मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026
लोककलाकार हाशिये पर, मंच पर बाहरी सितारों का जलव
कुंजापुरी मेले में दलेर मेहंदी को बुलाने पर उठ गए हैं सवालकृ
उत्तराखंड के कलाकारों को कब मिलेगा अपने घर में सम्मान
मंच पर मंत्री सुबोध उनियाल की टोका-टोकी ने खींचा ध्यान
देहरादून। उत्तराखंड में मेले लगते हैं, मंच सजते हैं, रोशनी होती है, भीड़ जुटती है और तालियों की गूंज के बीच कार्यक्रम खत्म हो जाते हैं। लेकिन इस शोर के बीच एक सवाल बार-बार दबा दिया जाता हैकृइस प्रदेश की अपनी लोकसंस्कृति का क्या हुआ? जिन लोकगीतों, लोकधुनों और लोककलाकारों ने उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान को पीढ़ियों तक जीवित रखा, वह आखिर अपने ही प्रदेश के आयोजनों में पीछे क्यों खड़े हैं? कुंजापुरी मेले में गायक दलेर मेहंदी को बुलाए जाने के बाद यह सवाल फिर सामने है। सवाल किसी कलाकार की लोकप्रियता का नहीं, बल्कि उस प्राथमिकता का है जिसके तहत बाहरी कलाकारों पर मोटी रकम खर्च करने की तैयारी दिखाई देती है, जबकि स्थानीय लोककलाकारों को पर्याप्त अवसर और सम्मान मिलने पर सवाल उठते रहते हैं।
विडंबना देखिए। उत्तराखंड अपनी सांस्कृतिक पहचान को पर्यटन की ताकत बताता है। सरकार और आयोजन समितियां लोकसंस्कृति के संरक्षण की बातें करती हैं। लेकिन जब मंच सजाने की बारी आती है, तो क्या लोकसंस्कृति महज उद्घाटन भाषणों और सरकारी विज्ञापनों तक सिमट जाती है? अगर स्थानीय कलाकारों को ही अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए संघर्ष करना पड़े, तो फिर सांस्कृतिक विरासत बचाने के दावों का अर्थ क्या रह जाता है? दलेर मेहंदी एक लोकप्रिय गायक हैं। उन्हें बुलाना अपने आप में गलत नहीं है। किसी भी मेले में देश के दूसरे हिस्सों के कलाकारों को आमंत्रित किया जा सकता है। लेकिन सवाल तब पैदा होता है, जब ऐसे आयोजनों में स्थानीय प्रतिभाओं की भागीदारी, उनके पारिश्रमिक और उन्हें मिलने वाले मंच को लेकर असंतोष सामने आता है।
उत्तराखंड के लोककलाकारों के पास अपनी परंपराएं हैं, अपनी धुनें हैं, अपनी भाषाएं हैं और अपने समाज की कहानियां हैं। जागर, पांडव नृत्य, चांचरी, झोड़ा, छपेली और हुड़किया बौल जैसी परंपराएं केवल मनोरंजन के साधन नहीं हैं। यह पहाड़ के जीवन, संघर्ष, आस्था और सामूहिक स्मृति की अभिव्यक्तियां हैं। फिर भी यदि किसी आयोजन की सफलता का पैमाना केवल यह बन जाए कि कितने बड़े बाहरी कलाकार को बुलाया गया और उस पर कितनी रकम खर्च हुई, तो स्थानीय संस्कृति को मंच पर जगह कैसे मिलेगी? यह आयोजकों से पूछा जाना चाहिए कि स्थानीय कलाकारों को कितने कार्यक्रम दिए गए, उन्हें कितना पारिश्रमिक मिला और उनके लिए बजट में कितनी जगह रखी गई।
कुंजापुरी मेले में दलेर मेहंदी के मंच पर शराब के नशे में होने को लेकर उठे सवालों के बीच कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल ने उन्हें टोका। यह प्रसंग इसलिए भी चर्चा में आया, क्योंकि सार्वजनिक मंच केवल मनोरंजन की जगह नहीं होता। वह आयोजन की गरिमा, कलाकार की जिम्मेदारी और आयोजकों की जवाबदेही का भी प्रतीक होता है। हालांकि, मंच पर कलाकार की स्थिति और पूरे घटनाक्रम के बारे में अंतिम निष्कर्ष आधिकारिक तथ्यों के आधार पर ही निकाला जाना चाहिए। लेकिन इस प्रसंग ने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा किया हैकृजब सार्वजनिक आयोजनों में अनुशासन और गरिमा की बात आती है, तो जिम्मेदारी केवल मंच पर मौजूद कलाकार की होती है या कार्यक्रम आयोजित करने वालों की भी? जिस कलाकार को बुलाया जाता है, उसके कार्यक्रम की शर्तें क्या होती हैं? आयोजन समिति ने क्या व्यवस्था की थी? सार्वजनिक धन खर्च हुआ हो तो खर्च और अनुबंध का हिसाब क्या है? और यदि कार्यक्रम में कोई अनुचित स्थिति पैदा हुई, तो आयोजकों की जवाबदेही तय होगी या नहीं?
इन सवालों का जवाब किसी एक कलाकार को कटघरे में खड़ा करके नहीं मिलेगा। इसके लिए आयोजन की पूरी व्यवस्था को देखना होगा। उत्तराखंड के कलाकारों की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि उन्हें अक्सर संस्कृति बचाने के भाषणों में याद किया जाता है, लेकिन बड़े मंचों पर उनका हिस्सा कितना है, इस पर कम चर्चा होती है। सरकारी समारोहों में स्थानीय लोककलाकारों को शामिल करना एक अच्छी पहल हो सकती है, मगर क्या यह पर्याप्त है? क्या उन्हें केवल औपचारिक प्रस्तुतियों तक सीमित रखा जाएगा, जबकि मुख्य आकर्षण और बड़े बजट वाले कार्यक्रमों में दूसरे कलाकारों को प्राथमिकता मिलती रहेगी?
लोककलाकारों को अवसर देना किसी पर एहसान करना नहीं है। यह प्रदेश की सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था में निवेश है। स्थानीय कलाकारों को नियमित काम मिलेगा तो उनके साथ वाद्ययंत्र बजाने वाले, लोकवाद्य बनाने वाले, वेशभूषा तैयार करने वाले और अनेक दूसरे लोग भी लाभान्वित होंगे। इससे संस्कृति केवल मंच पर दिखाई नहीं देगी, बल्कि स्थानीय समाज की आजीविका से भी जुड़ेगी। कुंजापुरी मेले का विवाद एक आयोजन तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इसे उत्तराखंड के तमाम सरकारी और सार्वजनिक सांस्कृतिक कार्यक्रमों की नीति पर बहस का अवसर बनना चाहिए। सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि बड़े आयोजनों में स्थानीय कलाकारों के लिए क्या व्यवस्था है। आयोजन समितियों को बताना चाहिए कि कलाकारों के चयन में कौन-से मानदंड अपनाए जाते हैं और बजट का कितना हिस्सा प्रदेश की प्रतिभाओं पर खर्च होता है।
एक पारदर्शी नीति बनाई जा सकती है, जिसके तहत हर बड़े सांस्कृतिक आयोजन में उत्तराखंड के लोककलाकारों के लिए न्यूनतम भागीदारी सुनिश्चित हो। उनके पारिश्रमिक की उचित दर तय हो। स्थानीय भाषाओं और परंपराओं को केवल प्रतीकात्मक प्रस्तुति तक सीमित न रखा जाए। साथ ही, बाहर से बुलाए जाने वाले कलाकारों के लिए भी अनुबंध, मंचीय आचरण और कार्यक्रम की गुणवत्ता से जुड़ी स्पष्ट शर्तें हों। आखिर मेले जनता के होते हैं। उनकी सांस्कृतिक पहचान स्थानीय समाज से बनती है। ऐसे में आयोजन की सफलता का आकलन सिर्फ भीड़, चमक-दमक या किसी बड़े नाम से क्यों हो?
उत्तराखंड को बाहरी कलाकारों से परहेज नहीं, अपनी प्रतिभाओं की उपेक्षा से आपत्ति होनी चाहिए। दलेर मेहंदी को बुलाने पर बहस का असली अर्थ यही है कि पहाड़ की आवाज को पहाड़ में ही जगह क्यों मांगनी पड़ रही है। यदि अपनी धरती के लोककलाकारों को सम्मान, मंच और उचित पारिश्रमिक नहीं मिल सकता, तो लोकसंस्कृति के संरक्षण के दावे आखिर किसके लिए हैं?
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