गुरुवार, 22 अक्टूबर 2026
200 करोड़ की संपत्ति पर सियासी भूचाल
कैबिनेट मंत्री रेखा आर्या के पति के आरोपों से सरकार असहज
विपक्ष ने मांगा हिसाब तो निष्पक्ष जांच की मांग ने बढ़ाया दबाव
संपत्ति के स्रोत से लेकर विभागीय कामकाज तक उठ रहे सवाल
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में कैबिनेट मंत्री रेखा आर्या से जुड़ा विवाद अब सरकार के लिए नई चुनौती बनता जा रहा है। पति गिरधारी लाल साहू की ओर से करीब 210 करोड़ रुपये की कथित अवैध संपत्ति अर्जित करने के आरोप लगाए जाने के बाद मामला केवल पारिवारिक विवाद तक सीमित नहीं रहा। आरोपों की जांच की मांग सतर्कता अधिष्ठान तक पहुंच चुकी है। कांग्रेस सरकार को घेर रही है, वहीं निष्पक्ष जांच की मांग ने सत्ता पक्ष के सामने भी जवाबदेही का सवाल खड़ा कर दिया है।
मामले का सबसे अहम पहलू यह है कि आरोप किसी राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी ने नहीं, बल्कि मंत्री के पति ने लगाए हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से कथित संपत्ति और विभाग में भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच कराने की मांग की है। हालांकि, 210 करोड़ रुपये की कथित संपत्ति और भ्रष्टाचार से जुड़े आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में जांच के जरिए ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि आरोपों में कितनी सच्चाई है।
विवाद की शुरुआत तब हुई, जब रेखा आर्या ने अपने पति गिरधारी लाल साहू के खिलाफ मारपीट, उत्पीड़न, जातिसूचक टिप्पणी और जान से मारने की धमकी देने के आरोपों में मुकदमा दर्ज कराया। इसके बाद गिरधारी लाल साहू ने वीडियो जारी कर मंत्री पर कथित अवैध संपत्ति अर्जित करने का आरोप लगाया और जांच की मांग की। पुलिस ने मंत्री की शिकायत पर जांच के लिए विशेष जांच दल गठित किया है।
इस घटनाक्रम ने भाजपा के लिए असहज स्थिति पैदा कर दी है। एक तरफ मंत्री की शिकायत पर पुलिस कार्रवाई और जांच चल रही है, दूसरी तरफ उन्हीं पर लगाए गए आर्थिक अनियमितताओं के आरोपों ने राजनीतिक दबाव बढ़ा दिया है। अब सरकार के सामने चुनौती है कि वह दोनों पक्षों से जुड़े आरोपों की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करे और किसी भी सवाल को अनुत्तरित न छोड़े। कांग्रेस ने इस प्रकरण को लेकर मुख्यमंत्री और भाजपा नेतृत्व की जवाबदेही पर सवाल उठाए हैं। पार्टी का कहना है कि जब एक मंत्री के खिलाफ इतनी बड़ी राशि की कथित अवैध संपत्ति के आरोप सामने आए हैं, तो सरकार को जांच के संबंध में स्पष्ट रुख अपनाना चाहिए। विपक्ष यह भी सवाल उठा रहा है कि आरोपों की गंभीरता को देखते हुए सरकार ने क्या कदम उठाए हैं।
कांग्रेस के लिए यह मामला राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। विधानसभा चुनाव 2027 से पहले पार्टी इसे भ्रष्टाचार, महिला सुरक्षा और सरकार की जवाबदेही से जोड़कर उठा सकती है। हालांकि, विपक्ष के आरोपों और मंत्री के पति के दावों को जांच से पहले प्रमाणित तथ्य नहीं माना जा सकता। मामले में 17 अक्टूबर को अधिवक्ता पंकज सिंह क्षेत्री ने सतर्कता अधिष्ठान में शिकायत देकर कथित संपत्ति के स्रोतों की जांच की मांग की। शिकायत में चल-अचल संपत्तियों, बैंक खातों, निवेश, कंपनियों, शेयरों और अन्य वित्तीय हितों से संबंधित अभिलेखों की पड़ताल करने का अनुरोध किया गया है। शिकायतकर्ता ने यह भी मांग की है कि संपत्तियों का मिलान संबंधित व्यक्तियों की ज्ञात और वैध आय से किया जाए।
यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि अब विवाद राजनीतिक बयानबाजी से आगे बढ़कर जांच की मांग के औपचारिक स्तर तक पहुंच गया है। लेकिन शिकायत दर्ज होने या जांच की मांग किए जाने का अर्थ यह नहीं है कि आरोप साबित हो गए हैं। वास्तविक स्थिति दस्तावेजों, वित्तीय रिकॉर्ड और संबंधित पक्षों के जवाबों की जांच के बाद ही सामने आएगी। इस प्रकरण में सरकार की भूमिका पर निगाहें टिकी हैं। यदि आरोप निराधार हैं, तो जांच से स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए। यदि दस्तावेजों में अनियमितताएं सामने आती हैं, तो कानून के अनुसार कार्रवाई की जानी चाहिए। राजनीतिक पद या प्रभाव किसी को जांच से छूट देने का आधार नहीं बनना चाहिए।
मंत्री रेखा आर्या ने भ्रष्टाचार के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा है कि उनकी आय और संपत्ति से संबंधित विवरण चुनावी घोषणापत्रों में सार्वजनिक किए गए हैं। उन्होंने आरोप साबित होने पर कार्रवाई का सामना करने की बात भी कही है। ऐसे में जांच में उनके चुनावी हलफनामों, घोषित संपत्तियों और उपलब्ध वित्तीय अभिलेखों का मिलान महत्वपूर्ण हो सकता है।
उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की तैयारी के बीच इस विवाद का राजनीतिक असर पड़ना स्वाभाविक है। भाजपा जहां विपक्ष के हमले का जवाब देने की कोशिश करेगी, वहीं कांग्रेस इसे सरकार की पारदर्शिता और जवाबदेही से जोड़ सकती है। लेकिन इस पूरे मामले की दिशा राजनीतिक बयानों से ज्यादा जांच के नतीजों पर निर्भर करेगी। अब असली सवाल तीन हैंकृ210 करोड़ रुपये की कथित संपत्ति का आधार क्या है, उसकी जांच किस स्तर पर पहुंचेगी और सरकार इस पूरे प्रकरण में कितनी पारदर्शिता दिखाएगी? फिलहाल, आरोपों ने सत्ता और विपक्ष दोनों के सामने राजनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है। जांच निष्पक्ष हुई तो सच सामने आएगा, लेकिन यदि मामला केवल बयानबाजी और आरोप-प्रत्यारोप में उलझा रहा, तो जवाबदेही को लेकर उठे सवाल और गहरे हो सकते हैं।
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