गुरुवार, 15 अक्टूबर 2026

सियासत में ‘खौफ’ कठघरे में सत्ता

रोते हुए कांग्रेस विधायक सुमित हृदयेश की गुहारकृमेरी और परिवार की जान को खतरा फोन टैपिंग से गाड़ी का एक्सीडेंट कराने की आशंका तक, गैरसैंण में फूट सकता है सियासी बम हल्द्वानी से कांग्रेस विधायक ने अपनी गाड़ी का हादसा कराए जाने की आशंका भी जताई देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में अब सवाल केवल सत्ता और विपक्ष की लड़ाई का नहीं, बल्कि एक निर्वाचित जनप्रतिनिधि की सुरक्षा और व्यवस्था पर उसके भरोसे का भी है। हल्द्वानी से कांग्रेस विधायक सुमित हृदयेश का भावुक होकर रो पड़ना, अपनी और अपने परिवार की जान को खतरा बताना और प्रदेश में नेताओं के फोन टैप किए जाने का आरोप लगाना धामी सरकार के लिए असहज करने वाला घटनाक्रम है। विधायक ने अपनी गाड़ी का हादसा कराए जाने की आशंका भी जताई है। इतना ही नहीं, गैरसैंण विधानसभा सत्र के दौरान कठोर कदम उठाने की चेतावनी देकर उन्होंने सियासी गलियारों में हलचल बढ़ा दी है। सवाल सीधा हैकृउत्तराखंड में एक विधायक को आखिर किससे खतरा महसूस हो रहा है? क्या यह किसी वास्तविक सुरक्षा संबंधी चिंता का मामला है, किसी कथित साजिश की आशंका है या फिर प्रदेश की राजनीति में बढ़ते अविश्वास का विस्फोट? इन सवालों के जवाब जांच से ही सामने आएंगे, लेकिन सुमित हृदयेश के आरोपों ने सरकार और पुलिस प्रशासन को जवाबदेही के कठघरे में जरूर खड़ा कर दिया है। सुमित हृदयेश कोई आम राजनीतिक कार्यकर्ता नहीं, बल्कि जनता द्वारा चुने गए विधायक हैं। जब ऐसा जनप्रतिनिधि सार्वजनिक रूप से अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा को लेकर आशंका जताता है, तो उसके बयान को सामान्य राजनीतिक आरोप कहकर खारिज करना आसान नहीं होना चाहिए। खासकर तब, जब वह फोन टैपिंग जैसे गंभीर मुद्दे को उठाते हुए संभावित दुर्घटना की आशंका भी व्यक्त कर रहा हो। यहां सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल यही है कि क्या सरकार विधायक की शिकायत को गंभीरता से लेकर स्थिति स्पष्ट करेगी या विपक्ष के आरोपों को राजनीतिक स्टंट बताकर पल्ला झाड़ लेगी? सत्ता के लिए यह मामला इसलिए भी संवेदनशील है, क्योंकि सुरक्षा और कानून-व्यवस्था सरकार की सबसे बुनियादी जिम्मेदारियों में शामिल हैं। विधायक ने प्रदेश में एक बड़े गिरोह द्वारा नेताओं के फोन टैप किए जाने का दावा किया है। यदि इस आरोप के पीछे कोई ठोस साक्ष्य है, तो यह केवल कांग्रेस या भाजपा के बीच का विवाद नहीं रह जाता। मामला नागरिकों की निजता, राजनीतिक स्वतंत्रता और सरकारी तंत्र के संभावित दुरुपयोग तक पहुंच सकता है। लेकिन आरोप जितना गंभीर है, उतना ही जरूरी उसका प्रमाणित होना भी है। फोन टैपिंग किसने की, किसके निर्देश पर की और क्या इसके लिए कानूनी अनुमति थीकृइन सवालों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। सरकार को आरोपों पर स्पष्ट रुख अपनाना चाहिए और पुलिस को शिकायत मिलने पर नियमानुसार कार्रवाई करनी चाहिए। यदि आरोप निराधार हैं, तो जांच उन्हें खारिज करे। यदि उनमें तथ्य हैं, तो जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई हो। लोकतंत्र में गंभीर आरोपों का जवाब चुप्पी या राजनीतिक पलटवार नहीं, बल्कि पारदर्शिता है। सुमित हृदयेश ने अपनी गाड़ी का एक्सीडेंट कराए जाने की आशंका जताकर विवाद को और गंभीर बना दिया है। यह आशंका अपने आप में किसी साजिश का प्रमाण नहीं है, लेकिन इसे अनदेखा करना भी उचित नहीं होगा। पुलिस को विधायक की शिकायत, उपलब्ध तथ्यों और सुरक्षा संबंधी जोखिम का आकलन करना चाहिए। यदि किसी जनप्रतिनिधि को अपनी आवाजाही और परिवार की सुरक्षा को लेकर वास्तविक खतरा महसूस हो रहा है, तो प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह उनकी बात सुने और आवश्यक सुरक्षा उपायों पर निर्णय ले। साथ ही, बिना साक्ष्य किसी व्यक्ति या संगठन को दोषी ठहराने से बचना भी जरूरी है। गैरसैंण विधानसभा सत्र से पहले सुमित हृदयेश की चेतावनी ने इस पूरे मामले को राजनीतिक रूप से और विस्फोटक बना दिया है। यदि कांग्रेस इस मुद्दे को सदन में उठाती है, तो सरकार को विधायक की सुरक्षा, फोन टैपिंग के आरोप और शिकायतों पर हुई कार्रवाई को लेकर सवालों का सामना करना पड़ सकता है। कांग्रेस के लिए यह सरकार को घेरने का बड़ा अवसर है। पार्टी कानून-व्यवस्था और विपक्षी नेताओं की सुरक्षा का मुद्दा उठाकर सरकार की जवाबदेही तय करने की मांग कर सकती है। वहीं, भाजपा और सरकार के सामने चुनौती होगी कि वे तथ्यों के आधार पर स्थिति स्पष्ट करें, न कि इसे केवल विपक्ष की राजनीति बताकर खारिज कर दें।हालांकि, विधायक ने गैरसैंण सत्र के दौरान कठोर कदम उठाने की जो चेतावनी दी है, उसका सटीक आशय स्पष्ट होना जरूरी है। इसे लेकर अटकलों के बजाय उनकी शिकायत और सुरक्षा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। संबंधित अधिकारियों को उनसे तत्काल संवाद कर उनकी बात सुननी चाहिए। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सरकार के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि वह इस प्रकरण से कैसे निपटती है। क्या विधायक की शिकायत की निष्पक्ष जांच होगी? क्या फोन टैपिंग के दावे की सत्यता सामने लाई जाएगी? क्या संभावित सुरक्षा खतरे का आकलन किया जाएगा? और क्या सरकार इन सवालों पर सार्वजनिक रूप से स्थिति स्पष्ट करेगी? ये सवाल किसी एक दल के राजनीतिक फायदे या नुकसान से बड़े हैं। यदि शिकायत में तथ्य हैं, तो कार्रवाई होनी चाहिए। यदि आरोपों की पुष्टि नहीं होती, तो जांच के निष्कर्ष सामने आने चाहिए। दोनों ही स्थितियों में पारदर्शिता जरूरी है। उत्तराखंड की राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप कोई नई बात नहीं है। लेकिन जब विवाद किसी विधायक की सुरक्षा, परिवार की चिंता और कथित निगरानी जैसे विषयों तक पहुंच जाए, तो इसे सामान्य राजनीतिक बयानबाजी के खाते में डालना उचित नहीं होगा। सुमित हृदयेश के आरोपों ने सरकार को एक असहज सवाल के सामने खड़ा कर दिया हैकृक्या प्रदेश में जनप्रतिनिधि अपनी सुरक्षा को लेकर आश्वस्त हैं? इसका उत्तर किसी प्रेस बयान से नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच, तथ्यों और ठोस कार्रवाई से मिलेगा। गैरसैंण सत्र से पहले सुमित हृदयेश के आरोपों ने सरकार के सामने राजनीतिक और प्रशासनिक, दोनों मोर्चों पर चुनौती खड़ी कर दी है। अब निगाहें इस बात पर रहेंगी कि सरकार आरोपों का जवाब कैसे देती है और पुलिस प्रशासन मामले की जांच में कितनी तत्परता दिखाता है। फिलहाल इतना तय है कि यह मामला केवल एक विधायक के भावुक बयान तक सीमित नहीं रहेगा। यदि कांग्रेस इसे सदन में उठाती है, तो गैरसैंण में कानून-व्यवस्था, राजनीतिक निगरानी और जनप्रतिनिधियों की सुरक्षा पर तीखी बहस हो सकती है। लेकिन उस बहस की विश्वसनीयता इसी में होगी कि आरोपों को तथ्यों की कसौटी पर परखा जाए और किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले निष्पक्ष जांच सुनिश्चित की जाए।

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