शुक्रवार, 25 सितंबर 2026

निर्वाचन आयोग में ‘दरार’

वोट चोरी के आरोपों के बीच निर्वाचन आयोग के भीतर मतभेद की रिपोर्ट ने बढ़ाया सियासी तापमान गंभीर आरोपों और विपक्ष के हमलों के बीच विवाद का एक और महत्वपूर्ण पक्ष भी आया सामने दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों की रिपोर्ट के बाद विपक्ष ने खोला मोर्चा,अब सवाल संस्था की विश्वसनीयता का देहरादून। चुनावी राजनीति में वोट चोरी के आरोपों के बीच निर्वाचन आयोग को लेकर सामने आई एक रिपोर्ट ने सियासी तापमान और बढ़ा दिया है। चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार आयोग के फैसलों और प्रक्रियाओं पर औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई। रिपोर्ट में कहा गया है कि इन आपत्तियों का संबंध मतदाता सूची में नाम जोड़ने, नाम हटाने और बहाल करने, फार्म-6 में बदलाव तथा मतदाता सूची से जुड़े तकनीकी तंत्र जैसे महत्वपूर्ण विषयों से था। रिपोर्ट सामने आते ही विपक्ष ने इसे निर्वाचन आयोग के भीतर गंभीर मतभेद का संकेत बताते हुए केंद्र सरकार और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर हमला तेज कर दिया है। विपक्षी दलों की ओर से अब मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की संसदीय प्रक्रिया शुरू करने की बात भी सामने आई है। लेकिन इस पूरे विवाद में एक दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। निर्वाचन आयोग ने रिपोर्ट के बाद स्पष्ट किया कि आयोग के भीतर अलग-अलग राय और सुझाव आना निर्णय प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा है। आयोग के मुताबिक पिछले एक वर्ष में लिए गए निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए और केवल कुछ आंतरिक टिप्पणियों को सामने रखकर पूरी प्रक्रिया की तस्वीर नहीं बनाई जा सकती। यानी अब राजनीतिक सवाल सीधे निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर आ खड़ा हुआ हैकृकि अगर दो चुनाव आयुक्तों ने 14 बार आपत्ति दर्ज की, तो उन आपत्तियों पर क्या हुआ? क्या उन्हें स्वीकार किया गया? क्या उन्हें खारिज किया गया?अगर खारिज किया गया तो उसके कारण क्या थे?और सबसे बड़ा सवालकृक्या इन आपत्तियों से जुड़े दस्तावेज सार्वजनिक किए जा सकते हैं?यही सवाल इस पूरे विवाद को गंभीर बनाता है। मामला इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि आपत्तियां किसी सामान्य प्रशासनिक फैसले को लेकर नहीं थीं। रिपोर्ट के मुताबिक इनमें मतदाता सूची में नए नाम जोड़ने, नाम हटाने और बहाल करने तथा मतदाता डेटा की तकनीकी व्यवस्था जैसे चुनावी प्रक्रिया के मूल हिस्से शामिल थे। वहीं, आयोग का तर्क है कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण एक वैधानिक प्रक्रिया है और मतदाता सूची को अद्यतन करना उसका संवैधानिक दायित्व है। एसआईआर को लेकर विपक्ष लंबे समय से सवाल उठा रहा है, जबकि आयोग इन आरोपों को खारिज करता रहा है। यहीं से वोट चोरी की राजनीतिक बहस और निर्वाचन आयोग की संस्थागत विश्वसनीयता एक-दूसरे से जुड़ जाती है। विपक्ष का आरोप है कि मतदाता सूची में बदलावों का इस्तेमाल चुनावी लाभ के लिए किया जा सकता है। आयोग का कहना है कि मतदाता सूची की शुद्धता और सत्यापन चुनाव प्रक्रिया का आवश्यक हिस्सा है। इन दोनों दावों के बीच असली कसौटी दस्तावेज और पारदर्शिता है। लोकतंत्र में चुनाव आयोग पर सवाल उठना अपने आप में लोकतंत्र का संकट नहीं है। बल्कि किसी भी संवैधानिक संस्था से सवाल पूछना लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है। संकट तब पैदा होता है जब सवालों के जवाब अस्पष्ट रह जाएं और संस्था के भीतर की असहमति पर भी जनता को पर्याप्त जानकारी न मिले। 14 आपत्तियों की खबर ने इसी पारदर्शिता की मांग को और बड़ा कर दिया है। राजनीतिक रूप से देखें तो विपक्ष को इसमें सरकार और चुनाव आयोग पर हमला करने का नया आधार मिला है। दूसरी ओर सत्तापक्ष और आयोग के पास यह कहने का आधार है कि आंतरिक विमर्श को संस्थागत मतभेद या निर्णयों की वैधता पर अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। आयोग ने खुद कहा है कि अलग-अलग राय निर्णय प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा हैं और अंतिम फैसले सर्वसम्मति से हुए। लेकिन जनता के लिए सवाल इससे आगे का है। चुनाव कौन जीतता है, यह बाद का सवाल है। चुनाव कैसे हुआ और हर मतदाता को अपने वोट के अधिकार का समान अवसर मिला या नहींकृयह उससे पहले का सवाल है। यही कारण है कि वोट चोरी जैसे राजनीतिक नारों से ऊपर उठकर मतदाता सूची, एसआईआर और आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियों की स्वतंत्र और तथ्याधारित पड़ताल जरूरी है। चुनाव आयोग देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था का निर्णायक प्रहरी है। उसकी विश्वसनीयता किसी राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं है। सत्ता पक्ष हो या विपक्षकृदोनों की चुनावी वैधता अंततः उसी व्यवस्था से आती है। इसलिए 14 आपत्तियों की रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश यही हैकृकि अब बहस आरोप बनाम आरोप की नहीं, दस्तावेज बनाम दस्तावेज की होनी चाहिए। यदि आपत्तियां गलत थीं तो उनके खारिज किए जाने का पूरा आधार सामने आए। यदि आपत्तियों में दम था तो सुधार की प्रक्रिया सार्वजनिक हो और यदि आयोग के सभी निर्णय वास्तव में सर्वसम्मति से हुए, तो उन फैसलों की प्रक्रिया और संबंधित रिकार्ड जनता के सामने रखने में संकोच नहीं होना चाहिए। क्योंकि चुनाव में हारने वाला दल पांच साल इंतजार कर सकता है, लेकिन मतदाता का खोया हुआ भरोसा लोकतंत्र के लिए कहीं ज्यादा महंगा पड़ता है। वोट चोरी का आरोप सच है या राजनीतिक नाराकृइसका फैसला राजनीतिक मंच नहीं, पारदर्शी तथ्य और संवैधानिक प्रक्रिया ही कर सकती है।

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