बुधवार, 28 अक्टूबर 2026
न यूकेडी चली, न बसपा का दांव, न आप का ‘माडल’
उत्तराखंड में तीसरे विकल्प के बीच आंदोलन की जमीन पर दो दलों का कब्जा
राज्य बना, सरकारें बदलीं, लेकिन सत्ता की चाबी नहीं, यूकेडी में होती रही टूट
बसपा का सिमटता आधार व आप पार्टी की नाकामी की यह है असली कहानी
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति का सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि जिस राज्य का जन्म क्षेत्रीय अस्मिता और अपने राजनीतिक भविष्य पर खुद फैसला लेने की आकांक्षा से हुआ, वहां ढाई दशक से अधिक समय बाद भी कोई क्षेत्रीय दल सत्ता का विकल्प नहीं बन सका। उत्तराखंड क्रांति दल ने अलग राज्य के लिए संघर्ष किया, बहुजन समाज पार्टी ने मैदानी जिलों में अपना जनाधार बनाया और आम आदमी पार्टी ने दिल्ली के शासन माडल के सहारे प्रदेश में दस्तक दी। लेकिन विधानसभा की सत्ता तक पहुंचने की बारी आई तो मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच ही सिमट गया। यह महज छोटे दलों की चुनावी हार की कहानी नहीं है। यह उस राजनीतिक व्यवस्था की कहानी भी है, जिसमें मतदाता बदलाव चाहता है, लेकिन बदलाव के लिए वोट डालते समय अक्सर उसी दो-दलीय मुकाबले में लौट जाता है। सवाल है कि क्या उत्तराखंड में तीसरे विकल्प के लिए जमीन नहीं है, या जो दल उस जमीन पर खड़े होने का दावा करते रहे, वह उसे राजनीतिक ताकत में बदलने में नाकाम रहे?
उत्तराखंड में 2002 से 2022 तक हुए पांच विधानसभा चुनावों के नतीजे इस राजनीतिक प्रवृत्ति की गवाही देते हैं। भाजपा और कांग्रेस का संयुक्त मत प्रतिशत लगातार बढ़ा, जबकि छोटे और क्षेत्रीय दलों के लिए विधानसभा में जगह बनाना कठिन होता गया। वर्ष 2002 में दोनों राष्ट्रीय दलों को मिलाकर करीब 52 प्रतिशत मत मिले थे, जो 2022 में बढ़कर लगभग 82 प्रतिशत हो गए। इन आंकड़ों में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि तीसरे विकल्प का संकट केवल सीटों का संकट नहीं है। छोटे दल चुनाव लड़ते रहे, मुद्दे उठाते रहे, लेकिन उनका समर्थन निर्णायक चुनावी शक्ति में नहीं बदल पाया। वर्ष 2022 में 46 दल मैदान में थे, मगर विधानसभा में भाजपा, कांग्रेस और बसपा के अलावा केवल निर्दलीय उम्मीदवारों को जगह मिली। उत्तराखंड क्रांति दल के सामने सबसे बड़ी विडंबना यही है कि अलग राज्य की मांग को राजनीतिक स्वर देने वाला दल राज्य बनने के बाद सत्ता की मुख्य दावेदारी नहीं कर पाया। 2002 में उसे चार सीटें मिलीं। 2007 में तीन विधायक जीते। लेकिन 2012 के बाद उसका विधानसभा में प्रतिनिधित्व समाप्त हो गया। इसके पीछे कई कारण रहे। आंदोलनकारी संगठन से व्यापक चुनावी दल बनने की चुनौती, नेतृत्व के बीच मतभेद, बार-बार टूट और बदलते राजनीतिक समीकरणों ने उसकी ताकत को कमजोर किया। राज्य आंदोलन के दौरान गैरसैंण, स्थानीय रोजगार, पलायन और पहाड़ के संसाधनों पर अधिकार जैसे मुद्दे जनभावनाओं से जुड़े थे। लेकिन इन मुद्दों को बूथ स्तर के संगठन, मजबूत नेतृत्व और विश्वसनीय शासन के विकल्प में बदलना अलग चुनौती थी।
यूकेडी के सामने एक और मुश्किल थी। भाजपा ने अलग राज्य के समर्थन और राष्ट्रीय स्तर पर अपनी राजनीतिक ताकत के सहारे पहाड़ी मतदाताओं के बीच जगह बनाई। कांग्रेस के पास भी पुराना संगठन और व्यापक चुनावी नेटवर्क था। ऐसे में यूकेडी जिस क्षेत्रीय अस्मिता की राजनीति पर आगे बढ़ सकता था, उसी के मुद्दों को दोनों राष्ट्रीय दल अपने चुनावी एजेंडे में शामिल करते रहे। नतीजा यह हुआ कि आंदोलन की विरासत यूकेडी के पास रही, लेकिन उसका राजनीतिक लाभ दूसरी पार्टियां उठाती रहीं।
उत्तराखंड में तीसरे विकल्प की चर्चा यूकेडी तक सीमित नहीं रही। बहुजन समाज पार्टी ने हरिद्वार, ऊधमसिंह नगर और मैदानी क्षेत्रों के कुछ हिस्सों में अपना प्रभाव बनाया। 2002 में सात और 2007 में आठ सीटें जीतकर उसने साबित किया कि भाजपा-कांग्रेस के बाहर भी मतदाताओं का एक आधार मौजूद है। लेकिन 2012 में उसकी सीटें घटकर तीन रह गईं, 2017 में वह खाता नहीं खोल सकी और 2022 में दो सीटों पर सिमट गई। बसपा की चुनौती यह रही कि उसका प्रभाव कुछ सामाजिक और भौगोलिक क्षेत्रों में तो दिखाई दिया, लेकिन वह पूरे प्रदेश में समान ताकत वाला विकल्प नहीं बन पाई। उत्तराखंड की राजनीति में पर्वतीय और मैदानी क्षेत्रों के सवाल अलग-अलग रूप में सामने आते हैं। ऐसे में किसी दल को राज्यव्यापी पहचान बनाने के लिए स्थानीय सामाजिक समीकरणों से आगे बढ़कर साझा राजनीतिक कार्यक्रम तैयार करना पड़ता है। बसपा के अनुभव से यह भी स्पष्ट होता है कि कुछ सीटों पर प्रभावशाली होना और सरकार बनाने लायक जनाधार हासिल करना दो अलग बातें हैं। सीमित क्षेत्रों में समर्थन होने के बावजूद जब पार्टी का राज्यव्यापी संगठन कमजोर पड़ता है, तो उसका चुनावी प्रभाव सत्ता के समीकरण बदलने की क्षमता नहीं बना पाता।
आम आदमी पार्टी ने उत्तराखंड में शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली और दिल्ली के शासन माडल को आधार बनाकर राजनीतिक जमीन तैयार करने की कोशिश की। पार्टी ने 2022 के विधानसभा चुनाव में सभी 70 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, लेकिन एक भी सीट नहीं जीत सकी। यह नतीजा बताता है कि किसी दूसरे राज्य में सफल राजनीतिक मॉडल को उत्तराखंड में दोहराना आसान नहीं है। यहां मतदाता केवल सेवाओं और सुविधाओं की घोषणाओं से प्रभावित नहीं होता। स्थानीय नेतृत्व, सामाजिक संपर्क, क्षेत्रीय समस्याओं की समझ और चुनावी संगठन भी महत्वपूर्ण हैं। पहाड़ के दूरस्थ गांवों से लेकर हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर के मैदानी क्षेत्रों तक अलग-अलग अपेक्षाओं को जोड़ना किसी भी नए दल के लिए बड़ी चुनौती है। आप की चुनौती यह भी थी कि भाजपा और कांग्रेस के बीच पहले से मौजूद मुकाबले में उसे अपनी अलग पहचान बनानी थी। चुनाव के दौरान प्रचार और संगठन खड़ा करना एक बात है, लेकिन वर्षों तक गांवों, कस्बों और स्थानीय मुद्दों के बीच मौजूद रहना दूसरी बात। 2022 का परिणाम दिखाता है कि राजनीतिक पहचान को मतों और सीटों में बदलने के लिए केवल प्रचार पर्याप्त नहीं था।
इस सवाल का जवाब इतना सरल नहीं है कि उत्तराखंड का मतदाता तीसरे दल को पसंद नहीं करता। बसपा की शुरुआती सफलताएं और यूकेडी की कुछ सीटें बताती हैं कि छोटे दलों के लिए जगह रही है। लेकिन चुनावी मुकाबला जैसे-जैसे भाजपा और कांग्रेस के बीच केंद्रित हुआ, वैसे-वैसे छोटे दलों के सामने एक कठिन गणित खड़ा हो गया। मतदाता अक्सर उस उम्मीदवार को प्राथमिकता दे सकता है जिसे वह जीतने की स्थिति में देखता है। यदि किसी क्षेत्र में मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच माना जा रहा हो, तो तीसरे दल को पसंद करने वाला मतदाता भी अपने वोट के संभावित परिणाम पर विचार कर सकता है। इस तरह छोटे दलों के लिए समर्थन होने के बावजूद वह सीट जीतने की स्थिति तक नहीं पहुंचता। इसे चुनावी ध्रुवीकरण और रणनीतिक मतदान के रूप में समझा जा सकता है।
2027 के विधानसभा चुनाव से पहले तीसरे विकल्प के सामने सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होना चाहिए कि भाजपा और कांग्रेस से कितनी नाराजगी है। असली सवाल यह होना चाहिए कि वह इस नाराजगी को विश्वसनीय राजनीतिक विकल्प में कैसे बदलेगा। इसके लिए तीन बुनियादी शर्तें जरूरी हैं। पहली, प्रदेशव्यापी संगठन और स्थानीय नेतृत्व। दूसरी, रोजगार, पलायन, खेती, शिक्षा, स्वास्थ्य और जमीन जैसे मुद्दों पर स्पष्ट कार्यक्रम। तीसरी, चुनाव के बाद भी जनता के बीच सक्रिय रहने की राजनीतिक इच्छाशक्ति। किसी दल को केवल चुनाव के समय दिखाई देने से राज्यव्यापी जनाधार नहीं मिलता। उत्तराखंड में तीसरी ताकत की सबसे बड़ी विफलता यह नहीं कि उसे कभी मौका नहीं मिला, बल्कि यह है कि जो मौके मिले, उन्हें स्थायी जनाधार में बदलने की क्षमता विकसित नहीं हो सकी। भाजपा और कांग्रेस की पकड़ का कारण केवल मतदाता की पसंद नहीं, बल्कि संगठन, संसाधन, नेतृत्व और चुनावी प्रतिस्पर्धा का पूरा ढांचा भी है।
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