-अलग मंचों पर यदि अलग-अलग बयान सामने आते हैं तो विस्तार का उद्देश्य ही कमजोर पड़ सकता है। चुनाव के समय एक ही मुद्दे पर पार्टी की अलग-अलग व्याख्या विपक्ष को हमले का अवसर दे सकती है। इसलिए नई टोली के सामने संदेश की एकरूपता और तथ्यों के साथ जवाब देने की बड़ी जिम्मेदारी होगी।
दूसरी ओर कांग्रेस के लिए भी भाजपा का यह कदम एक राजनीतिक संकेत है। अब उसे अपने मीडिया तंत्र को और सक्रिय करना होगा। यदि भाजपा रोजाना कई मुद्दों पर अपना पक्ष रखती है और कांग्रेस की प्रतिक्रिया देर से आती है, तो राजनीतिक विमर्श में भाजपा का नैरेटिव हावी हो सकता है। चुनावी राजनीति में कई बार मुद्दे से ज्यादा महत्वपूर्ण यह हो जाता है कि जनता के बीच उस मुद्दे की व्याख्या कौन और कितनी तेजी से करता है।
उत्तराखंड में 2027 का विधानसभा चुनाव अभी दूर दिखाई दे सकता है, लेकिन राजनीतिक दलों की गतिविधियां बता रही हैं कि चुनावी तैयारी शुरू हो चुकी है। भाजपा संगठन, बूथ और मीडियाकृतीनों मोर्चों पर अपनी मशीनरी को सक्रिय कर रही है। प्रवक्ता टोली का विस्तार इसी तैयारी की अगली कड़ी है।
अब देखना यह होगा कि आठ नए प्रवक्ता पार्टी की आवाज को कितनी मजबूती देते हैं। भाजपा के लिए यह सिर्फ आठ नए नाम जोड़ने का फैसला नहीं, बल्कि चुनाव से पहले मीडिया के मैदान में अपनी टीम को मजबूत करने की कवायद है। आने वाले महीनों में यह टोली जितनी सक्रिय होगी, उतना ही स्पष्ट होगा कि भाजपा चुनावी मुद्दों को अपने पक्ष में मोड़ने की रणनीति में कितनी सफल रहती है।
कांग्रेस का ‘दावा’ तय है सत्ता परिवर्तन
बेरोजगारी और किसानी के मुद्दे बनेंगे चुनावी हथियार, कहा- कोरे प्रचार से नहीं छिपेंगे जनता के सवाल
उत्तराखंड में चुनावी पारा हाई, युवाओं, किसानों और कर्मचारियों की अनदेखी पर आर-पार की तैयारी
सिर्फ योजनाओं के बखान से नहीं चलेगा काम, अनसुलझे सवालों पर भाजपा को घेरने की रणनीति तैयार
देहरादून। उत्तराखंड की सियासत में विधानसभा चुनाव की आहट के साथ राजनीतिक तापमान बढ़ने लगा है। कांग्रेस ने प्रदेश में बड़े राजनीतिक बदलाव का दावा करते हुए भाजपा पर एक बार फिर हमला तेज कर दिया है। पार्टी का कहना है कि प्रदेश की जनता अब बदलाव के मूड में है और आने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा को इसका जवाब मिलेगा। कांग्रेस के इस दावे के बाद सियासी गलियारों में आरोप-प्रत्यारोप का दौर और तेज होने के आसार हैं।
कांग्रेस का निशाना सीधे तौर पर प्रदेश की भाजपा सरकार और उसके कामकाज पर है। पार्टी नेताओं का आरोप है कि सरकार के कार्यकाल में युवाओं, बेरोजगारों, किसानों, कर्मचारियों और आम लोगों से जुड़े कई सवाल अनसुलझे हैं। कांग्रेस इन मुद्दों को चुनावी हथियार बनाने की तैयारी में है। पार्टी का मानना है कि महज सरकारी योजनाओं और उपलब्धियों के प्रचार से जनता के सवाल खत्म नहीं होंगे।
कांग्रेस नेताओं का कहना है कि उत्तराखंड की जनता ने लंबे समय तक भाजपा को मौका दिया है, लेकिन अब वह सरकार से कामकाज का हिसाब मांग रही है। बेरोजगारी और भर्ती परीक्षाओं से जुड़े विवाद, पलायन, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, सड़कों की स्थिति और महंगाई जैसे मुद्दों को कांग्रेस लगातार उठाती रही है। पार्टी अब इन्हीं सवालों को गांव-गांव तक ले जाने की रणनीति पर काम कर रही है।
कांग्रेस के इस आक्रामक रुख के पीछे चुनावी गणित भी देखा जा रहा है। पार्टी लंबे समय से संगठनात्मक कमजोरी और आपसी खींचतान की चुनौती से जूझती रही है। ऐसे में भाजपा के खिलाफ माहौल बनाने के साथ ही कांग्रेस के सामने अपने कार्यकर्ताओं और नेताओं को एकजुट करने की चुनौती भी है। केवल भाजपा विरोध के सहारे सत्ता में वापसी आसान नहीं होगी। जनता के सामने कांग्रेस को अपना वैकल्पिक एजेंडा भी मजबूती से रखना होगा।
भाजपा ने कांग्रेस के बदलाव के दावे को पहले से चली आ रही राजनीतिक बयानबाजी का हिस्सा माना है। भाजपा का तर्क है कि जनता सरकार के विकास कार्यों को देख रही है और विपक्ष केवल आरोप लगाने तक सीमित है। पार्टी लगातार यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि प्रदेश में सड़क, चारधाम, पर्यटन, बुनियादी ढांचे और रोजगार से जुड़े क्षेत्रों में काम हुआ है।
यही वह मोर्चा है जहां आने वाले दिनों में दोनों दलों के बीच असली राजनीतिक मुकाबला दिखाई देगा। कांग्रेस जहां बदलाव की जरूरत का नैरेटिव खड़ा करना चाहती है, वहीं भाजपा काम और विकास को चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश करेगी। दोनों दलों के बीच यह टकराव जितना बढ़ेगा, उतना ही चुनावी विमर्श आरोपों से निकलकर उपलब्धियों और जनसवालों की तरफ जाने की संभावना रहेगी।
कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि बदलाव के दावे को जमीन पर संगठनात्मक ताकत में कैसे बदला जाए। भाजपा के लिए चुनौती सत्ता विरोधी संभावनाओं को रोकने की होगी। उत्तराखंड में हर चुनाव में क्षेत्रीय संतुलन, पहाड़-मैदान, युवा मतदाता, महिला मतदाता और स्थानीय मुद्दे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए किसी भी दल के लिए केवल बड़े राजनीतिक दावे पर्याप्त नहीं होंगे।
फिलहाल कांग्रेस ने भाजपा के खिलाफ मोर्चा खोलकर यह संकेत जरूर दे दिया है कि वह आगामी चुनाव को लेकर अपनी राजनीतिक भाषा और रणनीति दोनों को आक्रामक बनाने जा रही है। भाजपा भी जवाब देने में पीछे रहने वाली नहीं है। ऐसे में आने वाले दिनों में उत्तराखंड की राजनीति में बयानबाजी और तेज होगी।
बदलाव का दावा कांग्रेस ने किया है, लेकिन उस दावे को जनसमर्थन में बदलना अब उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती है। दूसरी ओर भाजपा के सामने सत्ता में रहते हुए यह साबित करने की चुनौती है कि उसके पक्ष में केवल संगठन नहीं, बल्कि जनता का भरोसा भी कायम है। चुनाव की असली तस्वीर इन्हीं दोनों दावों की जमीन पर होने वाली परीक्षा से सामने आएगी।
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