शनिवार, 3 अक्टूबर 2026
असली ‘सिस्टम’ के फर्जी ‘कागज’
नौकरी से मेडिकल दाखिले तक सवालों में है सत्यापन व्यवस्था
उत्तराखंड में शिक्षक भर्ती से एमबीबीएस तक दस्तावेजों का खेल
19 एमबीबीएस सीटें रद्दकृ, सवाल सिर्फ फर्जीवाड़ा करने वालों पर
देहरादून। उत्तराखंड में फर्जी दस्तावेजों का मामला अब किसी एक भर्ती, किसी एक विभाग या किसी एक प्रमाणपत्र तक सीमित नहीं रह गया है। शिक्षक भर्ती से लेकर मेडिकल प्रवेश तक सामने आए मामलों ने सरकारी दस्तावेज सत्यापन व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे पहले शिक्षा विभाग का आंकड़ा देखिए। वर्ष 2024 में नियुक्त किए गए 2316 बेसिक शिक्षकों के दस्तावेजों की जांच के आदेश इसलिए हुए क्योंकि बड़ी संख्या में प्रमाणपत्रों को लेकर सवाल उठे थे। इनमें स्थायी निवास प्रमाणपत्र से जुड़ी गड़बड़ियों के मामले भी सामने आए। यानी सवाल किसी एक संदिग्ध प्रमाणपत्र का नहीं था। सवाल यह था कि नियुक्ति प्रक्रिया पूरी होने और अभ्यर्थियों के शिक्षक बन जाने के बाद दस्तावेजों की व्यापक जांच की जरूरत क्यों पड़ी?इसके बाद मामला और आगे बढ़ा। उत्तर प्रदेश से डीएलएड कर उत्तराखंड में प्राथमिक शिक्षक बने 152 शिक्षकों के प्रमाणपत्रों की जांच शुरू हुई। यह शिक्षक 11 जिलों से जुड़े बताए गए। यहां सबसे बड़ा सवाल हैकृयदि दस्तावेजों में पात्रता से जुड़ी शर्तें पूरी नहीं हो रही थीं तो नियुक्ति से पहले उनका सत्यापन किस स्तर पर हुआ?
फर्जी दस्तावेजों की सबसे चौंकाने वाली तस्वीर नीट-यूजी काउंसलिंग में सामने आई। सितंबर के आखिर तक उत्तराखंड में फर्जी प्रमाणपत्रों के आधार पर 19 एमबीबीएस सीटें रद्द की जा चुकी थीं। अलग-अलग मामलों में एससी, ओबीसी और स्वतंत्रता सेनानी आश्रित श्रेणी से जुड़े प्रमाणपत्रों पर सवाल उठे। यह मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि यहां फर्जी दस्तावेज का असर सीधे मेडिकल सीटों के आवंटन पर पड़ा, जिस सीट पर किसी पात्र अभ्यर्थी का अधिकार हो सकता था, वहां दस्तावेजों की सत्यता पर सवाल खड़ा हुआ। जांच में तो एक ऐसा मामला भी सामने आया, जिसमें एक ही पीपीओ नंबर का इस्तेमाल चार अभ्यर्थियों के लिए किए जाने की बात सामने आई। अब सवाल सिर्फ यह नहीं कि प्रमाणपत्र किसने बनाया। सवाल यह भी है कि एक ही रिकार्ड चार अलग-अलग दावेदारों के दस्तावेजों में कैसे पहुंच गया?
मामला यहीं नहीं रुका। दो अक्टूबर को सामने आई रिपोर्ट में एक ही प्रमाणपत्र संख्या के दो अलग-अलग नामों से जुड़े होने का मामला सामने आया। यानी डिजिटल रिकार्ड, प्रमाणपत्र संख्या और विभागीय सत्यापन की पूरी व्यवस्था के सामने एक बुनियादी सवाल खड़ा हो गयाकृक्या अलग-अलग विभागों के पास मौजूद रिकार्ड आपस में वास्तविक समय में जुड़े हुए हैं? उत्तराखंड सरकार की अपनी आनलाइन व्यवस्था में प्रमाणपत्र सत्यापन की सुविधा उपलब्ध है। चिकित्सा शिक्षा विभाग के नियम भी स्पष्ट करते हैं कि गलत सूचना या दस्तावेज सामने आने पर प्रवेश निरस्त किया जा सकता है और कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। इसके बावजूद यदि किसी अभ्यर्थी का फर्जी या संदिग्ध प्रमाणपत्र दाखिले अथवा नियुक्ति के स्तर तक पहुंच जाता है तो समस्या केवल अभ्यर्थी की नहीं रह जाती। यह सत्यापन तंत्र की कार्यप्रणाली का प्रश्न बन जाती है।
मेडिकल प्रवेश फर्जीवाड़े की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि स्वतंत्रता सेनानी आश्रित प्रमाणपत्र प्रकरण की जांच के लिए एसआईटी गठित करनी पड़ी। जांच आगे बढ़ी तो राजस्व विभाग के लेखपालों की भूमिका को लेकर भी सवाल सामने आए और पुराने मामलों की शिकायतें भी जांच के दायरे में आने लगीं। इसका अर्थ यह नहीं कि प्रत्येक अधिकारी या कर्मचारी इस मामले में दोषी है। लेकिन यह जरूर पूछना होगा कि प्रमाणपत्र जारी करने, सत्यापित करने और उसके आधार पर लाभ देने की पूरी श्रृंखला में जिम्मेदारी किसकी है?
आंकड़े अपने आप में यह साबित नहीं करते कि उत्तराखंड देश में फर्जी दस्तावेजों के मामलों में नंबर एक है। ऐसा दावा करने के लिए सभी राज्यों के समान आधार पर राष्ट्रीय आंकड़े जरूरी हैं। लेकिन यह आंकड़े एक बात जरूर साबित करते हैंकृराज्य में दस्तावेज सत्यापन की व्यवस्था पर गंभीर और सार्वजनिक जवाबदेही का सवाल खड़ा हो चुका है। अब सरकार से पांच सीधे सवाल है। नियुक्ति और दाखिले से पहले दस्तावेजों का पूर्ण डिजिटल सत्यापन क्यों नहीं? जिन प्रमाणपत्रों पर बाद में सवाल उठे, वह पहले चरण में सत्यापन से कैसे निकल गए? फर्जी प्रमाणपत्र जारी करने वाले स्रोत तक पहुंचने की कार्रवाई कितनी दूर पहुंची? जिन मामलों में लाभ मिल चुका था, वहां सरकारी तंत्र की जवाबदेही किस स्तर पर तय हुई? क्या सरकार सभी भर्ती और प्रवेश प्रक्रियाओं में प्रमाणपत्रों का एकीकृत डिजिटल सत्यापन लागू करेगी?
सबसे बड़ा सवाल यही हैकृफर्जी कागज बनाने वाला पकड़ा जाएगा, लेकिन वह कागज सरकारी व्यवस्था के भीतर पहुंचा कैसे? यही वह सवाल है जिसका जवाब केवल गिरफ्तारी, मुकदमे या सीट रद्द करने से नहीं मिलेगा। जवाब तब मिलेगा जब सरकार बताएगी कि फर्जी दस्तावेज की पहली एंट्री रोकने के लिए व्यवस्था में क्या बदला गया। क्योंकि अगर हर बार फर्जी दस्तावेज पकड़े जाने के बाद जांच शुरू होगी, तो व्यवस्था फर्जीवाड़ा रोक नहीं रही होगीकृसिर्फ उसका पता लगा रही होगी।
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