शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026
आरोपों की आग और न्याय का पैमाना
अंकिता हत्याकांड का कथित वीआइपी वाला सवाल आज भी खड़ा
दुष्यंत गौतम पर उठते आरोपों के बीच सरकार की चुप्पी पर सवाल
उत्तराखंड की सियासत में सबसे बड़ा सवाल अब भी है अनुत्तरित
देहरादून। अंकिता भंडारी हत्याकांड में तीन दोषियों को उम्रकैद की सजा मिल चुकी है, लेकिन उत्तराखंड की सियासत में सबसे बड़ा सवाल अब भी अनुत्तरित हैकृआखिर वह कथित वीआइपी कौन था, जिसका नाम लेकर इस मामले में लगातार सवाल उठते रहे हैं? अंकिता के माता-पिता इसी सवाल का जवाब मांग रहे हैं। कथित वीआइपी प्रकरण को लेकर दुष्यंत कुमार गौतम का नाम राजनीतिक बहस में उछाला जा रहा है। परिवार उनकी राज्यपाल पद पर नियुक्ति पर भी आपत्ति जता चुका है। लेकिन यहां एक बुनियादी सवाल है कि क्या राजनीतिक आरोप, जनाक्रोश और सोशल मीडिया पर चल रही चर्चाएं किसी व्यक्ति को अपराधी घोषित करने के लिए पर्याप्त हैं? जवाब हैकृनहीं। आरोप कितना भी गंभीर क्यों न हो, उसकी पुष्टि जांच और न्यायिक प्रक्रिया से ही होनी चाहिए।
इसका दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि अंकिता के परिवार के मन में कथित वीआइपी की भूमिका को लेकर सवाल हैं, यदि वह जांच की मांग कर रहे हैं और यदि सार्वजनिक जीवन में इस मामले को लेकर अविश्वास बना हुआ है, तो उन सवालों का जवाब देना सरकार और संबंधित जांच एजेंसियों की जिम्मेदारी है। केवल आरोपों को खारिज कर देने या राजनीतिक विवाद बताकर किनारे कर देने से संदेह समाप्त नहीं होते। सितंबर 2022 में अंकिता भंडारी की हत्या ने पूरे उत्तराखंड को झकझोर दिया था। वनंतरा रिजॉर्ट में काम करने वाली 19 वर्षीय अंकिता की हत्या के मामले में रिजार्ट मालिक पुलकित आर्य और उसके दो कर्मचारियों को अदालत ने दोषी ठहराया तथा आजीवन कारावास की सजा सुनाई। यह न्यायिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण पड़ाव था। लेकिन कथित वीआइपी की भूमिका को लेकर उठते सवालों ने मामले को राजनीतिक और सामाजिक बहस के केंद्र में बनाए रखा। अंकिता के माता-पिता की मांग है कि इस पहलू की निष्पक्ष जांच हो और उनकी आशंकाओं का समाधान किया जाए।
यहीं सरकार और जांच एजेंसियों की जवाबदेही सामने आती है। यदि किसी आरोप के समर्थन में साक्ष्य हैं, तो उनकी जांच होनी चाहिए। यदि जांच में आरोपों की पुष्टि नहीं होती, तो उसके कारण और निष्कर्ष भी स्पष्ट होने चाहिए। जनता को न तो अफवाहों के भरोसे छोड़ा जा सकता है और न ही गंभीर सवालों के जवाब के बिना चुप रहने की अपेक्षा की जा सकती है। कथित वीआइपी प्रकरण में दुष्यंत कुमार गौतम का नाम राजनीतिक आरोपों और सार्वजनिक चर्चाओं में सामने आया है। उन्होंने आरोपों को खारिज किया है। उपलब्ध जानकारी के आधार पर उन्हें अंकिता हत्याकांड का वीआइपी या दुष्कर्मी घोषित करना उचित नहीं है। ऐसा कोई निष्कर्ष न्यायिक रूप से प्रमाणित तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि आरोपों से जुड़े सवाल पूछना गलत है। किसी व्यक्ति के विरुद्ध आरोप की निष्पक्ष जांच की मांग और उसे अपराधी घोषित करना दो अलग बातें हैं। पहली लोकतांत्रिक जवाबदेही का हिस्सा है, जबकि दूसरी के लिए विश्वसनीय साक्ष्य और कानूनी प्रक्रिया आवश्यक है।
सरकार की असली परीक्षा यह नहीं कि वह आरोपों को कितनी दृढ़ता से खारिज करती है, बल्कि यह है कि वह निष्पक्ष जांच और पारदर्शी जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए क्या करती है। अंकिता के माता-पिता का दिल्ली जाकर धरना देना और न्याय की मांग करना इस बात का संकेत है कि वे मौजूदा स्थिति से संतुष्ट नहीं हैं। इंडिया गेट पर धरने के दौरान उनके हिरासत में लिए जाने की घटना ने भी राजनीतिक विवाद को हवा दी। लेकिन किसी पीड़ित परिवार के सवालों का समाधान उसे धरनास्थल से हटाने भर से नहीं हो सकता। प्रशासन को कानून-व्यवस्था बनाए रखने का अधिकार है, पर उसके साथ यह जिम्मेदारी भी है कि शिकायतों और मांगों पर उचित कार्रवाई हो।
यहां सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि कथित वीआइपी की भूमिका से संबंधित शिकायतों की वर्तमान स्थिति क्या है, कौन-से पहलू जांच के दायरे में हैं और परिवार को उपलब्ध कानूनी विकल्पों के बारे में क्या जानकारी दी गई है। यदि किसी मांग पर कार्रवाई संभव नहीं है, तो उसका कारण भी तथ्यों और कानून के आधार पर बताया जाना चाहिए। अंकिता भंडारी हत्याकांड उत्तराखंड में महिला सुरक्षा और राजनीतिक जवाबदेही का प्रतीक बन चुका है। इसलिए कथित वीआइपी प्रकरण पर उठने वाले सवालों का राजनीतिक असर होना स्वाभाविक है। विपक्ष सरकार को घेर रहा है, जबकि भाजपा अपनी सरकार की कार्रवाई और दोषियों को मिली सजा का हवाला दे रही है।
लेकिन इस राजनीतिक टकराव में सबसे महत्वपूर्ण पक्ष अंकिता का परिवार है। उसे राजनीतिक दलों के बयानों से अधिक तथ्य चाहिए। उसे यह जानना है कि उसके सवालों की जांच हुई या नहीं, उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण हुआ या नहीं और जांच एजेंसियों ने किन निष्कर्षों पर पहुंचकर अपनी स्थिति स्पष्ट की। यदि सरकार को लगता है कि जांच में किसी प्रभावशाली व्यक्ति के विरुद्ध कोई प्रमाण नहीं मिला, तो उसे तथ्यों के साथ अपनी स्थिति रखनी चाहिए। यदि कोई पहलू अब भी जांच की मांग करता है, तो उसकी निष्पक्ष पड़ताल होनी चाहिए। दोनों ही स्थितियों में पारदर्शिता जरूरी है।
न्यायालय साक्ष्यों और कानून के आधार पर निर्णय देता है। जनता का आक्रोश अपने आप में दोषसिद्धि का प्रमाण नहीं है। लेकिन जनता का अविश्वास भी ऐसा प्रश्न है जिसे सरकार और संस्थाएं अनदेखा नहीं कर सकतीं। कानून का शासन तभी मजबूत होता है, जब न्यायिक प्रक्रिया निष्पक्ष हो और उसके बारे में लोगों को विश्वसनीय जानकारी मिले। अंकिता हत्याकांड में दोषियों को सजा मिलना और कथित वीआइपी से जुड़े सवालों का समाधान होना अलग-अलग पहलू हो सकते हैं। इसलिए यह जरूरी है कि एक मामले में हुई दोषसिद्धि को दूसरे पहलू पर उठे हर सवाल का अंतिम उत्तर न मान लिया जाए।अंकिता को न्याय दिलाने के नाम पर किसी को बिना प्रमाण अपराधी घोषित करना भी गलत है और प्रभावशाली लोगों से जुड़े सवालों को बिना जवाब दिए छोड़ देना भी।
सरकार को चाहिए कि वह राजनीतिक बचाव की मुद्रा से बाहर निकले और जांच की स्थिति पर स्पष्टता दे। जांच एजेंसियों को चाहिए कि वह प्रत्येक प्रासंगिक साक्ष्य की निष्पक्षता से पड़ताल करें और राजनीतिक दलों को चाहिए कि वे पीड़ित परिवार के दुख को अपने राजनीतिक लाभ का साधन बनाने के बजाय न्याय की प्रक्रिया को मजबूत करने पर जोर दें। अंकिता के माता-पिता को जवाब चाहिए, जनता को पारदर्शिता चाहिए और लोकतंत्र को ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें न किसी को बिना सबूत दोषी ठहराया जाए, न किसी को उसके पद या प्रभाव के कारण सवालों से परे माना जाए। यही इस मामले की सबसे बड़ी कसौटी है।
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