गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026

सियासी शोर में दबे ‘पहाड़’ के सवाल

रोजगार-पलायन तक सरकार के सामने सवालों की कतार सियासी तपिश के बीच बुनियादी सवालों पर लोगों की आस राजनीतिक शोर के बीच जनता की मूलभूत समस्याएं खड़ी गैरसैंण। उत्तराखंड की ग्रीष्मकालीन राजधानी भराड़ीसैंण में विधानसभा का सत्र शुरू हो चुका है। सदन में अनुपूरक बजट, विधायी कार्यवाही और सत्ता-विपक्ष के बीच सियासी टकराव है। सदन के बाहर भी प्रदर्शन और विरोध की राजनीति गरमा रही है। लेकिन इस राजनीतिक शोर के बीच पहाड़ की जनता के सवाल अपनी जगह खड़े हैं। बेरोजगारी से जूझते युवा रोजगार मांग रहे हैं, गांव पलायन की मार झेल रहे हैं, मरीज बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के इंतजार में हैं और दूरस्थ क्षेत्रों के लोग सड़क, पेयजल तथा संचार जैसी बुनियादी सुविधाओं की उम्मीद लगाए बैठे हैं। ऐसे में विधानसभा के इस सत्र की सबसे बड़ी कसौटी यही है कि भराड़ीसैंण में कितनी राजनीतिक गर्मी पैदा हुई, इससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि यहां से जनता के जीवन में बदलाव लाने वाले कितने फैसले निकले। राज्य गठन के बाद उत्तराखंड ने विकास के कई पड़ाव पार किए हैं, लेकिन पहाड़ की मूल समस्याओं का पूरी तरह समाधान अब भी चुनौती बना हुआ है। जिस अलग राज्य की कल्पना रोजगार, बेहतर सुविधाओं और क्षेत्रीय असंतुलन को दूर करने के संकल्प के साथ की गई थी, उसकी कसौटी आज भी गांवों की स्थिति और युवाओं के भविष्य से तय होती है। भराड़ीसैंण में बैठने वाली सरकार से अपेक्षा भी यही है कि वह पर्वतीय क्षेत्रों की जरूरतों को प्राथमिकता दे। ऐसे में सत्र केवल विधेयकों को पारित करने और बजट की औपचारिकताएं पूरी करने तक सीमित नहीं रह सकता। सरकार ने लगभग 7412 करोड़ रुपये के अनुपूरक बजट को मंजूरी दी है। अब सवाल यह है कि अतिरिक्त धनराशि से प्रदेश की किन जरूरतों को पूरा किया जाएगा और इसका लाभ आम जनता तक कैसे पहुंचेगा। बजट का आकार सरकार की वित्तीय प्राथमिकताओं का संकेत देता है, लेकिन विकास की वास्तविक तस्वीर आवंटित धन के इस्तेमाल और उससे मिलने वाले परिणामों से बनती है। प्रदेश में सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल और रोजगार जैसे क्षेत्रों में जरूरतें व्यापक हैं। दूरस्थ पर्वतीय इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, विशेषज्ञ चिकित्सकों की उपलब्धता, विद्यालयों में शिक्षकों की तैनाती और गांवों तक नियमित परिवहन जैसी समस्याएं लोगों के दैनिक जीवन को प्रभावित करती हैं। ऐसे में जनता यह जानना चाहेगी कि अनुपूरक बजट से इन क्षेत्रों में कितनी राहत मिलेगी, कौन-सी योजनाएं प्राथमिकता पर पूरी होंगी और उनके क्रियान्वयन की समयसीमा क्या होगी। सरकार के सामने यह साबित करने की चुनौती है कि बजट केवल सरकारी खातों में दर्ज अतिरिक्त प्रावधान नहीं, बल्कि विकास कार्यों को गति देने का माध्यम बनेगा। योजनाओं के लिए धन उपलब्ध कराने के साथ यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि उसका समय पर और प्रभावी उपयोग हो। उत्तराखंड में बेरोजगारी ऐसा मुद्दा है, जिसे चुनावी बहस से अलग नहीं रखा जा सकता। सरकारी नौकरियों की तैयारी कर रहे युवाओं की अपेक्षाएं, भर्ती प्रक्रियाओं की पारदर्शिता और निजी क्षेत्र में सीमित अवसर रोजगार के सवाल को लगातार प्रासंगिक बनाए हुए हैं। चुनाव से पहले सरकार अपनी उपलब्धियां गिनाएगी और विपक्ष कमियों को सामने रखेगा, लेकिन युवाओं के लिए असली सवाल अवसरों का है। कितने युवाओं को स्थायी रोजगार मिला, कौशल प्रशिक्षण के बाद कितनों को काम मिला और स्वरोजगार की योजनाओं से कितने उद्यम स्थापित हुएकृइन सवालों के जवाब जरूरी हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में पर्यटन, बागवानी, कृषि आधारित उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण और डिजिटल सेवाओं के जरिए स्थानीय रोजगार बढ़ाने की संभावनाएं हैं। इसके लिए प्रशिक्षण के साथ बाजार, पूंजी और बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता भी सुनिश्चित करनी होगी। युवाओं को केवल सरकारी नौकरी की प्रतीक्षा में रहने के लिए छोड़ देना समाधान नहीं है। सरकार को ऐसे अवसर विकसित करने होंगे, जिनसे युवा अपने ही क्षेत्र में सम्मानजनक आजीविका हासिल कर सकें। पलायन उत्तराखंड के विकास मॉडल के सामने सबसे गंभीर सवालों में से एक है। गांवों से लोगों का बाहर जाना केवल रोजगार की कमी का परिणाम नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन और बाजार जैसी सुविधाओं की अनुपलब्धता से भी जुड़ा है। जब गांव में बच्चों की पढ़ाई और परिवार के उपचार की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होती, तब बेहतर भविष्य की तलाश में शहरों की ओर जाना मजबूरी बन जाता है। ऐसे में पलायन रोकने की नीति को केवल घोषणाओं तक सीमित नहीं रखा जा सकता। स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बढ़ाने, कृषि और बागवानी को बाजार से जोड़ने, छोटे उद्यमों को प्रोत्साहन देने तथा पर्यटन से स्थानीय परिवारों की आय बढ़ाने की जरूरत है। सरकार को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि अब तक घोषित योजनाओं से कितने गांवों में आजीविका के अवसर बढ़े और उनके परिणामों का आकलन किस आधार पर किया जा रहा है। भराड़ीसैंण के सत्र में इन सवालों पर गंभीर चर्चा और ठोस निर्णय पहाड़ की जनता के भरोसे को मजबूत कर सकते हैं। सत्र में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच टकराव स्वाभाविक है। सरकार का दायित्व अपनी नीतियों और योजनाओं का हिसाब देना है, जबकि विपक्ष की जिम्मेदारी जनता से जुड़े मुद्दों पर जवाब मांगना है। लेकिन लोकतंत्र में दोनों की भूमिका केवल आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं हो सकती। यदि विपक्ष सदन में बेरोजगारी, पलायन, स्वास्थ्य और शिक्षा के सवाल उठाता है तो उसे तथ्यों के साथ सरकार को जवाबदेह बनाने की कोशिश करनी चाहिए। वहीं सरकार को भी राजनीतिक आलोचना का जवाब केवल उपलब्धियों की सूची से नहीं, बल्कि स्पष्ट आंकड़ों और योजनाओं की प्रगति से देना होगा। असहमति लोकतंत्र की ताकत है, लेकिन उसका परिणाम जनता की समस्याओं के समाधान के रूप में सामने आना चाहिए। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले यह सत्र राजनीतिक दलों के लिए अपनी प्राथमिकताएं सामने रखने का अवसर भी है। सत्ता पक्ष के लिए विकास कार्यों का हिसाब देने और विपक्ष के लिए जनता की समस्याओं को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में लाने की चुनौती है। लेकिन मतदाता अंततः यह देखेगा कि उसके जीवन में कितना बदलाव आया।

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