शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2026
चुनावी ‘बिसात’ पर उत्तराखंड में ‘नई चालें’
सरकार के फैसलों के बीच चुनाव की बिसात बिछाने में जुटे सियासी दल
भाजपा की सत्ता वापसी की जंग बनाम कांग्रेस के अंतर्कलह की चुनौती
भाजपा तीसरी बार के लिए तैयार, कांग्रेस के सामने एकजुटता का सवाल
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की औपचारिक घोषणा भले अभी नहीं हुई है, लेकिन प्रदेश की राजनीति में चुनावी तापमान लगातार बढ़ रहा है। भाजपा तीसरी बार सत्ता में वापसी की रणनीति को धार देने में जुटी है तो कांग्रेस सरकार को घेरने के साथ अपने संगठन और नेतृत्व के समीकरण साधने की चुनौती से जूझ रही है। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण से लेकर बेरोजगारी, पलायन, भ्रष्टाचार और राजनीतिक यात्राओं तक, हर मुद्दा अब चुनावी चश्मे से देखा जा रहा है। सियासी मैदान में सवाल सिर्फ सरकार के कामकाज का नहीं, बल्कि विपक्ष की एकजुटता और दोनों दलों की राजनीतिक विश्वसनीयता का भी है।
प्रदेश में सत्तारूढ़ भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने शासन के पक्ष में माहौल बनाए रखने और सत्ता विरोधी असंतोष को सीमित करने की है। पार्टी संगठन बूथ स्तर तक सक्रियता बढ़ाने और सरकार की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने की रणनीति पर काम कर रहा है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व को चुनावी अभियान का प्रमुख आधार बनाया जा रहा है। लेकिन भाजपा के लिए केवल संगठनात्मक मजबूती का दावा पर्याप्त नहीं होगा। बेरोजगारी, भर्ती प्रक्रियाओं पर उठते सवाल, ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं की कमी, पलायन और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर जनता जवाब भी मांगेगी। सरकार के लिए चुनौती यह होगी कि विकास और जनकल्याण के दावों को जमीन पर हुए काम से जोड़कर पेश करे। चुनावी नारों की असली परीक्षा जनता के अनुभवों के बीच ही होगी।
विपक्षी कांग्रेस के पास सरकार को घेरने के लिए कई मुद्दे हैं। पार्टी बेरोजगारी, पलायन, भर्ती विवाद, महिला सुरक्षा और भ्रष्टाचार को लेकर सरकार पर हमलावर रही है। मगर इन मुद्दों को चुनावी ताकत में बदलने के लिए कांग्रेस को अपने भीतर के मतभेदों पर भी नियंत्रण रखना होगा। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा को लेकर पार्टी नेतृत्व की नाराजगी इसी चुनौती को उजागर करती है। रावत ने पांच अक्टूबर को जसपुर से हल्द्वानी तक यात्रा की, जबकि कांग्रेस नेतृत्व ने इसे संगठन से अलग समानांतर कार्यक्रम मानते हुए आपत्ति जताई। बाद में रावत ने प्रस्तावित नौ यात्राएं स्थगित करने की घोषणा की। इस घटनाक्रम ने चुनाव से पहले पार्टी के भीतर नेतृत्व, अनुशासन और राजनीतिक भूमिका को लेकर सवाल खड़े किए हैं।
कांग्रेस के लिए जरूरी है कि वह सरकार विरोधी माहौल बनाने के साथ जनता के सामने एक स्पष्ट नेतृत्व, साझा चुनावी कार्यक्रम और भरोसेमंद विकल्प भी प्रस्तुत करे। यदि पार्टी के नेता सार्वजनिक मंचों पर ही अपनी राजनीतिक जगह को लेकर उलझे रहेंगे, तो सरकार के खिलाफ उठाए गए मुद्दों की धार कमजोर पड़ सकती है। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण ने भाजपा और कांग्रेस के बीच एक और मोर्चा खोल दिया है। कांग्रेस ने मतदाता सूची से नाम कम होने पर सवाल उठाए हैं, जबकि भाजपा इसे सूची को दुरुस्त करने की प्रक्रिया बता रही है। दोनों दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप तेज हैं।
इस विवाद में राजनीतिक बयानबाजी से अधिक महत्वपूर्ण यह सुनिश्चित करना है कि कोई पात्र मतदाता अपने मताधिकार से वंचित न रहे। मतदाता सूची में मृत, स्थानांतरित और दोहरी प्रविष्टियों की पहचान जरूरी है, लेकिन किसी पात्र नागरिक का नाम गलती से हटने पर उसे सुधारने की प्रक्रिया भी सरल और प्रभावी होनी चाहिए। चुनाव से पहले इस मुद्दे पर निर्वाचन आयोग की पारदर्शिता और निष्पक्षता की अहम भूमिका रहेगी।
उत्तराखंड की राजनीति में बेरोजगारी, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास और भर्ती प्रक्रियाओं की पारदर्शिता जैसे सवाल चुनावी बहस के केंद्र में रहने वाले हैं। भाजपा अपने शासन और विकास के दावों के साथ जनता के बीच जाएगी, जबकि कांग्रेस सरकार की कमियों को उजागर कर सत्ता परिवर्तन की संभावना तलाशेगी। लेकिन दोनों दलों के सामने एक समान कसौटी है। जनता यह जानना चाहेगी कि रोजगार के कितने अवसर बने, पहाड़ के गांवों में बुनियादी सुविधाएं कितनी सुधरीं, स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच कितनी बढ़ी और युवाओं का भरोसा जीतने के लिए क्या ठोस कदम उठाए गए। इन सवालों का जवाब केवल राजनीतिक आरोपों से नहीं दिया जा सकता।
उत्तराखंड की सियासत में अभी से आरोपों, यात्राओं, संगठनात्मक बैठकों और राजनीतिक दावों का दौर तेज हो गया है। भाजपा सत्ता बचाने की रणनीति पर काम कर रही है तो कांग्रेस सत्ता में वापसी के लिए अपने मुद्दों और संगठन को मजबूत करने की कोशिश में है। छोटे दलों और क्षेत्रीय राजनीतिक ताकतों की भूमिका भी चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकती है। फिलहाल, प्रदेश की राजनीति का सबसे बड़ा सवाल यही है कि कौन-सा दल जनता के मुद्दों को विश्वसनीय समाधान में बदल पाता है। भाजपा के लिए शासन के रिकार्ड का हिसाब देना चुनौती है तो कांग्रेस के लिए अपने भीतर एकजुटता और मजबूत विकल्प पेश करना। चुनावी बिसात पर चालें भले अभी से चली जा रही हों, लेकिन अंतिम कसौटी जनता की अपेक्षाएं, नेताओं की जवाबदेही और जमीन पर किए गए काम ही होंगे।
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें